History of Jharkhand

A. झारखण्ड का इतिहास : स्वशासन 8×2 = 16 :

(क) मुण्डा शासन व्यवस्था (दो स्तरीय व्यस्था) (1 प्रश्न)

  • मुण्डा झारखण्ड में बसने वाली सबसे पुराणी जनजाति में से एक है | रिसा मुण्डा के नेतृत्व में लगभग 21 हजार मुण्डाओं ने झारखण्ड आये | यहाँ इन्होने जंगल को साफ कर खुटकट्टी गावं बसाए | इनके जमीन के मालिक को सूत-कट्टीदार कहते है |
  • मुण्डा गणतंत्र के पोषक थे , उनकी अपनी पारंपरिक शासन व्यवस्था पंचायती व्यवस्था ही रही है | इनके ग्राम पंचायत को पड़हा पंचायत कहा जाता है| सामान्यतः 5 से 21 गावं (हातु) को मिलकर पड़हा पंचायत बनता है |
  • पड़हा पंचायत : पड़हा पंचायत में पंच होते हैं जो मुख्यतः गांव के बड़े बूढ़े होते हैं |
  • इन्ही पडहा पंचायत के द्वारा मुण्डा गांव संचालित व नियंत्रित होते हैं | मुख्यतः 5-21 गांव मिलकर पडहा पंचायत बनता हैं |
  • प्रायः पडहा व्यवस्था गोत्र आधारित होता हैं और पंचायत में महिलाओं का स्थान नही होता था | शिक्षा के विकास के साथ सरकारी ग्राम पंचायत की व्यवस्था होने से अब महिलाएं ग्राम पंच्यातों में ग्राम सभा सदस्य / मुखिया आदि बनाने लगी है |सम्प्रति मुण्डा समाज पारंपरिक पड़हा पंचायत तथा सरकारी ग्राम पंचायत दोनों से संचालित हो रहा है |

मुण्डा शासन व्यवस्था के प्रमुख पद

  • हातु मुण्डा – हातु का अर्थ गांव होता है; जिसे मुंडा गांव भी कहा जाता है | हातु मुंडा अपने मुण्डा गांव का प्रधान होता हैं |
  • मुखिया – हातु पंचायत या ग्राम पंचायत के प्रमुख को मुखिया कहते हैं |
  • पाहन – मुंडाओं के पुजारी को पाहन कहते हैं |
  • पडहा पंचायत – हातु पंचायत से बड़ा पडहा पंचायत होता हैं |
  • पडहा राजा — पडहा पंचायत के सर्वोच्च अधिकारी को पडहा राजा कहते हैं | पडहा राजा को मानकी भी कहते हैं | यह कार्यपालिका ,विधायिका व न्यायपालिका का प्रमुख होता हैं | इसके द्वारा लिए गया निर्णय अंतिम होता हैं |
  • दीवान, कोतवाल पाण्डे, लाल, दरोगा और कर्ता ये सभी पद पड़हा राजा के सहयोग के लिए होते है पंचायत अखारा में बैठती है l अखारा गावं के मध्य में होता है यह इनका सांस्कृतिक केंद्र भी होता है

(ख) नागवंशी शासन व्यवस्था  (1 प्रश्न)

  • सुतियाम्बे के महारजा मदरा मुण्डा को 64 ई. में एक तालाब के किनारे नागफन के निचे एक बालक मिला | उस बालक का नाम फणी मुकुट रखा गया क्योकि वह नागफन के निचे प्राप्त हुवा था | जिसका लालन-पालन इन्होने अपने बेटे(मणि मुकुट) के साथ किया | उतराधिकार के प्रशन पर, फणी मुकुट राय विजय हुवा | इस तरह 83 ई. में फणी मुकुट सुतियाम्बे का महाराजा बने ओर मणि मुकुट उनका दीवान बने |
  • फणी मुकुट राय ने 83 ई. में अपने जन्म की घटना के आधार पर नागवंश शासन की नीव डाली और तब से नागवंशी शासन प्रमुख रूप से सुतियाम्बे, चुटिया, नागपुर, खुखरा, डोंएसा, पालकोट, तथा रातुगढ़ से चला
  • नागवंशियो की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था मदरा मुण्डा के समय से चलरही पड़हा पंचायत चलती रही | मदरा मुण्डा की शासन व्यवस्था ‘मदरा पंजी’ के नाम से जानी जाती है | इस व्यवस्था में पड़हा पंचायत से ही कोई निर्णय लिए जाते हैं और ज़मीन पर कोई लगान नही लिया जाता था |
  • लोगी को खेती की भूमि बनाने की छुट थी | एक जाती का कोई गोत्र जंगलो के बीच खेती बनता था | खेतो के बिच गावं बसाता था | गांव के मध्य अखरा बनाता था | गावं पूरा होने पर वह गावं बसे वाला सबसे पहले अपने गावं में लोहरा को दोना और कोना देकर बसाता था | फिर कुम्हार, तुरी, बुनकर अदि को भी दोना और कोना देकर बुलाता तथा बसाता था | बाद में ये भी अपनी खेती लायक जमीन बना लेते थे | छोटा-सा गावं इस तरह कई टोलों में मुण्डा टोला, कुम्हार टोली, लोहरा कोचा, जैसे बनकर बड़ा गावं बन जाता था | ज़मीन पर किसी भी तरह का लगन नागवंशी शासक नहीं लेते थे |
  • राजा-प्राजा सभी नृत्य संगीत के शौकीन थे | गावं के अखरा में सभी बिना किसी भेदभाव के एक साथ नाचते-गाते बजाते थे |
  • लोगो में सहयोग की भवन प्रबल थी अभाव होने पर बिना सूद के पंइचा मिल जाती थी | लोग बिहा जाति, धर्म, वर्ग, स्तर, भाषा, क्षेत्र के को सामान हृदय वाले संहिया बनाते थे | संहिया एक-दुसरे के सुख-दुःख में सहभागी होते थे

नागवंशी शासन व्यवस्था के कुछ महत्वपूर्ण पद : नागवंशी शासन व्यवस्था बिल्कुल सरल थी इसमें धीरे-धीरे कई पद और ओहदे बनाये जाते रहे

  • महतो – गांव के महत्वपूर्ण व्यक्ति को महतो कहते थे |
  • भंडारी – राजा के गांव में भंडारी का पद होता था जो राजा की खेती बारी करता था और अन्न भंडार में रखता था | और भंडारकोष की निगरानी करता था |
  • नागवंशी शासन के कुछ महत्वपूर्ण पद थे -महाराजा , कुंवर ,लाल व ठाकुर (घटते हुए क्रम में )|

(ग) पडहा पंचायत शासन व्यवस्था या उरांवों की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था(1 प्रश्न)

झारखण्ड में मुण्डाओ के बाद आने वालो में एक नाम उरांवो का आता है| इन्होने भी जंगल साफ़ कर गांव तथा खेती के लिए जमीन बनाए गांव भुंइहर गांव तथा जमीन को भुंइहरी जमीन कहा जाता है | जिसके मालिक को भुंइहर या भुइंहरदार भी करते है | उरांवों की अपनी पारंपरिक शासन व्यवस्था है मुंडाओं की तरह पड़हा पंचायत कहलाती है, परंतु इसके अपने स्वरुप हैं |

इसे उरांवों की पारंपरिक शासन व्यवस्था भी कहते हैं | पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था में पहले पाहन होते थे जो धार्मिक तथा सामाजिक आदि प्रन्संगो को को देखा करते थे | बाद में पाहन के सहयोग के लिए महतो का पद बना | इस तरह आरम्भ में  पाहन , महतो व गांव के बड़े बुजुर्ग पंचो के रूप में गांव का संचालन तथा निर्णय किया करते थे | सम्प्रति उरांवों में जो पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था है वह 3 स्तरीय है

1. ग्राम स्तर 2.पडहा राजा स्तर 3.पडहा दीवान स्तर | इनके अपने-अपने पदधारी होते हैं |

  • ग्राम स्तर पर हर गांव का एक प्रधान होता था जिसे महतो कहते हैं |
  • महतो भुइहर कुल का होता था , भुइहर कुल लोगों ने ही गांव को बसाया था | महतो के अधीन प्रशासन, न्याय तथा संपर्क पदधारी के कार्य होते हैं |
  • मांझी महतो का सहयोगी होता हैं जो महतो के हर पंचायती आदेशों को गांव वालो तक पहुचाता हैं |
  • पाहन धार्मिक अनुष्ठान , पर्व त्यौहार , शादी विवाह का कार्य सम्पादित करता हैं | पाहन महतो को पंचायत बैठक में भी सहयोग करता हैं |
  • बैगा पाहन का सहयोगी होता हैं |
  • पडहा राजा -5-21 गांव को मिलकर पडहा पंचायत बनता हैं जिसके प्रमुख को पडहा राजा कहते हैं |
  • पडहा दीवान – पडहा दीवान सर्वोच्च पदधारी होता हैं |उसके द्वारा लिए गए निर्णय अंतिम होते हैं |
  • पडहा शासन व्यवस्था में महिला व पुरुष दोनों पंचायत में उपस्थित हो सकते हैं |

(घ) मांझी परगना शासन व्यवस्था या संथालो की पारंम्परिक स्वशासन व्यवस्था |

  • झारखण्ड के आदिवासियों में संस्थालो की जनसँख्या सवार्धिक है | 2001 की जनगणन के अनुसार इनकी जनसँख्या लगभग 24 लाख है | इनकी पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था काफी प्राचीन है | परगना शासन व्यवस्था के अंतर्गत एक सुदृढ़ शासन व्यवस्था की स्थापना की गई है तथा इस शासन व्यवस्था के सफल क्रियान्वयन के लिए कई पदाधिकारियों की व्यवस्था की गई है । जो इसप्रकार है :
  • मांझी : यह संथाल गांव का मुख्य व्यक्ति होता था जिसे पंचायत के अध्यक्ष का पद प्राप्त था तथा वह अपने गांव में रहने वाले निवासियों के प्रतिनिधि के रूप में अपने कार्यों का निर्वाह करता था।  उसके प्रमुख कर्तव्य में शामिल थे -अपने गांव के अनाथ ,शोषण के शिकार, उत्पीड़न के शिकार तथा उन स्त्रियों का जिनके पति की मृत्यु हो चुकी है कि अधिकारों की रक्षा करना । कालांतर में मांझी के पद पर नियुक्त पदाधिकारी को लगान  वसुलने का भी अधिकार दे दिया गया । सच तो यह है कि मांझी अपने गांव वालों के बात व्यवहार धर्म-कर्म के लिए नैतिक रूप से जिम्मेदार है ।
  • जोग  मांझी : परगना शासन व्यवस्था में मांझी के बाद प्रमुख पदाधिकारी है जो वास्तव में मांझी के सहयोगी की हैसियत से कार्यों का निष्पादन करता है । दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि जोग मांझी गांव में प्रधान के बाद उप प्रधान की हैसियत रखता है । जोग मांझी ,माझी परगना शासन व्यवस्था में गांव वालों के लड़के लड़कियों के चारित्रिक व्यवहार पर नजर रखने के लिए  एक पदाधिकारी में रूप में व्यवस्था है ।  जोग  मांझी शादी-विवाह सम्बन्धी कार्यो के साथ-साथ सम्बंधित विवादों के वि निपटारा करता है ।
  • प्रनीक :  गावं का मुख्या सदस्य में से एक है | इन्हें उप मांझी का दर्जा प्राप्त है | मांझी के अनुपस्थिति में प्राणिक ही मांझी का काम देखता है | प्राणिक किसी अपराध के मामले में दण्ड निश्चित करता है |
  • जोग पारनिक  : मांझी परगना शासन व्यवस्था का एक अन्य महत्वपूर्ण पदाधिकारी जोग पारनिक है  जो मुख्य रूप से दो कार्यों को संपादित करता है /पहला वह जोग मांझी को उसके कार्यों के सफलतापूर्वक निष्पादन में सहायक की भूमिका निभाता है ।  दूसरा वह  गांव वालों के लिए हरकारा की भूमिका निभाते हुए उन तक सभी महत्वपूर्ण सूचनाओं को पहुंचाता है ।
  • गाडेत – मांझी परगना शासन व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण पदाधिकारी होता था जो वास्तव में मांझी  के सचिव के रूप में कम करता है और सहायक के रूप में कोषागार संभालता है ।
  • यहां यह उल्लेख करना जरूरी है इंन्ही पांच महत्वपूर्ण पदाधिकारियों के कारण पंचायत को “मोडे होड“ कहा जाता था जिसका शाब्दिक अर्थ पांच आदमी होता है । इन पांचों अधिकारियों का चुनाव प्रतिवर्ष भाग सिम त्यौहार के दौरान किया जाता था ,किंतु कालांतर में यह पद वंशानुगत हो गए ।
  • भाग्दो प्रजा : भाग्दो प्रजा गावं के कुछ प्रमुख सज्जन है जो गावं के प्रतेक मामले में विचार–विमर्श के लिए सभा में उपस्थित रहते हैंl प्रत्येक टोला में एक या दो लोग हो सकते हैl
  • लासेर टैंगेया : संगठनात्मकप्रमुख होता है जो ग्रामीणों को बहरी हमलो से सुरक्षा प्रदान करता हैl
  • नायके : धार्मिक पूजा पाठ संपन्न करता हैं और धार्मिक अपराधों के मामले में अपना फैसला सुनाता हैं |
  • कुड़ाम नायके : गांव के बाहर के देवी देवताओं की पूजा के लिए कुड़ाम नायके पदाधिकारी होता है ।

देश मांझी/मोड़ मांझी : मांझी परगना व्यवस्था के अंतर्गत इन पंचायतों में विभिन्न विवादो और सामाजिक समस्याओं पर निर्णय लिया जाता था | देश मांझी/मोड़ मांझी, मांझी पंचायत के ऊपर की संस्था थी जिसका अर्थ होता है पांच मांझिओ की पंचायत

परगनैत : देश मांझी के ऊपर का स्तर | जो गावं के मांझियों का प्रधान होता है | जिस मामलो को देश मांझी नहीं निपटा सकते वस मामला को परगनैत के पास सम्बंधित गावं के मांझी द्वारा लाया जाता है |

दिशुम परगना : कुछ क्षेत्रो में सभी परगनैत के ऊपर के दिसुम परगना होता है | जब कोई मामला प्रनानैतो द्वारा नहीं निपटाया जाता तो ऐसे मामलो को दिशुम परगना के सभा में निपटाया जाता है |

मांझी परगना शासन व्यवस्था या संथालो की पारंम्परिक स्वशासन व्यवस्था

(ड.) मुण्डा मानकी शासन व्यवस्था

  • यह हो लोगों की पारंपरिक शासन व्यवस्था हैं |
  • इस शासन व्यवस्था में ग्राम प्रधान / मुखिया को मुण्डा कहा जाता हैं जिसका कार्य प्रशासन व न्याय को संभालना व लगान वसूलना हैं |
  • डाकुआ , ग्राम प्रधान के सहयोग के लिए होते हैं जिनका कार्य मुण्डा के द्वारा दिए गए सामाजिक व प्रशासन संबंधी सूचना लोगों तक पहुचाना हैं |
  • मानकी – 15-20 गांव के ऊपर एक मानकी का पद होता हैं जो इन सब गांव का प्रमुख होता हैं |
  • तहसीलदार लगान वसूली में मानकी का सहयोगी हैं |
  • ग्राम पुजारी को दिउरी कहते हैं |

(च) ढ़ोकलो सोहोर शासन व्यवस्था :यह खड़िया समाज की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था हैं | इसमें ग्राम पंचायत के अध्यक्ष को ढ़ोकलो सोहोर कहा जाता हैं |

खड़िया स्वशासन के प्रमुख पद–

  • करटाहा- हरेक गांव में एक करटाहा होता है जिसे गांव के 20-25 अनुभवी लोग मिलकर चुनते है |करटाहा गांव में असामाजिक कार्य करने वाले को दंड देता है |
  • रेड – यह करटाहा से बड़ा पद होता है |
  • परगना का राजा – यह ग्राम परगना का शासन ,न्याय व अन्य मामला देखता है |यह रेड से बड़ा पद होता है |
  • खड़िया राजा – खड़िया महासभा का सर्वोच्च सभापति होता है |इसका निर्णय अंतिम होता है |
  • लिखाकड़ (सचिव या मंत्री )– यह राजा के सामाजिक, राजनैतिक व प्रशासनिक कार्यों में मदद करता है |
  • तिजाड़कड – ये खाजांची होते है जो राजा के आय व्यय का विवरण रखता है |

(छ) जातीय पंचायत

  • सभी आदिवासी जनजातिये सदानो की अपनी जातीय पंचायत अपने अपने नाम से पारंपरिक रूप में होता हैं |
  • जातीय पंचायत ग्राम स्तर , सवडिवीजन , जिला , राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर पर बनते हैं ,और अपने क्षेत्राधिकार का प्रयोग मुखिया , प्रमुख , प्रधान आदि करते हैं |
  • हत्या , चोरी , डकैती आदि के मामले जातीय पंचायत नही देखती |
  • जातीय पंचायत में मुख्यतः सामाजिक , जमीन तथा वैवाहिक मामलों का समाधान अधिक होता हैं |आज कल यह लोक अदालत के रूप में अधिक लोकप्रिय हो रहा हैं |
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