झारखण्ड में राष्ट्रीय चेतना का प्रसार एवं क्रांतिकारी  गतिविधियां

राष्ट्रीय स्तर पर 1857 ई. के विप्लव के बाद का दशक राष्ट्रीय जागरण के विकास के लिए काफी महत्वपूर्ण रहा। 1885 ई. में मुम्बई में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के साथ ही राष्ट्रीय आंदोलन को एक नई दिशा मिली। कांग्रेस के प्रारंभिक वर्षों में भी झारखण्ड क्षेत्र के निवासियों ने इसके प्रति अपार उत्साह दिखाया एवं इसके वार्षिक अधिवेशनों में वहाँ के प्रतिनिधि भारी संख्या में भाग लेते रहे।

20वीं सदी के प्रथम डेढ़ दशक में छोटानागपुर में कांग्रेस की अपेक्षा क्रांतिकारी अधिक सक्रिय रहे। सिंहभूम स्थित जमशेदपुर भी इस काल में क्रांतिकारियों का प्रमुख केंद्र रहा। यहाँ ढाका, मेमन सिंह और कोलकाता के क्रांतिकारी शरण लेते थे तथा क्रांतिकारी विचारों का प्रचार-प्रसार करते थे। यहाँ के अनेक क्रांतिकारियों का संबंध विदेशों में रह रहे भारतीय क्रांतिकारियों से था। सिंहभूम स्थित अनेक क्रांतिकारी जमशेदपुर स्थित ‘टाटा कंपनी’ के कर्मचारी थे। इनमें से मुख्य दुर्गादास बनर्जी एवं सत्य रंजन थे। सत्य रंजन की मित्रता एक महिला क्रांतिकारी मोहनी मोहन राय से भी बतायी जाती है। अप्रैल, 1916 ई. में अलीपुर जेल से मुक्त सुधांशु भूषण मुखर्जी नामक क्रांतिकारी का क्षेत्र प्रारंभ में सिंहभूम ही था, जो बाद में हजारीबाग में रहने लगे। कोलकाता निवासी गिरीन्द्र | नाथ मुखर्जी सिंहभूम में रहने वाले अपने भाई अमर नाथ मुखर्जी से मिलकर यहाँ के नौजवानों को क्रांति का पाठ पढ़ाता था। गिरीन्द्र नाथ मुखर्जी ने 1902 ई. में अमेरिका तथा जापान तक की यात्रा की थी तथा अपने विदेश प्रवास के | दौरान भी वह यहाँ क्रांतिकारी साहित्य भेजता रहा। 1908 ई. में गिरीन्द्र नाथ | मुखर्जी ने न्यूयार्क में स्पष्ट घोषणा की कि रक्तरंजित क्रांति से ही भारत को मुक्त कराया जा सकता है। बाका निवासी सुरेन्द्र कुमार राय भी टाटा कंपनी | की नौकरी के साथ-साथ क्रांतिकारियों की मदद करता था। उन दिनों भारत के | प्रमुख क्रांतिकारी अमेरिका स्थित ‘हिन्दुस्तान एसोसिएशन’ संगठन से जड़े हुए थे तथा उनमें से कई चाईबासा तथा जमशेदपुर में रहते थे। कई क्रांतिकारियों का संबंध जापान और जर्मनी की ‘रिवोल्युशनरी पार्टी’ (Revolutionary Parly) से भी था। उस तरह बंगाल के कई क्रांतिकारी सिंहभूम क्षेत्र में रहकर भारतीय | स्वतंत्रता की पृष्ठभूमि तैयार कर रहे थे। अत: बंगाल सरकार की इस क्षेत्र पर | खास नजर रहती थी।

वर्तमान में झारखण्ड प्रदेश की राजधानी राँची भी इस काल में क्रांतिकारियों का प्रमुख शरण स्थल था। गणेश चंद्र घोष के नेतृत्व में राँची क्रांतिकारियों का प्रमुख अड्डा बन गया, क्योंकि मानभूम का क्षेत्र कोलकाता के निकट होने से बंगाल में चल रहे क्रांतिकारी आंदोलन का प्रभाव इस क्षेत्र पर सर्वाधिक रहा। | बंगाल के क्रांतिकारी यहाँ लगातार पहुँचते रहे तथा राँची और आस-पास के क्षेत्रों | में पनाह लेते रहे। हाबड़ा स्थित बेलूर मठ का शचिन्द्र कुमार सेन डोरंडा आकर | अपने पिता के पास ठहरता था। पुलिस उसे क्रांतिकारियों से मिला हुआ मानती थी। एक अन्य क्रांतिकारी हेमंत कुमार बोस नवम्बर, 1913 ई. में राँची आकर | पी. एन. बोस के पास ठहरा था। इसी काल में हजारीबाग में क्रांतिकारियों | का आगमन हुआ। इनमें से रजतनाथ राय और सुधांशु भूषण मुखर्जी का नाम | उल्लेखनीय है। रजतनाथ हजारीबाग स्थित अपने ससुराल में ठहरता था, जबकि सुधांशु भूषण जमशेदपुर से आकर यहाँ रहने लगा था। हजारीबाग स्थित प्रसिद्ध संत कोलंबस कॉलेज के छात्रों के बीच भी क्रांतिकारी विचारधारा का विकास हुआ, साथ ही यहाँ के अनेक छात्रों का संपर्क क्रांतिकारियों से भी रहा। यहाँ अध्ययनरत एक क्रांतिकारी छत्र राम विनोद सिंह को ‘हजारीबाग का जतिन बाघा’ की संज्ञा दी गई।

बाद में इसे सरकार ने 14 दिसंबर, 1918 ई. को गिरफ्तार कर लिया। यहाँ के अन्य क्रांतिकारी छात्रों में बजरंग सहाय और कृष्ण बल्लभ सहाय का नाम उल्लेखनीय है। गिरिडीह जिला भी क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र रहा। जनवरी, 1913 ई. में यहाँ अनेक स्थलों पर ‘आवर स्वाधीन भारत’ शीर्षक बाले परचे चिपकाए गए। यह परचा बंगाल स्थित चौबीस परगना से यहाँ जीवन क्रिस्टो राय द्वारा लाया गया था।

वस्तुतः छोटानागपुर क्षेत्र में डॉ. यदुगोपाल मुखर्जी तथा बसावन सिंह के नेतृत्व में क्रांतिकारी आंदोलन 1931-32 तक फलता-फूलता रहा। राष्ट्रीय स्तर के क्रांतिकारी भी यहाँ आश्रय पाते रहे। काकोरी षड्यंत्र केस के प्रमुख अभियुक्त अशफाक उल्ला खाँ, कोलकाता के प्रफुल्ल चंद्र घोष और ज्योति पंत राय जैसे कुछ क्रांतिकारी भी यहाँ उन दिनों पनाह लेते थे।

राष्ट्रीय चेतना का प्रसार एवं क्रांतिकारी गतिविधियों से सम्बंधित प्रमुख तथ्य (for MCQs)

  • 1912 . के पूर्व झारखण्ड संयुक्त बंगाल का ही भाग थाअतः बंगाल के क्रांतिकारी आंदोलन का इस क्षेत्र पर गहरा प्रभाव पड़ा।
  • रांची क्रांतिकारियों का एक प्रमुख केन्द्र था। यहां गणेश चन्द्र घोष ने क्रांतिकारियों का नेतृत्व किया।
  • 1913 ई. में गिरिडीह में निर्मल चन्द बनर्जी ने खंभों पर ‘आवा स्वाधीन भारत’ शीर्षक के पर्चे चिपकाये। ये पर्चे 24 परगना के इन्द्रभूषण राय के पुत्र जीवन क्रिस्टो राय द्वारा गिरिडीह लाये गये।
  • देवघर क्रांतिकारियों का प्रमुख केन्द्र था।
  • देवघर में ‘स्वर्ण संघ’ नामक एक संस्था कायम की गयी थी जिसका उद्देश्य क्रांतिकारी क्रियाकलापों का प्रसार करना था।
  • बारीन्द्र कुमार घोष इस संघ के प्रमुख सदस्यों में से एक थे।
  • देवघर में स्थित ‘शीलेर बाड़ी’ नामक मकान का उपयोग क्रांतिकारी बम बनाने तथा अपने सहयोगियों को प्रशिक्षित करने में किया करते थे। 1915 ई. में इस मकान से बम बनाने की सामग्रियां बरामद हुई।
  • 1915 ई. में देवघर में शान्ति कुमार बख्शी द्वारा युवकों को क्रांतिकारी प्रशिक्षण दिया जाता था।
  • जमशेदपुर (सिंहभूम) में ढाका, मेमनसिंह तथा कलकत्ता के क्रांतिकारी आकर गुप्त प्रचार करते थे। उनमें से कुछ का सम्पर्क तो विदेशों में रह रहे क्रांतिकारियों से भी था।
  • सिंहभूम क्षेत्र में 1916 में अलीपुर जेल से मुक्त सुधांशु भूषण मुखर्जी नामक क्रांतिकारी सोनुआ गांव में रहता था। बाद में यह हजारीबाग में रहने लगा।
  • टाटा कम्पनी में कार्यरत अमरनाथ मुखर्जी रक्तरंजित क्रांति से भारत को मुक्त कराना चाहता था। 1908 ई. में उसने न्यूयार्क से स्पष्ट घोषणा की कि रक्तरंजित क्रांति से ही भारत को मुक्त किया जा सकता है।
  • ढाका निवासी सुरेन्द्र कुमार राय भी टाटा कम्पनी की नौकरी के साथ-साथ क्रांतिकारियों की मदद करता था।
  • संत कोलम्बा महाविद्यालय हजारीबाग के कुछ छात्र भी क्रांतिकारियों से मिले हुए थे। हजारीबाग में बाघा जतिन के नाम से पुकारे जाने वाले छात्र राम विनोद सिंह को 14 दिसम्बर, 1918 को गिरफ्तार किया गया।
  • राष्ट्रीय स्तर के कुछ क्रांतिकारी भी झारखण्ड में आश्रय पाते रहे। काकोरी केस के प्रमुख अभियुक्त असफाकउल्ला खां, कलकत्ता के फुल्ल चन्द्र घोष तथा ज्योति पंत राय यहां कुछ दिनों तक छुपे रहे।
  • वस्तुतः झारखण्ड क्षेत्र में क्रांतिकारी आन्दोलन 1931-32 ई. तक फलता-फूलता रहा, जिसका नेतृत्व डॉ. यदुगोपाल मुखर्जी तथा बसावन सिंह के हाथों में था।

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