1857 का विद्रोह और झारखण्ड

कारण एवं गतिविधियां

कोल विद्रोह के दमन के पश्चात् लगभग ढाई दशकों की अवधि में छोटानागपुर के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रशासनिक परिवर्तन हुए। फलतः साउथ-वेस्ट फ्रंटियर एजेंसी (South-west frontier Agencies 1834 में गठित इस एजेंसी का मुख्यालय किशुनपुर (राँची) था) के अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा झारखण्ड में अधिक विकास का कार्य हुआ। किन्तु इस विकास के पीछे औपनिवेशिक शासन के मानवीय पहलू न होकर आर्थिक शोषण और विदोहन जैसे स्वार्थ-सिद्धि के पहलू थे।

ब्रिटिश-विरोधी आंदोलनों की श्रृंखला में 1857 ई. का विप्लव सबसे महत्वपूर्ण और साथ ही अंतिम चुनौती सिद्ध हुआ। सामान्य जनता, विशेषतः आदिवासी प्रजा सरकार द्वारा बल-प्रदर्शन से केवल अस्थायी रूप से ही प्रभावित हुई थी। उनकी शिकायतें बढ़ती रहीं और जब 1857 ई. का आंदोलन शुरू हुआ तो झारखण्ड का क्षेत्र भी अछूता न रहा और यहाँ की जनता ने इसमें खुलकर भाग लिया। छोटानागपुर क्षेत्र में विद्रोह का प्रारम्भ 12 जून, 1857 ई. को देवघर जिले के गाँव रोहिणी के सैनिकों के विद्रोह से हुआ। दो अंग्रेज अधिकारी मारे गए, मगर विद्रोह विफल रहा। हजारीबाग स्थित रामगढ़ बटालियन ने 30 जुलाई, 1857 ई. को दिन के 1 या 2 बजे विद्रोह कर दिया। विद्रोहियों ने सर्वप्रथम प्रिंसिपल असिस्टेंट मेजर सिम्पसन तथा अन्य अंग्रेज अधिकारियों के बंगलों को आग लगा दी। सरकारी दफ्तरों तथा महाफिजखाना को लूट लिया गया। विद्रोहियों ने दिन में लगभग 3 बजे जेल से कैदियों को छुड़ा लिया। यह सब करने के बाद विद्रोही सैनिकों का ध्यान अंग्रेज अधिकारियों को पकड़ने की ओर गया लेकिन अंग्रेज अधिकारी एक गुप्त सूचना पर पहले ही (29 जुलाई, 1857 ई. को) हजारीबाग छोड़ कोलकाता की तरफ प्रस्थान कर चुके थे। यहाँ के विद्रोहियों का प्रमुख नेता सुरेन्द्र शाही थे।

उधर अंग्रेजों से सहानुभूति रखने वालों की भी कमी नहीं थी तथा वे अपनी जमींदारी और ब्रिटिश हुकूमत की सलामती के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर रहे थे। रामगढ़ के राजा शंभु नारायण सिंह ने गवर्नर-जनरल कैनिंग को तार से विद्रोह की सूचना भेजी तथा अपने भाई को लोगों को समझाने-बुझाने का निर्देश दिया। इतना ही नहीं राजा ने अंग्रेज अधिकारियों को सैन्य-सहायता भी दी, किंतु राजा के अधीनस्थों में से अधिकांश ने विद्रोहियों का साथ दिया। हजारीबाग के विद्रोह में जनजातियों ने भी विद्रोहियों का साथ दिया। इनमें से अधिकांश संथाल और भुइयाँ टिकैत थे। जनजातियों के मुख्य निशाने पर अंग्रेजी सरकार के प्रतिनिधि के रूप में साहूकार और महाजन रहे, जो कि इनके शोषणकर्ता थे।।

1 अगस्त, 1857 ई. को ले. ग्राह्य के अधीन सैनिकों ने डोरंडा (राँची) में विद्रोह कर दिया। इनका नेतृत्व जमादार माधव सिंह और सूबेदार नादिर अली खां कर रहे थे। विद्रोहियों ने सैनिक टुकड़ी में शामिल काफी साजो-सामानों को अपने कब्जे में कर लिया। डोरंडा के विद्रोही अगले दिन राँची पहुँचे। 2 अगस्त, 1857 ई. को पूरे राँची-डोरंडा पर माधव सिंह, जयमंगल पांडेय और नादिर अली खां का कब्जा हो गया। यहाँ पर उन्होंने डिप्टी कमिश्नर ओक्स और कप्तान मानक्रियफ की कोठियां जला दी और जेल से सभी कैदियों को छुड़ा लिया। मेन रोड स्थित गॉस्नर चर्च पर भी विद्रोहियों ने गोले दागकर उसे तहस-नहस कर डाला। इतना सब करने के बाद भी आगे के कार्यक्रम के बारे में उनके पास कोई निश्चित रूप-रेखा नहीं थी। विद्रोहियों के पास केवल बाबू कुंवर सिंह से मिलने के अलावा कोई अन्य कार्यक्रम नहीं था। सबसे बड़ी बात थी कि विद्रोहियों के पास उचित नेतृत्व का अभाव था। अतः उन्होंने अपने नेतृत्व और कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए नागवंशी राजाओं के दीवान रह चुके पांडेय गणपत राय को मनाया। हटिया के ठाकुर विश्वनाथ शाही ने पहले टाल-मटोल की, लेकिन विद्रोही सैनिकों के दबाव के कारण वह भी नेतृत्व करने के लिए तैयार हो गए। इस तरह डोरंडा के सैनिक विद्रोहियों ने पांडेय गणपत राय को अपना सेनापति और विश्वनाथ शाही को अपना नेता चुन लिया।

किन्तु यहाँ भी नागवंशी राजाओं और जमींदारों ने विद्रोह को दबाने में अंग्रेजों का साथ दिया और उनकी मदद की। इतना होने पर भी छोटानागपुर-खास में ब्रिटिश शासन समाप्त जान पड़ता था। यहाँ भी अंग्रेजी सरकारी संपत्ति को विद्रोहियों ने नुकसान पहुंचाया। आगे बढ़ने के क्रम में विद्रोही सैनिकों का 2 अक्टूबर, 1857 को चतरा में अंग्रेजी सेना से युद्ध हुआ एवं विद्रोहियों की पराजय हुई। विद्रोही सैनिकों में से प्रमुख माधव सिंह मैदान छोड़ कर भाग गया तथा इनके नेता पांडेय गणपत राय और ठाकुर विश्वनाथ शाही अंग्रेज सैनिकों के डर से लोहरदगा के जंगल में छिप गए और 3 अक्टूबर, 1857 को जयमंगल पांडेय और नादिर अली खाँ भी पकड़े गए तथा उन्हें 4 अक्टूबर, 1857 को फांसी दे दी गई। अत: इन विद्रोही सैनिकों का मनोबल टूट गया। अंततः अपने साजो-समान के बल पर अंग्रेज 22 अक्टूबर, 1857 को डोरंडा क्षेत्र में हुए विद्रोह को पूरी तरह कुचलने में सफल रहे।

चतरा युद्ध को जीतने के पश्चात् अंग्रेजों के सामने एक नई समस्या खड़ी हो गई, जब चतरा युद्ध से भागे तथा डोरंडा के सैनिक विद्रोहियों के दो प्रमुख नेता पांडेय गणपत राय और ठाकुर विश्वनाथ शाही ने लोहरदगा के जंगलों में छिपकर सरकार के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध शुरू कर दिया। विद्रोहियों में भय पैदा करने के लिए कप्तान मैकडोनाल्ड ने मद्रासी फौज की सहायता से उमरांव सिंह, उसके दीवान शेख भिखारी तथा प्यासी सिंह को पकड़ लिया और राँची स्थित राँची पहाड़ी के निचले हिस्से में 8 जनवरी, 1858 ई. को उन्हें फांसी दे दी गई। इस ऐतिहासिक फांसी स्थल को आज भी टुंगरी-फाँसी के नाम से जाना जाता है।

हालांकि बकुर विश्वनाथ शाही और पांडेय गणपत राय अभी भी सरकारी पकड़ से बाहर थे। मार्च, 1858 में कप्तान ओक्स ने कोल और संथाल सैनिकों की मदद से इन्हें घेरने में सफल रहा। विश्वनाथ दुबे और महेश नारायण शाही की गद्दारी के कारण कुछ दिनों के अंतराल पर दोनों पकड़े गए। जुडिशियल कमिश्नर की अदालत में एक संक्षिप्त मुकदमे के बाद 16 अप्रैल, 1858 ई. को ठाकुर विश्वनाथ शाही और 21 अप्रैल, 1858 ई. को पांडेय गणपत राय को फाँसी दे दी गई।

हजारीबाग तथा सूची में जब विद्रोह हुआ तो पलामू भी अछूता नहीं रह सका तथा वहाँ भी इसकी सहज एवं स्वाभाविक प्रतिक्रिया हुई। पलामू के निवासियों, विशेषतः जनजातियों ने इसमें खुलकर भाग लिया। अंतिम चेर शासक चूड़ामन को अंग्रेजों ने जिस तरह गद्दी से बेदखल किया था, उसे आज तक चेर भूल नहीं पाए थे। चेरो से भी बढ़कर खरवारों और उनके ही शाखा के भोगताओं ने विद्रोह में सक्रिय हिस्सा लिया। पलामू में इस आंदोलन के प्रमुख नेता नीलांबरऔर पीतांबर भोगता ने मिलकर क्रांति का शंखनाद किया और अपने को स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया। 26 सितंबर, 1857 ई. को चकला के भवानी बक्श राय भी इस विद्रोह में शामिल हो गए। इस तरह पलामू के चेर-खरवार भी कंपनी शासन के विरुद्ध एकजुट हो गए। पलाम के विद्रोहियों को लोहरदगा के जंगलों में छिपे कर विश्वनाथ शाही और पांडेय गणपत राय की ओर से भी प्रोत्साहन मिल रहा था। जनवरी, 1859 ई. तक उनका पलामू पर पूरी तरह कब्जा हो गया था। पलामू के विद्रोहियों ने गुरिल्ला युद्ध पद्धति अपना कर अंग्रेजों को बुरी तरह तबाह कर दिया। अंततः ब्रिटिश सरकार ने इनके बीच फूट डालने के लिए चेरो-भोगता गठबंधन में दरार पैदा करने के लिए ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति का सहारा लिया और इसमें अंग्रेजों को सफलता मिली। गठबंधन में बिखराव होते ही अंग्रेजों ने विद्रोहियों को कुचल दिया। पलामू की स्थिति अंततः फरवरी, 1859 ई. तक सामान्य हो गई।

ब्रिटिश सेना से अपनी अंतिम पराजय के दो दशक बाद भी सिंहभूम और विशेषतः कोल्हन क्षेत्र की जनजातियों ने विदेशी शासन को अंत:करण से स्वीकार नहीं किया था। अत: जब राँची और हजारीबाग के सैनिकों ने विद्रोह किया तो यहाँ के सैनिक भी उससे अछूते नहीं रह सके। 3 सितम्बर, 1857 ई. को भगवान सिंह तथा रामनाथ सिंह के नेतृत्व में यहाँ के सैनिकों ने भी विद्रोह कर दिया। इस विद्रोह में सैनिकों को पोरहाट के राजा अर्जुन सिंह का भी सहयोग मिला। यहाँ के (कोल्हन क्षेत्र के) अनेक मुंडाओं और मानकियों ने चक्रधरपुर तथा अरोचिआ गाँव में एकत्र होकर राजा अर्जुन सिंह के प्रति वफादारी का व्रत लिया। कंपनी सरकार से लड़ने के प्रतीक रूप में कोल्हन क्षेत्र में गाँव-गाँव में तीर घुमाया गया। यहाँ विद्रोहियों के समर्थक के रूप में राजा अर्जुन सिंह, जग्गु दीवान, रघुदेव और श्यामकर्ण थे, तो दूसरे विद्रोहियों के विरोधी अर्थात् कंपनी समर्थक सरायकेला के राजा चक्रधर सिंह थे। यहाँ के विद्रोहियों और अंग्रेज सैनिक के बीच कई मुठभेड़ हुई, जिसमें दोनों पक्षों के लोग शामिल थे। कोल्हान क्षेत्र लंबे समय तक अशांत रहा। फरवरी, 1859 ई. तक पूरे सिंहभूम में सेना सक्रिय रही। फलतः अनेक विद्रोही पकड़े गए या आत्मसमर्पण कर दिए। अंग्रेजों के क्रूर दमन के आगे इनका टिकना मुश्किल था। यहाँ प्रमुख विद्रोही नेता अर्जुन सिंह ने स्वयं 16 फरवरी, 1859 ई. को डाल्टन के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया।

स्वरूप :

1857 ई. के विद्रोह का स्वरूप झारखण्ड के सभी क्षेत्रों में एक-सा नहीं था। छोटानागपुर-खास में यह आंदोलन मुख्यतः सशस्त्र सैनिकों का आंदोलन था, जबकि सीमावर्ती पलामू में इसने जन-विद्रोह का रूप ले लिया था। समाज के विभिन्न वर्ग के लोग अपने पारंपरिक नेताओं, जमींदारों तथा जागीरदारों के नेतृत्व में ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने के लिए सक्रिय हो उठे थे। नीलांबर-पीतांबर बंधुओं के प्रयास से यह आंदोलन सामान्यजन तक पहुँच गया था। छोटानागपुर-खास में इस आंदोलन का प्रभाव मुख्यतः राँची शहर तथा लोहरदगा के आस-पास के इलाकों तक सीमित रह गया। जनजातियों से विद्रोहियों को कुछ खास सहायता नहीं मिली। जनजातियों की उदासीनता का सबसे महत्वपूर्ण कारण था नेताओं के प्रति उनका अविश्वास, क्योंकि नेता छोटानागपुर के बाहर के थे। पुनः इस आंदोलन के अंतिम दिनों में छोटानागपुर-खास में विद्रोहियों ने निजी संपत्ति की अगाध लूट-पाट शुरू कर दी थी, जिससे जनता की सहानुभूति इनके प्रति नहीं रही। विद्रोहियों द्वारा जेल से छुड़ाए गए कैदियों और असामाजिक तत्वों ने आंदोलन को बदनाम कर दिया था। रामगढ़ बटालियन के सैनिकों ने जेल से मुक्त किए गए कैदियों के साथ मिलकर लूट-पाट की थी। उन्होंने व्यापारियों के साथ-साथ सामान्य जन को भी लूटा था। 1857 ई. के विद्रोह ने व्यापक प्रभाव छोड़ा और अब कंपनी का शासन समाप्त हुआ और ब्रिटेन के सरकार ने भारत का शासन प्रत्यक्षतः अपने हाथों में ले लिया।

परिणाम : –

हालांकि 1857 ई. का विद्रोह अपने तात्कालिक लक्ष्य को पाने में विफल रहा, लेकिन इसका दूरगामी प्रभाव पड़ा। यह राष्ट्रभक्तों के लिए प्रेरणास्रोत बना और इसने राष्ट्रीय चेतना के उदय एवं विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

  1. यद्यपि 1857 ई. का विद्रोह ब्रिटिश सरकार के द्वारा सफलतापूर्वक कुचल दिया गया, तथापि ब्रिटिश सरकार इस निष्कर्ष पर पहुँची कि यदि उसे भारत में अपना साम्राज्य बनाये रखना है, तो भारत में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन के स्थान पर उसका स्वयं का प्रत्यक्ष शासन स्थापित होना आवश्यक है। तदनुसार, 2 अगस्त, 1858 ई. को ब्रिटिश संसद के द्वारा एक अधिनियम पारित किया गया, जिसके अनुसार भारत में इस्ट इण्डिया कम्पनी का शासन समाप्त हुआ और भारत में ब्रिटिश क्राउन (ताज) का प्रत्यक्ष शासन आरंभ हुआ। भारत के गवर्नर जनरल को वायसराय (ब्रिटिश क्राउन का प्रतिनिधि) का दर्जा दिया गया।
  2. 1 नवम्बर, 1858 ई. को इलाहाबाद में एक दरबार आयोजित किया गया, जहाँ महारानी विक्टोरिया की घोषणा भारत के प्रथम गवर्नर जनरल व वायसराय लार्ड कैनिंग द्वारा पढ़कर सुनाई गई। महारानी की इस घोषणा के द्वारा ईस्ट इण्डिया कम्पनी के साथ की गई सभी संधियों की पुष्टि की गई और भारत के देशी रियासतों के नरेशों को यह आश्वासन दिया गया कि उनके सभी अधिकार रक्षित किए जायेंगे। वस्तुतः महारानी विक्टोरिया की इस घोषणा के परिणामस्वरूप भारत के देशी रियासतों के सभी नरेश उसके अधीन हो गए।
  3. विद्रोही नेताओं की संपत्ति जब्त कर ली गई और उनके बीच बाँट दी गई, जिन्होंने अंग्रेजों का साथ दिया था।
  4. 1857 के विधान XV (Rule xv of 1857) के तहत, जिनकी संपत्ति (जमींदारियाँ) जब्त की गई, उनके नाम हैं-सिंहभूम जिलान्तर्गत पोरहाट के राजा अर्जुन सिंह, राँची व पलामू जिलान्तर्गत बरकागढ़ के ठाकुर विश्वनाथ शाही, भोरों के पाण्डेय गणपत राय, खुटूंगा के टिकैत उमरांव सिंह, खुदरा लोबोना के शेष भिखारी, पाकुरडीह के बहोरन सिंह, तिसिया के चम्भू शाही एवं हसेर के नीलाम्बर शाही, पीताम्बर शाही व रेंगा सिंह।
  5. विद्रोह के दौरान कम्पनी सरकार को सहायता पहुँचाने वालों को पुरस्कृत किया गया। नागवंशी महाराज जगन्नाथ शाह देव का धन्यवाद ज्ञापन किया गया। विश्वनाथ शाही तथा पाण्डेय गणपत राय को पकड़वाने वाले विश्वनाथ दुबे तथा महीप नारायण शाही जन-आक्रोश के भय से अपना इनाम लेने के लिए सामने नहीं आए। देव के राजा तथा पिठौरिया के परगनत जगतपाल सिंह को खिल्लत तथा पेंशन प्रदान की गई। जगतपाल सिंह के वंशज जनक सिंह को राँची दरबार (जनवरी, 1877 ई.) में सम्मानित किया गया। नावागढ़ के शिवचरण राय को खिल्लत दी गई और उसकी जागीर में वृद्धि की गई। मणिका के जागीरदार कुँवर वैद्यनाथ सिंह के पुत्र कुंवर भिखारी सिंह को खिल्लत दी गई तथा जागीर में 5 गाँवों को वृद्धि की गई। रंका के ठकुराई किशुन दयाल सिंह और चैनपुर के ठकुराई रघुवर दयाल सिंह को ‘राय बहादुर’ का खिताब प्रदान किया गया। रघुवर दयाल सिंह के पुत्र ठकुराई जगन्नाथ दयाल सिंह को राँची दरबार (जनवरी, 1877 ई.) में सम्मानित किया गया।
  6. कुछ देशी सैनिकों को उनकी सेवाओं के लिए पुरस्कृत किया गया। सूबेदार शेख पंचकौड़ी, हवालदार आरजू एवं नायक तारा सिंह को चतरा की लड़ाई में महत्वपूर्ण योगदान के लिए तीसरी श्रेणी का ‘ऑर्डर ऑफ मेरिट’ प्रदान किया गया।
  7. लेफ्टिनेंट डॉट को ‘विक्टोरिया क्रॉस’ से सम्मानित किया गया। इसी तरह साजेन्ट डाइनन (मरणोपरात) को “विक्टोरिया क्रॉस’ से सम्मानित किया गया।
  8. विद्रोह की समाप्ति के बाद छोटानागपुर को लड़ाकू (युद्धप्रिय) जनजातियों जैसे कोलों, संथालों आदि में से कुछ को सेना में भर्ती किया जाने लगा।
  9. रामगढ़ बटालियन के संघटन में भी परिवर्तन किया गया। इस बटालियन में सिक्खों और गोरखाओं को भर्ती किया जाने लगा। इसी तरह, इस बटालियन में दुसाधों को भी भर्ती किया जाने लगा।
  10. झारखण्ड में ब्रिटिश ताज के सीधे शासन के कारण प्रशासन में सुधारों की प्रक्रिया आरंभ हुई। फिर भी आर्थिक रूप से यहाँ की जनता का शोषण हुआ। अतएव झारखण्ड में धीरे-धीरे राजनीतिक चेतना का उदय हुआ।

1857 का विद्रोह और झारखण्ड से सम्बंधित प्रमुख तथ्य (for MCQs)

  • झारखण्ड में 1857 का विद्रोह 12 जून, 1857 को देवघर जिले के रोहिणी गांव में सैनिकों के विद्रोके साथ प्रारंभ हुआ
  • इस गाव में मेजर मेकडोनल्ड के नेतृत्व में थल सेना की 32वीं रजिमेंट थी, जिसके तीन सैनिकों ने विद्रोह कर लेफ्टिनेंट नार्मन लेस्ली की हत्या कर दी
  • 1857 के विद्रोह का मुख्य केन्द्र हजारीबाग, रांची, चुटुपालू की घाटी, चतरा, पलामू तथा चाईबासा थे
  • 30 जुलाई को हजारीबाग एवं रामगढ़ के सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया, पर इसका मुख्य केन्द्र रांची बना।
  • 1857 के विद्रोह में रांची के ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव, टिकैत उमरांव सिंह, पाण्डेय गणपत राय, शेख भिखारी, हजारीबाग के जगत लाल सिंह, रामगढ़ बटालियन के जमादार माधव सिंह, डोरांडा बटालियन के जयमंगल पाण्डेय एवं नादिर अली. पोड़ाहाट (सिंहभूम) के राजा अर्जुन सिंह, विश्रामपुर के चेरो सरदार भवानी राय, पलामू के नीलाम्बर एवं पीताम्बर सहित अन्य कई नेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।
  • इस विद्रोह के समय रामगढ़ बटालियन का मुख्यालय रांची में था।
  • 1857 के विद्रोह के समय हजारीबाग का उपायुक्त कप्तान सिम्पसन था।
  • इस संघर्ष में ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव एवं पाण्डेय गणपत राय की * मुक्तिवाहिनी सेना का योगदान उल्लेखनीय है।
  • इस मुक्तिवाहिनी सेना के संस्थापक विश्वनाथ शाहदेव थे। इसके सेनापति पाण्डेय गणपत राय और प्रमुख सैनिकों में शेख भिखारी थे।
  • मुक्तिवाहिनी सेना बाबू कुंवर सिंह के सम्पर्क में थी।
  • दो द्रोहियों लोहरदगा के जमींदार महेश नारायण शाही तथा विश्वनाथ दुबे की सहायता से अंग्रेज मेजर नेशन लोहरदगा के निकट कंकरंग घाट के जंगलों में ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव और पाण्डेय गणपतराय को मार्च 1858 को गिरफ्तार करने में सफल हुआ।
  • कमिश्नर डाल्टन के आदेशानुसार 16 अप्रैल, 1858 को ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव एवं 21 अप्रैल, 1858 को पाण्डेय गणपत राय को वर्तमान जिला स्कूल के मुख्य द्वार के समीप, जहां इन दिनों शहीद स्थल बना हुआ है, एक कदम वृक्ष से लटका कर फांसी दे दी गयी।
  • ओरमांझी क्षेत्र के टिकैत उमरांव सिंह तथा उनके दीवान शेख भिखारी को 8 जनवरी, 1858 को चुटुपालू घाटी में एक ही वृक्ष से लटका कर फांसी दे दी गयी थी।
  •  2 अक्टूबर, 1857 को चतरा में मेजर इंगलिश तथा जयमंगल पाण्डेय एवं नादिर अली के सैनिकों के बीच ऐतिहासिक युद्ध हुआ।
  • 4 अक्टूबर, 1857 को डिप्टी कमिश्नर सिमसन की आज्ञा से ‘जयमंगल पांडेय और नादिर अली को चतरा तालाब (चतरा) के किनारे एक आम के पेड़ से लटका कर फांसी दे दी गयी।
  • 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के समय धनबाद का उपायुक्त कैप्टन ओकस था।
  • पलामू में इस विद्रोह का नेतृत्व नीलाम्बर एवं पीताम्बर ने किया।
  • नीलांबर एवं पीताम्बर ने भोगता, खरवार एवं चेरों को एकजुट कर सैनिक दस्ता का गठन किया।
  • सिंहभूम के पोड़ाहाट के राजा अर्जुन सिंह ने इस संग्राम में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।

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