भारत छोड़ो आन्दोलनऔर झारखण्ड

जापान की सफलताओं एवं अंतर्राष्ट्रीय दबावों—अमेरिकी राष्ट्रपति रुजवेल्ट, चीनी राष्ट्रपति च्यांग काई शेक, ऑस्ट्रेलियाई विदेश मंत्री डॉ. इबाट आदि द्वारा दिए गए दबाव को देखते हुए ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल ने भारत के संवैधानिक संकट को सुलझाने के लिए क्रिप्स मिशन भारत भेजा। 22 मार्च, 1942 ई. को क्रिप्स मिशन भारत पहुँचा। क्रिप्स के प्रस्ताव (29 मार्च, 1942 ई.) भारत को अनेक प्रांतों व रियासतों में बाँटने की ओर ले जाते थे, इसलिए कांग्रेस ने इसे नामंजूर कर दिया। क्रिप्स ने कहा—’या तो इसे स्वीकार करो या छोड़ दो’। इसके बाद ब्रिटेन ने समझौते के सभी द्वार बंद कर दिए। क्रिप्स मिशन की असफलता का भारत-ब्रिटिश संबंधों पर विपरीत प्रभाव पड़ा। इसके बाद कांग्रेस कार्यकारिणी समिति की बंबई बैठक (7-8 अगस्त,1942 ई.) में ऐतिहासिक प्रस्ताव भारत छोड़ो (Quit India)—पारित किया गया। गाँधीजी ने इसी दिन लोगों को ‘करो या मरो’ (हम या तो भारत को स्वतंत्र करायेंगे या फिर उसके लिए संघर्ष में अपने प्राणों की बलि देंगे।) का प्रसिद्ध नारा दिया। इस आंदोलन के शुरू होते ही सरकार का दमन-चक्र आरम्भ हो गया। गाँधीजी और अन्य अनेक नेता गिरफ्तार कर लिए गए।

नेताओं की अनुपस्थिति में इस आंदोलन ने जन-विद्रोह का रूप ले लिया। शासन का विरोध करते हुए लोगों ने जुलूस निकाले, सभाएँ की और हड़तालों का आयोजन किया। सरकार ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल का प्रयोग किया। ऐसी स्थिति में जनता हिंसात्मक कार्यवाही पर उतर आईं। भारतीयों के द्वारा स्वतंत्रता प्राप्ति का यह अंतिम बड़ा प्रयास था। नि:संदेह यह आंदोलन सरकार को प्रबल शक्ति के सामने नहीं टिक सका, किन्तु इसने भारतीय जनता की वीरता व लड़ाकूपन की अद्वितीय मिसाल प्रस्तुत की। भारत में ब्रिटिश सत्ता पर यही अंतिम आघात साबित हुआ। यह स्पष्ट हो गया कि अंग्रेजों के लिए भारत में अधिक समय तक शासन करना असंभव है।

‘भारत छोड़ो आंदोलन’ से पूरा झारखण्ड आंदोलित हो उठा और झारखण्ड में बहुत बड़े पैमाने पर लोग इस आंदोलन में शामिल हुए। जगह-जगह जुलूस निकाले गए, प्रदर्शन हुए, सभाएँ हुई और आवागमन व संचार के साधनों को नष्ट किया गया।

9 अगस्त, 1942 ई. को राँची में हड़ताल रही। 10 अगस्त, 1942 ई. को नारायण चन्द्र लाहिरी को गिरफ्तार किया गया। 14 अगस्त, 1942 ई. को राँची जिला स्कूल के निकट जुलूस निकाल रहे कुछ छात्रों को गिरफ्तार किया गया। जानकी बाबू सहित राँची के कई नेता जैसे देवेन्द्र कुमार, गणपत खण्डेलवाल, लड्डू महाराज, मथुरा प्रसाद, गंगा महाराज व गोविन्द भगत को गिरफ्तार किया गया। नर्मदा हाई स्कूल, लोहरदगा के छात्रों ने स्कूल के अहाते में राष्ट्रीय झण्डा फहराया। गुमला थाना पर भी राष्ट्रीय झण्डा फहराने की कोशिश की गई। गुमला में हड़ताल हुई एवं जुलूस निकाला गया। 16 अगस्त, 1942 ई. को कुछ छात्र जेल के निकट इकट्ठे होकर नारे लगाने लगे। जेल के राजनीतिक कैदियों ने भी उनका साथ दिया। शालिग्राम अग्रवाल एवं मोतीलाल अमेनिया ने एक बार्डन को दबोच लिया तथा जेलर से हाथापाई की। पुलिस की सहायता से कैदियों को शांत किया गया। 17 अगस्त, 1942 ई. को राँची शहर में एक विशाल जुलूस निकाला गया। इसे सैनिकों की सहायता से तितर-बितर कर दिया गया। जिला कांग्रेस कमेटी के कोषाध्यक्ष शिव नारायण मोदी को गिरफ्तार कर लिया गया। टाटी सिलवे व नामकोम के बीच टेलीफोन व टेलीग्राफ की लाइनें कार दी गई। 18 अगस्त, 1942 ई. को ताना भगतों के एक दल ने विशुनपुर थाना को जलाया। उसी दिन धुंडु में हड़ताल हुई। 19 अगस्त, 1942 ई. को ओरमांझी के निकट तार काटा गया। 22 अगस्त, 1942 ई. को राहे में हड़ताल हुई। उसी दिन इटकी व टांगरबसली के बीच रेल की पटरी उखाड़ी गई। उसी दिन पी.सी. मित्रा गिरफ्तार किये गए। 28 अगस्त, 1942 ई. को राँचौ शहर की बिजली काटी गई। 30 अगस्त, 1942 ई. को बालकृष्ण स्कूल के रजिस्टर जलाए गए। नवम्बर, 1942 ई. तक राँची जिला में प्रायः 200 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया था, जिनमें प्रमुख थे: विमल दासगुप्त, सुनील कुमार राय, डॉ. यदुगोपाल मुखर्जी, केशव दासगुप्त, रामरक्षा उपाध्याय, नारायण जी, सत्यदेव साहू एवं नंद किशोर भगत।

हजारीबाग में आन्दोलन का आरंभ 11 अगस्त, 1942 ई. को हुआ। श्रीमती सरस्वती देवी के नेतृत्व में एक जुलूस निकाला गया। संध्या समय उन्हें गिरफ्तार | कर लिया गया। दो दिन बाद उत्तेजित जनता ने डाक घर, यूरोपियन क्लब, लाल | कम्पनी एवं डिप्टी कमिश्नर की अदालत में तोड़-फोड़ की। इस जिले के अबरख को खानों में काम करने वाले मजदूरों ने राजनीतिक चेतना का परिचय दिया और उन्होंने झुमरीतलैया में जुलूस निकाला। डाकघर, रेलवे स्टेशन व शराब भट्टी में लोगों ने तोड़-फोड़ की। डोमचांच की जनता ने भी एक जुलूस निकाला। इस जुलूस पर गोली चलाई गई, जिसमें 2 लोग मरे और 22 घायल हुए। गिरिडीह में टेलीफोन एवं आवागमन के साधनों को नष्ट किया गया। वहाँ चन्द्र प्रसाद, वासुदेव प्रसाद, राजन सिंह, अजित कुमार नाग व जगन्नाथ सहाय गिरफ्तार किए गए। चतरा में रामानुग्रह प्रसाद, भागू गांझू, मुहम्मद हई व शालिग्राम सिंह गिरफ्तार किए गए। कोडरमा में कुछ पुलिसकर्मी भी आंदोलनकारियों से मिले हुए थे। तलैया में 113 लोग गिरफ्तार किए गए। डुमरी में अनंत लाल, कारू राम, दुःखन मोची, काली मोची, बासन सोनार व मोती राम को गिरफ्तार किया गया। डोमचांच में विशुन मोदी, टंडवा में उपेन्द्र प्रसाद तथा सतगाँवा में बृजनंदन प्रसाद पकड़े गए। धंवार में पुनीत राय, लेखाराम, नारायण मोदी, शनिचर तेलो, बंसी मोदी, दशरथ मोदी, महापौर मोदी, झगडू कसेरा, छठू ठठेरा, पोखन राम सोना, नरसिंह मारवाड़ी, अशर्फी सिंह, शिव नारायण सिंह व लक्ष्मी नारायण सिंह को गिरफ्तार किया गया।

टाटा नगर में मिल मजदूरों, दुकानदारों एवं आम नागरिकों ने 10 अगस्त, 1942 ई. को पूर्ण हड़ताल का आयोजन किया। 15 अगस्त, 1942 ई. को एम.के. घोष, एम. जॉन, एन.एन. बनर्जी, त्रेता सिंह व टी. पी. सिन्हा को गिरफ्तार किया गया। चक्रधरपुर एवं चाईबासा में 14 एवं 16 अगस्त, 1942 ई. को हड़ताल रही। 17 अगस्त, 1942 ई. को टाटा नगर में एम.डी. मदन की गिरफ्तारी हुई। 30 अगस्त, 1942 ई. की रात में कई लोगों को गिरफ्तार किया गया। लोगों पर मशीनगनों से गोलियाँ दागी गई। फलस्वरूप 31 अगस्त, 1942 ई. को जमशेदपुर में पूर्ण हड़ताल रही। रामानंद तिवारी के नेतृत्व में पुलिस ने विद्रोह किया और नेताओं सहित 33 पुलिसकर्मियों को हजारीबाग जेल भेज दिया गया। 3-11 सितम्बर, 1942 ई. के बीच रामचन्द्र पालीवाल व नैयर के नेतृत्व में सफाईकर्मियों की हड़ताल हुई। 15 सितम्बर, 1942 ई. को मुसाबनी में सी.पी. राजू. डी. परसादी, रेग्मी, गंगैया, कमलानन्दन, बस्टिन व अदल नामक मजदूर नेता को गिरफ्तार कर लिया गया। 17 सितम्बर, 1942 ई. को घाटशिला के मदासी व उड़िया मजदूरों ने जुलूस निकाला। सत्यानंद, गोपाल, गाउन्डर, बी. एन. मिश्र, सुरेश कुमार मिश्र, श्याम सुन्दर पटनायक, स्वामी व सी. महमूद को जेल भेज दिया गया।

पलामू में आंदोलन का काफी जोर रहा। आंदोलन के सिलसिले में कई लोग गिरफ्तार किये गए, जिनमें प्रमुख थे-महावीर वर्मा, यदुवंश सहाय, गौरीशंकरओझा, राजेश्वरी सरोज दास, यदुनंदन तिवारी, देवराज तिवारी व जगनारायण पाठक। रंका, रामकंडा, चौनिया, पेशका, मंडरिया व भवनाथपुर में शराब भट्टियों में आग लगा दी गई। डाल्टेनगंज के प्रमुख डाकघर में आगजनी एवं तोड़-फोड़ की घटना हुई। सिगसिगी, हैदरनगर व कोमांडी में रेल की पटरी उखाड़ी गई। कई स्थानों में संचार व्यवस्था को विस्त कर दिया गया।

पलामू में आंदोलन की शुरुआत 11 अगस्त, 1942 ई. को हुई। भरत मल, नारायण साव व रामेश्वर तिवारी को तत्काल गिरफ्तार कर 6 महीने की सजा दी गई। जपला सीमेंट फैक्ट्री के मिथिलेश कुमार सिंह (जपला मजदूर संघ के सचिव) पकड़े गए। 13 अगस्त, 1942 ई. को विद्यार्थियों का विशाल जुलूस निकला। गजेन्द्र प्रसाद, नन्दलाल प्रसाद, दशरथ राम, रामावतार राम, रघुनाथ अग्रवाल व महावीर प्रसाद को गिरफ्तार किया गया। आंदोलन जिला मुख्यालय तक ही सीमित नहीं था। भवनाधपुर में 200 लोगों ने एक भट्ठी को नष्ट कर दिया। महुआटाइ थाना को लूटने की कोशिश की गई। गढ़वा हाई स्कूल से ब्रिटिश सम्राट एवं रंका नरेश के चित्र उतार दिए गए। लेस्लीगंज व उँटारी में कुछ लोग गिरफ्तार किए गए। 17 अगस्त, 1942 ई. को डाल्टेनगंज डाकघर के निकट तोड़-फोड़ में लगे दिकवा कोरवा, बोकारी उरांव, करीमन खरवार, जानकी खरवार, रामखेलावन सिंह, साधु महतो, सेवक महतो, गंगा चमार, भरत सिंह, कमलेश्वर प्रसाद अग्रवाल, शिव प्रसाद साहू, वैद्यनाथ तिवारी, कृष्णा नंदन सहाय, सुखदेव सहाय व जवाहर साव पकड़े गए। लातेहार में 18 अगस्त, 1942 ई. को जुलूस निकला। उसी दिन डाल्टेनगंज में विष्णु प्रसाद, गनौरी सिंह को एक वर्ष की सजा मिली। 19 अगस्त, 1942 ई. को प्रातः 200 आंदोलनकारी धनुष प्रसाद सिंह के नेतृत्व में लेस्लीगंज थाना में घुस गए और उत्पात मचाया। धनुष प्रसाद सिंह, बिन्देश्वर रमा, रामवृक्ष दुसाध, विश्वनाथ ठाकुर, जनक सिंह व महादेव सिंह को 6-6 महीने की सजा मिली। 20 अगस्त, 1942 ई. को टारी क्षेत्र में साथी साह, धर्मजीत पाण्डेय, रामविलास पाण्डेय, गुलाब सिंह व लक्ष्मण सिह गिरफ्तार किए गए। 21 अगस्त, 1942 ई. को राज किशोर सिंह सहित विजय शंकर प्रसाद, रामचन्द्र प्रसाद, मथुरा प्रसाद, कृष्ण मोहन, त्रिवेणी तिवारी, महावीर राम, सुरेश प्रसाद, हरिराम व राम नारायण गिरफ्तार किए गए। 26 अगस्त, 1942 ई. को उँटारी में भुवनेश्वर प्रसाद, कपिलनाथ, गुरो साह, नकाछेदी कहार, दुलारचंद प्रसाद व सरयुग पाण्डेय को गिरफ्तार किया गया। मनातू पथरा, चैनपुर की भट्ठियों को 30 अगस्त, 1942 ई. को जला डाला गया। इस सिलसिले में गणेश प्रसाद, कमला पुरी, रामटहल गुप्त, विरेश्वर साव, रामवृक्ष प्रसाद, सुदामा प्रसाद, बद्री नारायण, मनमोहन खरवार, लक्ष्मण साव, राम रेखा साथ, नन्हकू सिंह, दिकतार सिंह, रमा किसुन साव व डोमन साथ गिरफ्तार किए गए। 31 अगस्त, 1942 ई. को लातेहार पुलिस ने गिरिजानंद सिंह को गिरफ्तार कर लिया। उन्हें एक वर्ष की सजा मिली।

मानभूम में जगह-जगह जुलूस निकाले गए, प्रदर्शन किये गए, सभाएँ आयोजित की गई, आवागमन एवं संचार के साधनों को नष्ट किया गया। आंदोलनकारियों ने धनबाद-गोमो रेल लाइन के बीच जगह-जगह पटरियों उखाड़ना शुरू कर दिया। टेलीफोन के तार काटे जाने लगे। विवश होकर ब्रिटिश शासन ने दमन-चक्र आरम्भ किया। 9 अगस्त, 1942 ई. को विभूति भूषण दासगुप्ता, वीर राघव आचार्य, पूर्णेन्दु भूषण मुखर्जी को गिरफ्तार कर लिया गया। 10 अगस्त, 1942 ई. को पी.सी. बोस, मुकुटधारी सिंह, पुन्नीलाल सिंह, बैजनाथ प्रसाद सिंह, हरदेव सिंह, भागवत शास्त्री, गोपाल चन्द्र मुंशी, टेका राम मांझी गिरफ्तार कर लिए गए। 13 अगस्त, 1942 ई. को अतुल चन्द्र घोष गिरफ्तार किए गए। 16 अगस्त, 1942 ई. को समरेन्द्र मोहन राय, सुशील चन्द्र दास, अशोक नाथ चौधरी गिरफ्तार किए गए। कतरास, झरिया एवं धनबाद में अनियंत्रित स्थिति पर काबू पाने के लिए कफ्यूं लगा दिया गया।

झारखण्ड में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का एक प्रमुख केन्द्र संथाल परगना था। 11 अगस्त, 1942 ई. को देवघर में विनोदानंद झा के नेतृत्व में सभा हुई, जिसे पुलिस ने भंग कर दिया। गोड्डा कचहरी पर 13 अगस्त, 1942 ई. को कांग्रेसी झण्डा फहराया गया। 13-14 अगस्त, 1942 ई. को आंदोलनकारियों ने रेल की पटरियों, सिग्नलों, तार एवं टेलीफोन लाइनों को नष्ट कर दिया। मधुपुर, जसीडीह व देवघर में सरकारी भवनों को नुकसान पहुँचाया गया। देवघर अनुमण्डल के सरवण में आंदोलनकारियों ने समानान्तर सरकार की स्थापना की। दुमका में उपायुक्त के कार्यालय पर कांग्रेसी झण्डा फहराया गया। भारत सुरक्षा अधिनियम के तहत मोती लाल केजरीवाल, अशोक बोस, राम जीवन, हिम्मत सिंह आदि को गिरफ्तार किया गया। 21 अगस्त, 1942 ई. को गोड्डा जेल से लगभग 60 कैदी भाग निकले, जिनमें प्रमुख थे-दुलारचन्द टुड, रूप नारायण महतो, प्रयागदत्त ठाकुर, युधिष्ठिर झा, सच्चिदानंद झा, मो. मोसर्रफ, राम प्रसाद भण्डारी, दीप नारायण मोदी आदि। प्रफुल्ल चन्द पटनायक ने कुछ पहाड़िया सरदारों जमाकुमार पहाड़िया, सिंधियामल पहाड़िया व डोमन लाल के सहयोग से पहाड़ियाँ आदिवासियों का नेतृत्व किया। पटनायक ने गोड्डा, पाकुड़ व दुमका के मिलन-बिन्दु पर स्थित डांगपारा को अपना मुख्यालय बनाया था। पटनायक के प्रभाव में आकर बादलमल पहाड़िया नामक एक पहाड़िया नौजवान, जो अपने परिवार का एकमात्र पुरुष एवं अपनी माँ का एकमात्र पुत्र था, बड़े ही उत्साह के साथ आंदोलन में कूद पड़ा। वह फिर घर वापस नहीं लौटा। गोड्डा जेल में पुलिस की यातनाओं के कारण वह शहीद हो गया। 25 अगस्त, 1942 ई. को संथाल एवं पहाड़िया आदिवासी आंदोलनकारियों ने अलुबेरा में डाक बंगला एवं | वन विभाग के भवनों को जला डाला। जगह-जगह फौज भेजी गई। पटनायक | 7 नवम्बर, 1942 ई. को पकड़े गए और 8 नवम्बर, 1942 ई. की सुबह उन्हें | राजमहल जेल पहुँचा दिया गया। पटनायक को 16 वर्ष कैद की सजा दी गई। | एक विशेष फौजी टुकड़ी दुमका पहुँची। गोलीबारी में त्रिगुनानंद मारे गए। |विनोदानंद झा, गौरी शंकर डालमिया व छविलाल झा को गिरफ्तार कर लिया | गया। वस्तुतः संथाल परगना जिला में 890 लोगों को गिरफ्तार किया गया।

1943 ई. तक ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ समाप्त हो गया। झारखण्ड के | संदर्भ में 22 अगस्त, 1943 ई. को वाचस्पति त्रिपाठी की गिरफ्तारी ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ से जुड़ी प्रायः अंतिम घटना मानी जाती है।

भारत छोड़ो आंदोलन और झारखण्ड से सम्बंधित प्रमुख तथ्य (for MCQs)

  • अगस्त 1942 में कांग्रेने भारत छोड़ो आंदोलन का आह्वान किया। झारखण्ड पर इस आन्दोलन का व्यापक प्रभाव पड़ा तथा यहां के लोगों ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।
  • 8 अगस्त को भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित होने के तुरंत बाद कांग्रेस के अधिकतर नेता गिरफ्तार कर लिये गये। 9 अगस्त को रांची में तथा 10 अगस्त को जमशेदपुर में हड़ताल हुई।
  • 9 अगस्त को हजारीबाग के दो प्रमुख नेताओं रामनारायण सिंह एवं सुखलाल सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया।
  • हजारीबाग में आंदोलन का श्रीगणेश 11 अगस्त को हुआ। श्रीमती सरस्वती देवी के नेतृत्व में एक जुलूस निकाला गया। इसी दिन सरस्वती देवी को गिरफ्तार कर लिया गया।
  • पलामू में आंदोलन की शुरुआत 11 अगस्त को नगर में जुलूस निकालने के साथ हुआ। जपला मजदूर संघ के सचिव मिथिलेश कुमार सिन्हा की प्रेरणा से जपला फैक्ट्री के मजदूरों ने हड़ताल रखी।
  • देवघर में पंडित विनोदानंद झा के नेतृत्व में 11 अगस्त को एक जुलूस निकाली गयी। देवघर अनुमण्डल के सरवण में समानान्तर शासन स्थापित कर दिया गया।
  • 13 अगस्त को गोड्डा कचहरी पर राष्ट्रीय झंडा फहरा दिया गया।
  • 14 अगस्त को हजारीबाग के उपायुक्त कार्यालय पर से यूनियन जैक उतारकर राष्ट्रीय झंडा फहराया गया।
  • नदिया हाई स्कूल लोहरदगा के छात्रों द्वारा स्कूल भवन पर राष्ट्रीय झंडा फहराया गया।
  • संथाल परगना में अंग्रेजी हुकूमत के लिए सबसे बड़ा सरदर्द प्रफुलचन्द्र पटनायक थे। श्री पटनायक पहाडियां लोगों के बीच आंदोलन का निर्देशन कर रहे थे। डांगपारा उनके आंदोलन का मुख्यालय था। ब्रिटिश हुकूमत द्वारा प्रफुलचन्द्र पटनायक और उनके तीन सर्वाधिक सक्रिय साथियों के लिए ₹200 का इनाम घोषित किया गया था।
  • 30 सितम्बर को मानबाजार थाना पर आंदोलनकारियों ने आक्रमण किया। पुलिस द्वारा चलाई गयी गोली से चूनाराम महतो एवं गिरीशलाल महतो की मृत्यु हो गयी, जबकि गोविन्द महतो एवं हेम महतो घायल हो गये।
  • जमशेदपुर में रामानंद तिवारी के नेतृत्व में सिपाहियों ने विद्रोह किया, जिन्हें गिरफ्तार कर हजारीबाग जेल भेज दिया गया।
  • 9 नवम्बर, 1942 को हजारीबाग केन्द्रीय कारा से जयप्रकाश नारायण अपने पांच साथियों के साथ जल की दीवार फांदकर फरार हो गये। जयप्रकाश नारायण के साथ भागने वालों में रामानंद मिश्र, योगेन्द्र शुक्ल, सूरज नारायण सिंह, गुलाबी सोनार और शालिग्राम सिंह शामिल थे।
  • रांची में 22 अगस्त, 1943 को वाचस्पति त्रिपाठी की गिरफ्तारी संभवतः इस आंदोलन की सबसे अंतिम गिरफ्तारी थी।
  • इस तरह आजादी के पूर्व राष्ट्रीय आंदोलन में झारखण्ड क्षेत्र के वीर सेनानियों का अभूतपूर्व योगदान रहा है। इनकी कुर्बानियों को देश सदैव याद रखेगा। पति .
  • स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात झारखण्ड क्षेत्र से एकीकृत बिहार के मात्र दो सर्वश्री विनोदानंद झा तथा कृष्ण वल्लभ सहाय मुख्यमंत्री बने।

Previous Page:कांग्रोस का रामगढ़ अधिवेशन

Next Page :राष्ट्रीय आंदोलन और झारखण्ड की महिलाएं  और मजदूरआंदोलन