गाँधी युग तथा झारखण्ड

वर्ष 1917 ई. में चंपारण (बिहार) सत्याग्रह के साथ महात्मा गाँधी ने भारतीय राजनीति में सक्रिय कदम रखा और 1947 ई. तक इस पर पूरी तरह से छाये रहे। इसी कारण इस युग को ‘गाँधी युग’ कहा गया।

अबुल कलाम आजाद रांची में नजरबंद : 31 मार्च 1916 ई.-31 दिसम्बर, 1919 ई.

ब्रिटिश सरकार ने होम रूल आंदोलन के सिलसिले में मौलाना अबुल कलाम आजाद की नजरबंदी का आदेश दिया था। सरकारी आदेश के अनुपालन के क्रम में मौलाना आजाद जब अप्रैल, 1916 ई. में कलकत्ता से राँची पहुंचे तो स्टेशन पर दर्शनार्थियों की भीड़ लग गई। फिटिन द्वारा उन्हें डाक बंगला ले जाया गया। 10 दिन बाद वे मोरहाबादी में रहने लगे। वहाँ से वे अपर बाजार की जामा मस्जिद में नमाज अदा करने जाते थे। कुछ दिनों बाद मौलाना आजाद मोरहाबादी से जामा मस्जिद के पास किराए के मकान में आ गए। प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) में तुर्की की हार पर सरकारी जश्न के विरोध में मौलाना आजाद के कहने पर लोगों ने काले बिल्ले लगाए। 8 जुलाई, 1916 ई. को उनको ताकीद की गई और थाना में रोजाना हाजिरी लगाने को कहा गया। इसी क्रम में उन्होंने राँची में छुआछूत की दीवार तोड़ने की कोशिश की। मौलाना आजाद ने अगस्त, 1917 ई. में अन्जुमन इस्लामिया, राँची तथा मदरसा इस्लामिया, राँची की नींव रखी। अपना अलबेलाग प्रेस बेचकर इसकी रकम भी उन्होंने मदरसे में लगा दी।

सरकार ने मौलाना आजाद को पुनः मोरहाबादी चले जाने का आदेश दिया और उन पर पाबंदियाँ बढ़ा दी गईं। फिर भी गजनफर मिर्जा, मोहम्मद अली, डॉ. पूर्ण चन्द्र मित्र, देवकी नंदन प्रसाद, गुलाब तिवारी एवं नागरमल मोदी जैसे लोग उनसे बराबर मिलते-जुलते रहे। किन्तु गाँधीजी जब पटना आए और राँची में नजरबंद मौलाना आजाद से मुलाकात की इजाजत चाही तो सरकार ने उनसे मिलने नहीं दिया। मौलाना आजाद की नजरबंदी की मियाद पूरी होने पर उन्हें रिहा कर दिया गया। 3 जनवरी, 1920 ई. को मौलाना आजाद राँची से कलकत्ता के लिए रवाना हो गए।

महात्मा गाँधी का राँची प्रवास : 3-6 जून, 5-11 जुलाई व 22 सितम्बर-4 अक्टूबर, 1917 ई.

वर्ष 1917 ई. में श्याम कृष्ण सहाय लंदन में थे। वहीं उन्होंने गाँधीजी को राँची आने का आमंत्रण दिया। गाँधीजी पहली बार जून, 1917 ई. में राँची आये। वे चंपारण सत्याग्रह के सिलसिले में बिहार के मोतिहारी से चलकर राँची पहुँचे थे। यहाँ आकर वे श्याम कृष्ण सहाय के यहाँ ठहरे। साथ में ब्रज किशोर बाबू थे। राँची के राज भवन में उन्होंने बिहार के लेफ्टिनेंट गवर्नर एडवर्ड अल्बर्ट गेट से मुलाकात की। चंपारण आंदोलन की रूपरेखा राँची में रहकर तैयार की गई। कई बैठकों के बाद 3 अक्टूबर, 1917 ई. को अपनी रिपोर्ट पर गाँधीजी ने हस्ताक्षर किए, सरकार को चुनौती दी। 4अक्टूबर, 1917 ई. को राँची से चंपारण के लिए रवाना हो गए। इस तरह गाँधीजी से | झारखण्ड के लोगों का दीर्घकालीन सम्पर्क-सूत्र जुड़ गया। उनके साथ पत्नी कस्तूरबा | गाँधी, पुत्र देवदास गाँधी भी थे। गाँधीजी की सादगी एवं उनके सिद्धान्तों से झारखण्ड के लोग अत्यधिक प्रभावित हुए और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सहभागी बनने के लिए तैयार हो गए।

रौलेट एक्ट विरोधी सत्याग्रह : 1919 ई.

भारत में राजद्रोहात्मक गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए न्यायाधीश सिडनी रौलेट की अध्यक्षता में गठित राजद्रोह समिति (Sedition Committee) की रिपोर्ट के आधार पर 21 मार्च, 1919 ई. को रौलेट एक्ट पारित किया गया। इसे ‘काले | कानून’ की संज्ञा दी गई। चूँकि इस कानून के विरुद्ध कोई सुनवाई नहीं थी, इसलिए इसके बारे में कहा गया ‘न अपील, न वकील, न दलील’। इस कानून के विरोध में देशव्यापी हड़ताले हुईं और जनसभाएँ आयोजित की गई।

जहाँ तक झारखण्ड की बात है, तो झारखण्ड में भी रौलेट एक्ट विरोधी सत्याग्रह की लहर फैली। राँची में इसका नेतृत्व बारेश्वर सहाय एवं गुलाब तिवारी ने किया। पलामू में जिला स्कूल के शिक्षक रामदीन पाण्डेय ने 6 अप्रैल, 1919 ई. को अपने 6 विद्यार्थियों के साथ उपवास रखा। जमशेदपुर एवं चाईबासा में भी कुछ लोगों ने विरोध दिवस मनाया।

बड़े पैमाने पर हिंसा फैल जाने के कारण महात्मा गाँधी ने 18 अप्रैल, 1919 ई. को रौलेट एक्ट विरोधी सत्याग्रह स्थगित कर दिया। इस प्रकार इस सत्याग्रह का अंत हो गया।

जिला कांग्रेस कमेटियों की स्थापना : 1919-20 ई.

झारखण्ड में धीरे-धीरे कांग्रेस का प्रचार बढ़ा और जिलों में कांग्रेस कमिटियाँ स्थापित होने लगी। वर्ष 1919 ई. में बिंदेश्वरी पाठक एवं भागवत पाण्डेय ने पलामू जिला कांग्रेस कमिटी की स्थापना की। 1920 ई. में राँची एवं हजारीबाग में जिला कांग्रेस कमिटी की स्थापना की गई।

कांग्रेस का कलकत्ता अधिवेशन (विशेष अधिवेशन) : सितम्बर 1920 ई.

सितम्बर, 1920 ई. में अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (All India National Congress-AINC) का विशेष अधिवेशन कलकत्ता (अब कोलकाता) में हुआ। इसकी अध्यक्षता लाला लाजपत राय ने की। इस अधिवेशन से महात्मा गाँधी राष्ट्र नेता के रूप में उभरे। अधिवेशन में भाग लेने आये झारखण्ड के प्रतिनिधियों ने महात्मा गाँधी से आग्रह किया कि वे झारखण्ड को आजाद घोषित कर दें। इस पर महात्मा गाँधी ने एक पंक्ति का उत्तर दिया, –कपास बोओ, चरखा चलाओ, छोटानागपुर आजाद हो जाएगा। कलकत्ता अधिवेशन में ही युगांतकारी एवं महत्वपूर्ण असहयोग प्रस्ताव पहली बार पारित किया गया, जिसकी पुष्टि कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन नागपुर अधिवेशन (दिसम्बर, 1920 ई.) में की गई।

Previous Page:झारखण्ड में राष्ट्रीय चेतना का प्रसार एवं क्रांतिकारी  गतिविधियां

Next Page :असहयोग आन्दोलन और झारखण्ड