सविनय अवज्ञा आन्दोलन और झारखण्ड

सविनय अवज्ञा आन्दोलन 1924 ई. में बेलगाँव में कांग्रेस अधिवेशन के बाद गाँधीजी ने असहयोग आंदोलन स्थगित कर दिया। इसके बाद उनका मुख्य जोर रचनात्मक कार्यों और खादी बनाने पर रहा। किन्तु गाँधीजी के सशक्त राजनीतिक कदम के रूप में उनका अगला महत्वपूर्ण प्रयास सविनय अवज्ञा आंदोलन हो था। इस आंदोलन की रूप-रेखा दिसम्बर, 1929 ई. में पं. जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता में हुए कांग्रेस के वार्षिक सम्मेलन में तय किया गया था। 1930 में प्रारम्भ इस आंदोलन में यहाँ (झारखण्ड) के लोगों ने भी बढ़-चढ़ कर भाग लिया। कांग्रेस कार्यसमिति की 2 जनवरी, 1930 की बैठक में प्रतिवर्ष 26 जनवरी को स्वाधीनता दिवस मनाने की घोषणा की गईं। उस निश्चय के अनुसार छेटानागपुर में भी 26 जनवरी, 1930 ई.को पूर्ण स्वाधीनता दिवस अत्यंत उत्साहपूर्ण ढंग से मनाया गया। इससे संबद्ध कार्यक्रमों में आदिवासी समुदाय के लोग भी काफी संख्या में शामिल हुए। राँची का ‘तरुण संघ’ यहाँ के समारोह में सबसे आगे था। स्वाधीनता दिवस का आयोजन हजारीबाग तथा गिरिडीह में भी हुआ था। हजारीबाग में तो कृष्ण बल्लभ सहाय ने भारी लाठी चार्ज के बीच भी कचहरी पर झंडा फहरा दिया।

6 अप्रैल, 1930 ई. में महात्मा गांधी द्वारा नमक कानून तोड़ने की प्रक्रिया शुरू हुई। 13 अप्रैल को 200 लोगों ने छोटानागपुर में 50 स्थानों पर नमक बनाया। सरकारी दमन चक्र भी काफी तेज था। प्रशासन चूल्हा तोड़ती, बर्तन उठा कर ले जाती, नेताओं को गिरफ्तार करती, पर नमक-सत्याग्रह चलता रहा। कृष्ण बल्लभ सहाय ने हजारीबाग स्थित खजांची तालाब के निकट नमक बनाकर नमक-कानून को चुनौती दी। उन्हें एक वर्ष की सजा मिली। हजारीबाग में नमक सत्याग्रह में शामिल होने वाले अन्य नेताओं में – मथुरा प्रसाद, सीताराम दुवे, चक्र सिंह, राधा गोविन्द प्रसाद, सरस्वती देवी तथा मीरा देवी का नाम उल्लेखनीय हैं। पलामू में नमक सत्याग्रह का नेतृत्व चंद्रिका प्रसाद वर्मा तथा सोनार सिंह खरवार ने किया। उन्होंने चंदवा में एक सभा की, शिवपुर तथा कुम्मवा गाँवों में नमक कानून तोड़ा। शत्रुघ्न प्रसाद वकील ने कोलकाता में बने नमक को कचहरी परिसर में बांट कर नमक-कानून का उल्लंघन किया। जमशेदपुर में नमक-सत्याग्रह का नेतृत्व ननी गोपाल मुखर्जी ने किया। उन्हें जेल की सजा मिली।

सविनय अवज्ञा आंदोलन के क्रम में राँची, सिल्ली, गुमला, चुटिया तथा लोहरदगा क्षेत्र काफी आंदोलित रहे। 8 अप्रैल, 1930 ई. को नागरमल मोदी की अध्यक्षता में एक सभा चुटिया में हुई। इसमें पी.सी. मित्रा, देवकी नंदन लाल, अतुल चंद्र घोष, क्षितिज चंद्र बोस तथा आनन्द मोहन लाहिरी ने अपने विचार प्रस्तुत किए। इसी तरह की सभाओं का क्रम इस काल में खूटी, पलामू तथा सिल्ली में भी चलता रहा। 10 अप्रैल, 1930 ई. के राँची के सभा में काफी भीड़ थी, ठीक इसी दिन हिन में बंगाली महिलाओं की सभा हुई। 15 अप्रैल को जिला स्कूल तथा संत जॉन स्कूल के छात्रों ने कक्षा बहिष्कार किया। 18 अप्रैल को बुंडू में पूर्ण हड़ताल रही। राँची बार एसोसिएशन की 3 मई, 1930 ई. की बैठक में खादी के उपयोग और विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का प्रस्ताव पारित किया गया। सितंबर, 1930 ई. में रांची में ‘स्वदेशी सप्ताह मनाया गया। 16 नवंबर, 1930 ई. को सर्वत्र ‘जवाहर दिवस’ मनाया गया। जनवरी, 1932 ई. में जब सविनय अवज्ञा आंदोलन का दूसरा दौर चला तो राँची के तरुण संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। सूची में चल रहे सविनय अवज्ञा आंदोलन में यहाँ के साहू परिवार का व्यापक योगदान था। इस परिवार के बुलु साहू तथा नन्द किशोर साहू सभी ने स्वतंत्रता आंदोलन में अपना योगदान दिया। नन्द किशोर साहू जो कि गाँस्नर हाई स्कूल राँची के छात्र थे, जगन्नाथ मेले के अवसर पर शराब की दुकानों पर ताना भगतों के साथ धरना देते समय पुलिस की मार खानी पड़ी। फलत: कुछ ही दिनों के बाद नन्द किशोर साहू की मृत्यु हो गई।

सविनय अवज्ञा आंदोलन की गूंज संथाल जनजातियों के बीच भी सुनाई पड़ी। इस आंदोलन के क्रम में हजारीबाग के संथालों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। गोमिया थाना के बोरोगोरा ग्राम का बंगम मांणी इनका नेतृत्व कर रहा था। बंगम मांणी के संथाल अनुयायियों की संख्या हजारों में थी। बंगम मांणी ने ताना भगतों की तरह ही स्वच्छता, मद्य-निषेध और खादी पर जोर दिया। उसे राम नारायण सिंह तथा कृष्ण बल्लभ सहाय आदि कांग्रेस नेताओं का समर्थन प्राप्त था। इन संथालों का आन्दोलन इतना लोकप्रिय हुआ कि सरदार बल्लभ भाई पटेल तथा राजेन्द्र प्रसाद जैसे महान राष्ट्रीय नेताओं ने भी उनकी सभाओं में भाग लिया।

सविनय अवज्ञा आंदोलन के समय पलामू जिला भी काफी उद्वेलित रहा। महात्मा गाँधी को बंदी बनाए जाने की सूचना पर डाल्टेनगंज, गढ़वा तथा लातेहार में पूर्ण हड़ताल रही। डाल्टेनगंज में चंद्रिका प्रसाद, देवकी प्रसाद, नागेश्वर प्रसाद सिंह, ज्योति चन्द्र सरकार तथा तुलसी तिवारी के नेतृत्व में विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार का कार्यक्रम चलाया गया। अंतत: चंद्रिका प्रसाद को पकड़कर 6 माह को सजा दी गई। गढ़वा में गुलाब मिस्त्री, बिहारी लाल, सीताराम ठठेरा तथा जगन्नाथ साहू के नेतृत्व में विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार का कार्यक्रम चलाया गया। डाल्टेनगंज में कांग्रेस का दफ्तर बंद करवाने तथा मुठिया के रूप में एकत्रित अनाज को जब्त करने में ठाकुर भोलानाथ सिन्हा ने सरकार का साथ दिया। इस सेवा के बदले सरकार से उन्हें ‘राय बहादुर’ की पदवी मिली।

सिंहभूम में भी सविनय अवज्ञा आंदोलन का काफी असर देखा गया। यहाँ इस आंदोलन के शुरू होते ही 400 सिख शामिल हो गए। साथ ही यहाँ के पेशावरी लोग भी इस आंदोलन में शामिल हुए। यहाँ के गोलमुरी मैदान में झंडा फहरा कर ‘जवाहर दिवस’ मनाया गया। मार्च, 1931 ई. में भगत सिंह की फांसी के विरोध में 25 मार्च, 1931 ई. को जमशेदपुर में हड़ताल रही। चक्रधरपुर के कांग्रेसियों ने जंगल काट कर सरकार के प्रति अपना विरोध प्रकट किया। विरोध प्रकट करने के इस तरीके को ‘जंगल सत्याग्रह’ नाम दिया गया। यहाँ इस आन्दोलन के मुख्य नेता हरिहर महतो, हरि सिंह तथा लाल बाबू थे, जिन्हें बाद में जेल की सजा हुई। 1932 ई. में गाँधीजी के व्यक्तिगत सविनय अवज्ञा आंदोलन के आह्वान पर भी सिंहभूम के लोगों की सराहनीय भूमिका रही। इस क्रम में पुलिस ने माइकल जॉन तथा कुछ अन्य लोगों को गिरफ्तार कर लिया। जॉन की गिरफ्तारी के बाद जयप्रकाश नारायण, बसावन सिंह तथा शिवनाथ बनर्जी ने गोलमुरी मैदान की सभा में ब्रिटिश पुलिस, कचहरी के बहिष्कार के अतिरिक्त लोगों से सरकार को कर न देने का आह्वान भी किया। इसके तत्काल बाद सरकार ने जयप्रकाश नारायण को गिरफ्तार कर लिया। द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटेन की बिगड़ती स्थिति के कारण सद्भावना का प्रदर्शन करते हुए व्यक्तिगत सत्याग्रह भी वापस ले लिया गया।

सविनय अवज्ञा आंदोलन के क्रम में झारखण्ड में ‘चौकीदारी कर’ बंद करने के लिए भी आंदोलन हुआ। चौकीदारी कर की वसूली के क्रम में जो अत्याचार यहाँ के लोगों पर हो रहा था, इस कारण लोगों में अंसतोष की भावना थी। इस कर के विरोध में इचाक, पबरा, धनवार, मांडु, कुजू, डुमरी तथा डोमचांच में अनेक सभाएं हुई, जिसमें इसके खिलाफ प्रस्ताव पारित किए गए। चौकीदारी कर विरोधी आंदोलन के प्रमुख नेताओं में सरस्वती देवी, मथुरा सिंह, जे. एल. साव, चमन लाल, सीताराम दुबे, महादेव पाण्डेय और जय प्रकाश लाला का नाम उल्लेखनीय है। इन सभी नेताओं को 6 मास के कैद की सजा हुई। संत कोलम्बस कॉलेज के भौतिकी के व्याख्याता की पुत्री साधना को भी कैद की सजा हुई।

1940 ई. में व्यक्तिगत सत्याग्रह का कार्यक्रम शुरू हुआ। इस अवसर पर महात्मा गांधी अंतिम बार राँचौ आए थे। उनके आने का मुख्य कारण निवारणपुर जाकर मरणासन निवारण बाबू का हालचाल जानना था। निवारणपुर में गाँधीजी ने एक संक्षिप्त सभा को संबोधित किया, जिसमें गाँधी-सेवा संघ के क्षितिज चंद्र बसु उपस्थित थे। यह घटना 29 मार्च, 1940 ई. की है। 19 एवं 20 मार्च, 1940 ई. को इण्डियन नेशनल कांग्रेस की 53वीं वार्षिक सभा हजारीबाग के रामगढ़ में मौलाना अबुल कलाम आजाद की अध्यक्षता में हुई। जहाँ पर यह सभा हो रही थी, उसे मजहर नगर नाम दिया गया था। सभा के पहले दिन राजेन्द्र प्रसाद ने स्वागत भाषण करने के बाद भारत और विश्व संकट पर मुख्य प्रस्ताव प्रस्तुत किया। पण्डित नेहरू ने इसका अनुमोदन किया। कुछ संशोधनों के बाद मतदान द्वारा प्रस्ताव को पुष्टि हुई।

चरमपंथी राजनैतिक विचार वाले कुछ राष्ट्रवादी उन दिनों युद्ध जनित संकट के आलोक में कांग्रेस के दृष्टिकोण से सहमत नहीं थे। वे कांग्रेस को समझौतावादी समझने लगे थे। अत: रामगढ़ कांग्रेस के दौरान ही अखिल भारतीय समझौता विरोधी सम्मेलन आयोजित किया गया। इस सम्मेलन के सभापति सुभाषचन्द्र बोस थे। इस सम्मेलन में मुख्य प्रस्ताव सहजानंद सरस्वती द्वारा प्रस्तुत किया गया तथा कांग्रेस की नीति को कड़ी आलोचना की गई। इस सम्मेलन में पूर्ण स्वराज्य की प्राप्ति हेतु भारतीय जनता के अधिकार पर बल दिया गया। रामगढ़ कांग्रेस की एक विशेषता यह भी थी कि यहाँ सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में अखिल भारतीय फॉरवर्ड ब्लॉक का जन्म हुआ। यहीं पर एम. एन. राय ने रेडिकल डेमोक्रेटिक पार्टी (Redical Democratic Party) की स्थापना की। इस अधिवेशन के बाद भी व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन चलता रहा और इस सिलसिले में छोटानागपुर के अनेक नेता बंदी बनाए गए।

सविनय अवज्ञा आंदोलन और झारखण्ड से सम्बंधित प्रमुख तथ्य (for MCQs)

  • सविनय अवज्ञा आंदोलन का प्रस्ताव दिसम्बर 1929 . में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन में पारित हुआ जिसके अध्यक्ष जवाहर लाल नेहरू थे
  • इस अधिवेशन में पारित पूर्ण स्वतंत्रता प्रस्ताव के आलोक में 26 जनवरी, 1930 को स्वाधीनता दिवस मनाने का फैसला हुआ।
  • 26 जनवरी 1930 को झारखण्ड में स्वाधीनता दिवस उत्साहपूर्ण ढंग से मनाया गया। इससे सम्बद्ध कार्यक्रम में आदिवासी भी भारी संख्या में शामिल हुए।
  • रांची के तरुण संघ ने इसका सफलतापूर्वक आयोजन किया। हजारीबाग में कृष्ण बल्लभ सहाय ने लाठी चार्ज के बीच कचहरी पर झंडा फहराया।
  • 6 अप्रैल, 1930 ई. को महात्मा गांधी ने जब नमक आंदोलन का श्रीगणेश किया, तो इस आंदोलन का झारखण्ड के लोगों पर भी गहरा प्रभाव पड़ा।
  • झारखण्ड के लोगों ने नमक कानून भंग करने के कार्यक्रम में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई। 13 अप्रैल, 1930 को लगभग 200 लोगों ने झारखण्ड में 50 स्थानों पर नमक बनाया। हजारीबाग में कृष्ण बल्लभ सहाय ने खजांची तालाब के निकट नमक बनाकर नमक कानून को चुनौती दी। उन्हें एक वर्ष की सजा हुई।
  • पलामू में नमक सत्याग्रह का नेतृत्व सोनार सिंह खरवार तथा चंद्रिका प्रसाद वर्मा ने किया। शत्रुध्न प्रसाद वकील ने कलकत्ता में बने नमक को कचहरी परिसर में बांट कर नमक कानून का उल्लंघन किया। जमशेदपुर में नमक सत्याग्रह का नेतृत्व ननी गोपाल मुखर्जी ने किया।
  • संथाल परगना में श्रीमती शैलबाला राय के नेतृत्व में वहां की महिलाओं ने नमक कानून को चुनौती दी।
  • झारखण्ड के मोहन महतो, सहदेव महतो, गणेश महतो, गोकुल महतो ने भी नमक सत्याग्रह में सक्रिय सहयोग दिया।
  • सविनय अवज्ञा आंदोलन में संथालों का बड़ा योगदान रहा। उनका नेतृत्व गोमिया थाना के बोरोगेरा ग्राम के बंगम माणे ने किया।
  • सितम्बर 1930 ई. में रांची में ‘स्वदेशी सप्ताह’ मनाया गया।
  • 16 नवम्बर, 1930 ई. को सर्वत्र ‘जवाहर सप्ताह’ मनाया गया।
  • सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान हजारीबाग जेल में बंद रामवृक्ष बेनीपरी ‘कैदी’ तथा महामाया प्रसाद सिन्हा और भवानी दयाल संन्यासी ‘कारागार’ नामक हस्तलिखित पत्रिका निकाला करते थे।
  • सिंहभूम में सविनय अवज्ञा आंदोलन का प्रारंभ होते ही 100 सिक्ख इसमें शामिल हो गये।
  • चक्रधरपुर के कांग्रेसियों ने जंगल के पेड़ काटकर अपना विरोध प्रकट किया। इनका नेतृत्व हरिसिंह, हरिहर महतो तथा लालबाबू कर रहे थे। इन तीनों को जेल की सजा हुई।
  • स्वतंत्रता संग्राम का अग्रणी जिला पलामू सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान भी उद्वेलित बना रहा।
  • महात्मा गांधी के बन्दी बनाये जाने की खबर मिलते ही डाल्टनगंज तथा गढ़वा में 8 मई, 1930 को हड़ताल हुई। 11 मई को लातेहार में पूर्ण हड़ताल रही।
  • रामवृक्ष मिश्र, महेशलाल, हजारीलाल साव, बिफई राम, ज्योतिष चन्द्र सरकार तथा हरिहर प्रसाद मुख्तार ने 4 जनवरी, 1932 ई. को हमीदगंज (डाल्टनगंज) में एक सभा की। इसी सभा में मुरारी पाठक, भान पाण्डेय, विश्वनाथ चटर्जी तथा नवल किशोर पाठक ‘यूथ लीग’ में शामिल हुए।
  • सम्पूर्ण किसान आंदोलन यदुवंश सहाय के नेतृत्व में चल रहा था।
  • 1938 ई. में स्वामी सहजानन्द सरस्वती का आगमन संथाल परगना में हुआ। यहां पर उन्होंने किसानों की दशा सुधारने का आंदोलन चलाया। 1940 ई. के व्यक्तिगत सत्याग्रह के अवसर पर गांधीजी अंतिम बार रांची आय थे।

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