टाना भगत आंदोलन (1914-1919 ई.)

विद्रोह  के कारण एवं स्वरुप

‘टाना’ का शाब्दिक अर्थ है-टानना या खींचना। चूँकि ये भगत अपनी गिरी हुई स्थिति को तानकर या खींचकर दूर फेंकना चाहते थे तथा उन्नत अवस्था को प्राप्त करना चाहते थे, इसलिए इन्हें ‘टाना भगत’ कहा गया और इनके आंदोलन को ‘टाना भगत आंदोलन’। इस तरह टाना भगत आंदोलन एक प्रकार का संस्कृतिकरण आंदोलन (Sanskritization Movement) था। इस आंदोलन का नेतृत्व टाना भगतों (धर्माचार्यों) ने किया। उराँव लोग इन आंदोलनों को कुडुख धर्म या उराँवों का वास्तविक एवं मूल धर्म मानते थे। टाना भगत आंदोलन की शुरुआत धार्मिक व आर्थिक आंदोलन के रूप में हुई, बाद में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़कर यह राजनीतिक आंदोलन बन गया।

टाना भगत आंदोलन के जनक जतरा भगत का जन्म 2 अक्टूबर, 1888 ई. को गुमला जिले के विशुनपुर प्रखण्ड के चिंगरी नावाडोली गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम कोहरा भगत तथा माता का नाम लिवरी भगत था। इनकी पत्नी का नाम बुधनी भगत था। किंवदन्ती है कि जब जतरा हेसराग गाँव के श्री तुरीया भगत से मती (ओझा) का प्रशिक्षण ले रहे थे तो, 1914 ई. में उन्हें अचानक आत्म-बोध (आत्म-ज्ञान) हुआ। जतरा उराँव अब जतरा भगत कहलाने लगे। इस तरह टाना भगत आंदोलन की शुरुआत 21 अप्रैल, 1914 ई. को हुई। जतरा भगत ने अंग्रेजी राज के अत्याचार, जमींदारों द्वारा बेगारी, समाज में फैले अंधविश्वास एवं कुरीतियों से पीड़ित आदिवासी समुदाय को सन्मार्ग दिखाने का संकल्प लिया। उसने घोषणा की कि ‘धर्मेश’ (ईश्वर) ने उसे जनजातियों का नेतृत्व सौंपा है। उसने धार्मिक भावनाओं को जाग्रत करके उराँवों को संगठित करना शुरू किया। अपने अनुयायियों के लिए उसने आचरण की नई संहिता लागू की; जैसे-(i) केवल उराँव देवता ‘धर्मेश’ की आराधना की जाए (एकेश्वरवाद में आस्था)। (ii) पशु-बलि, मांस खाने और शराब पीने का परित्याग किया जाए। (iii) गाय और बैल पवित्र हैं, उनको काम में नहीं लाया जाना चाहिए। (iv) जींदारों, अन्य धर्मावलंबियों तथा गैर-आदिवासियों के यहाँ कुलियों एवं मजदूरों के रूप में काम न करें।

जतरा भगत द्वारा आरंभ किया गया आंदोलन सम्पूर्ण उराँव प्रदेश में जंगल की आग की तरह फैला। उराँवों ने खेती करना बंद कर दिया, क्योंकि उनका मानना था कि खेतों में हल चलाने से गायों-बैलों को तकलीफ होती है। उराँवों ने जींदारों और अन्य गैर-आदिवासियों का काम करना बंद कर दिया। वर्ष 1916 ई. के आरम्भ में अपने अनुयायियों को मजदूरी करने से रोकने के अपराध में जतरा भगत को उसके सात अनुयायियों के साथ गुमला के अनुमण्डल पदाधिकारी की कचहरी में उपस्थित किया गया। बाद में उसे इस शर्त पर छोड़ा गया कि वह अपने नए सिद्धान्तों का प्रचार नहीं करेगा और शांति बनाये रखेगा। किन्तु जेल में मिली घोर प्रताड़ना के फलस्वरूप जेल से बाहरआने के दो महीने के भीतर ही उसकी मृत्यु हो गई (1916 ई.)। इस तरह जतरा भगत का तो अंत हो गया, लेकिन उसके द्वारा आरंभ किया गया टाना भगत आंदोलन फूलता-फलता रहा।

आंदोलन के विकसित होने का एक बड़ा कारण उसका मसीहाई स्वरूप था। वस्तुत: जतरा भगत के समय से ही टाना भगत आंदोलन एक शक्तिशाली मसीहाई आंदोलन का रूप धारण करने लगा था और आगे भी उसका यह रूप बना रहा। इसका संदेश यह था कि ईश्वर उराँव आदिवासियों को उनकी दुखद स्थिति से उबारने के लिए अपना सर्वाधिक शक्तिशाली और कृपालु देवदूत (मसीहा) भेजेगा। इस मसीहा की तुलना प्रायः बिरसा मुण्डा आदि से की जाती थी, जो उनके देश से सभी विदेशियों को निष्कासित कर देगा। निरक्षर और भोले आदिवासियों ने ‘जर्मन कैसर बाबा’ को एक अज्ञात किन्तु शक्तिशाली मसीहा मान लिया। वस्तुत: उन दिनों जर्मनों की सफलता की चर्चा सर्वत्र हुआ करती थी, सो भोले उराँवों ने अज्ञात किन्तु शक्तिशाली मसीहा के रूप में ‘जर्मन कैसर बाबा’ की कल्पना कर ली।

सिसई थाना क्षेत्र में बभुरी गाँव निवासी देवमनियाँ भगत (जतरा भगत की समकालीन महिला), मांडर क्षेत्र में शिबू भगत, घाघरा क्षेत्र में बेलगाड़ा निवासी बलराम भगत (गैरक्षणी भगत संप्रदाय), बिशुनपुर थाना क्षेत्र में उरावां गाँव निवासी भीखू भगत (विष्णु भगत संप्रदाय) आदि ने टाना भगत आंदोलन का प्रचार-प्रसार किया। शिबू भगत ने टाना भगतों को मांस खाने की इजाजत दी तो टाना भगतों के दो वर्ग बन गए-‘अरुवा भगत’ एवं ‘जुलाहा भगत’। शाकाहारी भगतों को ‘अरुवा भगत’ एवं मांसाहारी भगतों को ‘जुलाहा भगत’ कहा गया। शाकाहारी भगतों का ‘अरुवा भगत’ नामकरण इसलिए हुआ, क्योंकि वे सिर्फ अरवा चावल ही खाते हैं। टाना भगतों ने पलामू के राजा के समक्ष चार सूत्री मांगें रखीं-

  1. उन्हें स्वशासन प्रदान किया जाए,
  2. राजा का पद समाप्त कर दिया जाए,
  3. समानता स्थापित किया जाए तथा
  4. भूमि कर समाप्त किया जाए क्योंकि भूमि ईश्वर प्रदत्त है।

पलामू के राजा ने इन मांगों को ठुकरा दिया। टाना भगत आंदोलन छत्तीसगढ़ के सरगुजा में भी फैला। मार्च, 1919 ई. में छोटानागपुर प्रमण्डल में शिबु भगत, माया भगत, सुकरा भगत, सिंहा भगत एवं देविया भगत को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें सजाएँ दी गई। फिर भी आंदोलन नहीं रुका। दिसम्बर, 1919 ई. में तुरिया भगत एवं जीतू भगत के नेतृत्व में चौकीदारी टैक्स एवं जमींदारों को मालगुजारी न देने का आंदोलन आरंभ किया गया।

टाना भगत आंदोलन के प्रमुख तथ्य (for MCQs)

  • यह आन्दोलन 1914 में जतरा उरांव के नेतृत्व में धार्मिकपंथ के रूप में शुरू हुआ जिसने एकेश्वरवाद, मांस-मदिरा एवं आदिवासी नृत्य पर पाबंदी और झूम खेती की वापसी की वकालत की।
  • इस आंदोलन को बिरसा आंदोलन का ही विस्तार माना जाता है।
  • इस आन्दोलन का मुख्य क्षेत्र घाघरा, बिशुनपुर, चैनपुर, करायडीह, सिसई, कुडू, मांडर आदि थे।
  • मांडर क्षेत्र में इस आन्दोलन का नेतृत्व शिबू भगत ने किया। घाघरा में बलराम भगत तथा विशुनपुर में भिखू भगत ने इस आन्दोलन का नेतृत्व किया। सिसई थाने की देवमनिया नामक महिला ने इस आन्दोलन में सराहनीय भूमिका निभायी।
  • 1916 ई. में जतरा भगत को डेढ़ वर्ष की सजा हुई। 1917 में जेल से रिहा होने के दो माह के अंदर ही उनका आकस्मिक निधन हो गया।
  • इस आंदोलन में अहिंसा को संघर्ष के ‘अमोघ अस्त्र’ के रूप में स्वीकार किया गया।
  • इस आंदोलन के तीसरे चरण के अन्तर्गत टाना भगतों ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में राष्ट्रीय आंदोलन में भाग लिया।
  • 1921 में महात्मा गांधी द्वारा चलाये गये ‘नागरिक अवज्ञा आंदोलन’ में टाना भगतों ने ‘सिद्धू भगत’ के नेतृत्व में भाग लिया।
  • टाना भगतों ने 1922 में कांग्रेस के गया तथा 1923 में नागपुर अधिवेशन में भाग लिया।
  • 1940 में रामगढ़ अधिवेशन में टाना भगतों ने महात्मा गांधी को 400 रु. की थैली भेंट की थी।

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