पहाड़िया विद्रोह (1772-82)

पहाड़िया विद्रोह (177282) :

  • पहाड़िया जनजाति संथाल परगना प्रमंडल की प्राचीनतम जनजाति हैवास्तव में यही यहां के प्रथम आदिम निवासी हैं

  • इनकी तीन उपजातियां हैं(i) माल : ये मुख्यत: बांसलोई नदी के दक्षिमें बसे हैं(ii) कुमारभाग : ये बांसलोई नदी के उत्तरी तट पर बसे हैं और (iii) सौरिया : ये बांसलोई नदी के उत्तर राजमहल के पठारों पर बसे हैं
  • पहाड़िया जनजाति राजपूत, मुस्लिम, मुगल एवं ब्रिटिश काल में विदेशी ताकतों से संघर्षरत रही
  • अंग्रेजों के खिलाफ इन्होंने कई विद्रोह किये, जिन्हें जनजातियों के संघर्ष के इतिहास में विदेशी शासन के विरुद्ध प्रथम व्यापक विद्रोह माना गया है।
  • 1766 में रमना आहड़ी के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह के बाद पहाड़िया चैन से नहीं बैठे।
  • इस विद्रोह में सरदार रमना आहड़ी (घसनिया पहाड़, दुमका), करिया पुलहर (आमगाछी पहाड़, दुमका), चंगरु सांवरिया (तारागाछी पहाड. राजमहल), नायब सूरजा आदि ने अंग्रेजों की नींद हराम कर दी।
  • लेकिन सबसे जर्बदस्त विद्रोह 1772, 1778 एवं 1779 में हुए।
  • 1772 के विद्रोह में सूर्य चंगरु सांवरिया, पाचगे डोम्बा पहाड़िया एवं करिया पुलहर शहीद हुए। सनकारा महाराजा सुमेर सिंह की हत्या कर दी गयी। .
  • 1781-82 में पुनः विद्रोह हुआ जब महेशपुर राजा की रानी सर्वेश्वरी ने विद्रोह किया, जिसमें पहाड़िया सरदारों ने अंग्रेजों के खिलाफ रानी का खुलकर साथ दिया।
  • सरदारी एवं जमींदारी के पतन के बावजूद पहाड़ियों का विरोध जारी रहा।
  • 1790 से 1810 के बीच अंग्रेजों ने इन क्षेत्रों में संथालों का बहुसंख्या में प्रवेश कराकर पहाड़िया को अल्पसंख्यक बना दिया। फिर भी, उनका विद्रोह जारी रहा।
  • अंग्रेजों ने पहाड़िया संघर्ष को दबाने हेतु 1824 में इनकी भूमि को. ‘दामिन-ए-कोह’ नाम देकर सरकारी संपत्ति घोषित कर दी।
  • 19वीं सदी में संथाल विद्रोह के पूर्व धरनी पहाड़ के रहने वाले सरदार सुन्दरा पहाड़िया ने उन्हें पुनः संगठित किया।
  • 1855-56 के संथाल विद्रोह में सौरिया एवं कुमारभाग की तुलना में माल पहाड़िया ने ज्यादा अहम् भूमिका निभायी थी।

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