कोल विद्रोह : (1831-32 ई.)

विद्रोह  के कारण एवं स्वरुप :

झारखण्ड में हुए जनजातीय विद्रोहों में कोल विद्रोह का विशिष्ट स्थान है, क्योंकि यह झारखण्ड का पहला सुसंगठित और व्यापक जनजातीय विद्रोह था। अपने नए मालिकों द्वारा शोषित, दिकू (बाहरी लोग) द्वारा उत्पीड़ित एवं न्याय के अपने पारम्परिक स्रोत से वंचित छोटानागपुर के आदिवासियों के लिए विद्रोह के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था। वस्तुत: यह मुण्डों का विद्रोह था, जिसमें हो उनके दाहिना हाथ बनकर शामिल हुए।

इस विद्रोह में छोटानागपुर खास, पलामू, सिंहभूम व मानभूम के कुछ क्षेत्रों की जनजातियों ने भाग लिया। सिर्फ हज़ारीबाग इस विद्रोह से अछूता रहा। कोल विद्रोह का ही परिणाम था कि 1834 ई. में विद्रोह-प्रभावित क्षेत्रों को कुछ अन्य क्षेत्रों के साथ मिलाकर ‘दक्षिण-पश्चिमी सीमांत एजेन्सी’ नाम से एक प्रशासनिक इकाई का गठन किया गया, जिसका मुख्यालय विशुनपुर या विलकिन्सनगंज (बाद का राँची) को बनाया गया।

कोल विद्रोह  के प्रमुख तथ्य (for MCQs) :

  • छोटानागपुर में अगर किसी ने अंग्रेज शासकों एवं जमींदारों को सर्वाधिक परेशान किया तो, वे थे कोल विद्रोही।
  • यह मुंडा जनजाति का विद्रोह था, जिसमें ‘हो’ जाति ने भी खुलकर साथ दिया था।
  • इस विद्रोह में छोटानागपुर विशेषकर सिंहभूम, पलामू, मानभूम के कुछ भागों की जनजातियों ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया।
  • कोल  विद्रोह का प्रमुख कारण ‘भूमि संबंधी असंतोष’ था।
  • इस विद्रोह का एक प्रमुख नेता बुधु भगत था। इस युद्ध में वह अपने भाई, पुत्र और 100 अनुयायियों सहित मारा गया। विद्रोहियों के दो अन्य नेता सिंदराय एवं सुर्गा अंत तक लड़ते रहे। उन्होंने 1832 में आत्मसमर्पण किया।
  • विद्रोह दबा दिया गया, पर गांव के मुखिया (मुंडा) एवं सात से बारह गांवों को मिलाकर बनाए गए पीर के प्रधान (मानकियों) की जमीन लौटा दी गयी।
  • इस विद्रोह के परिणामस्वरूप 1833 ई. में एक नये प्रांत दक्षिण पश्चिम सीमा एजेंसी का गठन हुआ। बाद में ‘मानकी मुंडा पद्धति‘ को वित्तीय एवं न्यायिक अधिकार भी दिये गये।

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