हरिबाबा आंदोलनः (1930 ई.)

विद्रोह  के कारण एवं स्वरुप

1930 के दशक में सिंहभूम के दुका हो, जो हरिबाबा के नाम से जाने जाते थे, ने एक आंदोलन चलाया, जिसे ‘हरिबाबा आंदोलन’ कहा गया। हरिबाबा आंदोलन का उद्देश्य टूटती और बिखरती सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक व्यवस्था का शुद्धीकरण था। इसके द्वारा ‘हो’ जनजाति के लोगों को संगठित करने का प्रयास किया गया, ताकि वे बाहरी लोगों के अत्याचार से बच सकें। इस आंदोलन में हरि बाबा के अतिरिक्त बारकेला पीर क्षेत्र के भूतागाँव निवासी सिंगराई हो, भड़ाहातू क्षेत्र के बामिया हो तथा गाड़िया क्षेत्र के हरि, दुला व बिरजो हो ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन लोगों ने सरना धर्म का प्रचार-प्रसार किया।

गाँधी जी के आत्मशुद्धि और त्याग को हरिबाबा आंदोलन ने भी अपनाया, क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि इस आंदोलन के जरिये वे दिकुओं को भगा सकते हैं। गाँधी जी के प्रभाव से यह आंदोलन राजनीतिक बन गया। उनका यह विश्वास था कि अंग्रेज सरकार को भगाने में गाँधी जी ही समर्थ हैं। 15 मई, 1931 ई. को उन्होंने उग्रता का भी परिचय दिया और सिंहभूम में टेलीग्राफ के तारों को उखाड़ फेंका। यह देखकर सरकार ने इस आंदोलन के दमन की कार्यवाही की। दमन के फलस्वरूप हरिबाबा आंदोलन बिखर गया।

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