चुआर विद्रोह : (1769-1805 ई.)

विद्रोह  के कारण :

अंग्रेज अधिकारी जंगल महाल के भूमिजों को चुआर/चोआड़ (अर्थात् दुवंत और नीच जाति) कहते थे, इसलिए इनके विद्रोह को चुआर विद्रोह कहा गया। चुआर जंगल साफ कर खेती करते, पशु-पक्षियों का शिकार करते और जंगल में पैदा होने वाली वस्तुओं को बेच कर गुजारा करते थे। उनमें से अधिकांश स्थानीय जमींदारों के यहाँ ‘पाइक’ यानी सिपाही का काम करते थे। वेतन के बदले उन्हें जमीन दी जाती थी, जो ‘पाइकान जमीन’ कहलाती थी। अंग्रेज शासकों ने कब्जा जमाते ही चुआरों की पुश्तैनी जमीनें छीन-छीन कर नए जमींदारों के हाथ बेचना और इन जमींदारोंके साथ मिलकर नई प्रजा बसाना शुरू किया। साथ ही पाइकों को हटाकर बाहर से ला-लाकर पुलिस को उनकी जगह नियुक्त किया। इससे हजारों पाइक जमीन, घर-द्वार, जीविका का साधन-सब कुछ खोकर दर-दर की ठोकरें खाने लगे। इन पाइकों (सिपाहियों) और किसानों की सम्मिलित शक्ति ने विद्रोह की वह आग लगा दी, जिसे बुझाना अंग्रेज शासकों के लिए बड़ा कठिन हो गया था। इसके अलावा अंग्रेज शासकों ने बेशुमार बढ़ाए गए राजस्व को चुकाने में असमर्थ हो गए जर्मीदारों के हाथ से जमीन छीन ली थी। जमीन खो चुके जमींदारों में से कुछ इस विद्रोह में शामिल हुए। यह विद्रोह अकाल, लगान में वृद्धि, जमीन की नीलामी एवं अन्य आर्थिक मुद्दों को लेकर किया गया।

विद्रोह  का स्वरुप

चुआर विद्रोह के प्रमुख नेताओं के नाम हैं- रघुनाथ महतो, श्याम गंजम, सुबल सिंह, जगन्नाथ पातर; मंगल सिंह, दुर्जन सिंह, लाल सिंह, मोहन सिंह आदि। रघुनाथ महतो ने 1769 ई. में नारा दिया ‘अपना गाँव अपना राज, दूर भगाओ विदेशी राज’। चुआर विद्रोह के दमनकर्ताओं के नाम हैं-लेफ्टिनेंट नन, कैप्टेन फोरबिस, लेफ्टिनेंट गुडयार आदि। करीब 30 वर्षों तक चुआरों के उपद्रवों के कारण पूरे इलाके में अशांति बनी रही।

कम्पनी सरकार ने समझ लिया कि पाइकों, किसानों व जींदारों को कुछ सुविधाएँ; जैसे-पाइकों को उनकी जमीनों की वापसी, राजस्व बाकी पड़ जाने पर जींदारों की जमीनों की नीलामी पर रोक, जमींदारों एवं घटवालों के पुलिस अधिकारों की पुनर्स्थापना आदि किए बगैर इलाके में शांति सम्भव नहीं है। अतएव 6 मार्च, 1800 ई. के एक प्रस्ताव द्वारा जींदारी-घटवाली पुलिस व्यवस्था को पुनर्स्थापित किया गया। 13 दिसम्बर,1805 ई. को इस व्यवस्था को कम्पनी सरकार की स्वीकृति भी मिल गई। गैर-आदिवासी दारोगाओं के स्थान पर स्थानीय लोगों की पुलिस अधिकारियों के रूप में नियुक्ति से कानून व्यवस्था की स्थिति सुधरी। जंगल महाल जिला के बनाए जाने के बाद मानभूम क्षेत्र में 25 वर्षों तक (1805-30 ई.) अपेक्षाकृत शांति व्यवस्था बनी रही।

चुआर विद्रोह के प्रमुख तथ्य :

  • चुआड़ विद्रोह अका, लगान में वृद्धि, जमीन की नीलामी एवं अन्य आर्थिक मुद्दों को लेकर किया गया
  • चुआड़ विद्रोह के प्रमुख नेताओं के नाम हैं – रघुनाथ महतो, श्याम गंजम, सुबल सिंह, जगन्नाथ पातर, मंगल सिंह, दुर्जन सिंह, लाल सिंह, मोहन सिंह आदि।
  • रघुनाथ महतो ने 1769 में नारा दिया ‘अपना गांव अपना राज, दूर भगाओ विदेशी राज।’
  • 1798 के अप्रैल महीने में वीरभूम के जंगल महाल के ही घाटशिला, बिंदू मंडलकुंडा, पुरुग्राम आदि के चुआड़ों एवं मिदनापुर के चुआड़ों ने अंग्रेजों के द्वारा जमीन पर लगान बढ़ाए जाने खिलाफ पनपे आर्थिक असंतोष के चलते विद्रोह कर दिया।
  • जून में बांकुड़ा के चुआड़ एवं पाइक तथा उड़ीसा के पाइक इसमें शामिल हो गये। विद्रोह के विस्तृत स्वरूप के आगे अंग्रेजी दमन काम नहीं आया एवं अंग्रेजों को विवश होकर चुआड़ एवं पाइक सरदारों को उनसे छीनी गयी जमीनें एवं सारी सुविधाएं वापस करनी पड़ी।

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