झारखण्ड में पृथक राज्य के लिए आंदोलन

झारखण्ड में पृथक राज्य के लिएआंदोलन

झारखण्ड क्षेत्र का विस्तार वास्तव में 27 आदिवासी बहुल जिलों (पं. बंगाल, उड़ीसा एवं मध्य प्रदेश के कुछ भाग सहित) में है, जिसे वृहत झारखण्ड कहा जाता है। लेकिन वर्तमान झारखण्ड का गठन बिहार के 18 जिलों को अलग करके किया गया है। अब इसके जिलों की संख्या बढ़कर 24 हो गई है।

इतिहासविदों के अनुसार झारखण्ड का पृथक अस्तित्व मगध साम्राज्य के पूर्व से ही चला आ रहा है। मुगल काल में इस क्षेत्र को कुकरा या खुखरा के नाम से जाना जाता था। ब्रिटिश सत्ता का विस्तार इस क्षेत्र में 1765 ई. के बाद हुआ तथा धीरे-धीरे यह क्षेत्र झारखण्ड के नाम से जाना जाने लगा। इसी काल में इस क्षेत्र में गैर-आदिवासी आबादी के बसने की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई जिससे स्थानीय आबादी प्रभावित हुई। नव आगंतुकों को आदिवासियों ने ‘दीकू’ नाम दिया तथा उनके विरुद्ध उनका विद्रोह ब्रिटिश शासन के प्रति केन्द्रित हुआ। इस बात को विभिन्न विद्रोहों यथा-कोल विद्रोह , भूमिज विद्रोह और संथाल विद्रोह के स्वरूपों में समझा जा सकता है। इनकी भाषागत, आर्थिक उपार्जन एवं सांस्कृतिक विभिन्नता के कारण अलग पहचान बनी हुई है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इस क्षेत्र के औद्योगिक एवं खनन विकास के क्रम में बड़ी तेजी से गैर-आदिवासियों की आबादी बढ़ने लगी। भूमि से बेदखली, साहूकारी व्यवस्था के प्रसार तथा जंगलों की बेरोक-टोक कटाई से आदिवासियों के जनजीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। फलतः इन लोगों ने बाहरी लोगों का विरोध करना प्रारम्भ कर दिया।

आदिवासियों द्वारा संगठित आंदोलन चलाने के लिए पहली बार 1915 ई. में छोटानागपुर उन्नति समाज के नाम से एक संगठन का निर्माण हुआ, परन्तु आपसी मतभेद एवं नेतृत्व के अभाव में यह संगठन बिखर गया। 1938 ई. में इंग्लैण्ड में शिक्षित जयपाल सिंह के नेतृत्व में आदिवासी महासभा का गठन हुआ जिसने 1940 के चुनाव में भाग लिया। 1950 ई. में इस संगठन को ‘झारखण्ड पार्टी ‘का नाम दिया गया, जिसने धीरे-धीरे पूरे दक्षिण पठारी क्षेत्र (वर्तमान झारखण्ड का भू-भाग) में अपना प्रभाव बढ़ाना प्रारम्भ कर दिया। इस पार्टी ने अलग राज्य के मुद्दे को ही अपना चुनावी मुहिम का मुख्य आधार बनाया तथा 1952 ई. एवं 1957 ई. के चुनावों में अविभाजित बिहार का (वर्तमान का झारखण्ड) महत्त्वपूर्ण विपक्षी दल बन कर उभरा। कांग्रेस के ‘बांटो और राज करो’ नीति के तहत 1963 ई. में जयपाल सिंह को राज्य मंत्रिमंडल में जगह दिया गया। फलतः इस दल में आंतरिक कलह की शुरुआत हुई और यह दल विभाजित हो गया। 1963 ई. में जयपाल सिह के नेतृत्व में झारखण्ड पार्टी के कांग्रेस में विलय हो जाने से कांग्रेस ने समझा कि झारखण्ड राज्य की माँग की त्रासदी समाप्त हो गई, किन्तु ऐसी बात नहीं थी।

जयपाल सिंह की असफलता के बावजूद उसके युवा साथियों ने झारखण्ड पार्टी को ‘हुल झारखण्ड पार्टी’ के नाम से बनाए रखा। जनजातीय भाषा में ‘हुल’ का शाब्दिक अर्थ क्रांतिकारी है। स्पष्टत: इस पार्टी का नाम क्रांतिकारी झारखण्ड पार्टी पड़ा, परन्तु यह पार्टी उचित नेतृत्व और मार्गदर्शन के अभाव में बिखर गई। इसी बीच इसके कई नेताओं की हत्या हो गई। बाद में वर्तमान झारखण्ड प्रदेश के विभिन्न जिलों में इस पार्टी के नेतृत्वकर्ताओं की एक श्रृंखला बन गई। जैसे- सिंहभूम में बागुन सुबई, राँची में एच.ई. होरा, संथाल परगना में सेन हेलम ने इस आंदोलन की बागडोर संभाली। अंतत: यह शृंखला भी विखर गई।  मृतप्राय: झारखण्ड आंदोलन सन् 1968 में पुनः लोकप्रिय हुआ। अब इसकी बागडोर ‘बिरसा सेवा दल‘ के हाथों में थी। ‘बिरसा सेवा दल’ ने आदिवासियों के भूमि एवं अन्य सम्पत्ति हड़पने बालों के विरुद्ध आवाज उठाई। सेवा दल के सशक्त अभियान के कारण सरकार को इनकी यथावत् मांगों को स्वीकार कर अध्यादेश जारी करना पड़ा। इस अध्यादेश के द्वारा 30 वर्षों के अंदर भूमि हस्तांतरण के मामलों को स्थगित किया गया। इस अध्यादेश द्वारा आदिवासियों को उनकी हड़पी जमीन मिलनी प्रारम्भ हुई। आगे चलकर कुशल नेतृत्व के अभाव में बिरसा सेवा दल आंदोलन भी खत्म हो गया।

झारखण्ड आंदोलन का दूसरा दौर 1972 ई. में शुरू हुआ, जय शिबू सोरेन के नेतृत्व में झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का गठन किया गया। शिबू सोरेन ने आदिवासियों के शोषण, पुलिस अत्याचार, अन्याय एवं श्रम दोहन के विरुद्ध आवाज उठाई। शिबू सोरेन को कई नेताओं विशेषकर ए.के. राय, विनोद बिहारी महतो का व्यापक समर्थन मिला। धनबाद के उपायुक्त के. बी. सक्सेना ने आदिवासियों के शोषण के विरुद्ध अनेक प्रशासनिक कदम उठाए। विभिन्न घटकों मैं समन्वय के अभाव में मोर्चे का प्रभाव सीमित रहा। 1980 ई. के प्रारम्भ में बी. पी. केसरी की पहल पर झारखण्ड समन्वय समिति ने पृथक राज्य की मांग को लेकर युवा पीढ़ी का आह्वान किया। इसके तुरन्त बाद झारखण्ड स्टूडेन्ट्स यूनियन नामक युवकों एवं छात्रों के संगठन ने झारखण्ड आंदोलन की बागडोर संभाल ली। इस छात्र संगठन ने व्यापक पृथकतावादी एवं हिंसात्मक आंदोलन छेड़ दिया। फलतः कई जगहों पर हिंसक घटनाएँ हुई तथा कोयला एवं अन्य खनिज तथा औद्योगिक उत्पादन का वितरण बाधित हुआ। अंतत: राज्य एवं केन्द्र सरकार को समस्या के तत्काल समाधान के लिए झारखण्ड प्रशासी परिषद की योजना को स्वीकृति देनी ही पड़ी। अतः केन्द्र सरकार की मध्यस्थता से एक समझौता हुआ। केन्द्र सरकार, राज्य सरकार एवं झारखण्ड मुक्ति मोर्चा (सोरेन ग्रुप) के त्रिपक्षीय समझौते के फलस्वरूप 9 अगस्त, 1995 को झारखण्ड क्षेत्र स्वायत्त परिषद (Jharkhand Area Autonomous Council-JAAC) का गठन हुआ। झारखण्ड क्षेत्र स्वायत्त परिषद् के अंतर्गत तात्कालिक बिहार के 18 जिले शामिल थे। आगे इतने ही जिले झारखण्ड राज्य में शामिल करके इस राज्य का गठन किया गया।

झारखण्ड का राज्य के रूप में गठन

उपर्युक्त बातों से स्पष्ट है कि झारखण्ड काफी लम्बे उतार-चढ़ाव को झेलते हुए एक अलग राज्य के रूप में गठित हुआ। देश के 35 प्रतिशत खनिज सम्पदा से समृद्ध ‘झारखण्ड’ राज्य के गठन के लिए बिहार पुनर्गठन विधेयक-2000′ को लोकसभा ने 2 अगस्त, 2000 को और राज्य सभा ने 11 अगस्त, 2000 को पारित कर दिया तथा राष्ट्रपति ने इसे 25 अगस्त, 2000 को अपनी स्वीकृति प्रदान कर इसे अधिनियम का रूप दे दिया। फलत: देश के मानचित्र पर 28वें राज्य के रूप में 15 नवम्बर, 2000 को ‘झारखण्ड राज्य’ एक पृथक इकाई के रूप में आ गया। नए राज्यपाल के रूप में प्रभात कुमार को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलाई गई। इसके साथ ही सात दशकों से संघर्षरत् झारखण्ड क्षेत्र की आदिवासी जनता का अपना राज्य बनाने का सपना साकार हो गया। इस ऐतिहासिक अवसर के लिए विशेष रूप से आयोजित एक भव्य समारोह में झारखण्ड उच्च न्यायालय के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश विनोद कुमार गुप्त ने राज्यपाल को शपथ दिलाई। बाद में बाबू लाल मरांडी ने झारखण्ड के प्रथम मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण की।

झारखण्ड में पृथक राज्य के लिएआंदोलन  से सम्बंधित महत्वपूर्ण तथ्य (for MCQs)

  • छोटानागपुर के जनजातीय क्षेत्रों के लिए झारखण्ड शब्द का प्रयोग पहली बार मध्यकाल में हुआइसका प्रथम प्रयोग 13वीं शताब्दी के ताम्रपत्र पर हुआ हैइस काल में यह एक स्पष्ट एवं पृथक भू-खण्ड के रूप में संगठित हुआ
  • ब्रिटिशासकाल के दौरान झारखण्ड प्रारंभ में बंगाल एवं बाद में बिहार प्रांत का अंग बना
  • पृथक् झारखण्ड की मांग ब्रिटिश काल से ही होती रही हैझारखण्ड में अंग्रेजों और उनकी शोषणकारी तथा शत्रुवत नीतियों के विरुद्ध आंदोलन चलता रहा
  • झारखण्ड आंदोलन का बीजारोपण ढाका में किया गया है ढाका विद्यार्थी परिषद की एक शाखा रांची में भी थी जो चलकर छोटानागपुर उन्नति समाज एवं बाद में झारखण्ड पार्टी के रूप में विकसित हुई।
  • चाईबासा निवासी जे. बार्थोलमन ढाका विद्यार्थी परिषद की शाखा का संचालक थे। उसे ही झारखण्ड आंदोलन का जन्मदाता माना जाता है।
  • जे. बार्थोलमन ने 1912 ई. में ‘क्रिश्चियन स्टूडेंट्स आर्गेनाईजेशन’  की स्थापना की। इस संगठन का प्रारंभिक उद्देश्य गरीब ईसाई विद्यार्थियों की मदद करना था। बाद में इसे केवल विद्यार्थियों तक ही सीमित न रखकर झारखण्ड के सभी आदिवासियों के सामाजिक एवं आर्थिक कल्याण का साधन बनाया गया।
  • 1915 में झारखण्ड का पहला अंतर्जातीय आदिवासी संगठन छोटानागपुर उन्नति समाज स्थापित हुआ। आदिवासियों के सामाजिक एवं आर्थिक हितों की रक्षा करना इस समाज का मुख्य लक्ष्य था। जुवेल लकड़ा, पॉल दयाल, बंदीराम उरांव, ठेबेल उरांव इस समाज के प्रमुख नेता थे।
  • पृथक राज्य के लिए एक सुनियोजित संघर्ष 1928 ई. में प्रारंभ हुआ। 1928 ई. में साइमन कमीशन ने झारखण्ड क्षेत्र से प्राप्त एक ज्ञापन के आधार पर झारखण्ड को पृथक राज्य बनाने की अनुशंसा की थी, परन्तु ब्रिटिश शासकों ने उस पर कोई विचार नहीं किया।
  • झारखण्ड के संघर्षशील नेताओं ने 1938 ई. में जयपाल सिंह के नेतृत्व में आदिवासी महासभा का गठन करके अपना संघर्ष योजनाबद्ध ढंग से प्रारंभ कर दिया।
  • 1939 ई. में थियोडोर सुरीन के बाद जयपाल सिंह इसके अध्यक्ष बने। 1946 ई. के संसदीय चुनाव में आदिवासी महासभा को केवल तीन सीटें प्राप्त हुई। जयपाल सिंह खूटी से चुनाव हार गये। वर्ष 1947 में देश स्वतंत्र हुआ तो झारखण्ड क्षेत्र के नेताओं की महत्वाकांक्षाएं भी मुखरित हुई, परन्तु उन्हें केन्द्र व राज्य सरकार से सहयोग नहीं मिला।
  • आदिवासी नेता जयपाल सिंह ने वर्ष 1950 ई. में ‘आदिवासी महासभा’ का नाम परिवर्तित करके झारखण्ड पार्टी कर दिया।
  • झारखण्ड पार्टी का गठन झारखण्ड आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना थी, क्योंकि इसके दरवाजे अलग झारखण्ड राज्य समर्थक गैर-आदिवासियों के लिए भी खोल दिए गये।
  • झारखण्ड पार्टी ने नवगठित क्षेत्रीय राजनीतिक दल के रूप में झारखण्ड क्षेत्र में राजनीतिक-सामाजिक चेतना प्रज्ज्वलित करने के साथ-साथ जनमत संगठित करने में अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगा दी।
  • वर्ष 1952 में अखण्ड बिहार के प्रथम विधानसभा चुनाव में जयपाल सिंह के कुशल नेतृत्व में झारखण्ड पार्टी ने 33 विधानसभा क्षेत्रों पर विजय प्राप्त कर मुख्य विपक्षी दल का रुतबा प्राप्त किया। इसका चुनाव चिन्ह मुर्गा था।
  • 1957 एवं 1962 के विधानसभा चुनावों में झारखण्ड पार्टी को क्रमशः 32 एवं 20 सीटें प्राप्त हुई।
  • झारखण्ड पार्टी ने 1955 में राज्य पुनर्गठन आयोग के समक्ष जयपाल सिंह के नेतृत्व में अलग झारखण्ड राज्य की मांग को लेकर एक प्रभावशाली प्रदर्शन किया। तब आयोग ने इस क्षेत्र के दौरे पर आया, किन्तु उसने अलग राज्य की अनुशंसा नहीं की।
  • राज्य पुनर्गठन आयोग के समक्ष झारखण्ड पार्टी ने अलग राज्य का जो प्रारूप पेश किया था, उसमें तत्कालीन बिहार के 7, बंगाल के 3, उड़ीसा के 4, और मध्य प्रदेश के 2 जिलों को मिलाकर कुल 16 जिलों के साथ झारखण्ड की मांग की गयी थी।
  • 10 फरवरी, 1961 को पहली बार बिहार विधान परिषद में सीताराम जगतराम ने पृथक झारखण्ड के गठन हेतु भारत सरकार से आग्रह करने के लिए सदन में एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया। इस प्रस्ताव पर काफी चर्चाएं हुई, परन्तु 24 मार्च, 1961 को सद्न ने इस प्रस्ताव को अस्वीकृत कर दिया।
  • वर्ष 1963 में झारखण्ड पार्टी का कांग्रेस में बिलय हो गया, जिससे पृथक झारखण्ड राज्य आंदोलन को गहरा झटका लगा।
  • यह बिलय बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री विनोदानंद झा की पहल पर हुआ। विनोदानंद झा की सरकार में जयपाल सिंह को सामुदायिक विकास एवं ग्राम पंचायत मंत्री बनाया गया।
  • 1965 में बिरसा सेवा दल की स्थापना की गयी। इस दल ने आदिवासियों की मांग को नया स्वर दिया।
  • 1967 में अखिल भारतीय झारखण्ड पार्टी का गठन हुआ।
  • 1968 में हुल झारखण्ड पार्टी का गठन किया गया।
  • वर्ष 1970 में जयपाल सिंह का निधन हो गया।
  • 4 फ़रवरी, 1973 को शिवाजी समाज के विनोद बिहारी महतो एवं सोनोत संथाल समाज के शिबू सोरेन ने मिलकर झारखण्ड मुक्ति मोर्चा का गठन किया।
  • विनोद बिहारी महतो अध्यक्ष एवं शिबू सोरेन महासचिव बनाये गये। इसके बाद क्षेत्रीय नेता एवं कार्यकर्त्ता पुनः सक्रिय हो गये।
  • झारखण्ड मुक्ति मोर्चा ने अपने चार लक्ष्य तय किये- अलग झारखण्ड राज्य के निर्माण के लिए संघर्ष, महाजनी प्रथा के खिलाफ संघर्ष, विस्थापितों के पुनर्वास एवं कल-कारखानों में स्थानीय लोगों की बहाली के लिए संघर्ष तथा वन कानून के विरोध में जंगल कटाई का आंदोलन।
  • 1985 ई. में कांग्रेस (ई) के विधायक देवेन्द्र नाथ चांपिया के नेतृत्व में बिहार विधान मंडल के झारखण्ड क्षेत्र के 52 विधायकों ने झारखण्ड क्षेत्र को केन्द्रीय प्रशासन के अधीन सौंपने की मांग से संबंधित एक संयुक्त  प्रस्ताव-पत्र देश के प्रधानमंत्री को दिया।
  • 22 जून, 1986 को जमशेदपुर में सूर्यसिंह बेसरा के नेतृत्व में असम छात्र संगठन आसू की तर्ज पर ऑल झारखण्ड स्टूडेन्ट्स यूनियन (आजसू) का गठन हुआ।
  • सूर्यसिंह बेसरा ने आंदोलन के कार्यक्रम की घोषणा में खून के बदले खून की रणनीति का प्रतिपादन किया।
  • झारखण्ड आंदोलन में लगे विभिन्न दलों में समन्वय स्थापित करने के उद्देश्य से 1987 ई. में झारखण्ड समन्वय समिति (जेसीसी) का गठन हुआ।
  • दिसम्बर 1987 में झारखण्ड समन्वय समिति द्वारा तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह को एक ज्ञापन दिया गया, जिसमें बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा एवं मध्य प्रदेश के 21 जिलों को मिलाकर अलग झारखण्ड राज्य बनाने की मांग की गयी।
  • 1988 में भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार वनांचल प्रदेश की मांग की। उसने सिर्फ बिहार के जिलों को अलग कर अलग राज्य बनाने की मांग की।
  • 23 अगस्त, 1989 को केन्द्र सरकार द्वारा बी.एस. लाली के नेतृत्व में 24 सदस्यीय झारखण्ड विषयक समिति का गठन किया गया। इस समिति में झारखण्ड आन्दोलन से जुड़े 16 प्रतिनिधि, 4 सरकारी पदाधिकारी और 4 विशेषज्ञ शामिल किये गये।
  • 31 दिसम्बर, 1991 को आजसू के एक सहयोगी राजनैतिक दल के रूप में झारखण्ड पीपुल्स पार्टी का गठन हुआ।
  • 7 अगस्त, 1995 को झारखण्ड क्षेत्र स्वशासी परिषद (जैक) के गठन की राजकीय अधिसूचना जारी की गयी। 9 अगस्त, 1995 को इस परिषद का औपचारिक गठन हुआ। शिबू सोरेन इसके अध्यक्ष और सूरज मंडल उपाध्यक्ष मनोनीत किये गये।
  • झारखण्ड क्षेत्र स्वशासी परिपद के अंतर्गत बिहार के 18 जिलों को सम्मिलित किया गया था। इस परिषद को कृषि, खनन, ग्रामीण विकास, सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा अनुसूचित जनजाति समेत 40 विभागों का भार सौंपा गया। – जैक का कभी विधिवत् चुनाव नहीं हुआ।
  • 22 जुलाई, 1997 को बिहार विधानसभा द्वारा अलग झारखण्ड राज्य के गठन का संकल्प पारित किया गया।
  • 1998 में केन्द्र में श्री अटल बिहारी बाजपेयी के नेतृत्व में गठित को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने 1997 में बिहार विधानसभा में पारित संकल्प के आधार पर वनांचल राज्य से संबंधित बिहार राज्य पुनर्गठन विधेयक तैयार किया और इसे स्वीकृति के लिए बिहार की राबड़ी देवी की सरकार के पास भेज दिया।
  • इस विधेयक में बिहार के 18 जिलों को मिलाकर अलग ‘वनांचल राज्य’ बनाने की बात कही गयी थी।
  • 21 सितम्बर, 1998 को बिहार विधानसभा में उस विधेयक को 107 के मुकाबले 181 वोटों से नामंजूर कर दिया गया।
  • श्रीमती राबड़ी देवी की अल्पमत सरकार ने कांग्रेस के दबाव में 25 अप्रैल, 2000 को पृथक राज्य झारखण्ड के गठन हेतु बिहार राज्य पुनर्गठन विधेयक 2000 को स्वीकृति प्रदान की।
  • 2 अगस्त, 2000 को लोक सभा तथा 11 अगस्त, 2000 को राज्य सभा द्वारा बिहार राज्य पुनर्गठन विधेयक-2000 को पारित कर दिया गया।
  • 25 अगस्त, 2000 को राष्ट्रपति ने विधेयक पर हस्ताक्षर करके अपनी स्वीकृति प्रदान कर दी। इस प्रकार झारखण्ड राज्य के गठन का मार्ग प्रशस्त हुआ और 15 नवम्बर, 2000 को देश के 28वें राज्य के रूप में झारखण्ड का उदय हुआ।

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