सल्तनतकालीन झारखण्ड

सल्तनतकालीन झारखण्ड

गुलाम वंशकालीन झारखण्ड (1206-1290 ई.)

खिल्जी वंशकालीन झारखण्ड (1290-1320 ई.)

तुगलक वंशकालीन झारखण्ड (1206-1412 ई.)

सैय्यद वंशकालीन झारखण्ड (1412-1451 ई.)

लोदी वंशकालीन झारखण्ड (1451-1526 ई.)

सामान्यतः सल्तनत काल में झारखण्ड में मुसलमानों का प्रवेश केवल शत्रुओं का पीछा करते हुए अथवा बंगाल-उड़ीसा जाते या वहाँ से लौटते समय हुआ। सल्तनत काल में झारखण्ड पर छिट-पुट बाहरी आक्रमण हुए। इन बाहरी आक्रमणों के बावजूद झारखण्ड सल्तनत काल में सदैव स्वतंत्र बना रहा। बीरभूम (प. बंगाल) के राजा द्वारा सिंहभूम पर आक्रमण, दिल्ली के सुल्तान महम्मद-बिन-तुगलक के सेनापति मलिक बया द्वारा हजारीबाग पर आक्रमण (1340 ई.) तथा उड़ीसा के शासक कपिलेन्द्र गजपति (1435-70 ई.) द्वारा संथाल परगना पर आक्रमण आदि का कोई स्थायी प्रभाव नहीं पड़ा। इस प्रकार, यदि झारखण्ड पर हए इन छिट-पट बाहरी आक्रमणों को छेड़ दिया जाए तो पूरे सल्तनत काल में झारखण्ड की स्वतंत्र सत्ता अक्षुण्ण बनी रही और यहाँ के राजागण बिना किसी बाह्य हस्तक्षेप के निर्बाध शासन करते रहे।

1202-03 ई. में कुतुबुद्दीन ऐबक के सेनापति बख्तियार खिल्जी ने दक्षिण बिहार पर आक्रमण किया और उदन्तपुरी, नालंदा व विक्रमशिला विश्वविद्यालय को नष्ट-भ्रष्ट किया और भारी खून खराबा किया। फलस्वरूप गैर-मुस्लिम जनता ने प्राणों की रक्षा के लिए झारखण्ड में शरण लेना शुरू कर दिया। इस तरह, झारखण्ड में नवीन नृजातीय तत्वों का समावेश हुआ। इन आक्रमणों के दौरान बख्तियार को बंगाल पहुंचने के मार्गों का पता चला जो झारखण्ड से होकर गुजरता था। उसने 1204-05 ई. में झारखण्ड के रास्ते से गुजर कर बंगाल के सेन वंशी शासक लक्ष्मण सेन की राजधानी नदिया पर आक्रमण किया।

गुलाम वंशकालीन झारखण्ड (1206-90 ई.) : आदि तुर्क गुलाम वंश के सुल्तानों इल्तुतमिश (1211-36 ई.) व बलबन (1265-86 ई.) के समय में दक्षिण बिहार में व्याप्त उथल-पुथल का थोड़ा-बहुत प्रभाव ही झारखण्ड पर पड़ा, क्योंकि ऐसी जानकारी मिलती है कि नागवंशी शासक हरिकर्ण अपने राज्य का शासन कुशलतापूर्वक चलाता रहा।

खिल्जी वंशकालीन झारखण्ड (1290-1320 ई.) : खिल्जी वंश के सुल्तान अलाउद्दीन खिल्जी (1296-1316 ई.) के सेनापति छज्जू मल्लिक ने नागवंशी शासक को कर देने के लिए विवश किया (1310 ई.)।

तुगलक वंशकालीन झारखण्ड (1320-1412 ई.): तुगलक वंश के सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक (1325-51 ई.) के सेनापति मलिक बया हज़ारीबाग क्षेत्र के चाई-चप्पा तक आ पहुँचा था। जबकि संथाली स्रोत के अनुसार, यह आक्रमण इब्राहिम अली के नेतृत्व में 1340 ई. में हुआ था। इब्राहिम अली ने बीघा के किले पर अधिकार कर लिया, परिणामस्वरूप वहाँ के संथाल अपने सरदार के साथ जान बचाकर भाग निकले। मुहम्मद-बिन-तुगलक के उत्तराधिकारी फिरोज तुगलक (1351-88 ई.) ने वर्चस्व की लड़ाई में बंगाल के शम्सुद्दीन इलियास शाह को पराजित किया और हज़ारीबाग के सतगांवा क्षेत्र में एक बहुत बड़े इलाके को जीत लिया तथा सतगांवा को इस विजित क्षेत्र की राजधानी बनाया (1359-60 ई.)। किन्तु फिरोज तुगलक या उसके उत्तराधिकारी सतगाँवा से आगे छोटानागपुर खास में नहीं बढ़ सके और वहाँ का नागवंशी शासक शक्तिशाली शासक बना रहा।

सैय्यद वंशकालीन झारखण्ड (1412-51 ई.): तुगलक वंश के उत्तराधिकारी वंश सैय्यद वंश के सुल्तानों ने झारखण्ड में कोई हस्तक्षेप नहीं किया।

लोदी वंशकालीन झारखण्ड (1451-1526 ई.) : लोदी वंश के सुल्तान अपेक्षाकृत कमजोर सुल्तान थे और दिल्ली सल्तनत का प्रभाव क्षेत्र सिमट कर बहुत कम रह गया था, इसलिए वे झारखण्ड में हस्तक्षेप करने की स्थिति में नहीं थे। लोदी वंश के सुल्तानों के काल में छोटानागपुर खास पर शासन करने वाले नागवंश राजाओं के नाम थे-प्रताप कर्ण, छत्र कर्ण एवं विराट कर्ण।

झारखण्ड लोदी सुल्तानों के हस्तक्षेप से तो बचा रहा, लेकिन उसे लोदी वंश के समकालीन वंश उड़ीसा के गजपति वंश के कहर कर सामना करना पड़ा। कपिलेन्द्र गजपति (1435-70 ई.), जो उड़ीसा के अंतिम गंग राजा का मंत्री था, ने उड़ीसा में एक नए राजवंश गजपति वंश की स्थापना की। कपिलेन्द्र गजपति के नेतृत्व में उड़ीसा राज्य दक्षिण-पूर्वी भारत की एक महाशक्ति बन गया। उसने संथाल परगना तथा हज़ारीबाग को छोड़कर नागवंशी राज्य के बहुत बड़े भाग पर कब्जा जमा लिया। इस प्रकार, झारखण्ड के कुछ भाग पर कपिलेन्द्र गजपति का शासन स्थापित हो गया।

इसी तरह, आदिल शाह-I/ आदिल खान-II/ (1457-1501 ई.) खानदेश का एक अत्यंत शक्तिशाली शासक था। उसने विपुल शक्ति संगठित कर ली थी। उसने अपने सैन्य दल को झारखण्ड तक भेजा और इसीलिए वह ‘झारखण्डी सुल्तान’ (अर्थात् जंगल का राजा) के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

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