झारखण्ड का पूर्व मध्यकालीन इतिहास

इस काल में छोटानागपुर में ऐतिहासिक राजवंशों के अतिरिक्त जनजातीय राज्यों की भी स्थापना हुई। यहाँ की जनजातियों में मुंडाओं की प्रधानता थी और राज्य निर्माण का कार्य भी सर्वप्रथम इन्होंने ही शुरू किया।

  • रिता मुंडा प्रथम मुंडा नेता था जिसने इस क्षेत्र में जनजातीय राज-निर्माण की प्रक्रिया शुरू की। इसने ‘ सुतिया पाहन’ को मुंडाओं का शासक चुना। सुतिया ने नवस्थापित राज्य का नामकरण किया-‘सुतिया नागखंड’। उसने अपने राज्य को सात गढ़ों में विभक्त किया। ये घे- लोहागढ़ (लोहरदगा), हजारीबाग, पालुनगढ़ (पलामू), मानगढ़ (मानभूम), सिंहगढ़ (सिंहभूम), केसलगढ़ और सुरगुजगढ़ (सुरगुज्जा)। इन सात गढ़ों को उसने 21 परगनों में विभक्त किया। इनमें से कुछ परगनों के नाम आज भी पूर्ववत् हैं। स्पष्टतः सुतिया पाहन द्वारा स्थापित यह राज्य प्राय: संपूर्ण छोटानागपुर क्षेत्र में विस्तृत था। किन्तु यह राज्य स्थायी सिद्ध नहीं हुआ। क्योंकि बौद्ध और जैन धर्मों के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ ही आर्य जातियाँ इस क्षेत्र में प्रविष्ट होने लगी थी।

मौर्य काल से लेकर वर्धनकाल तक नवागंतुकों की संख्या निरंतर बढ़ती ही गई थी तथा इन्हीं में से कुछ ने छोटानागपुर के विभिन्न भागों में नए-नए राज्यों की स्थापना की। इनमें प्रमुख थे- पलामू, सरगुज्जा, कोरांबे तथा बरवे के रक्सेल राज्य, अटानागपुर-खास के नागवंशी राज्य और पोरहट के सिंह राज्य । अन्य उल्लेखनीय राज्य थे- पंचेत और क्योंझर।

  • नागवंश

    • छोटानागपुर-खास जनजातियों का प्रमुख क्षेत्र था। अतः यहाँ स्थापित नागवंश राज्य का संपूर्ण छोटानागपुर में प्रमुख स्थान था। खुखरा, नागवंश की संभवतः प्रारंभिक राजधानी थी। इस वंश की स्थापना 10वीं शताब्दी में मानी जाती है। फणिमुकुट राय इस वशं का प्रथम शासक था। अपने समकालीन अनेक राजाओं को इसनेपरास्त किया। सतियांबे को इसने अपनी राजधानी बनाया और वहाँ एक सूर्य-मंदिर का निर्माण करवाया। इसने अपने शासन काल में अनेक गैर-आदिवासियों को निमंत्रित कर अपने राज्य में बसाया, जो उसके उदार व्यक्तित्व का परिचायक है। इसी वंश के चौथे शासक प्रताप राय ने राजधानी सुतियांबे से स्थानांतरित कर चुटिया में स्थापित की। इसी वंश के शासक भीम कर्ण ने चुटिया की जगह खुखरा को अपनी राजधानी बनाया। क्योंकि चुटिया बंगाल पर आक्रमण करने वाले तुर्क आक्रमणकारियों के मार्ग के निकट था। इस राजा का रक्सेल राजाओं से युद्ध हुआ, जिसमें इसकी विजय हुई।
    • पलामू और उसके दक्षिणी-पूर्व भाग पर रक्सेलों का अधिपत्य था। ये अपने को हैहय वंशीय राजपूत कहते थे। उनका शासन दीर्घकाल तक बना रहा। बाद में ये चेरों द्वारा अपदस्थ कर दिए गए। सरगुज्जा पर भी रक्सेलों की एक शाखा का शासन था। संभवतः इस काल में खरवार, गोंड, किसान, कोरवा और परहिया पलामू की प्रमुख जनजातियाँ थी। इनमें खरवारों की संख्या अधिक थी और सरगुज्जा से लगे पहाड़ी क्षेत्र पर इनका एकाधिकार था। इसी काल में संभवत: दहला के कलचुरियों ने पलामू के कुछ समीपवर्ती भागों पर कब्जा कर लिया था। किन्तु पलामू के शेष भागों में रक्सेलों की प्रधानता थी। 16वीं शताब्दी के प्रारंभ में चेरो के आगमन तक पलामू में रक्सेलों की प्रधानता बनी रही। रक्सेलों ने देवगन तथा कुंडेलवा में किले बनवाए और इन्हें अपना मुख्यालय बनाया।
  • सिंह वंश
    • सिंहभूम को पोरहट के सिंह राजाओं की भूमि कहा गया है। इसके नाम के विषय में सिंह वंश और ‘हो’ जनजातियों में मतभेद है। सिंह वंश के लोगों का कहना है कि इस क्षेत्र का नामकरण उन्होंने ही इस (सिंहभूम) नाम से किया, जबकि ‘हो’ जनजाति के लोगों का कहना है कि उन्होंने इस क्षेत्र का नाम ‘सिंहभूम’ अपने देवता सिंगबोंगा के नाम पर रखा। जनजातीय मत ही सर्वाधिक मान्य है, क्योंकि जनजातियों में पर्वत, पहाड़ों और नदियों के नाम अपने देवी-देवताओं के नाम पर रखने की परंपरा रही है।
    • सिंहभूम के सिंह राजाओं के विषय में कई अभिमत प्रकट किए गए हैं। यहाँ इनकी दो शाखाओं के शासन करने का उल्लेख मिलता है। प्रथम शाखा का संस्थापक काशीनाथ सिंह था। इस शाखा का शासनकाल 8वीं शताब्दी से संभवतः 13वी शताब्दी के प्रारंभ तक माना जाता है। इनके विषय में कहा जाता है कि ये पश्चिमी भारत से आए राठौर वंश के राजपूत थे और उन्होंने पोराहट राज्य की स्थापना की। उन पर बहुत दिनों तक छोटानागपुर-खास के नागवंशियों का प्रभाव बना रहा। दुर्भाग्यवश सिंह वंश को पहली शाखा के क्रिया-कलाप का कोई वर्णन उपलब्ध नहीं है। दूसरी शाखा का शासन काल 13वीं शताब्दी के प्रारंभ से शुरू होता है। इस शाखा के प्रथम शासक के रूप में दर्पनारायण सिंह के नाम का उल्लेख मिलता है। इसी शाखा के एक शासक काशीराम सिंह के काल में बनोई क्षेत्र में पोरहट के नाम से नई राजधानी की स्थापना हुई। काशीराम के उत्तराधिकारी अच्युत सिंह के समय में राज्य की आराध्य देवी के रूप में पौरी देवी की प्राण-प्रतिष्ठा की गई।
  • पंचेत राज्य :

    • मानभूम क्षेत्र के पंचेत राज्य की भी चर्चा इस काल में मिलती है। यह एक शक्तिशाली राज्य था। इस राज्य की उत्पत्ति और स्थापना के विषय में कई किंवदंतियाँ प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार, यहाँ के गोवंशी राजा गोमुख को शिकारियों के दल ने अरूण वन (आधुनिक पंचेत) में बच्चे के रूप में पाया था। बाद में उसे उन्होंने पाल-पोसकर गाँव का मांझी और बाद में परगना चौरासी का राजा चुन लिया। अन्य कथा के अनुसार बाल्यकाल में एक बालक कपिला पहाड़ में रहने वाली कपिला गाय के साथ जंगलों में घूमता रहता था। अंततः वह राजा बना और पंचकोट के किले का निर्माण कराया। क्योंकि उसका चुनाव पांच राजाओं ने मिलकर किया था, अतः नव-निर्मित किला पंचकोट कहलाया और राजा गोमुखी नाम से विख्यात हुआ।
  • गुर्जर-प्रतिहार, राष्ट्रकूट एवं पाल राजाओं की पारस्परिक शत्रुता का छोटानागपुर की राजनीति तथा संस्कृति पर भी प्रभाव पड़ा। इनमें से कोई-न-कोई शासक अवसर पाकर इस क्षेत्र पर अपना अधिकार स्थापित कर लेता था। घाघरा थाना स्थित हापामुनि गाँव का महामाया मंदिर उसका प्रमाण है। इस मंदिर का निर्माण गजघंट राज के महाराष्ट्र निवासी गुरू हरिनाथ द्वारा करवाया था। गुमला-चैनपुर के निकट टांगीनाथ के प्रसिद्ध मंदिर का निर्माण भी इसी काल में हुआ। दूसरी ओर चतरा जिले के इटखोरी नामक स्थान पर महेन्द्रपाल के शिलालेख से सिद्ध होता है कि 9वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में गुर्जर-प्रतिहारों ने छोटानागपुर के सीमावर्ती इलाकों पर कब्जा कर लिया था। अंततः पाल शासकों के कमजोर हो जाने के कारण छोटानागपुर के विभिन्न राज्य उनके आक्रांत किए जाने से बच गए।
  • पूर्व-मध्यकाल के उपर्युक्त वर्णित राज्यों के अतिरिक्त कुछ अन्य राज्यों, जैसे-रामगढ़, कुंडा, केंदी, छै तथा खड़गडीहा का भी वर्णन मिलता है। ये सभी राज्य आज के हजारीबाग जिले में अवस्थित थे। प्राचीन काल का अंत होने तक छोटानागपुर का क्षेत्र भारतीय इतिहास को गतिविधियों से सुरक्षित रहते हुए भी बाह्य जगत् से अप्रभावित नहीं रह सका। धनबाद जिला अंतर्गत गोविन्दपुर में स्थित कवि गंगाधर (1373-78 ई.) द्वारा रचित प्रस्तर शिलालेख एवं हजारीबाग स्थित दूधपानी से प्राप्त 8वीं सदी के शिलालेख से इस बात की पुष्टि होती है।
  • विभिन्न शासकों के विषय में उपर्युक्त वर्णन से स्पष्ट है कि पूर्व-मध्यकाल में छोटानागपुर में अनेक छोटे-बड़े राज्य थे। किन्तु इनमें प्रधानता नागवंशी राज्य की ही थी। 11वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में कलचुरी नरेश लक्ष्मी कर्ण एक अत्यंत शक्तिशाली राजा था। नागवंश के गंधर्व राय का वह समकालीन था। नागवंशी राजाओं में भीम कर्ण भी एक शक्तिशाली शासक था। नागवंशी राजाओं का यह उपाधि-परिवर्तन राय से कर्ण संभवतः लक्ष्मी कर्ण के वंशजों पर नागवंशियों की विजय या मित्रता का परिचायक है। नागवंशियों से इसकी पुष्टि होती है। भीम कर्ण ने भीमसागर का निर्माण कराया, जो आज भी है। भीम ने सरगुजा के रक्सेलों को बुरी तरह हराया और उनसे बासुदेव राय की मूर्ति भी छीन ली।

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