मुगलकालीन झारखण्ड

मुगलकालीन झारखण्ड

मुगल प्रशासक :बाबर (1526-30 ई.) हुमायूँ (1530-40 ई.) / शेरशाह सूरी (1540-55 ई.) अकबर (1556-1605 ई.) जहाँगीर (1605-27 ई.) शाहजहाँ (1627-58 ई.) औरंगजेब (1658-1707 ई.)

मुगल काल में झारखण्ड में छोटे-बड़े राज्यों की संख्या में और वृद्धि हुई। सबसे बड़ा परिवर्तन यह हुआ कि रक्सेलों को पराजित कर चेरो ने पलामू में नए राजवश की स्थापना कर ली। फिर भी झारखण्ड मुस्लिम अतिक्रमण से बचा हुआ था। अंतत: इसमें मुसलमानों के प्रवेश का मार्ग शेर खां ने प्रशस्त किया। शेरशाह का रोहतासगढ़ पर अधिकार 1538 ई. में हो चुका था। किन्तु जब वह किसी सैन्य अभियान में रहता, अथवा विपत्ति में फंसा रहता तो चेरो लोग झारखण्ड के जंगलों से निकलकर किसानों को सताते या बंगाल जाने वाले मार्ग पर यात्रियों के साथ लूट-पाट करते या कभी-कभी शेरशाह के सैनिक शिविरों में भी लूट-पाट मचाते। अतः शेरशाह के लिए इनका दमन करना आवश्यक था। शेरशाह का मुगलों से संघर्ष के क्रम में यह क्षेत्र उसका आश्रय स्थल था। अत: वह इस क्षेत्र के महत्व को समझ रहा था।

बाबर-हुमायूँ कालीन झारखण्ड

मुगल बादशाहो बाबर (1526-30 ई.) एवं हुमायूँ (1530-40 ई.) के शासन काल में झारखण्ड उनके प्रभाव क्षेत्र के दायरे से बाहर था, इसलिए झारखण्ड के क्षेत्रीय राजा बिना किसी बाह्य हस्तक्षेप के निबांध शासन करते रहे। चूँकि बाबर ने अफगानों को अपदस्थ कर मुगल वंश की स्थापना की थी इसलिए अफगान बिहार-बंगाल में रहते हुए फिर से शक्ति जुटा कर मुगलों से टक्कर लेने की फिराक में थे। इस प्रकार, बाबर और हुमायूँ के शासन काल में झारखण्ड मुगल विरोधी अफगानों का आश्रय स्थल बन गया था। हुमायूँ मुगल-अफगान संघर्ष के दौरान एक मौके पर भुरकुंडा (हज़ारीबाग जिला) तक घुस आया था। हुमायूँ के सबसे बड़े शत्रु शेरशाह ने मुगल-अफगान संघर्ष (1530-40 ई.) में इस क्षेत्र का कई बार उपयोग किया था।

मुगल सम्राट अकबर के शासन काल के 303 (1585 में) वर्ष में सर्वप्रथम मुगलों का झारखण्ड के साथ सैनिक संघर्ष शुरू हुआ। इसके पूर्व के 45 वर्षों में केवल इतना ही होता था कि मुगलों द्वारा दबाव डालने पर अफगान विद्रोही यहाँ के जंगलों में आश्रय लेते और मुगल पीछा करते झारखण्ड तक पहुंच आते। अकबर के शासन काल में झारखण्ड में प्रमुख तीन शासक वंश थे-कोकरह के नाग वंश, पलामू के चेरो वंश तथा सिंहभूम के सिंह वंश। अकबर के काल में मुगलों ने इस क्षेत्र पर ध्यान राजनीतिक, सामरिक और कुरु-कुछ आर्थिक कारणों से दिया। इस क्षेत्र पर अधिकार हो जाने से मुगल सेना के लिए हाथियों की समस्या दूर हो गई। संभवतः इस क्षेत्र के शंख नदी से हीरे की भी प्राप्ति होती थी। अत: इस क्षेत्र को मुगल अपने अधीन लाने के लिए अत्सुक थे। 1585 ई. में मुगल सेना ने इस क्षेत्र पर आक्रमण किया। इस समय कोकरह का राजा मधुकरण शाह था। ऐसा लगता है कि उसे बंदी बनाकर शाही दरबार में भी पेश किया गया, जहाँ उसके नम्र स्वभाव के कारण बादशाह ने उसे पुनः कोकरह भेज दिया। इस तरह 16 वीं शताब्दी के अंत तक कोकरह की तटस्थता भंग हो चुकी थी और यह क्षेत्र मुगलों के नियंत्रण में आ चुका था और उन्हें वार्षिक कर भी देने लगा था। सबसे बड़ी बात थी कि यहाँ का राजा मुगलों का विश्वस्त अधीनस्थ बन गया था जैसा कि उड़ीसा अभियान के समय उसके द्वारा मुगलों को दी गई सहायता से स्पष्ट है। कोकरह की तरह सिंहभूम के सिंह वंशी राजा भी मुगलों के सहायक बन गए। 1589 ई. तक मान सिंह के नेतृत्व में चेरो को भी परास्त कर साम्राज्य का अंग बना लिया गया।

जहाँगीर के शासन काल में मुगल-झारखण्ड संबंधों के इतिहास में एक सर्वथा नवीन युग का आरंभ हुआ। विशेषत: मुगल-नागवंशी और मुगल-चेरो के संदर्भ में। जहाँगीर को भी झारखण्ड से मिलने वाले हीरे के विषय की जानकारी थी। इस बात का उल्लेख उसने अपनी आत्मकथा तजुक-ए-जहाँगीर में किया है।

जहाँगीर के काल में कोकरह का शासन दुर्जन साल के हार्थों में था। उसने मुगल दरबार को वार्षिक कर देना भी बंद कर दिया था। अतः उस पर अनुशासनात्मक कार्रवाई जरूरी थी। इब्राहिम खां ने 1615 में कोकरह पर आक्रमण कर दुर्जन साल को बंदी बनाकर शाही दरबार में पेश किया। वहाँ से उसे 12 वर्ष की कैद की सजा सुनाकर ग्वालियर के किले में भेज दिया गया। दुर्जन साल के साथ उसके कुछ परिवार के सदस्य और राजागण भी बंदी थे। इस विजय के बाद इब्राहिम खां ने कुछ हीरे और हाथी शाही दरबार में भेंट किए थे। जहाँगीर को इस क्षेत्र से प्राप्त होने वाले हीरे में गहरी रुचि थी। कहा जाता है कि एक बार इस क्षेत्र से बैंगनी रंग का हीरा मिला था। बादशाह हीरे की शुद्धता की पूरी जानकारी चाहता था। उसे इस बात की जानकारी नहीं थी कि दुर्जन साल हीरे का बहुत ही अच्छा पारखी है। दुर्जन साल का यही गुण उसके कैदी जीवन से मुक्ति का साधन बना। दुर्जन साल ने बादशाह के कहने पर हीरे की शुद्धता की जांच की और उसे शद्ध होने की बात कही। बादशाह उससे प्रसन्न हुआ और उसे उसका राज्य लौट दिया। दुर्जन को अनुमति दी गई कि उसकी कोई मांग हो तो बादशाह के समक्ष रख सकता है। उसने दो मांगें रखी

  1. राजागण और उसके परिवार के सदस्य जो ग्वालियर के किले में कैद थे, उन्हें मुक्त किया जाए।
  2. उसे दरबार में कुर्सी पर बैठने की अनुमति दी जाए।

बादशाह ने उपर्युक्त दोनों मांगें स्वीकार कर ली। दुर्जन साल ने भी 6,000 वार्षिक कर देना स्वीकार कर लिया और उसे उसके राज्य का पट्टा बादशाह ने दे दिया।

जहाँगीर के समय में पलामू में दो चेरो राजाओं के शासन का उल्लेख मिलता है। लेकिन इनका उल्लेख चेरो वंशावली के अतिरिक्त जहाँगीरकालीन किसी फारसी स्रोत में नहीं मिलता है। जहाँगीर के समय मानभूम के विष्णुपुर पर मुगलों का अधिकार हो गया था। बहारिस्तान-ए-गैवी के अनुसार बंगाल के सूबेदार इस्लाम खां ने बिहार के सूबेदार अफजल खां तथा उसके अधीन जमींदारों की सहायता से पंचेत के जमींदार वीर हम्मीर पर आक्रमण किया। उसने बिना प्रतिरोध के ही आक्रमणकारी सेना के सेनापति शेख कलाम के समक्ष आत्म-समर्पण कर दिया। जहाँगीर के काल में यहाँ अन्य राज्यों के बारे में विशेष जानकारी का अभाव है।

शाहजहाँ के शासनकाल के आरंभ तक मुगल छोटानागपुर से पूरी तरह परिचित हो चुके थे। वे इस क्षेत्र के आंतरिक मामले में भी अब गहरी रुचि लेने लगे थे और यहाँ के निवासियों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने का हर संभव प्रयास कर रहे थे। अभी भी मुगलों का इस क्षेत्र के दो भागों से ही गहरा संबंध था- कोकरह और पलाम्।

शाहजहाँ के शासनकाल के प्रथम चरण में यहाँ का शासक दुर्जन साल था। दुर्जन साल ने कैद से मुक्त होने के बाद कोकरह पर लगभग 13 वर्षों तक शासन किया। यहाँ लौटने पर उसने अपनी राजधानी खुकरा की जगह सामरिक दृष्टि से अधिक सुरक्षित स्थान दोहसा को बनाया और इसे अनेक सुंदर भवनों से सजाया गया। तीन ओर पहाड़ियों और एक तरफ से दक्षिण कोयल नदी से घिरा दोहरा शत्रुओं के लिए प्रायः दुर्भेय था। दोहसा में स्थापित भवनों के निर्माण में मुगल स्थापत्य-कला का स्पष्ट प्रभाव है, जिसमें दुर्जन साल का प्रासाद नवरतगढ़ अथवा नवरत्नगढ़ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। यह पाँच-मंजिला था किन्तु अब केवल तीन मंजिले ही बची हुई हैं। दुर्जन साल के मृत्यु की बाद संभवतः रघुनाथ शाह शासक बना और इसके काल में भी मुगल नागवंशी संबंध सौहार्द्रपूर्ण बने रहे। शाहजहाँ के शासन काल के अंत तक कोकरह की एकांतिकता का अंत हो चुका था और अब वह उत्तर भारत के जन-जीवन से संबद्ध हो गया था। नागवंशी शासक अब सीमावर्ती राज्यों से सुसंस्कृत प्रशासकीय और स्थापत्य संबंधी परंपराओं को ग्रहण कर रहे थे। इस तरह इस वन-प्रांतर में सत्ता और संस्कृति संबंधी नई अवधारणाओं का विकास हुआ। यद्यपि शाहजहाँ के काल में भी मुगलों की इस क्षेत्र में अभिरुचि का कारण हीरा हो था। शाहजहाँ के शासन काल में पलामू के चेरो और मुगल संबंध और अधिक प्रत्यक्ष हो गया। वस्तुतः इसी समय से पलाम् का इतिहास क्रमबद्ध और प्रामाणिक जान पड़ता है। संभवतः इस समय भी कुछेक दिनों के लिए चेरो शासक मुगल शासकों के नियंत्रण में रहे। शाहजहाँ के शासनकाल में प्रताप राय चेरो शासक था। शाहजहाँ ने इसे एक हजारी मनसबदार नियुक्त किया।

सिंहभूम के सिंह वंश के राजाओं के मुगलों के साथ निकट-संपर्क थे। शाहजहाँ के समय में ही उन्होंने मुगलों को नियमित वार्षिक कर देना स्वीकार किया। मानभूम (वर्तमान सिंहभूम, धनबाद व हजारीबाग) क्षेत्र के साथ शाहजहाँ के संबंधों को स्पष्ट जानकारी का अभाव है।

औरंगजेब के शासन काल में झारखण्ड प्रदेश भी भारत के अन्य भागों की तरह उसकी साम्राज्यवादी मानसिकता का शिकार हुआ। अपने समय में उसने इस क्षेत्र से और अधिक निकट संबंध स्थापित किए। साथ ही मानभूम तथा सिंहभूम जैसे क्षेत्र जो तब तक लगभग अछूते रहे थे, अब वार्षिक कर देने के लिए बाध्य किए गए। औरंगजेब के शासन काल में अधिकांश भाग में कोकरह के नागवंशी राजा रघुनाथ शाह का शासन था। वह एक अत्यंत धार्मिक प्रवृत्ति और दानी स्वभाव का व्यक्ति था। उसका धर्म-गुरु हरिनाथ था। कहा जाता है कि एक अवसर पर रघुनाथ ने अपना समस्त राज्य हरिनाथ को दान में दे दिया, जब गुरु हरिनाथ ने इतना बड़ा दान लेना अस्वीकार कर दिया तो रघुनाथ ने घोषित किया कि वह हरिनाथ का दास है एवं उसने (रघुनाथ) गुरू के नामका ‘नाथ’ शब्द अपने नाम के साथ जोड़ लिया। आगे के सभी नागवंशी राजा अपने नामों में ‘शाह’ और ‘नाथ’ शब्दों को (पहला मुगल बादशाह अकबर द्वारा प्रदत्त और दूसरा गुरु हरिनाथ प्रदत) शामिल करने लगे। रघुनाथ शाह ने अपनी राजधानी दोहसा को अनेक भवनों तथा जनोपयोगी वस्तुओं से सजाया तथा यहाँ कई मंदिरों का निर्माण भी करवाया। इन मंदिरों में जगन्नाथ मंदिर सर्वाधिक उल्लेखनीय है। इस मंदिर की दीवार पर उत्कीर्ण दो अभिलेखों से पता चलता है कि रघुनाथ शाह के शासन काल में 1682 ई. में इसका निर्माण हुआ था। रघुनाथ शाह ने बौड़या नामक स्थान पर ‘मदन मोहन मंदिर’ का निर्माण कराया। हरि ब्रह्मचारी द्वारा चुटिया में ‘राम-सीता मंदिर’ का निर्माण कराया गया। रघुनाथ शाह के शासन काल में स्थापत्य संबंधी निर्माण कार्यों से प्रतीत होता है कि कोकरह राज्य आंतरिक रूप से समृद्ध था। उसके काल में मुगलों का केवल एक आक्रमण हुआ। चेरो (पलामू) शासक मेदिनी राय ने कोकरह पर आक्रमण कर राजधानी में लूट-पाट की। यहाँ से लूटी गई संपत्ति के अलावा पत्थर का विशाल दरवाजा भी था जिसे मेदिनी राय ने पलामू के ‘नया किला’ में लगवाया जो आज भी ‘नागपुर-दरवाजा’ के नाम से प्रसिद्ध है। रघुनाथ शाह की मृत्यु के बाद रामशाह शासक हुआ। इसके समय भी मुगल-नागवंशी संबंध सौहार्दपूर्ण थे।

औरंगजेब के शासन के प्रारंभिक वर्षों में पलामू का चेरो राजा मेदिनी राय था। उसने 1658 ई. से 1674 ई. तक राज्य किया। संभवतः शुरू में उसने मुगल सत्ता को स्वीकार कर लिया था, लेकिन शाहजहाँ के पुत्रों के उत्तराधिकार की लड़ाई का उसने भरपूर फायदा उठाया। चेरो अपनी परंपरागत मुगल-विरोधी नीति की ओर लौट चुके थे और अपने सुरक्षित आश्रय स्थल के कारण मुगल प्रदेशों पर आक्रमण कर लूट-पाट मचाना शुरू कर दिया था। वस्तुतः इस स्वतंत्र प्रिय जाति को मुगलों का नाममात्र का आधिपत्य भी स्वीकार नहीं था। उसने मुगलों को न केवल कर देना बंद कर दिया बल्कि सीमावर्ती मुगल-प्रदेशों को आक्रांत करना भी प्रारंभ किया। यह स्थिति औरंगजेब जैसे साम्राज्यवादी शासक के लिए असा थी। औरंगजेब ने बिहार के सूबेदार दाउद खां को पलामू पर आक्रमण करने और चेरो राजा से कर वसूलने का आदेश दिया। उसने बिहार के कई जागीरदारों और फौजदारों को भी दाङद के इस अभियान में सहायता | करने का आदेश दिया। फलतः 23 अप्रैल, 1660 से पलामू के चेरो शासक के विरुद्ध लंबा सैन्य अभियान शुरू हुआ जो दिसम्बर, 1660 तक चला। अंतत: चेरो की पराजय हुई और मेदिनी राय भाग गया। पलामू विजय अभियान दाउद के सैनिक जीवन की महत्त्वपूर्ण उपलब्ध थी। इसी अभियान में उसने सामरिक कुशलता, तत्काल निर्णय शक्ति और नेतृत्व का परिचय दिया। पलामू विजय | की स्मृति में दाउद ने 1662 ई. में पलामू के पुराना किला में एक मस्जिद का | निर्माण करवाया। वहाँ से लौटते समय दाउद खां पलामू किला का सिंह दरवाजा अपने साथ लेता गया और उसे दाउदनगर स्थित अपनी गढ़ी में लगवाया।

पलामू विजय के बाद वहाँ पर फौजदार के रूप में मनकली खां की नियुक्ति की गई, जो 1666 ई. तक रहा। मनकली खां के तबादले के बाद वहाँ का शासन बिहार के सूबेदार के हाथ आ गया। दाउद से पराजित होने के बाद मेदिनी राय सरगुजा भाग गया था और मनकली खाँ के हटते पुनः पलामू लौट आया और अपने खोये राज्य पर अधिकार कर लिया। मेदनी राय को ‘न्यासी राजा’ कहा गया है। उसने शीघ्र ही पलाम को विपन्नता से उबार कर समृद्धि के शिखर पर लाकर बैठा दिया। ऐसा लगता है कि उसके अधीन पलामू की सुधरी हुई दशा को ध्यान में रखकर मुगलों ने पलामू को उसके अधीन ही रहने दिया। आज भी पलामूवासो मेदिनी राय के शासन काल को ‘चेरो शासन का स्वर्ण युग’ के रूप में स्मरण करते हैं। मेदिनी राय के पलामू की गद्दी पर पुनर्स्थापित हो जाने पर भी औरंगजेब ने इस क्षेत्र में रुचि लेना बंद नहीं किया और यहाँ पर मुगलों को नाममात्र ही सही, संप्रभुत्ता बनी रही।

वर्तमान हज़ारीबाग, सिंहभूम और मानभूम जिलों में शामिल प्रदेशों पर औरंगजेब का कोई विशेष प्रभाव रहा हो ऐसा प्रतीत नहीं होता। उसके समय हजारीबाग क्षेत्र में पाँच प्रमुख राज्य थे। औरंगजेब के समय धनबाद और पुरुलिया जिला मुगल प्रभाव से प्रायः बाहर ही रहे। सम्पूर्ण छोटानागपुर में यही दो ऐसे क्षेत्र थे, जो मुस्लिम आक्रमणों से पूरी तरह बचे रहे। औरंगजेब के गही पर बैठने के समय पंचेत राज्य नियमित रूप से मुगलों को कर देता रहा। सिंहभूम | के पोरहट पर औरंगजेब के समय उसके समकालीन राजा महिपाल का शासन था, लेकिन उस पर औरंगजेब के संप्रभुता का कोई प्रमाण नहीं मिलता, क्योंकि यहाँ की भौगोलिक स्थिति ऐसी थी कि सिंहभूम को कभी भी औरंगजेब के साम्राज्य में शामिल नहीं किया जा सका और पोरहट के सिंह राजाओं ने अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखा।

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