झारखण्ड: मौर्य एवं मौर्योत्तर काल

मौर्य काल :

  • चन्द्रगुप्त मौर्य (322 ई.पू. – 298 ई.पू.) ने अपने गुरु कौटिल्य (अन्य नाम चाणक्य, विष्णुगुप्त) की मदद से नंद वंश के अंतिम शासक धनानंद को पराजित कर मगध में मौर्य वंश की स्थापना की। नंद वंश के शासक विशाल सेना के स्वामी थे। नंदों की सेना में झारखण्ड के जनजातीय सैनिकों के साथ-साथ हाथी भी शामिल थे। वास्तव में मगध की सैन्य सफलता का एक महत्त्वपूर्ण कारण इसमें शामिल जनजातीय तत्व भी था। नंद वंश का विनाशक और मौर्य वंश का संस्थापक चन्द्रगप्त मौर्य झारखण्ड क्षेत्र से परिचित थे।
  • कौटिल्य ने अपने ग्रंथ ‘अर्थशास्त्र’ में इस क्षेत्र को कुकुट/कुकुटदेश कहा है। कौटिल्य के अनुसार कुकुटदेश में गणतंत्रात्मक शासन प्रणाली थी। जनजातियों को नियंत्रण में रखने, मगध के हित में उनका उपयोग करने तथा मगध के शत्रुओं से उनके गठबंधन को रोकने के उद्देश्य से ‘आटविक’ नामक पदाधिकारी की नियुक्ति की गई थी।
  • आटविक के अधीन ‘नागाध्यक्ष’,’वनाध्यक्ष’, ‘नागपाल’,’वनपाल’ जैसे अन्य अधिकारी थे। मगध से दक्षिण भारत की ओर जाने वाला व्यापारिक मार्ग झारखण्ड से होकर गुजरता था; इसलिए झारखण्ड का व्यापारिक महत्त्व था। कौटिल्य ने लिखा है कि इन्द्रवानक की नदियों से हीरे प्राप्त किये जाते थे। इन्द्रवानक संभवत: इंव एवं शंख नदियों का इलाका था।
  • चन्द्रगुप्त मौर्य के पोते अशोक (273 ई.पू.-232 ई.पू.) का यहां की जनजातियों पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण था। अशोक के 13वें शिलालेख में अशोक के समीपवर्ती राज्यों की सूची मिलती है, जिसमें से एक आटविक/आटवी/ आटव था। आटविक प्रदेश बघेलखंड से उड़ीसा के समुद्र तट तक विस्तृत था। इस प्रदेश में झारखण्ड क्षेत्र भी शामिल था।
  • अशोक द्वारा भेजे गये धर्म प्रचारक दलों में एक आटवी जनजातियों के बीच भी भेजा गया था। इस दल के नेता का नाम रक्षित था। अशोक के पृथक् कलिंग शिलालेख 2 में उड़ीसा की सीमावर्ती अविजित जनजातियों के विषय में कहा गया है : ‘उन्हें मेरे लिए धर्म का आचरण करना चाहिए, ताकि वे लोक तथा परलोक की प्राप्ति कर सकें, उड़ीसा की सीमावर्ती अविजित जनजातियों में झारखण्ड क्षेत्र की जनजातियाँ भी संकेतित हैं।

मौर्योत्तर काल

  • इस काल की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात थी :
    • भारत की पश्चिमी विश्व के देशों के साथ व्यापार में अभूतपूर्व उन्नति।
    • झारखण्ड के क्षेत्रों में इस काल के कुछ सिक्कों के पाए जाने से आभास होता है कि इस काल के शासकों का इस क्षेत्र में शासन रहा होगा।
    • सिंहभूम में रोमन सम्राटों के सिक्के पाए गए हैं।
    • चाईबासा में इंडो-सीथियन सिक्के प्राप्त हुए हैं।
    • राँची जिले में कुषाण काल के ईसा की प्रथम तथा द्वितीय शताब्दियों के सिक्के मिले हैं, तीसरी शताब्दी का भी एक पुरा-कुषाण सिक्का यहीं से प्राप्त हुआ है। इन सिक्कों पर किसी राजा का नाम नहीं है।

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