सिंहभूम का सिंह वंश

  • सिंहभूम का सिंहवंशी शासक काशीराम सिंह (महिपाल सिंह का उत्तराधिकारी)परवर्ती मुगल बादशाहों में प्रथम बहादुरशाह 1 (1707-12 ई.) का समकालीन था
  • काशीराम सिंह के बाद छत्रपति सिंह सिंहभूम का सिंहवंशी शासक बना।
  • छत्रपति सिंह के बाद अर्जुन सिंह-I सिंहभूम के सिंह वंश की राजगद्दी पर बैठा।
  • अर्जुन सिंह के बाद जगन्नाथ सिंह सिंहभूम का सिंहवंशी शासक बना। उसके दो पुत्र थे-पुरुषोत्तम सिंह व विक्रम सिंह।
  • जगन्नाथ सिंह के बाद पुरुषोत्तम सिंह सिंहभूम के सिंह वंश की राजगद्दी पर बैठा।
  • पुरुषोत्तम सिंह के बाद उसका पुत्र अर्जुन सिंह-II सिंहभूम के सिंह वंश का शासक बना।

सरायकेला राज्य की स्थापना :

  • चूँकि अर्जुन सिंह॥ का लालन-पालन उसके चाचा विक्रम सिंह ने किया था, इसलिए उसने अपने चाचा को एक जागीर दी जिसे ‘सिंहभूम पीर’ कहा जाता था तथा जिसमें 12 गाँव शामिल थे। विक्रम सिंह ने इस जागीर का विस्तार कर उसे एक राज्य का रूप दिया जिसकी राजधानी सरायकेला को बनाया। बाद में यह राज्य सरायकेला राज्य’ के नाम से जाना गया। विक्रम सिंह ने पाटकुम राजा से कांड और बंकसाई पीर छीन कर अपने राज्य को उत्तरी सीमा का विस्तार किया। इसी तरह उसने उत्तर-पूर्व में गमहरिया पीर और खरसवां पर अधिकार कर अपने राज्य का विस्तार किया। उसके वंशजों ने सरायकेला राज्य का और भी विस्तार किया। शीघ्र ही वे न केवल सिंहभूम के मूल राज्य-पोरहाट राज्य-से स्वतंत्र हो गए बल्कि शक्ति व समृद्धि में भी उससे आगे निकल गए।
  • पोरहाट के सिंहवंशी राजा अर्जुन सिंह II का उत्तराधिकारी अमर सिंह हुआ।
  • अमर सिंह के बाद जगन्नाथ सिंह IV पोरहाट राज्य की राजगद्दी पर बैठा। उसके समय में पोरहाट राज्य आंतरिक व बाहरी उपद्रवों से त्रस्त था। कोल व हो जनजातियों ने राज्य में उपद्रव्य मचा रखा था। हो आदिवासियों का उपद्रव इतना बढ़ गया था कि पोरहार नरेश को छोटानागपुर खास के नागवंशी शासक दर्पनाथ शाह की सहायता लेनी पड़ी। मगर दुस्साहसी हो आदिवासियों ने इस संयुक्त सेना को भी हरा दिया। अंग्रेजों के प्रवेश से ठीक पहले सिंहभूम बाहरी क्षेत्रों के उपद्रवियों का आश्रय-स्थल बन गया था। साथ ही कोल्हान क्षेत्र के लड़ाका कोल दूसरे राज्य के क्षेत्रों में जाकर लूट-मार मचाने लगे थे। उनसे ही त्रस्त होकर पोरहाट नरेश को अंग्रेजों की शरण में जाना पड़ा। पोरहाट नरेश जगन्नाथ सिंह-IV के शासन काल में अंग्रेज सर्वप्रथम 1787 ई. में सिंहभूम में प्रविष्ट हुए।

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