छोटानागपुर खास का नाग वंश

  • छोटानागपुर खास का नागवंशी शासक रामशाह (1690-1715 ई.) परवर्ती मुगल बादशाहों में प्रथम बहादुर शाह I (1707-12 ई.) का समकालीन था।
  • रामशाह के मरणोपरांत यदुनाथ शाह (1715-24 ई.) छोटानागपुर खास का नागवंशी शासक बना। वह परवर्ती मुगल बादशाह फर्रुखसियर (1713-19 ई.) का समकालीन था। उसके समय में पलामू के चेरो राजा रणजीत राय ने 1719 ई. टोरी परगना पर कब्जा कर लिया। टोरी परगना पर उसका अधिकार उसकी मृत्यु तक अर्थात् 1722 ई. तक बना रहा। सालाना कर वसूलने के लिए बिहार के मुगल सूबेदार सरबुलंद खां ने 1717 ई. में यदुनाथ शाह पर आक्रमण किया। यदुनाथ शाह ने 1 लाख रुपये नजराना देकर अपनी जान छुड़ाई। सरबुलंद खां के आक्रमण ने राज्य की राजधानी दोइसा की असुरक्षित स्थिति को स्पष्ट कर दिया। अतएव यदुनाथ शाह ने पालकोट को नई राजधानी बनाया।
  • यदुनाथ शाह के मरणोपरांत शिवनाथ शाह (1724-33 ई.) छोटानागपुर खास का नागवंशी शासक बना। उसके समय में 1790 ई. में बिहार के मुगल सूबेदार फखरुद्दौला ने शिवनाथ शाह से 12,000 रुपये नजराना वसूला।
  • शिवनाथ शाह के मरणोपरांत उदयनाच शाह(1730-40 ई.) छोटानागपुर खास का नागवंशी शासक बना। उसके समय में 1733 ई. में बने बिहार के नायब सूबेदार अलीवर्दी खाँ ने टेकारी के जमींदार सुन्दर सिंह तथा रामगढ़ के शासक विष्णु सिंह से सालाना कर का निर्धारण किया। रामगढ़ के शासक विष्णु सिंह ने जो कर देना स्वीकार किया, उसमें नागवंशी राज्य का भी कर शामिल था और उसी के माध्यम से नागवंशी राज्य के शासक को निर्धारित कर मुगल सूबेदार तक पहुँचाना था।
  • उदयनाथ शाह के मरणोपरांत श्यामसुन्दरनाथ शाह (1740-45 ई.) छोटानागपुर खास का नागवंशी राजा बना। उसके समय में ही मराटों ने नाग वंश पर सर्वप्रथम आक्रमण किया। मराठों के आक्रमण का सिलसिला 19वीं सदी के प्रथम दशक तक चलता रहा। 1742 ई. में मराठा भास्कर राव पंडित (भास्कर राव कोल्हात्कर) ने बंगाल पर आक्रमण करने के लिए छत्तीसगढ़ के रास्ते झारखण्ड में प्रविष्ट हुआ और वहाँ से बंगाल गया, पर बंगाल के शक्तिशाली नवाब अलीवर्दी खाँ द्वारा खदेड़ दिया गया। खदेड़े जाने पर मराठे उड़ीसा के रास्ते अपने प्रदेश में लौट गये। अगले वर्ष यानी 1743 ई. में मराठा रघुजी भर्भोसले, भास्कर राव पंडित के नक्शेकदम पर झारखण्ड से गुजरते हुए बंगाल पहुँचा। बंगाल के नवाब अलीवदी खाँ द्वारा शिकायत किए जाने पर मराठा पेशवा बालाजी राव बंगाल पहुँचा। पेशवा के आने की खबर पाकर रघुजी भोंसले झारखण्ड के मानभूम (आज का धनबाद) से होता हुआ अपने प्रदेश की ओर भाग खड़ा हुआ। मराठों के बार-बार झारखण्ड से होकर आने-जाने का क्षेत्रीय राजवंशों पर गहरा प्रभाव पड़ा। मराठा आक्रमणों के फलस्वरूप झारखण्ड में मुगल प्रभाव (मुस्लिम प्रभाव) का अंत हो गया और उसका स्थान मराठा प्रभाव ने ले लिया। 31 अगस्त, 1743 ई. को पेशवा बालाजी राव एवं रघुजी भोंसले के बीच एक संधि हुई। इस संधि के अनुसार दोनों के प्रभाव-क्षेत्रों का निर्धारण हुआ। झारखण्ड रघुजी भोंसले के प्रभाव क्षेत्र के अन्तर्गत पड़ा। भविष्य में छोटानागपुर खास, पलामू, मानभूम आदि मराठों के शोषण क्षेत्र बन कर रह गए।
  • छोटानागपुर खास के नागवंशी शासक मणिनाथ शाह ने बरवा, सिल्ली, बंड, राव व तमाड़ के स्थानीय जमींदारों का दमन किया।

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