पलामू का चेरो वंश

पलामू

चेरो वंश का शासक

साहेब राय (1697-1716 ई.)

रणजीत राय ( 1716-22 ई.)

जयकृष्ण राय (1722-70 ई.)

  • पलामू का चेरोवंशी शासक साहेब राय (1697-1716 ई.) परवर्ती मुगल बादशाहों बहादुरशाह । (1707-12), जहाँदार शाह (1712-13 ई.) व फर्रुखसियर (1713-19 ई.) का समकालीन था।
  • साहेब राय के मरणोपरांत रणजीत राय (1716-22 ई.) पलामू का चेरोवंशी शासक बना। उसके समय में बिहार का मुगल सूबेदार सरवुलंद खाँ पलामू आया। रणजीत राय ने छोटानागपुर खास के नागवंशी राजा से टोरी परगना छीन लिया और इस पर 1722 ई. तक कब्जा बनाये रखा।
  • रणजीत राय के एक संबंधी जयकृष्ण राय (1722-70 ई.) ने रणजीत राय को हराकर मार डाला और पलामू का राज्य हथिया लिया। उसके समय में बिहार के मुगल सूबेदार फखरुद्दौला ने 1730 ई. में 5,000 रुपये सालाना कर वसूला। 1733 ई. में बने बिहार के नायब सूबेदार अलीवर्दी खाँ ने अपने झारखण्ड अभियान के दौरान पलामू के चेरोवंशी शासक जयकृष्ण राय के लिए 5,000 रुपए सालाना कर निर्धारित किया और पलामू से कर वसूली का भार टेकारी के राजा सुन्दर सिंह को सौंपा। 1740 ई. में बिहार के मुगल सूबेदार जैनुद्दीन अहमद खाँ के सैन्य अधिकारी हिदायत अली खौं ने पलामू का सालाना कर 5,000 रुपये ही निर्धारित किया। हिदायत अली खाँ का आक्रमण बिहार के मुगल अधिकारियों द्वारा पलामू के चेरो के मामले में अंतिम हस्तक्षेप था।

इसके बाद मुगल प्रभाव के स्थान पर मराठा प्रभाव हावी हो गया। मराठा पेशवा 1743 ई. में जब छोटानागपुर खास के नागवंशी राज्य से होकर मिर्जापुर जा रहा था तब वह पलामू होकर गुजरा। इस बात का संकेत पलामू के कुछ गांवों के मराठा नाम मरहटिया, पेशका आदि से मिलता है।

  • 1750-65 ई. के दौरान पलामू में राजनीतिक सत्ता का ध्रुवीकरण हुआ। दक्षिणी पलामू चेरो राजवंशों के कब्जे में रहा, जबकि उत्तरी पलाम में राजपूत व मुस्लिम जमींदारों का प्रभाव बढ़ गया। चरोवंशी शासक जयकृष्ण राय का दरबार षड्यंत्रों का अखाड़ा बन गया था। इस तरह 1765 ई. में ईस्ट इंडिया कम्पनी को बंगाल, बिहार व उड़ीसा की दीवानी मिलने के समय पलामू राजनीतिक अराजकता से ग्रस्त था। पलामू पर कब्जा करने के इच्छुक किसी बाहरी शक्ति के लिए स्थिति सर्वथा अनुकूल थी। इस स्थिति का अंग्रेजों ने पूरा-पूरा फायदा उठाया।

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