झारखण्ड : गुप्त एवं गुप्तोत्तर काल

गुप्त काल :

कुषाणों के पतन के बाद प्रयाग व पाटलिपुत्र में शक्तिशाली गुप्तों का उदय हुआ। गुप्त वंश का सबसे महान शासक समुद्रगुप्त (355-80 ई.) था। समुद्रगुप्त के दरबारी कवि हरिषेण द्वारा रचित प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त को सामरिक विजयों का वर्णन मिलता है। इन विजयों में से एक आटविक विजय थी। बघेलखंड से उड़ीसा के समुद्र तट तक फैले आटविक प्रदेश में झारखण्ड क्षेत्र भी शामिल था। समुद्रगुप्त ने आटविक प्रदेश के शासक को पराजित किया और उसके साथ ‘परिचारकीकृत’ नीति (भृत्य/ परिचारक बनाने की नीति) का पालन किया। इससे स्पष्ट होता है कि समुद्रगुप्त के शासनकाल में झारखण्ड क्षेत्र उसके अधीन था।

समुद्रगुप्त के प्रयाग प्रशस्ति में छोटानागपुर को ‘मुरुंड देश’ कहा गया है। गुप्त वंश के प्रसिद्ध शासक चन्द्रगुप्त-II विक्रमादित्य (380-412 ई.) का शासन उज्जैन से लेकर अंगाल तक विस्तृत था और इसमें झारखण्ड भी शामिल था, जिसे चन्द्रगुप्त-II विक्रमादित्य के राज्यकाल में भारत आये चीनी यात्री फाहियान ने ‘कुक्कुटलाड’ कहा है।

गुप्तकालीन पुरातात्त्विक अवशेषों में उल्लेखनीय हैं-महुदी पहाड़ (हज़ारीबाग जिला) पर पत्थरों को काटकर बनाये गये चार मंदिर, सतगाँव नामक गाँव (हज़ारीबाग जिला) के आस-पास के मंदिर, पिठोरिया (सूची से उत्तर की ओर स्थित) के एक पहाड़ी पर स्थित एक कुआँ आदि।

गुप्तोत्तर काल :

गुप्तोत्तर काल (550-650 ई.) में गौड़ (पश्चिम बंगाल) का शासक शशांक (602-25 ई.) एक प्रतापी शासक था। उसके साम्राज्य में मिदनापुर (प. बंगाल) से लेकर सरगुजा (छत्तीसगढ़) तक का वन-प्रांत शामिल था। कनिंघम ने बड़ा बाजार तथा हेविट ने दुलमी को उसकी राजधानी बताया है। शशांक एक कद्दर शैवोपासक था। जब शशांक का बंगाल, बिहार एवं उड़ीसा पर प्रभुत्व स्थापित हो गया, तो उसने बौद्धों का उत्पीड़न शुरू कर दिया। ड्रा

पश्चिम की ओर से हर्षवर्द्धन तथा पूर्व की ओर से भास्करवर्मन द्वारा दबाये जाने पर उसने अपनी राजधानी पौंड्रवर्धन खाली कर दिया और दक्षिण बिहार के पहाड़ी क्षेत्र में चला गया। अब उसकी शक्ति का केन्द्र वारुणिका बनी, जिसे इन दिनों बारुण अथवा सोन ईस्ट बैंक कहा जाता है। शैव धर्मावलम्बी शशांक की मूर्ति-भंजक उग्रता इतनी बड़ी कि उसने झारखण्ड के सभी बौद्ध केन्द्रों को नष्ट कर दिया। इस तरह, उसके प्रयासों से झारखण्ड में बौद्ध जैन धर्मों की जगह हिन्दू धर्म की प्रधानता स्थापित हो गई। 10वीं सदी ई. तक झारखण्ड में हिन्दू धर्म का प्रभुत्व पूर्ण रूप से स्थापित हो गया। दुलमी, तेलकुप्पी, पकबीरा आदि स्थलों पर ब्राह्मणों द्वारा निर्मित मंदिरों के अवशेषों से इसकी पुष्टि होती है। इन मंदिरों में अधिकांश मंदिर शैवों के हैं।

पुष्यभूति वंश (वर्द्धन वंश) के सबसे शक्तिशाली शासक हर्षवर्धन (606-47 ई.) के विस्तृत साम्राज्य में कार्जागल (राजमहल) का छोटा राज्य भी शामिल था। काजांगल में ही हर्षवर्द्धन चीनी यात्री हुएनत्सांग से पहली बार मिला और उससे बहुत प्रभावित हुआ। बाद में उन दोनों का साथ बरसों रहा।

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