झारखण्ड में अग्रेजों के प्रवेश का कारण

झारखण्ड में अंग्रेजों का प्रवेश

झारखण्ड क्षेत्र में अंग्रेजों का प्रवेश सर्वप्रथम सिंहभूम की ओर से हुआ। 1780 ई. में ही ईस्ट इंडिया कंपनी का मिदनापुर पर कब्जा हो चुका था। उसी समय से अंग्रेज सिंहभूम सहित बंगाल के सीमा से लगे झारखण्ड के क्षेत्रों में अपनी शक्ति तथा प्रभाव के विस्तार की बात सोचने लगे थे। उस समय सिंहभूम के प्रमुख राज्यों में डालभूम (ढाल राजाओं का), पोरहाट (सिंह राजाओं का) तथा कोल्हान (हो लोगों का) आदि उल्लेखनीय हैं। बार-बार मराठों के आक्रमण के कारण इन राज्यों को पहले बंगाल, पुन: बिहार तथा बाद में अंग्रेजों के प्रभाव से मुक्ति मिल गई थी। किन्तु मार्च, 1766 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी सरकार ने तय किया कि यदि सिंहभूम के राजागण कंपनी की अधीनता स्वीकार करके नियमित रूप से वार्षिक कर की अदायगी को तैयार हो जाते हैं, तो उनके विरुद्ध बल प्रयोग नहीं किया जायेगा। यदि ऐसा वे नहीं करते हैं, तो उनके खिलाफ बल प्रयोग किया जायेगा। सिंहभम के राजाओं द्वारा कंपनी की बातों को मानने से इंकार करने के कारण जनवरी, 1767 में फायूंसन को सिंहभूम पर आक्रमण करने का जिम्मा सौंपा गया।

झारखण्ड में अग्रेजों के प्रवेश का कारण

ईस्ट इंडिया कंपनी को मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय से अगस्त, 1765 ई. में बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी (राजस्व प्रशासन) का अधिकार प्राप्त होने से ठीक पहले कंपनी को बिहार के मैदानी इलाकों तथा संथाल परगना के पहाड़ी क्षेत्र से होकर गुजरने वाले व्यापार को मीर कासिम तथा मराठों के विरोध का सामना करना पड़ा था। अतः कंपनी छोटानागपुर से बनारस तक एक नया व्यापारिक मार्ग खोलकर वहाँ के राजाओं को अपना सहायक बनाना चाहती थी, ताकि बंगाल के समान ही उसकी इस क्षेत्र में भी आर्थिक स्वार्थ सिद्धि हो सके। उस काल में छोटानागपुर का पहाड़ी क्षेत्र विद्रोही जमींदारों का सुरक्षित आश्रय स्थल था। जब कभी भी बकाया कर की वसूली के लिए उन पर दबाव डाला जाता था, वे भागकर छोटानागपुर चले जाते थे और इस तरह कंपनी के राजस्व अधिकारियों की अवज्ञा करने में वे सफल होते थे। कंपनी अधिकारियों के शब्दों में ‘यहाँ के जमींदार अत्यंत उपद्रवी थे।’ जब कभी भी उनके खिलाफ सैन्य कार्रवाई की जाती, वे छोटानागपुर की पहाड़ियों में शरण ले लेते थे। अत: इस स्थिति से निपटने का एकमात्र तरीका यही था कि उखेटानागपुर के पहाड़ी मार्गों का प्रहरी कहलाने वाला ‘पलामू किला’ कंपनी के नियंत्रण में हो जाए। इस क्षेत्र पर कंपनी को अपना कब्जा जमाना इसलिए भी आवश्यक हो गया था, क्योंकि बिहार में कंपनी राज्य की पश्चिमी सीमा को मराठा आक्रमणकारियों का खतरा उत्पन्न हो गया था। उस समय के बिहार के नायब दीवान राजा सिताब राय का भी निश्चित मत था कि नागपुर के मराठों को रोकने के लिए छोटानागपुर के पलामू किला पर कब्जा करना जरूरी था, क्योंकि मराठे उसी रास्ते से आते थे। सिताब राय के अनुसार यदि पलामू किला कंपनी के अधिकार में आ जाता, तो मराठों के विरुद्ध उसका उपयोग एक फौजी चौकी के रूप में किया जा सकता था। मिदनापुर स्थित ब्रिटिश अधिकारियों का विचार भी कुछ इसी प्रकार था। बंगाल स्थित कंपनी के राज्य को ज्यादा खतरा दक्षिण-पश्चिमी सीमा के तरफ से था, क्योंकि इधर से ही मराठों और पहाड़ी राजाओं के आक्रमण का भय था और यह सीमा छोटानागपुर क्षेत्र के समीप थी। अत: छोटानागपुर में कंपनी के प्रवेश का मुख्य कारण था छोटानागपुर तथा दक्षिण-पश्चिमी बंगाल की सीमा को मराठा आक्रमणों से सुरक्षा प्रदान करने की जरूरत। यह सुरक्षा तभी प्राप्त की जा सकती थी, जब खेटानागपुर के पहाड़ी मागों तथा प्रमुख किलों पर कंपनी सरकार का अधिकार हो जाए।

झारखण्ड क्षेत्र में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह छोटानागपुर में अंग्रेजों का प्रवेश यद्यपि 1767 ई. में प्रारंभ हुआ। लेकिन इस प्रक्रिया को पूरा होने में सात दशक लग गए। इस तरह 1837 ई. तक सिंहभूम के कोल्हन क्षेत्र पर कंपनी सरकार की सत्ता निश्चित रूप से स्थापित हो गई। किन्तु खेटानागपुर-खास, पलामू, हजारीबाग तथा मानभूम में भी जहां अंग्रेजी सत्ता की स्थापना जल्दी ही हो गई थी, वहां स्थिति सामान्य नहीं थी। शुरू से ही वहाँ कभी व्यापक तो कभी छिट-पुट रूप से कंपनी शासन के विरुद्ध गड़बड़ी होती रही। वस्तुतः सम्पूर्ण छोटानागपुर में अभी भी अंग्रेजों को निकाल बाहर करने की एक क्षीण आशा बनी हुई थी। यहाँ कंपनी शासन के विरुद्ध असंतोष के कई कारण थे।

कुछ आर्थिक पहलू से सम्बन्धित थे, तो कुछ प्रशासकीय और मनोवैज्ञानिक –  प्रमुख कारण निम्नलिखित थे

(i) मराठा आक्रमणों, विभिन्न राजाओं एवं जमींदारों द्वारा फैलाई गई गड़बड़ियों और बार-बार फौजों के आने-जाने से छोटानागपुर के अधिकांश भाग उजाड़ पड़ गए थे। आर्थिक कठिनाई एवं अन्न के अभाव ने जनता को विद्रोह के लिए प्रेरित किया। जनता के अतिरिक्त कुछ राजा-महाराजा और जमींदार भी, जैसे पलामू के गोपाल राय और दालभूम के जगन्नाथ बाल बार-बार की गड़बड़ियों के कारण दरिद्र हो गए थे। कंपनी की निरंतर बढ़ने वाली मांग के कारण इनकी आर्थिक कठिनाई बढ़ गई थी। इनके अधीनस्थ जागीरदार तथा बड़े किसान इनकी कमजोरी का लाभ उठाकर प्राय: स्वतंत्र हो गए थे और मालगुजारी देना बंद कर दिया था। बार-बार पड़ने वाले अकाल के कारण लोगों की अवस्था बेहद दयनीय हो गई थी। सन् 1770 ई.-1777 ई. और 1800 ई. के अकाल के कारण छोटानागपुर का क्षेत्र उजाड़-सा हो गया। रोजी-रोटी के लिए लोगों का अन्य प्रदेशों में पलायन हुआ और जो कहीं जा न सके, कम्पनी सरकार के विरुद्ध हथियार उखाने को बाध्य हुए। ___कंपनी शासन की स्थापना के बाद छोटानागपुर के राजाओं और जमींदारों के बीच राज्यों तथा जींदारी की सीमाओं को लेकर अनेक विवाद उठ खड़े हुए तथा इन विवादों से निपटने में अंग्रेज अधिकारी पूरी तरह असफल रहे। फलतः गड़बड़ी फैली। कंपनी राजाओं तथा जमींदारों की उपेक्षा कर सीधे किसानों से बंदोबस्त कर रही थी। बकाया मालगुजारी के नाम पर किसानों की जमीन और जमींदारों की जमींदारी छौनी जा रही थी। वस्तुतः कंपनी सरकार और छोटानागपुर के राजाओं-जमींदारों और जागीरदारों के बीच मालबंदी और वसूली के अनवरत झगड़े चलते रहे। राजस्व वसूली के लिए बार-बार सैन्य शक्ति का उपयोग लोगों के लिए असहनीय हो गया। स्थिति तब विस्फोटक हो उनी, जब बकाया राशि (मालगुजारी) के लिए ऐतिहासिक राज्यों की नीलामी बोली जाने लगी।

(ii) आदिवासियों के बीच व्यापक असंतोष पनपने के कुछ प्रशासकीय कारण भी थे। सरकारी पदाधिकारी अधिकांश गैर-छोयनागपरी थे तथा इन तक पहुंचना साधारण आदमी के लिए कठिन था। साथ ही सरकारी कचहरी की न्याय-प्रक्रिया बेहद धीमी एवं प्रभावहीन थी। प्रभावशाली वर्ग के लोग प्रायः कचहरी में उपस्थित ही नहीं होते थे, बल्कि अपने विरुद्ध हुए फैसलों को लागू ही नहीं होने देते थे। सरकारी आदेश को मनवाने के लिए प्रायः फौज आती थी, इससे सामान्य जनमानस में सरकार के विरुद्ध घृणा का भाव पैदा होता था। सरकार ने छोटानागपुर में पुलिस-प्रशासन अपने हाथ में ले लिया, किंतु विभाग पर होने वाला खर्च स्थानीय राजाओं तथा जमींदारों को उठाना पड़ता था।

पुलिस-प्रशासन पर यह द्वैध-नियंत्रण राजाओं-जमींदारों के लिए अरुचिकर था और इससे वे काफी असंतुष्ट थे। पुलिस-प्रशासन की यह व्यवस्था आदिवासियों में भी अलोकप्रिय थी और इससे उनके बीच व्याप्त असंतोष घटने की जगह बढ़ते ही जा रहे थे। जैसा कि पहले उल्लेख किया जा चुका है कि बकाया मालगुजारी के नीलामी की सरकारी नीति के कारण राजा-जमीदार वर्ग पहले से ही बेहद गुस्से में था। फलस्वरूप विद्रोह की एक सहज-स्वाभाविक भावना छोटानागपुर के जमींदारों-जागीरदारों में व्याप्त थी। वस्तुत: दीवानी और फौजदारी दोनों तरह के मामलों में पदाधिकारी कानून की भावना से अधिक कानून के शब्द पर जोर देते थे। समग्र रूप में छोटानागपुर में कंपनी की शासन-व्यवस्था का दोष यह था कि एक विशाल भू-क्षेत्र पर यहाँ की स्थिति के विषय में बहुत कम जानकारी रखने वाला अधिकारी एक जटिल कानूनी व्यवस्था को थोपने की कोशिश कर रहा था। आदिवासी समाज इसलिए भी नाराज था कि सरकारी कर्मचारी गैर-छोटानागपुरी थे तथा इसमें से अधिक अंगाल और बिहार के निवासी थे। फलस्वरूप कंपनी-शासन के आरंभ से ही छोटानागपुर में असंतोष के स्पष्ट लक्षण नजर आ रहे थे। इस तरह कंपनी के शासन के प्रथम 50 वर्षों में अनेक छोटे-बड़े विद्रोह हुए, लेकिन सबसे बड़ा विद्रोह 1831-32 ई. में कोलों का विद्रोह था।

(iii) कंपनी शासन के विरुद्ध जनजातीय विद्रोह का एक मनोवैज्ञानिक पहलू भी था। पुरातन काल से ही जनजातीय समुदाय का बाहरी संस्कृति से कभी विरोधात्मक तो कभी सहयोगात्मक सम्पर्क रहा था। उत्तर भारत से आयाँ द्वारा निष्कासित होने के बाद लम्बे अवधि तक दोनों के बीच स्नेह और घृणा का सम्बन्ध रहा, लेकिन आगे चलकर दोनों में सामंजस्य स्थापित हो चुका था। अंग्रेजों के आगमन से उनका संपर्क एक आक्रामक संस्कृति से हुआ। फलतः उनकी पहचान, संस्कृति तथा स्वतंत्रता के लिए एक नया खतरा उत्पन्न हो गया था जिसकी सहज, स्वाभाविक और विरोधात्मक प्रतिक्रिया विद्रोह के रूप में हुई। औपनिवेशिक शासन व्यवस्था जनजातियों के लिए त्रासदी सिद्ध हुई। आनुपातिक एकात्मकता, भूमि-स्वामित्व और सामाजिक संरचना की तुलनात्मक अक्षुण्णता के कारण किसानों सहित किसी भी अन्य वर्ग की तुलना में उनके अधिक व्यापक और हिंसक विद्रोह हुए। इन विद्रोहों को साधारणत: आकस्मिक घटनाओं की संज्ञा दी गई। वस्तुतः ये विद्रोह न होकर आंदोलन थे, जिनका जनजातीय सामाजिक संरचना से सीधा सम्बन्ध था।

अंग्रेजों के लिए निजी संपत्ति एक प्राकृतिक एवं अपरिहार्य अधिकार था। यह प्रकृति के नियम के अनुकूल था, किंतु आदिवासी समुदाय के लिए प्रकृति ही कानून थी। पेड़ों और नदी नालों की तरह भूमि भी उनके लिए प्रकृति को देन थी। उन्हें भूमि के उपयोग का उसी तरह अधिकार था, जैसे हवा में सांस लेने का। जनजातीय अर्थव्यवस्था अभी वस्तु-विनिमय पर आधारित थी तथा मुद्रा प्रसार अभी सीमित था। स्वभाव से सरल आदिवासी समुदाय अपनी तत्काल आवश्यकताओं से आगे की नहीं सोचता था। लेकिन भूमि के स्थायी बंदोबस्त व्यवस्था में आदिवासी कृषक, जमींदारों को दया का पात्र होकर रह गया। जमींदार उन्हें गैर-कानूनी कर देने तथा बेगार के लिए बाध्य करते थे।

(iv) कंपनी शासन में स्थायी बंदोबस्त से आदिवासी समुदाय का जंगल से सम्बन्ध भी बदल गया था। आदिवासी भोजन, जलावन और चारे के लिए जंगल पर निर्भर रहे थे। कृषि योग्य भूमि के कम पड़ जाने पर वे झूम-कृषि के लिए जंगल की भूमि का उपयोग करते थे। स्थायी बंदोबस्त से जंगल की भूमि तथा उत्पादन के अतिरिक्त गाँव की गैरमजरूआ जमीन पर भी प्रतिबंध लग गया। इससे कृषि योग्य भूमि का विस्तार भी रुक गया। इसी समय गाँव के महाजन तथा साहूकार की जड़ें भी मजबूत होने लगी। नई व्यवस्था मुद्रा-निवेश, पूंजी-संचय तथा उत्पादन के साधनों के स्वामित्व पर आधारित थी। आदिवासी किसान नई व्यवस्था की बारीकियों को नहीं समझ पा रहा था। आदिवासियों ने किसी बाहरी सत्ता को कभी स्वीकार ही नहीं किया था। स्थानीय राजागण उनकी अपनी उपज थे तथा उनके शासन में न तो कोई संघर्ष था और न कोई विरोधाभास। वे यह नहीं समझ सके कि अंग्रेज आखिर कहां से उनके बीच आ गए एवं उनकी सत्ता का आधार क्या था। ठीक उसी तरह जर्मीदारों द्वारा उनकी जमीन तथा अधिकारों के अपहरण का कोई औचित्य भी उन्हें नहीं दिखाई दे रहा था। अत: उनके विद्रोहों का उद्देश्य इन अतिक्रमणकारियों को अपने क्षेत्र से निकाल बाहर करना था।

(v) औपनिवेशिक शासन, साहूकार और जमींदार के गठजोड़ ने आदिवासियों की पहचान को कहीं कम तो कहीं अधिक नष्ट कर दिया था। वस्तुतः जातिगत निकटता की भावना का इन विद्रोहों से घनिष्ठ संबंध था। विद्रोही अपने को पृथक योद्धा वर्ग न मानकर एक संघर्षशील जनजातीय समूह मानते थे। समूह स्तर पर उच्च स्तरीय एकता दृष्टिगत होती थी। आदिवासी स्वजनों पर तभी हमले होते थे, जब वे शत्रु से मिले हुए जान पड़ते थे। सभी बाहरी लोगों पर भी शत्रु मान कर हमले नहीं होते थे। गाँव की अर्थव्यवस्था में सहयोग करने वाले गैर-आदिवासी वर्गों पर हमले नहीं होते थे।

अनेक अवसरों पर गैर-आदिवासी गरीब ग्रामीण भी विद्रोहियों का साथ देते थे और रसद आदि से सहायता करते थे। एक बात गौर करने लायक है कि विद्रोह का आह्वान दिक्कुओं, पुलिस तथा राजस्व अधिकारियों और जमींदारों के खिलाफ होता था। यह अलग बात है कि आदिवासी समुदाय अपने आक्रोश को व्यक्त करने के क्रम में औपनिवेशिक शासन तथा दिक्कू अतिक्रमण के स्वरूप, संगठन और वर्ग संरचना को ठीक-ठीक से न समझ सकने के कारण दिक्कू मित्रों और शत्रुओं की सही पहचान नहीं कर पाता था।