झारखंड के विभूति / महत्वपूर्ण व्यक्ति

डॉ. जयपाल सिंह :

-इन्हें झारखण्ड पृथक राज्य आंदोलन का पितामह कहा जाता है। राँची में जन्मे हॉकी के प्रसिद्ध खिलाड़ी व आदिवासी नेता डॉ. जयपाल सिंह ने 1928 में एमस्टर्डम में आयोजित ओलंपिक खेलों में भारतीय हॉकी टीम का नेतृत्व किया, जिसमें भारत ने स्वर्ण पदक प्राप्त किया था। इन्होंने 1936 में झारखण्ड पार्टी का गठन किया। ये 1952 के प्रथम लोकसभा चुनाव में निर्वाचित भी हुए थे।

सखाराम गणेश देवस्कर :

-इनका जन्म देवघर जिले के ‘कैरो’ ग्राम में हुआ था। साहित्यकार के रूप में श्री देवस्कर ने क्रांति साहित्य साधना के द्वारा अपने नाम का परचम लहरा दिया। उनकी पुस्तक ‘देशेर कथा’ (बांग्ला में) को ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया था, फिर भी वह पाँच बार प्रकाशित हुई। श्री देवस्कर की ‘देशेर कथा’ का प्रभाव युवा क्रांतिकारियों पर निर्णायक रहा। उनकी अन्य लिखित प्रमुख पुस्तक है-तिलकेर मुकदमा। इसके अतिरिक्त उन्होंने लगभग 25 पुस्तकें, एक हजार के लगभग निबंध लेखन के साथ दैनिक हितवाद का सम्पादन भी किया।

टिकैत उमराव सिंह :

-1857 के सैनिक विद्रोह में हिस्सा लेने वाले उमराव सिंह का जन्म ओरमांझी प्रखंड के खटंगा पातर गाँव में हुआ था। अंग्रेजों ने उन्हें ओरमांझी से राँची लाकर मोराबादी में टैगोर हिल के पास 8 जनवरी, 1858 को फाँसी दी।

शेख भिखारी :

-इस अमर शहीद का जन्म 1819 में राँची के बुड़मू थाना में हुआ था। इन्होंने 1857 के सैनिक विद्रोह में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। 8 जनवरी, 1858 को इन्हें फाँसी दे दी गई। इनके सम्मान में एक स्मारक का निर्माण भी किया गया है।

अल्बर्ट एक्का :

-भारतीय थल सेना के ब्रिगेड ऑफ गार्ड्स के लांस नायक अल्बर्ट एक्का ने वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध में शत्रुओं के हमले को विफल करके मातृभूमि की रक्षा की एवं शहीद हो गए। उन्हें मरणोपरांत भारत सरकार द्वारा सर्वोच्च सैन्य सम्मान ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया गया। वे झारखण्ड प्रदेश के एकमात्र सैनिक हैं, जिन्हें इस सम्मान से सम्मानित किया गया है। झारखण्ड प्रदेश की राजधानी राँची के फिरायालाल चौक पर अल्बर्ट एक्का की आदमकद प्रतिमा स्थापित है।

बिरसा मुंडा :

-‘मरांग गोमके’ के नाम से विख्यात बिरसा मुंडा को लोग भगवान बिरसा कहकर पुकारते हैं। भगवान बिरसा ने महान उल्गुलान विद्रोह (1895-1900) का नेतृत्व किया। इनके पिता का नाम सुगना मुंडा था, लेकिन ईसाई धर्म अपनाने पर इनका नाम मसीह दास हो गया। बिरसा का जन्म 15 नवम्बर, 1875 में उलिहातू गाँव में हुआ था तथा इनकी मौत खूटी जेल में हैजे के कारण हुई।

भगीरथ मांझी :

-भगीरथ मांझी का जन्म गोड़ा जिले के तलडीहा गाँव में हुआ था। वे खरवार जनजाति के थे। उन्होंने 1874 ई. में एक आंदोलन आरंभ किया, जिसे ‘खरवार आंदोलन’ कहा जाता है। यह आंदोलन आरंभ में एकेश्वरवाद एवं सामाजिक सुधार की शिक्षा देता था, लेकिन अपने दमन के ठीक पूर्व इसने राजस्व-बंदोबस्ती की गतिविधियों के विरुद्ध एक अभियान का रूप धारण किया। मांझी ने घोषणा की कि उन्हें सिंगबोंगा का दर्शन हुआ है और सिंगबोंगा ने उन्हें बौंसी गाँव का राजा नियुक्त किया है। इसलिए उन्होंने स्वयं को राजा घोषित किया और ब्रिटिश सरकार, जमींदार को कर नहीं देने की घोषणा की। उन्होंने लोगों पर लगान तय किए और उन्हें रसीद दिये तथा लगान की वसूली करना शुरू कर दिया। उनकी इस हरकत के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। नवम्बर, 1877 ई. में उन्हें रिहा कर दिया गया। 1879 ई. में उनकी मृत्यु हो गई। लोग उन्हें श्रद्धावश ‘बाबाजी’ कहते थे।

पाण्डेय गणपत राय :

-पाण्डेय गणपत राय का जन्म लोहरदगा जिले के भंडरा प्रखण्ड के भौंरो गाँव में 17 जनवरी, 1809 ई. को हुआ। हजारीबाग के विद्रोही सैनिकों ने पाण्डेय गणपत राय के मार्फत नागवंशी ठाकुर विश्वनाथ शाही से संपर्क साधा था। पाण्डेय गणपत राय नागवंशी महाराजा का क्रमशः मुहर्रिर व दीवान रह चुका था, इसीलिए उसे इस काम के लिए चुना गया था। विद्रोह में उन्होंने सेनापति की भूमिका निभाई। डोरण्डा, राँची, चतरा में विद्रोह की कमान संभाली। राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान उन्होंने बरवा थाने को जला दिया था। चतरा की लड़ाई (2 अक्टूबर, 1857 ई.) में जब अंग्रेज भारी पड़ने लगे तो वे भाग खड़े हुए। इसके बाद उन्होंने लोहरदगा के जंगलों में छिपकर सरकार के विरुद्ध छापामार युद्ध जारी रखा। बाद में वे पकड़े गए और उन्हें 21 अप्रैल, 1858 ई. को राँची में कमिश्नर कम्पाउंड से उत्तर की ओर एक पेड़ से लटकाकर फाँसी दे दी गई।

ठाकुर विश्वनाथ शाही :

-ठाकुर विश्वनाथ शाही का जन्म 12 अगस्त, 1817 ई. को बड़कागढ़ की राजधानी सतरंजी में हुआ था। इनके पिता का नाम रघुनाथ शाही एवं माता का नाम वाणेश्वरी कुंवर था। हजारीबाग के विद्रोही सैनिकों ने जब बड़कागढ़ के नागवंशी ठाकुर विश्वनाथ शाही से नेतृत्व करने को कहा तो ठाकुर विश्वनाथ शाही ने आरंभ में आना-कानी की, लेकिन बल प्रयोग की धमकी के बाद वे झुक गये और नेतृत्व करना स्वीकार कर लिया। विद्रोह में उन्होंने प्रधान नेता की भूमिका निभाई। डोरण्डा, राँची, चतरा में विद्रोह का नेतृत्व किया। चतरा की लड़ाई (2 अक्टूबर, 1857) में जब अंग्रेज भारी पड़ने लगे तो वे भाग खड़े हुए। इसके बाद लोहरदगा के जंगलों में छिपकर सरकार के विरुद्ध छापामार युद्ध जारी रखा। बाद में विश्वनाथ दुबे एवं महेश नारायण शाही की गद्दारी से वे पकड़े गए। उन्हें 16 अप्रैल, 1858 ई. को राँची में कमिश्नर कम्पाउंड से उत्तर की ओर एक पेड़ से लटकाकर फाँसी दे दी गई।

राजा नीलमणि सिंह :

-1857 के विद्रोह के समय वे पंचेत के राजा थे। उन्होंने अंग्रेज विरोधी रुख अपनाया। उन्होंने अपने इलाके के संथालों को विद्रोह करने के लिए भड़काया। उनके सरकार विरोधी रवैये के कारण कैप्टेन माउन्ट गोमेरी ने नवम्बर, 1857 ई. में उन्हें गिरफ्तार कर कलकत्ता स्थित अलीपुर जेल भेज दिया।

राजा अर्जुन सिंह :

-1857 के विद्रोह के समय वे पोरहाट के राजा थे। उन्होंने चाईबासा के विद्रोही सैनिकों को अपने यहाँ शरण दी। कैप्टेन आर. सी. बर्च ने पोरहाट नरेश अर्जुन सिंह को विद्रोही सैनिकों से प्राप्त बंदूकों एवं सरकारी खजाने के साथ चाईबासा पहुँच कर आत्म-समर्पण करने को कहा। ऐसा नहीं करने पर उन्हें फाँसी पर लटका देने की धमकी दी, लेकिन अर्जुन सिंह ने 17 सितम्बर, 1857 ई. को चाईबासा में डुगडुगी पिटवाकर अपने आप को ‘सिंहभूम का राजा’ घोषित कर दिया। इस पर बर्च ने अर्जुन सिंह की गिरफ्तारी के लिए 1000 रुपये के इनाम की घोषणा की और उसके राज्य को जब्त किये जाने की घोषणा की। राज्य से वंचित होने के भय से अर्जुन सिंह ने राँची के कमिश्नर डाल्टन के समक्ष आत्म-समर्पण करना स्वीकार कर लिया, लेकिन उनके साथ धोखा हुआ। राँची पहुँचने पर उनके साथ आये विद्रोही सैनिकों को आनन-फानन में कोर्ट मार्शल कर फाँसी पर लटका दिया गया। इन फांसियों ने अर्जुन सिंह को फिर से बागी बना दिया। उन्होंने अंग्रेज विरोधी अभियान छेड़ दिया। उनका यह अभियान नवम्बर, 1857 से फरवरी, 1859 तक चला। अंतत: विरोध को निष्फल होता देख 15 फरवरी, 1859 ई. को उन्होंने राँची के कमिश्नर डाल्टन के समक्ष आत्म-समर्पण कर दिया। बंदी बनाकर उन्हें वाराणसी भेज दिया गया। बाद में राज्य वापस किया गया, तब भी अर्जुन सिंह ने सिंहभूम न लौटकर वाराणसी में ही मृत्यु का वरण करना श्रेयस्कर समझा।

नीलाम्बर-पीताम्बर :

-1857 के विद्रोह के दौरान पलामू में विद्रोह का नेतृत्व भोगता बंधुओं (नीलाम्बर शाही व पीताम्बर शाही) ने किया। नीलाम्बर-पीताम्बर ने शाहपुर, चैनपुर गढ़, लेस्लीगंज, रंकागढ़, पलामू किला आदि में विद्रोही गतिविधियों को अंजाम दिया। भोगता बंधुओं ने पलामू के बाहर से सहायता प्राप्त करने की कोशिश की, विशेषतः शाहाबाद (बिहार) के विद्रोहियों से। अंग्रेजी सेना नीलाम्बर-पीताम्बर को पकड़ने के लिए पुरजोर कोशिश करती रही, पर वे बार-बार अंग्रेजी सेना को चकमा देने में कामयाब होते रहे। आखिरकार जब भोगता बंधु अपने पारिवारिक सदस्यों के साथ एक गुप्त स्थान पर भोजन कर रहे थे तो जासूसों ने खबर कर दी। उन्हें पकड़ लिया गया और संक्षिप्त मुकदमे के बाद उन्हें अप्रैल 1859 को लेस्लीगंज में फाँसी दे दी गई।

फादर कामिल बुल्के :

-इस महान हिन्दी प्रेमी तथा प्रकांड विद्वान का जन्म यद्यपि बेल्जियम में 1 सितंबर, 1909 को हुआ, परंतु भारत आकर वे झारखण्ड के निवासी होकर रह गए। भारत आकर इन्होंने हिन्दी तथा संस्कृत का गहन अध्ययन किया और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से ‘रामकथा : उत्पत्ति एवं विकास’ विषय पर हिन्दी में शोध प्रबंध प्रस्तुत करके डी. फिल (D. Phil.) की उपाधि प्राप्त की। डॉ. बुल्के की यह गौरवशाली उपलब्धि सम्पूर्ण भारत में पहली थी, क्योंकि इससे पूर्व हिन्दी विषयों के सभी शोध प्रबंध अंग्रेजी माध्यम से किए जाते थे। डॉ. बुल्के को राँची स्थित सेंट जेवियर कॉलेज के हिन्दी विभाग में भी नियुक्त किया गया था। उनकी महानतम उपलब्धियों में से एक अंग्रेजी हिन्दी शब्दकोश की रचना है।

हरेन ठाकुर :

-वे राँची के एक मशहूर चित्रकार हैं। इन्होंने अपनी चित्रकला की बदौलत छोटानागपुर शैली को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। इन्हें कोलकाता की ‘ऑल इंडिया फाइन आर्ट्स अकादमी’, विश्वभारती, कोलकाता के ‘इंफॉर्मेशन सेंटर’, प्रवासी बांग्ला क्लब और कनाडा एवं न्यूयॉर्क की कला संस्थाओं ने सम्मानित किया है।

जात्रा भगत :

-गाँधीजी के आंदोलन के तरीकों से प्रभावित झारखण्ड क्षेत्र का पहला आंदोलन 1913-14 में हुआ। इस आंदोलन को ‘ताना भगत आंदोलन’ के नाम से जाना जाता है। इसका नेतृत्व जात्रा भगत ने किया था।

गंगा नारायण :

-वीरभूम और सिंहभूम के क्षेत्रों में भूमिज विद्रोह (1831-33) का नेतृत्व गंगा नारायण ने किया था। इन्हें पकड़ने के लिए ब्रिटिश सरकार को 5000 रु. के इनाम की घोषणा करनी पड़ी थी।

जमशेदजी टाटा :

-प्रमुख भारतीय उद्योगपति, जिन्होंने 1907 में साकची नामक स्थान पर टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी (TISCO) की स्थापना की। डॉ. गाब्रियल हेम्ब्रम-डॉ. हेम्ब्रम गुमला जिले के ‘हाटिंग होड़े’ गाँव के रहने वाले जड़ी-बूटी के विशेषज्ञ हैं। वे अपने पूर्वजों से विद्या और प्रेरणा लेकर तथा जड़ी-बूटी की महत्ता जानकर अनेक बीमारियों का इलाज कर रहे हैं। वे कैंसर जैसी लाइलाज बीमारी का भी इलाज करते हैं। डॉ. हेम्ब्रम के पास देश के कोने-कोने से लोग इलाज के लिए आते हैं। साथ ही विदेशों से भी लोग इनके पास आते हैं। कई लोग इनकी दवा से लाभ पा चुके हैं।

बुद्ध भगत :

-राँची जिले के सिलांगाई गाँव में जन्में इस क्रांतिकारी ने 1828-32 तक हुए ‘लरका महाविद्रोह’ का नेतृत्व किया। वे छोटानागपुर के प्रथम क्रांतिकारी थे, जिन्हें पकड़ने के लिए ब्रिटिश सरकार ने 1000 रु. इनाम की राशि की घोषणा की थी। अंततः अंग्रेजों से मुकाबला करते हुए वे मातृभूमि की बलिवेदी पर शहीद हुए।

रघुनाथ महतो :

-सरायकेला-खरसावां के नीमडीह प्रखंड के घुटियाडीह गाँव में जन्मे रघुनाथ महतो ने चुआर विद्रोह के प्रथम दौर का नेतृत्व किया। उन्होंने 1769 में ‘अपना गाँव अपना राज, दूर भगाओ विदेशी राज’ का नारा दिया था। वर्ष 1778 में लोटागाँव के समीप सभा करते समय अंग्रेजों की गोला-बारी में उनकी मृत्यु हो गई।

रानी सर्वेश्वरी :

-संथाल परगना जिले के सुल्तानाबाद (महेशपुर राज) की रानी सर्वेश्वरी ने पहाड़िया सरदारों के सहयोग से कंपनी शासन के विरुद्ध किया। अपने जीवन के अंतिम समय में वह भागलपुर जेल में बंद थीं, जहाँ उनकी मृत्यु 6 मई, 1807 को हुई।

ललित मोहन राय :

-स्कूल ऑफ आर्ट के निदेशक एल.एम. राय एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर के प्रसिद्ध चित्रकार हैं, जिनके मुख्य चित्र आदिवासी जीवन पर आधारित हैं। उन्हें ‘राजकीय सांस्कृतिक सम्मान’ (झारखण्ड सरकार) और 1989 में इन्हें ‘कलाश्री सम्मान’ बिहार सरकार से सम्मानित किया गया। 14 जुलाई, 2018 को इनकी मृत्यु दिल का दौरा पड़ने से हुई। ।

तेलंगा खड़िया :

-तेलंगा खड़िया का जन्म गुमला जिले के सिसई थाने के मुगुं ग्राम में 9 सितम्बर, 1806 ई. को हुआ था। वे खड़िया जाति के कृषक थे। उनके पिता का नाम ढुइया खड़िया एवं माता का नाम पेतो खड़िया था। उनकी पत्नी का नाम रतनी खड़िया एवं पुत्र का नाम जोगिया खड़िया था। खड़िया भाषा में वीर, निर्भीक एवं कुशल वक्ता को ‘तेब्बलंगा’ कहा जाता है। इसी कारण से उनका नाम ‘तेलंगा’ पड़ गया। उन्होंने खड़िया समाज को संगठित कर अंग्रेजों के विरुद्ध 1849-50 ई. में विद्रोह आरंभ किया। उनके विद्रोह से अंग्रेज सरकार सतर्क हो गई। एक दिन जब वे बसिया थाने के कुम्हारी गाँव में सभा कर रहे थे, तो उन्हें गिरफ्तार करके कलकत्ता भेज दिया गया। कई वर्षों तक वे जेल में रहे। 1859 ई. में उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया। तेलंगा फिर से अपने काम में जुट गए। वे गुमला के गाँव-गाँव घूमते, लोगों को अंग्रेजों की शोषण नीति से परिचित कराते और उन्हें तीर चलाने, लाठी चलाने व गदा चलाने का प्रशिक्षण देते तथा अंग्रेजों के खिलाफ हथियार उठाने के लिए उकसाते थे। 23 अप्रैल, 1880 ई. को सिसई स्थित अखाड़े में सुबह-सुबह जब उन्होंने प्रशिक्षण शुरू करने से पूर्व प्रार्थना करने के लिए सिर झुकाया तो निकट के एक झाड़ी में छुपे बोधन सिंह ने उन्हें गोली मार दी। उनके शिष्यों ने उनके शव को कोयल नदी पार कर गुमला के सोसो नीम टोली के ही एक टाँड में दफना दिया। आज यह टाँड ‘तेलंगा तोपा टांड’ के नाम से जाना जाता है।

सिद्धू-कान्हू :

-वर्ष 1855-56 ई. में हुए संथाल विद्रोह का नेतृत्व चार मूर्मू बंधुओं-सिद्धू (जन्म : 1815 ई.), कान्हू (जन्म : 1820 ई.), चाँद (जन्म : 1825 ई.) व भैरव (जन्म : 1835 ई.) ने किया। यह विद्रोह अंग्रेज शासक, जमींदार, साहूकार आदि के खिलाफ था। 30 जून, 1855 को भगनीडीह (संथाल परगना जिलान्तर्गत राजमहल सबडिवीजन के दामीन इलाकों के मध्य बारहाइत/ बड़हैत के निकट मूमू बंधुओं का गाँव) की सभा में 6000 संथाल एकत्र हुए और एक स्वर से विद्रोह (‘हुल’) का निर्णय लिया। इस सभा में सिद्धू (सिदो) को राजा एवं कान्हू (कान) को मंत्री चुना गया। सिद्धू ने गर्जना की ‘करो या मरो, अंग्रेजों हमारी माटी छोड़ो। जल्द ही यह विद्रोह भागलपुर से वर्दवान तक के विस्तृत क्षेत्र में फैल गया। अंग्रेजों ने संथालों के विरुद्ध कड़ी सैनिक कार्यवाही की। चाँद और भैरव गोली के शिकार हुए। सिद्ध-कान्हू पकड़े गए और उन्हें फाँसी दी गई। (मूर्मू बंधुओं के पिता का नाम चुन्नी मांझी, सिद्धू की पत्नी का नाम-सुमी)।

कृष्ण बल्लभ सहाय :

-राष्ट्रीय आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले हजारीबाग के कृष्ण बल्लभ सहाय 1965-67 के दौरान बिहार राज्य के मुख्यमंत्री थे।

करिया मुंडा :

-इनका जन्म 20 अप्रैल, 1936 को झारखण्ड राज्य के राँची जिले के अनिगारा नामक स्थान पर हुआ था। वे पूर्व में जनसंघ से संबंधित थे तथा 1971-72 में बिहार इकाई के संयुक्त मंत्री रहे। वे वाजपेयी मंत्रीमंडल में ‘कृषि एवं ग्रामीण उद्योग’ मंत्री रहे थे। 8 बार वह खूटी संसदीय क्षेत्र से लोकसभा सदस्य चयनित किए जा चुके है। ये पद्मभूषण से सम्मानित है।

बाबू राम नारायण सिंह :

-अमर स्वतंत्रता सेनानी और सामाजिक कार्यकर्ता बाबू राम नारायण सिंह का जन्म चतरा जिले के हंटरगंज प्रखंड के अंतर्गत तेतरिया गाँव में 19 दिसम्बर, 1884 को हुआ था। असहयोग आंदोलन के काल में जब विशेषतः वकीलों और छात्रों से महात्मा गाँधी ने सक्रिय सहयोग के लिए अपील की तो उन्होंने अपनी वकालत को छोड़कर इस आंदोलन में सहयोग दिया। उसके बाद वह जीवनपर्यन्त अर्थात् 1964 तक देश की सेवा में जुटे रहे। देश की आजादी के बाद वह लोकसभा के लिए चुने गए। उनकी चर्चित पुस्तक ‘स्वराज्य लुट गया’ आज भी प्रेरणा का स्रोत है। उन्हें 1931-1947 तक आठ बार अंग्रेजी हुकूमत द्वारा दी गई जेल यातना सहनी पड़ी। अंग्रेज सरकार इन पर कड़ी नजर रखती थी। यह इस बात से साबित होता है कि 1934 में आये भीषण भूकंप के समय डॉ. राजेन्द्र प्रसाद सहित अन्य स्वयंसेवक और राजनीतिक बंदियों को रिहा कर दिया गया, किन्तु बाबू राम नारायण सिंह को जेल में ही रखा गया। 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के समय वे हजारीबाग केंद्रीय जेल में भेज दिए गए थे, जहाँ से दीपावली की रात को अन्य क्रांतिकारियों के साथ वे भी भागने में सफल रहे।

बाबूलाल मरांडी :

-1998 और 1999 में दुमका (सुरक्षित) संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले और केंद्रीय मंत्रीमंडल में वन एवं पर्यावरण राज्यमंत्री रहे बाबूलाल मरांडी झारखण्ड प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री थे। उन्होंने ‘झारखण्ड विकास मोर्चा’ के नाम से एक नई राजनीतिक पार्टी का गठन भी किया था।

यशवंत सिन्हा :

-केंद्र सरकार में केंद्रीय वित्त मंत्री और विदेश मंत्री के रूप में कार्यरत रहे। केंद्रीय वित्त मंत्री के रूप में इनका कार्य सराहनीय रहा। श्री सिन्हा एक अच्छे अर्थशास्त्री भी हैं। उनकी जीवनकथा ‘द्रोहकाल के पथिक’ वर्ष 2013 में प्रकाशित हो चुकी है।

अब्दुल बारी :

–1936 में टाटा वर्कर्स यूनियन का नेतृत्व करने वाले मजदूर नेता अब्दुल बारी की 28 मार्च, 1947 को पटना में हत्या कर दी गई थी।

सैय्यद शहाबुद्दीन :

-इनका जन्म 4 नवंबर, 1935 को राँची में हुआ था। इन्होंने 1956 से 1958 तक पटना विश्वविद्यालय में लेक्चरर के पद पर कार्य किया। वे 1958 में विदेश सेवा के लिए चुन लिए गए और उन्होंने अनेक पदों पर रहकर देश सेवा की। इन्होंने 1978 में विदेश सेवा से त्यागपत्र देकर राजनीति में प्रवेश किया और 1979 से 1984 तक राज्यसभा के सदस्य रहे। वे ‘भारतीय मुस्लिम मजलिस मुशारत’ के कार्यकारी अध्यक्ष के पद पर वर्ष 2004-2011 तक काबिज रहे। उन्होंने एक मुस्लिम पत्रिका ‘मुस्लिम इंडिया’ में बतौर संपादक वर्ष 1983-2006 तक कार्य किया। उनकी मृत्यु 4 मार्च, 2017 को दिल्ली में 81 वर्ष की अवस्था में हुई।

वरुण आरोन :

-29 अक्टूबर, 1989 को जमशेदपुर में जन्मे वरुण आरोन भारत के अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट खिलाड़ी हैं। इंडियन प्रीमियर लीग में वह दिल्ली डेयरडेविल्स के लिए खेलते हैं और पहले वह कोलकाता नाइट राइडर्स के लिए भी खेल चुके हैं, जबकि ये घरेलू क्रिकेट झारखण्ड के लिए खेलते हैं। दाहिने हाथ के बल्लेबाज वरुण का अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट का पर्दापण अक्टूबर 2011 में हुआ था।

महेन्द्र सिंह धोनी :

-भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेन्द्र सिंह धोनी का जन्म रांची में 7 जुलाई, 1981 को हुआ था। धोनी एक आक्रामक सीधे हाथ के बल्लेबाज और विकेट कीपर हैं। ‘पद्मभूषण’, पद्मश्री और राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार’ से सम्मानित धोनी मानद लेफ्टिनेंट के पद पर भी कार्यरत हैं। धोनी भारत के सबसे सफल एक दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय कप्तान होने के अलावा दुनिया के पहले ऐसे कप्तान है, जिनके पास आई. सी. सी. के सभी कप है। धोनी ने 2014 में टेस्ट क्रिकेट और जनवरी 2017 में एक दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट की कप्तानी छोड़ी।

भीष्म नारायण सिंह :

-श्री सिंह का जन्मे झारखण्ड प्रांत के पलामू जिले में 13 जुलाई, 1933 को हुआ था। इन्होंने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की। इन्होंने छात्र जीवन में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में यूथ कांग्रेस का गठन किया और 1953-54 में इसके सह-संयोजक बने। अपने गृह जिले में इन्होंने ग्राम पंचायत और ग्राम परिषदों का गठन किया। बिहार विधानसभा के सदस्य के रूप में इनका कार्यकाल 1967-76 था। बाद में बिहार सरकार के अनेक मंत्रालयों में मंत्री का कार्य किया और दो बार राज्यसभा (1976 और 1982) के लिए चुने गए। 1977 में वे कांग्रेस पार्लियामेंट्री पार्टी के उप-सचेतक थे। 1980 में संसदीय मामलों के राज्यमंत्री बने। केंद्र की कांग्रेस सरकार में इन्होंने अनेक मंत्रालयों का सफलतापूर्वक संचालन किया। 1967 में बिस्कोमान (BISCOMAUN) के डायरेक्टर रहे तथा 1974-75 में बिहार राज्य कॉपरेटिव गृह निर्माण वित्त परिषद् के चेयरमैन रहे। इन्हें मेघालय और तमिलनाडु के राज्यपाल के पद पर भी नियुक्त होने का मौका मिला।

सीमोन उरांव :

-राँची जिले के अंतर्गत बेड़ों की निवासी सीमोन उरांव ने अनपढ़ होते हुए भी अपनी सूझबूझ की बदौलत अपने गाँव सहित आस-पास के गाँवों की भी काया पलट दी। इनके प्रयत्न से ही गाँव में आठवीं कक्षा तक की पढ़ाई शुरू हुई। इन्होंने सामुदायिक स्तर पर जल संरक्षण का कार्य और उसके समुचित उपयोग का रास्ता दिखाकर गाँववासियों में खुशहाली ला दी। इनके प्रयत्न से निर्मित 5,000 फीट नहर और उस पर 42 फीट ऊँचा बाँध इसका उदाहरण है, जिसकी बदौलत गाँवों में हरियाली के साथ ही खुशहाली भी आई। इनके कार्य से प्रभावित होकर कैंब्रिज विश्वविद्यालय की एक छात्रा ने ‘How to practically conserve the forest in Jharkhand’ पर शोध कर डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।

नागरमल मोदी :

-स्वदेशी आंदोलन को आरंभ करने वाले अग्रणी व्यक्तियों में से एक नागरमल मोदी ने विधवाओं एवं निराश्रित महिलाओं के लिए वर्ष 1935 में ‘अबला आश्रम’ की स्थापना की थी।

अर्जुन मुंडा :

-तीन बार झारखंड राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके अर्जुन मुंडा के नाम महज 35 वर्ष की आयु में मुख्यमंत्री (देश में सबसे कम उम्र में मुख्यमंत्री) बनने का रिकॉर्ड है। वे झारखंड विधानसभा में खरसाँवा का प्रतिनिधित्व करते हैं। फिलहाल वे जमशेदपुर लोकसभा क्षेत्र के सांसद और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव हैं। उनका राजनीतिक जीवन 1980 से शुरू हुआ। उस वक्त अलग झारखंड आंदोलन का दौर था। झारखंड मुक्ति मोर्चा से राजनीतिक पारी की शुरूआत करने वाले मुंडा ने आंदोलन में सक्रिय रहते हुए भी जनजातीय समुदायों और समाज के पिछड़े तबकों के उत्थान की कोशिश की।

सौरभ सनील तिवारी :

-झारखंड के जमशेदपुर के रहनेवाले सौरभ तिवारी भारतीय क्रिकेट टीम के मध्यम क्रम के एकदिवसीय क्रिकेट टीम के बाएं हाथ के बल्लेबाज हैं। वे 2008 से आईपीएल क्रिकेट के नियमित बल्लेबाज हैं। वे पहली बार 2008 में मुंबई इंडियन्स और 2018 में भी मुंबई इंडियन की तरफ से खेल चुके हैं। भारतीय एकदिवसीय क्रिकेट टीम में उनका पदार्पण 2010 में एशिया कप के लिए हुआ था।

रघुवर दास :

-ये वर्तमान में झारखंड के मुख्यमंत्री तथा झारखण्ड के जमशेदपुर से विधायक है। 3 मई, 1955 को जमशेदपुर में जन्मे रघुवर दास अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) तेली परिवार से सम्बंधित हैं और झारखंड के पहले गैर-आदिवासी मुख्यमंत्री हैं। 1977 में वे जनता पार्टी के सदस्य बने तथा 1980 में बीजेपी की स्थापना के साथ ही वह सक्रिय राजनीति में आए। 1995 में वे पहली बार जमशेदपुर पूर्व से विधायक चुने गए। तब से लगातार पांचवीं बार उन्होंने इसी क्षेत्र से विधानसभा चुनाव जीता है। रघुवर दास 15 नवंबर, 2000 से 17 मार्च, 2003 तक झारखंड के श्रम मंत्री, मार्च 2003 से 14 जुलाई, 2004 तक भवन निर्माण मंत्री और 12 मार्च, 2005 से 14 सितंबर, 2006 तक वित्त, वाणिज्य और नगर विकास मंत्री भी रहे हैं। इसके अलावा वे 2009 से 30 मई, 2010 तक ‘झारखंड मुक्ति मोर्चा’ के साथ बनी बीजेपी की गठबंधन सरकार में उपमुख्यमंत्री, वित्त, वाणिज्य, कर, ऊर्जा, नगर विकास, आवास और संसदीय कार्य मंत्री भी रहे।

सुमराई टेटे :

-भारतीय महिला हॉकी टीम की पूर्व कप्तान सुमराई टेटे ध्यानचंद लाइफ टाइम अवार्ड (2016) पानेवाली देश की पहली महिला हॉकी खिलाड़ी है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें पुरस्कार देकर सम्मानित किया था। सिमडेगा जिले के कसिरा बलियाजोर गांव की रहने वाली सुमराई टेटे ने लगभग एक दशक तक भारतीय महिला हॉकी टीम का प्रतिनिधित्व किया। वर्ष 2002 में टेटे की कप्तानी में भारतीय महिला हॉकी टीम ने मैनचेस्टर कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण जीती थी। उनके नेतृत्व में भारतीय टीम ने कई अंतर्राष्ट्रीय टूर्नामेंट जीती। वर्ष 2006 में अभ्यास शिविर के दौरान घुटने में लगी चोट ने सुमराय टेटे के अंतर्राष्ट्रीय करियर का अंत कर दिया। 2013-14 में सुमराई ने भारतीय हॉकी टीम में सहायक प्रशिक्षक की भी भूमिका निभायी।

दीपिका कुमारी :

-भारतीय महिला तीरंदाज हैं और अंतर्राष्ट्रीय स्तर की शीर्ष खिलाड़ियों में से एक हैं। उनका जन्म 13 जून, 1994 में झारखंड राज्य की राजधानी रांची के रातू नामक स्थान में ऑटो चालक शिवनारायण महतो और रांची मेडिकल कॉलेज में नर्स गीता महतो के घर हुआ था। अत्यंत निर्धन परिवार से ताल्लुक रखने वाली दीपिका वर्तमान में टाटा स्टील कंपनी के खेल विभाग की प्रबंधक हैं। दीपिका 2006 में मैरीदा (मैक्सिको) में आयोजित वर्ल्ड चैंपियनशिप में कम्पाउंड एकल प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक हासिल करने वाली दूसरी भारतीय थीं। वर्ष 2009 में महज 15 वर्ष की दीपिका ने अमेरिका में हुई 11वीं यूथ आर्चरी चैम्पियनशिप जीत कर अपनी उपस्थिति जाहिर की थी। फिर 2010 में एशियन गेम्स में कांस्य, राष्ट्रमण्डल खेल 2010 में महिला एकल स्पर्धा में एक तथा महिला टीम के साथ 1 स्वर्ण जीते, इस्तांबुल में 2011 में और टोक्यो में 2012 में एकल खेलों में रजत पदक जीता। उन्हें अर्जुन पुरस्कार तथा पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

शिबू सोरेन :

-भारतीय राजनेता और झारखंड मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष शिबू सोरेन 2004 में मनमोहन सिंह की सरकार में कोयला मंत्री बने, लेकिन चिरूडीह कांड के सिलसिले में गिरफ़्तारी का वारंट जारी होने के बाद उन्हें केन्द्रीय मंत्रिमंडल से 24 जुलाई, 2004 को इस्तीफ़ा देना पड़ा। उनका जन्म वर्तमान झारखंड के हजारीबाग जिले में नामरा गाँव में 11 जनवरी, 1944 को हुआ था। उनके राजनैतिक जीवन की शुरुआत 1970 में हुई। 23 जनवरी, 1975 को उन्होंने तथाकथित रूप से जामताड़ा जिले के चिरूडीह गाँव में “बाहरी” लोगों (आदिवासी जिन्हें “दिकू” नाम से बुलाते हैं) को खदेड़ने के लिये एक हिंसक भीड़ का नेतृत्व किया था। इस घटना में 11 लोग मारे गये थे। उन्हें 68 अन्य लोगों के साथ हत्या का अभियुक्त बनाया गया। 1980, 1986, 1989, 1991, 1996 में वे लगातार लोक सभा चुनाव जीते। 10 अप्रैल, 2002 से 2 जून, 2002 तक वे राज्यसभा के सदस्य रहे। 2004 में वे दुमका से लोकसभा के लिये चुने गये। सन् 2005 में झारखंड विधानसभा चुनावों के पश्चात वे विवादस्पद तरीके से झारखंड के मुख्यमंत्री बने, परंतु बहुमत साबित न कर सकने के कारण कुछ दिन पश्चात ही उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा।

प्रेमलता अग्रवाल :

-वर्ष 1963 में जन्मी प्रेमलता अग्रवाल एक भारतीय महिला पर्वतारोही हैं, जिन्होने 48 साल की उम्र में माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली प्रथम भारतीय महिला होने का गौरव हासिल किया। 50 वर्ष की उम्र में 23 मई, 2013 को उत्तरी अमेरिका के अलास्का के माउंट मैकेनले को फतह करनेवाली वे पहली भारतीय महिला हैं। सातों महाद्वीपों के शिखर पर चढ़ने वाली प्रेमलता एक गृहिणी हैं और उन्होंने 35 बरस की उम्र के बाद पहली बार पर्वतारोहण से नाता जोड़ा। उन्होंने दार्जिलिंग से पर्वतारोहण की शिक्षा प्राप्त की है। वे झारखंड के जुगसलाई, जमशेदपुर की रहने वाली हैं। इन्हें 2013 में “पद्म श्री” से सम्मानित किया गया है।

असुंता लकड़ा :

-भारतीय महिला टीम की पूर्व कप्तान असुंता लकड़ा वर्ष 2000 से 2014 तक लगातार 14 वर्षों तक भारतीय हॉकी टीम की सदस्य के रूप में अंतर्राष्ट्रीय स्तर की हॉकी खेल चुकी हैं तथा कई पदक भी जीत चुकी हैं। असुंता लकड़ा भारतीय महिला हॉकी टीम की चयनकर्ता के साथ-साथ जूनियर भारतीय महिला हॉकी टीम प्रशिक्षक भी हैं। वे झारखंड के सिमडेगा की रहनेवाली है। झारखंड के लिए बहुत गर्व की बात है कि हॉकी इंडिया हर वर्ष एक खिलाड़ी को “असुंता अवार्ड” से सम्मानित करती है।

निक्की प्रधान :

-झारखंड में जन्मी निक्की प्रधान (जन्म: 8 दिसम्बर, 1993) भारत के लिए ओलिम्पिक में खेलने वाली झारखण्ड की पहली महिला हॉकी खिलाड़ी है। सोमा प्रधान (पिता) और जीतन देवी (माँ) की बेटी निक्की 2016 ग्रीष्मकालीन ओलम्पिक में भारतीय महिला हॉकी टीम का हिस्सा रह चुकी हैं। निक्की पहली बार भारत के लिए बैंकॉक में हो रहे एशिया कप 2011 में खेली थी, जिसमें उन्होंने रजत पदक जीता था। इसके बाद 2016 में इनका ब्राजील में हो रहे ओलिम्पिक में चयन हुआ।

इम्तियाज़ अली :

-झारखंड के जमशेदपुर में जन्मे इम्तियाज अली एक निर्देशक के रूप में बॉलीवुड फिल्म इंडस्ट्री का एक जाना-पहचाना चर्चित नाम है। उनकी निर्देशित फिल्मों में “सोचा न था”, “जब वी मेट”, “लव आज कल” तथा “रॉकस्टार” के नाम प्रमुख हैं। इम्तियाज़ लीक से हटकर फिल्म बनाने के लिए जाने जाते हैं।

मीनाक्षी शेषाद्रि :

-भारतीय अभिनेत्री मीनाक्षी शेषाद्री का जन्म झारखंड प्रांत के सिंदरी नामक शहर में 13 नवंबर, 1963 को हुआ था। वैसे वे मूलतः तमिलनाडु से हैं, परंतु उनके पिता के सिंदरी के उर्वरक कारखाने में कार्यरत होने के कारण उनका परिवार इसी शहर में बस गया था। सन 1981 में मिस इंडिया बनने के बाद उनके फिल्मी कैरियर की शुरुआत नायिका के तौर पर हिन्दी फिल्म पेंटर बाबू (1982) से हुई और देखते-ही-देखते वे हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की एक प्रभावशाली व चर्चित अभिनेत्री बन गयी। वर्तमान में वे अपने परिवार के साथ कनाडा में रहती हैं और अपना शास्त्रीय नृत्य का स्कूल चलाती है।

पूर्णिमा महतो :

-झारखंड के जमशेदपुर की पूर्णिमा महतो एक भारतीय तीरंदाज और तीरंदाजी कोच हैं। उन्होंने 1998 के राष्ट्रमंडल खेलों में एक रजत पदक और भारतीय राष्ट्रीय तीरंदाजी चैंपियनशिप जीती है। वह 2008 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में भारतीय राष्ट्रीय टीम की कोच थीं और 2012 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक में भी टीम की कोच चुनी गईं। उन्हें 29 अगस्त, 2013 को भारत के राष्ट्रपति द्वारा “द्रोणाचार्य पुरस्कार” से सम्मानित किया गया।

दशरथ मांडी :

-झारखंड के चाकुलिया के दशरथ मांडी ने 70 फीट ऊंचे कन्हाईश्वर पहाड़ को काटकर दो किलोमीटर लंबी सड़क बना डाली, वह भी सिर्फ तीन साल में। इससे झारखंड और पश्चिम बंगाल के 17 गांवों की तकदीर बदल गई। 15 किलोमीटर का रास्ता सिमटकर महज दो किलोमीटर का रह गया। इसे “दुआरीशोल-काकड़ी झरना सड़क” के रूप में जाना जाता है। इस सड़क के बनने से करीब 12 हजार लोगों की मुश्किल आसान हो गई। दशरथ के इस कार्य में गांववालों ने साथ दिया और रास्ता बनाने के लिए उन्होंने चट्टानों को काटना शुरू कर दिया। इसमें न तो सरकार का साथ लिया और न ही किसी संस्था का। अपनों से ही चंदा जुटाया। आखिरकार तीन साल बाद मेहनत रंग लाई। सड़क तैयार हो गई। दरअसल पहाड़ की तराई में बसे पूर्वी सिंहभूम जिले के दुआरीशोल गांव प्रखंड मुख्यालय चाकुलिया से भी कटे हुए थे। यहां के लोगों की रिश्तेदारी और खेती पहाड़ के उस पार पश्चिम बंगाल के काकड़ी झरना में है। जहाँ जाने के लिए लोगों को पहाड़ पार करके 15 किलोमीटर का रास्ता तय करना पड़ता था।