झारखण्ड की ऊर्जा संसाधन

किसी भी देश या राज्य के लिए ऊर्जा संसाधनों का विकास वहाँ के औद्योगिक विकास की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जाता है। इसका कारण यह है कि शक्ति के संसाधनों का जितना अधिक उपयोग व्यापारिक स्तर पर किया जाएगा, उत्पादनों की मात्रा एवं विविधता भी उतनी ही अधिक होगी। ऊर्जा के साधन शांति एवं विकास के साथ ही अन्य विपरीत समयों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके सही विकास के द्वारा ही किसी देश को औद्योगिक आत्मनिर्भरता प्राप्त हो सकती है। हमारे देश में व्यापारिक स्तर पर प्रयोग किए जाने वाले मात्र तीन प्रमुख ऊर्जा संसाधन हैं—कोयला, खनिज तेल अथवा पेट्रोलियम एवं जल विद्युत। इसके अलावा अन्य ऊर्जा संसाधन हैं—प्राकृतिक गैस, परमाणु ऊर्जा, पवन-ऊर्जा, ज्वारीय ऊर्जा, सौर ऊर्जा एवं भूगर्भिक ऊर्जा।

लेकिन झारखण्ड में मुख्य रूप से दो ही साधन (कोयला एवं जल) ऊर्जा संसाधन के रूप में मौजूद हैं तथा अन्य साधनों की अतिन्यूनता है।

ताप विद्युत परियोजनाएं

झारखण्ड में विद्युत उत्पादन में ताप विद्युत परियोजनाओं का महत्व अधिक है, क्योंकि यह कोयला आधारित है, साथ ही यहाँ की ऊँची-नीची भूमि में इसका पारेषण (Transmission) आसान है।

राज्य में 4 ताप विद्युत् परियोजनाएं चलाई जा रही हैं

(i) बोकारो ताप विद्युत् गृह : दामोदर घाटी परियोजना के तहत कोयले पर आधारित प्रथम विद्युत् संयंत्र बोकारो ताप विद्युत् गृह स्थापित किया गया। यह बोकारो नदी (दामोदर नदी की एक सहायक नदी) पर स्थित है। फरवरी, 1953 में यहाँ बिजली उत्पादन शुरू हुआ। इसकी उत्पादन क्षमता 830 MW है। इससे राष्ट्रीय ग्रिड (National Grid) को विद्युत आपूर्ति की जाती है।

(ii) चन्द्रपुरा ताप विद्युत गृह : दामोदर घाटी निगम द्वारा इस विद्युत् गृह की स्थापना अक्टूबर, 1965 में की गई। यह बोकारो जिला में स्थित है। इसकी उत्पादन क्षमता 780 MW है। यह DVC के अधीन है।

(ii) पतरातू ताप विद्युत गृह : यह देश के बड़े ताप विद्युत् गृहों में से एक है। यह परियोजना चौथी पंचवर्षीय योजना अवधि में फरवरी, 1973 ई. में पूर्व सोवियत संघ के सहयोग से स्थापित की गई। यह रामगढ़ जिला में स्थित है। इसकी कुल उत्पादन क्षमता 840 MW है। इस विद्युत् गृह से हटिया (राँची) स्थित एच.ई.सी. को विद्युत् आपूर्ति की जाती है।

(iv) तेनुघाट ताप विद्युत् गृह : यह परियोजना 1990 के दशक में स्थापित की गई। यह राँची के तेनुघाट के निकट लालपनिया नामक स्थान पर स्थित है। तेनुघाट संयंत्र की स्थापित क्षमता 420 MW है।

जल विद्युत परियोजनाएं

1. दामोदर घाटी परियोजना (DVC) : दामोदर घाटी परियोजना, दामोदर और इसकी सहायक नदियों-बराकर, कोनार, जमुनिया तथा बोकारो पर 7 जुलाई, 1948 को स्थापित की गई। यह परियोजना अमेरिका के टेनेसी घाटी प्राधिकरण के मॉडल पर आधारित है, जिसे डब्ल्यू. एल. वुरडुइन ने तैयार किया था। यह एक बहुद्देशीय योजना (Multipurpose Project) है, जिसका मुख्य उद्देश्य विद्युत उत्पादन के साथ-साथ बाढ़ नियंत्रण एवं सिंचाई व्यवस्था को कायम करना भी है। दामोदर नदी छोटानागपुर की पहाड़ियों से निकलती है। इस नदी की ऊपरी घाटी में झारखण्ड के पलामू, हजारीबाग, राँची, मानभूम तथा संथाल परगना और निचली घाटी में पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा, वर्धमान, मिदनापुर तथा हावड़ा जिले शामिल हैं। दामोदर नदी को तत्कालीन बिहार और बंगाल का शोक कहा जाता था। इसमें आने वाली बाढ़ से काफी जान-माल की हानि होती थी। इसी को ध्यान में रखते हुए सन् 1948 में भारत सरकार द्वारा दामोदर घाटी निगम (DVC) की स्थापना की गई थी। इस परियोजना के अंतर्गत् आठ बांध, एक अवरोधक, बांधों के निकट जलविद्युत उत्पादन केंद्रों के अतिरिक्त बोकारो, चंद्रपुरा तथा दुर्गापुर में तीन तापीय विद्युतगृह तथा 2,500 किमी. लम्बी नहरों-नालों के निर्माण का कार्य किया गया है। इस परियोजना के बन जाने से 7.5 लाख हेक्टेयर भूमि में सिंचाई, 500 मेगावाट (MW) जल विद्युत एवं 145 किमी. लंबे परिवहन मार्ग की सुविधा प्राप्त हुई है। इस परियोजना के विभिन्न बांधों से प्रस्तावित जल विद्युत उत्पादन क्षमता 260,000 KW है।

इस परियोजना के अंतर्गत् निर्मित बांधों का विवरण इस प्रकार है

(i) तिलैया बांध (फरवरी, 1953) : झारखण्ड प्रदेश के कोडरमा जिला के अंतर्गत इस बांध का निर्माण दामोदर की सहायक नदी बराकर पर किया गया है। इस बांध के जलाशय की जल संग्रहण क्षमता 395 मिलियन घन मीटर है। इस बांध के पास ही एक जलविद्युत गृह की स्थापना की गई है। जिसकी कुल तीन इकाइयाँ है। इनकी कुल विद्युत उत्पादन क्षमता 60,000 किलोवाट (KW) है।

(ii) कोनार बांध (1955) : इस बांध का निर्माण प्रदेश के हजारीबाग जिला अंतर्गत दामोदर की सहायक नदी कोनार पर किया गया है। इस बांध के जलाशय की जल संग्रहण क्षमता 337 मिलियन घन मीटर है, यहाँ 40,000 किलोवाट (KW) क्षमता का एक भूमिगत जलविद्युत गृह का निर्माण किया गया है। इस बांध से 40,000 हेक्टेयर भूमि पर सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो रही है।

(iii) मैथन बांध (अक्टूबर, 1957) : झारखण्ड के धनबाद जिला में अंतर्गत इस बांध का निर्माण बराकर नदी पर धनबाद में किया गया है। इस बांध का जलाशय तीन ओर से पहाड़ियों से घिरा है, जिसकी जल संग्रहण क्षमता 1,357 मिलियन घन मीटर है। इस बांध के अंतर्गत 20,000 किलोवाट क्षमता वाली तीन इकाइयाँ कार्यरत हैं। यह जल विद्युत केंद्र गैस टरबाइन पर आधारित है, जो पूरे झारखण्ड में एकमात्र है। यहाँ स्थापित भूमिगत जल विद्युत केंद्र, पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में अपनी तरह का पहला विद्युत केंद्र है।

(iv) पंचेत पहाड़ी बांध (1959) : इस बांध का निर्माण धनबाद (झारखण्ड) और पुरूलिया (पं. बंगाल) जिले की सीमा पर दामोदर नदी पर किया गया है। इस बांध के अंतर्गत निर्मित जलाशय की जलसंग्रहण क्षमता 1497 मिलियन घन मीटर है। इस बांध के निकट 40,000 किलोवाट (KW) क्षमता का एक जलविद्युत गृह भी स्थापित किया गया है।

(v) अय्यर बांध : दामोदर घाटी परियोजना के दूसरे चरण में इस बांध का निर्माण दामोदर नदी पर किया गया। इस बांध के निकट ही एक जल-विद्युत गृह निर्मित किया गया है, जिसकी उत्पादन क्षमता 45,000 किलोवाट (KW) है।

(vi) बाल पहाड़ी बांध : इस बांध का निर्माण बराकर नदी पर गिरिडीह जिले के दक्षिण-पूर्व में किया गया है। इस बांध के निकट 20,000 किलोवाट क्षमता का एक विद्युत गृह स्थापित किया गया है।

(vii) बोकारो बांध : यह बांध बोकारो नदी पर निर्मित है। इस बांध के निकट एक विद्युत गृह का निर्माण किया गया है।

(vii) बर्मो बांध : इस बांध का निर्माण दामोदर नदी पर हुआ है। इसके निकट स्थापित जल विद्युत केंद्र की उत्पादन क्षमता 28,000 किलोवाट (KW) है।

दामोदर घाटी परियोजना के अंतर्गत दो तापीय विद्युत गृहों (Thermal Power House) की भी स्थापना की गई है—बोकारो तापीय विद्युत गृह और चंद्रपुरा तापीय विद्युत गृह।

2. स्वर्णरेखा जलविद्युत परियोजना : विश्व बैंक की सहायता से इस परियोजना का निर्माण कार्य प. बंगाल, उड़ीसा और झारखण्ड राज्य सरकार द्वारा कराया जा रहा है। इस परियोजना का निर्माण कार्य 1978 में आरम्भ किया गया था। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य झारखण्ड क्षेत्र में सिंचाई व्यवस्था का विकास और विद्युत उत्पादन है। स्वर्णरेखा नदी पर, स्वर्णरेखा जलविद्युत परियोजना का निर्माण राँची जिले में हुंडरू के पास किया जा रहा है। इसके अंतर्गत हुंडरू जलप्रपात के नीचे जलाशय बनाकर विद्युत उत्पादन किया जाएगा, जिसकी कुल उत्पादन क्षमता 130 मेगावट (MW) है। इस परियोजना से उत्पादित विद्युत को राँची क्षेत्र के औद्योगिक नगरी को आपूर्ति की जाएगी।

3. मयूराक्षी परियोजना : यह नदी परियोजना मुरली नदी पर स्थित, झारखण्ड और पश्चिम बंगाल सरकार की संयुक्त परियोजना है। इस परियोजना के निर्माण का मुख्य उद्देश्य शक्ति उत्पादन और सिंचाई व्यवस्था के सुविधाओं का विकास है। दुमका जिले में स्थित इस परियोजना के अंतर्गत निर्मित बांध को ‘कनाडा बांध’ के नाम से भी जाना जाता है।

4. कोयलकारो परियोजना : यह जल-विद्युत परियोजना झारखण्ड राज्य के राँची, गुमला और प. सिंहभूम जिले में अंतर्निहित होगी। कोयल और कारो नदियों पर निर्मित होने वाली इस परियोजना का निर्माण राष्ट्रीय पन बिजली निगम (N.H.P.C.) द्वारा किया जाएगा। इस परियोजना के तहत कुल 732 MW विद्युत उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जिसमें 710 MW प्रथम चरण में तथा 22 MW द्वितीय चरण में उत्पादित करने का लक्ष्य है।

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