झारखण्ड के प्रमुख मंदिर

  1. वंशीधर मंदिर, नगरऊँटारी (गढ़वा): यह मंदिर गढ़वा जिले के नगरऊँटारी नामक कस्बे में स्थित है। इस मंदिर में अष्टधातु की बनी वंशीधर अर्थात् कृष्ण की मूर्ति प्रतिष्ठापित है। इसमें कृष्ण को त्रिभंगी मुद्रा में कमल-पुष्प पीठिका पर खड़ा दर्शाया गया है। इस मंदिर की स्थापना वर्ष 1885 ई. में की गई।
  2. माँ योगिनी मंदिर, बाराकोपा पहाड़ी (गोड्डा): यह मंदिर गोड्डा जिले के बाराकोपा पहाड़ी पर स्थित है। अनुश्रुति के अनुसार यहाँ माँ सती का दाहिना जांघ गिरा था। यहाँ माँ की प्रतिमा के रूप में जांघ की आकृति का प्रस्तर अंश है। यहाँ श्रद्धालु भेंट के रूप में लाल वस्त्र चढ़ाते हैं। इस मंदिर का निर्माण चारुशीला देवी ने कराया था।
  3. भद्रकाली मंदिर, इटखोरी (चतरा): यह मंदिर चतरा जिले में चौपारण से 16 किमी. की दूरी पर इटखोरी प्रखण्ड के भदौली गाँव में स्थित है। इस मंदिर में भद्रकाली की मूर्ति प्रतिष्ठापित है। यह मूर्ति शक्ति के तीन रूपों-सौम्य, उग्र व काम-में से सौम्य रूप का प्रतिनिधित्व करती है।
  4. कौलेश्वरी मंदिर, कोल्हुआ पहाड़ (चतरा): यह मंदिर चतरा जिले में हंटरगंज से 16 किमी. दक्षिण कोल्हुआ पहाड़ (कालूस्थान पहाड़ी) पर स्थित है। इस मंदिर में शक्ति के एक रूप कौलेश्वरी देवी की मूर्ति प्रतिष्ठापित है। कोल्हुआ पहाड़ हिन्दू, बौद्ध एवं जैन धर्मों का संगम स्थल है। यहाँ हिन्दू धर्म से संबंधित कौलेश्वरी देवी, बौद्ध धर्म से संबंधित ध्यानस्थ गौतम बुद्ध एवं जैन धर्म से संबंधित ऋषभदेव (पहले तीर्थंकर), पार्श्वनाथ (23वें तीर्थंकर) की प्रतिष्ठापित मूर्तियाँ मिलती हैं। जैन विद्वान कोल्हुआ पहाड़ को 10वें तीर्थंकर शीतलनाथ की तपोभूमि एवं जिनसेन (‘जैन महापुराण’ के रचनाकार) का साधना स्थल मानते हैं।
  5. विष्णु मंदिर, दालमी (धनबाद): यह मंदिर धनबाद जिले के दालमी में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण 17वीं सदी ई. में किया गया।
  6. पार्वती मंदिर, कनसाई नदी तट (धनबाद): यह मंदिर धनबाद जिले में जैपुर रेलवे स्टेशन से 10 किमी. दूर कनसाई नदी के तट पर स्थित है। इस मंदिर में चार भुजाओं वाली पार्वती की प्रतिमा प्रतिष्ठापित है।
  7. शिव मंदिर, चेचगाँव (धनबाद): यह मंदिर धनबाद जिले में बनारस से 14 किमी. दूर चेचगाँव में स्थित है। इस मंदिर में शिव की मूर्ति प्रतिष्ठापित है।
  8. शिव मंदिर, तेलकुप्पी (धनबाद): यह मंदिर धनबाद जिले में तेलकुप्पी में दामोदर नदी के तट पर स्थित है। इस मंदिर का निर्माण 16वीं सदी ई. में किया गया।
  9. छिन्नमस्तिका मंदिर, रजरप्पा (रामगढ़): यह मंदिर रामगढ़ जिले में रजरप्पा नगर स्थान में दामोदर एवं भेड़ा (भैरवी) नदी के संगम पर स्थित है। इस मंदिर में देवी काली की धड़ से अलग सिर वाली मूर्ति प्रतिष्ठापित है, जिस कारण इसे ‘छिन्नमस्तिका’ कहा जाता है। यह मूर्ति शक्ति के तीन रूपों-सौम्य, उग्र व काम में से उग्र रूप का प्रतिनिधित्व करती है। देवी का छिन्न मस्तक मानव मस्तिष्क की चंचलता का प्रतीक है। देवी के दायें और बायें डाकिनी और शाकिनी विराजमान हैं। देवी के पैरों के नीचे रति-कामदेव को दर्शाया गया है जो कामनाओं के दमन का प्रतीक है। छिन्नमस्तिका मंदिर को ‘वन दुर्गा मंदिर’ भी कहा जाता है, क्योंकि 1947 ई. तक यह मंदिर घने वनों के बीच स्थित था। यह एक तांत्रिक पीठ है। यह भारत के प्रसिद्ध 51 शक्तिपीठों में से एक है। इस मंदिर के संरक्षक रामगढ़ नरेश रहे हैं। रामगढ़ नरेश ने दक्षिणेश्वर मंदिर के निकट के गाँव से तांत्रिक पुजारियों को लाकर यहाँ बसाया। इस मंदिर की शिल्प कला असम के प्रसिद्ध कामाख्या मंदिर की शिल्प कला से प्रभावित है।
  10. दसशीष महादेव मंदिर, जपला (पलाम): यह मंदिर पलामू जिले में जपला के निकट सोन नदी के मध्य में स्थित है। किंवदन्ती है कि हिमालय से शिवलिंग लंका ले जाते समय लंकापति रावण ने इसे यहीं रखा था और शिव के वरदान के अनुसार इसे पुनः नहीं उठा सका था।
  1. राम-लक्ष्मण मंदिर, बमण्डीग्राम (पलामू): यह मंदिर पलामू जिले में कोयल नदी के सुल्तानी घाट के निकट बमण्डीग्राम से 3 किमी. पश्चिम में स्थित है। इस मंदिर में पत्थर से बनी राम-लक्ष्मण की मूर्ति प्रतिष्ठापित है।
  2. रंकिनी देवी मंदिर, घाटशिला (पूर्वी सिंहभूम): यह मंदिर पहले महुलिया पहाड़ी पर स्थापित था। नर बलि प्रथा पर रोक लगाने के उद्देश्य से रंकिनी देवी की प्रतिमा को महुलिया पहाड़ी से हटाकर महुलिया थाना परिसर में स्थापित किया गया। रंकिनी देवी ढाल नरेशों की अधिष्ठात्री देवी का नाम है।
  3. शिव मंदिर, बादम गाँव (हजारीबाग): यह मंदिर हजारीबाग जिला के बड़का गाँव थाना के बादम गाँव में स्थित है। बादम पहाड़ियों में चार गुफा मंदिर स्थित है। ये सभी शिव मंदिर हैं। इन मंदिरों का निर्माण 17वीं सदी के उत्तरार्द्ध में किया गया।
  4. महामाया मंदिर, हाप्पामुनि गाँव (गुमला): यह मंदिर राँची-लोहरदगा-गुमला मार्ग पर लोहरदगा से 15 किमी. दूर हाप्पामुनि नामक गाँव में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण नागवंशी राजा गजघंट राय ने 908 ई. में कराया था। इस मंदिर का प्रथम पुरोहित हरिनाथ नामक मराठा ब्राह्मण था। इस मंदिर में देवी काली की मूर्ति प्रतिष्ठापित है। यह एक तांत्रिक पीठ है।
  5. टांगीनाथ मंदिर, मझगाँव पहाड़ी (गुमला): यह मंदिर गुमला जिले के चैनपुर से 25 किमी. की दूरी पर मझगाँव की पहाड़ी पर स्थित है। मुख्य मंदिर का नाम टांगीनाथ (शिव) मंदिर है। मंदिर के अंदर एक विशाल शिवलिंग स्थापित है। मंदिर के निकट वृहत् आकार का एक त्रिशूल स्थापित है।
  6. कपिलनाथ मंदिर, दोइसा नगर (गुमला): यह मंदिर नागवंशियों की राजधानी दोइसा में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण नागवंशी राजा रामशाह ने 1710 ई. में कराया था। इस मंदिर को ‘दोइसा के प्रस्तर-स्थापत्य का सर्वश्रेष्ठ नमूना’ कहा जाता है।
  7. सती मठ, पालकोट (गुमला): यह मठ नागवंशियों की राजधानी पालकोट में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण नागवंशी की एक महारानी ने कराया था, जो सती हो गई थी।
  8. चिंतामणि मंदिर, पालकोट (गुमला): यह मंदिर नागवंशियों की राजधानी पालकोट में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण नागवंशी शासक ने अपने कुलदेवता चिंतामणि के सम्मान में कराया था।
  9. आँजनग्राम के मंदिर, अरंगी परगना (गुमला): ये मंदिर गुमला से 21 किमी. दूर अरंगी परगना में स्थित आँजनग्राम में है। इसे अंजनिपुत्र अर्थात् हनुमान का जन्म स्थान माना जाता है। यहाँ अंजनी की प्रस्तर-मूर्ति स्थापित है। इसके अलावा यहाँ चक्रधारी (शिव) मंदिर एवं नकटी देवी मंदिर मिलते हैं। चक्रधारी मंदिर में स्थापित शिव लिंग के ऊपर चक्र है, जो अपने किस्म का अकेला है। यह चक्र भारी पत्थर का बना है और जिसके बीच में छिद्र है।
  10. वासुदेवराय मंदिर, कोराम्बेग्राम (गुमला): यह मंदिर गुमला जिले के सेन्हा थाना से 15 किमी. दक्षिण कोराम्बेग्राम में स्थित है। ‘नागवंशावली’ के अनुसार, इस मंदिर में स्थापित वासुदेवराय की मूर्ति को नागवंशियों ने पलामू के रक्सेलों को पराजित कर प्राप्त किया था। कोराम्बेग्राम को नाग वंश एवं रक्सेल वंश के इतिहास में वही स्थान प्राप्त है, जो मुगलों एवं मेवाड़ के राजपूतों के इतिहास में हल्दी घाटी का स्थान प्राप्त है। इसलिए इसे कभी-कभी ‘हल्दी घाटी मंदिर’ भी कहा जाता है। एक अन्य जनश्रुति के अनुसार यह मूर्ति सहियाना ग्राम निवासी घुमा मुण्डा को खेत जोतते समय मिली थी। राजा प्रताप कर्ण ने 1463 ई. में इस मूर्ति की विधिवत् स्थापना की।
  11. राधावल्लभ मंदिर, चुटिया (राँची): इस मंदिर का निर्माण नागवंशी राजा रघुनाथ शाह ने 1685 ई. में कराया था। राजा रघुनाथ शाह ने मराठा गुरु ब्रह्मचारी हरिनाथ को इस मंदिर का पुजारी नियुक्त किया।
  12. उग्रतारा मंदिर, नगर गाँव (लातेहार): यह मंदिर लातेहार जिले के चंदवा से लगभग 9 किमी. दूर नगर गाँव (मन्दारगिरि) में स्थित है। इस मंदिर की प्रसिद्धि एक सिद्धतंत्र पीठ के रूप में है। इस मंदिर की मुख्य विशेषता है-काली कुल की देवी उग्रतारा एवं श्रीकुल की देवी लक्ष्मी का एक ही स्थान पर स्थापित होना।
  13. वैद्यनाथ मंदिर (देवघर): जनश्रुति के अनुसार, यहाँ शिवलिंग की स्थापना लंकापति रावण ने की थी। इसी कारण इसे ‘रावणेश्वर महादेव’ भी कहा जाता है। बाद में बैजू नामक एक आदिवासी ने जब उस शिवलिंग की भक्तिपूर्वक आराधना की तो उसके नाम पर उस स्थान को बैजूनाथ या वैद्यनाथ मठ कहा जाने लगा। बाद में यह स्थान वैद्यनाथ धाम के नाम से विख्यात हुआ। वैद्यनाथ मंदिर का निर्माण गिद्धौर राजवंश के 10वें राजा पूरनमल ने कराया था। ‘शिव पुराण’ के अनुसार शिव के 12 ज्योतिलिंगों में से एक मनोकामना लिंग वैद्यनाथ धाम, देवघर में स्थापित है। इस मंदिर के प्रांगण में कुल 12 मंदिर हैं-वैद्यनाथ (शिव), पार्वती, लक्ष्मी, नारायण, तारा, काली, गणेश, सूर्य, सरस्वती, रामचन्द्र, देवी अन्नपूर्णा एवं आनंद मंदिर। यहाँ सावन (जुलाई/अगस्त) में मेला लगता है, जो अत्यंत प्रसिद्ध है और जिसमें देश-विदेश के लाखों हिन्दू श्रद्धालु भाग लेते हैं। सावन मास के प्रथम दिन से मास पर्यन्त शिवभक्त कांवरिया गेरुआ वस्त्र धारण कर 105 किमी. दूर सुल्तानगंज (बिहार) में गंगा से पावन जल लेकर देवघर तक दुर्गम पद यात्रा करते हैं और देवाधिदेव महादेव को जल अर्पण कर उनका आशीष ग्रहण करते हैं।
  14. युगल मंदिर (देवघर): इस मंदिर में राधा-कृष्ण की युगल मूर्ति प्रतिष्ठापित है। इस मंदिर को ‘नौलखा मंदिर’ भी कहा जाता है, क्योंकि इसके निर्माण में नौ लाख रुपये खर्च हुए थे।
  15. तपोवन (देवघर): यह देवघर शहर से 12 किमी. पूर्व में स्थित है। यहाँ भगवान शिव का एक मंदिर है। यहाँ गुफाएँ हैं, जिनमें ब्रह्मचारी लोग निवास करते हैं। तपभूमि होने के कारण इसे तपोवन कहा जाता है। किंवदन्ती है कि माता सीता ने यहाँ तपस्या की थी।
  16. वासुकिनाथ धाम (दुमका): यह दुमका से 25 किमी. की दूरी पर स्थित है। वैद्यनाथ धाम (देवघर) आने वाला प्रत्येक तीर्थयात्री यहाँ आये बगैर अपनी यात्रा पूरी नहीं मानता। वैद्यनाथ धाम से वासुकिनाथ धाम की दूरी 45.20 किमी. है। वासुकिनाथ की कथा समुद्र मंथन से जुड़ी हुई है। समुद्र मंथन में मंदराचल पर्वत को मथानी एवं नागवासुकि को रस्सी बनाया गया था। वासुकिनाथ मंदिर का निर्माण वसाकी तांती ने कराया था, जो हरिजन जाति का था। महाशिवरात्रि के दिन यहाँ विशाल मेला लगता है।
  17. जगन्नाथ मंदिर, जगन्नाथपुर (राँची): यह मंदिर राँची के हटिया क्षेत्र में जगन्नाथपुर नामक स्थान पर स्थित है। इस मंदिर का निर्माण नागवंशी नरेश राम शाह के एक खेरचोमदार ठाकुर ऐनी शाह ने 1691 ई. में कराया  था। इस मंदिर में जगन्नाथ-सुभद्रा-बलराम की मूर्तियाँ प्रतिष्ठापित हैं। यह मंदिर पुरी (उड़ीसा) के जगन्नाथ मंदिर का अनुकरण है। इस मंदिर में भी पुरी की रथ-यात्रा की भाँति रथ-यात्रा का आयोजन किया जाता है।
  18. मदनमोहन मंदिर, बोड़या गाँव (राँची): यह मंदिर राँची शहर से 8 किमी. उत्तर-पूर्व की ओर बोड़या गाँव में स्थित है। इसका निर्माण कार्य नागवंशी नरेश रघुनाथ शाह ने 1665 ई. में आरंभ कराया था। इस मंदिर के निर्माण में 17 वर्ष लगे अर्थात् 1682 ई. में इस मंदिर का निर्माण कार्य पूरा हुआ। इस मंदिर के शिल्पकार का नाम अनिरुद्ध था।
  19. देवी मंदिर, दिवरीग्राम (राँची): यह मंदिर राँची जिले के पूर्वी भाग में स्थित तमाड़ से 3 किमी. दूर दिवरीग्राम में स्थित है। इस मंदिर में सोलहभुजी देवी की प्रतिमा स्थापित है। देवी की प्रतिमा के ऊपर शिव की प्रतिमा एवं अगल-बगल में लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिकेय एवं गणेश की प्रतिमा स्थापित है। इस मंदिर का निर्माण केड़ा (सिंहभूम) के एक जनजातीय प्रमुख ने कराया था।
  20. शिव मंदिर, हारिण (राँची): इस मंदिर का निर्माण मध्य काल में किया गया। कोल विद्रोह (1831-32 ई.) के समय अंग्रेज अधिकारियों ने इस मंदिर पर गोलियां चलाई थी, जिसके चिन्ह अभी भी देखे जा सकते हैं।
  21. सूर्य मंदिर, बुण्डू (राँची): यह मंदिर राँची जिले में राँची-टाटा मार्ग पर बुण्डू में स्थित है। इस मंदिर का निर्माण राँची की एक संस्था ‘संस्कृति विहार’ ने कराया है। इस मंदिर को सूर्य के रथ की आकृति में बनाया गया है।
  22. वेणुसागर मंदिर समूह, वेणु सागर (पश्चिम सिंहभूम): यह मंदिर समूह पश्चिम सिंहभूम में मयूरभंज की सीमा पर वेणुसागर में स्थित है। वेणुसागर वास्तव में एक बड़े तालाब का नाम है, जिसके किनारे-किनारे बहुत से मंदिर स्थापित किये गए हैं, जिनमें जैन, बौद्ध, शैव, शाक्त मूर्तियों को स्थापित किया गया है।

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