झारखण्ड की चित्रकला

झारखण्ड में चित्रकला विशेषकर लोक चित्रकला की समृद्ध परम्परा मिलती है। जंगलों-पहाड़ों के बीच बसने वाले आदिवासी प्रकृति के सहज सौन्दर्य से सदैव अभिभूत रहे हैं। यही कारण है कि उनके आस-पास का प्राकृतिक वातावरण चित्रकला का प्रेरणा स्रोत बना है। आदिवासियों की चित्रकला उनकी सामाजिक मान्यताओं, रीति-रिवाजों, धार्मिक विश्वासों आदि को प्रतिबिम्बित करती है। उनकी चित्रकला का सहज उपलब्ध रूप उनके घरों की सजावट में देखने को मिलता है। वे घरों की दीवारों पर चिकनी मिट्टी का लेप लगाकर उन्हें मिट्टी व वनस्पतियों से प्राप्त रंगों से विभिन्न प्रकार की आकृतियाँ एवं ज्यामितिय डिजाइन बनाते हैं। घर की लिपाई-पुताई एवं सजावट का कार्य प्रायः घर की स्त्रियाँ विशेषकर कुँआरी लड़कियाँ करती हैं।

झारखण्ड की चित्रकला के प्रमुख रूप इस प्रकार हैं

  1. जादोपटिया चित्रकारी:

    • जादोपटिया शब्द दो शब्दों-‘जादो’ (चित्रकार) एवं ‘पटिया’ (कपड़ा या कागज के छोटे-छोटे टुकड़े को जोड़कर बनाया जाने वाला चित्रफलक) के मेल से बना है। इस प्रकार जादोपटिया चित्रकारी का अर्थ है-चित्रकार द्वारा कपड़ा या कागज के छोटे-छोटे टुकड़ों को जोड़कर बनाये जाने वाले पटियों पर की जाने वाली चित्रकारी। यह चित्रकारी संथालों (विशेषतः झारखण्ड-बंगाल के सीमावर्ती क्षेत्र के संथालों) में प्रचलित है। संथाल समाज के मिथकों पर आधारित इस लोक चित्रकला में संथालों की लोक-गाथाओं, सामाजिक रीति-रिवाजों, धार्मिक विश्वासों, नैतिक मान्यताओं को दर्शाया जाता है। इस चित्रकारी में सामान्यतः कपड़ों या कागज के छोटे-छोटे टुकड़ों को जोड़कर बनाये जाने वाले पटों पर चित्र अंकित किये जाते हैं। प्रत्येक पट 15 से 20 फीट तक चौड़ा होता है और इन पर 4 से 16 तक चित्र बनाये जाते हैं। चित्र बनाने में मुख्यतः लाल, हरा, पीला, भूरा एवं काले रंगों का प्रयोग किया जाता है। इन चित्रों की रचना करने वाले को संथाली भाषा में ‘जादो’ कहा जाता है। जादोपटिया चित्रकारी वर्तमान पीढ़ी को अपनी पिछली पीढ़ी से विरासत में मिलती रही है। दुर्भाग्य से इस विरासत को पीढ़ी-दर- पीढ़ी ले जाने की प्रवृत्ति का ह्रास हो रहा है। परिणामस्वरूप जादोपटिया चित्रकारी लुप्त होने के कगार पर पहुँच गई है। इस चित्रकारी को संरक्षण दिये जाने की आवश्यकता है।
  2. कोहबर चित्रकारी:

    • कोहबर शब्द फारसी भाषा के शब्द ‘कोह’ (गुफा) एवं हिन्दी भाषा के शब्द ‘वर’ (दूल्हा या विवाहित युगल) से मिलकर बना है। इस प्रकार कोहबर का अर्थ है-गुफा में विवाहित जोड़ा। प्रत्येक विवाहित महिला अपने पति के घर कोहबर कला का चित्रण करती है। यह चित्रकारी विवाह के मौसम में जनवरी से जून महीने तक की जाती है। इसमें घर-आंगन में विभिन्न ज्यामितीय आकृतियों में फूल-पत्ती, पेड़-पौधे एवं नर-नारी प्रतीकों का चित्रांकन किया जाता है। चित्रकला की यह लोक शैली विशेष रूप से बिरहोर जनजाति में प्रचलित है। आज भी हजारीबाग जिला एवं आस-पास के क्षेत्रों में बिरहोर जनजाति के घरों (कुम्बास) की दीवारों पर मिट्टी का लेप चढ़ाकर मिट्टी के रंगों से बनी कोहबर चित्रकारी को देखा जा सकता है।
  3. सोहराय चित्रकारी:

    • यह सोहराय पर्व से जुड़ी चित्रकारी है। सोहराय पर्व पशुओं को श्रद्धा अर्पित करने का पर्व है। यह पर्व दीवाली के एक दिन बाद मनाया जाता है। सोहराय चित्रकारी वर्षा ऋतु के बाद घरों की लिपाई-पुताई से शुरू होती है। कोहबर चित्रकारी की तरह सोहराय चित्रकारी भी जनजातीय औरतों में परम्परागत हुनर के कारण जिन्दा है। कोहबर चित्रकारी एवं सोहराय चित्रकारी में मुख्य अंतर प्रतीक चयन में देखने को मिलती है। कोहबर चित्रकारी में सिकी (देवी) का विशेष चित्रण मिलता है जबकि सोहराय चित्रकारी में कला के देवता प्रजापति का या पशुपति का। पशुपति को सांढ़ की पीठ पर खड़ा चित्रित किया जाता है। कुल मिलाकर कोहबर चित्रकारी में स्त्री-पुरुष संबंधों के विविध पक्षों का चित्रण किया जाता है, जबकि सोहराय चित्रकारी में जंगली जीव-जंतुओं, पशु-पक्षियों एवं पेड़-पौधों का चित्रांकन किया जाता है। चित्रण शैली के लिहाज से सोहराय की दो अलग-अलग शैलियाँ मिलती हैं-कुर्मी सोहराय एवं मंझू सोहराय।

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