झारखण्ड के प्रमुख किले / ऐतिहासिक स्थल

  1. पलामू किला, बेतला राष्ट्रीय उद्यान के निकट (लातेहार): यह किला लातेहार जिले में बेतला राष्ट्रीय उद्यान से 5 किमी. दूर औरंगा नदी पर स्थित है। इसका निर्माण चेरोवंशी शासकों ने अपनी राजधानी नगर पलामू में कराया था। यहाँ दो किले हैं-पुराना किला एवं नया किला। ये दोनों किले संयुक्त रूप से पलामू किला के नाम से प्रसिद्ध हैं। ये किले अपने समय में अभेद्य समझे जाते थे। पुराने और नये किले के निर्माण में बहुत दिनों का अंतर नहीं है। पुराने किले का निर्माण चेरोवंशी शासक प्रताप राय (मुगल बादशाह शाहजहाँ का समकालीन) ने कराया था। नये किले का निर्माण चेरोवंशी शासक मेदिनी राय 1658-74 ई. (मुगल बादशाह औरंगजेब का समकालीन) ने कराया था। नये किले का ‘नागपुरी दरवाजा’ (नागपुरी फाटक) अपनी आकर्षक स्थापत्य शैली के कारण दर्शनीय है। दरवाजे की ऊँचाई 40 फीट (12 मीटर) एवं चौड़ाई 15 फीट (4.5 मीटर) है। किले के भीतरी भाग में 4 दो मंजिले महल, अनेक मंदिर एवं 1 मस्जिद के अवशेष मिलते हैं। यह मस्जिद तीन गुम्बदों वाली है और इसका निर्माण 1661 ई. में बिहार के तत्कालीन मुगल सूबेदार दाउद खाँ ने पलामू विजय के बाद कराया था।
  2. नारायणपुर का किला, नावागढ़ (लातेहार): यह किला लातेहार जिले में लातेहार से 8 किमी. दूर दक्षिण नावागढ़ में स्थित है। इसका निर्माण चेरोवंशी शासक भागवत राय के लेखापाल जाज दास ने कराया था।
  3. शाहपुर चाँदनी, मेदिनीनगर (पलामू): वास्तव में यह एक किले का नाम है। यह पलामू जिला में डाल्टेनगंज से पश्चिम द. कोयल नदी के पश्चिमी तट पर स्थित है। इस किले का निर्माण चेरोवंशी शासक गोपाल राय ने 1772 ई. में कराया था।
  4. विश्रामपुर का किला, विश्रामपुर (पलामू): यह किला पलामू जिले के विश्रामपुर में स्थित है। इस किले का निर्माण विश्रामपुर के चेरोवंशी राजा ने कराया था। किले के निकट एक मंदिर है। किले और मंदिर के निर्माण में लगभग 9 वर्ष का समय लगा था।
  5. रोहिल्लों का किला, अलीनगर (पलामू): यह किला पलामू जिले में जपला से 10 किमी. दूर अलीनगर में स्थित है। चूँकि इस किले का निर्माण रोहिल्ला सरदार मुजफ्फर खाँ ने कराया था, इसलिए इसे ‘रोहिल्लों का किला’ के नाम से जाना जाता है। यह किला त्रिभुजाकार है।
  6. नागफेनी का राजभवन, नागफेनीगाँव (गुमला): यह राजभवन गुमला जिले के सिसई थाने के नागफेनी गाँव में स्थित है। इस राजभवन का निर्माण 1704 ई. के आस-पास आरंभ हुआ लेकिन पूरा न हो सका। किंवदन्ती है कि कोई राजा यहाँ पर महल बनवा रहा था, परन्तु महल बनने से पहले ही उसकी मृत्यु हो गई। हालांकि यहाँ पर एक पत्थर पर राजा, उसकी सात रानियों एवं एक कुत्ते का चित्र मिलता है, लेकिन इस राजा की पहचान अभी तक नहीं की जा सकी है। एक इतिहासविद् ने नागफनी को ‘नागों का शहर’ बताया है।
  7. तिलमी का किला, तिलमी गाँव (खूटी): यह किला खूटी जिले के कर्रा प्रखण्ड के तिलमा गाँव में स्थित है। इस किले का निर्माण 1737 ई. में अकबर नामक एक नागवंशी ठाकुर (सामंत) ने मोक्ष प्राप्ति के उद्देश्य से कराया था।
  8. पालकोट का राजमहल, पालकोट (राँची): यह महल राँची जिले के पालकोट में स्थित है। नागवंशी शासक यदुनाथ शाह (1715-24 ई.) ने दोइसा के स्थान पर पालकोट को अपनी राजधानी बनाया और यहाँ अनेक भवन बनवाये। इनमें से एक महल पालकोट का राजमहल बचा हुआ है और शेष खण्डहर में बदल गया है। यह राजमहल स्थापत्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है।
  9. रातू का राजमहल, रातू (राँची): यह महल राँची जिले के रातू में स्थित है। इसका निर्माण नागवंशी महाराज ने कराया था। इस राजमहल की विशालता दर्शनीय है।
  10. केसनागढ़ का किला, केसनागढ़ (पश्चिम सिंहभूम): यह किला प. सिंहभूम जिले में चाईबासा से दक्षिण-पूर्व में केसनागढ़ में स्थित है।
  11. जगन्नाथपुर का किला, जगन्नाथपुर (पश्चिम सिंहभूम): यह किला पश्चिम सिंहभूम जिले में चाईबासा से 38 किमी. दूर जगन्नाथपुर में स्थित है। इसका निर्माण पोरहाट नरेश जगन्नाथ सिंह ने कराया था।
  12. जैंतगढ़ का किला, जैंतगढ़ (पश्चिम सिंहभूम): यह किला पश्चिम सिंहभूम जिले में चाईबासा से 55 किमी. दक्षिण वैतरणी नदी के किनारे जैतगढ़ में स्थित है। इसका निर्माण पोरहाट नरेश काला अर्जुन सिंह ने कराया था।
  13. चक्रधरपुर की राजवाड़ी, चक्रधरपुर (पश्चिम सिंहभूम): यह राजवाड़ी पश्चिम सिंहभूम जिले के चक्रधरपुर में स्थित है। इसका निर्माण 1910-20 ई. के दौरान नरपति सिंह (राजा अर्जुन सिंह का पुत्र) ने कराया था। यह राजबाड़ी ईंटों से निर्मित है। तीन मंजिलों की संरचना वाले इस राजप्रासाद का रंगमहल अपनी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है। बाद में राजा नरपति सिंह की पुत्री शशांक मंजरी ने इसे बेच दिया।
  14. चैनपुर महल (पलामू): यह महल पलामू जिले के मुख्यालय मेदिनीनगर (पूर्व नाम-डाल्टेनगंज) में कोयल नदी के किनारे स्थित है। इस महल का निर्माण चेरो राजा के राजपूत दीवान पूरणमल के वंशजों ने कराया था।
  15. तेलियागढ़ राजमहल पहाड़ी (साहेबगंज): यह इतिहास-प्रसिद्ध किला साहेबगंज के निकट राजमहल पहाड़ी पर स्थित है। इसे ‘बंगाल का प्रवेश द्व पर’ कहा जाता था। सूर शासक शेरशाह ने 1535 ई. में बंगाल के सुल्तान गयासुद्दीन महमूद को यहाँ पराजित किया था। अब यह किला खण्डहर बन चुका है और इसकी केवल एक दीवार बची हुई है।
  16. कुण्डा का किला, कुण्डा (चतरा): यह किला चतरा जिले के कण्डा में स्थित है। इसका निर्माण चेरोवंशी राजपरिवार ने कराया था।
  17. पंचकोट का किला, पंचेत पहाड़ (धनबाद): यह किला धनबाद जिले में बराबर से 16 किमी. दूर पंचेत पहाड़ के दक्षिण-पूर्वी ढलान पर स्थित है। इसका निर्माण पंचेत के गोवंशी नरेश गोमुखी ने कराया था। पाँच कोटों (दीवारों) से घिरे होने के कारण इस किले का नाम ‘पंचकोट’ पड़ा।
  18. झरियागढ़ महल, झरिया (धनबाद): यह महल धनबाद जिले में स्थित है। इसका निर्माण झरिया नरेश ने अपनी राजधानी झरियागढ़ में कराया था। झरिया नरेश ने अपने मुख्यालय कतरासगढ़ में भी कुछ महल बनवाये थे, जिनके अवशेष मिलते हैं।
  19. रामगढ़ का किला (रामगढ़): यह किला रामगढ़ जिले के रामगढ़ में स्थित है। इसका निर्माण रामगढ़ नरेश सबल राय ने कराया था। इस किले की बनावट मुगल शैली से प्रभावित है।
  20. बादम का किला (हजारीबाग): यह किला हजारीबाग जिले के हजारीबाग शहर से 32 किमी. दक्षिण-पश्चिम में बसे बादम में स्थित है। इसका निर्माण रामगढ़ नरेश हेमंत सिंह ने 1642 ई. में कराया था। हेमंत सिंह ने यहाँ एक शिव मंदिर का भी निर्माण कराया था।
  21. पद्मा का किला, पद्मा (हजारीबाग): यह किला हजारीबाग जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग 33 के किनारे पदमा नामक स्थान पर स्थित है। इसका निर्माण पदमा के महाराज ने कराया था। सम्प्रति इस किले को राज्य सरकार ने पुलिस प्रशिक्षण केन्द्र (Police Training Centre) बना दिया है।
  22. नवरतनगढ़/दोइसागढ़, नगरग्राम (गुमला): यह महल गुमला जिले के नगरग्राम के निकट स्थित है। इस महल का निर्माण नागवंशी राजा दुर्जनशाल ने तब कराया था, जब उनकी राजधानी दोइसा थी। ऐतिहासिक प्रमाणों (जैसे-राँची, गजेटियर आदि) के आधार पर यह महल मूलतः पंचमंजिला था और प्रत्येक मंजिल में 9 कमरे थे। अब केवल तीन मंजिल ही शेष बचे हैं। हालांकि जनश्रुति है कि यह महल नौमंजिला था, जिनमें से 6 मंजिल जमीन में धंस गया। इस महल के विशेष आकर्षण का केन्द्र इसका ‘खजाना घर’ है। संपूर्ण महल कंगूरा शैली में दांतेदार परकोटों से घिरा है।

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