झारखण्ड के पर्व-त्योहार

टुसू पर्व – मकर संक्रांति के अवसर पर सिंहभूम जिले के आदिवासी विशेषकर महतो समुदाय के लोग बड़ी धूमधाम से सूर्य-पूजा का यह पर्व मनाते हैं। समाज की कन्याएं परंपरागत तरीके से मांदर की थाप पर ग्राम और घरों में टुसू प्रतिमा की स्थापना करती हैं।  समाज के युवा विसर्जन जुलूस के लिए लकड़ी, बांस और कागज से रंग-बिरंगे लंबे चौड़ल(ताजिया रूपी निशान) बनाते हैं।

बा परब पर्व – यह संथालियों का प्रसिद्ध पर्व है, जो मार्च के महीने में तीन दिनों के लिए जमशेदपुर में मनाया जाता है।

सरहुल – यह आदिवासी सम्प्रदाय का प्रमुख त्योहार है। यह पर्व कृषि कार्य प्रारंभ करने से पूर्व मनाया जाता है। इसमें सरना (सखुआ की डाल) की पूजा की जाती है। पुरोहित पूजा कराता है। इस पर्व के दिन दूर-दूर रहने वाले आदिवासी भी अपने घर चले जाते हैं तथा लड़कियाँ भी ससुराल से अपने मायके आ जाती हैं। घरों को साफ-सुथरा करके लिपाई-पुताई की जाती है तथा दीवारों पर रंग-बिरंगे चित्र बनाकर उन्हें आकर्षक बनाया जाता है। यह पर्व बड़े उत्साह और उमंग से आदिवासी समुदाय के लोग मनाते हैं। इस पर्व को मुण्डा जनजाति ‘सरहुल’, उरांव जनजाति ‘खद्दी’, संथाल जनजाति ‘बा परब’ एवं खड़िया जनजाति ‘जकोर’ कहते हैं।

मण्डा – यह पर्व वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया (अक्षय तृतीया) को आरंभ होता है। इसमें महादेव (शिव) की पूजा महादेव मण्डा में होती है। यह पर्व आदिवासी और सदान दोनों में समान रूप से प्रचलित है। इस व्रत में उपवास रखने वाले पुरुष व्रती को ‘भगता’ एवं महिला व्रती को ‘सोखताईन’ कहा जाता है। जागरण की रात भगताओं को धूप-धुवन की अग्निशिखा के ऊपर उल्टा लटका कर झुलाया जाता है, जिसे ‘धुंआसी‘ कहा जाता है। फिर दहकते अंगारों पर उन्हें चलना होता है, जिसे ‘फूलखूदी’ कहा जाता है। दूसरे दिन भगतिया लोग चड़क डांग में झूलते हैं। कहीं-कहीं तो इनकी पीठ पर लोहे के बने हुए अंकुश से छेद किया जाता है। यह अंकुश एक रस्सी के सहारे पीठ की चमड़ी से बिंधा हुआ रहता है। जब तक वह झूलता रहता है, तब तक उसकी माँ या बहन उस खुंटे के नीचे शिव की आराधना करती रहती हैं। झारखण्ड में यह महादेव की सबसे कठोर पूजा मानी जाती है।

धान बुनी – मण्डा पर्व के दिन किसान नयी धोती धारण कर खेत में जुताई करता है तथा बाँस की नयी टोकरी में धान ले जाकर बोता है। वस्तुतः एक-दो मुट्ठी बोकर शुभ मुहूर्त में धान बुआई का शुभारंभ किया जाता है। इसी को ‘धान बुनी’ कहा जाता है। यह पर्व आदिवासी एवं सदान दोनों मनाते हैं।

आषाढी पूजा – यह पर्व आदिवासी एवं सदान दोनों में प्रचलित है। यह पर्व आषाढ़ महीने में मनाया जाता है। इसमें अखरा या घर-आंगन में काली पाठी (बकरी) की बलि दी जाती है तथा हंडिया का ‘तपान’ चढ़ाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस पर्व को मनाने से गाँव में चेचक जैसी महामारी पास नहीं फटकती।

सावनी पूजा – यह पर्व सावन महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को मनाया जाता है। इसमें देवी की पूजा बकरे की बलि देकर एवं हड़िया तपान चढ़ाकर की जाती है।

बहुरा – यह पर्व ‘राइज बहरलक’ नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व भादो महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाता है। यह पर्व अच्छी वर्षा एवं संतान प्राप्ति के लिए महिलाओं द्वारा मनाया जाता है।

कदलेटा – यह पर्व भादो महीने में करमा पर्व से पहले मनाया जाता है। यह मेढ़की भूत को शांत करने के लिए मनाया जाता है। पाहन हंडिया उठाता है, जिसके लिए वह पूरे गाँव से चावल लेता है। अखरा में भेलवा, साल, केन्दु की डालियाँ रखकर पूजा की जाती है। मुर्गी की बलि दी जाती है, जो बाद में प्रसाद के रूप में सभी में वितरित की जाती है। पूजा के बाद अखरा से डालियों को लेकर लोग अपने-अपने खेतों में गाड़ते हैं। ऐसी मान्यता है कि ऐसा करने से फसल रोगमुक्त रहती है।

कर्मा – यह पर्व मुख्यतः उराव आदिवासी संप्रदाय के लोग भाद्रमास की शुक्ल पक्ष की एकादशी को बड़े उत्साह से मनाते हैं। कुछ गैर-आदिवासी हिन्दू भी इस पर्व को मनाते हैं। पूजा के दिन 24 घंटे का उपवास रखते हैं। नृत्य के मैदान (अखरा) में करम वृक्ष की डाली गाड़ी जाती है और रात भर नृत्य और गीत का कार्यक्रम चलता है। गीत के माध्यम से कर्मा-धर्मा की कहानी को कहा जाता है।

फगुआ – हिन्दुओं की ‘होली’ या ‘फाग’ के समान ही झारखण्ड में ‘फगुआ’ पर्व फागुन महीने की अंतिम पूर्णिमा एवं चैत्र के प्रथम दिवस को मनाया जाता है। फगुआ में गैर-जनजातीय लोग संवत जलाते वक्त बलि नहीं चढ़ाते हैं, जबकि जनजातीय लोग पाहन के साथ सेमल या अरण्डी की डाली गाड़कर संवत जलाते हैं और मुर्गे की बलि एवं हंडिया का तपान चढ़ाते हैं। दूसरे दिन धुरखेल मनाया जाता है। इस दिन लोग जंगलों में शिकार खेलने जाते हैं और लौटने पर शिकारियों के पांव धोए जाते हैं।

बहुरा – भादो महीने की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को मनाये जाने वाले इस पर्व को अच्छी वर्षा एवं संतान प्राप्ति के लिए महिलाओं द्वारा मनाया जाता है। इसे ‘राइज बहरलक’ नाम से भी जाना जाता है।

नवाखानी – करमा पर्व के बाद नवान्न अर्थात् नया अन्न ग्रहण करना ही नवाखानी पर्व के नाम से जाना जाता है। करमा पर्व के बाद नया अनाज गोंदली-गोड़ा धान पक जाता है। इसे घर लाकर इसका चिवड़ा बनाया जाता है और उसे देव-पितरों को अर्पित करने के बाद दही के साथ ग्रहण किया जाता है।

सोहराय – झारखण्ड में एक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में प्रसिद्ध इस पर्व का उद्देश्य पशु धन में वृद्धि और सामूहिक जीवनयापन की कामना आदि है। – पशुओं की श्रद्धा को अर्पित यह पर्व कार्तिक महीने की अमावस्या को मनाया जाता है। पांच दिनों के इस पर्व में पहले दिन स्नान में ‘गोड टाण्डी’ (बथान) में जोहर एरा का आह्वान किया जाता है व गो पूजन होता है। दूसरे दिन ‘गोहाल पूजा’ होती है, जिसमें गोशाला को साफ-सुथरा किया जाता है और गायों को नहलाया जाता है। तीसरे दिन ‘सण्टाऊ’ होता है, जिसमें पशुओं को धान की बाली एवं मालाओं से सजाकर ‘खुटते’ हैं। चौथे दिन ‘जाले’ होता है, जिसमें युवक-युवतियों का दल गृहस्थों के यहाँ से चावल, दाल, नमक, मसाला आदि एकत्र करते हैं। पांचवें दिन एकत्र अन्न से खिचड़ी बनती है और सहभोज दिया जाता है। यह पर्व मुख्यतः संथाल मनाते हैं।

मागे/माघे पर्व – यह पर्व माघ महीने में मनाया जाता है। इस दिन धांगर (कृषि मजदूर/खेतिहर मजदूर) की अवधि पूरी होती है। इस दिन कृषि वर्ष का अंत समझा जाता है तथा नये कृषि वर्ष का आरंभ किया जाता है। रोटी-पीठा आदि खिलाकर तयशुदा मूल्य चुका कर धांगर को विदा कर दिया जाता है। इस तरह यह धांगरों की विदाई का पर्व है।

चाण्डी पर्व – यह पर्व माघ महीने की पूर्णिमा को उराँवों के द्वारा मनाया जाता है। इसमें महिलाएँ भाग नहीं लेती हैं। पुरुष ही चाण्डी स्थल में देवी की पूजा करते हैं। पूजा में एक लाल मुर्गी तथा एक सफेद बकरा बलि के रूप में चढ़ाया जाता है। जिस परिवार में कोई गर्भवती महिला होती है, उस परिवार का पुरुष सदस्य इस पूजा में भाग नहीं लेता है।

जनी शिकार – महिलाओं के द्वारा पुरुषों का वेश धारण कर शिकार खेलने की प्रथा को ‘जनी शिकार’ कहा जाता है। यह झारखण्ड राज्य की अनूठी विशेषता है। इस तरह की प्रथा भारत के सिर्फ झारखण्ड राज्य में ही मिलती है और किसी राज्य में नहीं। यह प्रति 12 वर्ष में एक बार मनाया जाने वाला महिलाओं का सामूहिक त्योहार है। इसमें महिलाएँ पुरुष वेश धारण कर परम्परागत हथियारों से लैस होकर आस-पास के गाँवों में शिकार खेलने निकलती हैं और रास्ते में बकरी, भेड़, सूअर, हंस, बत्तख जो भी मिलता है, उसका शिकार करती हैं। शिकार किये गए पशु-पक्षियों को अखरा में लाकर पकाया जाता है। फिर सभी खाते-पीते हैं और नाचते-गाते हैं।

सूर्याही पूजा – अगहन महीने में कुछ जनजातियों द्वारा की जाने वाली इस पूजा में सफेद मुर्गे की बलि दी जाती है एवं हड़िया का तपान चढ़ाया जाता है। किसी उच्च भूमि (टांड़) में मनाई जाने वाली इस पूजा में केवल पुरुष भाग लेते हैं।

जितिया – अश्विन मास में कृष्ण पक्ष अष्टमी को माताएँ अपने पुत्र के दीर्घ जीवन और सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं, जिसे जितिया कहते हैं।

देशाउली – यह भी ‘जनी शिकार’ की तरह 12 वर्ष में एक बार मनाया जाने वाला त्योहार है। इसमें बड़ पहाड़ी या मरांग बुरु देवता (सबसे बड़ा देवता/ पर्वत देवता) को काड़ा (भैंसा) की बलि दी जाती है। यह बलि भुईंहरदारों की ओर से दिया जाता है। इस बलि को वहीं जमीन में गाड़ दिया जाता है।

जनजातियों के पर्व-त्योहार

क्र. जनजाति        पर्व-त्योहार

1. संथाल : बा-परब (चैत महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया को; संथालों का बसंतोत्सव), एरोक (आषाढ़ महीने में; बीज बोये जाने के समय मनाया जाने वाला), हरियाड़ (सावन महीने में; धान में हरियाली आने पर अच्छी फसल के लिए), सोहराय (कार्तिक अमावस्या को; पशुओं के सम्मान में मनाया जाने वाला), साकरात (पूस महीने में; घर-परिवार की कुशलता के लिए), भागसिम (माघ महीने में; गाँव के ओहदेदार को आगामी वर्ष के लिए ओहदे की स्वीकृति) एवं बाहा (फागुन महीने में; शुद्ध जल से खेली जाने वाली होली)।

2. उराँव : खद्दी (चैत महीने की शुक्ल पक्ष की तृतीया को; उराँवों का बसंतोत्सव), जतरा (जेठ, अगहन व कार्तिक महीने में; धर्मेश के सम्मानार्थ), करमा (भादो महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी को; करमा गोसाईं को समर्पित), सोहराय (कार्तिक अमावस्या को; पशुओं के सम्मान में मनाया जाने वाला), माघे पर्व (माघ महीने में) एवं फागु पर्व (फागुन महीने में, हिन्दुओं की होली के समतुल्य पर्व)।

3. मुण्डा : सरहुल (चैत महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया को; मुण्डाओं का बसंतोत्सव), करमा (भादो महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी को; करमा गोसाईं को समर्पित), सोहराय (कार्तिक अमावस्या को; पशुओं के सम्मान में मनाया जाने वाला), बुरु पर्व (अगहन महीने में; पर्वत देवता को समर्पित), माघे पर्व (माघ महीने में) एवं फागु पर्व (फागुन महीने में; हिन्दुओं की होली के समतुल्य पर्व)।

4. हो : उमुरी, होरो, जोमनना, कोलोम, माघी एवं बाहा (अधिकांश पर्व कृषि-कर्म से संबंधित)।

5. खरवार : सरहुल, करमा, नवाखानी, महावीरी झण्डा, दशहरा, दीवाली, छठ, होली आदि।

6. लोहरा : विश्वकर्मा पूजा, सोहराय, दीपावली, छठ, फगुआ आदि।

7. खड़िया : जंकोर (खड़ियाओं का बसंतोत्सव), बन्दई (कार्तिक पूर्णिमा को), करमा, बिइना (बाऊ बिड्बिड्), कदलेटा, जोओडेम (नवाखानी), रथ-यात्रा, दिमतङ पूजा (गोशाला पूजा), गिडिड पूजा/बोडोलेरड पूजा, पोनोमोसोर पूजा, पितरु पूजा, भडन्दा पूजा/बड़ पहाड़ी पूजा, दोरहो डुबोओ पूजा आदि। 8. भूमिज चैत पूजा, धुला पूजा, ग्राम ठाकुर पूजा, काली पूजा, गोराई ठाकुर पूजा, करम पूजा आदि।

9. माहली : सूरजी देवी पूजा, मनसा पूजा, छठ पूजा, दुर्गा पूजा, दीवाली, संक्रांति (टुसू), होली आदि।

10. माल : आड़या, गांगी आड़या (भादो महीने में, नई फसल कटने पहाड़िया पर), ओसरो आड़या/घंघरा पूजा (कार्तिक महीने में, घंघरा बीचे फसल कटने पर), पुनु आड़या (पूस महीने में, बाजरा फसल कटने पर), माघी पूजा आदि।

11. गोंड : फरसा पेन, मतिया, बूढ़देव आदि।

12. किसान : सरहुल, करमा, नवाखानी, सोहराय, काली पूजा, माघे, फगुआ आदि।

13. बंजारा : बंजारा देवी की पूजा आदि।

14. बिंझिया : सरहुल, करमा, सोहराय, विंध्यवासिनी देवी, जगन्नाथ पूजा (रथ-यात्रा), चरदी देवी, ग्राम श्री, दशहरा, दीवाली, होली आदि।

15. बेदिया : सरहुल, करमा, सोहराय, दशहरा, दीवाली, छठ, मकर स्नान आदि।

16. कावर : खूँट पूजा (आषाढ़ में), अन्य सनातन पर्व-त्योहार ।

17. कोल :  सिंग बोंगा पूजा, बजरंग बली पूजा, दुर्गा पूजा, काली पूजा आदि।

18. चेरो : दुर्गा पूजा, काली पूजा, छठ, सोहराय, होली आदि।

19. चीक : बड़ पहाड़ी, सूर्याही पूजा, देवी माय, सरहुल, सोहराय, बड़ाइक जितिया, करमा आदि।

20. सौरिया : बीचे आड़या, गांगी आड़या, ओसरा आड़या, पुनु आड़या, । पहाड़िया कर्रा पूजा, सलियानी पूजा आदि।

21. करमाली : सरहुल, करमा, सोहराय, नवाखानी; दुर्गा पूजा, दीवाली, छठ, होली आदि।

22. कोरा : सवा लाख की पूजा (एक लाख पच्चीस हजार देवी-देवताओं की पूजा), बागेश्वर, भगवती दाय, काली माय, नवाखानी, सोहराय आदि।

23. परहिया : धरती पूजा, सरहुल, करमा, सोहराय आदि।

24. कोरबा : पाट देवता, ग्राम देवता, मति, सर्प पूजा आदि।

25. असुर : सिंग बोंगा पूजा, मराङ बोंगा पूजा, सरहुल, नवाखानी, सोहराय, कथ-डेली, सरही, कटुसी (लोहा गलाने के उद्योग की उन्नति हेतु) आदि।

26. गोड़ाइत : देवी माय, पुरुबिया, मति आदि।

27. बिरहोर : कांदो बोंगा, ओरा बोंगा, हापराम बोंगा, टण्डा बोंगा पूजा आदि।

28. बिरझिया : सिंग बोंगा, मराङ बुरु, सरहुल, काठ डेली, फगुआ आदि।

29. बैगा : सरहुल, नवानंद (नवाखानी), महावीरी झंडा, दशहरा, दीवाली, छठ, होली आदि।

30. सबर : महावीरी झंडा, मनसा पूजा, दुर्गा पूजा, काली पूजा आदि।

31. खोंड : सरहुल, करमा, नवाखानी, सोहराय, रामनवमी, दशहरा, दीवाली, छठ, फगुआ आदि।

32. बथुड़ी : रास पूर्णिमा, सारोल पूजा, आषाढ़ी पूजा, धुलिया पूजा, शीतला पूजा, मकर संक्रांति, बंड पूजा, शिव चतुर्दशी आदि।

हिन्दुओं के पर्व-त्योहार

क्र.    पर्व-त्योहार       तिथि (उपलक्ष्य)

1. शीतला अष्टमी : चैत महीने की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को (चेचक की देवी शीतला माता के सम्मानार्थ स्त्रियों द्वारा मनाया जाने वाला)

2. रामनवमी : चैत महीने की शुक्ल पक्ष की नवमी को (भगवान राम के जन्म-दिवस के उपलक्ष्य में)

3. हनुमान जयंती : चैत महीने की पूर्णिमा को (भगवान हनुमान के जन्म-दिवस के उपलक्ष्य में)

4. तीज : सावन महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया को विवाहित स्त्रियों द्वारा अपने पति की सलामती हेतु भगवान शिव की आराधना

5. नाग पंचमी : सावन महीने की शुक्ल पक्ष की पंचमी को (नाग एवं अन्य सर्पो से जीवन रक्षा के लिए की जाने वाली पूजा)

6. रक्षा-बंधन : सावन महीने की पूर्णिमा को (भाई-बहन का पवित्र त्योहार)

7. गणेश चतुर्थी : भादो महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को (भगवान गणेश की आराधना का पर्व)

8. कृष्ण जन्माष्टमी : भादो महीने की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को (भगवान कृष्ण के जन्म-दिवस के उपलक्ष्य में)

9. दुर्गा पूजा : आश्विन महीने के शुक्ल पक्ष के प्रथम नौ दिन-प्रथमा से नवमी तक चलने वाला (देवी दुर्गा की आराधना का पर्व)

10. विजयादशमी : आश्विन महीने के शुक्ल पक्ष की दशमी को (भगवान राम की रावण पर विजय के उपलक्ष्य में; यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत, असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक है।)

11. महाशिवरात्रि : फागुन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को (भगवान शिव और पार्वती के विवाहोत्सव के उपलक्ष्य में)

12. होली : फागुन महीने की पूर्णिमा को (अबीर-गुलाल एवं रंगों का पर्व)

13. जीतिया पूजा : आश्विन महीने में पुत्रों की सुरक्षा व समृद्धि के लिए पुत्रवती माताओं द्वारा (जीमूतवाहन मनाया जाने वाला पर्व) पूजा।

14. दीपावली : कार्तिक महीने की अमावस्या को (भगवान राम के 14 वर्षों के वनवास के बाद अयोध्या वापसी के उपलक्ष्य में)

15. छठ : कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को (सूर्य की आराधना का पर्व)

16. मकर संक्रांति : माघ महीने में 14 जनवरी को (सूर्य के धनु राशि से मकर राशि पर जाने के उपलक्ष्य में)

17. वसंत पंचमी : माघ महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी को (विद्या की देवी सरस्वती की आराधना का पर्व)

मुस्लिमों के पर्व-त्योहार

क्र. पर्व-त्योहार तिथि (उपलक्ष्य)

1. मुहर्रम : हिजरी संवत् (मुस्लिम पंचांग) के पहले महीने-मोहर्रम-उल-हराम-में मनाया जाने वाला शोक पर्व (हजरत मुहम्मद की पुत्री फातिमा एवं दामाद हजरत अली के बेटों-हसन व हुसैन-के कर्बला में शहीद होने की पुण्य स्मृति में)

2. मिलाद-उन-नबी(मिलाद-ए-शरीफ) / बारा वफात : हिजरी संवत् के तीसरे महीने (रबी-उल-अव्वल) की 12वीं तारीख को (हजरत मुहम्मद के जन्म-दिवस के उपलक्ष्य में)। हजरत मुहम्मद के पुण्य-दिवस के उपलक्ष्य में बारा-वफात भी इसी दिन मनाया जाता है।

3. शब-ए-वरात : हिजरी संवत् के आठवें महीने (शाबान) की 15वीं तारीख को (ऐसी मान्यता है कि इस रात को अल्लाह आगामी वर्ष की किस्मत लिखता है; सिर्फ भारतीय मुसलमानों में प्रचलित त्योहार)

4. रमजान : हिजरी संवत् के 9वें महीने (रमजान-उल-मुबारक) में पूरे महीने (यानी 30 दिन तक) चलने वाला उपवास व्रत; दिन भर अन्न-जल ग्रहण न करना रोजा कहलाता है और शाम को रोजा खोला जाता है जिसे ‘इफ्तार’ कहते हैं। रमजान महीने के 30वें दिन रोजा रखने के उपरांत अगले महीने शव्वाल की पहली तारीख को ईद मनाई जाती है। 

5. ईद/ईद-उल-फित्र/ ईद-ए-रमजान : हिजरी संवत् के 10वें महीने (शव्वाल) की पहली  तारीख को हजरत मुहम्मद पर कुरान शरीफ के नाजिल होने (ज्ञान प्राप्ति) की याद में मनाया जाने वाला खुशियों का त्योहार)

6. बकरीद/ईद-उल-अजहा/ईद-ए-कुरबान : हिजरी संवत के 12वें महीने (जिल-हिज्ज) की 10वीं तारीख को (हजरत इब्राहिम द्वारा ईश्वरीय  आदेश से अपने प्रिय शिष्य इस्माइल को कुर्बान करने को तैयार हो जाने और उसके पुनर्जीवित हो उठने की स्मृति में)

ईसाइयों के पर्व-त्योहार

क्र. पर्व-त्योहार    तिथि (उपलक्ष्य)

1. क्रिसमस : प्रति वर्ष 25 दिसम्बर को (ईसा मसीह के जन्म-दिवस के उपलक्ष्य में मनाया जाने वाला खुशियों का त्योहार)

2. गुड फ्राइडे : प्रति वर्ष मार्च/अप्रैल में (ईसा मसीह को सलीब पर लटकाये जाने (पुण्य-दिवस) की याद में मनाया जाने वाला शोक पर्व)

3. ईस्टर : गुड फ्राइडे के ठीक बाद पड़ने वाले रविवार को (ईसा मसीह के पुनर्जीवित होने की स्मृति में मनाया जाने वाला पर्व)

सिखों, जैनियों व बौद्धों के पर्व-त्योहार

धर्म पर्व-त्योहार     तिथि (उपलक्ष्य)

  1. सिख गुरु पर्व : अक्टूबर/नवम्बर महीने में (सिखों के प्रथम गुरु, गुरुनानक देव के जन्म-दिवस के उपलक्ष्य में)
    • गुरु गोविन्द सिंह जयंती : पौष महीने के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को-दिसम्बर/ जनवरी महीने में (सिखों के 10वें गुरु, गुरु गोविंद सिंह के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में)
    • लोहड़ी : 13 जनवरी को मकर संक्रांति के एक दिन पहले (शीत लहर की ठंडी लहरों को विदाई देने के लिए मनाया जाने वाला त्योहार; इस दिन लकड़ियों की लोहड़ी जलाई जाती है।)
    • वैशाखी :  अप्रैल महीने में वैशाख महीने की पहली तिथि को (1699 ई. में गुरु गोविंद सिंह द्वारा खालसा पंथ की स्थापना की याद में मनाया जाने वाला)
  2. जैन महावीर जयंती (वीर त्रयोदशी) : चैत महीने में (24वें तीर्थंकर भगवान महावीर के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में)
  3. बौद्ध बुद्ध पूर्णिमा : वैशाख महीने की पूर्णिमा को (भगवान बुद्ध के सम्मान में मनाया जाने वाला; उल्लेखनीय है कि भगवान बुद्ध का जन्म, सम्बोधि (ज्ञान प्राप्ति) व महापरिनिर्वाण (मृत्यु) तीनों वैशाख पूर्णिमा को ही हुआ।

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