जनजातियों के वस्त्र तथा आभूषण

झारखण्ड की जनजातियों के परिधान परम्परागत हैं। ये स्वयं वस्त्र का निर्माण करते हैं। कपास की खेती की जाती है। पलाश के फूलों से लाल रंग बनाया जाता है। इनका कपड़ा स्वनिर्मित होने के कारण मोटा होता है। महिलाएँ लाल रंग की किनारी वाली साड़ी पहनती हैं, जिसे ‘पढ़िया’ कहा जाता है। इसका आंचल चौड़ा और कलात्मक होता है। पुरुषों के परिधान (जैसे-गमछा आदि) में भी लाल किनारी होती है। बहुत पहले जब ये जंगलों में रहते थे, तब पुरुषों का अधोवस्त्र बहुत छोटा होता था। केवल आगे और पीछे के भाग ढकने के लिए बनाया जाने वाले इस वस्त्र को ‘तोलोंग’ कहते थे। आधुनिक युग में अब ये वस्त्र रीति-रिवाज या परंपरागत विधान के समय ही पहने जाते हैं। युग बदलने और शिक्षा के प्रचार-प्रसार के साथ अब जनजातियों ने भी मुख्य धारा के अनुकूल वस्त्र धारण करके अपने समाज को विकासशील बना लिया है।

जनजातियों के आभूषण

क्र. अंग        आभूषण

1. बाल : उंडू, खोंगसो, सुर्रा-खोंगसो, झीका, खोखरी, चिरो चिलपों आदि।

2. सिर : टीका, कलगा, मयूरपंख, सिलपट (जीनतो), बंडोपगड़ी (पुरुष) आदि।

3. कान : पानरा, तरकी, तरकुला, कर्णफूल, बिडियो, पिपरपत्ता, ठिप्पी, लवंगफूल, तरपत, कुण्डल (पुरुष) आदि।

4. नाक : नथ, छुछी, मकड़ी आदि।

5. गला : हंसुली, सकड़ी, बेरनी, हिसिर, चन्दवा, खम्भिया, ठोसा, पुन, भुंडिया, सिकरी, ताबीज (पुरुष) आदि।

6. बांह : खागा, तार साकोम आदि।

7. हाथ : सांखा, साकोम, झुटिया, राली, धुंघुर, सीली, बाईकल आदि।

8. कमर : कमरधनी आदि।

9. पैर : बांक-बंकी, बटरिया आदि।

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