1956 के बाद बनाए गए नए राज्य एवं संघ शासित क्षेत्र

1956 के बाद बनाए गए नए राज्य एवं संघ शासित क्षेत्र

1956 में व्यापक स्तर पर राज्यों के पुनर्गठन के बावजूद भारत के राजनीतिक मानचित्र में व्यापक विभेदता व राजनीतिक दबाव के चलते परिवर्तन की आवश्यकता महसूस की गई। भाषा या सांस्कृतिक एकरूपता एवं अन्य कारणों के चलते दूसरे राज्यों से अन्य राज्यों के निर्माण की मांग उठी।

महाराष्ट्र और गुजरात:

1960 में द्विभाषी राज्य बंबई को दो पृथक् राज्यों में विभक्त किया गया – महाराष्ट्र मराठी भाषी लोगों के लिए एवं गुजरात गुजराती भाषी लोगों के लिए । गुजरात भारतीय संघ का 15वां राज्य था।

दादरा एवं नागर हवेली :

1954 में इसके स्वतंत्र होने से पूर्व यहां पुर्तगाल का शासन था। 1961 तक यहां लोगों द्वारा स्वयं  चुना गया प्रशासन चलता रहा। 10वें संविधान संशोधन अधिनियम 1961 द्वारा इसे संघ शासित क्षेत्र में परिवर्तित कर दिया गया।

गोवा, दमन एवं दीव :

1961 में पुलिस कार्यवाही के  माध्यम से भारत में इन तीन क्षेत्रों को अधिगृहीत किया गया, 12वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1962 के द्वारा इन्हें संघ शासित क्षेत्र के रूप में स्थापित किया गया। बाद में 1987 में  गोवा को एक पूर्ण राज्य बना दिया गया। इसी तरह दमन और  दीव को पृथक केंद्रशासित प्रदेश बना दिया गया।

पुडुचेरी:

पुडुचेरी का क्षेत्र पूर्व फ्रांसीसी गठन का स्वरूप था, जिसे भारत में पुडुचेरी, कराइकल, माहे और यनम के रूप  में जाना गया। 1954 में फ्रांस ने इसे भारत के सुपुर्द कर दिया। इस तरह 1962 तक इसका प्रशासन अधिगृहीत क्षेत्र’ की तरह चलता रहा। फिर इसे 14 वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा संघ शासित प्रदेश बनाया गया।

नागालैंड:

1963 में नागा पहाड़ियों और असम के बाहर के त्वेनसांग क्षेत्रों को मिलाकर नागालैंड राज्य का गठन किया गया । ऐसा नागा आंदोलनकारियों की संतुष्टि के लिए किया गया था। तथापि, नागालैंड को भारतीय संघ के 16वें राज्य का दर्जा देने से पूर्व 1961 में असम के राज्यपाल के नियंत्रण में रखा गया था।

हरियाणा, चंडीगढ़ और हिमाचल प्रदेश :

1966 में पंजाब राज्य से भारतीय संघ के 17वें राज्य हरियाणा और केन्द्रशासित प्रदेश चंडीगढ़ का गठन किया गया। इसके बाद सिखों के लिए पृथक् ‘सिंह गृह राज्य’ (पंजाब सूबा) की मांग उठने लगी। यह मांग अकाली दल नेता मास्टर तारा सिंह के नेतृत्व में उठी। शाह आयोग (1966)की सिफारिश पर पंजाबी भाषी क्षेत्र को पंजाब राज्य एवं हिंदी भाषी क्षेत्र को हरियाणा राज्य के रूप में स्थापित किया गया एवं इससे लगे पहाडी क्षेत्र को केंद्र शासित राज्य हिमाचल प्रदेश का रूप दिया गया। 11971 में संघ शासित क्षेत्र हिमाचल प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा दे दिया गया (भारतीय संघ का 18वां राज्य)।

मणिपुर, त्रिपुरा एवं मेघालय :

1972 में पूर्वोत्तर भारत के राजनीतिक मानचित्र में व्यापक परिवर्तन आए”। इस तरह दो केंद्र शासित प्रदेश मणिपुर व त्रिपुरा एवं उपराज्य मेघालय को राज्य का दर्जा मिला। इसके अलावा दो संघ शासित प्रदेशों मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश (मूलतः जिसे पूर्वोत्तर सीमांत एजेंसी ‘NEFA’ के नाम से जाना जाता है) भी अस्तित्व में आए। इसके साथ ही भारतीय संघ में राज्यों की संख्या 21 हो गई (मणिपुर 19वां, त्रिपुरा 20वां और मेघालय 21वां) 122वें संविधान संशोधन अधिनियम (1969) के द्वारा मेघालय को ‘स्वायत्तशासी राज्य’ बनाया गया। यह असम में उपराज्य के रूप में भी जाना जाता था, जिसका अपना मंत्रिपरिषद था। यद्यपि यह मेघालय के लोगों की महत्वाकांक्षा की पूर्ति नहीं कर पाया। मिजोरम एवं अरुणाचल प्रदेश संघ शासित प्रदेशों को असम क्षेत्र से पृथक् किया गया।

सिक्किमः

1947 तक सिक्किम भारत का एक शाही राज्य था, जहां चोग्याल का शासन था। 1947 में ब्रिटिश शासन के  समाप्त होने पर सिक्किम को भारत द्वारा रक्षित किया गया। भारत सरकार ने इसके रक्षा, विदेश मामले एवं संचार का उत्तरदायित्व लिया। 1974 में सिक्किम ने भारत के प्रति अपनी इच्छा दर्शायी तद्नुसार, संसद द्वारा 35वां संविधान संशोधन अधिनियम (1974) लागू किया गया। इसके द्वारा सिक्किम को एक ‘संबद्ध राज्य’ का दर्जा दिया गया। इस उद्देश्य के लिए एक नये अनुच्छेद 2क एवं नयी अनुसूची (दसवीं अनुसूची, जिसमें संबद्धता की शर्ते एवं नियम उल्लिखित किए गए) को संविधान में जोड़ा गया। हालांकि यह प्रयोग अधिक नहीं चला। इससे सिक्किम के लोगों की महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति नहीं हुई। 1975 में एक जनमत के दौरान उन्होंने चोग्याल के शासन को समाप्त करने के लिए मत दिया। इस तरह सिक्किम भारत का एक अभिन्न हिस्सा बन गया। इसी तरह 36 वें संविधान संशोधन अधिनियम (1975) के प्रभावी होने के बाद सिक्किम को भारतीय संघ का पूर्ण राज्य बना दिया गया (22 वां राज्य)। इस संशोधन के माध्यम से संविधान की पहली व चौथी अनुसूची को संशोधित कर नया अनुच्छेद 371-च को जोड़ा गया। इसमें सिक्किम के प्रशासन के लिए कुछ विशेष प्रावधानों की व्यवस्था की गई। इसने अनुच्छेद 2क और दसवीं अनुसूची को भी निरसित कर दिया, जिन्हें 1974 के 35वें संशोधन अधिनियम द्वारा जोड़ा गया था।

मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और गोवा :

1987 में भारतीय संघ में तीन नये राज्य मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश और गोवा 23 वें, 24 वें व 25 वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आये। संघशासित प्रदेश मिजोरम को पूर्ण राज्य बनाया गया। यह निर्माण 1986 में एक समझौते के आधार पर हुआ, जिस पर भारत सरकार एवं मिजो नेशनल फ्रंट ने हस्ताक्षर किये। जिसने दो दशक से चले आ रहे राजद्रोह को समाप्त किया। अरुणाचल प्रदेश भी 1972 में संघशासित प्रदेश बना। संघशासित प्रदेश गोवा, दमन और दीव से गोवा को पृथक कर अलग राज्य बनाया गया। छत्तीसगढ़, उत्तराखण्ड और झारखंडः सन 2000 मेंछत्तीसगढ उत्तराखण्ड और झारखंड को क्रमशः मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और बिहार से पृथक कर नये राज्यों के रूप में मान्यता दी गयी। ये तीनों राज्य, भारतीय संघ के 26वें, 27वें व 28वें राज्य बने।

तेलंगानाः

वर्ष 2014 में तेलंगाना राज्य आन्ध्र प्रदेश राज्य के भूभाग को काटकर भारत के 20वें राज्य के रूप में अस्तित्व में आया।

आन्ध्र प्रदेश राज्य अधिनियम 1953 ने भारत में भाषा  के आधार पर पहले राज्य का निर्माण किया – आन्ध्र प्रदेश, जिसमें मद्रास राज्य (तमिलनाडु) के तेलुगु भाषी क्षेत्र शामिल किए गए। कुरनूल आन्ध्र प्रदेश राज्य की राजधानी थी जबकि गुंटुर में राज्य का उच्च न्यायालय स्थापित था।

राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1956 द्वारा हैदराबाद राज्य के तेलुगू भाषी क्षेत्रों को आन्ध्र राज्य में मिलाकर वह बृहततर आन्ध्र प्रदेश राज्य की स्थापना की गई। राज्य की राजधानी हैदराबाद स्थांतरित की गई।

पुनः आन्ध्र प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2014 ने आन्ध्र प्रदेश को अलग राज्यों में बांट दिया : आन्ध्र प्रदेश (शेष) तथा तेलंगाना। हैदराबाद को दोनों राज्यों की संयुक्त राजधानी बनाया गया है। 10 वर्षों के लिए इस अवधि में आन्ध्र प्रदेश अपनी अलग राजधानी बना लेगा। इसी प्रकार आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालय का नाम बदलकर हैदराबाद उच्च न्यायालय (High Court of Judicature at Hyderabad) कर दिया गया है। उच्च न्यायालय तब तक दोनों राज्यों के लिए साझा रहेगा जब तक कि आन्ध्र प्रदेश राज्य के लिए अलग उच्च न्यायालय स्थापित नहीं हो जाता।

जम्मू और कश्मीर और लद्दाख :

2019 तक, जम्मू और कश्मीर के तत्कालीन राज्य का अपना संविधान था और इस प्रकार भारत के संविधान के अनुच्छेद 370 के आधार पर एक विशेष दर्जा प्राप्त था। 2019 में, “संविधान (जम्मू और कश्मीर के लिए आवेदन) आदेश, 2019” के रूप में जाना जाने वाले राष्ट्रपति के आदेश से इस विशेष दर्जा को समाप्त कर दिया गया था। इस आदेश ने पहले के आदेश को “संविधान (जम्मू और कश्मीर के लिए आवेदन) आदेश, 1954” के रूप में जाना। 2019 के आदेश ने भारत के संविधान के सभी प्रावधानों को जम्मू-कश्मीर में भी बढ़ा दिया। हालाँकि, भारत के संविधान के मूल पाठ में निष्क्रिय धारा 370 बनी हुई है।

इसके अलावा, जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 ने जम्मू और कश्मीर के दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेशों, अर्थात् जम्मू और कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश का विभाजन कर दिया।

जम्मू और कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश में कारगिल और लेह जिले को छोड़कर जम्मू और कश्मीर के सभी जिले शामिल हैं जो लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश में चले गए हैं।

इस प्रकार, 1956 में राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों की संख्या क्रमशः 14 और 6 से बढ़कर 28 और 9 हो गई।

नामों में परिवर्तन :

कुछ राज्यों एवं संघशासित क्षेत्रों के नामों में भी परिवर्तन किया गया। संयुक्त प्रांत पहला राज्य था जिसका नाम परिवर्तित किया गया। इसका नया नाम 1950 में उत्तर प्रदेश किया गया। 1969 में मद्रास का नया नाम तमिलनाडु रखा गया। इसी तरह 1973 में मैसूर का नया नाम कर्नाटक रखा गया। इसी वर्ष लकादीव मिनिकॉय एवं अमीनदीवी का नया नाम लक्षद्वीप रखा गया । 1992 में संघशासित प्रदेश दिल्ली का नया नाम राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली रखा गया (इसे बिना पूर्ण राज्य का दर्जा दिए)। यह बदलाव 69वें संविधान संशोधन अधिनियम 1991 के द्वारा हुआ। वर्ष 2006 में उत्तरांचल का नाम बदलकर उत्तराखंड कर दिया गया। इसी वर्ष पांडिचेरी का नाम बदलकर पुडुचेरी किया गया। वर्ष 2011 में उड़ीसा का पुन:नामकरण’ ‘ओडिशा’ के रूप में हुआ।

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