Development of Indian Administration in Colonial Era.

Development of Indian administration in colonial era. भारतीय प्रशासन का औपनिवेशिक काल में विकाश।

The British came to India in 1600 as traders, in the form of East India Company, which had the exclusive right of trading in India under a charter granted by Queen Elizabeth I. In 1765, the Company, which till now had purely trading functions obtained the ‘diwani’ (i.e., rights over revenue and civil justice) of Bengal, Bihar and Orissa. This started its career as a territorial power. In 1858, in the wake of the ‘sepoy mutiny’, the British Crown assumed direct responsibility for the governance of India. This rule continued until India was granted independence on August 15, 1947.

With Independence came the need for a Constitution. Hence, a Constituent Assembly was formed for this purpose in 1946 and on January 26, 1950, the Constitution came into being. However, various features of the Indian Constitution and polity have their roots in the British rule. There were certain events in the British rule that laid down the legal framework for the organisation and functioning of government and administration in British India. These events have greatly influenced our constitution and polity. They are explained here in a chronological order under two major headings :

  1. The Company Rule (1773 – 1858)
  2. The Crown Rule (1858 – 1947)

1600 में ब्रिटिश भारत में व्यापारियों के रूप में ईस्ट इंडिया कंपनी के रूप में आए, जिनके पास महारानी एलिजाबेथ 1 द्वारा दिए गए चार्टर के तहत भारत में व्यापार का विशेष अधिकार था। 1765 में, कंपनी, जो अब तक विशुद्ध रूप से व्यापारिक कार्य करती थी, को बंगाल, बिहार और उड़ीसा के ‘दीवानी’ (यानी, राजस्व और नागरिक न्याय के अधिकार) अधिकार प्राप्त हो गई ।फलस्वरूप, कंपनी का विस्तार एक क्षेत्रीय शक्ति के रूप में शुरू हुआ। 1858 में, ‘सिपाही विद्रोह’ के मद्देनजर, ब्रिटिश क्राउन ने भारत के शासन के लिए सीधे जिम्मेदारी संभाली। यह नियम तब तक जारी रहा जब तक भारत को 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता नहीं दी गई।

स्वतंत्रता के साथ एक संविधान की आवश्यकता हुई। इसलिए, 1946 में इस उद्देश्य के लिए एक संविधान सभा का गठन किया गया और 26 जनवरी 1950 को संविधान अस्तित्व में आया। हालाँकि, भारतीय संविधान की विभिन्न विशेषताओं और राजव्यवस्था की जड़ें ब्रिटिश शासन में हैं। ब्रिटिश शासन में कुछ घटनाएं हुईं, जिन्होंने ब्रिटिश भारत में सरकार और प्रशासन के संगठन और कामकाज की कानूनी रूपरेखा तैयार की। इन घटनाओं ने हमारे संविधान और राजनीति को बहुत प्रभावित किया है। उन्हें यहाँ एक कालानुक्रमिक क्रम में दो प्रमुख शीर्षकों के तहत समझाया गया है:

  1. कंपनी का शासन (1773 – 1858)
  2. द क्राउन रूल (1858 – 1947)

THE COMPANY RULE कंपनी का शासन (1773–1858)

Regulating Act of 1773

This act was of great constitutional importance as (a) it was the first step taken by the British Government to control and regulate the affairs of the East India Company in India; (b) it recognized, for the first time, the political and administrative functions of the Company; and (c) it laid the foundations of central administration in India.

The features of this Act were as follows:

  1. It designated the Governor of Bengal as the ‘Governor General of Bengal’ and created an Executive Council of four members to assist him. The first such Governor General was Lord Warren Hastings.
  2. It made the governors of Bombay and Madras presidencies subordinate to the governor-general of Bengal, unlike earlier, when the three presidencies were independent of one
  3. It provided for the establishment of a Supreme Court at Calcutta (1774) comprising one chief justice and three other
  4. It prohibited the servants of the Company from engaging in any private trade or accepting presents or bribes from the ‘natives’.
  5. It strengthened the control of the British Government over the Company by requiring the Court of Directors (governing body of the Company) to report on its revenue, civil, and military affairs in India.

1773 का विनियमन अधिनियम

यह अधिनियम अत्यधिक संवैधानिक महत्व के रूप में था (क) यह ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के मामलों को नियंत्रित करने और विनियमित करने के लिए उठाया गया पहला कदम था; (ख) यह पहली बार, कंपनी के राजनीतिक और प्रशासनिक कार्यों के लिए मान्यता प्राप्त है; और (ग) इसने भारत में केंद्रीय प्रशासन की नींव रखी।

इस अधिनियम की विशेषताएं इस प्रकार थीं:

  1. इसने बंगाल के गवर्नर को ‘बंगाल के गवर्नर जनरल’ के रूप में नामित किया और उसकी सहायता के लिए चार सदस्यों की एक कार्यकारी परिषद बनाई। पहले ऐसे गवर्नर जनरल लॉर्ड वारेन हेस्टिंग्स थे।
  2. इसने पहले के विपरीत, जब तीन गवर्नर एक-दूसरे से स्वतंत्र थे, बॉम्बे और मद्रास प्रांत को गवर्नर जनरल ऑफ बंगाल के अधीनस्थ बनाया।
  3. इसने कलकत्ता (1774) में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना के लिए एक मुख्य न्यायाधीश और तीन अन्य न्यायाधीशों को शामिल किया।
  4. इसने कंपनी के नौकरों को किसी भी निजी व्यापार में संलग्न होने या मूल निवासियों से रिश्वत या उपहार लेने से रोक दिया।
  5. इसने भारत में अपने राजस्व, नागरिक और सैन्य मामलों पर रिपोर्ट करने के लिए कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स (कंपनी के संचालन निकाय) की आवश्यकता के द्वारा कंपनी पर ब्रिटिश सरकार के नियंत्रण को मजबूत किया।

Amending Act of 1781

In a bid to rectify the defects of the Regulating Act of 1773, the British Parliament passed the Amending Act of 1781, also known as the Act of Settlement.

The features of this Act were as follows:

  1. It exempted the Governor-General and the Council from the jurisdiction of the Supreme Court for the acts done by them in their official capacity. Similarly, it also exempted the servants of the company from the jurisdiction of the Supreme Court for their official actions.
  2. It excluded the revenue matters and the matters arising in the collection of revenue from the jurisdiction of the Supreme
  3. It provided that the Supreme Court was to have jurisdiction over all the inhabitants of Calcutta. It also required the court to administer the personal law of the defendants i.e., Hindus were to be tried according to the Hindu law and Muslims were to be tried according to the Mohammedan law.
  4. It laid down that the appeals from the Provincial Courts could be taken to the Governor-General-in-Council and not to the Supreme Court.
  5. It empowered the Governor-General in Council to frame regulations for the Provincial Courts and Councils.

1781 का संशोधित अधिनियम

1773 के विनियमन अधिनियम के दोषों को ठीक करने के लिए, ब्रिटिश संसद ने 1781 का संशोधन अधिनियम पारित किया, जिसे निपटान अधिनियम के रूप में भी जाना जाता है।

इस अधिनियम की विशेषताएं इस प्रकार थीं:

  1. इसने गवर्नर-जनरल और परिषद को उनकी आधिकारिक क्षमता में उनके द्वारा किए गए कृत्यों के लिए सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से छूट दी। इसी प्रकार, इसने कंपनी के नौकरों को उनके आधिकारिक कार्यों के लिए सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से भी छूट दी।
  2. इसने राजस्व मामलों और राजस्व के संग्रह में आने वाले मामलों को सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र से बाहर कर दिया।
  3. यह प्रदान करता है कि सुप्रीम कोर्ट को कलकत्ता के सभी निवासियों पर अधिकार क्षेत्र रखना था। इसके लिए अदालत को प्रतिवादियों के व्यक्तिगत कानून का प्रशासन करने की भी आवश्यकता थी, अर्थात हिंदुओं को हिंदू कानून के अनुसार और मुसलमानों को मोहम्मडन कानून के अनुसार आजमाया जाना था।
  4. यह निर्धारित किया गया कि प्रांतीय न्यायालयों से अपील को गवर्नर-जनरल-इन-काउंसिल में ले जाया जा सकता है, न कि सुप्रीम कोर्ट में।
  5. इसने काउंसिल में गवर्नर-जनरल को प्रांतीय न्यायालयों और परिषदों के लिए नियम बनाने का अधिकार दिया।

Pitt’s India Act of 1784

The next important act was the Pitt’s India Act of 1784.

The features of this Act were as follows:

  1. It distinguished between the commercial and political functions of the Company.
  2. It allowed the Court of Directors to manage the commercial affairs, but created a new body called Board of Control to manage the political affairs. Thus, it established a system of double government.
  3. It empowered the Board of Control to supervise and direct all operations of the civil and military government or revenues of the British possessions in India.

Thus, the act was significant for two reasons: first, the Company’s territories in India were for the first time called the ‘British possessions in India’; and second, the British Government was given the supreme control over Company’s affairs and its administration in India.

पिटस का भारत अधिनियम 1784

अगला महत्वपूर्ण अधिनियम पिटस का भारत अधिनियम 1784 था।

इस अधिनियम की विशेषताएं इस प्रकार थीं:

  1. यह कंपनी के वाणिज्यिक और राजनीतिक कार्यों के बीच प्रतिष्ठित था।
  2. इसने कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स को वाणिज्यिक मामलों का प्रबंधन करने की अनुमति दी, लेकिन राजनीतिक मामलों का प्रबंधन करने के लिए बोर्ड ऑफ कंट्रोल नामक एक नया निकाय बनाया। इस प्रकार, इसने दोहरी सरकार की एक प्रणाली स्थापित की।इसने नियंत्रण बोर्ड को नागरिक और सैन्य सरकार के सभी कार्यों की निगरानी और निर्देशन करने या भारत में ब्रिटिश संपत्ति के राजस्व का अधिकार दिया।

इस प्रकार, यह अधिनियम दो कारणों से महत्वपूर्ण था: पहला, भारत में कंपनी के क्षेत्र पहली बार ‘भारत में ब्रिटिश संपत्ति’ कहे गए थे; और दूसरा, ब्रिटिश सरकार को भारत में कंपनी के मामलों और उसके प्रशासन पर सर्वोच्च नियंत्रण दिया गया था।

Act of 1786

In 1786, Lord Cornwallis was appointed as the Governor-General of Bengal. He placed two demands to accept that post, viz.,

  1. He should be given power to override the decision of his council in special cases.
  2. He would also be the Commander-in-Chief.

Accordingly, the Act of 1786 was enacted to make both the provisions.

1786 का अधिनियम

1786 में लॉर्ड कार्नवालिस को बंगाल का गवर्नर-जनरल नियुक्त किया गया। उन्होंने उस पद को स्वीकार करने के लिए दो मांगें रखीं।

  1. उसे विशेष मामलों में अपनी परिषद के निर्णय को ओवरराइड करने की शक्ति दी जानी चाहिए।
  2. वह कमांडर-इन-चीफ भी होगा।

तदनुसार, 1786 का अधिनियम दोनों प्रावधानों को बनाने के लिए अधिनियमित किया गया था।

Charter Act of 1793

The features of this Act were as follows:

  1. It extended the overriding power given to Lord Cornwallis over his council, to all future Governor-Generals and Governors of Presidencies.
  2. It gave the Governor-General more powers and control over the governments of the subordinate Presidencies of Bombay and Madras.
  3. It extended the trade monopoly of the Company in India for another period of twenty years.
  4. It provided that the Commander-in-Chief was not to be a member of the Governor-General’s council, unless he was so appointed.
  5. It laid down that the members of the Board of Control and their staff were, henceforth, to be paid out of the Indian

1793 का चार्टर एक्ट

इस अधिनियम की विशेषताएं इस प्रकार थीं:

  1. इसने लॉर्ड कॉर्नवॉलिस को दी गई ओवरराइडिंग पावर को भविष्य के गवर्नर-जनरल्स और प्रेसीडेंसीज़ के गवर्नर्स को दिया।
  2. इसने गवर्नर-जनरल को बंबई और मद्रास की अधीनस्थ प्रेसीडेंसी की सरकारों पर अधिक अधिकार और नियंत्रण दिया।
  3. इसने भारत में बीस वर्षों की अवधि के लिए कंपनी के व्यापार एकाधिकार को बढ़ाया।
  4. यह प्रदान करता है कि कमांडर-इन-चीफ को गवर्नर-जनरल की परिषद का सदस्य नहीं होना था, जब तक कि उन्हें नियुक्त नहीं किया गया था।
  5. यह निर्धारित किया गया कि भारतीय राजस्व मंडल के सदस्य और उनके कर्मचारी भारतीय राजस्व से भुगतान किए जाने वाले हैं।

Charter Act of 1813

The features of this Act were as follows:

  1. It abolished the trade monopoly of the company in India i.e., the Indian trade was thrown open to all British merchants. However, it continued the monopoly of the company over trade in tea and trade with China.
  2. It asserted the sovereignty of the British Crown over the Company’s territories in India.
  3. It allowed the Christian missionaries to come to India for the purpose of enlightening the people.
  4. It provided for the spread of western education among the inhabitants of the British territories in India.
  5. It authorised the Local Governments in India to impose taxes on persons. They could also punish the persons for not paying taxes.

1813 का चार्टर एक्ट

इस अधिनियम की विशेषताएं इस प्रकार थीं:

  1. इसने भारत में कंपनी के व्यापार एकाधिकार को समाप्त कर दिया अर्थात् भारतीय व्यापार को सभी ब्रिटिश व्यापारियों के लिए खोल दिया गया। हालांकि, इसने चाय के व्यापार और चीन के साथ व्यापार पर कंपनी के एकाधिकार को जारी रखा।
  2. इसने भारत में कंपनी के क्षेत्र पर ब्रिटिश क्राउन की संप्रभुता का दावा किया।
  3. इसने ईसाई मिशनरियों को लोगों के ज्ञानवर्धन के उद्देश्य से भारत आने की अनुमति दी।
  4. इसने भारत में ब्रिटिश क्षेत्रों के निवासियों के बीच पश्चिमी शिक्षा के प्रसार के लिए मार्ग प्रदान किया।
  5. इसने भारत में स्थानीय सरकारों को व्यक्तियों पर कर लगाने के लिए अधिकृत किया। वे करों का भुगतान नहीं करने के लिए व्यक्तियों को दंडित भी कर सकते थे।

Charter Act of 1833

This Act was the final step towards centralisation in British India.

The features of this Act were as follows:

  1. It made the Governor-General of Bengal as the Governor General of India and vested in him all civil and military powers. Thus, the act created, for the first time, Government of India having authority over the entire territorial area possessed by the British in India. Lord William Bentick was the first Governor-General of India.
  2. It deprived the Governor of Bombay and Madras of their legislative powers. The Governor-General of India was given exclusive legislative powers for the entire British India. The laws made under the previous acts were called as Regulations, while laws made under this act were called as
  3. It ended the activities of the East India Company as a commercial body, which became a purely administrative body. It provided that the Company’s territories in India were held by it ‘in trust for His Majesty, His heirs and successors’.
  4. The Charter Act of 1833 attempted to introduce a system of open competition for selection of civil servants and stated that the Indians should not be debarred from holding any place, office and employment under the Company. However, this provision was negated after opposition from the Court of Directors.

1833 का चार्टर एक्ट

यह अधिनियम ब्रिटिश भारत में केंद्रीयकरण की दिशा में अंतिम कदम था।

इस अधिनियम की विशेषताएं इस प्रकार थीं:

  1. इसने बंगाल के गवर्नर-जनरल को भारत का गवर्नर जनरल बनाया और उसे सभी नागरिक और सैन्य शक्तियों में निहित किया। इस प्रकार, यह अधिनियम, पहली बार, भारत सरकार के पास पूरे क्षेत्रीय क्षेत्र पर भारत में अंग्रेजों का अधिकार था। लॉर्ड विलियम बेंटिक भारत के पहले गवर्नर-जनरल थे।
  2. इसने बॉम्बे और मद्रास के राज्यपाल को उनकी विधायी शक्तियों से वंचित कर दिया। भारत के गवर्नर-जनरल को संपूर्ण ब्रिटिश भारत के लिए विशेष विधायी शक्तियाँ प्रदान की गईं। पिछले अधिनियमों के तहत बनाए गए कानूनों को विनियम कहा जाता था, जबकि इस अधिनियम के तहत बनाए गए कानूनों को अधिनियम कहा जाता था।
  3. इसने एक वाणिज्यिक निकाय के रूप में ईस्ट इंडिया कंपनी की गतिविधियों को समाप्त कर दिया, जो विशुद्ध रूप से प्रशासनिक निकाय बन गया। यह प्रदान करता है कि भारत में कंपनी के क्षेत्र उसके महामहिम, उसके उत्तराधिकारियों और उत्तराधिकारियों के लिए विश्वास में रखे हुए थे।
  4. 1833 के चार्टर एक्ट ने सिविल सेवकों के चयन के लिए खुली प्रतियोगिता की प्रणाली शुरू करने का प्रयास किया और कहा कि भारतीयों को कंपनी के अधीन किसी भी स्थान, कार्यालय और रोजगार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि, कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स के विरोध के बाद इस प्रावधान को नकार दिया गया था।

Charter Act of 1853

This was the last of the series of Charter Acts passed by the British Parliament between 1793 and 1853. It was a significant constitutional landmark.

The features of this Act were as follows:

  1. It separated, for the first time, the legislative and executive functions of the Governor-General’s council. It provided for addition of six new members called legislative councillors to the council. In other words, it established a separate Governor-General’s legislative council which came to be known as the Indian (Central) Legislative Council. This legislative wing of the council functioned as a mini Parliament, adopting the same procedures as the British Parliament. Thus, legislation, for the first time, was treated as a special function of the government, requiring special machinery and special process.
  1. It introduced an open competition system of selection and recruitment of civil servants. The covenanted civil service was, thus, thrown open to the Indians also. Accordingly, the Macaulay Committee (the Committee on the Indian Civil Service) was appointed in 1854.
  2. It extended the Company’s rule and allowed it to retain the possession of Indian territories on trust for the British Crown. But, it did not specify any particular period, unlike the previous Charters. This was a clear indication that the Company’s rule could be terminated at any time the Parliament liked.
  3. It introduced, for the first time, local representation in the Indian (Central) Legislative Council. Of the six new legislative members of the Governor General’s council, four members were appointed by the local (provincial) governments of Madras, Bombay, Bengal and Agra.

1853 का चार्टर एक्ट

यह 1793 और 1853 के बीच ब्रिटिश संसद द्वारा पारित चार्टर अधिनियमों की श्रृंखला का अंतिम था। यह एक महत्वपूर्ण संवैधानिक मील का पत्थर था।

इस अधिनियम की विशेषताएं इस प्रकार थीं:

  1. यह पहली बार , गवर्नर-जनरल की परिषद के विधायी और कार्यकारी कार्य अलग हुआ। इसने विधान परिषद के छह नए सदस्यों को परिषद में शामिल करने का प्रावधान किया। दूसरे शब्दों में, इसने एक अलग गवर्नर-जनरल की विधान परिषद की स्थापना की, जिसे भारतीय (केंद्रीय) विधान परिषद के रूप में जाना जाता है। परिषद की इस विधायी शाखा ने ब्रिटिश संसद के समान प्रक्रियाओं को अपनाते हुए एक मिनी संसद के रूप में कार्य किया। इस प्रकार, कानून, पहली बार सरकार के एक विशेष कार्य के रूप में माना गया था, विशेष मशीनरी और विशेष प्रक्रिया की आवश्यकता थी।
  1. इसने सिविल सेवकों के चयन और भर्ती की एक खुली प्रतियोगिता प्रणाली शुरू की। इस प्रकार, नागरिक सेवा को भारतीयों के लिए भी खुला रखा गया था। तदनुसार, मैकाले समिति (भारतीय सिविल सेवा समिति) 1854 में नियुक्त की गई थी।
  2. इसने कंपनी के शासन को बढ़ाया और इसे ब्रिटिश क्राउन के लिए ट्रस्ट पर भारतीय क्षेत्रों के कब्जे को बनाए रखने की अनुमति दी। लेकिन, यह पिछले चार्टर्स के विपरीत किसी विशेष अवधि को निर्दिष्ट नहीं करता था। यह एक स्पष्ट संकेत था कि कंपनी के नियम को संसद द्वारा आवश्यकता पड़ने पर किसी भी समय समाप्त किया जा सकता है।
  3. इसने पहली बार, भारतीय (केंद्रीय) विधान परिषद में स्थानीय प्रतिनिधित्व दिया। गवर्नर जनरल की परिषद के छह नए विधायी सदस्यों में से, चार सदस्यों को मद्रास, बॉम्बे, बंगाल और आगरा की स्थानीय (प्रांतीय) सरकारों द्वारा नियुक्त किया गया था।

THE CROWN RULE (1858–1947) द क्राउन रूल (1858 – 1947)

Government of India Act of 1858

This significant Act was enacted in the wake of the Revolt of 1857–also known as the First War of Independence or the ‘sepoy mutiny’. The act known as the Act for the Good Government of India, abolished the East India Company, and transferred the powers of Government, territories and revenues to the British Crown.

The features of this Act were as follows:

  1. It provided that India, henceforth, was to be governed by, and in the name of, Her Majesty. It changed the designation of the Governor-General of India to that of Viceroy of India. He (Viceroy) was the direct representative of the British Crown in India. Lord Canning, thus, became the first Viceroy of India.
  2. It ended the system of double Government by abolishing the Board of Control and Court of Directors.
  3. It created a new office, Secretary of State for India, vested with complete authority and control over Indian administration. The secretary of state was a member of the British Cabinet and was responsible ultimately to the British Parliament.
  4. It established a 15-member council of India to assist the Secretary of State for India. The council was an advisory body. The secretary of state was made the Chairman of the council.
  5. It constituted the Secretary of State-in Council as a body corporate, capable of suing and being sued in India and in England.

‘The Act of 1858 was, however, largely confined to the improvement of the administrative machinery by which the Indian Government was to be supervised and controlled in England. It did not alter in any substantial way the system of Government that prevailed in India.’

1858 का भारत सरकार अधिनियम

इस महत्वपूर्ण कानून का निर्माण 1857 के विद्रोह के बाद किया गया, जिसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम या सिपाही विद्रोह भी कहा जाता है। भारत के शासन को अच्छा बनाने वाला अधिनियम नाम के प्रसिद्ध इस कानून ने, ईस्ट इंडिया कंपनी को समाप्त कर दिया और गवर्नरों, क्षेत्रों और राजस्व संबंधी शक्तियां ब्रिटिश राजशाही को हस्तांतरित कर दी। अधिनियम की विशेषताएं

  1. इसके तहत भारत का शासन सीधे महारानी विक्टोरिया के अधीन चला गया। गवर्नर जनरल का पदनाम बदलकर भारत का वायसराय कर दिया गया। वह (वायसराय)भारत में ब्रिटिश ताज का प्रत्यक्ष प्रतिनिधि बन गया। लॉर्ड कैनिंग भारत के प्रथम वायसराय बने।
  2. इस अधिनियम ने नियंत्रण बोर्ड और निदेशक कोर्ट समाप्त कर भारत में शासन की द्वैध प्रणाली समाप्त कर दी।
  3. एक नए पद, भारत के राज्य सचिव, का सृजन किया गया; जिसमें भारतीय प्रशासन पर संपर्ण नियंत्रण की शक्ति निहित थी। यह सचिव ब्रिटिश कैबिनेट का सदस्य था और ब्रिटिश अंतत: संसद के प्रति उत्तरदायी था।
  4. भारत सचिव की सहायता के लिए 15 सदस्यीय परिषद का गठन किया गया, जो एक सलाहकार समिति थी। परिषद का अध्यक्ष भारत सचिव को बनाया गया।
  5. इस कानून के तहत भारत सचिव की परिषद का गठन किया गया, जो एक निगमित निकाय थी और जिसे भारत और इंग्लैंड में मुकदमा करने का अधिकार था। इस पर भी मुकदमा किया जा सकता था।

1858 के कानून का प्रमुख उद्देश्य, प्रशासनिक मशीनरी में सुधार था, जिसके माध्यम से इंग्लैंड में भारतीय सरकार का अधीक्षण और उसका नियंत्रण हो सकता था। इसने भारत में प्रचलित शासन प्रणाली में कोई विशेष परिवर्तन नहीं किया।

Indian Councils Act of 1861, 1892 and 1909 / 1861, 1892 और 1909 के भारत परिषद अधिनियम  : 

After the great revolt of 1857, the British Government felt the necessity of seeking the cooperation of the Indians in the administration of their country. In pursuance of this policy of association, three acts were enacted by the British Parliament in 1861, 1892 and 1909.

Indian Councils Act of 1861:

The Indian Councils Act of 1861 is an important landmark in the constitutional and political history of India.

The features of this Act were as follows:

  1. It made a beginning of the representative institutions by associating Indians with the law-making process. It, thus, provided that the Viceroy should nominate some Indians as non-official members of his expanded council. In 1862, Lord Canning, the then Viceroy, nominated three Indians to his legislative council–the Raja of Benaras, the Maharaja of Patiala and Sir Dinkar Rao.
  2. It initiated the process of decentralisation by restoring the legislative powers to the Bombay and Madras Presidencies. It, thus, reversed the centralising tendency that started from the Regulating Act of 1773 and reached its climax under the Charter Act of 1833. This policy of legislative devolution resulted in the grant of almost complete internal autonomy to the provinces in 1937.
  3. It also provided for the establishment of new legislative councils for Bengal, North-Western Provinces and Punjab, which were established in 1862, 1886 and 1897,
  4. It empowered the Viceroy to make rules and orders for the more convenient transaction of business in the council. It also gave a recognition to the ‘portfolio’ system, introduced by Lord Canning in 1859. Under this, a member of the Viceroy’s council was made in-charge of one or more departments of the Government and was authorised to issue final orders on behalf of the council on matters of his department(s).
  5. It empowered the Viceroy to issue ordinances, without the concurrence of the legislative council, during an emergency. The life of such an ordinance was six months.

1857 की महान क्रांति के बाद ब्रिटिश सरकार ने महसूस किया कि भारत में शासन चलाने के लिए भारतीयों का सहयोग लेना आवश्यक है। इस सहयोग नीति के तहत ब्रिटिश संसद ने 1861, 1892 और 1909 में तीन नए अधिनियम पारित किए। 

1861 के भारत परिषद अधिनियम की विशेषताएं 

  1. इसके द्वारा कानून बनाने की प्रक्रिया में भारतीय प्रतिनिधियों को शामिल करने की शुरुआत हुई। इस प्रकार वायसराय कुछ भारतीयों को विस्तारित परिषद में गैर-सरकारी सदस्यों के रूप में नामांकित कर सकता था। 1862 में लॉर्ड कैनिंग ने तीन भारतीयों-बनारस के राजा, पटियाला के महाराजा और सर दिनकर राव को विधान परिषद में मनोनीत किया। 
  2. इस अधिनियम ने मद्रास और बंबई प्रेसिडेंसियों को विधायी शक्तियां पुन: देकर विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया की शुरुआत की। इस प्रकार इस अधिनियम ने रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 द्वारा शुरू हुई केंद्रीयकरण की प्रवृत्ति को उलट दिया और 1833 के चार्टर अधिनियम के साथ ही अपने चरम पर पहुंच गया। इस विधायी विकास की नीति के कारण 1937 तक प्रांतों को संपूर्ण आंतरिक स्वायत्तता हासिल हो गई। 
  3. बंगाल, उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत और पंजाब में क्रमशः 1862, 1866 और 1897 में विधानपरिषदों का गठन हुआ। 
  4. इसने वायसराय को परिषद में कार्य संचालन के लिए अधिक नियम और आदेश बनाने की शक्तियां प्रदान की। इसने लॉर्ड कैनिंग द्वारा 1859 में प्रारंभ की गई पोर्टफोलियो प्रणाली को भी मान्यता दी। इसके अंतर्गत वायसराय की परिषद का एक सदस्य एक या अधिक सरकारी विभागों का प्रभारी बनाया जा सकता था तथा उसे इस विभाग में काउंसिल की ओर से अंतिम आदेश पारित करने का अधिकार था।
  5. इसने वायसराय को आपातकाल में बिना काउंसिल की संस्तुति के अध्यादेश जारी करने के लिए अधिकृत किया। ऐसे अध्यादेश की अवधि मात्र छह माह होती थी।

Indian Councils Act of 1892

The features of this Act were as follows:

  1. It increased the number of additional (non-official) members in the Central and provincial legislative councils, but maintained the official majority in them.
  2. It increased the functions of legislative councils and gave them the power of discussing the budget and addressing questions to the executive.
  3. It provided for the nomination of some non-official members of the (a) Central Legislative Council by the viceroy on the recommendation of the provincial legislative councils and the Bengal Chamber of Commerce, and (b) that of the provincial legislative councils by the Governors on the recommendation of the district boards, municipalities, universities, trade associations, zamin-dars and chambers.

‘The act made a limited and indirect provision for the use of election in filling up some of the non-official seats both in the Central and provincial legislative councils. The word “election” was, however, not used in the Act. The process was described as nomination made on the recommendation of certain bodies.’

1892 के भारतीय परिषद अधिनियम की विशेषताएं 

  1. इसके माध्यम से केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों में अतिरिक्त (गैर-सरकारी) सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई, हालांकि बहुमत सरकारी सदस्यों का ही रहता था। 
  2. इसने विधान परिषदों के कार्यों में वृद्धि कर उन्हें बजट पर बहस करने और कार्यपालिका के प्रश्नों का उत्तर देने के लिए अधिकृत किया। 
  3. इसमें केंद्रीय विधान परिषद और बंगाल चैंबर्स ऑफ़ कॉमर्स में गैर-सरकारी सदस्यों के नामांकन के लिए वायसराय की शक्तियों का प्रावधान था। इसके अलावा प्रांतीय विधान परिषदों में गवर्नर को जिला परिषद, नगरपालिका, विश्वविद्यालय, व्यापार संघ, जमींदारों और चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स की सिफारिशों पर गैर-सरकारी सदस्यों को नियुक्त करने की शक्ति थी।

‘इस अधिनियम ने केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों दोनों में गैर-सरकारी सदस्यों की नियुक्ति के लिए एक सीमित और परोक्ष रूप से चुनाव का प्रावधान किया हालांकि चुनाव शब्द का अधिनियम में प्रयोग नहीं हुआ था। इसे निश्चित निकायों की सिफारिश पर की जाने वाली नामांकन की प्रक्रिया कहा गया।’

Indian Councils Act of 1909

This Act is also known as Morley-Minto Reforms (Lord Morley was the then Secretary of State for India and Lord Minto was the then Viceroy of India).

The features of this Act were as follows:

  1. It considerably increased the size of the legislative councils, both Central and provincial. The number of members in the Central legislative council was raised from 16 to 60. The number of members in the provincial legislative councils was not uniform.
  2. It retained official majority in the Central legislative council, but allowed the provincial legislative councils to have nonofficial majority.
  3. It enlarged the deliberative functions of the legislative councils at both the levels. For example, members were allowed to ask supplementary questions, move resolutions on the budget and so on.
  4. It provided (for the first time) for the association of Indians with the executive councils of the Viceroy and Governors. Satyendra Prasad Sinha became the first Indian to join the Viceroy’s executive council. He was appointed as the Law
  5. It introduced a system of communal representation for Muslims by accepting the concept of ‘separate electorate’. Under this, the Muslim members were to be elected only by Muslim voters. Thus, the Act ‘legalised communalism’ and Lord Minto came to be known as the Father of Communal Electorate.
  6. It also provided for the separate representation of presidency corporations, chambers of commerce, universities and zamindars.

1909 के भारतीय परिषद अधिनियम की विशेषताएं : 

इस अधिनियम को मॉर्ले-मिंटो सुधार के सुधार के नाम से भी जाना जाता है (उस समय लॉर्ड मॉर्ले इंग्लैंड में भारत के राज्य सचिव थे और लॉर्ड मिंटो भारत में वायसराय थे)। 

  1. इसने केंद्रीय और प्रांतीय विधानपरिषदों के आकार में काफी वृद्धि की। केंद्रीय परिषद में इनकी संख्या 16 से 60 हो गई। प्रांतीय विधानपरिषदों में इनकी संख्या एक समान नहीं थी।
  2. इसने केंद्रीय परिषद में सरकारी बहुमत को बनाए रखा लेकिन प्रांतीय परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों के बहुमत की अनुमति थी। 
  3. इसने दोनों स्तरों पर विधान परिषदों के चर्चा कार्यों का दायरा बढ़ाया। उदाहरण के तौर पर अनुपूरक प्रश्न पूछना, बजट पर संकल्प रखना आदि।
  4. इस अधिनियम के अंतर्गत पहली बार किसी भारतीय को वायसराय और गवर्नर की कार्यपरिषद के साथ एसोसिएशन बनाने का प्रावधान किया गया। सत्येंद्र प्रसाद सिन्हा वायसराय की कार्यपालिका परिषद के प्रथम भारतीय सदस्य बने। उन्हें विधि सदस्य बनाया गया था।
  5. इस अधिनियम नै पृथक् निर्वाचन के आधार पर मुस्लिमों के लिए सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का प्रावधान किया। इसके अंतर्गत मुस्लिम सदस्यों का चुनाव मुस्लिम मतदाता ही कर सकते थे। इस प्रकार इस अधिनियम ने सांप्रदायिकता को वैधानिकता प्रदान की और लॉर्ड मिंटो को सांप्रदायिक निर्वाचन के जनक के रूप में जाना गया। 6. इसने प्रेसिडेंसी कॉरपोरेशन, चैंबर्स ऑफ़ कॉमर्स, विश्वविद्यालयों और जमींदारों के लिए अलग प्रतिनिधित्व का प्रावधान भी किया।

Government of India Act of 1919

On August 20, 1917, the British Government declared, for the first time, that its objective was the gradual introduction of responsible Government in India.

The Government of India Act of 1919 was thus enacted, which came into force in 1921. This Act is also known as Montagu Chelmsford Reforms (Montagu was the Secretary of State for India and Lord Chelmsford was the Viceroy of India).

The features of this Act were as follows:

  1. It relaxed the central control over the provinces by demarcating and separating the central and provincial subjects. The central and provincial legislatures were authorised to make laws on their respective list of subjects. However, the structure of government continued to be centralised and unitary.
  2. It further divided the provincial subjects into two parts– transferred and reserved. The transferred subjects were to be administered by the Governor with the aid of Ministers responsible to the legislative council. The reserved subjects, on the other hand, were to be administered by the Governor and his executive council without being responsible to the legislative council. This dual scheme of governance was known as ‘dyarchy’–a term derived from the Greek word diarche which means double rule. However, this experiment was largely unsuccessful.
  3. It introduced, for the first time, bicameralism and direct elections in the country. Thus, the Indian legislative council was replaced by a bicameral legislature consisting of an Upper House (Council of State) and a Lower House (Legislative Assembly). The majority of members of both the Houses were chosen by direct election.
  4. It required that the three of the six members of the Viceroy’s executive Council (other than the Commander-in-Chief) were to be Indian.
  5. It extended the principle of communal representation by providing separate electorates for Sikhs, Indian Christians, Anglo-Indians and Europeans.
  6. It granted franchise to a limited number of people on the basis of property, tax or education.
  7. It created a new office of the High Commissioner for India in London and transferred to him some of the functions hitherto performed by the Secretary of State for India.
  8. It provided for the establishment of a public service commission. Hence, a Central Public Service Commission was set up in 1926 for recruiting civil servants.
  9. It separated, for the first time, provincial budgets from the Central budget and authorised the provincial legislatures to enact their budgets.
  10. It provided for the appointment of a statutory commission to inquire into and report on its working after ten years of its coming into force.

भारत शासन अधिनियम, 1919:

20 अगस्त, 1917 को ब्रिटिश सरकार ने पहली बार घोषित किया कि उसका उद्देश्य भारत में क्रमिक रूप से उत्तरदायी सरकार की स्थापना करना था।

क्रमिक रूप से 1919 में भारत शासन अधिनियम बनाया गया, जो 1921 से लागू हुआ। इस कानून को मांटेग-चेम्सफोर्ड सुधार भी कहा जाता है (मांटेग भारत के राज्य सचिव थे, जबकि चेम्सफोर्ड भारत के वायसराय थे)। अधिनियम की विशेषताएं 

  1. केंद्रीय और प्रांतीय विषयों की सूची की पहचान कर एवं उन्हें पृथक् कर राज्यों पर केंद्रीय नियंत्रण कम किया गया। केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों को, अपनी सूचियों के विषयों पर विधान बनाने का अधिकार प्रदान किया गया। लेकिन सरकार का ढांचा केंद्रीय और एकात्मक ही बना रहा। 
  2. इसने प्रांतीय विषयों को पुन: दो भागों में विभक्त कियाहस्तांतरित और आरक्षित । हस्तांतरित विषयों पर गवर्नर का शासन होता था और इस कार्य में वह उन मंत्रियों की सहायता लेता था, जो विधान परिषद के प्रति उत्तरदायी थे। दूसरी ओर आरक्षित विषयों पर गवर्नर कार्यपालिका परिषद की सहायता से शासन करता था, जो विधान परिषद के प्रति उत्तरदायी नहीं थी। शासन की इस दोहरी व्यवस्था को द्वैध (यूनानी शब्द डाई-आर्की से व्युत्पन्न) शासन व्यवस्था कहा गया। हालांकि यह व्यवस्था काफी हद तक असफल ही रही।
  3. इस अधिनियम ने पहली बार देश में द्विसदनीय व्यवस्था और प्रत्यक्ष निर्वाचन की व्यवस्था प्रारंभ की। इस प्रकार भारतीय विधान परिषद के स्थान पर द्विसदनीय व्यवस्था यानी राज्यसभा और लोकसभा का गठन किया गया। दोनों सदनों के बहुसंख्यक सदस्यों को प्रत्यक्ष निर्वाचन के माध्यम से निर्वाचित किया जाता था।
  4. इसके अनुसार, वायसराय की कार्यकारी परिषद के छह सदस्यों में से (कमांडर-इन-चीफ़ को छोड़कर) तीन सदस्यों का भारतीय होना आवश्यक था।
  5. इसने सांप्रदायिक आधार पर सिखों, भारतीय ईसाईयों, आंग्ल-भारतीयों और यूरोपियों के लिए भी पृथक् निर्वाचन के सिद्धांत को विस्तारित कर दिया। 
  6. इस कानून ने संपत्ति, कर या शिक्षा के आधार पर सीमित संख्या में लोगों को मताधिकार प्रदान किया।
  7. इस कानून ने लंदन में भारत के उच्चायुक्त के कार्यालय का सृजन किया और अब तक भारत सचिव द्वारा किए जा रहे कुछ कार्यों को उच्चायुक्त को स्थानांतरित कर दिया गया।
  8. इससे एक लोक सेवा आयोग का गठन किया गया। अतः 1926 में सिविल सेवकों की भर्ती के लिए केंद्रीय लोक सेवा आयोग का गठन किया गया।
  9. इसने पहली बार केंद्रीय बजट को राज्यों के बजट से अलग कर दिया और राज्य विधानसभाओं को अपना बजट स्वयं बनाने के लिए अधिकृत कर दिया।
  10. इसके अंतर्गत एक वैधानिक आयोग का गठन किया गया, जिसका कार्य दस वर्ष बाद जांच करने के बाद अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करना था।

Simon Commission

In November 1927 itself (i.e., 2 years before the schedule), the British Government announced the appointment a seven-member statutory commission under the chairmanship of Sir John Simon to report on the condition of India under its new Constitution. All the members of the commission were British and hence, all the parties boycotted the commission. The commission submitted its report in 1930 and recommended the abolition of dyarchy, extension of responsible Government in the provinces, establishment of a federation of British India and princely states, continuation of communal electorate and so on. To consider the proposals of the commission, the British Government convened three round table conferences of the representatives of the British Government, British India and Indian princely states. On the basis of these discussions, a ‘White Paper on Constitutional Reforms’ was prepared and submitted for the consideration of the Joint Select Committee of the British Parliament. The recommendations of this committee were incorporated (with certain changes) in the next Government of India Act of 1935.

साइमन कमीशन

नवंबर 1927 में ही (यानी अनुसूची से 2 साल पहले), ब्रिटिश सरकार ने अपने नए संविधान के तहत भारत की स्थिति पर रिपोर्ट करने के लिए सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में सात सदस्यीय वैधानिक आयोग की नियुक्ति की घोषणा की। आयोग के सभी सदस्य ब्रिटिश थे और इसलिए, सभी दलों ने आयोग का बहिष्कार किया। आयोग ने 1930 में अपनी रिपोर्ट पेश की और प्रांतों में ब्रिटिश सरकार और रियासतों के एक महासंघ की स्थापना, सांप्रदायिक मतदाताओं की निरंतरता और इसी तरह, राजशाही के उन्मूलन, प्रांतों में जिम्मेदार सरकार के विस्तार की सिफारिश की। आयोग के प्रस्तावों पर विचार करने के लिए, ब्रिटिश सरकार ने ब्रिटिश सरकार, ब्रिटिश भारत और भारतीय रियासतों के प्रतिनिधियों के तीन गोलमेज सम्मेलन बुलाए। इन चर्चाओं के आधार पर, समिति ‘संवैधानिक सुधारों पर श्वेत पत्र’ तैयार किया गया और ब्रिटिश संसद की संयुक्त प्रवर समिति के विचारार्थ प्रस्तुत किया गया। इस समिति की सिफारिशों को 1935 के भारत सरकार अधिनियम में शामिल किया गया था।

Communal Award

In August 1932, Ramsay MacDonald, the British Prime Minister, announced a scheme of representation of the minorities, which came to be known as the Communal Award. The award not only continued separate electorates for the Muslims, Sikhs, Indian Christians, Anglo-Indians and Europeans but also extended it to the depressed classes (Scheduled Castes). Gandhiji was distressed over this extension of the principle of communal representation to the depressed classes and undertook fast unto death in Yerawada Jail (Poona) to get the award modified. At last, there was an agreement between the leaders of the Congress and the depressed classes. The agreement, known as Poona Pact, retained the Hindu joint electorate and gave reserved seats to the depressed classes.

सांप्रदायिक पुरस्कार

अगस्त 1932 में, ब्रिटिश प्रधान मंत्री, रामसे मैकडोनाल्ड ने अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व की एक योजना की घोषणा की, जिसे सांप्रदायिक पुरस्कार के रूप में जाना जाता है। इस पुरस्कार ने न केवल मुसलमानों, सिखों, भारतीय ईसाइयों, एंग्लो-इंडियन और यूरोपीय लोगों के लिए अलग-अलग निर्वाचक मंडलों को जारी रखा, बल्कि इसे वंचित वर्गों (अनुसूचित जातियों) तक भी बढ़ाया। गांधीजी वंचित वर्गों के सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांत के इस विस्तार से व्यथित थे और पुरस्कार संशोधित करने के लिए यरवदा जेल (पूना) में आमरण अनशन किया। अंत में, कांग्रेस और दबे-कुचले वर्ग के नेताओं के बीच एक समझौता हुआ। समझौता, जिसे पूना पैक्ट के रूप में जाना जाता है, ने हिंदू संयुक्त निर्वाचक मंडल को बनाए रखा और वंचित वर्गों को आरक्षित सीटें दीं।

Government of India Act of 1935

The Act marked a second milestone towards a completely responsible government in India. It was a lengthy and detailed document having 321 Sections and 10 Schedules.

The features of this Act were as follows:

  1. It provided for the establishment of an All-India Federation consisting of provinces and princely states as units. The Act divided the powers between the Centre and units in terms of three lists–Federal List (for Centre, with 59 items), Provincial List (for provinces, with 54 items) and the Concurrent List (for both, with 36 items). Residuary powers were given to the Viceroy. However, the federation never came into being as the princely states did not join it.
  2. It abolished dyarchy in the provinces and introduced ‘provincial autonomy’ in its place. The provinces were allowed to act as autonomous units of administration in their defined spheres. Moreover, the Act introduced responsible Governments in provinces, that is, the Governor was required to act with the advice of ministers responsible to the provincial legislature. This came into effect in 1937 and was discontinued in 1939.
  3. It provided for the adoption of dyarchy at the Centre. Consequently, the federal subjects were divided into reserved subjects and transferred subjects. However, this provision of the Act did not come into operation at all.
  4. It introduced bicameralism in six out of eleven provinces. Thus, the legislatures of Bengal, Bombay, Madras, Bihar, Assam and the United Provinces were made bicameral consisting of a legislative council (upper house) and a legislative assembly (lower house). However, many restrictions were placed on them.
  5. It further extended the principle of communal representation by providing separate electorates for depressed classes (Scheduled Castes), women and labour (workers).
  6. It abolished the Council of India, established by the Government of India Act of 1858. The secretary of state for India was provided with a team of advisors.
  7. It extended franchise. About 10 per cent of the total population got the voting right.
  8. It provided for the establishment of a Reserve Bank of India to control the currency and credit of the country.
  9. It provided for the establishment of not only a Federal Public Service Commission, but also a Provincial Public Service Commission and Joint Public Service Commission for two or more provinces.
  10. It provided for the establishment of a Federal Court, which was set up in 1937.

1935 का भारत सरकार अधिनियम

इस अधिनियम ने भारत में एक पूरी तरह से जिम्मेदार सरकार की ओर एक दूसरा मील का पत्थर चिह्नित किया। यह एक लंबा और विस्तृत दस्तावेज था जिसमें 321 खंड और 10 अनुसूचियां थीं।

इस अधिनियम की विशेषताएं इस प्रकार थीं:

  1. इसने एक अखिल भारतीय महासंघ की स्थापना के लिए प्रांतों और रियासतों को इकाइयों के रूप में शामिल किया। अधिनियम ने केंद्र और इकाइयों के बीच शक्तियों को तीन सूचियों-संघीय सूची (केंद्र के लिए, 59 वस्तुओं के साथ), प्रांतीय सूची (प्रांतों के लिए, 54 मदों के साथ) और समवर्ती सूची (दोनों के लिए, 36 वस्तुओं के साथ) के बीच विभाजित किया। वाइसराय को अवशिष्ठ शक्तियां दी गईं। हालाँकि, संघ कभी अस्तित्व में नहीं आया क्योंकि रियासतें इसमें शामिल नहीं हुईं।
  2. इसने प्रांतों में द्विशासन को समाप्त कर दिया और इसके स्थान पर ‘प्रांतीय स्वायत्तता’ की शुरुआत की। प्रांतों को उनके परिभाषित क्षेत्रों में प्रशासन की स्वायत्त इकाइयों के रूप में कार्य करने की अनुमति थी। इसके अलावा, अधिनियम ने प्रांतों में जिम्मेदार सरकारों गठन किया, अर्थात्, राज्यपाल को प्रांतीय विधायिका के लिए जिम्मेदार मंत्रियों की सलाह के साथ कार्य करने की आवश्यकता थी। यह 1937 में लागू हुआ और 1939 में बंद कर दिया गया।
  3. इसने केंद्र में द्विशासन अपनाने के लिए प्रावधान किया। नतीजतन, संघीय विषयों को आरक्षित विषयों और स्थानांतरित विषयों में विभाजित किया गया था। हालाँकि, अधिनियम का यह प्रावधान लागू नहीं हुआ।
  4. इसने ग्यारह प्रांतों में से छह में द्विसदनीयता का परिचय दिया। इस प्रकार, बंगाल, बॉम्बे, मद्रास, बिहार, असम और संयुक्त प्रांत के विधानसभाओं को एक विधान परिषद (उच्च सदन) और एक विधान सभा (निम्न सदन) से मिलकर द्विसदनीय बनाया गया। हालांकि, उन पर कई प्रतिबंध लगाए गए थे।
  5. इसने वंचित वर्गों (अनुसूचित जातियों), महिलाओं और श्रमिकों (श्रमिकों) के लिए अलग निर्वाचक मंडल प्रदान करके सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के सिद्धांत को आगे बढ़ाया।
  6. इसने भारत सरकार अधिनियम 1858 द्वारा स्थापित भारत की परिषद को समाप्त कर दिया। भारत के राज्य सचिव को सलाहकारों की एक टीम प्रदान की गई थी।
  7. इसने मताधिकार का विस्तार किया। कुल आबादी के लगभग 10 फीसदी लोगों को मतदान का अधिकार मिला।
  8. इसने देश की मुद्रा और ऋण को नियंत्रित करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना का प्रावधान किया।
  9. इसने न केवल एक संघीय लोक सेवा आयोग की स्थापना की बल्कि दो या अधिक प्रांतों के लिए एक प्रांतीय लोक सेवा आयोग और संयुक्त लोक सेवा आयोग की स्थापना की।
  10. इसने एक संघीय न्यायालय की स्थापना का प्रावधान किया, जिसे 1937 में स्थापित किया गया था।

Indian Independence Act of 1947

On February 20, 1947, the British Prime Minister Clement Atlee declared that the British rule in India would end by June 30,1948; after which the power would be transferred to responsible Indian hands. This announcement was followed by the agitation by the Muslim League demanding partition of the country. Again on June 3, 1947, the British Government made it clear that any Constitution framed by the Constituent Assembly of India (formed in 1946) cannot apply to those parts of the country which were unwilling to accept it. On the same day (June 3, 1947), Lord Mountbatten, the Viceroy of India, put forth the partition plan, known as the Mountbatten Plan. The plan was accepted by the Congress and the Muslim League. Immediate effect was given to the plan by enacting the Indian Independence Act (1947).

The features of this Act were as follows:

  1. It ended the British rule in India and declared India as an independent and sovereign state from August 15, 1947.
  2. It provided for the partition of India and creation of two independent dominions of India and Pakistan with the right to secede from the British Commonwealth.
  3. It abolished the office of Viceroy and provided, for each dominion, a governorgeneral, who was to be appointed by the British King on the advice of the dominion cabinet. His Majesty’s Government in Britain was to have no responsibility with respect to the Government of India or
  4. It empowered the Constituent Assemblies of the two dominions to frame and adopt any constitution for their respective nations and to repeal any act of the British Parliament, including the Independence act itself.
  5. It empowered the Constituent Assemblies of both the dominions to legislate for their respective territories till the new constitutions were drafted and enforced. No Act of the British Parliament passed after August 15, 1947 was to extend to either of the new dominions unless it was extended thereto by a law of the legislature of the dominion.
  6. It abolished the office of the Secretary of State for India and transferred his functions to the Secretary of State for Commonwealth Affairs.
  7. It proclaimed the lapse of British paramountcy over the Indian princely states and treaty relations with tribal areas from August 15, 1947.
  8. It granted freedom to the Indian princely states either to join the Dominion of India or Dominion of Pakistan or to remain
  9. It provided for the governance of each of the dominions and the provinces by the Government of India Act of 1935, till the new Constitutions were framed. The dominions were however authorised to make modifications in the Act.
  10. It deprived the British Monarch of his right to veto bills or ask for reservation of certain bills for his approval. But, this right was reserved for the GovernorGeneral. The Governor General would have full power to assent to any bill in the name of His Majesty.
  11. It designated the Governor-General of India and the provincial governors as constitutional (nominal) heads of the states. They were made to act on the advice of the respective council of ministers in all matters.
  12. It dropped the title of Emperor of India from the royal titles of the King of England.
  13. It discontinued the appointment to civil services and reservation of posts by the secretary of state for India. The members of the civil services appointed before August 15, 1947 would continue to enjoy all benefits that they were entitled to till that time.

At the stroke of midnight of 14-15 August, 1947, the British rule came to an end and power was transferred to the two new independent Dominions of India and Pakistan. Lord Mountbatten became the first GovernorGeneral of the new Dominion of India. He swore in Jawaharlal Nehru as the first Prime Minister of independent India. The Constituent Assembly of India formed in 1946 became the Parliament of the Indian Dominion.

1947 का भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम

20 फरवरी, 1947 को, ब्रिटिश प्रधान मंत्री क्लीमेंट एटली ने घोषणा की कि भारत में ब्रिटिश शासन जून 30,1948 तक समाप्त हो जाएगा; जिसके बाद सत्ता को जिम्मेदार भारतीय हाथों में सौंप दिया जाएगा। इस घोषणा के बाद मुस्लिम लीग ने देश के विभाजन की मांग की। 3 जून, 1947 को फिर से, ब्रिटिश सरकार ने स्पष्ट किया कि भारत की संविधान सभा द्वारा गठित कोई भी संविधान (1946 में गठित) देश के उन हिस्सों पर लागू नहीं हो सकता जो इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। उसी दिन (3 जून, 1947), लॉर्ड माउंटबेटन, भारत के वायसराय ने विभाजन योजना को सामने रखा, जिसे माउंटबेटन योजना के नाम से जाना जाता है। योजना को कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने स्वीकार कर लिया। भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम (1947) को लागू करके योजना को तत्काल प्रभाव दिया गया।

इस अधिनियम की विशेषताएं इस प्रकार थीं:

  1. इसने भारत में ब्रिटिश शासन को समाप्त कर दिया और 15 अगस्त, 1947 से भारत को एक स्वतंत्र और संप्रभु राज्य घोषित कर दिया।
  2. इसने भारत के विभाजन और ब्रिटिश राष्ट्रमंडल से अलग होने के अधिकार के साथ भारत और पाकिस्तान के दो स्वतंत्र राज्य के निर्माण का प्रावधान किया।
  3. इसने वायसराय के पद को समाप्त कर दिया और प्रत्येक शासन के लिए गवर्नर जनरल पद का प्रावधान किया, जिसे ब्रिटिश राजा द्वारा डोमिनियन कैबिनेट की सलाह पर नियुक्त किया जाना था। । ब्रिटेन में महामहिम की सरकार को भारत या पाकिस्तान सरकार के संबंध में कोई जिम्मेदारी नहीं थी।
  4. इसने दोनों प्रभुत्वों की संविधान सभाओं को अपने संबंधित राष्ट्रों के लिए कोई भी संविधान तैयार करने और उसे अपनाने और ब्रिटिश संसद के किसी भी अधिनियम को निरस्त करने का अधिकार दिया, जिसमें स्वतंत्रता अधिनियम भी शामिल है।
  5. इसने दोनों राज्यों की संविधान सभाओं को अपने संबंधित क्षेत्रों के लिए कानून बनाने का अधिकार दिया, जब तक कि नए संविधानों को तैयार और लागू नहीं हो जाये। 15 अगस्त, 1947 के बाद पारित ब्रिटिश संसद का कोई भी अधिनियम तब तक किसी भी नए राज्य में लागु नहीं हो सकता था, जब तक कि उसे राज्य के विधान द्वारा कानून के दायरे में नहीं लाया जाता।
  6. इसने भारत के लिए राज्य सचिव के कार्यालय को समाप्त कर दिया और अपने कार्यों को राष्ट्रमंडल मामलों के राज्य सचिव को हस्तांतरित कर दिया।
  7. इसने 15 अगस्त 1947 से भारतीय रियासतों पर ब्रिटिश सर्वोपरि और जनजातीय क्षेत्रों के साथ संधि संबंधों के समाप्ती की घोषणा की।
  8. इसने भारतीय रियासतों को या तो भारत के डोमिनियन या पाकिस्तान के डोमिनियन में शामिल होने या स्वतंत्र रहने की स्वतंत्रता दी।
  9. जब तक कि नए संविधान नहीं बनते तब तक के लिए 1935 के भारत सरकार अधिनियम द्वारा सभी राज्यों और प्रांतों के शासन का प्रावधान किया। तथापि, अधिनियम में संशोधन करने के लिए राज्यों को अधिकृत किया गया था।
  10. इसने ब्रिटिश सम्राट को अपने वीटो बिलों के अधिकार से वंचित कर दिया या उनकी मंजूरी के लिए कुछ बिलों के आरक्षण की माँग की। लेकिन, यह अधिकार गवर्नर जेनरल के लिए आरक्षित था। महामहिम के नाम पर किसी भी बिल को स्वीकार करने की पूरी शक्ति गवर्नर जनरल के पास होगी।
  11. इसने भारत के गवर्नर-जनरल और प्रांतीय गवर्नरों को राज्यों के संवैधानिक (नाममात्र) प्रमुखों के रूप में नामित किया। उन्हें सभी मामलों में संबंधित मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्रवाई करने के लिए बनाया गया था।
  12. इसने इंग्लैंड के राजा के शाही खिताब से भारत के सम्राट का खिताब हटा दिया।
  13. इसने भारत के लिए राज्य सचिव द्वारा सिविल सेवाओं में नियुक्ति और पदों के आरक्षण को बंद कर दिया। 15 अगस्त, 1947 से पहले नियुक्त सिविल सेवाओं के सदस्य उन सभी लाभों का आनंद लेना जारी रखेंगे, जो वे उस समय तक हकदार थे।

14-15 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि के समय, ब्रिटिश शासन समाप्त हो गया और भारत और पाकिस्तान के दो नए स्वतंत्र डोमिनियन को सत्ता हस्तांतरित कर दी गई। लॉर्ड माउंटबेटन भारत के पहले गवर्नर जेनरल बने। उन्होंने स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में जवाहरलाल नेहरू को शपथ दिलाई। 1946 में गठित भारत की संविधान सभा भारत की संसद बन गई।

Table 1 Interim Government (1946) अंतरिम सरकार 1946

Sl.

No.

Members Portfolios Held
1. Jawaharlal Nehru Vice-President of the Council;

External Affairs & Commonwealth Relations

2. Sardar Vallabhbhai Patel Home, Information & Broadcasting
3. Dr. Rajendra Prasad Food & Agriculture
4. Dr. John Mathai Industries & Supplies
5. Jagjivan Ram Labour
6. Sardar Baldev Singh Defence
7. C.H. Bhabha Works, Mines & Power
8. Liaquat Ali Khan Finance
9. Abdur Rab Nishtar Posts & Air
10. Asaf Ali Railways & Transport
11. C. Rajagopalachari Education & Arts
12. I.I. Chundrigar Commerce
13. Ghaznafar Ali Khan Health
14. Joginder Nath Mandal Law

Note: The members of the interim Government were members of the Viceroy’s Executive Council. The Viceroy continued to be the head of the Council. But, Jawaharlal Nehru was designated as the Vice-President of the Council.

Table 2 First Cabinet of Free India (1947) भारत की प्रथम मंत्रिमंडल 1947

Sl. No. Members Portfolios Held
1. Jawaharlal Nehru Prime Minister; External Affairs &

Commonwealth Relations; Scientific Research

2. Sardar Vallabhbhai Patel Home, Information & Broadcasting; States
3. Dr. Rajendra Prasad Food & Agriculture
4. Maulana Abul Kalam Azad Education
5. Dr. John Mathai Railways & Transport
6. R.K. Shanmugham

Chetty

Finance
7. Dr. B.R. Ambedkar Law
8. Jagjivan Ram Labour
9. Sardar Baldev Singh Defence
10. Raj Kumari Amrit Kaur Health
11. C.H. Bhabha Commerce
12. Rafi Ahmed Kidwai Communication
13. Dr. Shayama Prasad Mukherji Industries & Supplies
14. V.N. Gadgil Works, Mines & Power
NOTES

  1. The Mughal Emperor, Shah Alam, granted ‘Diwani’ to the Company after its victory in the Battle of Buxar (1764).
  2. At that time, the Civil Services of the company were classified into covenanted civil services (higher civil services) and uncovenanted civil services (lower civil services). The former was created by a law of the Company, while the later was created otherwise.
  3. The system of Budget was introduced in British India in 1860.
  4. The Indian Independence Bill was introduced in the British Parliament on July 4, 1947 and received the Royal Assent on July 18, 1947. The act came into force on August 15, 1947.
  5. The boundaries between the two Dominions were determined by a Boundary Commission headed by Radcliff. Pakistan included the provinces of West Punjab, Sind, Baluchistan, East Bengal, North-Western Frontier Province and the district of sylhet in Assam. The referendum in the North-Western Frontier Province and Sylhet was in favour of Pakistan.

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