निवास का अधिकार

भारतीय संविधान की अनुच्छेद 19(5) के अंतर्गत निवास का अधिकार से सम्बंधित निम्नवत प्रावधान है :

हर नागरिक को देश के किसी भी हिस्से में बसने का अधिकार है। इस अधिकार के दो भाग हैं-(अ) देश के किसी भी हिस्से में रहने का अधिकार-इसका तात्पर्य है कि कहीं भी अस्थायी रूप से रहना एवं (ब) देश के किसी भी हिस्से में व्यवस्थित होने का अधिकार-इसका तात्पर्य है वहां घर बनाना एवं स्थायी रूप से बसना।

यह अधिकार देश के अंदर कहीं जाने के आंतरिक अवरोधों का समाप्त करता है। यह राष्ट्रवाद को प्रोत्साहित करता है और संकीर्ण मानसिकता को महत्व प्रदान नहीं करता।

राज्य इस अधिकार पर उचित प्रतिबंध दो आधारों पर लगा सकता है-विशेष रूप से आम लोगों के हित में और अनुसूचित जनजातियों के हित में। जनजातीय क्षेत्रों में उनकी संस्कृति भाषा एवं रिवाज के आधार पर बाहर के लोगों का, प्रवेश प्रतिबंधित किया जा सकता है। देश के कई भागों में जनजातियों को अपनी संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन हेतु अपने रिवाज एवं नियमकानून के बनाने का अधिकार है।

उच्चतम न्यायालय ने कुछ क्षेत्रों में लोगों के घूमने पर प्रतिबंध लगाया है-जैसे वेश्या या पेशेवर अपराधी।

उपरोक्त प्रावधान में से यह स्पष्ट है कि निवास का अधिकार एवं घूमने के अधिकारों का कुछ विस्तार भी किया जा सकता है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।