शैक्षिक संस्थानों में ओबीसी के लिए आरक्षण

2005 के 93 वें संशोधन अधिनियम द्वारा राज्य को अधिकृत किया है की वह सामाजिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े लोगों या अनुसूचित जाति या जनजाति के लोगों के उत्थान के लिये शैक्षणिक संस्थाओं में प्रवेश के लिये छूट संबंधी कोई नियम बना सकता है। ये शैक्षणिक संस्थान राज्य से अनुदान प्राप्त, निजी,अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को छोड़कर किसी भी प्रकार के हो सकते हैं। इस प्रावधान को प्रभावी करने के लिए, केंद्र ने केंद्रीय शैक्षिक संस्थानों (प्रवेश में आरक्षण) अधिनियम, 2006 को लागू किया, जिसमें संबंधित उम्मीदवारों को 27% का कोटा प्रदान किया गया था। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IITs) और भारतीय प्रबंधन संस्थानों (IIMs) सहित सभी केंद्रीय उच्च शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को अप्रैल 2008 में, सुप्रीम कोर्ट ने संशोधन अधिनियम और ओबीसी कोटा अधिनियम दोनों की वैधता को बरकरार रखा। लेकिन, न्यायालय ने केंद्र सरकार को कानून लागू करते समय ओबीसी के बीच क्रीमी लेयर ’(उन्नत वर्गों) को बाहर करने का निर्देश दिया।

  1. संवैधानिक पद धारण करने वाले व्यक्ति, जैसे कि राष्ट्रपति उप-राष्ट्रपति, उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश, संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्य, राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्य, मुख्य निर्वाचन आयुक्त, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक आदि।
  2. वर्ग ए या ग्रुपए तथा ग्रुप बी की सेवा के क्लास II अधिकारी, जो कि केंद्रीय या राज्य सेवाओं में हैं। इसके अलावा सार्वजनिक प्रतिष्ठानों, बैंकों, बीमा कंपनियों, विश्वविद्यालयों आदि में पदस्थ समकक्ष अधिकारी आदि। यह नियम निजी कंपनियों में कार्यरत अधिकारियों पर भी लागू होता है।
  3. सैना में कर्नल या उससे ऊपर के रैंक का अधिकारी या नौसेना, वायु सेना एवं अर्द्ध-सैनिक बलों में समान रैंक का अधिकारी।
  4. डॉक्टर, अधिवक्ता, इंजीनियर, कलाकार, लेखक, सलाहकार आदि प्रकार के पेशेवर।
  5. व्यापार, वाणिज्य एवं उद्योग में लगे व्यक्ति।
  6. शहरी क्षेत्रों में जिन लोगों के पास भवन हैं तथा जिनके पास एक निश्चित सीमा से अधिक की कृषि भूमि या रिक्त भूमि रखने वाले।
  7. जिन लोगों की सालाना आय 4.5 लाख से अधिक है या जिनके पास एक छूट सीमा से अधिक की संपत्ति है। 1993 में जबकि ‘मलाईदार परत (creamy layer)’ हदबंदी लागू की गई, यह 1 लाख थी। बाद में 2004 में इसे बढ़ाकर 2.5 लाख, 2008 में 4.5 लाख 2013 में 6 लाख तथा 2017 में 8 लाख रुपये  किया गया।

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