The salient features of the Constitution संविधान की प्रमुख विशेषताएं

The Indian Constitution is unique in its contents and spirit. Though borrowed from almost every Constitution of the world, the Constitution of India has several salient features that distinguish it from the Constitutions of the other countries.

It should be noted at the outset that a number of original features of the Constitution (as adopted in 1949) have undergone a substantial change, on account of several amendments, particularly 7th, 42nd, 44th, 73rd, 74th, 97th and 101st Amendments. In fact, the 42nd Amendment Act (1976) is known as ‘Mini-Constitution’ due to the important and large number of changes made by it in various parts of the Constitution. However, in the Kesavananda Bharati case (1973), the Supreme Court ruled that the constituent power of Parliament under Article 368 does not enable it to alter the ‘basic structure’ of the Constitution.

भारतीय संविधान तत्वों और मूल भावना के संबंध में अद्वितीय है। हालांकि इसके कई तत्व विश्व के विभिन्न संविधानों से उधार लिये गये हैं। भारतीय संविधान के कई ऐसे तत्व हैं, जो उसे अन्य देशों के संविधानों से अलग पहचान प्रदान करते हैं।

यह बात ध्यान देने योग्य है कि सन 1949 में अपनाए गए संविधान के अनेक वास्तविक लक्षणों में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। विशेष रूप से 7वें, 42वें, 44वें, 73वें , 74वें एवं 97वें संशोधन में। संविधान में कई बड़े परिवर्तन करने वाले 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 को मिनी कॉन्स्टिट्यूशन’ कहा जाता है। हालांकि केशवानंद भारती मामले (1973) में सर्वोच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी थी कि अनुच्छेद 368 के तहत संसद को मिली संवैधानिक शक्ति संविधान के ‘मूल ढांचे’ को बदलने की अनुमति नहीं देती।

The salient features of the Constitution, as it stands today, are as follows:

संविधान की विशेषताएं संविधान के वर्तमान रूप में इसकी विशेषताएं निम्नलिखित हैं

1. Lengthiest Written Constitution

Constitutions are classified into written, like the American Constitution, or unwritten, like the British Constitution. The Constitution of India is the lengthiest of all the written Constitutions of the world. It is a very comprehensive, elaborate and detailed document.

Originally (1949), the Constitution contained a Preamble, 395 Articles (divided into 22 Parts) and 8 Schedules. Presently (2019), it consists of a Preamble, about 470 Articles (divided into 25 Parts) and 12 Schedules. The various amendments carried out since 1951 have deleted about 20 Articles and one Part (VII) and added about 95 Articles, four Parts (IVA, IXA, IXB and XIVA) and four Schedules (9, 10, 11 and 12). No other Constitution in the world has so many Articles and Schedules.

Four factors have contributed to the elephantine size of our Constitution. They are:

  1. Geographical factors, that is, the vastness of the country and its diversity.
  2. Historical factors, e.g., the influence of the Government of India Act of 1935, which was bulky.
  3. Single Constitution for both the Centre and the states.
  4. Dominance of legal luminaries in the Constituent Assembly.

The Constitution contains not only the fundamental principles of governance, but also detailed administrative provisions. Further, those matters which in other modern democratic countries have been left to the ordinary legislation or established political conventions have also been included in the constitutional document itself in India.

1. सबसे लंबा लिखित संविधान

संविधान को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है-लिखित, जैसेअमेरिकी संविधान, और; अलिखित, जैसे-ब्रिटेन का संविधान। भारत का संविधान विश्व का सबसे लंबा लिखित संविधान है। यह बहुत बृहद समग्र और विस्तृत दस्तावेज़ है।

मूल रूप से (1949) संविधान में एक प्रस्तावना, 395 अनुच्छेद (22 भागों में विभक्त) और 8 अनुसूचियां थीं। वर्तमान में (2016) इसमें एक प्रस्तावना, 465 अनुच्छेद (25 भागों में विभक्त) और 12 अनुसूचियां हैं। सन 1951 से हुए विभिन्न संशोधनों ने करीब 20 अनुच्छेद व एक भाग (भाग-VII) को हटा दिया और इसमें करीब 90 अनुच्छेद, चार भागों (4क, 9क, 9ख और 14क) और चार अनुसूचियों (9, 10, 11, 12) को जोड़ा गया । विश्व के किसी अन्य संविधान में इतने अनुच्छेद और अनुसूचियां नहीं हैं।

भारत के संविधान को विस्तृत बनाने के पीछे निम्न चार कारण हैं:

  1. भौगोलिक कारण, भारत का विस्तार और विविधता।
  2. ऐतिहासिक, इसके उदाहरण के रूप में भारत शासन अधिनियम, 1935 के प्रभाव को देखा जा सकता है। यह अधिनियम बहुत विस्तृत था।
  3. जम्मू-कश्मीर को छोड़कर केंद्र और राज्यों के लिए एकल संविधान।
  4. संविधान सभा में कानून विशेषज्ञों का प्रभुत्व।

संविधान में न सिर्फ शासन के मौलिक सिद्धांत बल्कि विस्तृत रूप में प्रशासनिक प्रावधान भी विद्यमान हैं। इसके अतिरिक्त अन्य आधुनिक लोकतंत्रों में जिन मामलों को आम विधानों अथवा स्थापित राजनैतिक परिपाटी पर छोड़ दिया गया है, उन्हें भी भारत के संवैधानिक दस्तावेज में शामिल किया गया है।

2. Drawn From Various Sources

The Constitution of India has borrowed most of its provisions from the Constitutions of various other countries as well as from the Government of India Act of 1935. Dr. B.R. Ambedkar proudly acclaimed that the Constitution of India has been framed after ‘ransacking all the known Constitutions of the World’.

The structural part of the Constitution is, to a large extent, derived from the Government of India Act of 1935. The philosophical part of the Constitution (the Fundamental Rights and the Directive Principles of State Policy) derive their inspiration from the American and Irish Constitutions, respectively. The political part of the Constitution (the principle of Cabinet Government and the relations between the Executive and the Legislature) have been largely drawn from the British Constitution.

The other provisions of the Constitution have been drawn from the Constitutions of Canada, Australia, Germany, USSR (now Russia), France, South Africa, Japan and so on.

The most profound influence and material source of the Constitution is the Government of India Act, 1935. The Federal Scheme, Judiciary, Governors, Emergency Powers, the Public Service Commissions and most of the administrative details are drawn from this Act. More than half of the provisions of Constitution are identical to or bear a close resemblance to the Act of 1935.

2. विभिन्न स्रोतों से विहित

भारत के संविधान ने अपने अधिकतर उपबंध विश्व के कई देशों के संविधानों भारत-शासन अधिनियम, 1935 के उपबंधों से हैं। डॉ. अंबेडकर ने गर्व के साथ घोषणा की थी कि, “भारत के संविधान का निर्माण विश्व के विभिन्न संविधानों को छानने के बाद किया गया है।”

संविधान का अधिकांश ढांचागत हिस्सा भारत शासन अधिनियम, 1935 से लिया गया है। संविधान का दार्शनिक भाग (मौलिक अधिकार और राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांत) क्रमशः अमेरिका और आयरलैंड से प्रेरित है। भारतीय संविधान के राजनीतिक भाग (संघीय सरकार का सिद्धांत और कार्यपालिका और विधायिका के संबंध) का अधिकांश हिस्सा ब्रिटेन के संविधान से लिया गया है।

संविधान के अन्य प्रावधान कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, यूएसएसआर (अब रूस), फ्रांस, दक्षिण अफ्रीका, जापान इत्यादि देशों के संविधानों से लिए गए हैं।

भारत के संविधान पर सबसे बड़ा प्रभाव और भौतिक सामग्री का स्रोत भारत सरकार अधिनियम, 1935 रहा है। संघीय व्यवस्था, न्यायपालिका, राज्यपाल, आपातकालीन अधिकार, लोक सेवा आयोग और अधिकतर प्रशासनिक विवरण इसी से लिए गए हैं। संविधान के आने से अधिक प्रावधान या तो 1935 के इस अधिनियम के समान है या फिर इससे मिलते-जुलते हैं।’

3. Blend of Rigidity and Flexibility

Constitutions are also classified into rigid and flexible. A rigid Constitution is one that requires a special procedure for its amendment, as for example, the American Constitution. A flexible constitution, on the other hand, is one that can be amended in the same manner as the ordinary laws are made, as for example, the British Constitution.

The Constitution of India is neither rigid nor flexible, but a synthesis of both. Article 368 provides for two types of amendments:

  1. Some provisions can be amended by a special majority of the Parliament, i.e., a two-third majority of the members of each House present and voting, and a majority of the total membership of each House.
  2. Some other provisions can be amended by a special majority of the Parliament and with the ratification by half of the total states.

At the same time, some provisions of the Constitution can be amended by a simple majority of the Parliament in the manner of ordinary legislative process. Notably, these amendments do not come under Article 368.

3. नम्यता एवं अनम्यता का समन्वय

संविधानों को नम्यता और अनम्यता की दृष्टि से भी वर्गीकृत किया जाता है। कठोर या अनम्य संविधान उसे माना जाता है, जिसमें संशोधन करने के लिए विशेष प्रक्रिया की आवश्यकता हो । उदाहरण के लिए अमेरिकी संविधान । लचीला या नम्य संविधान वह कहलाता है, जिसमें संशोधन की प्रक्रिया वही हो, जैसी किसी आम कानूनों के निर्माण की, जैसे-ब्रिटेन का संविधान। भारत का संविधान न तो लचीला है और न ही कठोर, बल्कि यह दोनों का मिला-जुला रूप है। अनुच्छेद 368 में दो तरह के संशोधनों का प्रावधान है।

  1. कुछ उपबंधों को संसद में विशेष बहुमत से संशोधित किया जा सकता है। उदाहरणार्थ, दोनों सदनों में उपस्थित और मतदान में भाग लेने वाले सदस्यों का दो-तिहाई बहुमत और प्रत्येक सदन में कुल सदस्यों का बहुमत (जो कि 50 प्रतिशत से अधिक है)।
  2. कुछ अन्य प्रावधानों को संसद के विशेष बहुमत और कुल राज्यों के आधे से अधिक राज्यों के अनुमोदन से ही संशोधित किया जा सकता है।

इसके अलावा संविधान के कुछ प्रावधान आम विधायी प्रक्रिया की तरह संसद में सामान्य बहुमत के माध्यम से संशोधित किए जा सकते हैं। उल्लेखनीय है कि ये संशोधन अनुच्छेद 368 के अंतर्गत नहीं आते।

4. Federal System with Unitary Bias

The Constitution of India establishes a federal system of Government. It contains all the usual features of a federation, viz., two Government, division of powers, written Constitution, supremacy of Constitution, rigidity of Constitution, independent judiciary and bicameralism.

However, the Indian Constitution also contains a large number of unitary or non-federal features, viz., a strong Centre, single Constitution, single citizenship, flexibility of Constitution, integrated judiciary, appointment of state governor by the Centre, all-India services, emergency provisions and so on.

Moreover, the term ‘Federation’ has nowhere been used in the Constitution. Article 1, on the other hand, describes India as a ‘Union of States’ which implies two things: one, Indian Federation is not the result of an agreement by the states; and two, no state has the right to secede from the federation.

Hence, the Indian Constitution has been variously described as ‘federal in form but, unitary in spirit’, ‘quasi-federal’ by K.C. Wheare, ‘bargaining federalism’ by Morris Jones, ‘co-operative federalism’ by Granville Austin, ‘federation with a centralising tendency’ by Ivor Jennings and so on.

4. एकात्मकता की ओर झुकाव के साथ संघीय व्यवस्था

भारत का संविधान संघीय सरकार की स्थापना करता है। इसमें संघ के सभी आम लक्षण विद्यमान हैं: जैसे-दो सरकार, शक्तियों का विभाजन, लिखित संविधान, संविधान की सर्वोच्चता, संविधान की कठोरता, स्वतंत्र न्यायपालिका एवं द्विसदनीयता आदि।

यद्यपि भारतीय संविधान में बड़ी संख्या में एकात्मकता और गैर-संघीय लक्षण भी विद्यमान हैं, जैसे-एक सशक्त केंद्र, एक संविधान, एकल नागरिकता, संविधान का लचीलापन, एकीकृत न्यायपालिका, केन्द्र द्वारा राज्यपाल की नियुक्ति, अखिल भारतीय सेवाएं, आपातकालीन प्रावधान इत्यादि।

फिर भी, संविधान में कहीं भी ‘संघीय’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है। दूसरी ओर अनुच्छेद 1 में भारत का उल्लेख ‘राज्यों के संघ’ के रूप में किया गया है। इसके दो अभिप्राय हैंपहला. भारतीय संघराज्यों के बीच हए किसी समझौते का निष्कर्ष नहीं है, और दूसरा; किसी राज्य को संघ से अलग होने का अधिकार नहीं है।

इसी वजह से भारतीय संविधानको निम्नांकित नाम दिए गए हैं, जैसे कि-एकात्मकता की भावना में संघ. अर्थ संघ (के.सी. वैरे), बारगेनिंग फेडरेलिज्म-(मॉरिज जोंस), को-ऑपरेटिव फेडरेलिज्म’ (ग्रेनविल ऑस्टिन), फेडरेशन विद ए सेंट्रलाइजिंग टेंडेंसी’ (आइवर जेनिंग्स व अन्य)।

5. Parliamentary Form of Government

The Constitution of India has opted for the British Parliamentary System of Government rather than American Presidential System of Government. The parliamentary system is based on the principle of co-operation and co-ordination between the legislative and executive organs while the presidential system is based on the doctrine of separation of powers between the two organs.

The parliamentary system is also known as the ‘Westminster’ Model of Government, responsible Government and Cabinet Government. The Constitution establishes the parliamentary system not only at the Centre, but also in the states.

The features of parliamentary government in India are:

  1. Presence of nominal and real executives;
  2. Majority party rule,
  3. Collective responsibility of the executive to the legislature,
  4. Membership of the ministers in the legislature,
  5. Leadership of the Prime Minister or the Chief Minister,
  6. Dissolution of the lower House (Lok Sabha or Assembly).

Even though the Indian parliamentary system is largely based on the British pattern, there are some fundamental differences between the two. For example, the Indian Parliament is not a sovereign body like the British Parliament. Further, the Indian State has an elected head (republic) while the British State has hereditary head (monarchy).

In a parliamentary system whether in India or Britain, the role of the Prime Minister has become so significant and crucial that the political scientists like to call it a ‘Prime Ministerial Government’.

5. सरकार का संसदीय रूप

भारतीय संविधान ने अमेरिका की अध्यक्षीय प्रणाली की बजाए ब्रिटेन के संसदीय तंत्र को अपनाया है। संसदीय व्यवस्था विधायिका और कार्यपालिका के मध्य समन्वय व सहयोग के सिद्धांत पर आधारित है, जबकि अध्यक्षीय प्रणाली दोनों के बीच शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत पर आधारित है। संसदीय प्रणाली को सरकार के वेस्टमिंस्टर” रूप, उत्तरदायी सरकार और मंत्रिमंडलीय सरकार के नाम से भी जाना जाता है। संविधान केवल केंद्र में ही नहीं, बल्कि राज्य में भी संसदीय प्रणाली की स्थापना करता है। भारत में संसदीय प्रणाली की विशेषताएं निम्नलिखित हैं:

  1. वास्तविक व नाममात्र के कार्यपालकों की उपस्थिति,
  2. बहुमत वाले दल की सत्ता,
  3. विधायिका के समक्ष कार्यपालिका की संयुक्त जवाबदेही,
  4. विधायिका में मंत्रियों की सदस्यता,
  5. प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री का नेतृत्व,
  6. निचले सदन का विघटन (लोकसभा अथवा विधानसभा)।

हालांकि भारतीय संसदीय प्रणाली बड़े पैमाने पर ब्रिटिश संसदीय प्रणाली पर आधारित है फिर भी दोनों में कुछ मूलभूत अंतर हैं। उदाहरण के लिए ब्रिटिश संसद की तरह भारतीय संसद संप्रभु नहीं है। इसके अलावा भारत का प्रधान निर्वाचित व्यक्ति होता है (गणतंत्र), जबकि ब्रिटेन में उत्तराधिकारी व्यवस्था ।

किसी भी संसदीय व्यवस्था में, चाहे वह भारत की हो अथवा ब्रिटेन की, प्रधानमंत्री की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। जैसा कि राजनीति के जानकार इसे ‘प्रधानमंत्रीय सरकार’ का नाम देते हैं।

6. Synthesis of Parliamentary Sovereignty and Judicial Supremacy

The doctrine of sovereignty of Parliament is associated with the British Parliament, while the principle of judicial supremacy with that of the American Supreme Court.

Just as the Indian parliamentary system differs from the British system, the scope of judicial review power of the Supreme Court in India is narrower than that of what exists in US. This is because the American Constitution provides for ‘due process of law’ against that of ‘procedure established by law’ contained in the Indian Constitution (Article 21).

Therefore, the framers of the Indian Constitution have preferred a proper synthesis between the British principle of parliamentary sovereignty and the American principle of judicial supremacy. The Supreme Court, on the one hand, can declare the parliamentary laws as unconstitutional through its power of judicial review. The Parliament, on the other hand, can amend the major portion of the Constitution through its constituent power.

6. संसदीय संप्रभुता एवं न्यायिक सर्वोच्चता में समन्वय

संसद की संप्रभुता का नियम ब्रिटिश संसद से जुड़ा हुआ है, जबकि न्यायपालिका की सर्वोच्चता का सिद्धांत, अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय से लिया गया है।

जिस प्रकार भारतीय संसदीय प्रणाली, ब्रिटिश प्रणाली से भिन्न है, ठीक उसी प्रकार भारत में सर्वोच्च न्यायालय की न्यायिक समीक्षा शक्ति अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय से कम है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अमेरिकी संविधान में ‘विधि की नियत प्रक्रिया’ का प्रावधान है, जबकि भारतीय संविधान में विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया’ (अनुच्छेद 21) का प्रावधान है।

इसलिए भारतीय संविधान निर्माताओं ने ब्रिटेन की संसदीय संप्रभुता और अमेरिका की न्यायपालिका सर्वोच्चता के बीच उचित संतुलन बनाने को प्राथमिकता दी। एक ओर जहां सर्वोच्च न्यायालय अपनी न्यायिक समीक्षा की शक्तियों के तहत संसदीय कानूनों को असंवैधानिक घोषित कर सकता है, वहीं दूसरी ओर संसद अपनी संवैधानिक शक्तियों के बल पर संविधान के बड़े भाग को संशोधित कर सकती है।

7. Integrated and Independent Judiciary

The Indian Constitution establishes a judicial system that is integrated as well as independent.

The Supreme Court stands at the top of the integrated judicial system in the country. Below it, there are high courts at the state level. Under a high court, there is a hierarchy of subordinate courts, that is, district courts and other lower courts. This single system of courts enforces both the central laws as well as the state laws, unlike in USA, where the federal laws are enforced by the federal judiciary and the state laws are enforced by the state judiciary.

The Supreme Court is a federal court, the highest court of appeal, the guarantor of the fundamental rights of the citizens and the guardian of the Constitution. Hence, the Constitution has made various provisions to ensure its independence–security of tenure of the judges, fixed service conditions for the judges, all the expenses of the Supreme Court charged on the Consolidated Fund of India, prohibition on discussion on the conduct of judges in the legislatures, ban on practice after retirement, power to punish for its contempt vested in the Supreme Court, separation of the judiciary from the executive, and so on.

7. एकीकृत व स्वतंत्र न्यायपालिका

भारतीय संविधान एक ऐसी न्यायपालिका की स्थापना करता है, जो अपने आप में एकीकृत होने के साथ-साथ स्वतंत्र है।

भारत की न्याय व्यवस्था में सर्वोच्च न्यायालय शीर्ष पर है। इसके नीचे राज्य स्तर पर उच्च न्यायालय हैं। राज्यों में उच्च न्यायालय के नीचे क्रमवार अधीनस्थ न्यायालय हैं, जैसे-जिला अदालत व अन्य निचली अदालतें।न्यायालयों का एकल तंत्र. केंद्रीय कानूनों के साथ-साथ राज्य कानूनों को लागू करता है। हालांकि अमेरिका में संघीय कानूनों को संघीय न्यायपालिका और राज्य कानूनों को राज्य न्यायपालिका लागू करती है।

सर्वोच्च न्यायालय, संघीय अदालत है। यह शीर्ष न्यायालय है, जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा की गारंटी देता है और संविधान का संरक्षक है। इसलिए संविधान में इसकी स्वतंत्रता के लिए कई प्रावधान किए गए हैं; जैसे-न्यायाधीशों के कार्यकाल की सुरक्षा, न्यायाधीशों के लिए निर्धारित सेवा शर्ते, भारत की संचित निधि से सर्वोच्च न्यायालय के सभी खर्चों का वहन, विधायिका में न्यायाधीशों के कामकाज पर चर्चा पर रोक, सेवानिवृत्ति के बाद अदालत में कामकाज पर रोक, अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति, कार्यपालिका से न्यायपालिका को अलग रखना इत्यादि।

8. Fundamental Rights

Part III of the Indian Constitution guarantees six fundamental rights to all the citizens:

  1. Right to Equality (Articles 14–18);
  2. Right to Freedom (Articles 19–22);
  3. Right against Exploitation (Articles 23–24);
  4. Right to Freedom of Religion (Articles 25–28);
  5. Cultural and Educational Rights (Articles 29–30); and
  6. Right to Constitutional Remedies (Article 32).

The Fundamental Rights are meant for promoting the idea of political democracy. They operate as limitations on the tyranny of the executive and arbitrary laws of the legislature. They are justiciable in nature, that is, they are enforceable by the courts for their violation. The aggrieved person can directly go to the Supreme Court which can issue the writs of habeas corpus, mandamus, prohibition, certiorari and quo warranto for the restoration of his rights.

However, the Fundamental Rights are not absolute and subject to reasonable restrictions. Further, they are not sacrosanct and can be curtailed or repealed by the Parliament through a Constitutional Amendment Act. They can also be suspended during the operation of a National Emergency except the rights guaranteed by Articles 20 and 21.

8. मौलिक अधिकार

संविधान के तीसरे भाग में छह मौलिक अधिकारों” का वर्णन किया गया है। ये अधिकार हैं:

  1. समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18)।
  2. स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19-22)।
  3. शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23-24)।
  4. धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25-28)।
  5. सांस्कृतिक व शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 29-30)।
  6. संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)।

मौलिक अधिकार का उद्देश्य वस्तुतः राजनीतिक लोकतंत्र की भावना को प्रोत्साहन देना है। यह कार्यपालिका और विधायिका के मनमाने कानूनों पर निरोधक की तरह काम करते हैं। उल्लंघन की स्थिति में इन्हें न्यायालय के माध्यम से लागू किया जा सकता है। जिस व्यक्ति के मौलिक अधिकार का हनन हुआ है, वह सीधे सर्वोच्च न्यायालय की शरण में जा सकता है, जो अधिकारों कीरक्षा के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश प्रतिषेध, अधिकार पृच्छा व उत्प्रेषण जैसे अभिलेख या रिट जारी कर सकता है।

हालांकि मौलिक अधिकार कुछ सीमाओं के दायरे में आते हैं लेकिन ये अपरिवर्तनीय भी नहीं हैं। संसद इन्हें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से समाप्त कर सकती है अथवा इनमें कटौती भी कर सकती है। अनुच्छेद 20-21 द्वारा प्रदत्त अधिकारों को छोड़कर राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान इन्हें स्थगित किया जा सकता है।

9. Directive Principles of State Policy

According to Dr. B.R. Ambedkar, the Directive Principles of State Policy is a ‘novel feature’ of the Indian Constitution. They are enumerated in Part IV of the Constitution. They can be classified into three broad cat-egories–socialistic, Gandhian and liberalintellectual.

The Directive Principles are meant for promoting the ideal of social and economic democracy. They seek to establish a ‘welfare state’ in India. However, unlike the Fundamental Rights, the directives are non-justiciable in nature, that is, they are not enforceable by the courts for their violation. Yet, the Constitution itself declares that ‘these principles are fundamental in the governance of the country and it shall be the duty of the state to apply these principles in making laws’. Hence, they impose a moral obligation on the state authorities for their application. But, the real force (sanction) behind them is political, that is, public opinion.

In the Minerva Mills case (1980), the Supreme Court held that ‘the Indian Constitution is founded on the bedrock of the balance between the Fundamental Rights and the Directive Principles’.

9. राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांत

डॉ. बी.आर. अंबेडकर के अनुसार, राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांत भारतीय संविधान की अनूठी विशेषता है। इनका उल्लेख संविधान के चौथे भाग में किया गया है। इन्हें मोटे तौर पर तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है-सामाजिक, गांधीवादी तथा उदारबौद्धिक।

नीति-निदेशक तत्वों का कार्य सामाजिक व आर्थिक लोकतंत्र को बढ़ावा देना है। इनका उद्देश्य भारत में एक कल्याणकारी राज्य’ की स्थापना करना है। हालांकि मौलिक अधिकारों की तरह इन्हें कानून रूप में लागू नहीं किया जा सकता। संविधान में कहा गया है कि देश की शासन व्यवस्था में ये सिद्धांत मौलिक हैं और यह देश की जिम्मेदारी है कि वह कानून बनाते समय इन सिद्धांतों को अपनाए। इसलिए इन्हें लागू करना राज्यों का नैतिक कर्तव्य है किंतु इनकी पृष्ठभूमि में वास्तविक शक्ति राजनैतिक है, अर्थात् जनमत।

मिनर्वा मिल्स मामले (1980) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि, “भारतीय संविधान की नींव मौलिक अधिकारों और नीति-निदेशक सिद्धांतों के संतुलन पर रखी गई है।”

10. Fundamental Duties

The original constitution did not provide for the Fundamental Duties of the citizens. These were added during the operation of internal emergency (1975–77) by the 42nd Constitutional Amendment Act of 1976 on the recommendation of the Swaran Singh Committee. The 86th Constitutional Amendment Act of 2002 added one more fundamental duty.

The Part IV-A of the Constitution (which consists of only one Article 51-A) specifies the eleven Fundamental Duties viz., to respect the Constitution, national flag and national anthem; to protect the sovereignty, unity and integrity of the country; to promote the spirit of common brotherhood amongst all the people; to preserve the rich heritage of our composite culture and so on.

The fundamental duties serve as a reminder to citizens that while enjoying their rights, they have also to be quite conscious of duties they owe to their country, their society and to their fellowcitizens. However, like the Directive Principles, the duties are also non-justiciable in nature.

10. मौलिक कर्तव्य

मूल संविधान में मौलिक कर्तव्यों का उल्लेख नहीं किया गया है। इन्हें स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश के आधार पर 1976 के 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से आंतरिक आपातकाल (1975-77) के दौरान शामिल किया गया था। 2002 के 86वें संविधान संशोधन ने एक और मौलिक कर्तव्य को जोड़ा।

संविधान के 4ए भाग में 1 मौलिक कर्तव्यों का जिक्र किया गया है (जिसमें केवल एक अनुच्छेद 51-क है)। इसके तहत प्रत्येक भारतीय का यह कर्तव्य होगा कि वह – संविधान, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे, राष्ट्र की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करें; हमारी मिश्रित संस्कृति की समृद्ध धरोहर का अनुरक्षणकरें; सभी लोगों में आपसी भाईचारे की भावना का विकास करें, इत्यादि। ।

मौलिक कर्तव्य नागरिकों को यह याद दिलाते हैं कि अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते समय उन्हें याद रखना चाहिए कि उन्हें अपने समाज, देश व अन्य नागरिकों के प्रति कुछ जिम्मेदारियों का निर्वाह भी करना है। नीति-निदेशक तत्वों की तरह कर्तव्यों को भी कानून रूप में लागू नहीं किया जा सकता।

11. A Secular State

The Constitution of India stands for a Secular State. Hence, it does not uphold any particular religion as the official religion of the Indian State. The following provisions of the Constitution reveal the secular character of the Indian State:

  1. The term ‘secular’ was added to the Preamble of the Indian Constitution by the 42nd Constitutional Amendment Act of 1976.
  2. The Preamble secures to all citizens of India liberty of belief, faith and worship.
  3. The State shall not deny to any person equality before the law or equal protection of the laws (Article 14).
  4. The State shall not discriminate against any citizen on the ground of religion (Article 15).
  5. Equality of opportunity for all citizens in matters of public employment (Article 16).
  6. All persons are equally entitled to freedom of conscience and the right to freely profess, practice and propagate any religion (Article 25).
  7. Every religious denomination or any of its section shall have the right to manage its religious affairs (Article 26).
  8. No person shall be compelled to pay any taxes for the promotion of a particular religion (Article 27).
  9. No religious instruction shall be provided in any educational institution maintained by the State (Article 28).
  10. Any section of the citizens shall have the right to conserve its distinct language, script or culture (Article 29).
  11. All minorities shall have the right to establish and administer educational institutions of their choice (Article 30).
  12. The State shall endeavour to secure for all the citizens a Uniform Civil Code (Article 44).

The Western concept of secularism connotes a complete separation between the religion (the church) and the state (the politics). This negative concept of secularism is inapplicable in the Indian situation where the society is multireligious. Hence, the Indian Constitution embodies the positive concept of secularism, i.e., giving equal respect to all religions or protecting all religions equally.

Moreover, the Constitution has also abolished the old system of communal repre-sentation, that is, reservation of seats in the legislatures on the basis of religion. However, it provides for the temporary reservation of seats for the scheduled castes and scheduled tribes to ensure adequate representation to them.

11. एक धर्मनिरपेक्ष राज्य

भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष है। इसलिए यह किसी धर्म विशेष को भारत के धर्म के तौर पर मान्यता नहीं देता। संविधान के निम्नलिखित प्रावधान भारत के धर्मनिरपेक्ष लक्षणों को दर्शाते हैं:

  1. वर्ष 1976 के 42वें संविधान संशोधन द्वारा संविधान की _प्रस्तावना में ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को जोड़ा गया।
  2. प्रस्तावना हर भारतीय नागरिक की आस्था, पूजा-अर्चना व विश्वास की स्वतन्त्रता की रक्षा करती है।
  3. किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समान समझा जाएगा और उसे कानून की समान सुरक्षा प्रदान की जाएगी (अनुच्छेद-14)।
  4. धर्म के नाम पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाएगा (अनुच्छेद-15)।
  5. सार्वजनिक सेवाओं में सभी नागरिकों को समान अवसर दिए जाएंगे (अनुच्छेद-16)।
  6. हर व्यक्ति को किसी भी धर्म को अपनाने व उसके अनुसार पूजा-अर्चना करने का समान अधिकार है (अनुच्छेद 25)।
  7. हर धार्मिक समूह अथवा इसके किसी हिस्से को अपने  धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार है (अनुच्छेद 26)।
  8. किसी भी व्यक्ति को किसी भी धर्म विशेष के प्रचार के लिए किसी प्रकार का कर देने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा (अनुच्छेद 27)।
  9. किसी भी सरकारी शैक्षिक संस्थान में किसी प्रकार के धार्मिक निर्देश नहीं दिए जाएंगे (28)।

  10. नागरिकों के किसी भी वर्ग को अपनी भाषा, लिपि अथवा संस्कृति को संरक्षित रखने का अधिकार है (अनुच्छेद 29)।

  11. अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद के शैक्षिक संस्थानों की स्थापना करने और उन्हें संचालित करने का अधिकार है (अनुच्छेद 30)।

  12. राज्य सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता बनाने के लिए प्रयास करेगा (अनुच्छेद-44)।

धर्मनिरपेक्षता की पश्चिमी अवधारणा धर्म (चर्च) और राज्य (राजनीति) के बीच पूर्ण अलगाव रखती है। धर्मनिरपेक्षता की यह नकारात्मक अवधारणा भारतीय परिवेश में लागू नहीं हो सकती क्योंकि यहां का समाज बहु धर्मवादी है। इसलिए भारतीय संविधान में सभी धर्मों को समान आदर अथवा सभी धर्मों की समान रूप से रक्षा करते हुए धर्मनिरपेक्षता के सकारात्मक पहलू को शामिल किया गया है।

इसके अलावा संविधान नै विधायिका में धर्म के आधार पर कुसी का आरक्षण देने वाले पुराने धर्म आधारित प्रतिनिधित्व को भी समाप्त कर दिया है। हालांकि संविधान अनुसूचित जाति और जनजाति को उचित प्रतिनिधित्व प्रदान करने के लिए अस्थायी आरक्षण प्रदान करता है।

12. Universal Adult Franchise

The Indian Constitution adopts universal adult franchise as a basis of elections to the Lok Sabha and the state legislative assemblies. Every citizen who is not less than 18 years of age has a right to vote without any discrimination of caste, race, religion, sex, literacy, wealth and so on. The voting age was reduced to 18 years from 21 years in 1989 by the 61st Constitutional Amendment Act of 1988.

The introduction of universal adult franchise by the Constitution-makers was a bold experiment and highly remarkable in view of the vast size of the country, its huge population, high poverty, social inequality and overwhelming illiteracy.

Universal adult franchise makes democracy broad-based, enhances the self-respect and prestige of the common people, upholds the principle of equality, enables minorities to protect their interests and opens up new hopes and vistas for weaker sections.

12. सार्वभौम वयस्क मताधिकार

भारतीय संविधान द्वारा राज्य विधानसभाओं और लोकसभा के चुनाव के आधारस्वरूप सार्वभौम वयस्क मताधिकार को अपनाया गया है। हर वह व्यक्ति जिसकी उम्र कम से कम 18 वर्ष है, उसे धर्म, जाति, लिंग, साक्षरता अथवा संपदा इत्यादि के आधार पर कोई भेदभाव किए बिना मतदान करने का अधिकार है। वर्ष 1989 में 61वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1988 के द्वारा मतदान करने की उम्र को 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष कर दिया गया था।

देश के वृहद आकार, जनसंख्या, उच्च गरीबी, सामाजिक असमानता, अशिक्षा आदि को देखते हुए संविधान निर्माताओं द्वारा सार्वभौम वयस्क मताधिकार को संविधान में शामिल करना एक साहसिकवसराहनीय प्रयोग था।

वयस्क मताधिकार लोकतंत्र को बड़ा आधार देने के साथसाथ आम जनता के स्वाभिमान में वृद्धि करता है, समानता के सिद्धांत को लागू करता है, अल्पसंख्यकों को अपने हितों की रक्षा करने का अवसर देता है तथा कमजोर वर्गों के लिए नई आशाएं और प्रत्याशा जगाता है।

13. Single Citizenship

Though the Indian Constitution is federal and envisages a dual polity (Centre and states), it provides for only a single citizenship, that is, the Indian citizenship.

In countries like USA, on the other hand, each person is not only a citizen of USA, but also a citizen of the particular state to which he belongs. Thus, he owes allegiance to both and enjoys dual sets of rights–one conferred by the National government and another by the state government.

In India, all citizens irrespective of the state in which they are born or reside enjoy the same political and civil rights of citizenship all over the country and no discrimination is made between them.

Despite the constitutional provision for a single citizenship and uniform rights for all the people, India has been witnessing the communal riots, class conflicts, caste wars, linguistic clashes and ethnic disputes. This means that the cherished goal of the Constitution-makers to build a united and integrated Indian nation has not been fully realised.

13. एकल नागरिकता

यद्यपि भारतीय संविधान फेडरल है और दो लक्षणों (एकल व संघीय) का प्रतिनिधित्व करता है मगर इसमें केवल एकल नागरिकता का प्रावधान है अर्थात भारतीय नागरिकता।

दूसरी ओर, अमेरिका जैसे देशों में प्रत्येक व्यक्ति के पास न केवल देश की नागरिकता होती है बल्कि वह जिस राज्य में रहता है उसकी भी नागरिकता होती है। इसलिए वह अधिकारों के दो समूहों का लाभ उठाता है- पहला, राष्ट्रीय सरकार द्वारा प्रदत्त, तथा; दूसरा, राज्य सरकार द्वारा प्रदत्त।

भारत में, सभी नागरिकों को चाहे वो किसी भी राज्य में पैदा हुए हो या रहते हों, संपूर्ण देश में नागरिकता के समान राजनीतिक और नागरिक अधिकार प्राप्त होते हैं और उनमें कोई भेदभाव नहीं किया जाता, सिवाए कुछ मामलों के, जैसे-जनजातीय क्षेत्र, जम्मू और कश्मीर इत्यादि। सभी नागरिकों के लिए एकल नागरिकता और समान अधिकारों के संवैधानिक प्रावधानों के बावजूद भारत में सांप्रदायिक दंगे, वर्ग संघर्ष, जातिगत युद्ध, भाषायी विवाद और नृजातीय विवाद होते रहे हैं। इसका अर्थ यह है कि, संविधान के निर्माताओं ने एकीकृत और संगठित भारत राष्ट्र के निर्माण का जो सपना देखा था, वह पूरी तरह पूरा नहीं हो पाया है।

14. Independent Bodies

The Indian Constitution not only provides for the legislative, executive and judicial organs of the Government (Central and state) but also establishes certain independent bodies. They are envisaged by the Constitution as the bulkworks of the democratic system of Government in India. These are:

  1. Election Commission to ensure free and fair elections to the Parliament, the state legislatures, the office of President of India and the office of Vice-president of India.
  2. Comptroller and Auditor-General of India to audit the accounts of the Central and state governments. He acts as the guardian of public purse and comments on the legality and propriety of Government expenditure.
  3. Union Public Service Commission to conduct examinations for recruitment to all-India services and higher Central services and to advise the President on disciplinary matters.
  4. State Public Service Commission in every state to conduct examinations for recruitment to state services and to advice the governor on disciplinary matters.

The Constitution ensures the independence of these bodies through various provisions like security of tenure, fixed service conditions, expenses being charged on the Consolidated Fund of India, and so on.

14. स्वतंत्र निकाय

भारतीय संविधान केवल विधायिका, कार्यपालिका व सरकार (केन्द्र और राज्य) न्यायिक अंग ही उपलब्ध कराता है। बल्कि यह कुछ स्वतंत्र निकायों की स्थापना भी करता है। इन्हें संविधान ने भारत सरकार के लोकतांत्रिक तंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभों के रूप में परिकल्पित किया है। ऐसे कुछ स्वतंत्र निकाय निम्नलिखित हैं:

  1. संसद, राज्य विधानसभाओं भारत के राष्ट्रपति और भारत के उप-राष्ट्रपति के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने हेतु निर्वाचन आयोग।
  2. राज्य और केंद्र सरकार के खातों के अंकेक्षण के लिए भारत का नियंत्रक एवं महालेखाकार। ये जनता के पैसे के संरक्षक होते हैं और सरकार द्वारा किए गए खर्चों की वैधानिकता और उनके उचित होने पर टिप्पणी करते हैं।
  3. संघ लोक सेवा आयोग। यह अखिल भारतीय सेवाओं व उच्च स्तरीय केंद्रीय सेवाओं के लिए भर्ती हेतु परीक्षाओं का आयोजन करता है तथा अनुशासनात्मक मामलों पर राष्ट्रपति को सलाह देता है।
  4. राज्य लोक सेवा आयोग, जिसका काम हर राज्य में राज्य सेवाओं के लिए भर्ती हेतु परीक्षाओं का आयोजन करना व अनुशासनात्मक मामलों पर राज्यपाल को सलाह देना है।

विभिन्न प्रावधानों, यथा-कार्यकाल की सुरक्षा, निर्धारित सेवा शर्ते, भारत की संचित निधि पर भारित विभिन्न व्यय आदि के माध्यम से संविधान इन निकायों की स्वतंत्रता सुनिश्चित करता है।

15. Emergency Provisions

The Indian Constitution contains elaborate emergency provisions to enable the President to meet any extraordinary situation effectively. The rationality behind the incorporation of these provisions is to safeguard the sovereignty, unity, integrity and security of the country, the democratic political system and the Constitution.

The Constitution envisages three types of emergencies, namely:

  1. National emergency on the ground of war or external aggression or armed rebellion (Article 352);
  2. State emergency (President’s Rule) on the ground of failure of Constitutional machinery in the states (Article 356) or failure to comply with the directions of the Centre (Article 365); and
  3. Financial emergency on the ground of threat to the financial stability or credit of India (Article 360).

During an emergency, the Central Government becomes allpowerful and the states go into the total control of the centre. It converts the federal structure into a unitary one without a formal amendment of the Constitution. This kind of transformation of the political system from federal (during normal times) to unitary (during emergency) is a unique feature of the Indian Constitution.

15. आपातकालीन प्रावधान

आपातकाल की स्थिति से प्रभावशाली ढंग से निपटने के लिए भारतीय संविधान में राष्ट्रपति के लिए बृहद आपातकालीन प्रावधानों की व्यवस्था है। इन प्रावधानों को संविधान में शामिल करने का उद्देश्य है-देश की संप्रभुता, एकता, अखण्डता और सुरक्षा, संविधान एवं देश के लोकतांत्रिक ढांचे को सुरक्षा प्रदान करना।

संविधान में तीन प्रकार के आपातकाल की विवेचना की गई है।

  1. राष्ट्रीय आपातकालः युद्ध, आक्रमण अथवा सशस्त्र विद्रोह  पैदा हुई राष्ट्रीय अशांति की अवस्था (अनुच्छेद-352)।
  2. राज्य में आपातकाल (राष्ट्रपति शासन ) राज्यों में संवैधानिक तंत्र की असफलता (अनुच्छेद 356) या केन्द्र के निदेशों का अनुपालन करने में असफलता (अनुच्छेद 365)।
  3. वित्तीय आपातकालः भारत की वित्तीय स्थिरता या प्रत्यय संकट में हो (अनुच्छेद 360)।

आपातकाल के दौरान देश की पूरी सत्ता केंद्र सरकार के हाथों में आ जाती है और राज्य केंद्र के नियंत्रण में चले जाते हैं।इससे संविधान में संशोधन किए बगैर देश का ढांचा संघीय से एकात्मक हो जाता है। राजनीतिक तंत्र का संघीय (सामान्य परिस्थितियों के दौरान) से एकात्मक (आपातकाल के दौरान) में परिवर्तित होना भारतीय संविधान की एक अद्वितीय विशेषता है।

16. Three-tier Government

Originally, the Indian Constitution, like any other federal Constitution, provided for a dual polity and contained provisions with regard to the organisation and powers of the Centre and the states. Later, the 73rd and 74th Constitutional Amendment Acts (1992) have added a third-tier of Government (i.e., local) which is not found in any other Constitution of the world.

The 73rd Amendment Act of 1992 gave constitutional recognition to the panchay-ats (rural local governments) by adding a new Part IX and a new Schedule 11 to the Constitution. Similarly, the 74th Amendment Act of 1992 gave constitutional recognition to the municipalities (urban local governments) by adding a new Part IX-A and a new Schedule 12 to the Constitution.

16. त्रिस्तरीय सरकार

मूल रूप से अन्य संघीय संविधानों की तरह भारतीय संविधान में दो स्तरीय राजव्यवस्था (केंद्र व राज्य) और संगठन के संबंध में प्रावधान तथा केंद्र एवं राज्यों की शक्तियां अंतर्विष्ट थी। बाद में वर्ष 1992 में 73वें एवं 74वें संविधान संशोधन ने तीन स्तरीय (स्थानीय) सरकार का प्रावधान किया गया, जो विश्व के किसी और संविधान में नहीं है।

संविधान में एक नए भाग (वें) एवं नई अनुसूची (11वीं) जोड़कर वर्ष 1992 के 73वें संविधान संशोधन के माध्यम से पंचायतों को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई। इसमें एक नया भाग 9″ जोड़ा गया। इसी प्रकार से 74वें संविधान संशोधन विधेयक, 1992 ने एक नए भाग १ए तथा नई अनुसूची 12वीं को जोड़कर नगरपालिकाओं (शहरी स्थानीय सरकारें) को संवैधानिक मान्यता प्रदान की।

17. Co-operative Societies

The 97th Constitutional Amendment Act of 2011 gave a constitutional status and protection to co-operative societies. In this context, it made the following three changes in the Constitution:

  1. It made the right to form co-operative societies a fundamental right (Article 19).
  2. It included a new Directive Principle of State Policy on promotion of co-operative societies (Article 43-B).
  3. It added a new Part IX-B in the Constitution which is entitled as “The Co-operative Societies” (Articles 243-ZH to 243-ZT).

The new Part IX-B contains various provisions to ensure that the co-operative societies in the country function in a democratic, professional, autonomous and economically sound manner. It empowers the Parliament in respect of multi-state cooperative societies and the state legislatures in respect of other co-operative societies to make the appropriate law.

17. सहकारी समितियाँ

2011 के 97 वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम ने सहकारी समितियों को संवैधानिक दर्जा और संरक्षण दिया। इस संदर्भ में, इसने संविधान में निम्नलिखित तीन परिवर्तन किए:

  1. इसने सहकारी समितियों को मौलिक अधिकार बनाने का अधिकार बनाया (अनुच्छेद 19)।
  2. इसमें सहकारी समितियों के संवर्धन पर राज्य नीति का एक नया निर्देश सिद्धांत शामिल था (अनुच्छेद 43-बी)।
  3. इसने संविधान में एक नया भाग IX-B जोड़ा जो “सहकारी समितियों” के रूप में हकदार है (अनुच्छेद 243-ZH से 243-ZT)।

नए भाग IX-B में यह सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न प्रावधान हैं कि देश में सहकारी समितियाँ लोकतांत्रिक, व्यावसायिक, स्वायत्त और आर्थिक रूप से सुदृढ़ रूप से कार्य कर सके। यह संसद को बहु-राज्य सहकारी समितियों और राज्य विधानसभाओं के संबंध में अन्य सहकारी समितियों के संबंध में उचित कानून बनाने का अधिकार देता है।

Sources of the Constitution at a Glance संविधान के स्रोत, एक नजर में
Sources स्रोत Features Borrowed
ली गयी विशेषताएं
1 Government of India Act of 1935
भारत शासन अधिनियम, 1935
Federal Scheme, Office of governor, Judiciary, Public Service Commissions, Emergency provisions and administrative details.
संघीय तंत्र, राज्यपाल का कार्यालय, न्यायपालिका, लोक सेवा आयोग, आपातकालीन उपबंध व प्रशासनिक विवरण।
2 British Constitution
ब्रिटेन का संविधान
Parliamentary government, Rule of Law, legislative procedure, single citizenship, cabinet system, prerogative writs, parliamentary privileges and bicameralism.
संसदीय शासन, विधिका शासन, विधायी प्रक्रिया, एकल नागरिकता, मंत्रिमण्डल प्रणाली, परमाधिकार लेख, संसदीय विशेषाधिकार और द्विसदनवाद।
3 US Constitution
संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधान
Fundamental rights, independence of judiciary, judicial review, impeachment of the president, removal of Supreme Court and high court judges and post of vice president.
मूल अधिकार, न्यायापालिका की स्वतंत्रता, न्यायिक पुनरावलोकन का सिद्धांत, उप-राष्ट्रपति का पद, उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का पद से हटाया जाना और राष्ट्रपति पर महाभियोग।
4 Irish Constitution
आयरलैंड का संविधान
Directive Principles of State Policy, nomination of members to Rajya Sabha and method of election of president.
राज्य के नीति-निदेशक सिद्धांत, राष्ट्रपति की निर्वाचन पद्धति और राज्य सभा के लिए सदस्यों का नामांकन।
5 Canadian Constitution
कनाडा का संविधान
Federation with a strong Centre, vesting of residuary powers in the Centre, appointment of state governors by the Centre, and advisory jurisdiction of the Supreme Court.
सशक्त केन्द्र के साथ संघीय व्यवस्था, अवशिष्ट शक्तियों का केन्द्र में निहित होना, केन्द्र द्वारा राज्य के राज्यपालों की नियुक्ति और उच्चतम न्यायालय का परामर्शी न्याय निर्णयन।
6 Australian Constitution
ऑस्ट्रेलिया का संविधान
Concurrent List, freedom of trade, commerce and inter-course, and joint sitting of the two Houses of Parliament.
समवर्ती सूची, व्यापार, वाणिज्य और समागम की स्वतंत्रता और संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक।
7 Weimar Constitution of Germany
जर्मनी का वाइमर संविधान
Suspension of Fundamental Rights during Emergency.
आपातकाल के समय मूल अधिकारों का स्थगन।
8 Soviet Constitution (USSR, now Russia)
सोवियत संघ (पूर्व) का संविधान
Fundamental duties and the ideal of justice (social, economic and political) in the Preamble.
मूल कर्तव्य और प्रस्तावना में न्याय (सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक) का आदर्श।
9 French Constitution
फ्रांस का संविधान
Republic and the ideals of liberty, equality and fraternity in the Preamble.
10 South African Constitution
दक्षिणी अफ्रीका का संविधान
Procedure for amendment of the Constitution and election of members of Rajya Sabha.
गणतंत्रात्मक और प्रस्तावना में स्वतंत्रता, समता और बंधुता के आदर्श।
11 Japanese Constitution
जापान का संविधान
Procedure established by Law.
संविधान में संशोधन की प्रक्रिया और राज्यसभा के सदस्यों का निर्वाचन। विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया।