भारतीय संविधान की आलोचना

भारत का संविधान जैसा कि संविधान सभा द्वारा बनाया और अंगीकार किया गया, की आलोचना निम्नलिखित आधारों पर की जाती है:

1. उधार का संविधान

आलोचक कहते हैं कि भारतीय संविधान में नया और मौलिक कुछ भी नहीं है। वे इसे ‘उधार का संविधान’ कहते हैं और ‘उधारी की एक बोरी’ अथवा एक ‘हॉच पांच कन्स्टीच्युशन’ दुनिया के संविधानों के लिए विभिन्न दस्तावेजों की ‘पैबन्दगिरी।’ लेकिन ऐसी आलोचना पक्षपातपूर्ण एवं अंतार्किक है। ऐसा इसलिए कि संविधान बनाने वालों ने अन्य संविधान के आवश्यक संशोधन करके ही भारतीय परिस्थितियों में उनकी उपयुक्तता के आधार पर उनकी कमियों को दरकिनार करके ही स्वीकार किया।

उपरोक्त, आलोचना का उत्तर देते हुए डा. वी.आर. अम्बेदकर ने संविधान सभा में कहा-“कोई पूछ सकता है कि इस घड़ी दुनिया के इतिहास में बनाए गए संविधान में नया कुछ हो सकता है। सौ साल से अधिक हो गए जबकि दुनिया का पहला लिखित संविधान बना। इसका अनुसरण अनेक देशों ने किया और अपने देश के संविधान को लिखित बनाकर उसे छोटा बना दिया। किसी संविधान का विषय क्षेत्र क्या होना चाहिए। यह पहले ही तय हो चुका है, उसी प्रकार किसी संविधान के मूलभूत तत्वों की जानकारी और मान्यता आज पूरी दुनिया में है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सभी संविधानों में मुख्य प्रावधानों में समानता दिख सकती है। केवल एक नई चीज यह हो सकती है किसी संविधान में जिसका निर्माण इतने विलंब से हुआ है कि उसमें गलतियों को दूर करने और देश की जरूरतों के अनुरूप उसको टालने की विविधता उसमें मौजूद रहे। यह दोषारोपण कि यह संविधान अन्य देशों के संविधानों की हू-ब-हू नकल है, मैं समझता हूं, संविधान के यथेष्ट अध्ययन पर आधारित नहीं है।”

2. 1935 के अधिनियम की कार्बन कॉपी

आलोचकों ने कहा कि संविधान निर्माताओं ने बड़ी संख्या में भारत सरकार अधिनियम 1935 के प्रावधान भारत के संविधान में डाल दिए। इससे संविधान 1935 के अधिनियम की कार्बन कॉपी बनकर रह गया या फिर उसका ही संशोधित रूप उदाहरण के लिए एन. श्रीनिवासन का कहना है कि भारतीय संविधान भाषा और वस्तु दोनों ही तरह से 1935 के अधिनियम की नकल है। उसी प्रकार सर आइबर जेनिंग्स, ब्रिटिश संविधानवेत्ता ने कहा कि संविधान भारत सरकार अधिनियम 1935 से सीधे निकलता है, जहां से वास्तव में अधिकांश प्रावधानों के पाठ बिल्कुल उतार लिए गए हैं।

पुनः पी.आर. देशमुख, संविधान सभा सदस्य ने टिप्पणी की कि “संविधान अनिवार्यतः भारत सरकार अधिनियम 1935 ही है, बस वयस्क मताधिकार उसमें जुड़ गया है।”

उपरोक्त आलोचनाओं का उत्तर संविधान सभा में बी.आर. अम्बेदकर ने इस प्रकार दिया – “जहां तक इस आरोप की बात है कि प्रारूप संविधान में भारत सरकार अधिनियम 1935 का अच्छा-खासा हिस्सा शामिल कर लिया गया है, मैं क्षमा याचना नहीं करूंगा। उधार लेने में कुछ भी लज्जास्पद नहीं है। इसमें साहित्यिक चोरी शामिल नहीं है। संविधान के मूल विचारों पर किसी का एकस्व अधिकार (Patent Rights) नहीं है। मुझे खेद इस बात के लिए है भारत सरकार अधिनियम, 1935 से लिए गए प्रावधान अधिकतर प्रशासनिक विवरणों से सम्बन्धित हैं।

3. अभारतीय अथवा भारतीयता विरोधी

आलोचकों के अनुसार भारत का संविधान ‘अ-भारतीय’ या ‘भारतीयता विरोधी’ है क्योंकि यह भारत की राजनीतिक परम्पराओं अथवा भावनाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करता। उनका कहना है कि संविधान की प्रकृति विदेशी है जिससे यह भारतीय परिस्थितियों के लिए अनुपयुक्त एवं अकारण है। इस संदर्भ में के. हनुमंथैय्या, संविधान सभा सदस्य ने टिप्पणी की-“हम वीणा या सितार का संगीत चाहते थे, लेकिन यहां हम एक इंग्लिश बैंड का संगीत सुन रहे हैं। ऐसा इसलिए कि हमारे संविधान निर्माता उसी प्रकार से शिक्षित हुए।” उसी प्रकार लोकनाथ मिश्रा, एक अन्य संविधान सभा सदस्य ने संविधान की आलोचना करते हुए इसे “पश्चिम का दासवत अनुकरण, बल्कि पश्चिम को दासवत आत्मसमर्पण कहा।’123 लक्ष्मीनारायण साहू, एक अन्य संविधान सभा सदस्य का कहना था-“जिन आदर्शों पर यह प्रारूप संविधान गढ़ा गया है भारत की मूलभूत उनमें प्रगट नहीं होती। यह संविधान उपयुक्त सिद्ध नहीं होगा और लागू होने के फौरन बाद ही टूट जाएगा।”

4. गांधीवाद से दूर संविधान

आलोचकों के अनुसार भारत का संविधान गांधीवादी दर्शन और मूल्यों को प्रतिबिम्बित नहीं करता, जबकि गांधी जी हमारे राष्ट्रपिता हैं। उनका कहना था कि संविधान ग्राम पंचायत तथा जिला पंचायतों के आधार पर निर्मित होना चाहिए था। इस संदर्भ में, वही सदस्य के. हनुमंथैय्या ने कहा-“यह वही संविधान है जिसे महात्मा गांधी कभी नहीं चाहते, न ही संविधान को उन्होंने विचार किया होगा।” टी. प्रकाशम संविधान सभा के एक और सदस्य इस कमी का कारण गांधीजी के आंदोलन में अम्बेदकर की सहभागिता नहीं होना, साथ ही गांधीवाद विचारों के प्रति उनका तीव्र विरोध को बताते हैं।

5. महाकाय आकार

आलोचक कहते हैं कि भारत का संविधान बहुत भीमकाय और बहुत विस्तृत है जिसमें अनेक अनावश्यक तत्व भी सम्मिलित हैं। सर आइवर जेनिंग्स, एक ब्रिटिश संविधानवेत्ता के विचार में जो प्रावधान बाहर से लिए गए हैं उनका चयन बेहतर नहीं है और संविधान सामान्य रूप से कहें, तो बहुत लंबा और जटिल है।

इस संदर्भ में एच.वी. कामथ, संविधान सभा के सदस्य ने टिप्पणी की-“प्रस्तावना, जिस किरीट का हमने अपनी सभा के लिए चयन किया है, वह एक हाथी है। यह शायद इस तथ्य के अनुरूप ही है कि हमारा संविधान भी दुनिया में बने तमाम संविधानों में सबसे भीमकाय है।” उन्होंने यह भी कहा-“मुझे विश्वास है, सदन इस पर सहमत नहीं होगा कि हमने एक हाथीनुमा संविधान बनाया है।”

6. वकीलों का स्वर्ग

आलोचकों के अनुसार भारत का संविधान अत्यंत विधिवादितापूर्ण तथा बहुत जटिल है। उनके विचार में जिस कानूनी भाषा और मुहावरों को शामिल किया है उनके चलते संविधान एक जटिल दस्तावेज बन गया है। वही सर आइवर जेनिंग्स इसे ‘वकीलों का स्वर्ग’ कहते हैं।

इस संदर्भ में एच.के. माहेश्वरी, संविधान सभा के सदस्य का कहना था-“प्रारूप लोगों को अधिक मुकदमेबाज बनाता है, अदालतों की ओर अधिक उन्मुख होंगे, वे कम सत्यनिष्ठ होंगे, और सत्य और अहिंसा के तरीकों का पालन वे नहीं करेंगे। यदि में ऐसा कह सकू तो यह प्रारूप वास्तव में ‘वकीलों का स्वर्ग’ है। यह वाद या मुकदमों की व्यापक संभावना खोलता है और हमारे योग्य और बुद्धिमान वकीलों के हाथ में बहुत सारा काम देने वाला है।”

उसी प्रकार संविधान सभा के एक अन्य सदस्य पी.आर. देशमुख ने कहा- ‘मैं यह कहना चाहूंगा कि सदन के समक्ष डा. अम्बेदकर ने जो अनुच्छेदों का प्रारूप प्रस्तुत किया है, मेरी समझ से अत्यंत भारी-भरकम है, जैसा कि एक भारी-भरकम जिल्दवाला विधि-ग्रंथ हो। संविधान से सम्बन्धित कोई दस्तावेज इतना अधिक अनावश्यक विस्तार तथा शब्दाडम्बर का इस्तेमाल नहीं करता। शायद उनके लिए ऐसे दस्तावेज को तैयार करना कठिन था जिसे, मेरी समझ से एक विधि ग्रंथ नहीं बल्कि एक सामाजिक राजनीतिक दस्तावेज होना था, एक जीवंत स्पंदनयुक्त, जीवनदायी दस्तावेज। लेकिन हमारा दुर्भाग्य कि ऐसा नहीं हुआ और हम शब्दों और शब्दों से लद गए हैं जिन्हें बहुत आसानी से हटाया जा सकता था।

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