Citizenship नागरिकता

MEANING AND SIGNIFICANCE

Like any other modern state, India has two kinds of people–citizens and aliens. Citizens are full members of the Indian State and owe allegiance to it. They enjoy all civil and political rights. Aliens, on the other hand, are the citizens of some other state and hence, do not enjoy all the civil and political rights. They are of two categories–friendly aliens or enemy aliens. Friendly aliens are the subjects of those countries that have cordial relations with India. Enemy aliens, on the other hand, are the subjects of that country that is at war with India. They enjoy lesser rights than the friendly aliens, eg, they do not enjoy protection against arrest and detention (Article 22).

The Constitution confers the following rights and privileges on the citizens of India (and denies the same to aliens):

  1. Right against discrimination on grounds of religion, race, caste, sex or place of birth (Article 15).
  2. Right to equality of opportunity in the matter of public employment (Article 16).
  3. Right to freedom of speech and expression, assembly, association, movement, residence and profession (Article 19).
  4. Cultural and educational rights (Articles 29 and 30).
  5. Right to vote in elections to the Lok Sabha and state legislative assembly.
  6. Right to contest for the membership of the Parliament and the state legislature.
  7. Eligibility to hold certain public offices, that is, President of India, Vice-President of India, judges of the Supreme Court and the high courts, Governor of states, Attorney General of India and Advocate General of states.

Along with the above rights, the citizens also owe certain duties towards the Indian State, as for example, paying taxes, respecting the national flag and national anthem, defending the country and so on.

In India both a citizen by birth as well as a naturalised citizen are eligible for the office of President while in USA, only a citizen by birth and not a naturalised citizen is eligible for the office of President.

नागरिकता : अर्थ एवं महत्व

किसी अन्य आधुनिक राज्य की तरह भारत में दो तरह के लोग हैं, नागरिक और विदेशी। नागरिक भारतीय राज्य के पूर्ण सदस्य होते हैं और उनकी इस पर पूर्ण निष्ठा होती है। इन्हें सभी सिविल और राजनीतिक अधिकार प्राप्त होते हैं। दूसरी ओर, विदेशी किसी अन्य राज्य के नागरिक होते हैं इसलिए उन्हें सभी नागरिक एवं राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं होते हैं। इनकी दो श्रेणियां होती हैं- विदेशी मित्र एवं विदेशी शत्रु। विदेशी मित्र वे होते हैं, जिनके भारत के साथ सकारात्मक संबंध होते हैं। विदेशी शत्रु वे हैं, जिनके साथ भारत का युद्ध चल रहा हो। उन्हें कम अधिकार प्राप्त होते हैं तथा वे गिरफ्तारी और नजरबंदी के विरुद्ध सुरक्षित नहीं होते (अनुच्छेद 22)।

संविधान भारतीय नागरिकों को निम्नलिखित अधिकार एवं विशेषाधिकार प्रदान करता है। विदेशियों को नहीं:

  1. धर्म, मूल वंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर विभेद के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 15)।
  2. लोक नियोजन के विषय में समता का अधिकार (अनुच्छेद 16)।
  3. वक् स्वातंत्र्य एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सम्मेलन, संघ, संचरण, निवास व व्यवसाय की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19)।
  4. संस्कृति और शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29 व 30)।
  5. लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनाव में मतदान का अधिकार।
  6. संसद एवं राज्य विधानमंडल की सदस्यता के लिए चुनाव लड़ने का अधिकार।
  7. सार्वजनिक पदों, जैसे-राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, उच्चतम एवं उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, राज्यों के राज्यपाल, महान्यायवादी एवं महाधिवक्ता की योग्यता रखने का अधिकार।

उपरोक्त अधिकारों के साथ नागरिकों को भारत के प्रति कुछ कर्तव्यों का भी निर्वहन करना होता है। उदाहरण के लिए कर भुगतान, राष्ट्रीय ध्वज एवं राष्ट्रगान का सम्मान, देश की रक्षा आदि।

भारत में नागरिक जन्म से या प्राकृतिक रूप से राष्ट्रपति बनने की योग्यता रखते हैं, जबकि अमेरिका में केवल जन्म से नागरिक ही राष्ट्रपति बन सकता है।

CONSTITUTIONAL PROVISIONS

The Constitution deals with the citizenship from Articles 5 to 11 under Part II. However, it contains neither any permanent nor any elaborate provisions in this regard. It only identifies the persons who became citizens of India at its commencement (i.e., on January 26, 1950). It does not deal with the problem of acquisition or loss of citizenship subsequent to its commencement. It empowers the Parliament to enact a law to provide for such matters and any other matter relating to citizenship. Accordingly, the Parliament has enacted the Citizenship Act (1955), which has been amended from time to time.

According to the Constitution, the following four categories of persons became the citizens of India at its commencement i.e., on January 26, 1950:

  1. A person who had his domicile in India and also fulfilled any one of the three conditions, viz., if he was born in India; or if either of his parents was born in India; or if he has been ordinarily resident in India for five years immediately before the commencement of the Constitution, became a citizen of India.
  2. A person who migrated to India from Pakistan became an Indian citizen if he or either of his parents or any of his grandparents was born in undivided India and also fulfilled any one of the two conditions viz., in case he migrated to India before July 19, 19481 , he had been ordinarily resident in India since the date of his migration; or in case he migrated to India on or after July 19, 1948, he had been registered as a citizen of India. But, a person could be so registered only if he had been resident in India for six months preceding the date of his application for registration.
  3. A person who migrated to Pakistan from India after March 1, 1947, but later returned to India for resettlement could become an Indian citizen. For this, he had to be resident in India for six months preceding the date of his application for registration2 .
  4. A person who, or any of whose parents or grandparents, was born in undivided India but who is ordinarily residing outside India shall become an Indian citizen if he has been registered as a citizen of India by the diplomatic or consular representative of India in the country of his residence, whether before or after the commencement of the Constitution. Thus, this provision covers the overseas Indians who may want to acquire Indian citizenship.

To sum up, these provisions deal with the citizenship of (a) persons domiciled in India; (b) persons migrated from Pakistan; (c) persons migrated to Pakistan but later returned; and (d) persons of Indian origin residing outside India.

The other constitutional provisions with respect to the citizenship are as follows:

  1. No person shall be a citizen of India or be deemed to be a citizen of India, if he has voluntarily acquired the citizenship of any foreign state.
  2. Every person who is or is deemed to be a citizen of India shall continue to be such citizen, subject to the provisions of any law made by Parliament.
  3. Parliament shall have the power to make any provision with respect to the acquisition and termination of citizenship and all other matters relating to citizenship.

संवैधानिक उपबंध

संविधान के भाग-II में अनुच्छेद 5 से 11 तक में नागरिकता के बारे में चर्चा की गई है। इस संबंध में इसमें स्थायी और विस्तृत उपबंध नहीं हैं, यह सिर्फ उन लोगों की पहचान करता है, जो संविधान लागू होने के समय (अर्थात् 26 जनवरी, 1950)भारत के नागरिक बने। इसमें न तो इनके अधिग्रहण एवं न ही नागरिकता की हानि की चर्चा की गई है। यह संसद को इस बात का अधिकार देता है कि वह नागरिकता से संबंधित मामलों की व्यवस्था करने के लिए कानून बनाए। इसी प्रकार संसद ने नागरिकता अधिनियम, 1955 को लागू किया, जिसका 1957, 1960, 1985, 1986, 1992, 2003, 2005 और 2015 में संशोधन किया गया।

संविधान निर्माण के उपरांत ( 26 जनवरी, 1950) संविधान के अनुसार चार श्रेणियों के लोग भारत के नागरिक बने:

  1. एक व्यक्ति, जो भारत का मूल निवासी है और तीन में से कोई एक शर्त पूरी करता है। ये शर्ते हैं-यदि उसका जन्म भारत में हुआ हो, या उसके माता-पिता में से किसी एक का जन्म भारत में हुआ हो या संविधान लागू होने के पांच वर्ष पूर्व से भारत में रह रहा हो।
  2. एक व्यक्ति, जो पाकिस्तान से भारत आया हो और यदि उसके माता-पिता या दादा-दादी अविभाजित भारत में पैदा हुए हों और निम्न दो में से कोई एक शर्त पूरी करता हो, वह भारत का नागरिक बन सकता है- यदि वह 19 जुलाई, 1948 से पूर्व स्थानांतरित हुआ हो, अपने प्रवसन की तिथि से उसने सामान्यतः भारत में निवास किया हो; और यदि उसने 19 जुलाई, 1948 को या उसके बाद भारत में प्रवसन किया हो तो वह भारत के नागरिक के रूप में पंजीकृत हो, लेकिन ऐसे व्यक्ति का पंजीकृत होने के लिए छह माह तक भारत में निवास आवश्यक है (अनुच्छेद 6)।
  3. एक व्यक्ति, जो 1 मार्च, 1947 के बाद भारत से पाकिस्तान स्थानांतरित हो गया हो, लेकिन बाद में फिर भारत में पुनर्वास के लिए लौट आए तो वह भारत का नागरिक बन सकता है। उसे पंजीकरण प्रार्थना-पत्र के बाद छह माह तक रहना होगा (अनुच्छेद 7)।
  4. एक व्यक्ति, जिसके माता-पिता या दादा-दादी अविभिाजित भारत में पैदा हुए हों लेकिन वह भारत के बाहर रह रहा हो। फिर भी वह भारत का नागरिक बन सकता है, यदि उसने भारत के नागरिक के रूप में पंजीकरण कूटनीतिज्ञ तरीके या पार्षदीय प्रतिनिधि के रूप में आवेदन किया हो। यह व्यवस्था भारत के बाहर रहने वाले भारतीयों के लिए बनाई गई है ताकि वे भारत की नागरिका ग्रहण कर सकें (अनुच्छेद 8)।

कुल मिलाकर ये व्यवस्थाएं, नागरिकों की चर्चा करती हैं(i) व्यक्ति जो भारत का मूल निवासी हो, (ii) व्यक्ति पाकिस्तान से स्थानांतरित हुआ हो, (iii) व्यक्ति पाकिस्तान स्थानांतरित हुआ हो, लेकिन बाद में लौट आया हो, (iv) भारतीय मूल का व्यक्ति जो बाहर रह रहा हो।

नागरिकता संबंधी अन्य संवैधानिक प्रावधान इस प्रकार हैं

  1. वह व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं होगा या भारत का नागरिक नहीं माना जायेगा, जो स्वेच्छा से किसी अन्य देश की नागरिकता ग्रहण कर लेगा (अनुच्छेद 9)।
  2. प्रत्येक व्यक्ति, जो भारत का नागरिक है या समझा जाता है, यदि संसद इस प्रकार के किसी विधान का निर्माण करे (अनुच्छेद 10)।
  3. संसद को यह अधिकार है कि वह नागरिकता के अर्जन और समाप्ति के तथा नागरिकता से संबंधित अन्य सभी विषयों के संबंध में विधि बना सकती है (अनुच्छेद 11)।

CITIZENSHIP ACT, 1955

The Citizenship Act (1955) provides for acquisition and loss of citizenship after the commencement of the Constitution.

Originally, the Citizenship Act (1955) also provided for the Commonwealth Citizenship. But, this provision was repealed by the Citizenship (Amendment) Act, 2003.

Acquisition of Citizenship

The Citizenship Act of 1955 prescribes five ways of acquiring citizenship, viz, birth, descent, registration, naturalisation and incorporation of territory:

  1. By Birth: A person born in India on or after January 26, 1950 but before July 1, 1987 is a citizen of India by birth irrespective of the nationality of his parents.

A person born in India on or after July 1, 1987 is considered as a citizen of India only if either of his parents is a citizen of India at the time of his birth.

Further, those born in India on or after December 3, 2004 are considered citizens of India only if both of their parents are citizens of India or one of whose parents is a citizen of India and the other is not an illegal migrant at the time of their birth.

The children of foreign diplomats posted in India and enemy aliens cannot acquire Indian citizenship by birth.

  1. By Descent: A person born outside India on or after January 26, 1950 but before December 10, 1992 is a citizen of India by descent, if his father was a citizen of India at the time of his birth.

A person born outside India on or after December 10, 1992 is considered as a citizen of India if either of his parents is a citizen of India at the time of his birth.

December 3, 2004 onwards, a person born outside India shall not be a citizen of India by descent, unless his birth is registered at an Indian consulate within one year of the date of birth or with the permission of the Central Government, after the expiry of the said period. An application, for registration of the birth of a minor child, to an Indian consulate shall be accompanied by an undertaking in writing from the parents of such minor child that he or she does not hold the passport of another country.

Further, a minor who is a citizen of India by virtue of descent and is also a citizen of any other country shall cease to be a citizen of India if he does not renounce the citizenship or nationality of another country within six months of his attaining full age.

  1. By Registration: The Central Government may, on an application, register as a citizen of India any person (not being an illegal migrant) if he belongs to any of the following categories, namely:-
    1. a person of Indian origin who is ordinarily resident in India for seven years before making an application for registration;
    2. a person of Indian origin who is ordinarily resident in any country or place outside undivided India;
    3. a person who is married to a citizen of India and is ordinarily resident in India for seven years before making an application for registration;
    4. minor children of persons who are citizens of India;
    5. a person of full age and capacity whose parents are registered as citizens of India;
    6. a person of full age and capacity who, or either of his parents, was earlier citizen of independent India, and is ordinarily resident in India for twelve months immediately before making an application for registration;
    7. a person of full age and capacity who has been registered as an overseas citizen of India cardholder for five years, and who is ordinarily resident in India for twelve months before making an application for registration.

A person shall be deemed to be of Indian origin if he, or either of his parents, was born in undivided India or in such other territory which became part of India after the August 15, 1947.

All the above categories of persons must take an oath of allegiance before they are registered as citizens of India.

  1. By Naturalisation: The Central Government may, on an application, grant a certificate of naturalisation to any person (not being an illegal migrant) if he possesses the following qualifications:
    1. that he is not a subject or citizen of any country where citizens of India are prevented from becoming subjects or citizens of that country by naturalisation;
    2. that, if he is a citizen of any country, he undertakes to renounce the citizenship of that country in the event of his application for Indian citizenship being accepted;
    3. that he has either resided in India or been in the service of a Government in India or partly the one and partly the other, throughout the period of twelve months immediately preceding the date of the application;
    4. that during the fourteen years immediately preceding the said period of twelve months, he has either resided in India or been in the service of a Government in India, or partly the one and partly the other, for periods amounting in the aggregate to not less than eleven years;
    5. that he is of good character;
    6. that he has an adequate knowledge of a language specified in the Eighth Schedule to the Constitution3 ; and
    7. that in the event of a certificate of naturalisation being granted to him, he intends to reside in India, or to enter into or continue in, service under a Government in India or under an international organisation of which India is a member or under a society, company or body of persons established in India.

However, the Government of India may waive all or any of the above conditions for naturalisation in the case of a person who has rendered distinguished service to the science, philosophy, art, literature, world peace or human progress. Every naturalised citizen must take an oath of allegiance to the Constitution of India.

  1. By Incorporation of Territory: If any foreign territory becomes a part of India, the Government of India specifies the persons who among the people of the territory shall be the citizens of India. Such persons become the citizens of India from the notified date. For example, when Pondicherry became a part of India, the Government of India issued the Citizenship (Pondicherry) Order (1962), under the Citizenship Act (1955).
  1. Special Provisions as to Citizenship of Persons Covered by the Assam Accord

The Citizenship (Amendment) Act, 1985, added the following special provisions as to citizenship of persons covered by the Assam Accord (which related to the foreigners’ issue):

  1. All persons of Indian origin who came to Assam before the January 1, 1966 from Bangladesh and who have been ordinarily residents in Assam since the date of their entry into Assam shall be deemed to be citizens of India as from the January 1, 1966.
  2. Every person of Indian origin who came to Assam on or after the January 1, 1966 but before the March 25, 1971 from Bangladesh and who has been ordinarily resident in Assam since the date of his entry into Assam and who has been detected to be a foreigner shall register himself. Such a registered person shall be deemed to be a citizen of India for all purposes as from the date of expiry of a period of ten years from the date of detection as a foreigner. But, in the intervening period of ten years, he shall have the same rights and obligations as a citizen of India, excepting the right to vote.

नागरिकता अधिनियम, 1955

नागरिकता अधिनियम (1955) में संविधान के प्रारंभ के बाद नागरिकता के अर्जन और निरस्ती सम्बन्धी प्रावधान है।

मूल रूप से, नागरिकता अधिनियम (1955) ने भी राष्ट्रमंडल नागरिकता प्रदान की है। लेकिन इस प्रावधान को नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2003 के द्वारा निरस्त कर दिया गया था।

नागरिकता का अर्जन

नागरिकता अधिनियम, 1955 नागरिकता प्राप्त करने की पाँच शर्ते बताता है, जैसे-जन्म, वंशानुगत, पंजीकरण, प्राकृतिक एवं क्षेत्र समावष्टि करने के आधार पर।
1. जन्म से : भारत में 26 जनवरी, 1950 को या उसके बाद परन्तु 1 जुलाई, 1947 से पूर्व जन्मा व्यक्ति अपने मातापिता के जन्म की राष्ट्रीयता के बावजूद भारत का नागरिक होगा। भारत में 1 जुलाई को या उसके बाद जन्मा व्यक्ति केवल तभी भारत का नागरिक माना जाएगा, यदि उसके जन्म के समय उसके माता-पिता में से कोई एक भारत का नागरिक हो। इसके अलावा, यदि किसी व्यक्ति का जन्म 3 दिसंबर, 2004 के बाद भारत में हुआ हो तो वह उसी दशा में भारत का नागरिक माना जायेगा, यदि उसके माता-पिता दोनों उसके जन्म के समय भारत के नागरिक हों या माता या पिता में से एक उस समय भारत का नागरिक हो तथा दूसरा अवैध प्रवासी न हो। भारत में पदस्थ विदेशी राजनयिक एवं शत्रु देश के बच्चों को भारत की नागरिकता अर्जन करने का अधिकार नहीं है।
2. वंश के आधार पर : कोई व्यक्ति जिसका जन्म 26 जनवरी, 1950 को या उसके बाद परन्तु 10 दिसम्बर, 1992 से पूर्व भारत के बाहर हुआ हो वह वंश के आधार पर भारत का नागरिक बन सकता है, यदि उसके जन्म के समय उसका पिता भारत का नागरिक हो। यदि 10 दिसंबर, 1992 को या उसके बाद यदि किसी व्यक्ति का जन्म देश से बाहर हुआ हो तो वह तभी भारत का नागरिक बन सकता है, यदि उसके जन्म के समय उसके माता-पिता में से कोई एक भारत का नागरिक हो। 3 दिसंबर, 2004 के बाद भारत से बाहर जन्मा कोई व्यक्ति वंश के आधार पर भारत का नागरिक नहीं हो सकता, यदि उसके जन्म के एक वर्ष के भीतर भारतीय कांसुलेट में उसके जन्म का पंजीकरण न करा दिया गया हो या केंद्र सरकार की सहमति से उक्त अवधि के बाद पंजीकरण न हुआ हो। इस प्रकार के बच्चे का भारतीय कांसुलेट में पंजीकरण कराते समय आवेदन पत्र में माता-पिता को इस आशय का शपथ-पत्र देना होगा कि उनके बच्चे के पास किसी अन्य देश का पासपोर्ट नहीं है। पुनः एक नाबालिग जो वंश के आधार पर भारत का नागरिक है, साथ ही वह किसी अन्य देश का भी नागरिक है तब उसकी भारतीय नागरिकता समाप्त हो जाएगी जब तक कि वह अन्य देश की नागरिकता या राष्ट्रीयता का परित्याग वयस्क होने की छह माह के अन्दर नहीं कर देता।
3. पंजीकरण द्वारा : केन्द्र सरकार आवेदन प्राप्त होने पर किसी व्यक्ति (अवैध प्रवासी न हो) को भारत के नागरिक के रूप में पंजीकृत कर सकती है, यदि वह निम्नांकित श्रेणियों में से किसी से संबंद्ध हो, नामतः

  1. भारतीय मूल का व्यक्ति, जो नागरिकता प्राप्ति का – आवेदन देने से ठीक पूर्व सात वर्ष भारत में रह चुका हो।
  2. भारतीय मूल का वह व्यक्ति जो अविभाजित भारत के बाहर या किसी अन्य देश में अन्यत्र रह रहा हो।
  3. वह व्यक्ति जिसने भारतीय नागरिक से विवाह किया हो और वह पंजीकरण के लिए प्रार्थनापत्र देने से पूर्व सात वर्ष से भारत में रह रहा हो।
  4. भारत के नागरिक के नाबालिग बच्चे।
  5. कोई व्यक्ति, जो पूरी आयु तथा क्षमता का हो तथा उसके माता-पिता भारत के नागरिक के रूप में पंजीकृत हों।
  6. कोई व्यक्ति, जो पूरी आयु तथा क्षमता का हो तथा वह या उसके माता-पिता स्वतंत्र भारत के नागरिक के रूप में पंजीकृत हों या वह पंजीकरण का इस प्रकार का आवेदन देने से बारह महीने से साधारणत निवास कर रहा हो।
  7. कोई व्यक्ति, जो पूरी आयु तथा क्षमता का हो तथा वह समुद्र पार किसी देश के नागरिक के रूप में पांच वर्ष से पंजीकृत हो या तथा वह पंजीकरण का इस प्रकार का आवेदन देने से बारह महीने से साधारणत निवास कर रहा हो।

एक व्यक्ति जन्म से भारतीय मूल का माना जायेगा, यदि वह या उसके माता-पिता में से कोई अविभाजित भारत में पैदा हुये हों या 15 अगस्त, 1947 के बाद भारत का अंग बनने वाले किसी भू-क्षेत्र के निवासी हों।

उपरोक्त सभी श्रेणियों के लोगों को भारत के नागरिक के रूप में पंजीकृत होने के बाद निष्ठा की शपथ लेनी होगी।
4. प्राकृतिक रूप से: केंद्र सरकार आवेदन प्राप्त होने पर किसी व्यक्ति (अवैध प्रवासी न हो) प्राकृतिक रूप से नागरिकता प्रमाण-पत्र प्रदान कर सकती है। यदि वह व्यक्ति निम्नलिखित योग्यताएं रखता है:

  1. ऐसे देश से संबंधित नहीं हो, जहां भारतीय नागरिक प्राकृतिक रूप से नागरिक नहीं बन सकते।
  2. कि यदि वह किसी अन्य देश का नागरिक हो तो वह भारतीय नागरिकता के लिए अपने आवेदन की स्वीकृति पर उस देश की नागरिकता को त्याग देगा।
  3. यदि वह भारत में रह रहा हो या भारत सरकार की सेवा में हो या इनमे से थोड़ा कोई एक और थोड़ा कोई अन्य हो तो उसे नागरिकता संबंधी आवेदन देने के कम से कम 12 माह पूर्व से भारत में रह रहा होना चाहिए।
  4. यदि 12 माह की इस अवधि से 14 वर्ष पूर्व से वह भारत में रह रहा हो या भारत सरकार की सेवा में हो या इनमें से थोड़ा एक में और थोड़ा अन्य में हो, इनकी कुल अवधि ग्यारह वर्ष से कम नहीं होनी चाहिए।
  5. उसका चरित्र अच्छा होना चाहिए।
  6. कि वह संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित भाषाओं का अच्छा ज्ञाता हो।
  7. कि उसे प्राकृतिक रूप से नागरिकता का प्रमाणपत्र प्रदान किए जाने की स्थिति में, वह भारत में रहने का इच्छुक हो या भारत सरकार सेवा या किसी अंतरराष्ट्रीय संगठन में जिसका भारत सदस्य हो या भारत में स्थापित किसी सोसायटी, कंपनी या व्यक्तियों का निकाय हो में प्रवेश या उसे जारी रखे।

हालांकि भारत सरकार उपरोक्त प्राकृतिक शर्तों के मामलों पर एक या सभी पर दावा हटा सकती है यदि व्यक्ति की विशेष सेवा विज्ञान, दर्शन, कला, साहित्य, विश्व शांति या मानव उन्नति से संबद्ध हो। इस प्रकार से नागरिक बने हर व्यक्ति को भारत के संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेनी होगी।
5. क्षेत्र समाविष्टि द्वारा: किसी विदेशी क्षेत्र द्वारा भारत का हिस्सा बनने पर भारत सरकार उस क्षेत्र से संबंधित विशेष व्यक्तियों को भारत का नागरिक घोषित करती है। ऐसे व्यक्ति उल्लिखित तारीख से भारत के नागरिक होते हैं। उदाहरण के लिए, जब पांडिचेरी, भारत का हिस्सा बना, तो भारत सरकार ने नागरिकता (पांडिचेरी) आदेश, 1962 जारी किया। यह आदेश नागरिकता अधिनियम, 1955 के तहत जारी किया गया।
6. असम समझौते से आच्छादित व्यक्तियों के लिए नागरिकता का विशेष प्रावधानः नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 1985 असम समझौते (विदेशी मुद्दे पर) आच्छादित व्यक्तियों की नागरिकता के लिए निम्नलिखित विशेष प्रावधान करता है

(a) भारतीय मूल के सभी व्यक्ति जो 1 जनवरी 1966 के पहले बांग्लादेश से असम आए और जो अपने प्रवेश के बाद से ही साधारणतः असम के निवासी हैं, को 1 जनवरी, 1966 से भारत का नागरिक मान लिया जाएगा।

(b) भारतीय मूल का प्रत्येक व्यक्ति जो 1 जनवरी, 1966 को या उसके बाद लेकिन 25 मार्च 1971 के पहले बांग्लादेश से असम आया और अपने प्रवेश के समय से ही साधारणतया असम का निवासी हैं और जिसे विदेशी के रूप में पहचाना गया है, को स्वयं को निबंधित करना होगा। ऐसा निबंधित व्यक्ति भारत का नागरिक मान लिया जाएगा, सभी उद्देश्यों के लिए विदेशी के रूप में पहचाने जाने के बाद से दस वर्षों की अवधि की समाप्ति की तारीख के बीच। लेकिन इन दस वर्षों के बीच की अवधि में उसे भारत के नागरिक के समान ही अधिकार होंगे लेकिन मत देने का अधिकार नहीं होगा।

Loss of Citizenship

The Citizenship Act (1955) prescribes three ways of losing citizenship whether acquired under the Act or prior to it under the Constitution, viz, renunciation, termination and deprivation:

  1. By Renunciation: Any citizen of India of full age and capacity can make a declaration renouncing his Indian citizenship. Upon the registration of that declaration, that person ceases to be a citizen of India. However, if such a declaration is made during a war in which India is engaged, its registration shall be withheld by the Central Government.

Further, when a person renounces his Indian citizenship, every minor child of that person also loses Indian citizenship. However, when such a child attains the age of eighteen, he may resume Indian citizenship.

  1. By Termination: When an Indian citizen voluntarily (consciously, knowingly and without duress, undue influence or compulsion) acquires the citizenship of another country, his Indian citizenship automatically terminates. This provision, however, does not apply during a war in which India is engaged.
  1. By Deprivation: It is a compulsory termination of Indian citizenship by the Central government, if:
  1. the citizen has obtained the citizenship by fraud:
  2. the citizen has shown disloyalty to the Constitution of India:
  3. the citizen has unlawfully traded or communicated with the enemy during a war;
  4. the citizen has, within five years after registration or naturalisation, been imprisoned in any country for two years; and
  5. the citizen has been ordinarily resident out of India for seven years continuously.

नागरिकता की समाप्ति

नागरिकता अधिनियम, 1955 में अधिनियम या संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार प्राप्त नागरिकता खोने के तीन कारण बताए गए हैंत्यागना, बर्खास्तगी या वंचित करना होना।
1. स्वैच्छिक त्याग : एक भारतीय नागरिक जो पूर्ण आयु और

क्षमता का हो। ऐसी घोषणा के उपरांत वह भारत का नागरिक नहीं रहता। अपनी नागरिकता को त्याग सकता है। यदि इस तरह की घोषणा तब हो जब भारत युद्ध में व्यस्त हो तो केंद्र सरकार इसके पंजीकरण को एकतरफ रख सकती है। जब कोई व्यक्ति अपनी नागरिकता का परित्याग करता है। तो उस व्यक्ति का प्रत्येक नाबालिग बच्चा भारतीय नागरिक नहीं रहता, यद्यपि इस तरह के बच्चे की उम्र 18 वर्ष भारतीय

होने पर वह भारतीय नागरिक बन सकता है।
2. बर्खास्तगी के द्वारा: यदि कोई भारतीय नागरिक स्वेच्छा से किस अन्य देश की नागरिकता ग्रहण कर ले तो उसकी भारतीय नागरिकता स्वयं बर्खास्त हो जाएगी। हालांकि यह व्यवस्था तब लागू नहीं होगी जब भारत युद्ध में व्यस्त हो।
3. वंचित करने द्वारा: केंद्र सरकार द्वारा भारतीय नागरिक को आवश्यक रूप से बर्खास्त करना होगा यदिः

  1. यदि नागरिकता फर्जी तरीके से प्राप्त की गयी हो।
  2. यदि नागरिक ने संविधान के प्रति अनादर जताया हो।
  3. यदि नागरिक ने युद्ध के दौरान शत्रु के साथ गैर कानूनी रूप से संबंध स्थापित किया हो या उसे कोई राष्ट्रविरोधी सूचना दी हो।
  4. पंजीकरण या प्राकृतिक नागरिकता के पांच वर्ष के दौरान नागरिक को किसी देश में दो वर्ष की कैद हुई हो।
  5. नागरिक सामान्य रूप से भारत के बाहर सात वर्षों से रह रहा हो।

SINGLE CITIZENSHIP

Though the Indian Constitution is federal and envisages a dual polity (Centre and states), it provides for only a single citizenship, that is, the Indian citizenship. The citizens in India owe allegiance only to the Union. There is no separate state citizenship. The other federal states like USA and Switzerland, on the other hand, adopted the system of double citizenship.

In USA, each person is not only a citizen of USA but also of the particular state to which he belongs. Thus, he owes allegiance to both and enjoys dual sets of rights–one set conferred by the national government and another by the state government. This system creates the problem of discrimination, that is, a state may discriminate in favour of its citizens in matters like right to vote, right to hold public offices, right to practice professions and so on. This problem is avoided in the system of single citizenship prevalent in India.

In India, all citizens irrespective of the state in which they are born or reside enjoy the same political and civil rights of citizenship all over the country and no discrimination is made between them. However, this general rule of absence of discrimination is subject to some exceptions, viz,

  1. The Parliament (under Article 16) can prescribe residence within a state or union territory as a condition for certain employments or appointments in that state or union territory, or local authority or other authority within that state or union territory. Accordingly, the Parliament enacted the Public Employment (Requirement as to Residence) Act, 1957, and thereby authorised the Government of India to prescribe residential qualification only for appointment to non-Gazetted posts in Andhra Pradesh, Himachal Pradesh, Manipur and Tripura. As this Act expired in 1974, there is no such provision for any state except Andhra Pradesh and Telangana.
  2. The Constitution (under Article 15) prohibits discrimination against any citizen on grounds of religion, race, caste, sex or place of birth and not on the ground of residence. This means that the state can provide special benefits or give preference to its residents in matters that do not come within the purview of the rights given by the Constitution to the Indian citizens. For example, a state may offer concession in fees for education to its residents.
  3. The freedom of movement and residence (under Article 19) is subjected to the protection of interests of any schedule tribe. In other words, the right of outsiders to enter, reside and settle in tribal areas is restricted. Of course, this is done to protect the distinctive culture, language, customs and manners of schedule tribes and to safeguard their traditional vocation and property against exploitation.
  4. Till 2019, the legislature of the erstwhile state of Jammu and Kashmir was empowered to:
    1. define the persons who are permanent residents of the state; and
    2. confer any special rights and privileges on such permanent residents as respects:
      1. employment under the state government;
      2. acquisition of immovable property in the state;
      3. settlement in the state; and
      4. right to scholarships and such other forms of aid provided by the government.

The above provision was based on Article 35-A of the Constitution of India. This Article was inserted in the constitution by “The Constitution (Application to Jammu and Kashmir) Order, 1954”. This order was issued by the President under Article 370 of the Constitution which had provided a special status to the erstwhile state of Jammu and Kashmir. In 2019, this special status was abolished by a new presidential order known as “The Constitution (Application to Jammu and Kashmir) Order, 2019”. This order superseded the earlier 1954 order.

The Constitution of India, like that of Canada, has introduced the system of single citizenship and provided uniform rights (except in few cases) for the people of India to promote the feeling of fraternity and unity among them and to build an integrated Indian nation. Despite this, India has been witnessing the communal riots, class conflicts, caste wars, linguistic clashes and ethnic disputes. Thus, the cherished goal of the founding fathers and the Constitution-makers to build an united and integrated Indian nation has not been fully realised.
एकल नागरिकता

यद्यपि भारतीय संविधान संघीय है और इसने दोहरी राजपद्धति (केंद्र एवं राज्य) को अपनाया है, लेकिन इसमें केवल एकल नागरिकता की व्यवस्था की गई है अर्थात् भारतीय नागरिकता। यहां राज्यों के लिए कोई पृथक् नागरिकता की व्यवस्था नहीं है। अन्य संघीय राज्यों, जैसे-अमेरिका एवं स्विट्जरलैंड में दोहरी नागरिकता व्यवस्था को अपनाया गया है।

अमेरिका में प्रत्येक व्यक्ति न केवल अमेरिका का नागरिक है, वरन उस राज्य विशेष का भी नागरिक है जहां वह रहता है। इस तरह उसे दोहरी नागरिकता प्राप्त है और इसी संदर्भ में उसे राष्ट्रीय सरकार एवं राज्य सरकार के दोहरे अधिकार प्राप्त हैं। यह व्यवस्था भेदभाव की समस्या पैदा कर सकती है। जैसा कि राज्य अपने नागरिकों के प्रति भेदभाव बरत सकता है। यह भेदभाव मताधिकार, सार्वजनिक पदों, व्यवसाय आदि को लेकर हो सकता है। ऐसी समस्या को दूर करने के लिए ही भारत में एकल नागरिकता की व्यवस्था को अपनाया गया।

भारत में सभी नागरिकों को, चाहे उनका जन्म कहीं और निवास कहीं और हो, पूरे देश में समान नागरिक अधिकार प्राप्त होते हैं। उनके बीच किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जा सकता। हालांकि भेदभाव रहित इस व्यवस्था में कुछ अपवाद भी

  1. संसद (अनुच्छेद 16 के तहत) ऐसी व्यवस्था कर सकती है कि किसी राज्य विशेष में रहने वाले लोगों को कुछ नौकरियों या नियुक्तियों में अलग सुविधा मिले। यह सुविधा उस राज्य या केंद्र शासित क्षेत्र के तहत स्थानीय या अन्य प्रशासन के तहत हो सकती है। संसद ने इसी से संबंधित सार्वजनिक रोजगार (निवासी के रूप में जरूरत) अधिनियम, 1957 को प्रभावी बनाया। भारत सरकार को यह अधिकार दिया गया कि गैर-राजपत्रित पदों पर नियुक्ति के लिए आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर और त्रिपुरा के लिए निवास की अनिवार्यता करे। जैसा कि यह अधिनियम 1974 में समाप्त हो गया, उसके बाद आंध्र प्रदेश और तेलंगाना को छोड़कर किसी भी राज्य में ऐसी व्यवस्था नहीं है।
  2. संविधान (अनुच्छेद 15) किसी भी नागरिक के खिलाफ धर्म, मूल वंश, जाति, लिंग, जन्म-स्थान या निवास के आधार पर भेदभाव करने पर प्रतिबंध लगाता है। इसका अभिप्राय है कि निवास के आधार पर राज्य किसी को विशेष सुविधा दे सकता है, जो कि संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों के सीमा क्षेत्र में आने वाला मामला न हो। उदाहरण के लिए एक राज्य अपने निवासियों के लिए शैक्षणिक शुल्क में छूट दे सकता है।
  3. निवास एवं घूमने की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19 के अंतर्गत) अनुसूचित जनजातियों के हित में सुरक्षा का विषय है। दूसरे शब्दों में, जनजातीय क्षेत्रों में प्रवेश एवं निवास प्रतिबंधित है। निश्चित रूप से ऐसी व्यवस्था उनकी विशेष संस्कृति, भाषा, रिवाज आदि को बचाने के लिए किया गया है। यही नहीं, यह व्यवस्था उनकी संपत्ति एवं परंपरा को बचाने एवं उनके शोषण के विरुद्ध सुरक्षा कवच है।
  4. 2019 तक, जम्मू और कश्मीर के तत्कालीन राज्य की विधायिका को अधिकार दिया गया था:
    1. उन व्यक्तियों को परिभाषित करना जो राज्य के स्थायी निवासी हैं; तथा
    2. सम्मान के रूप में ऐसे स्थायी निवासियों पर कोई विशेष अधिकार और विशेषाधिकार प्रदान करें:
      1. राज्य सरकार के अधीन रोजगार;
      2. राज्य में अचल संपत्ति का अधिग्रहण;
      3. राज्य में समझौता; तथा
      4. सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाली छात्रवृत्ति और सहायता के अन्य प्रकार के अधिकार।

भारत का संविधान, कनाडा की तरह एकल नागरिकता का उपबंध करता है और एकीकृत अधिकार (कुछ मामलों को छोड़कर) प्रदान करता है। यह व्यवस्था भाई-चारे और लोगों के बीच एकता बनाए रखने के लिए की गई, ताकि एक शक्तिशाली भारतीय राष्ट्र की स्थापना हो सके। इसके बावजूद भारत में सांप्रदायिक दंगे, वर्ग संघर्ष, जातीय युद्ध, भाषायी विवाद आदि होते रहे हैं। इस तरह संविधान निर्माताओं का एक एकीकृत भारतीय राष्ट्र निर्माण का लक्ष्य पूरा नहीं किया जा सका है।

OVERSEAS CITIZENSHIP OF INDIA

In September 2000, the Government of India (Ministry of External Affairs) had set-up a High Level Committee on the Indian Diaspora under the Chairmanship of L.M. Singhvi. The mandate of the Committee was to make a comprehensive study of the global Indian Diaspora and to recommend measures for a constructive relationship with them.

The committee submitted its report in January, 2002. It recommended the amendment of the Citizenship Act (1955) to provide for grant of dual citizenship to the Persons of Indian Origin (PIOs) belonging to certain specified countries.

Accordingly, the Citizenship (Amendment) Act, 2003, made provision for acquisition of Overseas Citizenship of India (OCI) by the PIOs of 16 specified countries other than Pakistan and Bangladesh. It also omitted all provisions recognizing, or relating to the Commonwealth Citizenship from the Principal Act.

Later, the Citizenship (Amendment) Act, 2005, expanded the scope of grant of OCI for PIOs of all countries except Pakistan and Bangladesh as long as their home countries all dual citizenship under their local laws. It must be noted here that the OCI is not actually a dual citizenships as the Indian Constitution forbids dual citizenship or dual nationality (Article 9).

Again, the Citizenship (Amendment) Act, 2015, has modified the provisions pertaining to the OCI in the Principal Act. It has introduced a new scheme called “Overseas Citizen of India Cardholder” by merging the PIO card scheme and the OCI card scheme.

The PIO card scheme was introduced on August 19, 2002 and thereafter the OCI card scheme was introduced w.e.f. December 2, 2005. Both the schemes were running in parallel even though the OCI card scheme had become more popular. This was causing unnecessary confusion in the minds of applicants. Keeping in view some problems being faced by applicants and to provide enhanced facilities to them, the Government of India decided to formulate one single scheme after merging the PIO and OCI schemes, containing positive attributes of both. Hence, for achieving this objective, the Citizenship (Amendment)

Act, 2015, was enacted. The PIO scheme was rescinded w.e.f. January 9, 2015 and it was also notified that all existing PIO cardholders shall be deemed to be OCI cardholders w.e.f. January 9, 2015.7

The Citizenship (Amendment) Act, 2015, replaced the nomenclature of “Overseas Citizen of India” with that of “Overseas Citizen of India Cardholder” and made the following provisions in the Principal Act :

I. Registration of Overseas Citizen of India Cardholder

  1. The Central Government may, on an application made in this behalf, register as an overseas citizen of India cardholder–
    1. any person of full age and capacity,–
      1. who is a citizen of another country, but was a citizen of India time of, or at any time after the commencement of the Constitu
      2. who is a citizen of another country, but was eligible to bec citizen of India at the time of the commencement of the Cons or
      3. who is a citizen of another country, but belonged to a territo became part of India after the 15th August, 1947; or
      4. who is a child or a grandchild or a great grandchild of such a or
    2. a person, who is a minor child of a person mentioned in clause (a); or
    3. a person, who is a minor child, and whose both parents are citizens of India or one of the parents is a citizen of India; or
    4. spouse of foreign origin of a citizen of India or spouse of foreign origin of an Overseas Citizen of India Cardholder and whose marriage has been registered and subsisted for a continuous period of not less than two years immediately preceding the presentation of the application.

No person, who or either of whose parents or grandparents or great grandparents is or had been a citizen of Pakistan, Bangladesh or such other country as the Central Government may, specify, shall be eligible for registration as an Overseas Citizen of India Cardholder.

2. The Central Government may specify the date from which the existing persons of Indian origin cardholders shall be deemed to be overseas citizens of India cardholders.

3. Notwithstanding anything contained in point (1), the Central Government may, if it is satisfied that special circumstances exist, after recording the circumstances in writing, register a person as an Overseas Citizen of India Cardholder.

II. Conferment of Rights on Overseas Citizen of India Cardholder

  1. An overseas citizen of India cardholder shall be entitled to such rights, as the Central Government may specify in this behalf.
  2. An overseas citizen of India cardholder shall not be entitled to the following rights (which are conferred on a citizen of India)–
    1. He shall not be entitled to the right to equality of opportunity in matters of public employment.
    2. He shall not be eligible for election as President.
    3. He shall not be eligible for election as Vice-President.
    4. He shall not be eligible for appointment as a Judge of the Supreme Court.
    5. He shall not be eligible for appointment as a Judge of the High Court.
    6. He shall not be entitled for registration as a voter.
    7. He shall not be eligible for being a member of the House of the People or of the Council of States.
    8. He shall not be eligible for being a member of the State Legislative Assembly or the State Legislative Council.
    9. He shall not be eligible for appointment to public services and posts in connection with affairs of the Union or of any State except for appointment in such services and posts as the Central Government may specify.

III. Renunciation of Overseas Citizen of India Card

  1. If any overseas citizen of India cardholder makes in prescribed manner a declaration renouncing the card registering him as an overseas citizen of India cardholder, the declaration shall be registered by the Central Government, and upon such registration, that person shall cease to be an overseas citizen of India cardholder.
  2. Where a person ceases to be an overseas citizen of India cardholder, the spouse of foreign origin of that person, who has obtained overseas citizen of India card and every minor child of that person registered as an overseas citizen of India cardholder shall thereupon cease to be an overseas citizen of India cardholder.

IV. Cancellation of Registration as Overseas Citizen of India Cardholder

The Central Government may cancel the registration of a person as an overseas citizen of India cardholder, if it is satisfied that–

  1. the registration as an overseas citizen of India cardholder was obtained by means of fraud, false representation or the concealment of any material fact; or
  2. the overseas citizen of India cardholder has shown disaffection towards the Constitution of India; or
  3. the overseas citizen of India cardholder has, during any war in which India may be engaged, unlawfully traded or communicated with an enemy; or
  4. the overseas citizen of India cardholder has, within five years after registration, been sentenced to imprisonment for a term of not less than two years; or
  5. it is necessary so to do in the interests of the sovereignty and integrity of India, the security of India, friendly relations of India with any foreign country, or in the interests of the general public; or
  6. the marriage of an overseas citizen of India cardholder–
    1. has been dissolved by a competent court of law or otherwise; or
    2. has not been dissolved but, during the subsistence of such marria he has solemnised marriage with any other person.

विदेशी भारतीय नागरिकता

सितंबर 2000 में भारत सरकार (विदेश मंत्रालय) ने भारतीय डायस्पोरा पर एल.एम. सिंघवी की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया। कमिटी को वैश्विक भारतीय डायस्पोरा के व्यापक अध्ययन करने तथा उनके साथ रचनात्मक सम्बन्ध बनाने के उपायों पर अनुशंसा देने का कार्य सौंपा गया।

समिति ने अपनी रिपोर्ट जनवरी, 2002 में सौंपी। इसने नागरिकता अधिनियम 1955 में संशोधन की सिफारिश की ताकि भारतीय मूल के व्यक्तियों (Persons of Indian Origin, PIOs) को दोहरी नागरिकता प्रदान की जा सके, लेकिन कुछ विशेष देशों के रहने वालों को ही।

उसी अनुसार नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2003 में विदेशी भारतीय नागरिकता का प्रावधान किया गया। 16 निर्दिष्ट देशों के पीआईओ, यानी भारतीय मूल के व्यक्तियों के लिए, पाकिस्तान और बांग्लादेश को छोड़कर। इस अधिनियम ने पूर्व मुख्य अधिनियम के राष्ट्रमंडल नागरिकता से सम्बन्धित सभी प्रावधान हटा दिए।

बाद में नागरिकता (संशोधन) अधिनियम 2005 में सभी देशों के भारतीय मूल के व्यक्तियों को विदेशी भारतीय नागरिकता प्रदान करने के (अपवाद पाकिस्तान और बांग्लादेश) प्रावधान किए गए जब तक कि उनके गृह देश स्थानीय कानूनों के अनुसार दोहरी नागरिकता प्रदान करते हों।

पुनः नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2015 ने मुख्य अधिनियम में विदेशी भारतीय नागरिकता (OCI) सम्बन्धी प्रावधानों को संशोधित कर दिया। इसने ‘भारतीय विदेशी नागरिकता कार्डहोल्डर’ (Overseas Citizen of India Cardholder) के नाम से एक नई योजना शुरू की है जिसमें पीआईओ कार्ड स्कीम तथा ओसीआई कार्ड स्कीम को मिला (विलयित) कर दिया गया है।

पीआईओ कार्ड स्कीम को 19.08.2002 में शुरू किया गया था और उसके बाद ओसीआई कार्ड स्कीम 1.12.2005 में शुरू की गयी थी। दोनों स्कीम साथ-साथ चल रही थी, वैसे ओसीआई स्कीम अधिक लोकप्रिय थी। आवेदक इस कारण भ्रम की स्थिति में थे। आवेदकों का भ्रम दूर कर उन्हें अधिक सुविधाएं प्रदान करने के लिए भारत सरकार ने पीआईओ तथा ओसीआई को मिलाकर एकल स्कीम का सूत्रण किया जिसमें दोनों स्कीमों के सकारात्मक पक्षों को शामिल किया गया। इस प्रकार इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2015 अधिनियमित किया गया। पीआईओ स्कीम 9.1.2015 के प्रभाव से रद्द कर दी गयी और यह अधिसूचित किया गया कि सभी चालू पीआईओ कार्डधारक 9.1.15 से ओसीआई कार्डधारक मान लिए जाएंगे।’

नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2015 ‘विदेशी भारतीय नागरिक’ को बदलकर ‘विदेशी भारतीय नागरिक कार्डधारक’ (Overseas Citizen of India Cardholder) कर दिया और मुख्य अधिनियम में निम्नलिखित प्रावधान किए

I. विदेशी भारतीय नागरिक कार्ड होल्डर का निबंधन

  1. भारत सरकार आवेदन प्राप्त होने पर किसी विदेशी भारतीय नागरिक कार्डधारक (होल्डर) को पंजीकृत कर सकती है
    1. पूर्ण आयु एवं क्षमतावाला कोई व्यक्ति
      1. जोकि किसी अन्य देश का नागरिक है, लेकिन संविधान लागू होने के समय अथवा उसके बाद भारत का नागरिक था, अथवा
      2. जोकि किसी अन्य देश का नागरिक है लेकिन संविधान लागू होने के समय भारत का नागरिक होने के लिए अर्ह था, अथवा
      3. जोकि किसी अन्य देश का नागरिक है लेकिन उस भू-भाग से सम्बन्ध रखता है जो 15 अगस्त 1947 के भारत का भाग हो गया, अथवा
      4. जोकि ऐसे किसी नागरिक का पुत्र/पुत्री या पौत्र/पौती या प्रपौत्र/प्रपौत्री हो, अथवा
    2. कोई व्यक्ति जो धारा (a) में उल्लेखित व्यक्ति का नाबालिग बच्चा हो, अथवा
    3. कोई व्यक्ति जोकि नाबालिग बच्चा हो जिसके माता-पिता भारत के नागरिक हैं अथवा दोनों में से एक भारत का नागरिक हो, अथवा
    4. भारतीय नागरिक का विदेशी मूल का/की पति/पत्नी, अथवा विदेशी भारतीय नागरिक कार्डधारक का विदेशी मूल का/की पति/पत्नी जिसका विवाह निबंधित है और आवेदन प्रस्तुत करने की तिथि के पूर्व कम-से-कम दो वर्ष तक लगातार चला हो।

कोई भी व्यक्ति जो स्वयं अथवा किसके माता-पिता में से कोई अथवा जिसके दादा/दादी, परदादा/परदादी पाकिस्तान, बांग्लादेश अथवा ऐसे किसी देश जिन्हें भारत सरकार उल्लिखित कर सकती है. विदेशी भारतीय नागरिक कार्डहोल्डर के लिए निबंधन के लिए अर्ह नहीं होगा।

2. भारत सरकार उस आंकड़े/डाटा को उल्लिखित कर सकती है जिसमें से सूचीबद्ध भारतीय मूल के कार्डधारक व्यक्तियों को विदेशी भारतीय नागरिक कार्डहोल्डर मान लिया जाएगा। 3. बिन्दु (1) में कोई बात पहले रहते भी, केन्द्र सरकार अगर संतुष्ट हो कि कोई विशेष परिस्थिति बनती है, उन परिस्थितियों को लिखित में अभिलेखित कर, किसी व्यक्ति को विदेशी भारतीय नागरिक कार्डहोल्डर को निबंधित कर सकती है।

II. विदेशी भारतीय नागरिक कार्डहोल्डर को प्राप्त अधिकार

  1. एक विदेशी भारतीय नागरिक कार्डहोल्डर को ऐसे अधिकार प्राप्त होंगे जैसा कि केन्द्र सरकार उल्लिखित या विशिष्ट निर्देशित कर सकती है
  2. एक विदेशी भारतीय नागरिक कार्डहोल्डर को निम्नलिखित अधिकार नहीं होंगे (जोकि किसी भारतीय नागरिक को होते हैं)
    1. उसे सार्वजनिक रोजगार के मामले में अवसर की संभावना का अधिकार नहीं होगा।
    2. वह राष्ट्रपति चुने जाने के लिए अर्ह नहीं होगा।
    3. वह उप-राष्ट्रपति चुने जाने के लिए अर्ह नहीं होगा।
    4. वह सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किए जाने के लिए अर्ह नहीं होगा।
    5. वह उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किए जाने के लिए अर्ह नहीं होगा।
    6. वह एक मतदाता के रूप में पंजीकृत किए जाने का अधिकारी नहीं होगा।
    7. वह लोक सभा या राज्य सभा का सदस्य बनने के लिए अर्ह नहीं होगा।
    8. वह राज्य विधानसभा या राज्य विधान परिषद का सदस्य चुने जाने के लिए अर्ह नहीं होगा।
    9. वह सार्वजनिक सेवाओं में नियुक्ति तथा
    10. संघ अथवा राज्य के मामलों से सम्बन्धित पद के लिए अर्ह नहीं होगा, जब तक कि ऐसी सेवाओं एवं पदों पर नियुक्ति के लिए केन्द्र सरकार विशिष्ट निर्देशन

III. विदेशी भारतीय नागरिकता कार्ड का परित्याग

  1. यदि कोई विदेशी भारतीय नागरिक कार्डहोल्डर निर्धारित प्रपत्र पद्धति से उस कार्ड के परित्याग की घोषणा करता है जो उसे विदेशी भारतीय नागरिक के रूप में पंजीकृत करती है, तब इस घोषणा को केन्द्र सरकार द्वारा पंजीकृत किया जाएगा तथा इस पंजीकरण के पश्चात वह व्यक्ति विदेशी भारतीय नागरिक नहीं रह जाएगा।
  2. जब एक व्यक्ति विदेशी भारतीय नागरिक कार्ड होल्डर नहीं रह जाता है तब उसका विदेशी मूल की उसकी/का पत्नी/पति जिसने विदेशी भारतीय नागरिक कार्ड प्राप्त किया है और उसका नाबालिग बच्चा जो कि विदेशी भारतीय नागरिक के रूप में पंजीकृत है, भारत का विदेशी नागरिक नहीं रह जाएगा।

IV. विदेशी भारतीय नागरिक कार्डहोल्डन के रूप में पंजीकरण का रद्द होना

केन्द्र सरकार विदेशी भारतीय नागरिक कार्डहोल्डर के रूप में किसी व्यक्ति का पंजीकरण रद्द कर सकता है, यदि वह संतुष्ट है कि

  1. विदेशी भारतीय नागरिकता कार्डहोल्डर धोखाधड़ी, असत्य प्रतिनिधित्व अथवा भौतिक साक्ष्य को छुपाकर प्राप्त की गई है अथवा
  2. विदेशी भारतीय नागरिक कार्डहोल्डर ने भारत के संविधान के प्रति अनिष्ठा प्रदर्शित की है, अथवा
  3. विदेशी भारतीय नागरिक कार्डहोल्डर ने, ऐसे किसी युद्ध जिसमें भारत भी संलग्न है, के दौरान शत्रु के साथ गैरकानूनी रूप से संपर्क स्थापित किया है, अथवा
  4. विदेशी भारतीय नागरिक कार्डहोल्डर ने पंजीकरण के पांच वर्षों के अंदर दो वर्षों से कम की कैद की सजा भुगती है अथवा
  5. यदि ऐसा करना भारत की संप्रभुता एवं अखंडता भारत की सुरक्षा, किसी दूसरे देश के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध अथवा सामान्य जनता के हित में हो, अथवा
  6. किसी विदेशी भारतीय नागरिक कार्ड होल्डर का विकास
    1. किसी सक्षम न्यायालय द्वारा या अन्य द्वारा भंग कर दिया गया हो अथवा
    2. भंग नहीं किया गया हो, लेकिन ऐसे विवाह के बने रहते ही उसने किसी और के साथ विवाह कर लिया हो।