Indian Councils Act of British India भारत परिषद अधिनियम

After Government of India Act of 1858 British Govt. enacted New Acts i.e. Indian Councils Act of 1861, 1892 and 1909:

After the great revolt of 1857, the British Government felt the necessity of seeking the cooperation of the Indians in the administration of their country. In pursuance of this policy of association, three acts were enacted by the British Parliament in 1861, 1892 and 1909.

Indian Councils Act of 1861:

The Indian Councils Act of 1861 is an important landmark in the constitutional and political history of India.

The features of this Act were as follows:

  1. It made a beginning of the representative institutions by associating Indians with the law-making process. It, thus, provided that the Viceroy should nominate some Indians as non-official members of his expanded council. In 1862, Lord Canning, the then Viceroy, nominated three Indians to his legislative council–the Raja of Benaras, the Maharaja of Patiala and Sir Dinkar Rao.
  2. It initiated the process of decentralisation by restoring the legislative powers to the Bombay and Madras Presidencies. It, thus, reversed the centralising tendency that started from the Regulating Act of 1773 and reached its climax under the Charter Act of 1833. This policy of legislative devolution resulted in the grant of almost complete internal autonomy to the provinces in 1937.
  3. It also provided for the establishment of new legislative councils for Bengal, North-Western Provinces and Punjab, which were established in 1862, 1886 and 1897,
  4. It empowered the Viceroy to make rules and orders for the more convenient transaction of business in the council. It also gave a recognition to the ‘portfolio’ system, introduced by Lord Canning in 1859. Under this, a member of the Viceroy’s council was made in-charge of one or more departments of the Government and was authorised to issue final orders on behalf of the council on matters of his department(s).
  5. It empowered the Viceroy to issue ordinances, without the concurrence of the legislative council, during an emergency. The life of such an ordinance was six months.

1857 की महान क्रांति के बाद ब्रिटिश सरकार ने महसूस किया कि भारत में शासन चलाने के लिए भारतीयों का सहयोग लेना आवश्यक है। इस सहयोग नीति के तहत ब्रिटिश संसद ने 1861, 1892 और 1909 में तीन नए अधिनियम पारित किए। 

1861 के भारत परिषद अधिनियम की विशेषताएं: 

  1. इसके द्वारा कानून बनाने की प्रक्रिया में भारतीय प्रतिनिधियों को शामिल करने की शुरुआत हुई। इस प्रकार वायसराय कुछ भारतीयों को विस्तारित परिषद में गैर-सरकारी सदस्यों के रूप में नामांकित कर सकता था। 1862 में लॉर्ड कैनिंग ने तीन भारतीयों-बनारस के राजा, पटियाला के महाराजा और सर दिनकर राव को विधान परिषद में मनोनीत किया। 
  2. इस अधिनियम ने मद्रास और बंबई प्रेसिडेंसियों को विधायी शक्तियां पुन: देकर विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया की शुरुआत की। इस प्रकार इस अधिनियम ने रेगुलेटिंग एक्ट, 1773 द्वारा शुरू हुई केंद्रीयकरण की प्रवृत्ति को उलट दिया और 1833 के चार्टर अधिनियम के साथ ही अपने चरम पर पहुंच गया। इस विधायी विकास की नीति के कारण 1937 तक प्रांतों को संपूर्ण आंतरिक स्वायत्तता हासिल हो गई। 
  3. बंगाल, उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत और पंजाब में क्रमशः 1862, 1866 और 1897 में विधानपरिषदों का गठन हुआ। 
  4. इसने वायसराय को परिषद में कार्य संचालन के लिए अधिक नियम और आदेश बनाने की शक्तियां प्रदान की। इसने लॉर्ड कैनिंग द्वारा 1859 में प्रारंभ की गई पोर्टफोलियो प्रणाली को भी मान्यता दी। इसके अंतर्गत वायसराय की परिषद का एक सदस्य एक या अधिक सरकारी विभागों का प्रभारी बनाया जा सकता था तथा उसे इस विभाग में काउंसिल की ओर से अंतिम आदेश पारित करने का अधिकार था।
  5. इसने वायसराय को आपातकाल में बिना काउंसिल की संस्तुति के अध्यादेश जारी करने के लिए अधिकृत किया। ऐसे अध्यादेश की अवधि मात्र छह माह होती थी।

Indian Councils Act of 1892:

The features of this Act were as follows:

  1. It increased the number of additional (non-official) members in the Central and provincial legislative councils, but maintained the official majority in them.
  2. It increased the functions of legislative councils and gave them the power of discussing the budget and addressing questions to the executive.
  3. It provided for the nomination of some non-official members of the (a) Central Legislative Council by the viceroy on the recommendation of the provincial legislative councils and the Bengal Chamber of Commerce, and (b) that of the provincial legislative councils by the Governors on the recommendation of the district boards, municipalities, universities, trade associations, zamin-dars and chambers.

‘The act made a limited and indirect provision for the use of election in filling up some of the non-official seats both in the Central and provincial legislative councils. The word “election” was, however, not used in the Act. The process was described as nomination made on the recommendation of certain bodies.’

1892 के भारतीय परिषद अधिनियम की विशेषताएं :

  1. इसके माध्यम से केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों में अतिरिक्त (गैर-सरकारी) सदस्यों की संख्या बढ़ाई गई, हालांकि बहुमत सरकारी सदस्यों का ही रहता था। 
  2. इसने विधान परिषदों के कार्यों में वृद्धि कर उन्हें बजट पर बहस करने और कार्यपालिका के प्रश्नों का उत्तर देने के लिए अधिकृत किया। 
  3. इसमें केंद्रीय विधान परिषद और बंगाल चैंबर्स ऑफ़ कॉमर्स में गैर-सरकारी सदस्यों के नामांकन के लिए वायसराय की शक्तियों का प्रावधान था। इसके अलावा प्रांतीय विधान परिषदों में गवर्नर को जिला परिषद, नगरपालिका, विश्वविद्यालय, व्यापार संघ, जमींदारों और चैम्बर ऑफ़ कॉमर्स की सिफारिशों पर गैर-सरकारी सदस्यों को नियुक्त करने की शक्ति थी।

‘इस अधिनियम ने केंद्रीय और प्रांतीय विधान परिषदों दोनों में गैर-सरकारी सदस्यों की नियुक्ति के लिए एक सीमित और परोक्ष रूप से चुनाव का प्रावधान किया हालांकि चुनाव शब्द का अधिनियम में प्रयोग नहीं हुआ था। इसे निश्चित निकायों की सिफारिश पर की जाने वाली नामांकन की प्रक्रिया कहा गया।’

Indian Councils Act of 1909:

This Act is also known as Morley-Minto Reforms (Lord Morley was the then Secretary of State for India and Lord Minto was the then Viceroy of India).

The features of this Act were as follows:

  1. It considerably increased the size of the legislative councils, both Central and provincial. The number of members in the Central legislative council was raised from 16 to 60. The number of members in the provincial legislative councils was not uniform.
  2. It retained official majority in the Central legislative council, but allowed the provincial legislative councils to have nonofficial majority.
  3. It enlarged the deliberative functions of the legislative councils at both the levels. For example, members were allowed to ask supplementary questions, move resolutions on the budget and so on.
  4. It provided (for the first time) for the association of Indians with the executive councils of the Viceroy and Governors. Satyendra Prasad Sinha became the first Indian to join the Viceroy’s executive council. He was appointed as the Law
  5. It introduced a system of communal representation for Muslims by accepting the concept of ‘separate electorate’. Under this, the Muslim members were to be elected only by Muslim voters. Thus, the Act ‘legalised communalism’ and Lord Minto came to be known as the Father of Communal Electorate.
  6. It also provided for the separate representation of presidency corporations, chambers of commerce, universities and zamindars.

1909 के भारतीय परिषद अधिनियम की विशेषताएं : 

इस अधिनियम को मॉर्ले-मिंटो सुधार के सुधार के नाम से भी जाना जाता है (उस समय लॉर्ड मॉर्ले इंग्लैंड में भारत के राज्य सचिव थे और लॉर्ड मिंटो भारत में वायसराय थे)। 

  1. इसने केंद्रीय और प्रांतीय विधानपरिषदों के आकार में काफी वृद्धि की। केंद्रीय परिषद में इनकी संख्या 16 से 60 हो गई। प्रांतीय विधानपरिषदों में इनकी संख्या एक समान नहीं थी।
  2. इसने केंद्रीय परिषद में सरकारी बहुमत को बनाए रखा लेकिन प्रांतीय परिषदों में गैर-सरकारी सदस्यों के बहुमत की अनुमति थी। 
  3. इसने दोनों स्तरों पर विधान परिषदों के चर्चा कार्यों का दायरा बढ़ाया। उदाहरण के तौर पर अनुपूरक प्रश्न पूछना, बजट पर संकल्प रखना आदि।
  4. इस अधिनियम के अंतर्गत पहली बार किसी भारतीय को वायसराय और गवर्नर की कार्यपरिषद के साथ एसोसिएशन बनाने का प्रावधान किया गया। सत्येंद्र प्रसाद सिन्हा वायसराय की कार्यपालिका परिषद के प्रथम भारतीय सदस्य बने। उन्हें विधि सदस्य बनाया गया था।
  5. इस अधिनियम नै पृथक् निर्वाचन के आधार पर मुस्लिमों के लिए सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का प्रावधान किया। इसके अंतर्गत मुस्लिम सदस्यों का चुनाव मुस्लिम मतदाता ही कर सकते थे। इस प्रकार इस अधिनियम ने सांप्रदायिकता को वैधानिकता प्रदान की और लॉर्ड मिंटो को सांप्रदायिक निर्वाचन के जनक के रूप में जाना गया। 6. इसने प्रेसिडेंसी कॉरपोरेशन, चैंबर्स ऑफ़ कॉमर्स, विश्वविद्यालयों और जमींदारों के लिए अलग प्रतिनिधित्व का प्रावधान भी किया।

Next : Government of India Act of 1919, Simon Commission and Communal Award

Also read : Regulating Act of 1773, Charter Acts of 1793, 1813, 1833 and 1853Pitt’s India Act of 1784,

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