पुष्यभूति एवं हर्ष साम्राज्य का उदय

इस पेज  की  पाठ्यक्रम

1 प्रस्तावना 2 उत्तर भारत का बदलता राजनैतिक परिदृश्य 2.1 राजनीतिक केन्द्रों के ये प्रकार : जयस्कन्धवाड़ 2.2 कन्नौज नये राजनीतिक केन्द्र के रूमें 2.3 पाटलिपुत्र का पतन 3. पुष्पभूति 4. हर्ष की राजनैतिक गतिविधियाँ 4.1 स्रोत 4.2 हर्ष की राजनैतिक गतिविधि : एक अवलोकन 4.3 हर्ष का राज्य विस्तार 4.4 युवानच्चांग का विवरण 4.5 हर्ष-संवत 4.6 हर्ष के राज्यकाल का अन्त 5. राजनीति की बदलती संरचना 5.1 शासकों की उपाधियाँ 5.2 प्रशासन 5.3 राजनीतिक संरचना 6. परिणामः कन्नौज का त्रिगुटीय संघर्ष

1. प्रस्तावना

उत्तर गुप्त काल में उत्तर भारत की चारित्रिक विशेषताएं कान्यकुब्ज के मौखरि, मगध के गुप्त, श्चिम बंगाल के गौड़ (मुर्शिदाबाद जिला), वल्लभी के मैत्रक (सौराष्ट्र उपद्वीप), थानेसर के पुष्पभूति जैसे अनेक शासकीय परिवारों का उद्भव था। इनमें से अनेक गुप्तों के अधीनस्थ थे। परन्तु गुप्तवंश के राजनैतिक अधिकारों के पतन के पश्चात ये स्वयं को स्वतन्त्र मानने लगे। इस प्रकार 6वीं शताब्दी सी.ई. का उत्तर भारत अपनेअपने क्षेत्रीय न्दर्भो पर आधारित, अनेक शक्तियों की रणभूमि बना, जो पस में संघर्षरत थीं। इस प्रकार के राजनैतिक परिदृश्य से सामन्त (अधीनस्थ) शक्तिशाली होकर उभरे। उन्होंने दूरस्थ क्षेत्रों पर नियंत्रण रखा अथवा अपने अधिपतियों के राजनैतिक केन्द्रों से सुंदर युद्ध लड़े । स्थानीय वं क्षेत्रीय शक्तियों के उदय को इस काल की कसौटी माना जाता है। इस इकाई में हम आपको पुष्पभूतियों के संक्षिप्त इतिहास एवं हर्ष किस प्रकार सबसे महत्वपूर्ण शासक बना एवं एक साम्राज्य स्थापित किया, सका वर्णन कर रहे हैं। 

2 उत्तरी भारत का बदलता राजनैतिक परिदृश्य 

इस काल में हम देखते हैं कि कुछ क्षेत्र अन्य की तुलना में अधिक शक्तिशाली हुए। उदाहरण के लिए उन्नत क्षेत्रों जैसे जो ऊँचाई पर स्थित थे अथवा पहाड़ों तथा नदियों से घिरे थे, क्षेत्र जो कि सुचारू रूप से सैना की गतिविधियों, उनके भोजन एवं प्रावधानों के सुगम्य परिवहन के लिए जलीय तथा थलीय मार्गों से जुड़े थे, ये पुरानी राजधानी से अधिक महत्वपूर्ण माने गये। ये नये केन्द्र अभिलेखों में जयस्कन्धवाड़ (जिसका वास्तविक अर्थविजय शिवि) के नाम से जाने जाते हैं। 

2.1. नये प्रकार के राजनीतिक केन्द्र : जयस्कन्धवाड़ 

ये जयस्कन्धवाड़ थे जहाँ से शासकीय वंशों ने धार्मिक अनुदान जैसे ब्राह्मणों, भिक्षुओं, मन्दिरों एवं बौद्ध मठों को प्रदान किया। आरम्भिक मध्ययुगीन शिलालेख भिन्न-भिन्न शासकों के अनेक जयस्कन्धवाड़ के सन्दर्भो से भरे हैं। इस प्रकार के सन्दर्भो से राजनीतिक विजयों एवं विस्तार का अनुमान लगाया जा सकता है। उदाहरणस्वरूप हर्ष के वर्धमानकोटि जयस्कन्धवाड़ से क्रमशः मधुबन एवं बांसखेड़ा ताम्रपत्र अभिलेख प्रकाशित किये गये थे। दोनों आधुनिक उत्तर-प्रदेश में कहीं स्थित हैं।

2.2. कन्नौज नये राजनीतिक केन्द्र के रूप में 

पूर्व में कान्यकुब्ज या महोदय नाम से जाना जाने वाला कन्नौ, धुनिउत्तर प्रदेश के कन्नौज जिले में स्थित, म्भिक मध्यकाल में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। ऊँचाई क्षेत्र में गंगा-यमुना दोआब में स्थित कन्नौज की किलेबन्दी सुगमता से कराई जा सती थी। इस प्रकार मैदानी क्षेत्र में इसकी अनुकूल अवस्थिति के बावजूद इसे सुगमतापूर्वक किलेबन्दी करके सुरक्षित किया जा सकता था। इसके अतिरिक्त कन्नौज मूलतः पश्चिमी गंगा तटीय क्षेत्र के कृषि विस्तार के अन्तर्गत आता था। भूमि अनुदान इस क्षेत्र में प्रचुरता में किया जा सकता था। प्राकतिक रूप से इस क्षेत्र ने ब्राह्मणों को आकर्षित किया जो यहाँ आकर बसे एवं आगामी शताब्दियों में पूरे देश के राजदरबारों में विस्तृत रूप से प्रतिष्ठित हुए। कन्नौपूर्व में गंगा क्षेत्रों के साथ ही साथ दक्षिण में जाने वाले मार्गों से भी भली प्रकार जुड़ा था। इन सभी कारकों के कारण कन्नौज शक्ति के रूप में उभरा एवं उत्तर भारमें केन्द्रक के रूप में महत्व स्थापित किया। इस विकास के साथ हम देखते हैं केन्द्र बिन्दु, दक्षिण बिहार के पाटलिपुत्र से कन्नौज की तरफ स्थानान्तरित होता है। कन्नौज उत्तर भारत की राजनीति में एक केन्द्रीय विषय के रूप में उभरा। 

इस प्रकार, कान्यकुब्ज राजनैतिक केन्द्र के रूप में मौखरियों की सत्ता के अंतर्गत गृहवर्मन के अधीन सर्वप्रथम हर्षचरित में देखने को मिलता है। गृहवर्मन का विवाह पुष्पभूति राजकुमारी राज्य श्री के साथ हुआ था। जब हर्षवर्धन राजा बना उसने अपने पूर्वजों की राजधानी थानेश्वर के बजाय कन्नौज में स्थापित की। इसे अपनी राजधानी बनाने के पीछे हुणों की आक्रमक गतिविधियाँ भी हो सकती है, जो 5वीं शताब्दी के मध्य में स्कन्दगुप्त के शासनकाल से उत्तर पश्चिम से भारत में आने का मार्ग बना रहे थे | थानेश्वर उत्तर-पश्चिम के निकट था; हर्षवर्धन ने कान्यकुब्ज में अधिक सुरक्षित महसूस किया चूँकि यह पूर्व की ओर अधिक केन्द्रित था। 

2.3. पाटलिपुत्र का पतन 

आर. एस. शर्मा जैसे इतिहासकारों का मत है कि उत्तर-गुप्त काल में व्यापार एवं व्यवसाय में अवनति के कारण पाटलिपुत्र पतकी ओर था। यह राज्य के आर्थिक एवं राजनैतिक सामन्तीकरण की प्रक्रिया का भाग था। अन्य स्थानों से इस नगर में आने वाले व्यापारियों पर मार्ग-कर संग्रहित किया जाता था। इस प्रकार अधिकारियों, सैनिकों एवं अन्य शाही नौकरों का वेतन भूमिआवंटन द्वारा किया जाता था। इस प्रकार उत्तर-गुप्त काल में नगरों ने अपनी महत्ता खो दी एवं स्कन्धवाड़ों ने ख्याति अर्जित की । अतः आर. एस. शर्मा का मत है कि पाटलिपुत्र वृहद स्तर पर पूर्व सामन्ती क्रम को दर्शाता है, जहाँ कान्यकुब्ज र्षवर्धन के अधीन सामन्त युग के आरम्भ को दर्शाता है। 

जैसा भी हो, इस त की अपनी आलोचना है। भिन्न-भिन्न क्षेत्रों एवं स्थानों की अर्थव्यवस्था का अध्ययन गुप्त काल के तुन्त पश्चात व्यापार, नगरीय केन्द्रों एवं आर्थिक मुद्रा के पतन को परिलक्षित नहीं करता है। यह एक सम्पूर्ण भारत की घटना हीं थी। बल्कि कुछ इलाकों जैसे क्षिण-पूर्व बंगाल, पश्चिम भारत आदि स्थानों पर व्यापार समृद्ध था एवं यहाँ सोने चाँदी के सिक्कों की प्रचुरता भी थी। इसके अतिरिक्त अन्तर एवं अन्तर्खेत्रीय व्यापार वृहद स्तर पर किये जाते थे। 

हर्ष कान्यकुब्ज को अपनी राजधानी बनाने के पश्चात् काफ़ी शक्तिशाली हुआ जिसे उसके राजकवि बाणभट्ट ने अपने ग्रंथ हर्षचरित में गौरान्वित किया है। दूसरी तरफ एच. सी. रायचौधरी जैसे इतिहासकारों का मत है कि इसने ‘त्रिगुटीय संघर्ष’ में भी योगदान दिया। नका मानना है कि यह तीन वंशों के मध्य का संघर्ष था पश्चिम भारत के गुर्जर-प्रतिहार, बंगाल एवं बिहार के पाल एवं दक्कन के राष्ट्रकूट, जिसका उद्देश्य कान्यकुब्ज, जिसे हर्ष ने राजधानी चुना था तथा जो शाही राजधानी बन गया था, पर आधिपत्य स्थापित करना था। 

3. पुष्पभूति’

विभिन्न स्रोतों से हमें पुष्पभूतियों के विषय में जानकारी मिलती है, जिन्होंने पहले हरियाणा के थानेश्वर तथा बाद में उत्तर प्रदेश के कन्नौज से शासन किया। इन स्रोतों में हर्षचरित, युवानच्चांग (हवेनत्सांग) का यात्रा विवरण, अभिलेख तथा सिक्कें हैं। बावणभट्ट हमें बताते हैं कि इस वंश का संस्थापक राजा थानेश्वर में पुष्पभूति था तथा यह परिवार पुष्पभूति वंश के नाम से जाना जाता था। यद्यपि हर्ष के अभिलेखों में इसका कोई सन्दर्भ नहीं है। बांसखेड़ा एवं मधुबन ताम्पत्र एवं शाही मुहरें आरम्भिक पाँच शासकों के विषय में जानकारी प्रदान करते हैं, जिनमें से तीन को महाराजा की उपाधि प्रदान की गई थी। यह दर्शाता है कि वे सम्प्रभु सम्राट नहीं थे। चतुर्थ सम्राट प्रभाकरवर्धन का वर्णन महाराजाधिराज के रूप में हुआ है जिससे हम यह अनुमान लगा सकते हैं कि वह एक स्वतन्त्र सम्राट था एवं उसने गृहवर्धन की पुत्री राज्यश्री के साथ विवाह करके मौखरियों के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किया था।

इस समय (लगभग 604 सी.ई.) थानेश्वर को पश्चिम की ओर से हूणों के आक्रमण का भय था। बाणभट्ट प्रभाकरवर्धन का वर्णन ‘हूण हिरनों के लिए शेर’ के रूप में करते हैं। उनके अनुसार राज्यवर्धन के अधीन एक सेना हूणों को पराजित करने के लिए भेजी गयी परन्तु पिता की अकस्मात बिमारी के कारण उसे वापस होना पड़ा। प्रभाकर वर्धन की मृत्यु के पश्चात परिवार को कुछ समय तक विपदा का सामना करना पड़ा। मालवा शासक ने गृहवर्धन की हत्या कर दी तथा उसकी पत्नी राज्यश्री को बन्दी बना लिया। ऐसा प्रतीत होता है, मालवा एवं गौड़ शासक ने सन्धि कर ली थी तथा थानेश्वर को धमकी दे रहे थे। राज्यवर्धन ने मालवों को पराजित किया परन्तु गौड़ शासक शशांक द्वारा विश्वाघात द्वारा मारा गया। अब यह हर्ष का उत्तरदायित्व था कि वह प्रतिशोध ले, एवं कुछ समय पश्चात वह एक सशक्त साम्राज्य स्थापित करने में समर्थ हुआ।

4. हर्ष की राजनैतिक गतिविधियाँ 

4.1. स्रोत 

प्रशस्तिक के रूप में अभिलेख, तामपत्र, इस वंश के घोषणापत्र इत्यादि शासक की क्रियाकलापों एवं राजनैतिक विजयों का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन करते हैं। प्रशस्तियों में शासकों की राजनैतिक विजयों का रूढ़रूप वर्णन मिलता है। ये शासक को सार्वभौम सम्राट (चक्रवर्ती/सार्वभौम राजा) होने का दावा करते हैं, जिसने चारों दिशाओं को जीता एवं दिग्विजय प्राप्त की। राजनैतिक केन्द्रों के सन्दर्भ, अभिलेखों में अभिलिखित भू-दान क्षेत्र एवं आलेखों के खोज स्थल, वंश के अधीन क्षेत्र-विस्तार को इंगित करते हैं। इसके अतिरिक्त राज कवियों के चरित काव्य एवं जीवनी काव्य ऐतिहासिक जानकारी के नये स्रोतों के रूमें उभर कर आये हैं। इस प्रकार के काव्यों, कविताओं में संरक्षक राजा नायक होता है, जो जीवमें कई उतार-चढ़ाव चुनौतियाँ से गुजतरा हुआ अन्नतः विजय प्राप्त करता है। इस प्रकार का आरम्भिक उदाहरण हमें हर्षचरित में देखने को मिलता है। हर्षचरित (हर्ष का जीवन) इस तरह का पहला दर्श है। इस काव्य में कवि बाणभट्ट हर्षवर्धन के उदय के बारे में बताते हैं। हमें यह बताया जाता है कि जब पुष्पभूति शासक प्रभाकरवर्धन राज्य कर रहा था दुर्जेय हूणों ने राज्य के उत्तर-पश्चिम सीमान्त पर आक्रमण किया। राज्यवर्धन एवं हर्षवर्धन दोनों राजकुमार उन्हें रोकने गये । इसी मध्य प्रभाकरवर्धन बीमार हो गये एवं उनकी मृत्यु हो गयी। स्थिति और भी दयनीय हो गयी जब कान्यकुब्ज का मौखरि शासक जो कि उनका जीजा एवं उनकी हन का पति था, अपने शत्रुओं द्वारा मारा गया। ये गौड़ के शशांक एवं मालवा के देवगुप्त थे। राज्यवर्धन शत्रुओं से युद्ध करने गये एवं शत्रुओं के शिविर में मारे गये। बाद में हर्षवर्धन ने अपनी बहन को बचाया और चूंकि मौखरियों का कोई उत्तराधिकारी नहीं था, अतः कान्यकुब्ज के सिंहासन का प्रस्ताव उसे दिया गया। उसने मौखरि के मंत्रियों द्वारा दिया गया प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। इस प्रकार वह पुष्पभूतियों एवं मौखरियों का संयुक्त शासक बन गया। उसने कान्यकुब्ज को अपनी राजधानी बनायी। इस प्रकार काव्य का अन्त होता है। गौर का विषय है कि कवि का उद्देश्य हर्ष के सिंहासन पर विराजने का वृतांत प्रस्तुत करना है। उसे एक सर्वोचित एवं न्यायपूर्ण व्यक्ति दर्शाते हुए, उसके अपने भाई के साथ साझा प्रेम को रेखांकित करते हुए बाणभट्ट हर्ष की सिंहासन प्राप्ति को न्यायसंगत ठहराते हैं। यद्यपि यह करते हुए उसने ज्येष्ठ भाई का स्थान ले लिया था। 

आगामी काल के शासक जैसे बंगाल एवं बिहार के रामपाल, पश्चिम चालुक्य के विक्रमादित्य तुर्थ, गुजरात के चालुक्य वंश के कुमारपाल चरित काव्यों जैसे रामचरित, विक्रमाकदेवचरिएवं कुमारपालचरित में मुख्य पात्र के रूमें प्रतीत होते हैं। यह दर्शाता है कि किस प्रकार हर्षचरित एक उदाहरण के रूप में स्थापित हुआ जिससे साहित्य में एक शैली का प्रारम्भ एवं लोकप्रिय हुआ एवं जिसका विभिन्न क्षेत्रों के शासकों ने जो काव्य के नायक के रूप में आना चाहते थे, अनुसरण किया। 

इस काल से सम्बन्धित अन्य स्रोत चीनी यात्री युवानच्चांग (हवेनत्सांग) का विज्ञात यात्रा विवरण है, जिसने 629 सी.ई.-645 सी.ई. तक भारत में यात्रा की एवं हर्ष के दरबार में सर्वाधिक समय व्यतीत किया। 

स्रोतों की व्याख्या

हर्ष बाणभट्ट एवं युवानच्चांग (हवेनत्सांग) दोनों का संरक्षक था। दोनों के वृतान्त हर्ष को पूरे उत्तर-भारत का स्वामी बताते हैं। दोनों के विवरण के आधार पर आरम्भिक इतिहासकार हर्ष को उत्तर गुप्तकाल का अन्तिम ‘महान हिन्दू’ साम्राज्य निर्माता दिखाते है। इस प्रकार के मतों को हर्ष के कट्टर प्रतिद्वंदी पुलकेशिन-II के उत्तराधिकारियों द्वारा प्रदत्त सकालोत्तपथेश्व(उत्तर के सभी क्षेत्रों का युद्ध-स्वामी) नामक विशेषीकृत उपाधि से भी दृढ़ता प्राप्त होती है। इस प्रकार, भारतीय इतिहास के काल-विभाजन के प्रयोजन में इतिहासकार 647 सी.ई. में र्ष की मृत्यु के साथ एयुका न्त, वास्तव में हिन्दू युग के अन्त को चिन्हित करते हैं। इस प्रकार विन्सेन्ट स्मिथ जो आरम्भिक इतिहासकारों में से एक हैं तथा जिन्होंने भारतीय इतिहास की विस्तृत रचना की है (भारत का आरंभिक इतिहास), मध्यकाल के हिन्दू राज्य को, जिसमें राजपूत सबसे आगे आते हैं, र्ष की मृत्यु के उपरान्त बताते हैं। इस परिवर्तन का प्रमुख मानदण्ड इस विस्तृत साम्राज्य का विभाजन था। जैसा कि उनका मानना है कि पूर्व मध्यकालीन भारत में हर्ष अन्तिम सम्राट था जिसका मौर्यों एवं गुप्तों की भाँति उत्तरभारत के विस्तृत भाग पर आधिपत्य था । राजपूतों की उपस्थिति के बावजूद मध् यकाल मुस्लिम युग का आरम्भ माना जाता है। 

4.2 हर्ष की राजनैतिक गतिविधियाँ : एक अवलोकन 

हर्ष का सिंहासनारोहण 606 सी.. में हुआ। वह पुष्पभूति वंश का था जो स्थानविस्वरा (पंजाब के अम्बाला जिले में आधुनिक थानेश्वर) के निवासी था। अभिलेखों में उल्लेखित उसकी विजयों की पुष्टि समकालीन शासकों जैसे पुलकेशिन II के अभिलेखों से भी की जा सकती है। हर्ष की गतिविधियों पर चर्चा निम्नांकित रूप में करेंगे। 

प्रारम्भिक जीवन-यात्रा

प्रभाकरवर्धन हर्ष का पिता एवं क्रम में चतुर्थ शासक था। उसके दो पुत्र राज्यवर्धन एवम् हर्षवर्धन थे। उसकी पुत्री का विवाह कान्यकुब्ज के मौखरि शासक गृहवर्धन के साथ हुआ। यह एक महत्वपूर्ण वैवाहिक सन्धि थी जिसने 7वीं शताब्दी सी.. त्तर भारत के शक्ति संतुलन को प्रभावित किया। मौखरियों के प्रतिद्वंदी गौड़ों (प्रारम्भ में मौखरि शासक इशानवर्मन गौड़ों को परास्त करने का दावा करते हैं), ने मालवा के देवगुप्त के साथ सन्धि बनायी थी। 

पूर्वी अभियान

गौड़ शासक शशांक एवं मालवा शासक देवगुप्त ने हर्षवर्धन के जीजा मौखरि शासक गृहवर्धन की हत्या कर संकट पैदा कर दिया। उन्होंने कान्यकुब्ज पर अधिकार कर लिया। हर्ष का ज्येष्ठ भाई राज्यवर्धन शत्रु-शिविर में मारा गया। अपनी बहन, गृहवर्धन की विधवा को बचाने के पश्चात मौखरियों के उत्तराधिकारी न होने के कारण, हर्षवर्धन को मंत्रियों द्वारा सिंहासन का प्रस्ताव आया। हर्ष ने अब कान्यकुब्ज के सिंहासको अधिकार में लेकर पुष्पभूति एवं मौखरि दोनों प्रदेशों पर शासन प्रारम्भ कर दिया। उसने शंशाक से प्रतिरोध की प्रतिज्ञा की, स्वं उन राज्यों पर आक्रमण किया जिन्होंने राजनिष्ठा से इंकार किया था। यद्यपि न तो बाणभट्ट न युवानच्चांग शशांक और हर्ष के मध्य वास्तविक संघर्ष के विषय में सूचना देते हैं। इसके अतिरिक्त युवानच्चांग (हवेनत्सांग) उल्लेकरता है कि 63738 सी. ई. से कुछ वर्ष पूर्व शशांक ने गया में बोधि वृक्ष काट दिया था। यह बौद्ध धर्म का एक पवित्र प्रतीक था एवं शशांक यह कृत्य तब तक नहीं कर सकता था जब तक कि गया क्षेत्र पउसका अधिकार न हो। वह यह भी इंगित करता हैं कि हर्ष ने 643 सी.ई. में ओडरा एवं कौंगडा (उत्तर-पूर्वी एवं दक्षिणी उडीशा) को भी जीता था। इस प्रकार यह प्रतीत होता है कि हर्ष ने 637 सी.ई. में शशांक की मृत्यु से पूर्व पूर्वी भारत में कोई विजय प्राप्त नहीं की थी। 

पश्चिमी भारत

सौराष्ट्र में वल्लभी के राज्य पर मैत्रकों का शासन था जो गुप्तों के सामन्त थे। हर्ष एवं मैत्रकों के मध्य सम्बन्ध थोड़ा जटिल है। भड़ौच के गुर्जर शासकों का शिलालेख (जयभट्ट II का नौसारी अनुदान 726 सी.ई.) वल्लभी शासकों की रक्षा का दावा करता हैं जिसपर हर्ष बलपूर्वक अधिकार करना चाहता था। मूलरूसे लाट शासक (दक्षिण गुजरात) एवं मालवों तथा गुर्जरों ने हर्ष एवं पुलकेशिन II के राज्य जो क्रमशः उत्तर एवं दक्षिणी र्मदा पर अवस्थित थे पर रणनीतिक स्थिति बना रखी थी। इस प्रकार हर्ष एवं पुलकेशिन दोनों ही इन तीनों पर नियन्त्रण का प्रयत्न करने का प्रयत्न करेंगे। पुलकेशिन || अपने होल अभिलेख में इन तीनों शासकों को अपने अधीनस्त होने का दावा करता है। जैसा भी हो, जब हर्ष ने वल्लभी राज्य को अधिकार में लिया, वैवाहिक सम्बन्धों के कारण दोनों के मध्य शान्ति अवश्य स्थापित हुई होगी। इस प्रकार मैत्रक वंश के बालादित्य ध्रुवसेन II ने हर्ष की पुत्री से विवाह किया एवं उसका मित्र बन गया। इस प्रकार इस सन्धि ने ध्रुवसेन II को पुलकेशिन के प्रभाव से मुक्त कर दिया। हर्ष एवं पुलकेशिन के मध्य विख्यात संघर्ष का यह कारण हो सकता है। 

पुलकेशिन II के साथ संघर्ष

हर्ष एवं पुलकेशिन द्वितीय दोनों के राज्य नर्मदा नदी की सीमा को स्पर्श करते थे। पुलकेशिन अपने एहोल अभिलेख में बताता है कि हर्ष का आनन्द (हर्ष) भय से चूर हो गया जब उसका हाथी युद्ध में गिर गया। युवानच्चांग के विवरण से ज्ञात होता है कि हर्ष ने पहल की परन्तु पुलकेशिन के विरूद्ध कोई विजय प्राप्त न कर सका। पुलकेशिन के उत्तराधिकारी पुलकेशिन को सकालोत्तरपथेश्वर (हर्ष) को परास्त करके परमेश्वर की उपाधि अर्जित करने का दावा करते हैं। आर. सी. मजुमदार का मानना है कि युद्ध का परिणाम पुलकेशिन के उत्तराधिकारियों द्वारा पुलकेशिन के क्ष में बढ़ा-चढ़ा कर वर्णित किया गया है। यह विरोधियों के संबंध में उच्च स्वर में बोलने का प्रयोजन कवि के संरक्षक की उपलब्धियों को गौरान्वित करना था। 

4.3. हर्ष के राज्य का विस्तार 

हर्ष के अधीन वर्तमान उत्तर प्रदेश, दक्षिण बिहार व उडीशा के कुछ हिस्से थे। उन्हें थानेसर, पूर्वी पंजाब और पूर्वी राजस्थान के हिस्से विरासत में मिले। भास्करवर्मन के अलावा, कामरूप के शासक उनके अधीनस्थ सहयोगी थे और हर्ष ने भी जालंधर और शायद कश्मीर के राजाओं पर प्रभाव डाला | दक्षिण में नर्मदा वह सीमा थी जिसके आगे पुलकेसिन द्वितीय शासकर रहा था। 

4.4 युवानच्वांग (हवेनत्सांग) का विवरण

चीनी धर्मयात्री युवानच्चांग ने 629-645 सी.. में भारत की यात्रा की। वह हर्ष के अधीकन्नौज की समृद्धि के विषय में बताता है। वह कहता है कि शासक अपनी प्रजा की स्थिति जानने के लिए प्रायः भ्रमण करता है। वह हर्ष को बौद्ध धर्म की महायान शाखा के अनुयायी के रूप में दर्शाता है तथा उसने उसके राज्यकाल में नियोजित बौद्ध संगीति का वृहत विवरण दिया है। वह यह भी कहता है कि हर्ष अपने मंत्रियों को वेतभूमि-अनुदान के रूमें देता है। जैसा भी है, हमें इस प्रकार के गैर धार्मिक अनुदान के विषय में कोई वास्तविसाक्ष्य नहीं प्राप्त है। वह हर्ष के द्वारा बौद्ध धर्म की महायान शाखा के संरक्षण एवं ब्राह्ममणों एवं हीनयानों के द्वारा विरोध का भी उल्लेख करता है। हर्ष ने बौद्ध धर्म को भव्य उपहार देने की अतिव्ययिता में शाही खजाने को लगभग खाली कर दिया था। यह विवरण कितना सत्य है इसकी सुनिश्चितता का पता लगाना कठिन है। परन्तु इसने निश्चित रूप से विभिन्न धार्मिक समुदायों के मध्य तनाव को उजागर करता है जो राजकीय संरक्षके लिए आपस में लड़े।

दूसरी ओर युवानच्वांग स्वयं कहता है कि हर्ष ने प्रयाग समारोह में बुद्ध, शिव एवं सूर्य की पूजा की एवं सभी धर्म के अनुयायियों को दान वितरित किया। इसके अतिरिक्त हर्ष के बांसखेड़ा एवं मधुबन ताम्रपत्र लेख में ऋग्वेदीय एवं सामवेदीय ब्राह्मणों को भूमि-अनुदान का उल्लेख है। शिलालेख भी यह दिखाते हैं कि आरम्भिक पुष्पभूति शासक सूर्य-उपासक थे जबकि राज्यवर्धन बौद्ध भक्त था। इन शिलालेखों में हर्ष शिवभक्त दर्शाया गया है। इसके अतिरिक्त हर्ष के लिखे गये नाटक प्रियदर्शिका, रत्नावली, नागनंद में से प्रथम दो ब्राह्मण देवों के मंगलाचरण के साथ आरम्भ होते हैं। ये सामग्री इंगित करते हैं कि चीनी धर्मयात्री बौद्ध धर्म के लिए पक्षपाती था और हर्ष को बौद्ध र्म के महान संरक्षक के रूप में दर्शाना चाहता था। 

4.5. हर्ष-संवत 

अल्बरूनी जो 11वीं शताब्दी में भारत आया, उल्लेख करता है कि हर्ष संवत मथुरा एवं कन्नौज में प्रयोग किया जाता था। यह संवत 606 सी.ई. हर्ष के सिंहासनारोहण से प्रारम्भ माना जाता है। हर्ष के बांसखेड़ा, मधुबन, नवअन्वेशित कुरूक्षेत्र वाराणसी ताम्रपत्र लेख व आदित्यसेन के शाहपुर शिलालेख इसी संवत के लिए दिनांकित किये गये हैं। इसके पूर्व गुप्तों, जिन्होंने भारत के वृहत क्षेत्र पर शासन किया था, भी गुप्त संलेकर आये। यह इंगित करता है कि शासक स्वयं के नाम से संवत प्रारम्भ करके भावी पीढियों द्वारा स्वयं का स्मरण किये जाते हने की इच्छा रखते थे। 

4.6. हर्ष के राज्यकाल का अन्त

चीनी स्रोतों से हमें ज्ञात होता है कि तांग (T’ang) शासन ताई सुंग ने हर्ष के दरबार में 643 एवं 647 सी.ई. में एक दूत भेजा था। दूसरे अवसर पर उन्होंने पाया कि हर्ष जीवित नहीं था तथा उसके सिंहासन पर किसी ने अनधिग्रहण कर दिया था । नेपाल एवं असम की शक्तियों की सहायता से अनधिकर्ता को पराजित करके चीमें बंदी बना लिया गया। यह घटना उत्तर भारत की राजनीति में चीन की बढ़ती हुई रुचि को दर्शाता है। 

5. राजनीति की बदलती संरचना

वृहद उपाधियाँ गुप्तों से ग्रहण की गई थी, साथ ही साथ प्रशासनिक इकाईयों के नाम का भी आगामी राजाओं ने अनुसरण किया।

5.1. शासकों की उपाधियाँ

सम्प्रभुता का दावा करने वाले शासकों द्वारा सामान्यता धारण की जाने वाली उपाधियाँ महाराजाधिराज, परमेश्वर तथा परम भट्टारकथी। अधीनस्थ राजा महाराज, सामन्त, महासामंत क आदि उपाधियाँ का प्रयोग करते थे। भूमि-अनुदान घोषणाओं में राज्य के प्रशासन में उपाधियाँ तथा पद के विभिन्न स्त, श्रेणी क्रियात्मकता एवं कार्यकलाप दर्शाते हैं। 

5.2. प्रशासन

हर्ष के प्रशासनिक शान से सम्बन्धित बहुत कम विवरण उपलब्ध हैं। विभिन्न शासकीय पद गुप्तों के समय से चला आ रहे थे। युवानच्चांग कहता है कर बहुत कठोर नहीं थे। शासक किसानों से 1/6 भाग कर के रूप में लेता था । युवानच्चांग के अनुसार दासप्रथा नहीं थी, आगे कहता है यह बहुत सीमित थी एवं कर बहुविनम्र थे। देवाहूति का मानना है कि शायद इससे उसका तात्पर्य कर के स्थान पर श्रम से था। हर्ष दृढ़प्रतिज्ञ शासक था एवं अपने मंत्रियों को आत्मविश्वास एवं निष्ठा से प्रेरित रखता था । युवानच्चांग उल्लेख करता है कि हर्ष एक उद्योगशीशासक था। उसका दिन तीन भागों में विभाजित था जिसमें से एक राज्य को एवं अन्य दो धार्मिक कार्यों को समर्पित था। यद्यपि राजकीमामलों एवं प्रशासन में धर्मनिरपेक्ष पहलु अधिक अन्तर्निहित हो सकते हैं, धार्मिक मामलों में भावग्रस्त लोगों के लिए अस्पताल खुलवाना, दान का वितरण, दार्शनिक चर्चाओं का प्रबन्ध एवं छाया देने वाले वृक्षों का रोपण, शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना आदि आते हैं। हर्ष अपने अधीन मण्डलों के लिए न केवल कठोर था बल्कि समय-समय पर भ्रमण एवं निरक्षण करके आम जनता से निकट सम्पर्क में रहता था। वह अपने विस्तृत साम्राज्य से परिचित था, जो उसे प्रशासनिक रूप से दक्ष बनाता था। उदाहरणस्वरूप वह स्थानीय भौगोलिक स्थिति एवं लोगों के मिजाज को समझता था जिससे उसे वहाँ के लिए उपयुक्त राज्यपाल नियुक्ति में मदद मिलती थी। हर्ष उनके एवं सहायक नेताओं के साथ व्यक्तिगत साक्षात्कार करके सुचारु प्रशासन सुनिश्चित करता था। 643 सी.ई. में से 20 सहायक नेता थे। हर्ष अपने पड़ोसी राज्यों के साथ मैत्री सम्बन्ध रखता था। जिससे वह युवानच्चांग के यात्रा एवं आवास के लिए सुविधाएँ माँगता था। उसके चीनी सम्राटों के साथ राजनयिसम्पर्क थे। 

हर्ष के राज्यकाल में सर्वोच्च उपाधि परम भट्टारक महाराजाधिराज शासकों का सर्वोच्च हान शासक” की थी। इस प्रकार के उच्चस्तरीय उपाधियाँ का प्रयोगुप्तों के काल से प्रतिमान बन गया था। जैसे ही शासक सार्वभौविजेता बनता एवं सर्वोपरि स्थान प्राप्त ता था इस प्रकार की उपाधियाँ ग्रहण करना सामान्य बात हो गयी थी। हर्ष के प्रतिद्वंदी पुलकेशिन II द्वारा प्रदत्त विशेषीकृत पाधि ‘कालोत्तपथेश्वर हर्ष को प्राप्त इस प्रकार की उच्चस्तरीय उपाधियों को और भी प्रमाणिकता प्रदाकरती है। 

छोटे शासक राजा या महाराजा नाम से जाने जाते थे। वे अपनी सीमाओं में स्वतन्त्र थे परन्तु सम्प्रभु शासक के प्रति अपनी निष्ठा प्रकट करते थे। दुर्भाग्यवश, दो प्रमुख प्राधिकारी लेखक बाण एवं युवानच्वांग भी हमें हर्ष के प्रशासन के विषय में अधिक जानकारी नहीं देते। हर्ष एवं पुलकेशिन II के शिलालेख, उनके उत्तराधिकारी एवं समकालीन शासक हमें प्रशासन के विषय में कुछ जानकारी प्रदान करते हैं। शासक राज्य का सर्वोच्च था। वह राज्य में मंत्रियों एवं महत्वपूर्ण अधिकारियों की नियुक्ति करता था। युद्ध में सेना का नेतृत्व करता था। वह धर्मशास्त्रों में दिये गये आदर्शों के अनुसार शासन करता था। 

राजा को प्रशासमें मंत्रिपरिषद सहायता करती थी। परिषद में सामन्त, जागीरदार, राजकुमार एवं उच्च अधिकारी सम्मिलित थे। राज-दरबार के प्रबन्ध के लिए विशेष कर्मचारी एवं अधिकारी होते थे। विभागीय अध्यक्ष होते थे जो सीधे शासक को विवरण देते थे। हर्ष के काल में प्रशासनिक एवं सैन्य विभाग स्पष्ट रूप से विभाजित नहीं थे। परिणाम स्वरू, उच्च अधिकारियों में से कुछ सैन्य अधिकारियों के रूप में भी कार्य करते थे। जिला एवं प्रान्तीय प्रशासन गुप्तों से अधिक भिन्न नहीं था। इसके साक्ष्य हमें कुमारगुप्त I के दामोदपुर शिलालेख, धर्मादित्य एवं समाचारदेव का फरीदपुर शिलालेख, बसाढ़ के सिक्कों में उल्लेखिप्रशासनिक इकाईयों एवं उनके अधिकारियों के नाम के द्वारा मिलता है, जो बाण के अनुसार हर्ष के शिलालेखों में भी पाया जाता है। 

5.3. राजनैतिक संरचना 

उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर प्रसिद्ध शासक हर्षवर्धन की राजनैतिक गतिविधियों के बारे में उपर्युक्त र्चा, अनगिणत मध्ययुगीन राज्यों एवं उसके विस्तार के विषय में उत्पन्न बाधाओं की ओर सकेंत करती है। राज्यों की रूपरेखा स्पष्ट नहीं थी। वैवाहिक सन्धियाँ एवं संघर्ष वंशों के मध्य सामान्य थे। बी. डी. चट्टोपाध्याय दर्शाते हैं कि आरम्भिक मध्यकाल में आनुवांशिक संधिया राजनैतिक गठन का केन्द्र थी एवं वंश एवं राज्य के मध्य कोई विरोधाभास नहीं था। 

इस काल की प्रशस्तियाँ (प्रशंसा पत्र) सौपानिक राजनैतिक संचना की सूचक हैं। अधनिस्थ शासकों के शिलालेख अपने अधिपतियों का उल्लेख करते हैं। इस न्दर्भ में सामान्यतया प्रयोग की जाने वाली उक्ति है, तत्पदानुध्याता, जिसका वास्तविक अर्थ ‘उसकी चरणवन्दना’ है। यह उक्ति शासकों द्वारा उनके पिता के लिए भी प्रयोग की जाती थी। जैसा भी है, जब यह उक्ति अधिनस्थ शासकों द्वारा उनके अधिपतियों के लिए प्रयोग की जाती थी तो इसका आशय पदानुग्रहीतहोता था जो उके साथ अन्य की तुलना में प्रकार से अधिनिकट सम्बन्ध का दावा करता था। 

क अन्य चर्चा का विषय यह भी है कि “सामन्त’ या ‘जागीरदार’ उन अधीनस्थ शासकों के सन्दर्भ में कितना उपयुक्त है जो अपनी निष्ठा एवं सैन्य सेवा के द्वारा आभार व्यक्त करते थे। पश्चिमी यूरोपीय सामन्तवाके समान यहाँ अधिपत्यों एवं अधीनस्थ शासकों के मध्य कोई अनुबंध नहीं होता था। शासकों द्वारा अपने सामन्तों को भूमि-अनुदान (गैर-धार्मिक भूमि) के वास्तविक साक्ष्य बहुत कम है। इस प्रकार 6वीं शताब्दी में भूमि-अनुदानों की संख्या में वृद्धि सामन्ती राजनीतिके उदय की कारक नहीं हो सकती थी। 

6. परिणामः कन्नौज का त्रिगुटीय संघर्ष

(8-9वीं शताब्दी सी.ई. में तीन शक्तियों बंगाल एवं बिहार के पाल, पश्चिमी भारत के प्रतिहार एवं दक्कन के चालुक्यों के मध्य कान्यकुब्ज पर अधिकार के लिए संघर्ष।)

उत्तर भारत में कन्नौज को राजकीय शक्ति के रूप में स्थापित करने का श्रेय हर्ष को जाता है। हम देते हैं आगामी वर्षों में अनेक शासकों द्वारा स्वयं को कान्यकुब्ज पर पदासीन करने के कई प्रयास किये गये | 8वीं शताब्दी के प्रारम्भ में प्राकृकाव्य गौड़वहों के नायक शोवर्मन भी स्वयं को कान्यकुब्ज के शासक के रूप में दर्शाते हैं। काव्य का शीर्षक गौड़वहों (संस्कृत में गौड़वध अर्थात गौड़ शासक की पराजय एवं मृत्यु) गौड़ों एवं कान्यकुब्जों के मध्य शत्रुता दर्शाता है। डी. सी. सिरकर के अनुसार यह शत्रुता मौखरियों के शासके प्राम्भ से ही थी जैसाकि ईशानवर्मन अपने हरहा शिलालेख 554 सी.ई. में गौड़ों को पराजित करने का दावा करता है। शत्रुता की यह विरासत दो शक्तियों कन्नौका प्रतिनिधित्व करने वाले हर्ष एवं गौड़ों का प्रतिनिधित्व करने वाले शशांक के मध्य भी जारी रही तथा अन्ततः बंगाल तथा बिहार के पाल (उत्तर भारतीय स्रोतों में गौड़ेश्वरा के रूप में दिखाया गया है) एवं कन्नौज के गुर्जर-प्रतिहारों के मध्य संघर्ष के साथ समाप्त हुई। 

कल्हणकृत राजतरंगिणी भी कश्मीर के कारकोट वंश के ललितादित्य मुक्तापीड द्वारा शोवर्धन के पराजका दावा करती है। शासकों के राजकवियों द्वारा इन प्रभावशाली विजयों के विभिन्न दावों की सुनिश्चिता नहीं की जा सकती। जैसा भी है, काव्यों के नायकों द्वारा स्वयं को कान्यकुब्ज का विजेता के रूप में प्रस्तुति 6-8-9वीं शताब्दी सी.ई. में कान्यकुब्ज के उत्तरोत्तर महत्व को इंगित करता है। 

7. सारांश 

हर्ष का उदय एवं प्रसार, गंगा-यमुना दोआब के महत्व के उद्भव को दर्शाता है। इसमें सन्देह नहीं है कि इसने बाणभट्ट एवं युवानच्चांग के विवरण के बहुत प्रसिद्धि प्राप्त की है। हर्ष की प्रतिद्वंदी, दक्कन के चालुक्यों द्वारा सकालोत्तरपथनाथ उपाधि से विभूषित करना इसके महत्व को और अधिक बल प्रदाकरता है। जो भी है, उपर्युक्त चर्चा यह इंगित करती है कि यह कितना अतिशयोक्तिपूर्ण है। 

इस प्रकार के दावों को दरकिनार करने के पश्चात भी उत्तर-गुप्त राजनीति में कन्नौज के महत्व को इंकार नहीं किया जा सकता है। कन्नौज ने एक प्रभावशाली कृषि पृष्ठप्रदेश पनिन्त्रण स्थापित किया जो नगर की वृद्धि में महत्वपूर्ण था। यह बदलती हुई राजनीतिक अर्थव्यवस्था को दर्शाता है जिसमें कृषि संसाधनों का दोहनके स्थानीय, अतिस्थानीयक्षेत्रीय वंशों के लिए अनिवार्य था जो उत्तर-भारत की राजनीतिक रंणभूमि में हावी होना चाहते थे।