प्रागैतिहासिक काल – तीन पाषाण युग 

शु पालन का आरम्भ

इस पेज के पाठ्यक्रम
1 प्रस्ताना
2 पुरापाषाण युग 2.1 पुरापाषाण युग के औज़ार 2.2 पुरापाषाण युग की बस्तियाँ 2.3 जीवन यापन के तरीके
3 मध्य पाषाण युग 3.1 मध्य पाषाण युग के औज़ार 3.2 मध्य पाषाण युग की बस्तियाँ 3.3 जीवन यापन के तरीके
4 संस्कृति का नवपाषाण चरण 5 सबसे प्राचीन किसान
5.1 नील घाटी 5.2 पश्चिम एशिया के प्रारम्भिक किसान
6 भारतीय उपमहाद्वीप के प्राचीन किसा
1. प्रस्तावना

आज इक्कीसवीं शताब्दी में हमें यह जानकर आश्चर्य होगा कि मनुष्य जाति ने अपने अस्तित्व के आरम्भ से लेकर आज तक का 99 प्रतिशत हिस्सा शिकारी/संग्रहकर्ता के रूप में बिताया है। कहने को तात्पर्य यह है कि मनुष्य ने मात्र 10,000 वर्ष पूर्व कृषि द्वारा उत्पादन करना सीखाइससे पहले वह पूर्णतः प्रकृति पर निर्भर था। अपने भोजन के लिए या तो वे प्रकृति से जड़ें, फल मूल आदि एकत्र करते थे या क्षियों, जानवरों और मछलियों को पकड़कर अपना भोजन जुटाते थे। अपने अस्तित्व के अधिकांश कालों में मनुष्य प्रकृति और पर्यावरण पर पूर्णतः आश्रित रहा। इस तथ्य से कई बातें सामने आती हैं। एक तो यह कि उनके भोजन प्राप्त करने के तरीकों का प्रभाव उनके प्रकृति से संबंध और प्रकृति के प्रति दृष्टिकोण पर पड़ादूसरी यह कि शिकारी/संग्रहकर्ता एक समूह में रहते थे और इसका संबंध उनके द्वारा भोजन जुटाने की पद्धति से है। यहां क बात ध्यान में रखनी चाहिए कि अन्य समूहों की अपेक्षा शिकारी/संग्रहकर्ता समूहों की बनावट कहीं ज्यादा लचीली थी।
मनुष्य काफी अरसे तक शिकारी/संग्रहकर्ता का जीवन बिताता रहा। इसलिए इस काल के मानव इतिहास को जानना जरूरी है। विश्व में ऐसे अनेक क्षेत्र हैं जहां आज भी लोग शिकारी/संग्रहकर्ता का जीवन जी रहे हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि मानव इतिहास में हुए सांस्कृतिक बदलावों के साथ-साथ हम उनकी संस्कृति के बारे में भी जानकारी हासिल करें। पर हम शिकारी/संग्रहकर्ताओं के बारे में जानेंगे कैसे? शिकारी/संग्रहकर्ताओं के रहने के ढंग, उनके सामाजिक संगठन और उनके पर्यावरण आदि विभिन्न पहलुओं पर कई मानव जाति वैज्ञानिकों/मानवेताओं ने प्रकाश डाला है। इन्होंने जीवित शिकारी/संग्रहकर्ता समूहों का अध्ययन किया है। इनके कार्यों से अतीत के शिकारी/संग्रहकर्ता समुदायों की जीवन पद्धति और स्थिति को जानने की अंतर्दृष्टि प्राप्त होती है। इन समुदायों के बारे में जानने के लिए हमें उन पुरात्तववेताओं और अन्य वैज्ञानिकों की सहायता लेनी पड़ती है जो उन समुदाय विशेष के औज़ारों, हड्डियों के अवशेषों और पर्यावरण विशेष के विशेषज्ञ होते हैं। इस प्रकार के अध्ययन के लिए कई प्रकार के शैक्षणिक संकायों का सहारा लेना पड़ता है। उनके जीवन को जानने के लिए कई प्रकार के साक्ष्यों जैसे जानवरों के अवशेष, पौधे और अन्य जैव अवशेषों का अध्ययन करना पड़ता है और उनका संबंध शिकारी/संग्रहकर्ता अवस्था से जोड़ना पड़ता है और इनसे आदि मानव के तत्कालीन भौतिक पर्यावरण को जानने और इसके उपयोग को समझने की अंतर्दृष्टि मिलती है।
शिकारी/संग्रहकर्ताओं द्वारा उपयोग में लाए गए पत्थर के औज़ार पाए गए हैं। उन औजारों को इनके प्रकार तथा काल के अनुसार मध्यपाषाणीय, पुरापाषाणीय आदि वर्गों में विभाजित किया गया है। इन औज़ारों के बनाने के तकनीक पर भी पुरातत्ववेता विचार करते हैं। पशुओं के अवशेषों के अध्ययन से इस बात की जानकारी मिलती है कि प्रागैतिहासिक काल में उनका किस प्रकार उपयोग किया जाता था। पत्थर पर की गयी खुदाई और चित्रकारी से भी प्रागैतिहासिक काल के लोगों की अर्थव्यवस्था और समाज का पता चलता है।

2. पुरापाषाण युग

पुरापाषाण संस्कृति का उदय अभिनूतन (Pleistocene) युग में हुआ था। अभिनूतन युग (20 लाख वर्ष पूर्व) एक भूवैज्ञानिक काल है जिसमें हिम युग अपने अन्तिम चरण में था। इस युग में धरती बर्फ से ढकी हुई थी। पुरापाषाण युग के पत्थर के औज़ारों के वर्गीकरण के संबंध में भारत के पुरातत्ववेत्ताओं के बीच मतभेद हैं:

  • कुछ विद्वान धारदार ब्लेड (Blade) और लक्षणों वाले काल को “उच्च पुरापाषाण” कहते हैं।
  • कुछ विद्वान उच्च पुरापाषाण को यूरोपीय पुरापाषाण संस्कृति से जोड़ते हैं। पर अब उच्च पुरापाषाण का प्रयोग भारतीय संदर्भ में भी होता है।

2.1 पुरापाषाण युग के औज़ार

पर्यावरण और जलवायु में हुए परिवर्तन और मनुष्य द्वारा बनाए गए पत्थर के औज़ारों की प्रकृति के आधार पर पुरापाषाण संस्कृति को तीन चरणों में बांटा गया है।

  • निम्न पुरापाषाण चरण के औज़ारों में मुख्यतः हाथ की कुल्हाड़ी, तक्षणी, काटने का औज़ार आदि हैं।
  • मध्य पुरापाषाण युगीन उद्योग काटने के औज़ारों पर आधारित था, और
  • उच्च पुरापाषाण युग की विशेषता थी – तक्षणी और खुरचनी। अब हम इस काल के कुछ औज़ारों और उनके उपयोग के बारे में चर्चा करेंगे।
  • हाथ की कुल्हाड़ी (Handaxe) – इसका मूठ चौड़ा और आगे का हिस्सा पतला होता है। इसका उपयोग काटने या खोदने के लिए होता होगा।
  • चीरने का औज़ार (Cleaver) – इसमें दुहरी धार होती है। इसका उपयोग पेड़ों को काटने और चीरने के लिए होता था।
  • काटने के औज़ार (Chopper) – एक बड़ा स्थूल औज़ार जिसमें एक तरफा धार होती है और इसका उपयोग काटने के लिए किया जाता था।
  • काटने का औज़ार (Chopping tool) – यह भी चौपर के समान एक बड़ा स्थूल औज़ार है पर इसमें दुहरी धार होती है और इसमें कई पट्टे होते हैं। इसका उपयोग भी किसी चीज को काटने के लिए होता था पर अधिक नुकीली धार वाला होने से यह चौपर से अधिक कारगर होता था।
  • परत (Flake) – यह एक प्रकार का औज़ार होता है जिसे पत्थर को तोड़कर बनाया जाता है परत की सतह पर सकारात्मक समाघात और इसके सारभाग में एक नकारात्मक समाघात (Negative bulb ofpercussion) होता है। जिस स्थान पर पत्थर के हथौड़े से चोट की जाती है उसे समाघात स्थल कहते हैं। इस चोट से जो गोल, हल्का उत्तल हिस्सा कट कर निकलता है उसे सकारात्मक समाघात कहते हैं। इस चोट के परिणामस्वरूप सारभाग का जो हिस्सा अवतल हो जाता है उसे नकारात्मक समाघात कहते हैं। परत बनाने की कुछ तकनीकें हैं: फ्री फ्लेकिंग तकनीक, स्टेप फ्लेकिंग तकनीक, ब्लॉक आन ब्लॉक तकनीक, द्विध्रुवीय तकनीक आदि ।
  • खुरचनी (Side scraper) – इसमें एक पत्तर या ब्लेड होता है और इसका किनारा धारदार होता है। इसका उपयोग पेड़ की खाल या जानवरों का चमड़ा उतारने में किया जाता होगा।
  • तक्षणी (Burin) – यह भी पत्तर या ब्लेड के समान ही होता है, पर इसका किनारा दो तलों के मिलने से बनता है। तक्षणी के काम वाले हिस्से की लम्बाई 2-3 से.मी. से अधिक नहीं होती है। इसका उपयोग मुलायम पत्थरों, हड्डियों, कोरों या गुफाओं की दीवारों पर नक्काशी के लिए होता होगा।

2.2 पुरापाषाण युग की बस्तियाँ

अब हम पढ़ेंगे कि शिकारी/संग्रहकर्ताओं द्वारा प्रयुक्त औज़ार पुरातत्ववेताओं को किन-किन क्षेत्रों में मिले हैं। इन औजारों के क्षेत्रीय फैलाव के बारे में पता चलने पर न केवल हमें शिकारी/संग्रहकर्ताओं के निवास स्थलों का पता चलेगा, बल्कि उस पर्यावरण की भी जानकारी मिलेगी जिसमें वे रहते थे।
विभिन्न क्षेत्रों में इनका अध्ययन करें :

  1. कश्मीर घाटी दक्षिण पश्चिम में पीर पंजाल पहाड़ियों और उतर पूर्व हिमालय से घिरी है। कश्मीर में लिद्दर नदी के किनारे पहलगांव से एक हाथ की कुल्हाड़ी प्राप्त हुई थी। किन्तु पुरापाषाण युग के औज़ार कश्मीर में ज्यादा नहीं मिलते क्योंकि हिम युग में कश्मीर में अत्यधिक ठंड होती थी। पोतवार क्षेत्र (आज का पश्चिमी पंजाब औपाकिस्तान) पीर पंजल और साल्ट पर्वत श्रृंखला के बीच में पड़ता है। इस इलाके में विवर्तनिक बदलाव आया था और इस क्रम में सिंधु और सोन नदियों की उत्पत्ति हुई थी। सोहन घाटी में हाथ की कुल्हाड़ी और काटने के औज़ार मिले हैं। ये औज़ार अड़ियाल, बलवाल और चौन्टरा जैसी महत्वपूर्ण पुरापाषाणीय बस्तियों में पाये गए हैं। ब्यास, बाणगंगा और सिरसा नदियों के किनारे भी पुरापाषाण युग के औज़ार पाए गए हैं।
  2. लूनी नदी (राजस्थान) के आसपास के क्षेत्र में कई पुरापाषाण युगीन बस्तियाँ पाई गई हैं। लूनी नदी का उद्गम अरावली क्षेत्र में हुआ था। चितौढ़गढ़ (गंभीर नदी घाटी) कोटा (चंबल नदी घाटी) और नगरई (बेराच नदी घाटी) में पुरापाषाण युग के औज़ार पाए गए हैं। मेवाड़ की वगांव और कदमली नदियों के आसपास भी मध्य पुरापाषाण युगीन बस्तियाँ पाई गई हैं। इन इलाकों से कई प्रकर की खुरचनी, बेधक औज़ार और नुकीले औज़ार भी पाए गए हैं।
  3. गुजरात में साबरमती, माही और उनकी सहायक नदियों के आसपास पुरापाषाण युग के अनेक औज़ार पाए गए हैं। साबरमती नदी अरावली से निकल कर खम्बात की खाड़ी में जा गिरती है। ओरसंग घाटी के नजदीक भंडारपुर में भी मध्य पुरापाषाण युग के औज़ार पाए गए हैं। सौराष्ट्र में भद्दर नदी के आसपास पुरापाषाण युग के अनेक औज़ार मिले हैं जैसे हाथ की कुल्हाड़ियाँ, खुरचनी, काटने के औज़ार, नुकीले औज़ार, बेधक औज़ार आदि। कच्छ क्षेत्र में भी पुरापाषाण युग के अनेक औज़ार मिले हैं जैसे – खुरचनी, हाथ की कुल्हाड़ी और काटने के औज़ार ।
  4. नर्मदा नदी मैकॉल पर्वत श्रृंखला से निकलती है और खम्बात की खाड़ी में जाकर मिल जाती है। नर्मदा के समतलों में पुरापाषाण युग के अनेक औज़ार पाए गए हैं, जैसे हाथ की कुल्हाड़ियां और चीरने के औज़ार। विंध्य क्षेत्र में अवस्थित भीमबेटका (भोपाल के निकट) में पहले एश्यूलियन (Acheulian) संस्कृति के औज़ार उपयोग में लाए जाते थे किंतु वहां बाद में मध्य पुरापाषाण युगीन संस्कृति का आगमन हुआ।
  5. ताप्ती, गोदावरी, भीमा और कृष्णा नदियों के आसपास भी कई पुरापाषाण युग की बस्तियाँ पाई गई हैं। पुरापाषाण युग की बस्तियाँ की उपस्थिति का संबंध पर्यावरण संबंधी बदलाव से भी है जैसे भू-स्खलन, मिट्टी की प्रकृति आदि । ताप्ती की तलहटी में काफी गहराई तक रेगुर काली मिट्टी पाई जाती है। भीमा और कृष्णा नदियों के ऊपरी हिस्से के आसपास के क्षेत्रों में कम पुरापाषाणीय बस्तियाँ पाई गई हैं। महाराष्ट्र में नवासा के नजदीक चिरकी में हाथ की कुल्हाड़ियां, काटने के औज़ार, बेधक औज़ार,
  6. खुरचनी और मिट्टी तोड़ने के औज़ार पाए गए हैं। महाराष्ट्र में कोरेगांव, चन्दौली और शिकारपुर पुरापाषाण युग की अन्य प्रमुख बस्तियाँ हैं। पूर्वी भारत में रोरो नदी (सिंहभूम, बिहार) में भी हाथ की कुल्हाड़ियां, काटने के औज़ार, पत्तर आदि अनेक पुरापाषाण युग के औज़ार पाए गए हैं। सिंहभूम में भी बहुत सी पुरापाषाण युग की बस्तियाँ मिली है। इन बस्तियाँ में मुख्यतः हाथ की कुल्हाड़ियां और काटने के औज़ार पाए गए हैं। दामोदर और सुवर्णरेखा नदियों की घाटी से भी पुरापाषाण युग के औज़ारों के पाए जाने की सूचना मिली है। यहां भी पुरापाषाणीय संस्कृति की उपस्थिति स्थलाकृतिक विशेषताओं से प्रभावित हुई है। उडीशा में वैतरनी, ब्राहमणी और महानदी के डेल्टा क्षेत्र में भी पुरापाषाण युग के कुछ औज़ार पाए गए हैं। उडीशा में मयूरभंज में बुहार बलंग घाटी में प्रारंभिक और मध्य पुरापाषाण युग के कई औज़ार पाए गए हैं जैसे हाथ की कुल्हाड़ियां, खुरचनी, नुकीले औज़ार और पत्तर।
  7. मालप्रभा, घाटप्रभा और कृष्णा की सहायक नदियों के आसपास पुरापाषाण युग की कई बस्तियाँ पाई गई हैं। घाटप्रभा नदी घाटी में एश्यूलियन (Acheulion) हाथ की कुल्हाड़ियां काफी संख्या में पाई गई हैं। अनगवाडी और बागलकोट घाटप्रभा नदी के पास स्थित दो बस्तियाँ है जहां प्रारंभिक और मध्य पुरापाषाण युग के औज़ार पाए गए हैं। तमिलनाडु में पलर, पेनियार और कावेरी में भी पुरापाषाण युग के अनेक औज़ार पाए गए हैं। अतिरमपक्कम और गुड्डियम में प्रारंभिक और मध्य पुरापाषाण युगीन औज़ार पाए गए है जैसे हाथ की कुल्हाड़ियां, खुरचनी, पत्तर, ब्लेड आदि ।

2.3 जीवय यापन के तरीके

पुरापाषाण युग की बस्तियों में भारतीय और विदेशी मूल के जानवरों के अवशेष काफी मात्रा में पाए गए हैं। नर वानर, जिराफ, कस्तूरी मृग, बकरी, भैंसा, गाय और सुअर स्वदेशी मूल के पशु प्रतीत होते हैं। ऊँट और घोड़े से उत्तरी अमरीका से संबंध का ता चलता है। दरियाई घोड़ा और हाथी मध्य अफ्रीका से भारत आये थे। ये हिमालय की पूर्वी और पश्चिमी सीमा से होकर आये होंगे। अधिकांश जानवर भारत की उत्तर पश्चिमी सीमा से होकर आये। उस समय अफ्रीका और भारत के बीच काफी आदान-प्रदान होता था। पुरापाषाण युग के मनुष्य भोजन के लिए किन स्रोतों पर निर्भर करते थे? इस बारे में जानकारी जानवरों के अवशेषों से मिलती है। इन अवशेषों से पता चलता है कि लोग शिकारी और संग्रहकर्ता अवस्था में थे। एक इलाके के रहने वाले मनुष्यों और पशुओं की संख्या के बीच संतुलन रहा होगा। उस समय के लोगों ने आसपास पाये जाने वाले पशुओं और वानस्पतिक संसाधनों का भोजन के रूप में उपयोग किया होगा। मनुष्य छोटे और मध्यम आकाके जानवरों विशेषतः खुरों वाले पशुओं का शिकार करता होगा। साथ ही वह हिरण, गैंडे और हाथी का भी शिकार करता होगा। इस काल में किसी खास प्रकार की शिकारी प्रवृति का पता नहीं चलता है। कहीं-कहीं कुछ विशेष प्रकार के जानवरों के अवशेष बहुतायत में पाए गए, लेकिन इसका कारण यह है कि उस इलाके में उन विशेष जानवरों की बहुतायत थी औउनका शिकार करना आसान था। ऐसा लगता है कि शिकारी/संग्रहकर्ताओं द्वारा पशुओं और पेड़ों को भोजन के रूप में इस्तेमाल करना काफी हद तक शुष्क/आद्र ऋतुचक्र पर आधारित था। पुरापाषाण युग के लोग मुख्य रूप से बैल, गवल, नीलगाय, भैंसा, चिंकारा, हिरण, बारहसिंगे, साम्भर, जंगली सुअर, कई तरह के क्षियों, कुछओं, मछलियों, मधु और फलदायक पौधों के फलों, मू, बीज और पत्तों को भोजन के रूमें इस्तेमाल करते थे
यह कहा जाता है कि आज के वर्तमान शिकारी/संग्रहकर्ताओं द्वारा शिकार किए जाने वाले जानवरों से अधिक महत्व शिकारी/संग्रहकर्ताओं द्वारा संग्रहित भोजन का है। संग्रहित भोजन के अवशेष शिकार के अवशेषों की तुलना में अधिक समय तक सुरक्षित रहते हैंपुरापाषाण युग के लोगों की खाने-पीने की आदतों के बारे में पता लगाना मुश्किल है। ये लोग किस प्रकार के पौधों या फलों का भोजन के रूप में इस्तेमाल करते थे इस बारे में हमें उस प्रकार की जानकारी उपलब्ध नहीं है जैसी कि आजकल के शिकारी/संग्रहकर्ता समूहों के बारे में उपलब्ध है। यह मुमकिन है कि पुरापाषाण युग के लोग पशुओं के साथसाथ फलफूल को भी भोजन के रूप में इस्तेमाल करते होंगे
पत्थर पर की गई चित्रकारी और खुदाई से भी हमें पुरापाषाण युग के लोगों के रहन-सहन और सामाजिक जीवन के बारे में पता चलता है। सबसे पुरानी चित्रकारी उत्तर पुरापाषाण युग की है। विन्ध्य क्षेत्र में स्थित भीमबेटका में विभिन्न कालों की चित्रकारी देखने को मिलती है। प्रथम काल में उतर पुरापाषाण युग की चित्रकारी में हरे और गहरे लाल रंग का उपयोग हुआ है। इन चित्रों में भैंसे, हाथी, बाघ, गैंडे और सुअर के चित्र प्रमुख हैं। ये चित्र काफी बड़े हैं और 2 से 3 मीटर तक है। पुरापाषाण युग के लोगों के शिकारी जीवन की सही जानकारी प्राप्त करने के लिए विभिन्न प्रकार के जानवरों के कितने और किन रूपों में चित्र मिले हैं इसका बारीकी से अध्ययन करना होगा। खुदाई और चित्रकारी से पता चलता है कि शिकार ही जीवन यापन का मुख्य साधन था। इन चित्रों में बनी शारीरिक संरचना के आधार पर पुरूष और स्त्री में सरलता से भेद किया जा सकता है। इन चित्रों से यह भी पता चलता है कि पुरापाषाण युग के लोग छोटे-छोटे समूहों में रहते थे और उनका जीवन निर्वाह पशुओं और पेड़ पौधों पर निर्भर था।

3. मध्य पाषाण युग

मध्य पाषाण युग का आरम्भ बी.सी.ई 8000 के आसपास हुआ। यह पुरापाषाण और नव पुरापाषाण युग के बीच का संक्रमण काल है। धीरे-धीरे तापक्रम बढ़ा और मौसम गरम और सूखा होने लगा। परिवर्तन से मनुष्य का जीवन प्रभावित हुआ। पशु-पक्षी तथा पेड़-पौधों की किस्मों या प्रजातियों में भी परिवर्तन आया। औज़ार बनाने की तकनीक में परिवर्तन हुआ और छोटे पत्थरों का उपयोग किया जाने लगा। मनुष्य मूलतः शिकारी-संग्रहकर्ता ही रहा, पर शिकार करने की तकनीक में परिवर्तन हो गया। अब न केवल बड़े बल्कि छोटे जानवरों का भी शिकार करने लगा। मछलियाँ पकड़ने लगा और पक्षियों का भी शिकार करने लगा। यह भौतिक और पारिस्थितिकी परिवर्तन पत्थर पर हुई चित्रकारी से भी प्रतिबिम्बित होता है। अब हम इस युग में उपयोग में लाए जाने वाले कुछ औज़ारों की चर्चा करेंगे।

3.1 मध्य पाषाण युग के औज़ार

मध्य पाषाण युग के औज़ार छोटे पत्थरों से बने हुए हैं। ये सूक्ष्म औज़ार आकार में काफी छोटे हैं और इनकी लम्बाई 1 से 8 से. मी. तक है। कुछ सूक्ष्म औज़ारों का आकार ज्यामितीय होता है। ब्लेड, कोर, नुकीले, त्रिकोण, नवचन्द्राकार और कई अन्य प्रकार के औज़ार मध्य पाषाण काल में उपयोग में लाए जाने वाले मुख्य ज्यामितीय औज़ार हैं। इनके अलावा इस काल में पुरापाषाण युग के औज़ार जैसे क्षणा, खुरचनी और यहां तक कि गंडासा भी मिलते हैं।

  1. ब्लेड (Blade): यह एक प्रकार का विशेषीकृत परत होता है। इसकी लम्बाई इसकी चौड़ाई से दुगनी होती है। इनका उपयोग संभवतः काटने के लिए किया जाता होगा। मध्य पाषाण युग में औज़ार बनाने की तकनीक को फ्लूटिंग (Fluting) कहा जाता है। इसमें सार मात्र पर प्लेटफार्म के नुकीले सिरे से प्रहार किया जाता है। हमें कुछ धारदार ब्लेड भी मिले हैं। ये चौड़े, मोटे और लंबे होते हैं। ब्लेड को धार देने से उसमें पैनापन आता है। कुछ ऐसे ब्लेड पाए गए हैं जिनके एक या दोनों सिरे धारदार होते हैं अन्यथा दोनों किनारे धारदार होते हैं। ये ब्लेड साधारण ब्लेडों से कहीं अधिक पैने तथा कारगर होते हैं।
  2. कोर (Core): कोर साधारणतया आकार में बेलनाकार होता है जिसकी पूरी लंबाई में फ्लूटिंग के निशान होते हैं और इसमें एक सपाट प्लेटफार्म होता है।
  3. नुकीला औज़ार (Point): नुकीला औज़ार एक प्रकार का टूटा तिकोना ब्लेड होता है। इसके दोनों सिरे ढलवां तथा धारदार होते हैं। इसके सिरे सरल रेखीय या वक्र रेखीय भी हो सकते हैं।
  4. त्रिकोण (Triangle): इसमें साधारणतः एक सिरा और एक आधार होता है और सिरे को धारदार बनाया जाता है। इसका उपयोग काटने के लिए किया जाता है या इसे तीर के अग्र भाग में भी लगाया जाता है।
  5. वचन्द्राकार (Lunate): नवचन्द्राकर औज़ार भी एक तरह का ब्लेड होता है लेकिन इसका एक सिरा वृत्ताकार होता है। यह एक वृत्त के हिस्से के समान मालूम होता है। इनका उपयोग अवतल कटाई के लिए किया जा सकता था या ऐसे दो औज़ारों को मिलाकर तीर का अग्रभाग तैयार किया जा सकता था।
  6. समलम्ब औज़ार (Trapeze): यह भी एक ब्लेड के समान ही दिखाई पड़ता है। इसके एक से अधिक सिरे धारदार होते हैं। किसी-किसी समलम्ब औज़ारों के तीन सिरे धारदार होते हैं। इनका उपयोग तीर के अग्रभाग के रूप में होता होगा।

3.2 मध्य पाषाण युग की बस्तियाँ

अब हम भारत में मध्य पाषाण युग की महत्वपूर्ण बस्तियों के विषय में चर्चा करेंगे

  1. पचपद्र नदी घाटी और सोजत (राजस्थान) इलाके में सूक्ष्म औज़ार काफी मात्रा में मिले हैं। यहां पाई गई एक महत्वपूर्ण स्ती तिलवारा हैतिलवारा में दो सांस्कृतिक चरण पाए गए हैं। पहला चरण मध्य पाषाण युग का प्रतिनिधित्व करता है तथा इस चरण की विशेषता सूक्ष्म औज़ारों का पाया जाना है। दूसरे चरण में चाक पर बने हुए मिट्टी के बर्तन और लोहे के टुकड़े इन सूक्ष्म औजारों के साथ पाए गए हैंमध्य पाषाण युग की बड़ी बस्तियों में से एक है बंगोर (राजस्थान) जो कोठारी नदी के किनारे स्थित है। बगोर में खुदाई की गई तो तीन सांस्कृतिक अवस्थाएं पाई गई। रेडियो कार्बन डेटिंग में अवस्थाI या संस्कृति की सबसे प्रारंभिक अवस्था का समय 5000 से 2000 बी.सी.ई. निश्चित किया गया है।
  2. गुजरात में ताप्ती, नर्मदा, माही और साबरमती नदियों के आसपास भी कई मध्य पाषाण युग की बस्तियाँ पाई गई हैं। अक्खज, बलसाना, हीरपुर और लंघनाज साबरमती नदी के पूरब में स्थित है। लंघनाज का विस्तार से अध्ययन किया गया है। लंघनाज में तीन सांस्कृतिक अवस्थाएं पाई गई हैं। अवस्था-I में सूक्ष्म औज़ार पाए गए हैं। सूक्ष्म औज़ारों में ब्लेड, त्रिकोणीय औज़ार, अर्धचन्द्रकार औज़ार, खुरचनी और तक्षणी आदि प्रमुख हैं।
  3. विन्धय और सतपुरा इलाके में मध्य पाषाण युग की अनेक बस्तियाँ पाई गई हैं। प्रयागराज जिले के प्रतापगढ़ इलाके में सराय नहर राय (उत्तर प्रदेश) का विस्तार से अध्ययन किया गया है। कैमूर पर्वत श्रृंखला में मध्य पाषाण युग की दो प्रमुख बस्तियाँ पाई गई हैं – मोरहाना पहाड़ (उतर प्रदेश) और लेखहीया (उतर प्रदेश)। भीमबेटका (मध्य प्रदेश) में अनेक सूक्ष्म औज़ार मिले हैं। भीमबेटका में पारिस्थितिकी संतुलन बसने के लिए अनुकूल था। भीमबेटका के दक्षिण में आदमगढ़ (होशंगाबाद) में मध्य पाषाण युग की एक प्रमुख बस्ती पाई गई है।
  4. कोंकण के तटीय इलाके और आन्तरिक पठार में भी मध्य पाषाण युग के औज़ार पाए गए हैं। कोंकण इलाके में कसूशोअल, जनयेरी, दभालगो और जलगढ़ जैसी कुछ प्रमुख बस्तियाँ पाई गई हैं। असिताश्म के बने दक्षिण पठार में भी अनेक मध्य पाषाण युग की बस्तियाँ पाई गई हैं। धुलिया और पूना जिले में सूक्ष्म औज़ार पाए गए हैं।
  5. छोटा नागपुर पठार, उडीशा के तटीय मैदानी क्षेत्र, बंगाल डेल्टा, ब्रहमपुत्र घाटी और शिलांग पठारी इलाके में भी सूक्ष्म औज़ार पाए गए हैं। प्राक नवपाषाण युग के सूक्ष्म औज़ार छोटा नागपुर पठार में पाए गए हैं। मयूरभंज, कियोनझर और सुन्दरगढ़ में भी सूक्ष्म औज़ार पाए गए हैं। पश्चिम बंगाल में दामोदर नदी के किनारे बीभानपुर की भी खुदाई हुई है। यहां पर भी सूक्ष्म औज़ार पाए गए हैं। मेघालय की गारो पहाड़ियों में स्थित सेबालगिरी-2 में भी प्राक नव पाषीणयुगीन सूक्ष्म औज़ार पाए गए हैं।
  6. कृष्णा और भीमा नदी में भी अनेक सूक्ष्म औज़ार पाए गए हैं। ये सूक्ष्म औज़ार नव पाषाण संस्कृति के चरण में भी पाए गए हैं। कर्नाटक पठार के पश्चिमी किनारे पर स्थित सगंनकल में अनेक औज़ार मिले हैं जैसे कोर, नुकीले औज़ार, अर्धचन्द्राकार पतर आदि ।

गोदावरी डेल्टा में भी सूक्ष्म औज़ार काफी मात्रा में पाए गए है। यहां पर पाए गए ये औज़ार नवपाषाणीय संस्कृति से संबंधित हैं। कुरनूल इलाके में भी काफी मात्रा में सूक्ष्म औज़ार पाए गए हैं। आन्ध्र प्रदेश के चित्तूर इलाके में रेणीगुंटा में सूक्ष्म औज़ार पाए गए हैं। चूंकि मध्य पाषाण युग की काल सीमा काफी लंबी थी और भारत में अनेक मध्य पाषाण युग की बस्तियाँ पाई गई हैं। अतः विभिन्न बस्तियों को कालक्रमानुसार और वहां प्राप्त भौतिक अवशेषों के आधार पर वर्गीकृत करने का प्रयास किया गया है। कालक्रम तथा सूक्ष्म औज़ारों की बहुतायत मध्य पाषाण युग के सूचक हैं। कुछ बस्तियाँ कालक्रमानुसार बाद की हैं और मध्य पाषाण संस्कृति से प्रभावित है। ये सभी बस्तियाँ मध्य पाषाणीय परम्परा की बस्तियों की श्रेणी में गिनी जाती हैं। बगोर, सराय-नहर राय और अदमगढ़ में मध्य पाषाण युग की बस्तियाँ पाई गई हैं।

3.3 जीवन यापन के तरीके

आरंभिक मध्यपाषाणीय बस्तियों से जानवरों जैसे भेड़, बकरी, भैंस, सूअर, कुता, हाथी, दरियाई घोड़ा, बनैले सूअर, गवल, गीदड़, भेड़िए, चीते, साम्भ, बारहसिंघे, खरगोश, काले हिरण, मृग, कछुए, साही, नेवले, छिपकली, मवेशियों आदि के अवशेष पाए गए हैंइनमें से बहुत सी प्रजातियां मध्य पाषाण परम्परा के अंतर्गत विद्यमान रही। मध्य पाषाणीय परम्परा का प्रतिनिधित्व करने वाली बस्तियां से जंगली भेड़, जंगली बकरी, गदहा, हाथी, लोमड़ी, गवल, दरियाई घोड़ा, साम्भर, खरगोश, साही, छिपकली, चूहा, मुर्गी, कछुआ आदि नहीं पाए गए हैंजंगली भैंसा, ऊँट, भेड़िया, गैंडा और नीलगाय मध्य पाषाणीय परम्परा के अंतर्गत पाए गए हैंये प्रजातियां आरंभिक मध्यपाषाणीय युग में अनुपस्थित थीं। किसी विशेष काल में पशुओं का पाया जाना और पाया जाना वस्तुतः जलवायु और पर्यावरण संबंधी परिवर्तन पर निर्भर करता है।
मध्य पाषाण युग के दौरान लोग शाकाहारी एवं मांसाहारी दोनों प्रकार का भोजन खाते थे। मध्य पाषाण युग की अनेक बस्तियों जैसे लंघनाज और तीलवारा से मछली, कछुए, खरगोश, नेवले, साही, मृग, नीलगाय के अवशेष पाए गए हैं। सा प्रतीत होता है कि भोजन के रूप में इनका उपयोग किया जाता होगा। शिकार करने और मछली मारने के अलावा मध्य पाषाण युग के लोग जंगली कन्द मूल, फल और मधु आदि का भी संग्रह करते थे और यह उनके भोजन का पूर्ण हिस्सा था। ऐसा प्रतीत होता है कि पौधों से प्राप्त भोजन शिकार से प्राप्त भोजन की अपेक्षा अधिक सुलभ था। कुछ इलाकों में घास, खाने योग्य जड, बीज, काष्ठफल और फल काफी मात्रा में उपलब्ध थे और लोग भोजन के साधन के रूप में इनका उपयोग करते होंगे। कुछ वर्तमान शिकारी/संग्रहकर्ताओं के संदर्भ में यह तर्क दिया जाता है कि उनका मुख्य भोजन फल-फूल ही है। शिकार से प्राप्त भोजन केवल पूरक का ही काम करता है। मध्य पाषाण युग के संदर्भ में पशु मांस और पेड़-पौधों से प्राप्त भोजन के बीच तारतम्य स्थापित करना मुश्किल है क्योंकि पौधों के अवशेष जल्दी नष्ट हो जाते हैं। यह भी तर्क दिया जा सकता है कि काफी हद तक भोजन की पूर्ति शिकार के माध्यम से होती थी।
पत्थर की गुफाओं की दीवारों पर बनाए गये चित्रों और नक्काशियों से मध्य पाषाण युग के सामाजिक जीवन और आर्थिक क्रियाकलाप से संबंधित काफी जानकारी मिलती है। भीमबेटका, आदमगढ़, प्रतापगढ़, मिर्जापुर, मध्य पाषाण युग की कला और चित्रकला की दृष्टि से समृद्ध हैं। इन चित्रों से शिकार करने, भोजन जुटाने, मछली पकड़ने और अन्य मानवीय क्रियाकलापों की भी झलक मिलती है। भीमबेटका में भी काफी चित्र बने मिले हैं। इनमें बहुत से जानवरों जैसे जंगली सूअर, भैंसे, बन्दर और नीलगाय के चित्र बने मिले हैं। इन चित्रों औनक्काशियों से यौन संबंधों, बच्चों के जन्म, बच्चे के पालन पोषण और शव दफन से संबंधित अनुष्ठानों की भी झलक मिलती हैं।
इन सब बातों से यह संकेत मिलता है कि मध्य पाषाण युग में पुरापाषाण युग की अपेक्षा सामाजिक संगठन धिक सुदृढ़ हो गया थासा प्रतीत होता है कि मध्य पाषाण युग के लोगों का धार्मिक विश्वास पारिस्थितिकी और भौतिक परिस्थितियों से प्रभावित था

सामान्यतः मानव समुदाय अपने अस्तित्व में सबसे अधिक लम्बे समय तक शिकारी/संग्राहक के रूप में जीवित रहे। उनके अस्तित्व का यह चरण उनके पत्थर के औज़ारों से प्रकट होता है जिन्हें पुरातत्वविदों ने निम्नलिखित श्रेणियों में वर्गीकृत किया है:

i) पूर्व पाषाण और

ii) मध्य पाषाण

इनके औज़ारों द्वारा जिन पशुओं का शिकार किया गया है उनके अवशेषों के आधार पर भी उनका वर्गीकरण किया गया है। मानव समुदायों ने संस्कृति के एक नए चरण में उस समय प्रवेश किया जब जीवित रहने के लिए उन्होंने प्रकृति के साधनों पर पूरी तरह से निर्भर रहने की बजाए जौ, गेहूं और चावल जैसे अनाज उगाकर अपने भोजन का स्वयं उत्पादन करना शुरू किया और दूध तथा मांस की पूर्ति के लिए और विभिन्न प्रयोजनों के वास्ते उनके श्रम का उपयोग करने के लिए कुछ विशेष प्रकार के पशुओं को पालना शुरू किया। मानव संस्कृति के इस चरण की शुरुआत नए प्रकार के पत्थर के औज़ारों से पता चलती है जो औज़ार नवपाषाण औज़ार अथवा नव पाषाण युग के औज़ार कहलाते हैं। नवपाषाण औज़ार और इस चरण से संबंधित विभिन्न पहलू, जब यह औज़ार बनाए गए थे। संस्कृति के उस चरण के विभिन्न तत्व हैं जिनमें यह नवपाषाण समुदाय रहे थे। इस खंड में नील घाटी और पश्चिम एशिया में नवपाषाण संस्कृति के प्रसार तथा इसकी विशेषताओं पर भारतीय उपमहाद्वीप में नवपाषाण चरण के अध्ययन की पृष्ठभूमि के रूप में संक्षेप में विचार किया गया है।
वनस्पति कृषिकरण और पशुओं को पालना संस्कृति के नवपाषाण चरण का एक मुख्य विशिष्ट लक्षण माना गया है। नियोलिथिक (नवपाषाण) शब्द का प्रयोग सबसे पहले सर जॉन लुबॉक ने अपनी पुस्तक “प्रिहिस्टोरिक टाइम्स” (सर्वप्रथम 1865 में प्रकाशित) में किया था। उसने इस शब्द का प्रयोग उस युग को बताने के लिए किया था जिस युग में पत्थर के उपकरण अधिक कुशलता से और अधिक रूपों में बनाए गए और उन पर पालिश भी की गई। बाद में वी. गार्डन चाइल्ड ने नवपाषाण-ताम्रपाषाण संस्कृति को अपने आप में पर्याप्त अन्न उत्पादक अर्थव्यवस्था बताया और माइल्स बरकिट ने इस बात पर जोर दिया कि निम्नलिखित विशिष्ट विशेषकों को नवपाषाण संस्कृति का माना जाना चाहिए:

  • कृषि कार्य
  • पशुओं को पालना
  • पत्थर के औज़ारों का घर्षण और उन पर पालिश करना,
  • मृदभांड बनाना।

नवपाषाण की संकल्पना में इधर कुछ वर्षों में परिवर्तन हुआ है। एक आधुनिअध्ययन में उल्लेख किया गया है कि नवपाषाण शब्द उस पूर्व-धातु चरण संस्कृति का सूचक होना चाहिए। जब यहां रहने वालों ने अनाज उगाकर और पशुओं को पालतू बनाकर भोजन की विश्वस्त पूर्ति की व्यवस्था कर ली थी और एक स्थान पर टिक कर जीवन बिताना आरम्भ कर दिया था। फिर भी, घर्षित पत्थर के औज़ार नवपाषाण संस्कृति की सर्वाधिक अनिवार्य विशेषता है। वनस्पति कृषिकरण और पशुओं को पालने सेः

  • एक स्थान पर टिककर जीवन बिताने के आधार पर ग्राम समुदायों की शुरुआत हुई,
  • कृषि तकनीकी की शुरुआत हुई,
  • प्रकृति पर और अधिक नियंत्रण अथवा प्राकृतिक साधनों का दोन हुआ। तथापि अपने स्वयं के उपमहाद्वीप में संस्कृति के नवपाषाण चरण के साक्ष्यों और विनिर्दिष्टताओं पर विचार करने से पहले हम मनुष्यों द्वारा भारत से बाहर के क्षेत्रों में तथा भारतीय उपमहाद्वीप में पशुओं को पालने और वनस्पति कृषीकरण की प्रक्रिया के शुरुआत पर संक्षेप में विचार करेंगे।
क्षेत्र युग खेती
नील घाटी लगभग 12,500 बी.सी.ई. गेहूं और जौ
पश्चिम एशिया लगभग 8500 बी.सी.ई.से आगे गेहूं और जौ
बलूचिस्तान लगभग 6000 बी.सी.ई.से आगे गेहूं और जौ
उत्तर प्रदेश में बेलान घाटी लगभग 5440-4530 बी.सी.ई. चावल
दक्षिण भारत लगभग 2500-1500 बी.सी.. रागी

5. सबसे प्राचीन किसान

अभी हाल तक ऐसा समझा जाता था कि वनस्पति कृषीकरण और पशुओं को पालने के कार्य की शुरुआत पश्चिम एशिया में हुई और वहां से यह विसरण के द्वारा संसार के विभिन्न अन्य क्षेत्रों में फैला। लेकिन अब मिस्र में नील घाटी तथा अन्य क्षेत्रों के हाल ही में प्राप्त पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर, इन दृष्टिकोणों में संशोधन करना आवश्यक है।

5.1 नील घाटी

गेहूं और जौ की सबसे हली खेती के बारे में जो नया साक्ष्य प्रकाश में आया है वह निम्नलिखित स्थानों पर उत्खननों से प्राप्त हुआ है:

  • वाडी कुब्बानिया (दक्षिण मिस्र में आसवान के उत्तर में थोड़ी दूरी पर स्थित),
  • बाडी टस्का (आबू सिम्बेल के पास जो अब जलमग्न है),
  • कोम अम्बो (आसवान के उत्तर से कुब्बानिया स्थलों से लगभग 60 किलोमीटर दूर), और
  • एसना के पास का स्थलसमूह

इस साक्ष्य के विषय में बात यह है कि ये सभी नील घाटी में स्थित उत्तर पुरापाषाण स्थल हैं, न कि नवपाषाण स्थल ।

[पुरातत्वविदों ने इन स्थलों का काल-निर्धारण आज से 14500-13000 वर्षों के बीच किया है।]

नील घाटी से प्राप्त साक्ष्यों से कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न उठते हैं:

  • चूंकि मिस्र के स्थलों में पशुओं को पालतू बनाए जाने के कोई प्रमाण नहीं मिलते अतः यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि इस क्षेत्र में अनाजों की खेती पशुओं को पालने से पहले आरम्भ हुई। इस प्रकार वनस्पति कृषिकरण और पशुओं के पालने के कार्य आवश्यक रूप से अन्त सम्बद्ध नहीं हैं।
  • चूंकि अनाजों की खेती परवर्ती पुरापाषाण औज़ार से सम्बद्ध है: यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि कुछ मामलों में अनाज उत्पादन उस नवपाषाण संस्कृति से पहले हुआ जिससे घर्षित पत्थर के औज़ार सम्बद्ध हैं।
  • अनाजों की खेती से नवपाषाण क्रान्ति को बल मिला और यह खेती इस क्रान्ति से पहले हुई।
  • चूंकि कुब्बनिया स्थल जंगली गेहूं और जंगली जौ, दोनों के विदित क्षेत्र से बाहर स्थित हैं, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि यह आवश्यक नहीं है कि अन्न उत्पादन उन्हीं क्षेत्रों से शुरू हुआ जहां पेड़-पौधे अपने जंगली रूप में विद्यमान थे।
  • जैसा पहले विश्वास किया जाता था कृषिकरण पश्चिम एशिया से शुरू नहीं हुआ।

5.2 पश्चिम एशिया के प्रारम्भिक किसा

आइए, पश्चिम एशिया में विकास की प्रक्रिया पर विचार करें। इस क्षेत्र में फिलीस्तीन, सीरिया, तुर्की, इराक, कैस्पियन द्रोणी और ईरान के आसपास के क्षेत्र आते हैं। ये वे आधुनिक नगर हैं जहां पुरातत्वविदों ने सबसे प्रारंभिक खेती करने वाली ग्राम बस्तियों को पता लगाया है। अब यह भली-भांति विदित है कि फिलीस्तीन, सीरिया और तुर्की में खेती नवीं-आठवीं सहस्राब्दि बी.सी.ई. में शुरू हुई थी। यह महत्वपूर्ण है कि इस क्षेत्र के शिकारियों-संग्राहकों ने एक स्थान से दूसरे स्थान पर भटकना छोड़ दिया और एक स्थान पर टिककर जीवन बिताना आरम्भ किया। पहले उन्होंने यह काम वन्य साधनों के दोहन पर आश्रित रहते हुए कुछ स्थानों पर किया। मुरेबात, उत्तर सीरिया में यूफरेट्स पर आबू हरेयरा का उत्तर और उसी नदी पर दक्षिण तुर्की में सुबेरदे जैसे स्थलों में स्थायी बस्तियाँ शिकार करने और बटोरने पर ही पूरी तरह से फलफूल सकती थीं। खेती में संक्रमण एक धीमी प्रक्रिया थी परन्तु लगभग नवें सहस्राब्दि बी.सी.. से ऐसा साक्ष्य मिला है कि स्थायी समुदायों का खेती को अपने स्थायी जीवन के स्वरूप का निवार्य आधार बनाकर आविर्भाव हो रहा थाऐसे अनेक स्थल हैं, जहां पश्चिम एशिया में किसानों के स्थायी समुदायों का पता चलता है:

  1. लगभग 85007500 बी.सी.ई.के बीच फिलीस्तीन में जरीको एक बड़ा गांव बन गया था जहां कृषि के साक्ष्य तो मिले हैं परन्तु पशुओं को पालने के कोई साक्ष्य नहीं मिले हैं (यह कार्य बाद में हुआ)। उत्खनन के दौरान उत्तर स्तरों में यह पाया गया कि जेरीको के चारो ओर दो मीटर चौड़ी पत्थर की दीवार थी और गोल मीनारें थीं। संसार में किलेबंदी का यह सबसे प्रारंभिक उदाहरण है
  2. दक्षिण तुर्की में हुयुक एक बड़ा गांव था। यहां गेहूं, जौ और मटर की खेती होती थी। मवेशी, भेड़, बकरी जैसे जानवरों को घर में पाला जाता था। कच्चे मकान जिनमें छत से होकर प्रवेश करना होता था दो कमरों के होते थे और मकानों की दीवार मिली होती थीं। घरों की दीवारों पर तेंदुआ, फूटते हुए ज्वालामुखी और बिना सिर के मानव शवों को निगलते हुए गिद्धों के चित्र बने हुए मिले हैं। इस स्थान पर भौतिक संस्कृति के साक्ष्य मृदभांडों, पत्थर की कुल्हाड़ियों, पत्थर के आभूषणों, हड्डियों के औज़ारों, लकड़ी के कटोरों और करंडशिल्प के रूप में मिले हैं।
  3. इराक में जारमों में स्थायी रूप से बसे कृषि गांवो (लगभग 6500-5800 बी.सी.ई.) के भी साक्ष्य मिले हैं। इनमें लगभग 20 से 30 तक कच्चे मकान होते थे। प्रत्येक में एक आंगन और कई कमरे होते थे और वहां घर्षित पत्थर की कुल्हाड़ियां, चक्कियां, मृदभांड आदि भी होते थे। लोग गेहूं और जौ उगाते थे तथा भेड़-बकरी पालते थे।
  4. ईरान में खेती खजिस्तान के क्षेत्र में आठवें सहस्राब्दि बी.सी.ई. के दौरान शुरू हुई। लगभग उसी समय जब फिलीस्तीन और अनातोलिया में शुरू हुई। दक्षिण ईरान में (लगभग 7,500 बी.सी.ई. से) अली कोश में हमें ऐसे लोगों के एक जाड़े के मौसम के शिविर के साक्ष्य मिले हैं/जो लोग गेहूं और जौ की खेती करते थे और जो भेड़ भी पालते थे। ऐसा लगता है कि इस क्षेत्र में पशु-पालन और खेती अंर्तसंबंधित थे।

पश्चिम एशिया में फसल उगाना और पशुओं को पालना का कुछ स्थलों पर अंर्तसंबंधित है जबकि कुछ क्षेत्रों में कृषि कार्य पशुओं को पालने के कार्य से पहले शुरू हुआ।

6. भारतीय उपमहाद्वीप के प्राचीन किसा

इस महाद्वीप में कृषिकरण और पशुओं को पालने का इतिहास वस्तुतः नवपाषाण संस्कृतियों के उदय से प्रारम्भ होता है। घर्षित पत्थर की कुल्हाड़ियों को छोड़कर इस उपमहाद्वीप की नवपाषाण संस्कृतियां निम्न तालिका  में उल्लिखित भौगोलिक क्षेत्रों में वर्गीकृत की जा सकती हैं।

तालिका            भारतीय उपमहाद्वीप के क्षेत्र

उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र – (अफ़ग़ानिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान, विशेष तौर पर बलूचिस्तान में कच्ची मैदान मिलाकर) 

उत्तर क्षेत्र – (इसमें कश्मीर घाटी आती है) 

दक्षिण-पूर्वी उत्तर प्रदेश – (इसमें इलाहाबाद, मिर्जापुर, रीवा और सिंघी जिलों में विंध्य दृश्यांश – खास तौर पर बेलान घाटी आती है)

 मध्य पूर्वी क्षेत्र – (उत्तरी बिहार) 

पूर्वोत्तर क्षेत्र – (इसमें असम और निकटवर्ती उप-हिमालय क्षेत्र आते हैं) 

मध्य पूर्वी क्षेत्र – (इसमें छोटा नागपुर का पठार, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल में विस्तार सहित आते हैं)

दक्षिणी क्षेत्र – (इसमें प्रायद्वीपीय भारत आता है)