प्राचीन भारत में इतिहास लेखन की परंपरा

प्राचीन भारतीय इतिहास के स्रोत

इस पेज की रूपरेखा

1 प्रस्तावना

2 साहित्यिक स्रोत, 2.1 वैदिक साहित्य 2.2 कौटिल्य का अर्थशास्त्र 2.3 महाकाव्य 2.4 पुराण  2.5 संगम साहित्य 2.6 जीवन-वृत्तांत, कविताएँ और नाटक 2.7 बौद्ध और जैन साहित्य

3 पुरातात्विक स्रोत 3.1 सिक्के 3.2 शिलालेख 3.3 स्मारक

4 विदेशी वृत्तांत        5 सारांश           6 शब्दावली

1. प्रस्तावना इतिहास कहानी की तरह नहीं लिखा जाता। यह विभिन्न स्रोतों पर आधारित अतीत का वर्णन है। आज के कई प्रकार के स्रोत विभिन्न आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों, जैसे पूर्ण तिथि निर्धारण विधियाँ (कार्बन-14 डेटिंग), पर्यावरण अध्ययन, भूवैज्ञानिक अध्ययन आदि पर आधारित हैं। ये सभी विभिन्न स्रोतों को सत्यापित या संबंधित करने के लिए एक वैज्ञानिक आधार प्रदान करते हैं। हाल ही की खोजों ने मिथकों की सत्यता को प्रमाणित करने में मदद की है। उदाहरण के लिए, प्राचीन शहर द्वारका के मामले में यह माना जाता था कि यह महाभारत में वर्णित एक मिथक है। हालाँकि, हाल ही में पानी के नीचे डूबे हुए अवशेषों की खोज करने वाले पुरातत्वविदों ने एक डूबे हुए शहर के अवशेषों का पता लगाया है जो प्राचीन द्वारका प्रतीत होता है। इसी तरह, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बागपत जिले में हाल ही में खुदाई किए गए एक पुरातात्विक स्थल सन्नौली में हुई ‘रथ’ की खोज महाभाके पुरातत्व के नए आयाम को सामने लाती है। निश्चित रूप से अभी हाल में मिले स्रोतों को स्थापित करने और उनके अध्ययन की प्रक्रिया जारी है। फिर भी यहाँ यह महसूस करना महत्वपूर्ण है कि पुरातत्व हमारे अतीत के ज्ञान की वृद्धि कर रहा है। अब तक जिसे अज्ञात क्षेत्र माना जाता था, उसका अब वैज्ञानिक विश्लेषण किया जा रहा है। स्रोत इतिहास लेखन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन स्रोतों के आधार पर हम अपने अतीत का पुनर्निर्माण करते हैं। इतिहास लेखन के लिए एक इतिहासकार को स्रोतों की आवश्यकता होती है। इतिहासकार लगातार स्रोतों की खोज, पड़ताल, अन्वेषण, विश्लेषण, विचार और पुनर्विचार करके अतीत को जानने का काम करते हैं। अतीत का कोई भी अवशेष स्रोत के उद्देश्य की पूर्ति कर सकता है। प्राचीन भारत के इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए हमारे पास विभिन्न स्रोत हैं। मोटे तौर पर, उन्हें दो मुख्य श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है: 

  • साहित्यिक 
  • पुरातात्विक

साहित्यिक स्रोतों के अंतर्गत वैदिक, बौद्ध और जैन साहित्य, महाकाव्य, पुराण, संगम साहित्य, प्राचीन जीवनियाँ, कविता और नाटक शामिल किए जा सकते हैं। 

पुरातत्व के अंतर्गत हम पुरातात्विक अन्वेषणों और उत्खनन के परिणामस्वरूप प्राप्त होने वाले पुरालेखों, मुद्राओं और स्थापत्य पुरातात्विक अवशेषों पर विचार कर सकते हैं।

भारतीय इतिहास में लिखित अभिलेखों की प्रधानता है। हालाँकि, मंदिर के अवशेष, सिक्के, घर के अवशेष, खंभों के गड्डे (Post Holes), मिट्टी के बर्तन, कोष्ठागार आदि के रूप में पुरावशेष भी साक्ष्य की एक महत्वपूर्ण श्रेणी का गठन करते हैं। भारतीय इतिहास के तीनों काल – प्राचीन, मध्यकालीन और आधुनिक के लिए पुरातात्विक साक्ष्य बहुत महत्वपूर्ण है। पुरातात्विक साक्ष्य उन अवधियों के लिए अपरिहार्य हैं जिनके पास कोई लेखन नहीं था; उदाहरण के लिए, भारतीय इतिहास का प्रागैतिहासिक और आद्य-ऐतिहासिक काल । स्रोतों को प्राथमिक और द्वितीयक के रूप में भी विभाजित किया जा सकता है। सभी पुरावशेष; मंदिर से मिले अभिलेख और लिखित दस्तावेज़ों के रूप में तालपत्र (ताड़ के पत्ते की पांडुलिपियाँ); खंभों, चट्टानों, तांबे की तश्तरी, मृदमाण्ड आदि पर शिलालेखों को प्राथमिक स्रोत कहा जाता है। इतिहासकारों द्वारा इनका उपयोग लेख, किताबों या लिखित इतिहास के किसी भी रूप को लिखने के लिए किया जाता है जो बाद के शोधकर्ताओं द्वारा उपयोग किए जाते हैं और इसलिए ये द्वितीयक स्रोत कहलाते हैं। लिखित प्राथमिक स्रोत दो प्रकार के होते हैं: 

  • पांडुलिपि/शिलालेख 
  • प्रकाशित सामग्री। 

2. साहित्यिक स्रोत 

प्राचीन भारतीय ग्रंथों का अध्ययन करते समय कुछ प्रश्नों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, उनकी रचना क्यों और किसके लिए की गई? उनका सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ क्या था? एक ग्रंथ एक आदर्श का प्रतिनिधित्व कर सकता है और उस समय जो हो रहा था उसका सटीक विवरण शायद नहीं हो सकता। जब कोई ऐतिहासिक जानकारी के लिए प्राचीन भारतीय ग्रंथों का अध्ययन कर रहा हो तब कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उपिंदर सिंह ने कहा है कि यदि एक विशेष अवधि में एक ग्रन्थ की रचना की गई थी, तो ऐतिहासिक स्रोत के रूप में इसका उपयोग कम समस्यापूर्ण है। हालाँकि, यदि इसकी रचना लंबे समय तक चलती है, तो उसका काल निर्धारण करना अधिक जटिल हो जाता है। उदाहरण के लिए, महाकाव्यों में महाभारत को एक विशिष्ट समय के ग्रन्थ के रूप में देखना बहुत मुश्किल है। ऐसे मामलों में इतिहासकार को विभिन्न कालानुक्रमिक परतों का विश्लेषण करना पड़ता है और गंभीर रूप से विभिन्न परिवर्धन और प्रक्षेपों को देखना होता है। किसी ग्रन्थ की भाषा, शैली और सामग्री का विश्लेषण करना आवश्यक है। रामायण और महाभारत दोनों महाकाव्यों के महत्वपूर्ण संस्करण बनाए गए हैं जहाँ इन ग्रंथों की विभिन्न पांडुलिपियों का विश्लेषण किया गया और उनके मूल को पहचानने का प्रयास किया गया है। इस तरह के उपक्रमों ने इतिहासकारों की काफी मदद की है। इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए प्राचीन भारतीय साहित्य की विश्वसनीयता को लेकर बहुत बहस हुई है। चूंकि अधिकांश प्राचीन भारतीय साहित्य की प्रकृति धार्मिक है; उदाहरण के लिए, वैदिक, उत्तरवैदिक, पुराण और महाकाव्य साहित्य आदि। कुछ विद्वानों ने दावा किया है कि प्राचीन भारतीयों के पास इतिहास की भावना ही नहीं थी। शुरुआती पश्चिमी विद्वानों को कालक्रम, साक्ष्य, एक साफ-सुथरी कथा और भारतीय ग्रंथों में तारीखों की तलाश थी। इसके बजाय उन्हें जो मिला वह दंतकथाएँ, अनुष्ठान, प्रार्थना आदि थे। हालाँकि, भारत की ऐतिहासिक परंपराओं के हालिया शोध ने यह स्पष्ट कर दिया है कि विभिन्न समाज अलग अलग तरीकों से ऐतिहासिक चेतना को एकीकृत करता है। प्राचीन भारत में लिखित परंपरा के विपरीत एक मजबूत मौखिक परंपरा थी। उसमें हमें जो ऐतिहासिक चेतना झलकती है वह एक स्थापित चेतना थी जिसका विश्लेषण किया जाना मुश्किल था। हमें चीनी तीर्थयात्री हवेनत्सांग के लेखन से पता चलता है कि भारत के प्रत्येक राज्य के पास आधिकारिक रिकॉर्ड के रखरखाव के लिए अपने स्वयं के अधिकारी और विभाग थे जो महत्वपूर्ण घटनाओं सहित राज्य के विभिन्न पहलओं का लेखा-जोखा रखते थे। उसके बाद यह प्रथा लंबे समय तक जारी रही, जैसा कि बड़ी संख्या में भूमि-अनुदानों और स्थानीय ऐतिहासिक लेखों में देखा जा सकता है जो राजाओं की वंशावली और उनके कई पुण्य कार्यों को प्रकाशित करते हैं। चूंकि अधिकांश प्रारंभिक भारतीय साहित्य में धर्म, बह्मांड विज्ञान, जादू, अनुष्ठान, प्रार्थना और पौराणिक कथाओं से भरा हुआ है, इसलिए इन ग्रंथों के साथ काल-निर्धारण से जुड़ी समस्याएँ हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनकी रचना और संकलन की अवधि में एक व्यापक अंतर होता है। वे ईश्वर मीमांसा जैसे विषय से संबंध रखते हैं इसलिए उन्हें ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य से समझना मुश्किल है। वेद, उपनिषद, ब्राहमण, शास्त्र साहित्य, सूत्र, पुराण आदि मोटे तौर पर धार्मिक विषयों से संबंधित हैं। हालाँकि इन सीमाओं के बावजूद ऐसे ग्रंथों को अतीत को समझने के लिए फलदायी रूप से इस्तेमाल किया गया है। अब हम भारतीय इतिहास के स्रोतों के रूप में प्राचीन भारतीय साहित्य की इन विभिन्न श्रेणियों का अध्ययन करेंगे। 

2.1 वैदिक साहित्य 

भारतीय उपमहाद्वीप का सबसे पहला साहित्य वैदिक साहित्य है। वेद शब्द संस्कृत मूल के “विद’ शब्द से बना है जिसका अर्थ है ‘जानने के लिए’। वेद का अर्थ है ज्ञान। वेद मौखिक साहित्य में उत्कृष्ट हैं। उन्हें पारंपरिक रूप से श्रुति यानि ‘सुना’ या प्रकट ग्रंथों के रूप में माना जाता है. कहा जाता है कि शब्द पहले मनुष्य के कानों में भगवान बह्मा द्वारा कहे गए हैं। संस्मरण के रूप में उन्हें एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को सौंप दिया गया। वैदिक साहित्य शास्त्रीय संस्कृत से अलग भाषा में है। इसे वैदिक संस्कृत कहा जाता है। इसकी शब्दावली में अर्थों की एक विस्तृत श्रृंखला है और इसमें विभिन्न व्याकरणिक उपयोग हैं। इसमें उच्चारण की एक विशिष्ट प्रक्रिया है। ज़ोर देने से शब्दों का अर्थ बदल जाता है। यही कारण है कि वेदों के उच्चारण की विधा की सुरक्षा और संरक्षण के लिए एक विस्तृत साधन का विकास किया गया। घन, जट और अन्य प्रकार के पाठों के माध्यम से हम न केवल मंत्रों के अर्थ को निर्धारित कर सकते हैं, बल्कि उन मूल स्वर को भी सुन सकते हैं जिनमें ये हज़ारों साल पहले गाए गए थे। इन पाठों के कारण वेदों में कोई भी प्रक्षेप संभव नहीं था, क्योंकि मौखिक प्रसारण पर जोर दिया गया था।

वैदिक साहित्य तीन रूप से वर्गीकृत है:

क) संहिता या संग्रह, अर्थात् भजनों, प्रार्थनाओं, मंत्रोच्चार, मंगलकामना, बलिदान के सूत्र  और निम्नलिखित चार वैदिक संहिताएँ हमें ज्ञात हैं:

    1. ऋग्वेद संहिताः ऋग्वेद का संग्रह । यह प्रशंसा (रिक) के गीतों का ज्ञान है और इसमें  1028 श्लोक (सूक्त) हैं जो 10 पुस्तकों (मंडल) में संकलित हैं। मंडल 2 से मंडल 7 प्रारंभिक तिथि के हैं और मंडल 1, 8, 9 और 10 बाद के हैं। वे प्रथाओं, सामाजिक मानदंडों और संरचनाओं से संबंधित विभिन्न मुद्दों से निपटते हैं। ऋग्वेद की आनुष्ठानिक सामग्री के बावजूद इतिहासकार पशुपालन अर्थव्यवस्था, कबीले के प्रमुख (राजा), विश की स्थिति, भाग और बलि और सामाजिक वर्गों जैसे विषयों को सफलतापूर्वक प्रस्तुत करते हैं। 
    2. अथर्ववेद संहिताः इसकी 20 पुस्तकों में कई विषयों को समाहित किया गया है, जिनमें से पहले सात मुख्य रूप से कविताओं, मंत्रों और छंदों से संबंधित हैं। इसमें से कुछ लाभार्थियों द्वारा बोले जाते हैं, जो उनकी ओर से विभिन्न बीमारियों और चोटों को ठीक करने के लिए व उपचार के लिए बोले जाते थे। 13-18 पुस्तकें संस्कारों पर प्रकाश डालती हैं जैसे सीखने (दीक्षा), विवाह और अंत्येष्टि में प्रवेश के लिए आदि। इसमें शाही अनुष्ठान और दरबार-पुजारियों के कर्तव्यों को भी शामिल किया गया है। इस प्रकार, इसकी सामग्री का अध्ययन वैदिक काल के सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यों की जानकारी प्राप्त करने के लिए किया जाता है। एक महत्वपूर्ण खंड दवा के रूप में जड़ी  बूटियों और प्रकृति-व्युत्पन्न औषधि के बारे में भी बात करता है।
    3. सामवेद संहिताः सामवेद का संग्रह अर्थात् गीतों या धुनों (समन) का ज्ञान । भारतीय शास्त्रीय संगीत की जड़ें सामवेद के ध्वनि, संगीत, विशेष रूप से मंत्रों की संरचना और सिद्धांतों पर आधारित है। इन्हें कभी-कभी ऋग्वेद के संगीत संस्करण के रूप में भी  जाना जाता है क्योंकि संगीत की रचनात्मकता और मधुरता 75 छंदों में परिलक्षित होती हैं, बाकी ऋग्वेद से उधार लिए गए हैं। इसमें वीणा जैसे उपकरणों का भी उल्लेख है। विभिन्न वाद्ययंत्रों को बजाने के नियम और सुझाव को एक अलग संकलन में संकलित किया गया है, जिसे गंधर्व-वेद के नाम से जाना जाता है, जो एक उपवेद है: सामवेद  का पूरक या परिशिष्ट।
    4. यजुर्वेद संहिताः यजुर्वेद का संग्रह पूजा-अनुष्ठानों के लिए यज्ञीय सूत्रों (यजु) का  संकलन है। अग्निहोत्र (तीन प्राथमिक ऋतुओं – वसंत, मानसून और शरद ऋतु के स्वागत में अग्नि को मक्खन और दूध अर्पित करते हैं), वाजपेय और राजसूय (एक राजा और उसके राज्याभिषेक पर क्रमशः मक्खन और सुरा – एक मादक पेय – अग्नि को अर्पण करके) अग्निचयन (वेदी और चूल्हा बनाने के लिए मंत्रों का उच्चारण) आदि के लिए मंत्रों का संकलन है। यह कृषि, आर्थिक और सामाजिक जीवन पर भी महत्वपूर्ण जानकारी देता है। उदाहरण के लिए, शुक्ल यजुर्वेद’ में एक महत्वपूर्ण कविता उन फसलों को सूचीबद्ध करती है जो उन समय में महत्वपूर्ण मानी जाती हैं जैसे गेहूं, चावल, जौ, तिल, बाजरा, ज्वार, राजमा इत्यादि । यह प्राथमिक उपनिषदों का सबसे बड़ा संग्रह है – बृहदारण्यक उनिषद, कथा उपनिषद, ईश उपनिषद, मैत्री उपनिषद, तैत्तिरीय उपनिषद और श्वेताश्वतर उपनिषद – जिनमें से हिंदू दर्शन के विभिन्न स्कूल विकसित  और विकसित हुए हैं। उदाहरण के लिए, बृहदारण्यक उपनिषद में धर्म, कर्म और मोक्ष (इसका शाब्दिक अर्थ जीवन और मृत्यु के दुष्चक्र से मुक्ति है लेकिन यह दुःख, स्वतंत्रता या आत्म-प्राप्ति से मुक्ति के लिए भी लिया जाता है।) की हिंदू अवधारणा पर शुरुआती  व्यापक चर्चाएँ हैं।

वेदों की उचित समझ के लिए छह वेदांगों (वेदों के अंग) का विकास किया गया। ये हैं:

  • शिक्षा (स्वर विज्ञान),
  • कल्प (अनुष्ठान),
  • व्याकरण (व्याकरण),
  • निरुक्त (व्युत्पत्ति),
  • छंद (मैट्रिक्स), और 
  • ज्योतिष (खगोल विज्ञान)।

प्रत्येक वेदांग ने अपने चारों ओर एक विश्वसनीय साहित्य विकसित किया है, जो सूत्र रूप में है, अर्थात् उपदेश। यह गद्य में अभिव्यक्ति का एक बहुत संक्षिप्त और सटीक रूप है जो प्राचीन भारतीयों द्वारा विकसित किया गया था। पाणिनि की अष्टाध्यायी – आठ अध्यायों में व्याकरण पर एक पुस्तक – सूत्र (उपदेश) में लेखन की इस उत्कृष्ट कला की अंतिम परिणति है, इसमें प्रत्येक अध्याय सटीक रूप से परस्पर जुड़ा हुआ है। 

वेदों के अलावा, ब्राहमणों, आरण्यकों और उपनिषदों जैसे ग्रंथों को भी वैदिक साहित्य में शामिल किया गया है और उत्तर-वैदिक साहित्य के रूप में जाना जाता है। ब्राहमण ग्रन्थ वैदिक अनुष्ठानों पर विस्तार से बताते हैं, और आरण्यक और उपनिषद विभिन्न आध्यात्मिक  और दार्शनिक समस्याओं पर प्रवचन देते हैं।

ख) ब्राह्मणः ये विस्तृत गद्य ग्रंथ हैं जिनमें धार्मिक विषय होते हैं, विशेष रूप से बलिदान  पर टिप्पणियों और बलिदान संस्कार और समारोहों के व्यावहारिक या रहस्यमय महत्व ।

ग) आरण्यक और उपनिषदः आरण्यक वेदों के अनुष्ठानों-बलिदानों से जुड़ी व्युत्पत्ति,  पहचान, चर्चा, विवरण और व्याख्याओं का प्रतिनिधित्व करते हैं ताकि उनका उचित  प्रदर्शन किया जा सके। उदाहरण के लिए, ऐतरेय आरण्यक में स्पष्ट है कि वेद का पालन करने वाले और देवताओं को सही ढंग से बलिदान करने वाले व्यक्ति देवों के निवास के अधिकारी हैं, जबकि उनका उल्लंघन करने वाले को सरीसृपों, कीड़ों आदि के अस्तित्व की निचली दुनिया प्राप्त होती हैं। तैत्तिरीय आण्यक के अध्याय को प्रसिद्ध रूप से “सूर्य नमस्कार अध्याय” कहा जाता है जिसे बाद में योग-सूत्रों में वर्णित किया गया। इसके अतिरिक्त, आरण्यक जीवन के गहरे दर्शन में एक अंतर्दृष्टि भी प्रदान करते हैं। अरण्य शब्द का अर्थ है “जंगल” या बीहड़। यह माना जाता है कि जो लोग वानप्रस्थ को जाते हैं (वन-निवास के लिए सेवानिवृत्त), वे ण्यक ग्रंथों का पाठ करते हैं, इसलिए इसलिए इसका नाम ण्यक है। उपनिषद शब्द “उप” से बना है जिसका अर्थ है “पास/निकट” और नि-षद का अर्थ है “बैठ जाना” के जुड़ने से बना है। इस प्रकार, यह “निकट बैठने” को दर्शाता है। गुरु के पास बैठकर एक शिष्य आध्यात्मिक ज्ञान के मोती प्राप्त करता है। अन्य धारणाओं में “गूढ सिद्धांत”, “गुप्त सिद्धांत”, “रहस्यवादी अर्थ’, “छिपे हुए संबंध” आदि शामिल हैं। मोनियर-विलियम्स अपने संस्कृत शब्दकोश में इसे “सर्वोच्च आत्मा के ज्ञान को प्रकट करके अज्ञानता को शांत करने” के रूप में परिभाषित करते हैं। उपनिषदों में हिंदू धर्म के कुछ प्रमुख दार्शनिक शब्द शामिल हैं – जैसे कि बह्म (उच्चतम सत्ता या अंतिम वास्तविकता) और आत्मन् (आत्मा या स्वयं) – जिनमें से कुछ का उल्लेख बौद्ध धर्म और जैन धर्म जैसे समानांतर विषम धार्मिक परंपराओं में भी किया गया है। उन्होंने प्राचीन भारत में आध्यात्मिक विचारों के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई; अमूर्त दर्शन और अध्यात्म पर नए विश्वासों को वैदिक कर्मकांड से एक संक्रमण को वेदांत के रूप में जाना जाता है। वेदांत में “वेदों का सर्वोच्च उद्देश्य” भी है। 19वीं शताब्दी की शुरुआत में उनके अनुवाद के साथ-साथ पश्चिमी विद्वानों का ध्यान आकर्षित करने लगे। उनके दार्शनिक सिद्धांतों से रोमांचित आर्थर शोपेनहावर ने उपनिषद दर्शन को “उच्चतम मानव ज्ञान का उत्पादन” कहा। आरण्यकों को कर्मकांड के रूप में मान्यता दी जाती हैः कर्मकाण्ड क्रिया या वैदिक साहित्य के यज्ञ-खंड या बाह्य यज्ञ-अनुष्ठानों को सूचित करता है। जबकि उपनिषदों को ज्ञान-कांड, ज्ञान उत्पादन या वैदिक साहित्य के आध्यात्मिक-खंड के रूप में आंतरिक दार्शनिक सिद्धांतों के रूप में सूचित किया जाता 

वसुधैव कुटुंबकम् – संस्कृत में ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का अर्थ है “दुनिया एक परिवार है”। यह भारत की संसद के प्रवेश-द्वार पर अंकित है और इसे महा-उपनिषद से लिया गया है। “वसुधा” का अर्थ पृथ्वी से है, “एव” का अर्थ है “वास्तव” और “कुटुम्बकम” का अर्थ है परिवार। इसका उपयोग उस श्लोक में किया गया है, जो एक ऐसे व्यक्ति की विशेषताओं का वर्णन करती है, जिसने आध्यात्मिक उत्थान के उच्चतम स्तर को प्राप्त किया है और जो भौतिक संपत्ति और प्रलोभनों में जकड़े बिना अपने सांसारिक कर्तव्यों में भाग लेने में सक्षम है। यह माना जाता है कि गांधी के समग्र विकास की दृष्टि, जीवन के सभी रूपों के लिए सम्मान और अहिंसा पर आधारित संघर्ष संकल्प रणनीति इस प्राचीन भारतीय सूक्ति से ली गई थी। 

अथितिदेवो भ– यह भारतीय मूल्य-प्रणाली में अतिथि-मेज़बान संबंधों की गतिशीलता का प्रतिनिधित्व करने वाला एक मंत्र, जिसका शाब्दिक अर्थ है “अतिथि देवता है”, भारतीय आतिथ्य का प्रदर्शन करने वाला एक केंद्रीय विचार है। इसे तैत्तिरीय उपनिषद से लिया गया है। पारंपरिक हिंदू धर्म में किसी एक देवता की पूजा में पाँच चरण (पंचोपचार पूजा) शामिल होते हैं जो मेहमानों का स्वागत करते समय मानी जाने वाली पाँच औपचारिकताएँ होती हैं: सुखद सुगंध (धूप) प्रदान करना, दीप (दीप) जलाना, तर्पण (नैवेद्य) अर्पित करना, तिलक (माथे पर धार्मिक निशान) और फूल (पुष्प) अर्पण। 

सत्यमेव जयते – इसे “सत्य की विजय” / केवल सत्य विजित है के रूप में अनुदित किया गया है, “सत्य अजेय है/सत्य, सत्य है”, मुंडक उपनिषद से लिया गया एक वाक्यांश है। एक नारे के रूप में इसे लोकप्रिय बनाया गया और 1918 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा व्यापक राष्ट्रीय उपयोग में लाया गया। इसे स्वतंत्रता के अवसर पर भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य घोषित किया गया था। यह हमारे राष्ट्रीय प्रतीक में अशोक चक्र पर अंकित है। हम इसे भारतीय मुद्रा के अग्रभाग पर भी पाते हैं।

संपूर्ण वैदिक साहित्य को ईश्वर द्वारा प्रकट किया गया माना जाता है और इसलिए इसे पवित्र माना जाता है। कालक्रम में यह हज़ार साल तक फैला है, कुछ हिस्से जिसमें पहले की अवधि और कुछ बाद की अवधि के हैं। ऋग्वेद भारत का सबसे पुराना ग्रंथ है। ऋग्वेद की पुस्तकें II-VII सबसे प्राचीन हैं और इन्हें पारिवारिक पुस्तकें भी कहा जाता है क्योंकि प्रत्येक को ऋषि (ऋषियों) के एक विशेष परिवार द्वारा परंपरा के अनुसार बताया रचित किया गया। जब हम प्रारंभिक वैदिक साहित्य का उल्लेख करते हैं तो हम अनिवार्य रूप से ऋग्वेद की पुस्तकों II VII का उल्लेख करते हैं, माना जाता है कि 1500-1000 बी.सी.ई. में इसकी रचना की गई थी। उत्तर वैदिक साहित्य में ऋग्वेद की पुस्तकें I, VIII, IX और X शामिल हैं; सामवेद; यजुर्वे, अथर्ववेद; ब्राह्मण; अरण्यक और उपनिषद । ये लगभग 1000-500 बी.सी.ई. के बीच रचे गए थे।

हालाँकि, अधिकांश वैदिक साहित्य में गीत, प्रार्थना, धर्मशास्त्रीय और धार्मिक मामले शामिल हैं, लेकिन इनका उपयोग इतिहासकारों ने राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक सामग्री को इकट्ठा करने के लिए किया है। ऋग्वेद में एक पशुपालन, पूर्व-वर्ग समाज से कृषि, वर्ग, जाति समाज को ओर संक्रमण व उत्तर वैदिक काल में राजनीतिक क्षेत्रों के निर्माण जैसी प्रक्रियाओं की जानकारी इन ग्रंथों से प्राप्त हुई हैं।

ग्रंथों की एक श्रेणी और है – सूत्र। यह वैदिक साहित्य के बाद का हिस्सा है। इन्हें “सुने” (श्रुति) ग्रंथों के बजाय संस्मरण अथवा “स्मृति” के रूप में वर्गीकृत किया गया है। ये महान ऋषियों द्वारा रचे गए थे। हालाँकि वे अपने आप में आधिकारिक माने जाते हैं। सूत्र ग्रंथ (लगभग 600-300 बी.सी.ई.) कर्मकांड पर आधारित हैं। इसमें शामिल हैं: 

  • श्रौतसूत्र : महान बलिदानों को करने के नियम हैं। 
  • गृह्यसूत्र : दैनिक जीवन के सरल समारोहों और बलिदानों के लिए दिशा-निर्देश  शामिल हैं।
  • धर्मसूत्र : ये आध्यात्मिक और गैर-धार्मिक कानून के निर्देशों की पुस्तकें हैं – सबसे  पुरानी कानून पुस्तकें हैं।

धर्मसूत्र और स्मृतिलेख आम जनता और शासकों के लिए नियम और कानून हैं। उन्हें आधुनिक अर्थों में, संविधान के रूप में, प्राचीन भारतीय राजनीति और समाज के लिए कानून की किताबें कहा जा सकता है। इन्हें धर्मशास्त्र भी कहा जाता है। वे लगभग 600 बी.सी.ई. – 200 बी.सी.ई. के बीच संकलित थे। उनमें से मनुस्मृति प्रमुख है। सूत्रों के बाद के ग्रंथ स्मृति ग्रंथ हैं जो निम्नलिखित हैं:

  • मनु स्मृति, 
  • नारद स्मृति, और 
  • याज्ञवल्क्य स्मृति। 

ये लगभग 200 बी.सी.ई. और 900 सी.ई. के बीच रचे गए थे। वे विभिन्न वर्गों के साथ-साथ राजाओं और उनके अधिकारियों के कर्तव्यों के बारे में उल्लेख है। इसमें शादी और संपत्ति के लिए नियम तय किए गये। इसमें चोरी, हमले, हत्या, व्यभिचार आदि के लिए व्यक्तियों को दंड का भी विधान है। 

2.2 कौटिल्य का अर्थशास्त्र 

यह अर्थव्यवस्था और राज्य-व्यवस्था पर एक महत्वपूर्ण कानूनी ग्रन्थ है। इसको 15 पुस्तकों में विभाजित किया गया है, जिनमें से पुस्तकें II और III को आरम्भिक माना जा सकता है  और लगता है कि यह अलग-अलग हाथों की कृतियाँ हैं। ये विभिन्न पुस्तकें राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज के विभिन्न विषय-वस्तु से संबंधित हैं। सी.ई. की आरंभिक शताब्दियों में इसे अंतिम रूप दिया गया। हालाँकि, शुरुआती भाग मौर्य काल की स्थिति और समाज को दर्शाते हैं। यह प्रारंभिक भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था के अध्ययन के लिए समृद्ध सामग्री प्रदान करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि अर्थशास्त्र के अंतिम संस्करण से पहले भी राजकीय वस्तुओं के लेखन और अध्यापन की परंपरा थी क्योंकि कौटिल्य अपने पूर्वजों के ऋण को स्वीकार करता है। 

2.3 महाकाव्य 

दो महान महाकाव्य – रामायण और महाभारत (लगभग 500 बी.सी.ई. – 500 सी.ई.) को भी एक ऐतिहासिक स्रोत के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। वे “इतिहास” (“इस प्रकार से”) या आख्यान के रूप में जाने जाते हैं। व्यास लिखित महाभारत पुराना है और संभवतः लगभग 10वीं-चौथी शताब्दी बी.सी.ई. की स्थिति को दर्शाता है। इसकी मुख्य कथा जो कौरव पांडव संघर्ष है और उत्तर वैदिक काल से संबंधित हो सकती है, इसका वर्णनात्मक भाग उत्तर वैदिक काल का हो सकता है और उपदेशात्मक अंश आमतौर पर मौर्य और गुप्त काल से संबंधित है (आर.एस. शर्मा, 2005)।

यह माना जाता है कि इनमें लगातार प्रक्षेप बने हैं। चूँकि दोनों महाकाव्यों में हर कुछ समय बाद भाग जोड़े गए, इसलिए इतिहासकारों को इस सामग्री की पाठन क्रिया में सावधानी बरतनी चाहिए और उनकी विभिन्न कालानुक्रमिक परतों को ध्यान में रखना चाहिए। वे लोकप्रिय साहित्य का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसका आज भी नियमित और औपचारिक रूप से अभिनय किया जाता है। इसलिए, श्रोताओं की बढ़ती रुचि के साथ उत्साही कथाकार ने नए अध्याय जोड़े और इसी तरह प्रक्षेप बनते चले गए। वाल्मीकि की रामायण महाभारत की तुलना में अधिक एकीकृत प्रतीत होती है। दोनों महाकाव्यों में वर्णित कुछ स्थलों की खुदाई की गई है। अयोध्या की खुदाई से उत्तरी काली पॉलिश मृदभांड की अवधि तक बस्तियों का पता चला है। हस्तिनापुर, कुरुक्षेत्र, पानीपत, बागपत, मथुरा, तिलपत और बैराट में खुदाई की गई है और चित्रित धूसर मृदभांड अवधि के समय के हैं। दोनों महाकाव्यों में धार्मिक संप्रदायों के बारे में जानकारी है, जिन्हें हिंदू धर्म की मुख्यधारा, सामाजिक प्रथाओं और तात्कालिक समय के दर्शन में एकीकृत किया गया। 

2.4 पुराण

पुराण व्यास द्वारा लिखित हिंदू ग्रंथों की एक श्रेणी है। उन्हें गुप्त और उत्तर गुप्तकाल के समय का माना जाता हैं। 18 महापुराण और कई उपपुरा(पुराणों के पूरक या परिशिष्ट) हैं। उनकी विश्वव्यापी सामग्री इंगित करती है कि ये विभिन्न विषयों को शामिल करते हैं और विभिन्न हाथों द्वारा रचित हैं। उदाहरण के लिए, अग्नि पुराण (लगभग 8वीं – 11वीं शताब्दी सी.ई.) इन निम्नलिखित विषयों से सम्बन्धित हैं – अनुष्ठान पूजा, बह्मांड विज्ञान और ज्योतिष, पौराणिक कथाओं, वंशावली, कानून, राजनीति, शिक्षा प्रणाली, प्रतीक, कराधान सिद्धांत, युद्ध  और सेना का संगठन, युद्ध, मार्शल आर्ट, कूटनीति, स्थानीय कानूनों, सार्वजनिक परियोजनाओं के निर्माण, जल वितरण के तरीकों, पेड़ों और पौधों, चिकित्सा, डिजाइन और वास्तुकला, रत्न विज्ञान, व्याकरण, छंद, कविता, खाद्य और कृषि, अनुष्ठान, भूगोल और मिथिला (बिहार और पड़ोसी राज्यों) का सांस्कृतिक इतिहास के यात्रा दिग्दर्शक ।

निम्नलिखित पांच शाखाओं को पुराणों के विषय-वस्तु के रूप में माना जाता है: 

  • सर्ग (विश्व के निर्माण), 
  • प्रतिसर्ग (ब्राह्माण का पुनः निर्माण),
  • मन्वंतर (विभिन्न मानवों का का काल/ मनु का काल),
  • वंश (देवताओं, राजाओं और संतों की वंशावली सूची), और
  • वंशानुचरित (शाही राजवंशों का वृत्तांत/ कुछ चुने हुए पात्रों की जीवन कथाएँ)। बाद में, तीर्थों ( पवित्र स्थान) और उनके महात्म्य (धार्मिक महत्व) का वर्णन भी पुराण/ पुराण साहित्य में शामिल किया गया था।

पुराणों में प्राचीन भारत के इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए उपयोगी जानकारी है। वे राजवंशों के राजनीतिक इतिहास और वंशावली पर प्रकाश डालते हैं। प्राचीन राजवंशों पर पुराणों में बहुत कुछ है जैसे हर्यक, शिशुनाग, नंद, मौर्य, सुंग, कण्व और आंध्र । कुछ नाग अंतसर्ग लगाने वाले राजाओं का भी उल्लेख किया गया है। वे उत्तर भारत और मध्य भारत में राज्य करते  थे। दिलचस्प बात यह है कि हम किसी अन्य स्रोत से इन राजाओं के बारे में नहीं जानते हैं। पुराणों में गुप्त राजाओं के साथ वंश सूची समाप्त होती है। यह दर्शाता है कि पुराणों को लगभग चौथी-छठी शताब्दी बी.सी.ई. के दौरान संकलित किया गया। हालाँकि, कुछ ऐसे हैं जो बाद में रचे गए, जैसे कि भागवत पुराण (लगभग 10वीं शताब्दी) और स्कंद पुराण (लगभग 14वीं शताब्दी)। पुराण नदियों, झीलों, पहाड़ों आदि पर भौगोलिक जानकारी प्रदान करने के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। इसलिए, वे प्राचीन भारत के ऐतिहासिक भूगोल के पुनर्निर्माण के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसके अलावा, वे हिंदू धर्म के तीन प्रमुख संप्रदायों: वैष्णववाद, शैववाद और शक्तिवाद के बारे में जानकारी का एक अच्छे स्रोत हैं। विभिन्न प्रक्रियाओं जैसे विभिन्न पंथ प्रमुख धार्मिक परंपराओं के भीतर कैसे एकीकृत हो गए और गणपति, कृष्ण, बह्मा, कार्तिकेय आदि जैसे छोटे पंथ कैसे उभरे, यह भी उनसे जाना जा सकता है। इन पंथों को ब्राह्मणों ने अपने सामाजिक और धार्मिक मूल्यों का प्रसार हेतु वाहन के रूप में प्रयोग किया। 

2.5 संगम साहित्य 

सबसे शुरुआती तमिल ग्रंथ संगम साहित्य (लगभग 400 बी.सी.ई. – 200 सी.ई.) के बीच संकलित किए गए। यह उन कवियों का संकलन है, जिन्होंने तीन से चार शताब्दियों की अवधि में छोटी और लंबी कविताओं की रचना की, जो प्रमुखों और राजाओं द्वारा संरचित हैं। इनका संग्रह गोष्ठियों में हुआ जिन्हें संगम कहा जाता था और इसमें उत्पादित साहित्य को संगम साहित्य कहा जाने लगा। तीन संगम (साहित्यिक सम्मेलन) हुए – पहला और अंतिम सम्मलेन मदुरै में, दूसरा सम्मलेन कपाटपुरम में हुआ था। हालाँकि, इन समारोहों की ऐतिहासिकता के बारे में कुछ संदेह है। इसलिए, कुछ विद्वान संगम साहित्य के बजाय “प्रारंभिक शास्त्रीय तमिल साहित्य” शब्द का उपयोग करना पसंद करते हैं। हालाँकि पहले दो संगमों की कविताओं को आम तौर पर ऐतिहासिक के रूप में खारिज कर दिया जाता है लेकिन कुछ आधुनिक विद्वान उन्हें ऐतिहासिक मूल्य का दर्जा देते हैं।

कविताओं में लगभग 30,000 पंक्तियाँ प्रेम और युद्ध के विषयों पर हैं। वे प्राचीन काल के भाटी के गीतों पर आधारित थे और संकलित होने से पहले लंबे समय तक मौखिक रूप से प्रसारित हुई है| वे धार्मिक साहित्य के रूप में संकलित नहीं थे। इनके कवि शिक्षकों व्यापारियों बढई, सुनार, लोहार, सैनिक, मंत्री और राजा आदि सभी वर्गों से आते थे। लेखकों के विविध विषयों के कारण वे अपने समय के लोगों के रोजमर्रा के जीवन की जानकारी की खान हैं। वे उच्चतम गुणवत्ता के साहित्य का प्रतिनिधि करते हैं। जैसा कि अभी कहा गया है, वे दक्षिण भारत के कई राजाओं और राजवंशों का वर्णन करते हैं। कई कविताओं में एक राजा या नायक का नाम आता है और वह उसके सैन्य कारनामों का विस्तार से वर्णन मिलता है। उनके द्वारा भाटों और योद्धाओं को दिए गए उपहारों का वर्णन मिलता है। ऐसा भी हो सकता है, शाही दरबार में इन कविताओं का ग्रन्थ किया गया हो। इसलिए यह संभव है कि राजाओं के नाम वास्तविक ऐतिहासिक आंकड़ों का उल्लेख करते हैं। चोल राजाओं का उल्लेख दाता के रूप में किया जाता है। संगम साहित्य में कावेरीपटिनम जैसे कई समद्ध शहरों का उल्लेख है। वे अपने जहाजों में आने वाले यवनों, सोने के लिए काली मिर्च खरीदने और स्थानीय लोगों को शराब और महिला दासों की आपूर्ति करने की बात करते हैं (आर.एस. शर्मा, 2005) । व्यापार पर संम साहित्य द्वारा उत्पादित जानकारी पुरातत्व और विदेशियों के वृत्तांत द्वारा पुष्टि की जाती है। कुछ राजाओं और घटनाओं का उल्लेख शिलालेखों द्वारा भी समर्थित है। 

2.6 जीवन-वृत्तांत, कविता और नाटक

प्रारंभिक भारत नाटक और कविता की कई कृतियों का भंडार है। इतिहासकारों ने उस काल के बारे में जानकारी प्राप्त करने का प्रयत्न किया है, जिस समय उनकी रचना की गई थी। सबसे पहले संस्कृत के कवियों और नाटककारों में अश्वघोष और भाष शामिल हैं। अश्वघोष ने बुद्धचरित, सारिपुत्रकृष्ण और सौन्दरानंद को लिखा । भाष एक नाटककार थे और उन्होंने पंचरात्र, दत्तवाक्य, बालचरित और स्वप्न-वासवदत्ता लिखा। महान संस्कृत लेखक-कवि कालिदास (लगभग चौथी-पांचवीं शताब्दी सी.ई.) ने अभिज्ञानशाकुंतलम्, मालविकाग्निमित्रम्, विक्रमोर्वशीयम् और रघुवंशम्, कुमारसम्भवम् और मेघदूतम् जैसे काव्य कृतियों को लिखा। वे गुप्त वंश के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं। मालविकाग्निमित्रम् पुष्यमित्र शुंग के शासनकाल की घटनाओं पर आधारित है (शुंग वंश मौर्यों  के बाद था)। तत्पश्चात, ऐतिहासिक विषयों पर प्राचीन नाटक हैं। उल्लेख विशाखदत्त के मुद्राराक्षस (लगभग 7वीं – 8वीं शताब्दी सी.ई.) का किया जा सकता है। यह नाटक इस बात पर आधारित है कि चाणक्य चंद्रगुप्त मौर्य की ओर से नंदों के मंत्री राक्षस पर कैसे विजय प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। इसमें तत्कालीन समाज और संस्कृति की झलक भी मिलती है। उनके अन्य नाटक देवीचंद्रगुप्तम् गुप्त राजा, रामगुप्त के शासनकाल की एक घटना पर केंद्रित है। एक अन्य कवि शूद्रक हैं, जिन्होंने ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित नाटक लिखे हैं। कथा साहित्य में पंचतंत्र (लगभग 5वीं-6वीं शताब्दी सी.ई.) और कथासरित्सागर (कहानियों का महासागर) शामिल हैं। वे लोकप्रिय लोक कथाओं के संग्रह हैं। 

पंचतंत्र, विरुपक्ष मंदिर, पट्टाडकल, कर्नाटक से “बंदर और मगरमच्छ और नेवला और सांप’ दंतकथाओं को दर्शाने वाला पैनल। लगभग 8वीं शताब्दी बी.सी.ई.। 

प्रसिद्ध राजाओं की जीवनियाँ साहित्य का एक दिलचस्प हिस्सा हैं। इन्हें दरबारी-कवियों और लेखकों ने अपने शाही संरक्षकों की प्रशंसा में लिखा था। बाणभट्ट का हर्षरित (लगभग 7वीं शताब्दी सी.ई.) पुष्यभूति राजवंश के हर्षवर्धन के बारे में प्रशस्तिपरक शब्दों में बात करता है। यह भारत में सबसे पुरानी संरक्षित जीवनी है। बाण के अनुसार यह एक अध्यायिका है। यह इतिहास परंपरा से संबंधित ग्रंथों की एक शैली है। यह राजा के बारे में बहुत कुछ बताता है लेकिन साथ ही सिंहासन के लिए संघर्षरत होने का संकेत देता है। यह कई ऐतिहासिक तथ्यों पर प्रकाश डालता है जिनके बारे में हम अन्यथा नहीं जान सकते थे। बिल्हण का विक्रमांकदेवचरित् (लगभग 12वीं सदी) बाद के चालुक्य राजा विक्रमादित्य VI के बारे में है और उनकी जीत का वर्णन करता है।

वाक्पतिराज ने कन्नौज के यशोवर्मन के कारनामों के आधार पर गौड़वहो लिखा। विभिन्न राजाओं के जीवन पर आधारित कुछ अन्य जीवनी संबंधी कार्य हैं। इनमें से प्रमुख हैं: 

  • जयसिंह की कुमारपालचरित्, 
  • हेमचंद्र का कुमारपालचरित् या दिव्यश्रयकाव्य 
  • नैचंद्र के हम्मीरकाव्य,
  • पद्मगुप्त के नवसहसांकरित्,
  • बल्लाल का भोजप्रबंध, और 
  • चंदबरदाई का पृथ्वीराजचरित।

लेकिन, ऐतिहासिक दृष्टिकोण से, कल्हण द्वारा रचित राजतरंगिणी आधुनिक इतिहासकारों द्वारा सराहे गए इतिहास-लेखन का सर्वश्रेष्ठ चित्रण है। शोध की महत्वपूर्ण पद्धति और ऐतिहासिक तथ्यों की निष्पक्ष जाँच ने उन्हें आधुनिक इतिहासकारों के बीच बहुत सम्मान दिया है। वह एक कश्मीरी ब्राह्मण था और उसे कश्मीर का पहला इतिहासकार माना जाता है।  उसके बारे में बहुत कम ही जाना जाता है, सिवाय इसके कि वह अपनी पुस्तक के शुरुआती छंदों में अपने बारे में जो कुछ हमें बताते हैं, वही पता चलता है। इसमें उसने यह भी लिखा। है कि इतिहास को किस तरह लिखा जाना चाहिए। वह कहता है: 

  • श्लोक 7: निष्पक्षताः वह नेक दिमाग वाला लेखक केवल प्रशंसा के योग्य होता है  जिसका शब्द, न्यायाधीश की तरह, अतीत के तथ्यों से संबंधित प्रेम या घृणा से मुक्त  रहता है।
  • श्लोक 11: पूर्व लेखकों का हवाला देते हुए : कश्मीर के शाही इतिहास को प्राचीनतम व्यापक इतिहास सुव्रत की रचना के सामने खंडित प्रकट होते हैं। उसने उसे  इस तरह से घनीभूत किया है जिससे उसे आसानी से याद किया जा सके।
  • श्लोक 12: सुव्रत की कविता, यद्यपि इसने ख्याति प्राप्त की है, विषय-वस्तु की व्याख्या में निपुणता नहीं दिखाती है, क्योंकि यह सीखने (पढ़ने के) गलत तरीके से ग्रस्त है।
  • श्लोक 13: असावधानी के कारण, क्षेमेंद्र की “राजाओं की सूची” (नृपावली) में गलतियों से मुक्त नहीं है, हालाँकि यह एक कवि की रचना है।
  • श्लोक 14: राजाओं के वृत्तान्त पूर्व विद्वानों के ग्यारह कार्यों का निरीक्षण मैंने किया है,  साथ ही ऋषि नील के पुराणों का भी निरीक्षण किया है।
  • श्लोक 15: प्राचीन राजाओं द्वारा मंदिरों और अनुदानों को रिकॉर्ड करने वाले शिलालेखों को देखकर, प्रशंसनीय शिलालेखों और लिखित कार्यों पर, कई त्रुटियों को दूर किया गया है।

प्रारंभिक किंवदंतियों, रीति-रिवाजों और कश्मीर के इतिहास की जानकारी के स्रोत के रूप में कल्हण का कार्य बेहद मूल्यवान है।

2.7 बौद्ध और जैन साहित्य

प्रारंभिक भारत के गैर-ब्राह्मणवादी और गैर-संस्कृत स्रोतों में बौद्ध और जैन साहित्य एक महत्वपूर्ण श्रेणी है। यह क्रमशः पाली और प्राकृत भाषाओं में लिखा गया था। प्राकृत संस्कृत का एक रूप था और प्रारंभिक जैन साहित्य अधिकतर इसी भाषा में लिखा गया है। पाली को प्राकृत का एक रूप माना जा सकता है जिसका मगध में प्रचलन था। अधिकांश प्रारंभिक बौद्ध साहित्य पाली में लिखा गया है। बौद्ध भिक्षुओं के साथ यह श्रीलंका पहुँचा जहाँ यह एक जीवित भाषा है। अशोक की शिक्षाएँ भी पाली में हैं। बुद्ध की मृत्यु के बाद रचित पाली ग्रंथ त्रिपिटक (“तीन टोकरी”) हमें बुद्ध और 16 महाजनपदों के समय के भारत के बारे में बताते हैं। त्रिपिटक पाली में बौद्ध विहित साहित्य और उनकी टिप्पणियों के लिए दिया जाने वाला सामान्य नाम है। त्रिपिटक पाली, जापानी, चीनी और तिब्बती संस्करणों में जीवित हैं। उनमें तीन किताबें शामिल हैं : 

  • सुत्त पिटक, 
  • विनय पिऔर 
  • अभिधम्म पिटक

सुत्त पिटक में कहानियों, कविताओं और संवाद के रूप में विभिन्न सिद्धांतों पर बुद्ध के प्रवचन शामिल हैं। विनय पिटक भिक्षुओं के लिए 227 नियमों और विनियमों के बारे में है। इसमें बुद्ध द्वारा प्रत्येक नियम की स्थापना के बारे में स्पष्टीकरण शामिल हैं। इसमें उनके जीवन, घटनाओं और बौद्ध धर्म की कहानी के बारे में जानकारी शामिल है। यह 386 बी.सी.ई. में लिखा गया था।

अभिधम्म पिटक (शाब्दिक रूप से “उच्च धम्म”) में थेरवाद के अनुसार बौद्ध दर्शन से संबंधित विषय हैं और इसमें सूचियाँ, सारांश और प्रश्न शामिल हैं। सुत्त पिटक में पाँच निकाय शामिल हैं जिनमें से खुद्दक निकाय प्रवचनों का एक संग्रह है। इसमें थेरगाथा, थेरीगाथा और जातशामिल हैं जो एक इतिहासकार के लिए महत्वपूर्ण स्रोत हैं। जातक में लगभग 550 से अधिक कहानियाँ देव, मनुष्य, पशु, परी, आत्मा या एक पौराणिक चरित्र के रूप में बुद्ध के पूर्व जन्मों के बारे में हैं। उन्हें कुछ ऐतिहासिक महत्व दिए गए हैं क्योंकि वे बुद्ध के पिछले जन्मों से संबंधित हैं। कई कहानियों और रूपांकनों को पूर्व-बौद्ध और गैर-बौद्ध मौखिक परंपराओं से लिया गया था। उनकी लोकप्रियता के कारण वे भारहुत, सांची, नागार्जुनाकोंडा और अमरावती में मूर्तिकला में चिन्हित है। वे महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे बौद्ध धर्म और लोकप्रिय बौद्ध धर्म के इतिहास की एक झलक प्रदान करते हैं। 

थेगाथा (“पुराने बौद्ध भिक्षुओं की कविताएँ”) और थेरीगाथा (“पुराने बौद्ध भिक्षुणियों की कविताएँ”) कविता का एक संग्रह है, जिसमें छंद के रूप में बौद्ध भिक्षुओं के शुरुआती सदस्यों ने सुनाए थे। थेरीगाथा भारत की पहली संरक्षित कविता संग्रह है जिसे महिलाओं द्वारा रचा गया है। इसलिए, यह न केवल बौद्ध धर्म के लिए बल्कि लिंग अध्ययन के लिए भी महत्वपूर्ण है। थेरीगाथा के गाथाएँ इस दृष्टिकोण का पुरज़ोर समर्थन करती हैं कि महिलाएँ आध्यात्मिक प्राप्ति के मामले में पुरुषों के बराबर हैं।

धर्म-वैधानिक बौद्ध साहित्य में प्रथम शताब्दी बी.सी.ई.- प्रथम शताब्दी सी. ई. के आसपास मिलिंदपन्हो (“मिलिंद के प्रश्न) शामिल हैं। इसमें इंडो-ग्रीक राजा मिनैंडर और एक बौद्ध भिक्षु नागसेन के बीच संवाद शामिल हैं। सिंहली कालक्रम महावंश (“महान इतिहास) और दीपवंश (“द्वीप का इतिहास’) बुद्ध के ज्ञानोदय के समय से बौद्ध धर्म के इतिहास को बताते हैं। 

जैन साहित्य में ग्रंथों की एक अन्य महत्वपूर्ण श्रेणी का गठन किया गया है जो अर्धमागधी में है। इसमें ऐसी जानकारी है जो प्राचीन भारत के विभिन्न क्षेत्रों के इतिहास के पुनर्निर्माण में हमारी मदद करती है। दिगंबरों का साहित्य जैन शौरसेनी में है जबकि श्वेतांबर साहित्य अर्धमागधी की दो उपभाषाओं में है। 14वीं शताब्दी बी.सी.ई. में महावीर द्वारा शिष्यों को दिए गए उपदेश पहली बार 14 पूर्वो में संकलित किए गए। स्थूलभद्र ने पाटलिपुत्र में एक महान परिषद का गठन किया और 12 अंगों में जैन साहित्य का पुनर्निर्माण किया। बाद में लगभग 5वीं शताब्दी सी.ई. में वल्लभी में हुए एक परिषद में मौजूदा ग्रंथों को औपचारिक रूप दिया गया और उन्हें लिखित रूप में प्रस्तुत किया गया। 

श्वेतांबरों द्वारा स्वीकार किए गए शास्त्र हैं:

1) 12 अंग, ii) 12 उपांग, ii) 10 प्रकीर्णद, iv) 6 छेदसूत्र, v) 2 सूत्र, और vi) 4 मूलसूत्र।

ये आचार संहिता, विभिन्न किंवदंतियों, जैन सिद्धांतों और तत्वमीमांसा के बारे में बताते हैं। D दिगंबरों का मानना है कि अधिकांश मूल पूर्व खो गए हैं। इसलिए, वे श्वेतांबर द्वारा स्वीकार किए गए शास्त्रों को स्वीकार नहीं करते हैं। वे महान आचार्यों द्वारा लिखित धर्मग्रंथों का उपयोग करते हैं, जो महावीर की मूल शिक्षाओं पर आधारित हैं। जैन धर्म के इतिहास और सिद्धांत की जानकारी के लिए हम जैन साहित्य का उपयोग कर सकते हैं। प्रतिद्वंद्वी मत के सिद्धांत, जैन संघ में रहने वाले संतों की जीवन गाथा और जैन भिक्षुओं के जीवन के बारे में  जान सकते हैं।

पुरातत्व के द्वारा अतीत को समझने के लिए भौतिक संस्कृति का अध्ययन किया जाता है। इसका इतिहास से घनिष्ठ संबंध है। मूर्तियाँ, मिट्टी के बर्तनों, हड्डियों के टुकड़े, घर के अवशेष, मंदिर के अवशेष, अनाज, सिक्के, मुहरें, शिलालेख आदि वे अवशेष हैं जो पुरातत्व विज्ञान की विषय-वस्तु के रूप में हमारे सामने हैं। यह पुरातात्विक साक्ष्य है जिससे हम प्रागैतिहासिक काल का अध्ययन करने में सक्षम हैं। भारत में भी पुरातत्व के आधार पर आद्य ऐतिहासिक काल का पुनर्निर्माण किया गया है। हालाँकि, हम पुरातत्व की उपयोगिता को केवल इन अवधियों तक सीमित नहीं कर सकते हैं; यह उन अवधियों के लिए भी महत्वपूर्ण है जिनके लिखित प्रमाण हैं और जो इतिहास के क्षेत्र के अन्तर्गत आते हैं। उदाहरण के लिए, इंडो-ग्रीक के इतिहास को सिक्कों के आधार पर ही पूरी तरह से समझा गया है।

भारत के अतीत के पुनर्निर्माण में पुरातात्विक स्रोतों का उपयोग केवल दो शताब्दियों पुराना है। यह 1920 के दशक तक माना जाता था। भारतीय सभ्यता की शुरुआत लगभग 6वीं शताब्दी बी.सी.ई से शुरु हुई। लेकिन मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई के साथ भारतीय सभ्यता लगभग 5000 बी.सी.ई. तक कालबद्ध की जा सकती है। प्रागैतिहासिक पुरावशेषों की खोज से पता चला है कि मानवीय गतिविधियाँ 20 लाख साल पहले ही शुरू हो गई थीं। इसी तरह, यह माना जाता था कि अधिकांश भारतीय उपमहाद्वीप में मानव सभ्यता लगभग पहले सहस्राब्दी बी.सी.ई. के उत्तरार्द्ध में आबाद हो गई थी। लेकिन अब पुरातत्व की मदद से हम जानते हैं कि इसकी शुरुआत पाषाण-काल की अवधि से ही कम या ज्यादा रूप से आबाद हो गई थी।

उत्खनन और अन्वेषण जैसे पुरातात्विक तरीके महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये व्यापार, राज्य, अर्थव्यवस्था, सामाजिक पहलुओं, धर्म और इस तरह के सांसारिक पहलुओं पर महत्वपूर्ण सामग्री प्रदान करते हैं जैसे कि लोग कैसे रहते, खाते और कपड़े पहनते थे। उत्खनन से पुरापाषाण, मध्य पाषाण, नवपाषाण, ताम्र पाषाण लौह युग, महापाषाण और कई अन्य संस्कृतियों पर भारी मात्रा में दत्त सामग्री प्राप्त होती है। चूंकि हड़प्पा लिपि अभी भी अनिर्धारित है, इसलिए इस अवधि की जानकारी पूरी तरह पुरातत्व से प्राप्त की गई है। यह हमें उत्पत्ति, प्रसार, अधिवास के प्रति रूप, शहरीकरण, व्यापार, राजनीति, अर्थव्यवस्था, कृषि, शिकार, फसलों, कृषि उपकरणों, प्रौद्योगिकी, मनकों, मुहरों, अग्नि वेदियों, धर्म और इस सभ्यता के ह्रास के बारे में बताता है। 

3. पुरातात्विक स्रोत

भारतीय इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए विभिन्न प्रकार के पुरातात्विक अवशेष उपयोगी हैं। उदाहरण के लिए, खुदाई किए गए अवशेष, खड़े स्मारक, मूर्तिकला और उत्कीर्ण अभिलेख। जमीनी सर्वेक्षण से पुरातात्विक स्थलों की पहचान की जाती है। इसमें दस्तावेज़ी स्रोत, व प्राचीन नामों की जाँच शामिल हैं। हवाई सर्वेक्षण के माध्यम से जिसमें हवाई या अंतरिक्ष जनित रिमोट सेंसिंग शामिल हैं, उन जगहों की खोज होती है जिन्हें अक्सर जमीन पर चिन्हित नहीं किया जा सकता है। जमीन पर एक बार चिह्नित की गई स्थलों की तुलना और व्यवस्थित रूप से अधिवास के प्रतिरूप, स्थल निर्माण प्रक्रियाओं और भू-पुरातात्विक विश्लेषण पर पहुँचने के लिए अध्ययन किया जा सकता है। पुरातत्वविदों जैसे कि जीवाश्म विज्ञानी (जो जानवरों की हड्डियों का अध्ययन करते हैं), परगाणु विज्ञानी (जो जीवाश्म पराग का अध्ययन और विश्लेषण करते हैं), भू-पुरातत्वविद (जो पृथ्वी निर्माण और मिट्टी और तलछट पैटर्न का अध्ययन करते हैं), पुरातत्व-प्राणी विज्ञानी (जो स्थलों से पशु प्रजातियों का अध्ययन, पहचान और विश्लेषण करते हैं); जातीय-पुरातत्वविदों (जो अतीत के बारे में परिकल्पना करने के लिए जीवित लोगों और जनजातियों का अध्ययन करते हैं) अवशेषों की जाँच-परख में सम्मिलित होते हैं। 

उत्खनन : उत्खनन दो प्रकार की होती है: 1) ऊर्ध्वाधर 2) क्षैतिज।

ऊर्ध्वाधर उत्खनन, स्तरीकरण को प्रकट करने के उद्देश्य से किया जाता है और इसमें  गहरी स्तरों को काट दिया जाता है। क्षैतिज खुदाई उस परत में विभिन्न परावशेषों के बीच स्थानिक संबंधों को प्रकट करने के लिए एक विशेष परत को खोलकर क्षैतिज आयाम पर जोर देती है। कई उत्खननकर्ता उत्खनन रणनीतियों का संयोजन करते हैं। परावशेषों के व्यवस्थित अध्ययन के माध्यम से जिसमें प्रयोगशाला विश्लेषण भी शामिल है। पुरातत्वविद् प्राचीन जीवनयापन के तरीकों और घटनाओं के बारे में निष्कर्ष पर पहुंचते हैं। आज, कुछ सामग्री जिसे पहले अध्ययन के लायक नहीं माना गया था, को महत्वपूर्ण माना जाता है, जैसे कि जले हुए बीज, पौधे की सामग्री, पराग अवशेष  और प्राचीन अवशेष (पिछले पारिस्थितिकी तंत्र, आहार को फिर से निर्धारित करने के लिए); जानवरों और मनुष्यों दोनों के दांत और हड्डियाँ (अतीत में रोगों और आहार के पैटर्न को समझने के लिए) आदि को आज पुरातत्वविदों के पास बड़ी संख्या में काल-निर्धारण की विधियाँ हैं, जिनके माध्यम से वे एक विशेष प्रकार के अवशेषों की आयु निर्धारित करते हैं। रेडियोकार्बन काल निर्धारण सबसे लोकप्रिय है और कोयला, लकड़ी, बीज, पौधे सामग्री, मानव और पशु की हड्डी अवशेषों के रूप में जमा में की तारीख तय कर सकता है। अन्य निरपेक्ष काल निर्धारण की तकनीकों का भी उपयोग किया जाता है; उदाहरण के लिए, थर्मोलुमिनिसेंस डेटिंग (मिट्टी के बर्तन, पकी मिट्टी की वस्तुएँ (Terracotta)); डेंड्रोकलॉजी (वृक्ष के तने के विभिन्न छल्ले की आयु तय करता है) आदि।)

हमने अन्य शाखाओं जैसे पुरालेखशास्त्र और मुद्राशास्त्र इत्यादि से लाभ उठाया है। हम इंडो-ग्रीक, शक-पहलव और कुषाण राजाओं के बारे में मुद्राशास्त्र के बिना नहीं जान सकते हैं। इसी प्रकार, धम्म के बारे में अशोक के विचार और समुद्रगुप्त की विजय आदि उनके पुरालेख के बिना अज्ञात रहेंगे। 

3.1 सिक्के 

सिक्के उत्खनन में या मुद्रा भंडार के रूप में पाए जाते हैं। वे ज्यादातर भंडार में पाए जाते हैं, जिनमें से अधिकांश एक खेत की खुदाई करते समय या किसी भवन की नींव की खुदाई करते हुए, सड़क आदि बनाते हुए पाए गए हैं। सिक्कों के अध्ययन को मुद्राशास्त्र कहा जाता है। इसे भारत के इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए दूसरा सबसे महत्वपूर्ण स्रोत और शिलालेखों को पहला स्रोत माना जाता है। भारत और विदेशों के विभिन्न संग्रहालयों में कई सौ हज़ार सिक्के जमा किए गए हैं। व्यवस्थित खुदाई में पाए गए सिक्के संख्या में कम हैं, लेकिन बहुत मूल्यवान हैं क्योंकि उनसे कालक्रम और सांस्कृतिक संदर्भ को ठीक से तय किया जा सकता  है। 

सिक्का एक धातु मुद्रा है और इसका एक निश्चित आकार, और वजन मानक है। इस पर जारी करने वाले प्राधिकरण की मुहर भी मिल सकती है। उस सतह पर जहाँ संदेश लिखा जाता है उसे अग्र व विपरीत पक्ष को उल्टा (reverse) कहा जाता है। प्रारंभिक भारतीय इतिहास में दूसरा शहरीकरण (लगभग 6वीं शताब्दी बी.सी.ई.) पहला उदाहरण है, जहाँ हमें सिक्के के साहित्यिक और पुरातात्विक दोनों प्रमाण मिलते हैं। यह राज्यों के उदय, कस्बों और शहरों के विकास और कषि और व्यापार के प्रसार का समय था। प्रारंभिक भारत में सिक्के तांबे, चांदी, सोने और सीसे से बनते थे। पकी मिट्टी के बने सिक्के के सांचे, जो कुषाण काल (पहली तीन शताब्दियों सी.ई.) से संबंधित हैं, सैकड़ों में पाए गए हैं। वे इस समय के समृद्ध वाणिज्य को दर्शाते हैं। मौर्योत्तरकालीन सिक्के सीसा, पोटिन, तांबा, कांस्य, चांदी और सोने से बने थे उन्हें बड़ी संख्या में जारी किया गया था जिसमें हमें व्यापार में हुई वृदधि के संकेत मिलते हैं।

प्रमुख राजवंशों से संबंधित अधिकांश सिक्कों को सूचीबद्ध और प्रकाशित किया गया है। उपमहाद्वीप में सबसे पुराने सिक्के आहत सिक्के हैं। ये ज्यादातर चांदी के और कभी-कभी तांबे के होते हैं। कुछ सोने के आहत सिक्के भी मिले हैं लेकिन वे बहुत दुर्लभ हैं और उनकी प्रामाणिकता संदिग्ध है। आहत सिक्कों पर केवल प्रतीक मिलते हैं। प्रत्येक प्रतीक को अलग अलग आहत किया जाता है जो कभी-कभी एक दूसरे को अतिव्याप्त करते हैं। ये सिक्के पूरे देश में तक्षशिला से मगध तक मैसूर या उससे भी आगे दक्षिण पाए गए हैं। उन पर कोई मुद्रा लेख व उत्कीर्णन मौजूद नहीं होता। मगध साम्राज्य के विस्तार के साथ मगध के आहत सिक्कों को प्रतिस्थापित किया गया जो अन्य राज्यों द्वारा जारी किए गए थे। इसके बाद, इंडो-ग्रीक सिक्के भी चांदी और तांबे में हैं और सोने के दुर्लभ हैं। उन पर सुंदर कलात्मक आकृतियाँ चित्रित हैं। इन सिक्कों के अग्रभाग पर राजा की अर्ध प्रतिमा का वास्तविक चित्रण होता था तथा पृष्ठ भाग पर कुछ देवताओं को दर्शाया जाता था। केवल इन सिक्कों के माध्यम से हम 40 से अधिक इंडो-ग्रीक शासकों के बारे में जानते हैं जिन्होंने उत्तरपश्चिमी भारत में शासन किया था। जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, इन सिक्कों से हम कई ऐसे शक पहलव राजाओं के बारे में जानते हैं जिनके बारे में हमें किसी अन्य स्रोत से कोई जानकारी नहीं मिलती। 

कुषाणों ने अपने सिक्के चांदी में कम और सोने और तांबे में ज्यादा जारी किए। उनके सिक्के उत्तर भारत के अधिकांश हिस्सों में वर्तमान बिहार तक पाए जाते हैं। गुप्त सम्राटों ने ज्यादातर सोने और चांदी के सिक्के जारी किए, लेकिन सोने के सिक्के अधिक हैं। भारतीय प्रभाव उन पर शुरू से ही देखा जा सकता है। विमा कडफिसेस के सिक्के पर एक बैल के साथ खड़े शिव की आकृति मिलती है। इन सिक्कों पर मुद्रालेख में राजा स्वयं को महेश्वर यानी शिव का भक्त बताता है। कनिष्क, हुविष्क और वासुदेव आदि, इन सभी राजाओं के सिक्कों पर यह चित्रण मिलता है। कुषाण के सिक्कों पर भारतीय देवी-देवताओं के साथ हमें कई फारसी और ग्रीक देवताओं के चित्र भी देखने को मिलते हैं। हालाँकि सबसे पुराने सिक्कों में केवल चिन्ह थे जो बाद में राजाओं, देवताओं के साथ उनकी तिथियों और नामों का भी उल्लेख करते थे। उदाहरण के लिए, पश्चिमी क्षत्रप के सिक्कों पर शक संवत् की तिथियाँ मिलती हैं। सिक्कों के प्रचलन ने हमें कई सत्तारूढ़ राजवंशों के इतिहास का पुनर्निर्माण करने में सक्षम बनाया है। सिक्के राजनीतिक संगठन पर बहुमूल्य जानकारी प्रदान करते हैं। मिसाल के तौर पर, यौधेय और मालव के सिक्के गण’ की विरासत को आगे ले जाते हैं, जो हमें उनके गैर राजतंत्रीय स्वरूप के बारे में बताता है। दक्कन के सातवाहन सिक्कों पर एक जहाज की छवि समुद्री व्यापार के महत्व की गवाही देती है। 

सिक्कों को ढालने की परंपरा में गुप्तों ने कुषाणों की परम्परा को बनाए रखा। उन्होंने पूरी  तरह से अपने सिक्के का भारतीयकरण किया। उन्होंने कई सोने के सिक्के भी जारी किए। दीनार के नाम से प्रसिद्ध सिक्के अच्छी तरह बने हुए थे। राजगद्दी पर बैठे राजाओं के विभिन्न मुद्राओं को दर्शाया गया है: राजाओं को शेर या गैंडे का शिकार करने, धनुष या युद्ध-कुल्हाड़ी पकड़ने, संगीत वाद्य बजाने या अश्वमेध यज्ञ करने जैसी गतिविधियों के साथ दर्शाया गया है। समुद्रगुप्त और कुमारगुप्त के सिक्के पर उन्हें वीणा बजाते हुए दिखाया गया है। गुप्तोत्तर काल में सोने के सिक्कों की संख्याओं और शुद्धता में गिरावट आ गई थी। आर.एस. शर्मा की सामंतवाद पर आधारित अत्यधिक विवादास्पद धारणा है। उनके अनुसार सिक्कों की अधोगति और कौड़ियों का बढ़ता उपयोग इस काल के व्यापार और वाणिज्य की गिरावट की ओर संकेत करता है।

3.2 शिलालेख 

शिलालेख इतिहास लिखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण और विश्वसनीय स्रोत हैं। समकालीन दस्तावेज़ होने के कारण शिलालेख बाद के प्रक्षेपों से मुक्त होते हैं। ये उसी रूप में दिखाई देते हैं, जिसमें ये पहली बार उत्कीर्ण किए गए थे। इसमें बाद के समय में कुछ जोड़ना लगभग असंभव है, भोजपत्र, ताड़ के पत्ते, कागज आदि जैसी नरम सामग्री पर लिखे शब्दों की पुनः नकल करने की आवश्यकता होती थी क्योंकि पुरानी पांडुलिपियाँ समय के साथ नष्ट हो जाती हैं। नकल करते समय उनकी कुछ त्रुटियों को ठीक किया जाता था और कभी कभी कुछ जोड़ भी दिया जाता है। शिलालेखों में यह संभव नहीं है। शिलालेखों के अध्ययन  को पुरालेखशास्त्र कहा जाता है। शिलालेख मुहरों, तांबे की प्लेटों, मंदिर की दीवारों, लकड़ी की टुकड़ों, पत्थर के खंभों, चट्टान की सतहों, ईंटों या चित्रों पर उकेरे गए हैं। शिलालेखों । पर अंकित लिपि भी इतिहासकार की कई तरह से मदद करती है। प्राचीनतम शिलालेखों पर अंकित लिपि लगभग 2500 बी.सी.ई. की हड़प्पा लिपि है, जो अभी तक पढ़ी नहीं गई है। हड़प्पा की मोहरों पर लेखन को पढ़ने में अभी तक सफलता नहीं मिली।

सर्वप्रथम अशोक के शिलालेख पढ़े गए। ये शिलालेख पूरे उपमहाद्वीप में चट्टान की सतह और पत्थर के स्तंभों पर पाए गए हैं। ये चार लिपियों में लिखे हुए हैं। अशोक के तत्कालिक साम्राज्य जो वर्तमान अफगानिस्तान में था, वहाँ अरामाइक और ग्रीक लिपियों का इस्तेमाल किया गया था। गांधार क्षेत्र में खरोष्ठी लिपि प्रयोग में लाई जाती थी। खरोष्ठी भारतीय भाषाओं की वर्णमाला प्रणाली पर विकसित हुई और यह दाएँ से बाएँ लिखी जाती थी। उनके बाकी साम्राज्य में उत्तर में कलसी से लेकर दक्षिण में मैसूर तक ब्राह्मी लिपि प्रयोग की जाती थी। 

अशोक के बाद ब्राह्मी लिपि को बाद के शताब्दियों के शासकों द्वारा अपनाया गया। इसके बारे में सबसे दिलचस्प बात यह है कि इसके अक्षर समय-समय पर संशोधित किए गए। ब्राह्मी से भारत की लगभग सभी लिपियाँ दक्षिण में तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और मलयालम् और नागरी, गुजराती, बंगाली उत्पन्न हुई हैं। ब्राह्मी के अक्षरों के संशोधन का एक लाभ हुआ है। इससे उस समय अथवा शताब्दी का पता लगाना लगभग संभव हो गया जिसमें विशेष अभिलेख लिखा गया था। लिपियों के विकास के अध्ययन को पेलियोग्राफी कहा जाता है।

अशोक के शिलालेखों को पढ़ने का श्रेय जेम्स प्रिंसेप को जाता है। इसके बाद पुरालेख का अध्ययन अपने आप में एक विषय बन गया। वे बंगाल में ईस्ट इंडिया कंपनी में एक सिविल सेवक थे। अशोक के शिलालेख अपने आप में अनुपम है। उनके शासन काल के विभिन्न वर्षों में रिकॉर्ड किए गए थे। उन्हें शिलालेख कहा जाता है क्योंकि वे राजा के आदेश के रूप में हैं। वे न केवल अपने विषयों बल्कि संपूर्ण मानवता के कल्याण से संबंधित एक उदार राजा की छवि और व्यक्तित्व की झलक भी देते हैं।

अशोक के शिलालेखों की लिपि काफी विकसित है। यह माना जाता है कि लेखन-कार्य उससे पहले के काल में भी किया जाता होगा। श्रीलंका में अनुराधापुरा की खुदाई में छोटे लेखों वाले बर्तन मिले हैं, जिसे चौथी शताब्दी बी.सी.ई. के मौर्य काल के पूर्व, का माना जा सकता है। संस्कृत का पहला शिलालेख लगभग पहली शताब्दी बी.सी.ई. का मिलता है। रुद्रदमन के जूनागढ़ शिलालेख को दूसरी शताब्दी के मध्य में लिखे गए शुद्ध संस्कृत का प्रारंभिक उदाहरण माना जाता है। प्राकृत और संस्कृत के मिश्रण वाला प्रारंभिक अभिलेख लगभग 5वीं शताब्दी सी.ई. में मिलता है, जिसका स्थान शाही अभिलेखों की भाषा के रूप में संस्कृत ने ले लिया। 

अभिलेख विभिन्न प्रकार के थे। अशोक के शिलालेख राजकीय आदेश थे जो सामान्य रूप से अधिकारियों या लोगों को संबोधित थे व सामाजिक, धार्मिक और प्रशासनिक मामलों से संबंधित थे। अशोक का लुम्बिनी स्तंभलेख एक स्मारक शिलालेख है क्योंकि अशोक द्वारा की गई बुद्ध के जन्मस्थान की यात्रा को दर्ज करता है। फिर, सती (sati stones) तथा नायक (hero stones) के स्मारक मिले, जिनमें से कुछ पर अभिलेख मिलते हैं। मंदिर के निर्माण को रिकॉर्ड करने वाले दान अभिलेख सैकड़ों की संख्या में प्रारंभिक मध्ययुगीन काल में दक्कन और दक्षिण भारत में पाए गए हैं। इनके अलावा, हमारे पास ताम्रपत्रों पर उत्कीर्ण राजकीय भूमि-अनुदानों के कई हज़ार शिलालेख मिलते हैं। ये दान के दस्तावेज़ हैं जो ब्राह्मणों और अन्य लाभार्थियों को दिए गए भूमि और अन्य वस्तुओं के अनुदान रिकॉर्ड करते हैं। यद्यपि ये भूमि-अनुदान शिलालेख मंदिरों, देवताओं, ब्राह्मणों आदि को भूमि की बिक्री या दान से संबंधित हैं, लेकिन अधिकांशतः वे दानदाताओं के वंश और अन्य आर्थिक जानकारी का विवरण भी देते हैं। इस प्रकार, ये राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक इतिहास का एक बड़ा स्रोत हैं। इनसे हमें भूमि के अनुदान के बारे में भी पता चला, जो सभी करों से मुक्त ब्राह्मणों को  दी गई थीं। इन्हें अग्रहार कहा जाता था।

शिलालेख जो उनके संरक्षकों की प्रशंसा में लिखे गए हैं, एक प्रशस्ति के साथ शुरू होते हैं। उदाहरण हेतु प्रथम शताब्दी बी.सी.ई. से प्रथम शताब्दी सी.ई. के कलिंग (ओडिशा) के राजा खारवेल के हाथीगुम्फा शिलालेख और गुप्त राजा समुद्रगुप्त के इलाहाबाद स्तंभ शिलालेख हैं। क्षहरत, शक-क्षत्रप और कुषाणों के शिलालेख दो या तीन पीढ़ियों के नामों को दर्शाते हैं। ये शिलालेख उन्हें सामाजिक और धार्मिक कल्याण कार्यों में लगे हुए दिखाते हैं। जैसा कि हमने पहले जाना कि, गुप्त काल में संस्कृत का प्रमुख स्थान था। इलाहाबाद स्तंभ शिलालेख समुद्रगुप्त की उपलब्धियों को दर्शाता है। लेकिन इस एकमात्र शिलालेख के बिना यह महान गुप्त शासक अज्ञात रह जाता। अधिकांश गुप्त शासक अपनी वंशावली देते हैं। बाद के राजवंशों की यह प्रथा बन गई। वे अपने विजय के की कथाओं सहित अपने पूर्ववर्तियों की विजय और उपलब्धियों व उत्पत्ति के मिथक विवरण भी देते थे। चालुक्य राजा पुलकेशिन द्वितीय ने अपने ऐहोल शिलालेख में वंशावली और उपलब्धियों के बारे में बताया है। इसी तरह, भोज का ग्वालियर शिलालेख उनके पूर्ववर्तियों और उनकी उपलब्धियों का पूरा विवरण देता है। कुछ शिलालेख बांध, जलाशय, टैंक, तथा धर्मार्थ भोजन घर आदि के निर्माण को रिकॉर्ड करते हैं। शक शासक रुद्रदमन के जूनागढ़ (गिरनार) शिलालेख में चंद्रगुप्त मौर्य के समय सुदर्शन झील नामक एक जलाशय के निर्माण का रिकॉर्ड है। अशोक के शासनकाल में इसे पूर्ण किया गया और लगभग दूसरी शताब्दी बी.सी.ई. में इसकी मरम्मत की गई। इस तरह विभिन्न प्रकार के शिलालेखों के अलावा, हम विविध प्रकारों जैसे भित्तिचित्र, धार्मिक सूत्र और मुहरों पर लेखन-कार्य पाते हैं।

शिलालेख राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक इतिहास का एक अच्छा स्रोत हैं। वे इतिहासकारों के लिए मूल्यवान हैं क्योंकि वे हमें समकालीन घटनाओं और आम लोगों के बारे में बताते हैं। उनका प्रसार राजा के विस्तार क्षेत्र के बारे में बताता है। कई शिलालेखों में वंशावली विवरण और कभी-कभी, उन राजाओं के नाम भी शामिल होते हैं, जो मुख्य वंशावली में छूट गए हैं। पल्लव, चालुक्य और चोल काल के भूमि अनुदान हमें समकालीन राजस्व प्रणालियों, कृषि विवरण और राजनीतिक संरचनाओं की जानकारी प्रदान करते हैं। 

शिलालेखों के कई अन्य उपयोग भी हैं। उदाहरण के लिए, वे हमें मूर्तियों की तिथियों के बारे में बताते हैं। वे हमें विलुप्त होने वाले धार्मिक संप्रदायों के बारे में बताते हैं, वे हमें अजीविका पंत, ऐतिहासिक भूगोल, मूर्तिकला का इतिहास, कला और वास्तुकला, साहित्य और भाषाओं का इतिहास और यहां तक कि संगीत जैसी कला के बारे में भी जानकारी देते हैं। वे साहित्यिक ग्रंथों की तुलना में अधिक विश्वसनीय हैं क्योंकि वे हमेशा धार्मिक नहीं होते हैं। 

3.3 स्मारक 

पुरालेखशास्त्र और मुद्राशास्त्र के स्रोतों के अलावा कई अन्य पुरातन अवशेष हैं जो हमारे अतीत के बारे में बताते हैं। गुप्तकाल से लेकर वर्तमान काल तक देश भर में मंदिर और मूर्तियाँ मिलती हैं। ये स्थापत्य कलात्मक इतिहास और भारतीय संस्कृति की उपलब्धियों को दर्शाते हैं। अजंता और एलोरा जैसी बड़ी गुफाओं की खुदाई पश्चिमी भारत की पहाड़ियों में की गई हैं। उसमें चैत्य और विहार मिले हैं। एलोरा के कैलाश मंदिर और मामल्लपुरम के रथ-मंदिरों को पत्थरों को काटकर बनाया गया है। मध्ययुगीन काल के स्मारकों से शासक वर्ग की भव्यता और धन का विवरण मिलता है। इसके अलावा, वे वास्तुकला की क्षेत्रीय शैलियों, विभिन्न क्षेत्रों के प्रभाव पर प्रकाश डालते हैं। 

पुरातात्विक खुदाई में बुद्ध के समय से संबंधित तक्षशिला, कौशाम्बी, काशी (राजघाट), अयोध्या, वैशाली, बोधगया आदि की बस्तियों को प्रकाश में लाया गया। कहा जाता है कि तक्षशिला को छोड़कर इन सभी स्थानों पर 6वीं शताब्दी बी.सी.ई. में बुद्ध ने यात्रा की थी। 

4. विदेशी वृत्तांत 

कई आगंतुक, तीर्थयात्रियों, व्यापारियों, अधिवाासी, सैनिकों तथा राजदूतों के रूप में भारत आए। उन्होंने जिन जगहों और वस्तुओं को देखा, उन पर अपना विवरण दे गए। यदि इनका ध्यानपूर्वक अध्ययन किया जाए तो ये लेख बहुत सारी ऐतिहासिक जानकारी देते हैं। यूनानी सैंड्रोकोट्टस का उल्लेख मिला है जिनके बारे में कहा जाता है कि वे एक युवा व्यक्ति के रूप में सिकंदर से मिले थे। 18वीं शताब्दी में विलियम जोन्स ने सैंड्रोकोट्टस को चन्द्रगुप्त  से लगभग 300 सी.ई. तक  मौर्य के रूप में पहचाना जो मौर्य कालक्रम का आधार बना। ग्रीक राजाओं द्वारा पाटलिपुत्र में राजदूत भेजे गए थे। उनमें से कुछ मेगस्थनीज़, डायमेकस और डायोनिसियस थे। सेल्यूकस के दूत मेगस्थनीज़ ने इंडिका में चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में अपने ठहरने का विवरण दिया है। हालाँकि ये मूल-ग्रंथ अब मौजूद नहीं है लेकिन बाद के लेखक इसके कुछ भागों का उल्लेख करते हैं, जिससे मौर्य काल की प्रशासनिक संरचना, सामाजिक वर्गों और आर्थिक गतिविधियों का पुनर्निर्माण संभव हो पाया। मेगस्थनीज़ और सिंकदर के साथ आने वाले विदेशियों के विवरण लुप्त हो गए हैं। अब वे केवल खंडों में उपलब्ध हैं।

ग्रीक और रोमन यात्रियों के विवरण प्रारंभिक भारत में हिन्द महासागर के व्यापार के बारे में उपयुक्त जानकारी देते हैं। मिस्र में बसे एक अज्ञात ग्रीक लेखक ने लगभग 80 सी.ई. में भारतीय तट की अपनी व्यक्तिगत यात्रा के आधार पर पेरिप्लस फ एरीर्थिन सी (Periplus of the Erythrean Sea) लगभग 80-115 सी.ई. में लिखी। वह भारतीय तटों के बारे में बहुमूल्य जानकारी प्रदान करता है। एक अन्य लेखक टॉलेमी ने 2वीं शताब्दी सी.ई. में भारत का एक भौगोलिक ग्रंथ जियोग्राफी (Geography) लगभग 150 सी.ई. में लिखा था। पेरिप्लस ऑफ एरीर्थिन सी और टॉलेमी का जियोग्राफ, ग्रीक में लिखे गए दोनों ग्रंथ भारत के भूगोल और प्राचीन व्यापार के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं। स्ट्रैबो, एरियन, प्लिनी द एल्डर के शुरुआती यूनानी और लैटिन विवरणों में हमें भारतीय समुद्री व्यापार के बारे में पता चलता है। एरियन ने सिकंदर द्वारा भारत पर किए गए आक्रमण का विस्तृत विवरण लिखा। उसने इस अभियान के साथ आने वाले लोगों से मिली जानकारी के आधार पर लिखा है।

भारत के बारे में जानकारी देने वाले अधिकांश ग्रीक विवरण द्वितीयक स्रोतों पर आधारित हैं जिसके परिणामस्वरूप इनमें कई त्रुटियाँ और विरोधाभास हैं। इसलिए, उनका उपयोग करते समय सतर्क रहना चाहिए। यूनानी लेखक भारतीय भाषाओं और रीति रिवाजों से अनभिज्ञ थे। उनकी जानकारी अविश्वसनीय तथ्यों और सूचनाओं से भरी हुई है। उदाहरण के लिए, मेगस्थनीज़ अपने प्रवास के समय भारत में सात जातियों का उल्लेख करता है। ये जातियाँ “व्यावसायिक वर्गों के साथ भ्रम पैदा करती हैं। । 

विदेशी शिलालेख जैसे डेरियस के विवरण भारत के बारे में जानकारी देते हैं। हेरोडोटस और टेसियस ने फारसी स्रोतों के माध्यम से भारत के बारे में अपनी जानकारी प्राप्त की। हेरोडोटस द्वारा लिखित “हिस्टरीज़ (Histories) भारत फारस के संबंधों के बारे में जानकारी देता है। 

चीनी यात्रियों ने समय-समय पर भारत का दौरा किया। वे बौद्ध तीर्थयात्री के रूप में यहाँ आए थे और इसलिए उनके विवरणों में बौद्ध धर्म के प्रति झुकाव दिखाई देता है। फा-हसीन अथवा फा-हियान नामक चीनी यात्री 5वीं शताब्दी सी.ई. में और हवेनत्सांग तथा इत्सिंग 7वीं शताब्दी में भारत आए थे। इन चीनी बौद्ध भिक्षुओं ने काफी विस्तृत यात्रा विवरणों को दिया जिनका अंग्रेजी में अनुवाद किया गया। उन्होंने कई पवित्र स्थानों और बौद्ध मन्दिरों का दौरा किया। फा-हियान ने 399-414 सी.ई के बीच भारत की यात्रा की लेकिन उसकी यात्रा उत्तर भारत तक ही सीमित थी। वेन-त्सांग ने 639 सी.ई. में ही अपना घर छोड़ दिया और भारत में 10 साल तक रहा। फा-हियान ने गुप्त और वेन-त्सांग ने हर्षवर्धन के समय के राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक परिस्थितियों का वर्णन किया। 

बाद के समय में कुछ अरब यात्रियों ने भी भारत के बारे में अपने विवरण दिए। इन अरब विद्वानों में सबसे प्रसिद्ध अबू रिहान थे जिन्हें हम अल-बरूनी के रूप में जानते हैं। वे खिव (आधुनिक तुर्कमेनिस्तान) के क्षेत्र के थे और गज़नी के महमूद के समकालीन थे। भारत के लोगों के बारे में जानन के लिए उन्होंने भारतीय ग्रंथों को उनकी मूल भाषा में अध्ययन किया। उन्होंने जो लिखा वह उनके भारतीय समाज और संस्कृति के ज्ञान पर आधारित है, यह ज्ञान उन्होंने साहित्य के माध्यम से हासिल किया था। इसके लिए उन्होंने संस्कृत का अध्ययन किया। हालाँकि, वह अपने समय की कोई राजनीतिक जानकारी नहीं देते हैं। लेकिन उनकी रचना तहकीक-ए-हिन्द वास्तव में एक विश्वकोश है। इसमें भारतीय लिपियों, विज्ञान, भूगोल, ज्योतिष, खगोल विज्ञान, दर्शन साहित्य, विश्वास, रीति-रिवाजों, धर्मों, त्योहारों, अनुष्ठानों, सामाजिक मानदंडों और काननों जैसे विषयों को शामिल किया गया है। अल्बरूनी की रचना 11वीं शताब्दी के भारत के लिए एक मूल्यवान ऐतिहासिक स्रोत हैं। उन्होंने पहली बार गुप्त काल के शुरुआती वर्ष की पहचान कराई। अरब और भारत के लोग समुद्री व्यापार करते थे। अरब यात्रियों जैसे सुलेमान के विवरण में भारत का उल्लेख मिलता है।

12वीं शताब्दी की शुरुआत के साथ हमें शासकों द्वारा अधिकृत और दरबारियों द्वारा लिखित आधिकारिक इतिहास मिलना शुरू हो जाता है। इसका सबसे पहला उदाहरण मिन्हाज-उद दीन-सिराज द्वारा लिखित तबकात-ए-नासिरी है। तत्पश्चात् हमें मध्ययुगीन इतिहास के ऐसे महत्वपूर्ण स्रोत मिलते हैं, जैसे: > ज़िया-उन-दिन बरानी द्वारा लिखित तारिख-ए-फ़िरोज़ शाही, > मुहम्मद कासिम फ़रिश्ता द्वारा रचित गुलशन-ए-इब्राहिमी

5. सारांश 

 इतिहासकार अतीत का अध्ययन करने के लिए विभिन्न प्रकार के स्रोतों  का सहारा लेते| पुरातत्व और साहित्यिक ग्रंथ दोनों महत्वपूर्ण हैं। दुर्भाग्य से, कई पुरातात्विक उत्खनन अब तक प्रकाशित नहीं हुए हैं। हजारों शिलालेखों का अध्ययन बाकी है। परिणामस्वरूप, अतीत के बारे में हमारी जानकारी अभी पूर्ण नहीं है। 

पुरातात्विक उत्खनन और अन्वेषण से पता चलता है कि मानव ने पाषाण काल में ही भारत के अधिकांश हिस्सों पर अधिकार कर लिया। जिसकी पुरातनता 1.6 करोड़ वर्ष आंकी जा सकती है। प्रागैतिहास के क्षेत्र में बहुत शोध किया गया है जिससे पता चलता है कि मानव गतिविधियाँ भारतीय उपमहाद्वीप में दो करोड़ साल पहले शुरु हो गई थी। यहाँ तक कि थार रेगिस्तान में मानव गतिविधियाँ लगभग 90,000 वर्षों पुरानी मानी जाती हैं। हड़प्पा सभ्यता के स्थलों तथा मोहनजोदड़ों और हड़प्पा नगरों की खोज ने भारतीय संस्कृति और सभ्यता की प्राचीनता को कई हजार साल पीछे धकेल दिया। इसी तरह, भारत के विभिन्न हिस्सों में उत्खनन और अन्वेषण में भारत में कृषि के इतिहास पर महत्वपूर्ण प्रकाश डाला है। अब हम जानते हैं कि भारत में कृषि की शुरुआत लगभग 8000 साल पहले हुई थी। इसके अलावा, पुरातात्विक खोजों से पता चलता है कि भारत में पत्थरों पर चित्रकारी करने की परम्परा 12,000 से अधिक वर्ष पहले ही शुरु हो गई थी। एक और महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि ऐतिहासिक ग्रंथों और साहित्यिक साक्ष्यों के दिनांकन को निश्चितता के साथ निर्धारित नहीं किया जा सकता। यह चिंता का कारण है। प्राचीन भारतीय साहित्य का अधिकांश हिस्सा कर्मकांड और धर्म से जुड़ा हुआ है। इसलिए इसका अध्ययन करते समय इसकी विभिन्न परतों की जाँच-पड़ताल अति आवश्यक है ताकि इस पर कुछ हद तक सामाजिक नियंत्रण रखा जा सके। 

6. शब्दावली 

पुरातत्व (Archaeology) : अतीत को समझने के लिए विभिन्न वस्तुओं के अवशेषों का अध्ययन। 

पुरावशेष (Artifact) : आम तौर पर सांस्कृतिक या ऐतिहासिक रुचि हेतु  मनुष्य द्वारा बनाई गई वस्तु। 

ब्राह्मणवाद (Brahmanical): ब्राह्मणों अथवा ब्राह्मणों से सम्बन्धित उनके सिद्धान्त, उपदेश, लोकाचार या पूजा।

वैधानिक (Canonical): यदि किसी चीज को वैधानिक स्थिति प्राप्त है तो उसके सभी गुणों को स्वीकार किया जाता है: आदेशात्मक, प्रामाणिक।

ताम्रपाषाणिक संस्कृति (Chalcolithic Culture) वह संस्कृति जिसमें पत्थर और तांबे के उपकरण का उपयोग किया जाता था।

शास्त्रीय (Classical) : : पारंपरिक और लम्बे समय से स्थापित रूप या शैली के भीतर एक अनुकरण मानक का प्रतिनिधित्व करना। प्राचीन ग्रीक या लैटिन साहित्य, कला अथवा संस्कृति से संबंधित ।

दिंगबर : जैन धर्म के दो मुख्य संप्रदायों में से एक संप्रदाय जो मत-विभेद के परिणाम स्वरूप 80 सी.ई. में बना था और दक्षिण भारत में आज तक है। इस संप्रदाय के तपस्वी पुरुष अथवा सदस्य संपत्ति-स्वामित्व को अस्वीकार करते हैं और वस्त्र नहीं पहनते। 

स्तुति (Eulogy) : भाषण या लेखन का एक अंश जो किसी व्यक्ति अथवा वस्तु की अत्यधिक प्रशंसा करता है, अर्थात् एक प्रकार की श्रद्धांजलि। 

भातृघातक (Fratricidal): एक परिवार या संगठन के भीतर संघर्ष से संबंधित । 

हड़प्पा सभ्यता : कांस्य युग की सभ्यता लगभग 3300-1300 बी.सी.ई.  /परिपक्वता की अवधि: 2600-18800 बी.सी.ई. जो मुख्य रूप से भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर पश्चिमी क्षेत्रों में पनपी। इसमें आधुनिक भारत (गुजरात, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, जम्मू और कश्मीर राज्य) और पाकिस्तान (सिंध, पंजाब और बलूचिस्तान प्रांत) के मुख्य शहर जैसे हड़प्पा, मोहनजोदड़ो, लोथल, कालीबंगन आदि शामिल हैं। 

प्रक्षेप (Interpolation) : आमतौर पर एक पाठ में बाद में जोड़ा जाता है।

कलि युग  : विश्व के चार युगों में से अंतिम युग जो संस्कृत के ग्रंथों में वर्णित समय के चक्र के हिस्से के रूप में जाना जाता है; अन्य युग : सत्य, त्रेता और द्वापर हैं। यह दानव कलि से संबंधित है। इसे देवी काली के साथ भ्रमित नहीं करना चाहिए। कलि युग के “कलि” का अर्थ है “संघर्ष’, “कलह”, “झगड़ा” या “विवाद” । पुराणिक स्रोतों के अनुसार कृष्ण के प्रस्थान से द्वापर युग का अंत और कलियुग की शुरुआत का संकेत मिलता है। 

महापाषाण काल (Megalithic) : प्रागैतिहासिक स्मारकों के साथ संबद्ध, आमतौर पर बड़े/ विशाल पत्थरों से बनी करें। 

मध्यपाषाण काल (Mesolithic) : पुरापाषाण काल और नवपाषाण काल के बीच का पाषाण काल। इस काल में माइक्रोलिथ्स अर्थात् सूक्ष्म उपकरण (छोटे, महीन पत्थर के औज़ार पाए 

जाते हैं)।

नवपाषाण काल (Neolithic) पाषाण काल का अंतिम चरण जब पॉलिश किए गए पत्थर के हथियारों और उपकरणों का उपयोग किया जाता था। 

निकाय :यह एक पाली शब्द है जिसका अर्थ है “मात्रा”, “संग्रह”, “संयोजन”, “वर्ग” या “समूह | इसका उपयोग आमतौर पर सुत्त पिटक के बौद्ध ग्रंथों के संदर्भ में किया जाता है, लेकिन इसका उपयोग थेरावाद बौद्ध धर्म के मठों के विभाजन को दर्शाने के लिए भी किया जा सकता है। 

पुरापाषाण काल (Paleolithic): पाषाण काल का प्रारंभिक चरण, लगभग 2.5 करोड़ वर्ष पहले तक, जब आदिम पत्थर के औज़ारों का उपयोग करता था। 

पाठ : वैदिक मंत्रों के जाप के तरीके। 

प्रागैतिहासिक काल (Prehistoric Period) : होमिनिन्स द्वारा लगभग तीन करोड़ वर्ष पहले पत्थर के औज़ारों के उपयोग की अवधि और लगभग 5000 साल पहले के शुरुआती लेखन प्रणालियों की। उपस्थिति। 

आद्य-ऐतिहासिक काल (Proto-historic Period) : प्रागैतिहास और इतिहास के बीच का संक्रमण काल जिसके दौरान एक संस्कृति या सभ्यता ने अभी तक अपना लेखन विकसित नहीं किया है, लेकिन अन्य संस्कृतियों ने अपने लेखन में इसके अस्तित्व का उल्लेख किया है। एक उदाहरण का हवाला देते हुए, यूरोप में केल्टिक और जर्मनिक जनजातियों को आद्य-ऐतिहासिक माना जाता है, क्योंकि उनका विवरण प्राचीनतम ग्रीक और रोमन स्रोतों में मिलता है। 

श्वेतांबर : जैन धर्म के इस संप्रदाय के तपस्वी सफेद वस्त्र पहनते हैं।