उत्तर-गुप्त काल में राज्य व्यवस्था, धर्म और संस्कृति 

1 प्रस्तावना 2 राजपद 3 राजनीतिक संगठन 3.1 सेना 3.2 प्रशासनिक विभाजन 3.3 सामंत 3.4 कर प्रणाली 4. न्याय व्यवस्था 5. उत्तरगुप्त काल में धर्म 5.1 भक्ति का उद्भव 5.2 देवताओं का समन्वय 5.3 कबीलाई अनुष्ठानों का समावेश 5.4 मंदिरों एवं ईश्वरवाद को राजकीय संरक्षण 5.5 उत्तर भारतीय धर्मों का दक्षिण की ओर प्रसार 6. दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन 6.1 दक्षिण भारत के क्ति आंदोलन में प्रतिरोध एवं सुधार और भक्ति आंदोलन का बाद में रूपातंरण 7. तन्त्रवाद की उत्पत्ति 7.1 तन्त्रवाद की कुछ मुख्य विशेषतायें 7.2 तन्त्रवाद तथा वाममार्गी धर्म 8. उत्तरगुप्त काल में संस्कृति 

उद्देश्य 

इस पेज को पढ़ने के बा, आप बता सकते हैं: 

  • त्तर-गुप्त काल में राजनीतिक व्यवस्था, धर्म और संस्कृति;
  • उन कारणों को जिनके आधार पर इतिहासकार इस काल के राजनीतिक संगठन का चरित्र सामंतीय मानते हैं;
  • बाद के ब्राह्मण मत, भक्ति एवं तंत्रवाद की मुख्य विशेषतायें; और
  • उत्तगुप्त काल में मंदिर वास्तुकला, साहित्य और अध्ययके नये क्षेत्र। 

1. प्रस्तावना 

जिस काल का हम अध्ययन कर रहे हैं उस पर उत्तर में गुप्त तथा पुश्यभूतियों, दक्कन में वाकाटक, कदम्ब एवं बादामी के चालुक्य और दक्षिण के आंध्र तथा तमिलनाडु में पल्लवों का शासन रहा। इन सबके अतिरिक्त निश्चित रूप से कुछ छोटे राज्य एवं सरदारों के प्रभाव क्षेत्र देश के बहुत से भागों में विद्यमान थे। इस युग की राजनैतिक व्यवस्था का अध्ययन करने के लिए अभिलेख, धर्मशास्त्र साहित्य, बाण की रचना हर्षचरित, चीनी यात्रियों फाह्याएवं हवेन-त्सांग के यात्रा वृतांत आदि इस काल के मुख्य स्रोत हैं। इस काल की राजनीतिक व्यवस्था के लिए सामान्यतः यह कहा जाता है कि उत्तराधिकारी राजतन्त्रों का छोटे क्षेत्रों पर शासन रहा परन्तु उनमें से एक या दो राजतंत्रों ने एक व्यापक क्षेत्र पर अपने सम्प्रभु को स्थापित किया। उदाहरण के लिए, हर्ष के (सातवीं सदी के पूर्वार्द्ध में) नियन्त्रण में सामान्यतः एक विशाल क्षेत्र था। इस इकाई में हम 300 से 700 सी.ई. तक के काल के राजनैतिक संगठन की मुख्य विशेषताओं का विवेचन करेंगे। हम यह भी दिखाने का प्रयास करेंगे कि इन विशेषताओं ने पहले के युग के राजनैतिक संगठन में परिवर्तको कैसे स्पष्ट किया और इसी प्रकार के परिवर्तन अन्य क्षेत्रों में भी हुए जैसे कि इस समय में देश के राजनैतिक संगठन में भी अति महत्वपूर्ण परिवर्तन हो रहे थे। हम धर्म और संस्कृति के क्षेत्र में हो हे विकास के बारे में भी जानेंगे। 

2. राजपद 

देश के अधिकतर भाग पर राजाओं का ही शासन था। कुछ सीमान्त क्षेत्रों में गणों (कबीलागणतन्त्र) की सरकार कायम थी। चौथी सदी सी.ई. के प्रारम्भ में समुद्रगुप्त के द्वारा उत्तर भात में सैनिक अभियान का संचालन करने के बाद ये सभी कबिलाई गणतन्त्र राजनैतिक दृश्य से गायब हो गये। इस प्रकार पंजाब में मद्र एवं योधे, ध्य भारत के अभीर आदि का नाम फिर कभी भी सुनायी न दिया। कुछ कबिलाई सरदारों के राज्य धीरे-धीरे राजतन्त्रों में परिवर्तित हो गये। राजा अब परममहेश्वर, राजाधिराज, परमभट्टारक जैसी भारी भरकम उपाधियों को धारण करने लगे जिनसे अन्य छोटे शासकों पर उनकी सर्वोच्चता स्पष्ट होती है। इस काल में दैवी अधिकार सिद्धान्त का प्रचलन हो गया। इस सिद्धांत को बनाये रखने के लिये राजा पृथ्वीबल्लभ जैसी उपाधियों को धारण करते थे। जिसका तात्पर्य है, “पृथ्वी देवी का प्रिय” | उसको पांचवा लोकपाल कहा जाता है क्योंकि चारों प्रधान दिशाओं संरक्षकों पर लोकपालों के नाम से विख्यात अन्य चार थे कुबेर, वरुण, इन्द्र एवं यम। यद्यपि राजा का देवत्व का सिद्धांत प्रधानता को प्राप्त कर गया था परन्तु इसके अन्दर राज्य की एक संरक्षक तथा रक्षक की अवधारणा भी निहित थी। राजा का पद पैतृक था। यद्यपि सिंहासन पर उत्तराधिकार ज्येष्ठत्व के सिद्धांत के अनुसार ही तय किया जाता था जिसका तात्पर्य है कि सिंहासन पर राजा का ज्येष्ठ पुत्र ही बैठता है परन्तु इस नियम के कुछ अपवाद भी थे। कभी-कभी राजा का निर्वाचन कुलीनों औमन्त्रियों के द्वारा होता था। सरकार का प्रमुख होने के कारण राजा अपने प्रदेश की सभी प्रशासनिक गतिविधियों का निरीक्षण करता था। वह सर्वोच्च न्यायाधीश था और सामान्यतः युद्ध के मैदानों में अपनी सेना का नेतृत्व करता था। अपवाद के रूप में कुछ ऐसी रानियों के नाम भी मिलते हैं जो शासन करती थीं। जैसे बाद में कश्मीर की रानी दिद्दा थी। सामान्यतः रानियां पृष्ठभूमि में ही रहती थी। 

3. राजनीतिक संगठन 

मौर्य काल की तुलना में, इस काल में राजा को सलाह देने के लिये किसी मन्त्रीपरिषद का अस्तित्व था इसके कोई स्पष्ट प्रमाण नहीं हैं। परन्तु फिर भी कुछ उच्च अधिकारी इस समय में भी थे जिनको न्त्री कहा जाता था। उच्च अधिकारियों में संधिविग्राहिका, यह विदेशी मामलों, युद्ध एवं शांति का मन्त्री था, हाबालाधिकृ एवं महादण्डनायक, ये दोनों सेना के उच्च अधिकारी थे। कभीकभी एक समय में ही व्यक्ति एक से अधिक पदों पर पदासीन होता था। उदाहरण के लिये, हरिषेण जो समुद्रगुप्त की प्रयागराज प्रशस्ति का रचयिता था संधिविग्राहिका होने के साथ-साथ महादण्डनायक भी था। 

अधिकारियों और उच्च अधिकारियों के अधिकांश पद उत्तगुप्त काल के दौरान जारी रहे। अधिकारियों का एक वर्ग था जिसको कुमारमात्य के नाम से जाना जाता था। ऐसा प्रतीत होता है कि अधिकांश उच्च अधिकारियों की नियुक्ति इस वर्ग से ही की जाती थी औइसलिकुमारमात्यों को अन्य बहुत से पदों जैसे कि संधिविग्राहिका, दण्डनायक, महाबालाधिकृत आदि पर भी नियुक्त किया जाता। उनमें कुछ प्रत्यक्ष रूसे राजा के नियन्त्रण में होते थे और उनमें से कुछ राजकुमारों के सेवकों तथा प्रांतीय सूबेदारों के रूप में कार्य करते थे। उपारिका के नाम से पुकारे जाने वाले अधिकारी के अधीन एक प्रशासनिक मण्डल भुक्ति होता था। युक्तक नौकरशाही का एक सदस्य था जो विषयपति के समान था तथा गाँव में उच्च स्तर पर कार्य करता था और वह ग्राम तथा भुक्ति के मध्य एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक सम्पर्क था। इस काल के प्रारम्भ में प्रशासनिक अधिकारियों को भुगतान नकद किया जाता था और बाद में एक निश्चित क्षेत्र का राजस्व वे प्राप्त करने लगे और इसलिए उनको भोगिका और भोगपति कहा जाने लगा। यह हर्षचरित से ज्ञाहुआ है जिसके अनुसार इस प्रकार के अधिकारियों के विरूद्ध गाँव वालों ने हर्ष से शिकायत की। ये पद बाद में पैतृक हो गये जिसके कारणवराजा का प्रभुत्व कमज़ोर हो गया। 

3.1 सेना 

आंतरिक शांति रखने तथा आक्रमण से सुरक्षा के लिए लगातार या स्थायी रूप से सेना खना इस युग की मुख्य विशेषता थी। जैसा कि ऊपर बताया गया कि उस समय में भी सेना के बहुत से उच्च अधिकारी थे और सेना इन अधिकारियों के अधीन होती थी। घुड़ सेना इयुग की सेना का मुख्य अंहोती थी। समुद्र टीय पल्लव जैसे दक्षिण के राज्यों में नौसेना भी होती थी। इस युग की सेना में रथों का प्रचलन महत्वपूर्ण नहीं था। केन्द्रीय शाही सेना का उपभाग सामान्तों की सेना होती थी। 

3.2 प्रशासनिक विभाजन

देश का प्रशासन सुचारू रूप से चलाने के लिए उसको कई मण्डलों में विभक्त किया गया। सबसे उच्च इकाई को भुक्ति कहा जाता था। कभीभी राजकुमार इस पद पर नियुक्त किये जाते थे। भुक्ति से आगे का प्रशासनिक मण्डल विषहोता था और प्रशासकी सबसे छोटी इकाई ग्राम होते थे। कुछ विशेष क्षेत्रों में विषय को राष्ट्र भी कहा जाता था। पूर्वी भारत में विषयों को भी विभिन्न विधियों में विभाजित किया गया था और जो ग्राम से ऊपर होता था। विषय के अधिकारियों को (या स्थानीय ताकतवर लोग) विशपति कहा जाता और वे प्रशासनिक कार्यों में अग्रिम भूमिका अदा करते थे। गाँव में एक मुखिया होता और गाँव के बड़े-बूढ़े लोग गाँव के मामलों में अग्रिम भूमिका अदा करते थे। नगरों या कस्बों में स्तकारों तथा व्यापारियों के अपने संगठन (श्रेणियों होते थे और वे अपने इन संगठनों का प्रशासन स्वयं लाते थे। 

3.3. सामन्त 

अर्द्ध रूप से स्वतंत्र स्थानीय सरदारों को सामन्त कहा जाता और ये सामन्त युग की राजनैतिव्यवस्था की महत्वपूर्ण विशेषता थे। हम पहले ही बता चुके हैं कि समुद्रगुप्त ने बहुत क्षेत्रों को विजयी किया और उनको अपने अधीन कर लिया। इन क्षेत्रों के कुछ से शासकों को जो गुप्त साम्राज्य की सीमाओं पर स्थित थे राजा का सहायक शासक बना दिया गया था। वे सामन्तीय शासक हो गये जिससे कि वे समयसमय पर राजा को नज़राना भेंट करते थे। उनमें से कुछ ने अपनी पुत्रियों का विवाह राजा के साथ उपहार के रूप में भी किया। वे स्वयं राजा के दरबार में उपस्थित होकर उसको प्रसन्न करने के लिए सम्मान व्यक्त करते। इसके बदले में राजा उनके अपने क्षेत्र में उनके शासन करने के अधिकार को मान्यता प्रदान रता और इसके लिये वह उनको राजपत्र भी देता। युद्ध के समय में ये सहाक शासक राजा की सेना में लड़ने के लिये अपने सैनिकों को भेजकर उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते। इन सम्मानों तथा कृतज्ञताओं के बदले में सामन्तों को उनके अपने क्षेत्रों में उस प्रशासन को चलाने के लिए छोड़ दिया जाता। 

पुजारियों और अधिकारियों को उनके निर्वाह के लिये भूमि-अनुदान दिये गये जिसके कारविकेन्द्रीकरण विशेषताओं वाली राजनैतिक व्यवस्था का प्रचलन हुआ। सामान्यतः राजा भूमि अनुदान ही नहीं प्रदान करता था बल्कि इसके साथसाथ लोगों पर कर लगाने, अपराधियों को दण्ड आदि देने के अधिकारों को भी प्रदान करता। अनुदान में दिये गये क्षेत्रों को राजा की सेनाओं के प्रवेश से भी मुक्त कर दिया जाता। यह स्वाभाविक ही था कि इस प्रकार के अनुदान प्राप्त करने वाले राजा से लगभग स्वतन्त्र हो गये और वे स्वयं ही सामन्त बन गये। इसके फलस्वरूप हम देखते हैं कि सातवीं सदी सी.. में इस प्रकार के अधिकारीगण महासामन्त जैसी भारी भरकम उपाधियां धारण करने लगे। एक सामन्त ने पांच शब्दों की क विशेष उपाधि को धारण किया जिसको पंचमहाशब्द कहा गया। यद्यपि सामन्त तथा महासामन्त के उपाधियों को धारण करने से उनकी स्वायत्तता की पुष्टि होती थी। राजनैतिक व्यवस्था में इन सब विशेषताओं के उत्पन्न हो जाने पर कुछ इतिहासकारों ने निष्कर्ष निकाला है कि गुप्त काल से जिस प्रकार की राजनैतिक व्यवस्था का जन्म हुआ वह सामन्तीप्रकार की राजनैतिक व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करती थी। 

3.4. कर प्रणाली 

सरकार को अपना अधिकतम राजस्व कर प्रणाली के द्वारा प्राप्त होता था। भाग, भोग आदि के नाम से पुकारे जाने वाले भूमि कर ही मुख्य कर थे और सदी-दर-सदी भूमि कर में वृद्धि होती रही। इस काल में व्यापार तथा वाणिज्य का पतन हो रहा था जिसके कारण व्यापारिक करों की प्रमुखता नहीं पायी जाती। यह बात विचारणीय है कि जिन स्थानों पर पुजारियों और अधिकारियों को भूमि-अनुदान दिये गये उन स्थानों से सरकाको प्राप्त होने वाले राजस्व में काफी कमी यी। 

4. न्याय व्यवस्था

पहले की तुलना में इस समय न्याय व्यवस्था काफ़ी विकसित हो गई थी। इस काल में ही विधि नियमों तथा संहिताओं का संकलन हुआ और धर्मशास्त्रों में स्पष्ट रूप से वैधानिक मामलों पर लिखा गया। 

उस समय में करण, अधिक, धर्मासन, आदि के नाम से अलग-अलग अदालतें थीं। दीवानी तथा फौजदारी मामलों में एक दूसरे से स्पष्ट विभाजन किया गया था। सम्पत्ति तथा उत्तराधिकार से संबंधित कानून स्पष्ट थे। परन्तु न्याय समाज के वर्ण विभाजन पर आधारित था। एक ही समान अपराध के लिये उच्च वर्ण से या उच्च जाति से संबंधित अपराधी को छोटे वर्ण या छोटी जाति से जुड़े अपराधी की अपेक्षा काफी कम दण्ड दिया जाता था। धर्मशास्त्रों में भी यह व्यवस्था की गई थी कि जब भी न्याय किया जाये तो उस समय विभिन्न श्रेणियों तथा जातियों की परम्पराओं और स्थानीय परिपाटियों को ध्यान में रखा जाए। 

5. उत्तर-गुप्तकाल में धर्म

प्रारंभिक भारत के धार्मिक इतिहास के विभिन्न चरणों से आप भली भांति अवगत हैं। परातात्विक सामाग्रियों से स्पष्ट है कि भारतीय धर्मों के कछ निश्चित तत्व परातात्विक संस्कृतियों में निहित थे जो वेदों के पूर्वगामी थे। ऋग्वेद के श्लोकों से स्पष्ट है कि देवताओं को प्रसन्न करने के लिये किस प्रकार से अर्चना की जाती थी। समय के साथ-साथ ऋग्वेद की सरल प्रार्थनायें जटिल अनुष्ठानों में परिवर्तित हो गई जिन पर ब्राह्मणों का प्रभुत्व कायम हो गया और इस स्थिति में ब्राह्मणों, शासकों तथा क्षत्रियों के बीच बढ़ते घनिष्ठ सम्बन्धों को कोई भी देख सकता है। न केवल घुमक्क्ड़ सन्यासियों ने जो स्थापित समाज से दूर भागते थे बल्कि बौद्ध तथा जैन धर्मों के अनुयाईयों ने ब्राह्मणों तथा उस कठोर समाज और नैतिक व्यवस्था का विरोध किया जिसकी ब्राह्मण कालत करते थे। इस प्रकार इस समय में ब्राह्मणवादी र्म विरोधी आंदोलनों का उदय हुआ (वाममार्गी या गैर सनातनी धार्मिआन्दोलन) जिनको न केवल शासक वर्ग ने समर्थदिया बल्कि धनी व्यापारियों तथा ता के अनेक र्गों से इनको समर्थन मिला। पूर्व-गुप्त काल में बौद्ध धर्म अपनी प्रगति की चरम ऊँचाइयों पर पहुँच गया; भारत की सीमाओं से बाहर इसका प्रसार हुआ र बौद्ध धर्म के केन्द्रों का व्यापक स्तर पर निर्माण हुआ। इसी बीच ब्राह्मणवादी धर्म में भी अनेक परिवर्तन हुए और इसी के साथ-साथ वाममार्गी सम्प्रदायों में भी परिवर्तन हुए। धार्मिक दृष्टिकोण से होने वाले ये परिवर्तन इसलिए भी हत्वपूर्ण थे कि पासक क्ति के द्वारा सर्वोच्च ईश्वर से बंधा था और इस प्रकार सर्वोच्च ईश्वर की उपासना एक आकार के रूप में होने लगी। वैश्णव मत तथा शैव मत ब्राह्मणवादी धर्म के ही भाग थे और इन्होंने काफी अन्यायी आकर्षित किये। इस प्रकार मूर्ति पूजा बौद्ध धर्म में भी काफी लोकप्रिय हो गई जिसके अन्तर्गत न केवल महात्मा बुद्ध या बोधिसत्व की मूर्ति की पूजा होने लगी बल्कि बौद्ध धर्म के अनेक देवताओं को पूजा जाने लगा। जैन धर्म के अन्दर भी तीरथंकर की मूर्ति, बहुत छोटे देवताओं, पत्थर के आयगपट्ट और अन्य प्रतीकों की भी पूजा होने लगी। 

इसी तरह से देवियां (शक्ति) ब्राह्मणवादी मत में महत्वपूर्ण हो गई। ब्राह्मणवादी धर्म में एकरूपता नहीं थी और धर्मों की पूजा-अर्चना तथा विश्वासों में व्यापक विभिन्नतायें थीं। शैव मत के विभिन्न सम्प्रदाय जैसे पाषुपात, कौला कापालिक, कालमुख ब्राह्मणों के प्रभुत्व का विरोध करते थे। मठों के आसपास उनकी अपनी धार्मिक व्यवस्था थी और उनको भी बहुत से राजवंशों से सहायता प्राप्त होती थी। इसी के साथ-साथ ब्राह्मणों को भी राजवंशों से सहायता प्राप्त होती थी और वे अब भी वेदों के ज्ञान के जानने वाले थे तथा वेद-यज्ञों को सम्पन्न करते। ब्राह्मणों की अग्रहार बस्तियां ब्राह्मणिक विचारों का सम्पूर्ण देश में प्रसार तथा व्यवहार करने वाली मुख्य सम्पर्क केन्द्र बन गई। इस युग में मंदिर ऐसे संस्थानों के रूप में बदल गये जहाँ पर लोग सामूहिक रूप से एकत्रित होते तथा जहाँ से ब्राह्मणिक विचारों का प्रसार भी प्रभावशाली ढंग से होने लगा। 

भारत की प्रारम्भिक मध्य काल की इस जटिल धार्मिक स्थिति में यद्यपि ब्राह्मणों ने प्रमुखता प्राप्त र ली थी। परन्तु इस सन्दर्भ में हमें निम्नलिखित बातों का भी ध्यान चाहिये।

1) रूढ़िवादी ब्राह्मणिक व्यवस्था को शैव मत के आन्तरिक आंदोलन के सासाथ कवि न्तों एवं तान्त्रिक पूजा करने वालों से चुनौतियां मिलती रहीं;

2) सभी धर्मों ने चाहे ब्राह्मणवादी धर्म हो या फिर बौद्ध मत एवं शैव मत मंदिरों एवं मठों के रूप में अपना संस्थानात्मक आधार विकसित किया;

3) समाज के शासक एवं सम्पन्न वर्गों ने ब्राह्मणों, भिक्षुओं, धार्मिक मठाधीशों, संस्थाओं और दूसरों की सहायता भूमि-अनुदानों, धन तथा अन्य साधनों से की। संरक्षण देने वाले इन कार्यों के माध्यम से समाज के शासक तथा प्रभुत्व सम्पन्न वर्गों ने अपना स्वयं का सामाजिक आधार मज़बूत किया।

5.1. भक्ति का उद्भव

ब्राह्मणवादी मत को वैदिक देवताओं इन्द्र एवं वरुण के साथ-साथ नये देवताओं विष्णु एवं शिव के बढ़ते महत्व को स्वीकार करना पड़ा। इस धारा में वासुदेव, स्कन्द जैसे नये देवताओं का भी समावेश हो गया। इन सभी कारणों वश भक्ति सम्प्रदाय का उदय हुआ। 

उत्तर-ब्राह्मणिक मत में अन्य धर्मों या सम्प्रदायों की परम्पराओं को अपने अन्दर ग्रहण करने की क्षमता का विकास हो गया। यह इसलिये भी आवश्यक हो गया कि “वामगार्मी सम्प्रदायों” ने ब्राह्मणवादी धर्म को चुनौतियां देना प्रारम्भ कर दिया था। ब्राह्मणवादी धर्म ने अन्य ये देवताओं को अपनाने के साथसाथ वैदिअनुष्ठाके स्थान पर भक्ति पर अपना बल देना शुरू कर दिया | भक्ति में यह अन्तर्निहित था कि उपासक ईश्वर के साथ अपना प्रत्यक्ष संबंकायकर सकता था। इस प्रकार ईश्वर के एकेश्वरवाद की अवधारणा विष्णु या शिव के रूप में अभिव्यक्त हुई और भक्ति शनैः-शनै: मज़बूत होने लगी। भक्ति उत्तर ब्राह्मणवादी धर्म की एक गतिशील शक्ति बन गई जिसको हिंदूवाद के नाम से जाना गया।

5.2. देवताओं का समन्वय

नये ब्राह्मणवादी धर्म की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि अनेक स्थानीय देवताओं का सांमजस्य ब्राह्मणवादी धर्म में होने लगा और जिसके कारणश एकेश्वरवादी या अद्वैतवादी महान ईश्वर की अवधारणा का विकास हुआ। इस सन्दर्भ में समन्वय होने का तात्पर्य यह था कि जिन विभिन्न देवताओं की पूजा विभिन्न लोगों के द्वारा की जाती थी उनकी पहचान को मान्यता प्रदान की गई और उनकी पूजा उसी सर्वोच्च देवता की अभिव्यक्ति के रूप में की गई। इस प्रकार वासुदेव को विष्णु रूप में बताया गया। विष्णु वेदों में वर्णित कम महत्व के देवता के समान थे और ब्राह्मणिक ग्रंथों के अनुसा, नारायण की उत्पत्ति किसी अन्धकारमय या मलिन वस्तु से हुई। बाद में विष्णु का नाम कृष्ण के साघनिष्ठ रूप से संबंधित हो गया। कृष्ण एक योद्धा तथा ग्वाले के रूप में बांसुरी बजाने वाले देवता के संयुक्त रूप का प्रतिनिधित्व करते थे। विष्णु के साथ अन्य सम्प्रदायों के देवताओं को भी संबंधित कर दिया गया। जैसे कि “वराह देवता” को जो मालवा के एक बीले का देवता था, ब्राह्मण नायक परशुराम, और रामायण के महान नायक राम को भी विष्णु के साथ संबंधित कर दिया गया। इसके बाद विष्णु भगवद् गीता वाले सार्वभौमिक ईश्वर हो गये। 

इसी भांति शिव को भी वैदिक रूद्र तथा भैरव के रूप में मान लिया गया। शिव एक बीलाई ईश्वर थे औउनकी लिंग के रूप में पूजा होने लगी। बाद में शिके साथ स्कन्द तथा हाथीमुख वाले गणेश जैसे देवताओं को सम्बन्धित कर दिया गया। ईश्वरवादी सम्प्रदायों ने वैदिक यज्ञों की अपेक्षा पूजा पर अधिक बल दिया। 

5.3. कबीलाई अनुष्ठानों का समावेश 

उत्तर-ब्राह्मणवादी धर्म की एक अन्य महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि इसने वैदिक अनुष्ठानों की सिर्फ सैधांतिक रूप में सर्वोच्चता को बनाये खते हुए कबीलाई अनुष्ठानों को अपना लिया। समय के साथ-साथ इन कबीलाई अनुष्ठानों के गुणों की तुलना वैदिक यज्ञों से की जाने लगी। आगे चलकर कबीले के पवित्र स्थलों को नये तीर्थस्थलों के रूप में कुछ मिथकों के साथ ससम्मास्वीकार कर लिया गया। इतिहास तथा पुराण ऐसी बहुत सी कहानियों से भरपूर हैं जिन्होंने व्यक्तिगत ईश्वर की ओर भक्ति को प्रेरित किया। 

5.4. मंदिरों एवं ईश्वरवाद को राजकीय संरक्षण 

पुराणों में मथुरा तथा बनारस जैसे महान धार्मिक केन्द्रों की धार्मिक यात्रा के पुण्यों पर प्रकाश डाला गया है और ये नगर महत्वपूर्ण तीर्थस्थल थे। इसके कारण मंदिर संस्था को विशेष बढ़ावा मिला। वास्तव में उस काल के पुराणों तथा अन्य ग्रंथों में ऐसे बहुत से तीर्थस्थानों के नाम दिये गये हैं जिनकी यात्रा भक्त लोग काफी बड़ी संख्या में करते थे क्योंकि इन तीर्थों पर जाने से पुण्य की प्राप्ति होती थी। मंदिर जो देवता का घर है, पूजा के स्थल बन गये र उपासना करने वाले लोग अपने घरों का परित्याकरके ऐसे स्थल की ओर पूजा करने के लिये आते थे जो सार्वजनिक केन्द्र हो गये थे। गुप्त काल में मंदिर स्थापत्यकला की जटिल शैली की नीवं पड़ी। इसने भारतीय मंदिर वास्तुकला की विशिष्ट शैलियों की भी नींव रखी। मंदिर में उनके स्थापत्य में महाकाव्यों और पुराणों में राम तथा कृष्ण से संबंधित वर्णित कहानियों के अति सुन्दर नमूने पाये गये हैं | गुप्त राजाओं ने वैष्णव तथा शैव दोनों मतों को संरक्षण प्रदान किया। गुप्त शासकों का व्यक्तिगत धर्म वैष्णव धर्म था जिसके फलस्वरूप गुप्त काल में वैष्णव धर्म के अनेक केन्द्रों तथा मूर्ति कलाओं का भरपूर विकास हुआ। छठी तथा सातवीं सदियों में वैष्णव धर्म का स्थान शैव धर्म ने ग्रहण कर लिया क्योंकि उत्तरी भारत में उसे राज्य का संरक्षण प्राप्त हुआ। शैव मत के अनुयायी उच्चतम शासकों से लेकर विदेशियों तथा भारतीयों तक के सभी वर्गों में थे। राजाओं में उसके अनुयायी मिहिकुल, यशोधर्मन, शंशाक और हर्ष थे। पाशुपत या शैव आचार्यों को समकालीन साहित्य में पर्याप्त मात्रा में उद्धृत किया गया है और इस साहित्य के अन्तर्गत अभिलेख, वराहमिहिर, बाण और हवेन-त्सांग की रचनायें भी सम्मिलित है। 

5.5. उत्तर भारतीय धर्मों का दक्षिण की ओर प्रसार 

उत्तर भारत के सभी बड़े धर्मों जैसे कि बौद्ध धर्म, जैन धर्म और ब्राह्मणवादी धर्म का प्रसार दक्षिण की ओर हुआ। ब्राह्मणवादी धर्म के साथ-साथ दक्षिण के लोवैदियज्ञों तथा गैर सनानी सम्प्रदायों, विष्णु मत और शैव मत के सम्पर्क में भी आये| राजाओं ने वैदिक अनुष्ठानों का इसलिये समर्थन किया क्योंकि ये अनुष्ठान उनकी स्थिति को मान्यता प्रदान करते थे। परन्तु ये ईश्वरवादी सम्प्रदाय सामान्य जनता के मध्य लोकप्रिहो गये। परन्तु दक्षिण भारत में अकस्मात् ही भक्ति वाले ये दोनों ईश्वरवादी सम्प्रदाय अन्य किसी धर्म से अधिक शक्तिशाली हो गये औइस तथ्य की पुष्टि इससे भी होती है कि वैष्णव मत तथा शैव मत और उनके अन्य सम्प्रदायों को राजवंशों ने संरक्षण प्रदान किया। वातापि के प्रारम्भिक चालुक्य शासकों के मध्य कुछ भागवत मत तथा कुछ ने पशुपात सम्प्रदाय को प्रचारित किया। बादामी के प्रसिद्ध पत्थर स्तम्भों पर बने चित्र, दक्कन में छठी-सातवीं सी. . शताब्दियों में ईश्वरवादी सम्प्रदायों की लोकप्रियता के प्रतीक हैं। इसी प्रकार कांची के पल्लव शासकों ने इन दोनों ईश्वरवादी सम्प्रदायों को संरक्षण प्रदान किया और इसकी पष्टि महाबलिपुरके एक ही पत्थर शिला से बने रथों तथा उन पर बने बहुत से चित्रों के द्वारा होती है। 

दक्षिण भारत में कुछ विशेष देवताओं की पूजा के इर्द गिर्द भक्ति के केन्द्रीकरण का प्रसार बड़ी तीव्रता से प्रारम्भ हुआ और इसका प्रसार ब्राह्मणों की बस्तियों तथा उन मंदिरों के माध्यम से भी हुआ जहाँ पर भूमि अनुदानों की दानशीलता के साधनों से महाकाव्यों तथा पुराणों की व्याख्याओं को संस्थात्मक किया गया। इस प्रकार भक्ति की अवधारणा आम जनता के बीच लोकप्रिय हो गई। इस सन्दर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि ब्राह्मणों ने जिस प्रकार से उत्तर भारत में प्रारम्भिक धार्मिक रूपों का रूपान्तरण मंदिर को केन्द्र बनाकर श्वरवादी संस्कृति में किया उसी प्रक्रिया को पुनः दक्षिण में भी दोहराया गया। 

6. दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन 

श्वरवादी क्ति का अन्तिम स्वरूप मुख्यतः तमिल उपासनावाद के प्रभाव का परिणाम था। यह उपासनावाद स्थानीकबीलाई सम्प्रदायों (वेलान वेरियादल) के परमानन्द तथा उत्तर ईश्वरवादी विचारों के संगम की उपज था। यह पारस्परिक सम्मिश्रण तिरुपति तथा कलाहस्ति में प्रारम्भ हुआ जिनसे उस समय के तमिल देश का उत्तरी द्वार बनता था। फिर इसका विकास कांचीपुरम के आसपास हआ जो उस समय पल्लव शासकों की राजधानी होती थी तथा शीघ्र ही यह पांडेय राजधानी मदुरई में पहुँच गया। मरुगुतिरू अरुप्पादई देवता पर लिखा गया एक प्रसिद्ध उपासना वाला ग्रंथ है और इसमें स्थानीय कबीलाई देवता मुरुगन को स्कन्द का अवतार बताया गया है तथा पारस्परिक प्रजनन का सबसे पहला दाहरण है। 

शीघ्र ही तमिल उपासनावाद एक आंदोलन के रूप में उस समय विकसित हो गया जब इसने वैष्णव मत तथा शैव मत के दोनों ईश्वरवादी सम्प्रदायों को स्वीकार कर लिया। तब भक्ति आंदोलन देवता की पूजा करके गहन परमानन्द प्राप्त करने वाला ही न होकर वह उन ईश्वरवादी सम्प्रदायों के विरूद्ध एक आक्रामक आवेग हो गया जो राजकीय समर्थन के साथ जनता में लोकप्रिय होते जा रहे थे। 

इस आंदोलन का प्रसार छठी सदी सी.ई. में उन प्रतिभाशाली कवि सन्तों द्वारा किया गया जिन्होंने धर्म प्रचार के लिये कई बार देश का भ्रमण किया। वे अपने सारे रास्ते गीतों को गाते चते, नाच करते और वाममार्गी सम्प्रदायों के साथ वाद विवाद करते। इन कवि सन्तों में शैव मत के अनुयाइयों को “नयनार” के नाम से तथा वैष्णव सन्तों को “अलवार” के नाम से जाना जाता था। 

इस महान उत्साहवर्धक धार्मिक धारा का चरमोत्कर्ष प्रारम्भिक सातवीं सदी सी.ई. में हुआ और इसकी अन्तिम विजय आगामी दो सदियों में हुई। इस काल के गायक कवि सन्तों की मुख्य विशेषता ह थी कि वे बौद्ध मत तथा जैन मत के विरूद्ध घृणात्मक तरीके से बोलते थे। इसके परिणाम स्वरूप सार्वजनिक वाद विवाद, आश्चर्यजनक कार्यों को करने की प्रतियोगिता और अपने सिद्धान्तों की सत्यता के सिद्ध करने के लिए कठिन से कठिन परीक्षा को अपनाना दिन प्रतिदिन के कार्य हो गये। 

इन गायक सन्तों की सफलता का अन्य कारण भी था। इन गायक सन्तों ने जन साधारण की भाषा तमिल में सरलता से समझ में आ जाने वाले तरीकों से अपनी चनाओं को गाया। उन ब्राह्मणों की भांति नहीं जो गोपनीय सिद्धांतों तथा संस्कृत भाषा के माध्यम से हिन्दू धर्म का प्रचार करते थे। भक्ति की अवधारणा के अनुसार श्रेष्ठतम देवता के लिये कोई विशेष सम्मान न करने अपितु उनके प्रति असीम प्रेम भाव को प्रकट करना था। भक्ति आंदोलन की इस शक्तिशाली धारा को राज्य का भी समर्थमिला जिसके कारण जैन तथा बौद्ध मत इसका सामना न कर सके और दक्षिण भारत में ये दोनों धर्म मृतप्रायः हो गये। 

6.1. दक्षिण भारत के भक्ति आंदोलन में प्रतिरोध एवं सुधार और भक्ति आंदोलन का बाद में रूपान्तरण 

जहाँ एक ओर ब्राह्मण जातिवादी नियमों का अनुसरण करते थे वहाँ भक्ति सम्प्रदाय ने न केवल जाति की अवेहलना की बल्कि उन्होंने अपने सम्प्रदाय में सभी जातियों के पुरुषों और स्त्रियों को सम्मिलित किया। नयनारों में कराईक्कल अम्माई एक महिला तथा नंदनार एछोटी जाति का सदस्य था। अलवरों में अन्दाल एक महिला थी और निरुप्पन छोटी जाति का था जो क्ति गीतों को गाता था। इस प्रकार सम्पूर्ण भक्ति आंदोलन के अन्तर्गत विरोध एवं सुधार के तत्व मौजूद थे। परन्तु शीघ्र ही यह स्थापित व्यवस्था का एक अंग बन गया तथा इसको भी रूढ़िवादी ब्राह्मणों का संरक्षण प्राप्त हो गया। 

क्ति आंदोलन का विकास तथा संगठन प्रारंभिक मध्यकाल के राजतन्त्रों की भांति पहले पल्लवों एवं फ़िर चोल, पाण्डेय और चेरों के अधीन हुआ। पत्थर की चट्टानों से काटकर बनाए गए मंदिर और स्थापत्य कला के प्रतीक सुंदर मंदिरों का निर्माण विष्णु एवं शिव के लिये सम्पूर्ण तमिलनाडु में उपरोक्त राजतन्त्रों के शासन काल में हुआ। 

इन मन्दिरों के लिये भूमि अनुदानों में प्राप्त हुई तथा कभी-कभी कर मुक्त विशाल भूमि भी थी। दक्षिण भारतीय मंदिरों की दीवारों पर खुदे हजारों दान अभिलेखों से स्पष्ट है कि ब्राह्मणों को भूमि का विशाल क्षेत्र अनुदान में प्रदान किया गया। शीघ्र ही पुरोहित और राजा की एक धुरी कायम हो गई। राजाओं ने मंदिरों पर केन्द्रित भक्ति अवधारणा का स्वागत किया क्योंकि यह राजतन्त्र की विचारधारा के अनुकूल थी। ब्राह्मणों ने इसका स्वागत इसलिये किया क्योंकि ब्राह्मणवादी मत को मंदिर केन्द्रीकृत कृषि बस्तियों के रूप में संस्थात्मक आधार प्राप्त हो गया जिसके फलस्वरूप उसका दक्षिण में उत्थान एक गतिशील शक्ति के रूप में हुआ।

सभी जगहों पर मंदिर धार्मिक जीवन तथा नये सामाजिक निर्माण के मुख्य केन्द्र थे। ये मंदिर ब्राह्मणिक व्यवस्था की दो भुजाओं अर्थात् वैदिक अनुष्ठानिक सम्प्रदाय तथा ईश्वरवादी सम्प्रदायों के मिलन बिन्दु के केन्द्र बन गये | मंदिर केन्द्रित भक्ति सम्प्रदाय की अवधारणा के कारण दक्षिण भारत के पुराने कबीले जाति व्यवस्था को स्वीकार करने की ओर आकर्षित हुए और जिससे उन्होंने पदानुक्रम जाति व्यवस्था को श्रेणीबद्ध कर लिया। इस व्यवस्था ने कबीलों के लिये अनुष्ठानों तथा सामाजिक स्तरों को ब्राह्मणों के द्वारा निश्चित किये गये नियमों के अनुरूप ही निश्चित कर दिया। भक्ति की विचारधारा के माध्यम से राजाओं, पुरोहितों तथा आम जनता को अपनी सौहार्दपूर्ण सामाजिक संबंधों के ढांचे के अन्तर्गत एक साथ लाया जा सका।

राजाओं तथा जमींदारों के बढ़ते संरक्षण के कारण शीघ्र ही भक्ति आंदोलन व्यवस्था का एक अंग बन गया। दसवीं सदी सी.ई. में सभी प्रकार के धार्मिक मतभेदों, विरोध तथा सुधार को समाप्त कर दिया गया। अलवार तथा नयनार अब कहीं दिखायी नहीं पड़ते थे। उनका स्थान वैष्णव आचार्यों ने ले लिया जो सभी ब्राह्मण थे या फ़िर शैववादी सनातनाचार्य जो धनी भूस्वामी वेल्लला जाति से आये थे।

7. तंत्रवाद की उत्पत्ति 

ऐसी धार्मिक क्रियायें जिनकी उत्पत्ति गैर आर्य कबीलाई लोगों के अति प्राचीन प्रजनन संस्कारों से हुई थी उनको बाद में चलकर तन्त्रवाद के नाम से जाना गया। इसने न केवल अन्य “साम्य” सम्प्रदायों (जैन म, बौद्ध मत, शैव मत, वैष्णव मत आदि) को प्रभावित किया बल्कि इसका उद्भव उन सम्प्रदायों के लिये चुनौती एवं प्रतिक्रिया के रूप में हुआ जिनके अन्तर्गत निहित स्वार्थ उत्पन्न हो गये थे और जो प्रारम्भिक मध्यकाल के आते आते व्यवस्था का एक अंग बन गये। 

7.1. तंत्रवाद की कुछ मुख्य विशेषतायें

सभी कबीलाई क्षेत्रों में महिलाओं को उच्च स्थान प्राप्त था। जिस समय से उनको संस्कृत के ग्रंथों में शूद्रों की श्रेणी में रखा जाने लगा ब से अपना परम्परागत अनुष्ठानिक स्तर बनाये रखने के लिये यह आवश्यहो गया कि वे तांत्रिक क्रियाओं के साधनों को अपनायें। 

तन्त्रवाद में देवियों या देवी माता का महत्व इस कारण से था कि सभी कबीलाई क्षेत्रों में देवी शक्ति या देवी माता के सम्प्रदाका लोकप्रिय प्रचलन था। इन बीलाई देवियों का प्रवेश ब्राह्मणवादी धर्म में शक्ति के रूप में, बौद्ध धर्म में तारा तथा जैन धर्म में बहु संख्यक यक्षिणियों के रूप में हुआ। प्रारंभिक ध्यकाल का प्राकृत भाषा का ग्रंथ गौडवाह काली एवं पार्वती देवियों को कोल और सबर कबीलों से संबंधित करता है। शक्ति मतंगी (मतंग कबीले की देवी) और चंडाली (चंडालों की देवी) ने नामों से भी जानी जाती है। गुप्त काल के अंत तक विभिन्न कबिले की देवियों का उच्च सम्प्रदायों में मिलन हो गया। इसी के साथ-साजादू वाले संस्कारों और पशु बलि की एक नई रीति भी सम्मिलित हुई। तन्त्रवाद का एक धर्म के रूप में उदय छठी सदी सी.ई. में हुआ और नौवीं सदी में एक शक्तिशाली मत बन गया

इस वास्तविकता के बावजूद प्रारंभिक मध्यकाल में तन्त्रवाद अपने मूल चरित्र को खो चुका था और इसे भी राजाओं, अधिकारियों और उन उच्च वर्गों के द्वारा जिन्होंने इसका संस्कृतिकरण किया, ने संरक्षण प्रदान किया परन्तु फिर भी तन्त्रवाद संगठित एवं औपचारिक संरक्षण प्राप्त, ब्राह्मणवादी धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म के लिये एक चुनौती बना रहा।

तन्त्रवाद के पुरोहितों ने ब्राह्मणवादी धर्म के दीक्षा वाले संस्कारों को भी चुनौती दी। अगर ब्राह्मणों ने अपनी सर्वोच्चता का दावा वैदिक अनुष्ठानों के आधार पर किया तो कबिलापुरोहितों ने अपनी जादुई शक्तियों का दावा अपने रहस्यवादी अनुष्ठानों तथा यौवन योग क्रियाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया। इस प्रकार तन्त्रवाद ने उन छोटी जातियों और महिलाओं को दीक्षा प्रदान करके जिनको ब्राह्मणिक व्यवस्था ने समाज में निम्न स्थान प्रदान किया था, महत्वपूर्ण सामाजिक लक्ष्य की सेवा की।

तांत्रिक पुरोहितों ने अनेक अनुष्ठानों पर अपने स्वामित्व का दावा किया, जैसे कि वे गूढ़ क्रियाओं और जड़ी बूटियों से न केवल सांप के काटने, कीड़ों मकोड़ों के काटने और अन्य बीमारियों का इलाज करते थे बल्कि उन्होंने भूत प्रेतों एवं ग्रहों के बुरे प्रभावों को भी दूर करने वाले अनुष्ठानों को सम्पन्न करने का काम किया। इस प्रकार प्रारंभिक मध्यकाल के तान्त्रिक पुरोहितों ने पुरोहित, चिकित्सक, ज्योतिषि एवं पशमन (ओझा) का कार्य किया। 

7.2. तन्त्रवाद तथा वाममार्गी धर्म

तन्त्रवाद ने बौद्ध मत, जैन मत एवं ब्राह्मणिक विचारधारा में भी प्रवेश किया। प्रारंभिक बौद्ध धर्म तथा जैन धर्म ने इन तान्त्रिक क्रियाओं के प्रभाव को अपने सम्प्रदायों पर पड़ने से रोकने के लिए भसक प्रयास किया। बौद्ध मत तथा जैन मत ने अपने इतिहास के प्रारंभिक दौर  में मूर्ति पूजा, नैतिक मूल्यों को नष्ट करने वाले अनुष्ठानों तथा बलि यज्ञों के विरूद्ध व्यवस्थित ढंग से अभियान चलाया। उन्होंने आत्मा की पवित्रता पर बल दिया क्योंकि इसी से निर्वाण या मुक्ति प्राप्त की जा सकती थी।

महायान मत ने स्वयं को मन्त्रवाले मत या आंध्र प्रदेश के क्षेत्रों में तान्त्रिक प्रक्रियाओं को धारण करते हुए वजयान मत के रूप में विकसित कर लिया। आन्ध्र तथा कलिंग प्रदेशों में तीसरी सदी सी.ई. में लिखे जाने वाले अनेक तांत्रिक ग्रंथों ने वंगा तथा मगध में तन्त्रवाद का प्रसार किया और पाल शासकों के शासन काल में मगध क्षेत्र नालन्दा तान्त्रिक अध्ययन के केन्द्र के रूमें विकसित हुआ | वजयान तान्त्रिक साहित्य इतना विशाल है कि तिब्बत भाषा में जो साहित्य पाया गया है उसकी नाममात्र की सारिणी तीन खण्डों में संकलित हो गई है।

कॉमन एरा की प्रारंभिक सदियों में जैन धर्म में भी मूर्ति पूजा एवं अनुष्ठानों की रीति प्रकट होने लगी। पुराणों और अन्य साहित्य में इस पर बल दिया गया कि आदिनाथ के उपासक शत्रुओं, बीमारियों एवं बुरी आत्माओं पर विजय प्राप्त कर सकते हैं। प्रारम्भिक मध्यकाल में तन्त्रवाद ने अन्य धर्मों की भांति जैन धर्म पर भी अपना प्रभाव डाला। फलस्वरूप, जैन धर्म ने यक्षों तथा यक्षियों (तीर्थंकरों के देव एवं देविया) के लिए देवालयों का निर्माण किया और इसी के साथ कुछ मन्त्रों (जादुई मन्त्र) को विकसित किया जिससे कि उको तुष्ट किया जा सके। जैन तान्त्रिक ग्रंथों में जिनमें जादूई तथा आश्चर्यचकित तत्वों को शामिल किया गया, तथा उनके पद्मावति, अम्बिका, सिद्धायिका और ज्वालामालिनी जैसी यक्षियों के सम्प्रदाय की भी महिमा की गई। ऐसा विश्वास किया जाता था कि ये यक्षियां अपने भक्तों को दिव्य शक्तियां प्रदान करती थी। जैन धर्म के यपनिया सम्प्रदाय ने प्रारम्भिक मध्य काल के कर्नाटक में तान्त्रिक रीति की पूजा का काफी प्रचार किया। 

8. उत्तर-गुप्तकाल में संस्कृति 

उत्तर-गुप्त काल में भी कला, वास्तुकला, साहित्य और कविता के क्षेत्रों में महान उपलब्धियों को देखा गया। मंदिर निर्माण की शुरुआत गुप्त काल में हुई, जैसा कि इकाई 2 में संक्षेप में उल्लेख किया गया है। गुप्तोत्तर काल से उत्तर और दक्षिण भारत, दोनों में, मंदिर निर्माण की दक्षता के प्रमाण हमारे मक्ष उपलब्ध हैं। मंदिरों का स्तर, परिणाम और भव्यता भी कई गुना बढ़ गए। वास्तुकला की कई विशेषताएं, जैसे कि भू-चित्र/भू-योजना, हले की शैलियों से विकसित हुईं। मंदिर की सपाट छत का स्थान अब ऊँची केन्द्रीय मीनार ने ले लिया जिसे शिखर के रूप में जाना जाता है। साथ-साथ, अब मुख्य तीर्थ स्थल के साथ सहायक तीर्थ स्थलों पर भी छोटे शिखर दृष्टिगोचर होने लगे। पुराण साहित्य में परिलक्षित होते पौराणिक हिन्दू धर्म में अक्सर एक मुख्य देवता जैसे कि विष्णु अथवा देवी को परिचारक देवियों या देवों की संगत और मेज़बानी के साथ दर्शाया गया है और यह उनको समर्पित मंदिर परिसरों में प्रतिबिंबित होता है। अतिरिक्त विशेषता के रूप में शिखर ने अलंकरण के संदर्भ में प्रयोग के लिए पर्याप्त गुंजाइश प्रदान की। शिखर समृद्ध एवं उत्कृष्ट रूप से नक्काशीदार थे तथा मूर्तियों के माध्यम से सुशोभित थे। गुप्त काल से एक और प्रस्थान अथवा बदलाव यह था कि पूजा-उपासना के छोटे स्थलों का स्थान विशालकाय वनों ने ले लिया और इस प्रकार गुप्तोत्तर काल से हमें मंदिरों के बढ़ते आकार का स्पष्ट प्रमाण मिलता है। ये मंदिर परिसर कई प्रकार के कार्यों के लिए प्रयुक्त होने लगे। उदारहण स्वरू, ये राजाओं के राज्याभिषेक तथा जुलूस समारोहों के लिए प्रयुक्त होने लगे, जैसा कि इन मंदिरों की कई मूर्तिकला की पट्टिकाओं के द्वारा दर्शाया गया है। मंदिर शाही सत्ता का प्रतीक भी बन गया, इलिए राजाओं ने अपनी शक्ति, साम्राज्य और शासन को अभिव्यक्त करने के लिए भव्य एवं बृहत्काय मंदिरों का निर्माण कवाया। दूसरा, अब संपूर्ण मठों को मंदिरों के प्रांगन में स्थापित किया जाने लगा, ठीक उस तरह जैसे बौद्ध संघ को स्तूप के समीप स्थापित किया जाता था। ये मठ धार्मिक शिक्षा के केन्द्र बन गए जहाँ पुराणों, रामायण और महाभातथा अन्य महत्वपूर्ण रचनाओं का पेशेवर आख्यानों द्वारा कथन और वादन किया जाता था। 

साहित्य के क्षेत्र में, संस्कृत को प्रदान किया गया संरक्षण जारी रहा। वास्तव में, गुप्तोत्तर काल में शास्त्रीय (Classical) संस्कृत की उत्तमता तथा परिपक्वता को देखा गया। भरवी, कुमारदास एवं दंडित जैसे बड़े पैमाने पर विख्यात कवि और विशाखदत्त जैसे महान नाटककार इस युग में रहते थे। गणित, खगोल विज्ञान और चिकित्सा जैसी ज्ञान की विभिन्न शाखाओं में एक नए सिरे से रुचि के साथ-साथ मीमासा और न्याय जैसे दर्शन के अध्ययन के विभिन्न नए विषय इस अवधि में विकसित हुए। सम्राट हर्ष विदवता के उत्कगुणज्ञ और संरक्षक थे। वे स्वयं एक कवि, नाटककार तथा तीन नाटकों के रचयिता थे। उनके दरबारी-कवि बाणभट्ट ने र्षचरित (हर्ष की जीवनी) एवं कादम्बरी की रचना की। नके दबार में दूर-दूर से कवि, नाटककार, दार्शनिक व चित्रकार आते थे। उनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने प्रसिद्ध कन्नौज सभा का गठन किया था जिसमें अनेक प्रकांड विद्वानों ने भाग लिया था। 

समकालीन पौराणिक साहित्य का एक महत्वपूर्ण योगदान वंशानुवलियों अर्थात राजाओं तथा राजवंशों का सूचीबद्ध लेखन है जिसे इतिहास-पुराण पंरपरा के व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। यह उन लोगों की आलोचना का उत्तर है जो तर्क देते हैं और आरोप लगाते हैं कि प्राचीन भारतीयों में इतिहास की भावना का अभाव था। गुप्तोत्तर राज्यों ने अपना इतिहास स्वयं लिखना आरंभ किया, जिसका प्रमाण राजाओं द्वारा जारी किए गए शिलालेखों, की जीवनीयों (रित-साहित्य) व उनके कालक्रम-संबंधी कृतियों आदि से मिलता है। उदाहरण के लिए, हर्षचरित र्ष के सिंहासन पर विराजमान होने का वर्णन करता है, संध्याकारनंदिन के रामचरित में पाल शासक रामपाल द्वारा कैवर्तों के विद्रोह को कुचलने तथा अपनी सत्ता के पुनःस्थापना का विवरण दिया गया है। इस समय में लोगों की ऐतिहासिक चेतना का एक और प्रमाण उन ग्रंथों से मिलता है जिनका दिनांकन अब युगों/कालचक्रों के आधार पर होने लगा, जैसे कि 606 का हर्ष-युग (Harsh Era of 606)। इन युगों की शुरुआत एक राजा या राजवंश के प्रारंभ से मानी जाती थी, परन्तु इनकी गणना पंचांगआधारित परंपराओं अथवा खगोलीय पर्यवेक्षणों के आधार पर की जाती थी, जिससे इस युग के लोगों द्वारा समझे गए समके ऐतिहासिक महत्व का संकेत मिलता है।