भारतीय इतिहास की प्रकृति विशेषताएं एवं संरचना

इस पेज की विषय वस्तु

1 प्रस्तावना

2 प्राकृतिक भूगोल और इतिहास ,2.1 पर्यावरण और मानव बस्तियाँ , 2.2 भौगोलिक नियतत्ववाद के विरुद्ध तर्क

3 आधारभूत भू-आकृतिक विभाजन

4 क्षेत्रीय प्राकृतिक विशेषताएँ  4.1 हिमालय और पश्चिमी सीमा प्रदेश 4.2 सिन्धु का मैदान 4.3 गांगेय उत्तरी भारत 4.4 पूर्वी पश्चिमी और मध्य भारत 4.5 प्रायद्वीपीय भारत 4.6 सुदूर दक्षिण

5 क्षेत्रीय परिवर्तन के कारण 5.1 ऐतिहासिक क्षेत्रों के उदय की असमान प्रक्रियाएँ 5.2 मृत्तिका कला के प्रमाण 5.3 साहित्यिक प्रमाण

6 भारतीय इतिहास में क्षेत्रों की महत्ता 6.1 चक्रवर्ती संकल्पना

7 क्षेत्रों की श्रेणीबद्धता 7.1 बुनियादी भौगोलिक प्रभाव 7.2 केंद्रीय क्षेत्र 7.3 समय एवं स्थान के संदर्भ में अधिवासिय (बस्तियों) की संरचना

8 प्राचीन भारत में कुछ क्षेत्रों का गठन 8.1 गांगीय घाटी 8.2 तमिल देश 8.3 दक्कन : आंध्र एवं महाराष्ट्र 8.4 कलिंग एवं प्राचीन उडीशा 8.5 उत्तर-पश्चिम

9 सारांश

1 प्रस्तावना

बिना भूगोल के इतिहास प्रायः अधूरा रहता है और अपने क प्रमुख तत्व से वंचित हो जाता है, यानी स्थान की अवधारणा के अभाव में तिहास अपने लक्ष्य से भटक सकता है। यही कारण है कि इतिहास को मानव जाति के इतिहास और पर्यावरण के इतिहास, दोनों के रूपों में ही देखा जाता है। इन दोनों को अलग करना कठिन है। मानव इतिहास और पर्यावरण का इतिहास दोनों ही परस्पर एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। मिट्टी, वर्षा, वनस्पति, जल वायु और पर्यावरण मानव संस्कृतियों के क्रमिक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वस्तुतः मानव प्रगति का सार प्रकृति को नियंत्रित करके मानव जीवन को बेहतर बनाने में है। इस सम्बन्ध में तकनीकी प्रगति पर्यावरण को अपने नियंत्रण में लाने में मनुष्य की मदद करती है। मनुष्य प्रभावशाली ढंग से अपने पर्यावरण पर नियंत्रण स्थापित करने में इतिहास के बहुत आगे के चरण में ही सफल हो पाया। अतः जब हम अपने अतीत को समझने का प्रयास करते हैं तो यह आवश्यक हो जाता है कि हम उस भूगोल, पर्यावरण और उन प्राकृतिक क्षेत्रों को समझने और जानने का प्रयास करें जिन्होंने भारतीय इतिहास को प्रभावित किया। इस इकाई में हम आपको भारतीय उपमहाद्वीप की उन प्राकृतिक विशेषताओं से अवगत कराने का प्रयास करेंगे जिनका कि भारत के ऐतिहासिक विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है।

भारतीय उपमहाद्वीप कई क्षेत्रों से मिलकर बना है और प्रत्येक क्षेत्र की अपनी विशेषताएँ हैं। देश के ऐतिहासिक उद्भव की प्रक्रिया में क्षेत्रों ने विशेष सांस्कृतिक विशेषताएँ ग्रहण की तथा कई आधारों पर जैसे ऐतिहासिक परंपरा, भाषा, सामाजिक संगठन, कला आदि के माध्यम से हम एक क्षेत्र से दूसरे की भिन्नताओं को इंगित कर सकते हैं। इस प्रकार भारतीय इतिहास में समान सामाजिक तथा सांस्कृतिक रीतियों एवं संस्थाओं तथा साथ ही क्षेत्रीय विशिष्टताओं की संरचना के स्थायित्व की दोहरी प्रक्रिया देखने को मिलती है।

यह भी ध्यान देने योग्य तथ्य है कि इतिहास में क्षेत्रों के उदय की प्रक्रिया का स्वरूप असमान रहा है। अतः वर्तमान की भांति भूत में भी विभिन्न क्षेत्रों में ऐतिहासिक परिवर्तन की प्रक्रिया में काफी असमानताएँ रही हैं। यद्यपि कोई भी क्षेत्र कभी भी पूरी तरह से कटा हुआ नहीं रहा है। इस इकाई में भारतीय इतिहास के क्षेत्रों के गठन की प्रक्रिया तथा क्षेत्रीय विभिन्नताओं पर प्रकाश डाला जाएगा। स्थान एवं काल के आधार पर भारतीय समाज के उद्भव के विभिन्न चरणों में भिन्नता को समझने के लिए भारतीय उप महाद्वीप का गठन करने वाले क्षेत्रों के स्वरूप की जानकारी अत्यावश्यक है। 

2 प्राकृतिक भूगोल और इतिहास

मिट्टी, स्थलाकृति, वर्षा और जलवायु की विविधता ने अलग-अलग प्रकार के अनेक ऐसे क्षेत्र बनाए हैं जिनके प्राकृतिक लक्षण और पहचानें भी अलग-अलग हैं। प्राकृतिक क्षेत्र सांस्कृतिक क्षेत्रों के अनुरूप होते हैं। इन भिन्न प्राकृतिक क्षेत्रों में सांस्कृतिक विकास ही भिन्न प्रकार का रहा है। तात्पर्य यह है कि ये क्षेत्र भाषा, बोली, पोषाक, फसल, जनसंख्या घनत्व, जाति, संरचना आदि की दृष्टि से एक दूसरे से भिन्न हैं। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश और उत्तरी बिहार जैसे कुछ क्षेत्रों में, यानी गंगा घाटी के उपजाऊ मैदानों में, जनसंख्या घनत्व बहुत अधिक है। जबकि पठारी मध्य भारत की बसावट काफी छितरी हुई है। इसी प्रकार मगध, कौशल, अवन्ति, महाराष्ट्र, आंध्र, कलिंग और चोल देश जैसे कुछ क्षेत्र प्रारंभ में विकसित क्षेत्रों के रूप में उभरे, जबकि अन्य क्षेत्र विकास की दृष्टि से पिछड़े रहे। ऐतिहासिक रूप से विभिन्न प्रदेशों के उद्भव की प्रक्रिया असमान रही और विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न प्रकार की प्रवृत्तियों का विकास हुआ जो मुख्य रूप से भूगोल और पर्यावरण से संबंधित थीं और उनसे प्रभावित थीं। एक अन्य उदाहरण में हम देखते हैं कि गेहूं पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों का मुख्य भोजन है जबकि बंगाल, बिहार और उडीशा जैसे पूर्वी भारत के प्रदेशों के लोगों का मुख्य भोजन और वहाँ की मुख्य फसल चावल है। ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है कि

  • विभिन्न फसलों के प्राकृतिक वास क्षेत्र भिन्न होते हैं;
  • वे फसलें विशेष प्राकृतिक परिस्थितियों में उगती हैं; और
  • समय के साथ बाद में ये फसलें उस स्थान विशेष के लोगों की भोजन सम्बन्धी आदतों  को प्रभावित करती हैं। इसी प्रकार सिंचाई के साधन भी अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग हैं।
  • नदियों और नहरें उत्तर भारत में सिंचाई का सर्वाधिक प्रमुख साधन रहे हैं; 
  • प्राकृतिक तालाब पूर्वी भारत में बहुत उपयोगी रहे हैं; 
  • जलाशयों द्वारा सिंचाई ने दक्षिण भारत की कृषि में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

इन भिन्नताओं का अर्थ यह नहीं है कि पूर्वी या दक्षिणी प्रदेशों में नदियों का महत्त्व नहीं रहा। है। बल्कि इनसे जो बात सामने आती है वह यह है कि विभिन्न प्रदेशों में जल संसाधनों में वृद्धि के लिए लोग विभिन्न तरीके अपनाते हैं। एक क्षेत्र विशेष में अपनाया गया तरीका इस बात पर निर्भर करता है कि वह उस क्षेत्र के लिए कितना उपयोगी है। भूगोल और पर्यावरण, वस्त्र शैलियों के संबंध में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उदाहरण के लिए, हम कश्मीरी, राजस्थानी तथा तटवर्ती क्षेत्रों में रहने वालों के वस्त्र और उनके पहनने ओढ़ने के तरीकों की तुलना कर सकते हैं। विभिन्न प्रदेशों की वस्त्र शैलियों पर उन प्रदेश की जलवायु और पर्यावरण का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। गंगा के मैदान और डेल्टा उन्नत संस्कृतियों के जन्म स्थान रहे हैं, और यहाँ उनका युगों तक पोषण भी हुआ जबकि मध्य भारत के पर्वतीय इलाकों में अलग-अलग क्षेत्रों के आदिवासी लोगों की अच्छी बसावट रही है। इस तरह जहाँ नदियों के मैदानों में भरपूर प्राकृतिक सम्पदा रही है और मैदानी लोगों का अपना एक विशिष्ट जीवन रहा है, वहाँ अलग-अलग क्षेत्रों में बसे लोगों का जीवन अन्य भू-क्षेत्रों में प्रगति से अप्रभावित रहा। इसलिए भारतीय उपमहाद्वीप की वस्त्र शैली से संबंधित या भोजन सम्बन्धी आदतों या संस्कृतियों से सम्बद्ध विविधताओं के सहअस्तित्व को यहाँ के प्राकृतिक भूगोल के संदर्भ में ही ठीक से समझा जा सकता है। प्राकृतिक भौगोलिक परिस्थितियों द्वारा पोषित क्षेत्रीय भिन्नताएँ और उनसे संबंधित भिन्न क्षेत्रीय पहचानें भारतीय इतिहास में स्थायी अखिल भारतीय राज्यों के उदय के मार्ग में बाधा बनी रही हैं। समूचा भारतीय उपमहाद्वीप कभी भी एक राजनीतिक इकाई नहीं रहा। यह बात मौर्य साम्राज्य, दिल्ली सल्तनत, मुगल साम्राज्य और साथ ही ब्रिटिश भारत पर समान रूप से लागू होती है। साथ ही यहाँ यह बताना भी आवश्यक है कि हालांकि भौगोलिक संरचनागत क्षेत्रीय विविधताओं ने हमारे इतिहास में अखिल भारतीय राज्यों के विकास में बाधा पैदा की फिर भी इन विविधताओं ने किसी भी काल में विभिन्न राष्ट्रीयताओं को जन्म नहीं दिया। 

2.1 पर्यावरण और मानव बस्तियाँ 

प्राकृतिक भूगोल मानव बस्तियाँ और बसावट की शैलियों का परस्पर सम्बन्ध एक और ऐसा महत्त्वपूर्ण विषय है जिस पर ध्यान देने की जरूरत है। उदाहरण के लिए, सिंध प्रदेश आज अपेक्षाकृत गर्म और शुष्क है क्योंकि इस क्षेत्र में वर्षा बहुत कम होती है। फिर भी हम जानते हैं कि अतीत में इसी क्षेत्र के अधिकांश भागों में हड़प्पा की सभ्यता का विकास हुआ था। कुछ विद्वानों का मत है कि उस समय इस क्षेत्र की जलवायु नम रही होगी और वर्षा भी अपेक्षाकृत अधिक होती होगी, जिके कारण यहाँ उच्चस्तरीय सभ्यता का विकास हो सका और लम्बे समय तक यह सभ्यता बनी रह सकी। कुछ विद्वानों द्वारा यह तर्क भी दिया जाता है कि प्राकृतिक संसाधनों के अत्यधिक दोहन के कारण प्राकृतिक वनस्पति के क्षेत्र को नुकसान पहुँचा और साथ ही शुष्क जलवायु पैदा होने से लोगों के जीवन-निर्वाह का आधार ही खतरे में पड़ गया। इस प्रकार यह सभ्यता नष्ट हो गई (इस विषय पर विस्तृत जानकारी के लिए देखें इकाई 5)। अनुपयोगी भौगोलिक स्थितियों और भूमि तथा संसाधनों पर पड़ने वाले संभावित जनसंख्यात्मक दबाव ने लोगों को सभ्यता के इस केंद्र से पलायन करने पर मजबूर कर दिया। इस प्रकार यह सभ्यता धीरे-धीरे नष्ट हो गई।

दूसरी ओर मगध साम्राज्य की सफलता और इस साम्राज्य द्वारा स्थापित किया गया राजनीतिक प्रभुत्व हमें आश्चर्य में डाल देता है। इसके क्या कारण थे? यह तर्क दिया जा सकता है कि इस साम्राज्य की स्थापना में कई तत्व सहयोगी बने : 

  • अत्यधिक उपजाऊ जमीन; 
  • पर्याप्त वर्षा और उससे होने वाली धान की वार्षिक अच्छी फसल; 
  • लोहे की खानों तथा छोटा नागपुर पठार के पत्थर और लकड़ी के स्रोतों का निकट होना;
  • नदियों द्वारा पर्याप्त संचार और व्यापार की सुविधा उपलब्ध कराना;
  • मानव बस्तियों की निकटता और निरंतरता, जो बहुत कुछ इन प्राकृतिक सुविधाओं के  कारण संभव हुई, अत्यधिक जनसंख्या घनत्व की ओर इशारा करती है।

संयुक्त रूप से इन तथ्यों ने आसानी से उत्तरी गांगेय मैदान पर विजय प्राप्त करने में मदद D दी। वास्तव में इन्हीं कारणों से सिंधु-गांगेय का मैदानी प्रदेश, कृषि उत्पादकता और जनसंख्या की दृष्टि से अन्य प्रदेशों से आगे था। उत्तरी मैदानों की ओर सीमाई विस्तार से उस समय निर्विवाद भारतीय सर्वोच्चता की स्थापना का आधार मिला। इस तरह इस क्षेत्र में एक के बाद एक घटने वाली घटनाओं को एक क्रम में देखा जा सकता है। मगध राज्य का भारत पर अधिपत्य उसकी उत्तरी मैदानों की विजय पर आधारित था। इन मैदानों की भूमि, वर्षा, वनस्पति, सहज संचार सुविधा और अन्य प्राकृतिक संसाधनों की उपलब्धि ने मगध साम्राज्य को शक्तिशाली बनाने में मदद की।

मगध के राजनीतिक प्रभुत्व के बढ़ने से इसकी राजधानी पाटलीपुत्र उत्तरी भारत की राजधानी बन गई। साम्राज्यवादी राजधानी के रूप में पाटलीपुत्र का महत्त्व कई शताब्दियों तक बना रहा। पाटलीपुत्र के उत्थान और पतन के अनेक भौगोलिक कारण गिनाए गए हैं। पाटलीपुत्र के इतिहास के प्रारंभिक दिनों में गंगा, सोन और गंडक जैसी नदियाँ उसे प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करती थीं। साथ ही व्यापार और परिवहन की सहज सुविधाएँ भी देती थीं। लेकिन प्रथम सहस्त्राब्दि सी.ई. के मध्य तक लगातार बाढ़ों के कारण इन नदियों का महत्त्व कम हो गया। यह सर्व विदित है कि गुप्त काल और उत्तर गुप्त काल में व्यापार की क्षति हुई और नगरों का पतन हुआ। गुप्त काल और उत्तर गुप्त काल में उत्तर भात में व्यापार और वाणिज्य के पतन के साथ मानव गतिविधियों के कम हो जाने और गंगा नदी का मार्ग बदल जाने से इन नदियों की उपयोगिता कम हो गई। इस काल में गांगेय उत्तर भारत में नगरों के पतन के कारणों में आंतरिक क्षेत्रों में वनों की कटाई और परिणामतः वर्षा में कमी जैसे भौगोलिक कारण भी बताए गए हैं। हो सकता है कि ये कारण पूरी तरह से सही न हों। फिर भी ये उदाहरण निश्चित रूप से यह बताते हैं कि ऐतिहासिक प्रक्रियाओं और भौगोलिक विशेषताओं के बीच सदैव ही निकट सम्बन्ध रहा है।

2.2 भौगोलिक नियत्ववाद के विरुद्ध तर्क

यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि प्राकृतिक विशेषताओं और ऐतिहासिक प्रक्रियाओं के विकास के बीच अन्तर्सबन्ध को देखना और समझना एक बात है, परन्तु इतिहास को भौगोलिक नियतत्ववाद के अर्थ में देखना एक पूरी तरह भिन्न बात है। भौगोलिक तथ्यों की जानकारी से सांस्कृतिक विकास को ठीक प्रकार से समझने में मदद मिलती है। इससे विभिन्न प्रदेशों में विकास के अलग-अलग तरीकों और शैलियों को भी समझने में सहायता मिलती है। फिर भी भूगोल और पर्यावरण को एकमात्र या प्रमुख नियामक कारक के रूप में नहीं लिया जा सकता क्योंकि अंततः प्राकृतिक क्षेत्र मात्र संभावनाओं वाले क्षेत्र होते हैं और उन संभावनाओं को मनुष्य अपनी तत्कालीन तकनीकी उपलब्धियों के आधार पर कार्यान्वित करता है। यह कहा जा सकता है कि “प्रकृति, विकास का मार्ग तय करती है, जबकि मनुष्य विकास की अवस्था और उसकी गति को तय करता है। इसलिए न तो प्रकृति का प्रभाव स्थायी होता है और न ही मनुष्य और पर्यावरण के सम्बन्ध ही सुस्थिर हैं। मनुष्य अपने अनुभव और अपने औजारों के बल पर प्रकृति द्वारा लगाई गई सीमाओं और बाधाओं पर विजय प्राप्त करता रहा है। यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है जो मानवीय अनुभव को निरंतर समृद्ध बनाती है और पर्यावरण पर मनुष्य के नियंत्रण की सीमाओं को निरंतर विस्तार देती जाती है। एक समय में जो प्राकृतिक विशेषताएँ और पर्यावरण से सम्बद्ध स्थितियाँ प्रतिकूल प्रतीत होती हैं दूसरे चरण में वे ही समृद्ध संभावनाओं वाली हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, आखेटक संग्राहक लोग जंगलों के निकट, या जिन्हें आज हम सीमांत क्षेत्र कहते हैं, हाँ रहना पसंद करते थे। लेकिन प्रारंभिक किसानों को लोहे आदि के हल इत्यादि के अभाव में स्वयं को गंगा यमुना दो-आब के पश्चिम में नर्म भूमि तक ही सीमित रहना पड़ा। ये किसान, गांगेय उत्तरी भारत के समृद्ध जलोढ़ मैदानों पर लोहे के आगमन के साथ ही पहुँच सके और तभी वे घनी वनस्पति और भारी तथा उपजाऊ मिट्टी वाली भूमि का दोहन कर सके। 

3. आधारभूत भू-आकृतिक विभाजन

अब हम भारतीय उपमहाद्वीप के प्राकृतिक लक्षणों की और इन लक्षणों द्वारा निर्मित विभिन्न प्रदेशों की विशिष्टताओं की चर्चा करेंगे। भू-आकृतिक लक्षणों के आधार पर उपमहाद्वीप को तीन भागों में बांटा जा सकता है:

1) हिमालय के पर्वतीय प्रदेश;

2) सिंधु गंगा के मैदान; और

3) प्रायद्वीपीय भारत।

इनमें से प्रत्येक का आगे भी विभाजन किया जा सकता है। यह माना जाता है कि हिमालय पर्वत श्रृंखला की ऊँचाई अब भी बढ़ रही है। हिमालय की पर्वतीय श्रृंखलाओं के अपक्षय और भूमि कटाव के कारण जलोढ़ यानी कछारी मिट्टी निरंतर बह कर भारी मात्रा में इन मैदानों में आती है। हिमालय की बर्फ के पिघलते रहने से सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र तीन बड़ी नदियों में निरंतर जल प्रवाह बना रहता है। उत्तर भारत का कछारी मैदान लगभग 3200 किलोमीटर तक एक धनुष के आकार में सिंधु के मुहाने से लेकर गंगा के मुहाने तक फैला हुआ है। लगभग 320 किलोमीटर चौड़ाई वाला यह मैदान तमाम संभावनाओं से भरा हुआ है। सिंधु के मैदान में भारतीय उपमहाद्वीप की पहली सभ्यता का विकास हुआ जबकि गंगा के मैदान में पहली सहस्राब्दि बी.सी.ई. से नगर जीवन, राज्य, समाज और सम्राज्य सम्बन्धी ढांचे का पोषण और विकास हुआ।

उत्तर के मैदान और प्रायद्वीपीय भारत को, एक विशाल मध्यवर्ती क्षेत्र जिसे किसी बेहतर शब्दावली के अभाव में मध्य भारत कहा जा सकता है, अलग करता है। यह मध्यवर्ती क्षेत्र गुजरात से लेकर पश्चिमी उडीशा तक लगभग 1600 किलोमीटर तक फैला हुआ है। राजस्थान की अरावली पहाड़ियाँ सिंधु के मैदान को प्रायद्वीप से अलग करती हैं। मध्यवर्ती क्षेत्र में विंध्याचल और सतपुड़ा की पर्वत श्रृंखला और छोटा नागपुर का पठार है जो बिहार, बंगाल और उडीशा के कुछ क्षेत्रों तक फैला है। इस मध्यवर्ती क्षेत्र यानी मध्य भारत को चार उप प्रदेशों में बांटा जा सकता है :

1) उदयपुर और जयपुर के बीच राजपूतों की भूमि;

2) उज्जैन के आस-पास माल्वा का पठार जो प्राचीन समय में अवन्ति के नाम से प्रसिद्ध था; 

3) विदर्भ या नागपुर के आस-पास का उप-क्षेत्र; और

4) पूर्वी मध्य प्रदेश के छत्तीसगढ़ का मैदान जो प्राचीन काल में दक्षिण कौशल के नाम से जाना जाता था। 

हालांकि सामान्य रूप में इस मध्यवर्ती क्षेत्र में संचार तथा आवागमन कभी भी आसान नहीं रहा फिर भी इन चार प्रत्यक्ष रूप से अलग-अलग उप प्रदेशों के बीच आपस में सम्पर्क बना रहा, तथा मध्यवर्ती क्षेत्र और अन्य भौगोलिक क्षेत्रों के बीच भी सम्पर्क बना रहा। 

मध्यवर्ती क्षेत्र या मध्य भारत के दक्षिणी सिरे पर वह भू-रचना शुरू होती है जिसे प्रायद्वीपीय भारत कहा जाता है यह एक प्राचीन भू-भाग है जिसमें स्थायित्व के सभी लक्षण मौजूद हैं। यह भू-भाग पठारी है। इस पठारी चट्टानी संरचना का झुकाव पश्चिम से पूर्व की ओर है। इसमें चार प्रमुख नदियाँ हैं जो बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। ये नदियाँ हैं महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी। इन नदियों के कारण इस पठारी क्षेत्र में जलोड़ बने और इन मैदानों तथा नदियों के डेल्टाओं में मूल आवास क्षेत्रों का विकास हुआ। यहाँ दीर्घ काल तक सांस्कृतिविकास की धारा प्रवाहित हुई जो प्राचीन काल से प्रारंभ होकर मध्यकाल से होते हुए आधुनिक काल तक निरंतर बहती रही।

मध्य भारत में बहने वाली नर्मदा और ताप्ती नदियों का प्रवाह पश्चिम की ओर है। पर्वतीय मध्य भारत में लम्बी दूरी तय करने के बाद ये नदियाँ गुजरात में अरब सागर में गिरती हैं। उपमहाद्वीप के इस भाग की प्रमुख विशेषता दक्कन का पठार है। यह उत्तर में विंध्य पर्वत श्रेणियों से लेकर कर्नाटक की दक्षिणी सीमाओं तक फैला हुआ है। महाराष्ट्र तथा मध्य भारत के भू-भागों में काली मिट्टी विशेष रूप से उपजाऊ है, क्योंकि इसमें नमी बनी रहती है और इस जमीन को स्वहलित’ भूमि यानी ऐसी भूमि कहा जाता है जिसमें जुताई की आवश्यकता नहीं होती। भूमि की इस विशेषता के कारण वार्षिक वर्षा की कमी और सिंचाई संबंधी अन्य कठिनाइयाँ फसल के लिए बड़ी बाधा नहीं बनतीं। यह भूमि कपास, ज्वार, मूंगफली और तिलहन की अच्छी फसल देती है इसलिए यह बात आश्चर्यजनक नहीं है कि पश्चिम और मध्य भारत में प्रारंभिक कृषि संस्कृतियाँ (ताम्र पाषाण संस्कृति) इसी क्षेत्र में उदित हुई। दक्षिण का यह पठार पश्चिम में पश्चिमी घाट तक फैला है और पूर्व में इसकी सीमाएँ पूर्वी घाट से लगी हुई हैं। पूर्वी घाट इसको पूर्वी तटवर्ती मैदानों से अलग करता है। मैदान पश्चिम के संकरे मैदानों की तुलना में कहीं अधिक चौड़े हैं। नीलगिरी और कार्डोमम पहाड़ियाँ मूल प्रायद्वीपीय संरचना की उत्पत्ति मानी जाती हैं। 

4 क्षेत्रीय प्राकृतिक विशेषताएँ

अभी तक हमने मोटे तौर पर भौगोलिक विभाजनों की विशेषताओं का सामान्य आधार पर विवेचन किया है। अब हम उन विशिष्ट प्रमुख भौगोलिक इकाइयों को लेंगे जो आमतौर पर भाषा पर आधारित विभाजनों को पुष्ट करती हैं, और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से उनकी प्राकृतिक विशेषताओं की चर्चा करेंगे।

4.1 हिमालय और पश्चिमी सीमा प्रदेश हिमालय को तीन प्रमुख भागों में बांटा जा सकता है। हर भाग की अपनी विशेषतायें हैं :

  • पूर्वी हिमालय 
  • पश्चिमी हिमालय और 
  • मध्यवर्ती हिमालय 

पूर्वी हिमालय पर्वत श्रृंखला ब्रह्मपुत्र के पूर्व में उत्तर दक्षिण दिशा में असम से लेकर दक्षिण चीन तक फैली हुई है। हालांकि पूर्वी हिमालय पर्वतमाला के बीच से गुजरने वाले मार्ग दुर्गम हैं फिर भी प्रागैतिहासिक और ऐतिहासिक कालों में दक्षिण-पूर्व एशिया और क्षिण चीन से सांस्कृतिक प्रभावों का आना नहीं रुका। मध्यवर्ती हिमालय पर्वत श्रृंलाएँ, जो भूटान से चित्राल तक फैली हुई हैं। तिब्बत के विशाल पठार की सीमा पर स्थित हैं। भारत और तिब्बत के बीच व्यापार तथा अन्य प्रकार के सम्बन्ध इसी सीमा प्रदेश के माध्यम से बने रहे।

संकरी हिन्दुकश पर्वत श्रृंखला हिमालय से दक्षिण पश्चिम की ओर प्राचीन गांधार प्रदेश को घेरती हुई अफगानिस्तान में दूर तक फैली है। भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से पश्चिमी अफगानिस्तान का गहरा सम्बन्ध और समानतायें पूर्वी ईरान से है लेकिन दक्षिण-पूर्वी अफगानिस्तान सांस्कृतिक रूप से नवपाषाण काल से ही भारतीय उपमहाद्वीप के निकट रहा है। खैबर दर्रा और अन्य दरें तथा काबुल नदी इस क्षेत्र को सिन्धु के मैदान से जोड़ते हैं। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि अफगानिस्तान के इस भाग में स्थित शोर्तुगई हड़प्पा की सभ्यता का एक प्रमुख व्यापारिक बाह्य केंद्र था। काबुल और कन्धार जैसे प्राचीन नगर ईरान और भारत के बीच व्यापार मार्गों पर स्थित है।

बलूचिस्तान की ओर चलते हुए दक्षिण पश्चिम अफगानिस्तान में रेगिस्तानी हालात काफी प्रखर रूप से सामने आते हैं। इस क्षेत्र में नवपाषाण काल से ही पशुचारण को जीवन के लिए एक लाभदायक अनुकूल नीति के रूप में अपनाया जाता रहा है। बलूचिस्तान का तटवर्ती क्षेत्र जो कि मकरान कहा जाता है, मानव बस्तियों के लिए कभी भी उपयुक्त क्षेत्र नहीं रहा। उदाहरण के लिए, भारत अभियान से वापस लौटते हुए जब सिकन्दर अपनी सेना के एक भाग को मकरान तट से होकर ले गया तो उसे भोजन और पानी की कमी के कारण भारी जन हानि उठानी पडी। यह प्रदेश एक प्रकार का केंद्रीय स्थल रहा है क्योंकि यहाँ से एक ओर तो मध्य एशिया और चीन के लिए रास्ते निकलते हैं, तो दूसरी ओर ईरान और सुदूर पश्चिम की ओर रास्ते निकलते हैं। वे सभी प्रमुख मार्ग, जो अफगानिस्तान होकर भारत के मैदानों को ईरान और मध्य एशिया से जोड़ते हैं, गोमाल, बोलन और खैबर दरों से होकर जाते हैं। ऐतिहासिक कालों अथवा उससे भी पहले व्यापारी, हमलावर और विविध सांस्कृतिक प्रभाव इन सभी प्रमुख मार्गों से होकर भारत आते रहे। यूनानी, शक, कुषाण, हूण और अन्य हमलावर इन्हीं मार्गों से भारत आए। बौद्ध धर्म और भारतीय संस्कृति के अन्य प्रभाव अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक इन्हीं दरों से होकर पहुंचे। इस तरह ऐतिहासिक रूप से अफगानिस्तान और बलूचिस्तान के पहाड़ी क्षेत्र महत्त्वपूर्ण सीमान्त क्षेत्र रहे हैं।

4.2 सिंधु का मैदान

इन दरों से निकलने वाले ये मार्ग सिंधु के उपजाऊ मैदानों की तरफ ले जाते हैं। इस मैदान को दो भागों में बांटा जा सकता है : 

  • पंजाब और 
  • सिंध

पंजाब (इस समय भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजित) का शाब्दिक अर्थ है पाँच नदियों की भूमि। विस्तृत जलोढ़ मैदान के बीच से बहने वाली सिंधु नदी की पाँच सहायक नदियों ने इस क्षेत्र को उपमहाद्वीप का बहु-धान्य प्रदेश बना दिया है। इस मैदान का पूर्वी भाग गंगा की घाटी से जा मिलता है। पंजाब विभिन्न संस्कृतियों का मिलन स्थल और उनके परस्पर एकीकृत होने का स्थान रहा है। पूर्व स्थापित संस्कृतियों के तथा बाहर से आने वाले नये तत्व यहाँ घुल-मिल कर क होते रहे हैं। पंजाब की सामरिक स्थिति और यहाँ की समृद्धि सदा ही हमलावरों को आकर्षित करती रही है।

सिंधु घाटी का निचला क्षेत्र और डेल्टा मिल कर सिंध प्रदेश का निर्माण करते हैं। यह प्रदेश उत्तर पश्चिम में बलूचिस्तानी पहाड़ियों और क्षिण-पूर्व में थार के रेगिस्तान से घिरा हुआ है। 

इस प्रदेश के गुजरात के साथ ऐतिहासिक सम्बन्ध रहे हैं। इस प्रदेश में वर्षा बहुत कम होती है लेकिन यहाँ की जलोढ़ भूमि बहुत उपजाऊ है। सिंध प्रदेश, सिंधु नदी का प्रदेश है और बड़ी मात्रा में चावल और गेहूं उत्पन्न करता है। जैसा कि पहले कहा जा चुका है, सिंधु मैदान में 3-2 सहस्त्राब्दि बी.सी.ई. के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप की पहली नगरीय संस्कृति पनपी। इनके दो प्रमुख नगर हड़प्पा और मोहनजोदड़ों क्रमशः पंजाब और सिंध में स्थित हैं।

4.3 गांगेय उत्तरी भारत 

सिंधु के मैदान की तुलना में गंगा का मैदान जलवायु की दृष्टि से अधिक आद्र है। वार्षिक वर्षा जो सिंधु-गंगा विभाजक पर 50 सेंटीमीटर होती है वह बंगाल तक पहुँचते-पहुँचते बढ़ कर दो सौ सेंटीमीटर हो जाती है। गंगा के मैदानी क्षेत्र को तीन उप-क्षेत्रों में बांटा जा सकता है : 

  • ऊपरी क्षेत्र,
  • मध्य क्षेत्र, और 
  • निचला क्षेत्र 

पश्चिम और मध्य उत्तर प्रदेश के ऊपरी मैदानी क्षेत्र में अधिकांश दोआब का इलाका शामिल है। यह संघर्ष और सांस्कृतिक संश्लेषण का क्षेत्र रहा है। हड़प्पा संस्कृति के इस क्षेत्र तक फैले होने के बहुतायत में साक्ष्य उपलब्ध हुए हैं। यह क्षेत्र “चित्रित धूसर या भूरे भांड संस्कृति” का केंद्र भी था और उत्तर वैदिक काल में हलचल भरी गतिविधियों का केन्द्र प्रयागराज रहा। प्राचीन प्रयाग भी दोआब की सीमा पर गंगा और यमुना नदियों के संगम पर स्थित है। गांगेय मैदान का मध्य क्षेत्र पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार तक फैला हुआ है। यह वही क्षेत्र है जहाँ प्राचीन कौशल, काशी और मगध स्थित थे। यह क्षेत्र छठी शताब्दी बी.सी. ई. से नगर जीवन, मौद्रिक अर्थव्यवस्था तथा व्यापार का केंद्र रहा है। इसी प्रदेश ने मौर्य साम्राज्य के विस्तार को आधार प्रदान किया और यह भू-प्रदेश राजनीतिक दृष्टि से गुप्त काल पाँचवी शताब्दी सी.ई. तक महत्त्वपूर्ण बना रहा।

गंगा के मैदान का ऊपरी और मध्य क्षेत्र भौगोलिरूप से उत्तर में हिमालय पर्वत श्रृंखलाओं और दक्षिण में मध्य भारत की पर्वत श्रृंखलाओं से सीमाबद्ध होता है। गंगा के मैदान का निचला क्षेत्र बंगाल प्रान्त के साथ फैला हुआ है। बंगाल का विस्तृत मैदान, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों द्वारा लाई गई जलोढ़ यानी कछारी मिट्टी से निर्मित हुआ है। मैदान के निचले क्षेत्रों में भारी वर्षा होने से यहाँ पर घने जंगल और दल-दल हैं। इनके कारण बंगाल में प्रारंभिक बस्तियों की बसावट में काफी बाधाएँ आईं। इस जलोढ़ भूमि की उर्वरता का उपयोग तभी किया जा सका जब लौह तकनीक पर नियंत्रण और उसका प्रयोग अच्छी मात्रा में शुरू हो गया। इस क्षेत्र को देखते हुए तालाब और पोखर प्राचीन समय से ही बंगाल के जीवन में विशिष्ट बने रहे हैं। प्राचीन समय से ही मछली यहाँ के सभी वर्गों के भोजन का आवश्यक अंग रही है।

अन्य वृहद बसावट वाले क्षेत्रों की तुलना में गंगा का मैदान अनेक घनी बस्तियों वाला क्षेत्र रहा है। जनसंख्या घनत्व भी यहाँ अपेक्षाकृत अधिक रहा है। पहली सहस्त्राब्दि बी.सी.ई. से ही यह क्षेत्र भारतीय सभ्यता का मुख्य केंद्र रहा है। अति प्राचीन काल से लेकर वर्तमान समय तक इस प्रदेश की यह स्थिति बनी हुई है। बंगाल के मैदान से लगी हुई ब्रह्मपुत्र द्वारा निर्मित दूर तक फैली हुई असम घाटी है। यह 600 किलोमीटर से भी अधिक लम्बाई में फैली हुई है। सांस्कृतिक रूप से असम बंगाल के निकट है। लेकिन ऐतिहासिक विकास की दृष्टि से यह प्रदेश उडीशा की तरह देर से विकास प्रक्रिया में आने वाला प्रदेश है।

4.4 पूर्वी, पश्चिमी र मध्य भारत 

मध्य भारत जैसा कि पहले बताया जा चुका है, एक पूरी तरह भिन्न प्रकार का क्षेत्र है और उसमें कोई भी ऐसा विशेष स्थान नहीं है जिसे केंद्र स्थान मान कर बात की जा सके। यह एक पर्वतीय प्रदेश है जहाँ पहाड़ियाँ अधिक ऊँचाई तक नहीं पहुँचती। प्रतापीय ढाल इस क्षेत्र की पर्वत श्रृंखलाओं को बीच-बीच में खंडित करते हैं और घाटियाँ इन्हें विभाजित करती हैं। ये पर्वत श्रृंखलाएँ सामान्य रूप से पूर्व से पश्चिम की ओर चलती हैं। लेकिन इस भू-आकृतिक क्षेत्र के उत्तर, पश्चिम भाग में अरावली पर्वत श्रृंखलाएँ मरू प्रदेश राजस्थान को लगभग दो भागों में विभाजित करती हैं। अरावली पर्वत श्रृंखला के पूर्व में राजस्थान का दक्षिण पूर्वी भाग मालवा उप-क्षेत्र का एक अंग है। इस प्रदेश की मिट्टी उपजाऊ है। इसलिए यहाँ सिंचाई के अभाव के बावजूद अच्छी फसलें हो जाती हैं। इस प्रदेश में ताम्र-पाषाण युगीन बस्तियाँ काफी संख्या में फैली हुई थी। इसकी भौगोलिक अवस्थाओं को देखते हुए प्रतीत होता है कि यह प्रदेश हड़प्पा-कालीन समुदायों और मध्य भारत तथा उत्तरी दक्कन के दूसरे ताम्र पाषाण युगीन समुदायों के बीच सेतु के रूप में रहा होगा। सांस्कृतिक रूप से इस प्रदेश में उत्तर कालों में, उत्तरी मैदानों की संस्कृति का ही विस्तार हुआ। इस प्रदेश के पूर्व में ऊपरी महानदी क्षेत्र में छत्तीसगढ़ का मैदान एक छोटा उपजाऊ क्षेत्र है। यहाँ अच्छी वर्षा होती है और धान उगाया जाता है। चौथी-पाँचवीं शताब्दी से यहाँ का ऐतिहासिक विकास उसी प्रकार का था जैसा कि पश्चिमी उड़ीसा के ऊँचे पहाड़ी क्षेत्रों में हुआ। इन क्षेत्रों में भौगोलिक निकटता के कारण सांस्कृतिक और राजनीतिक आदान-प्रदान होता रहा। 

यह अधिकांश भू-भाग जिसे हमने मध्य भारत बताया है, आज मध्य प्रदेश के नाम से जाना जाता है। इस प्रदेश में उत्तर से दक्षिण में विंध्य और सतपुड़ा पर्वत शृंखलाएँ तथा नर्मदा और ताप्ती नदियाँ रूकावट बनती हैं। मध्य भारतीय क्षेत्र, जिसमें विशेष रूप से दक्षिण बिहार, पश्चिम और पूर्वी मध्य प्रदेश आते हैं, आदिवासी बहुल क्षेत्र है। फिर भी यह ऐसा क्षेत्र है जिसमें बाह्य तत्वों के प्रवेश की गति धीमी और निरंतर रही। इस प्रदेश के आदिवासी निकटवर्ती क्षेत्रों के सांस्कृतिक प्रभाव में आकर प्रारंभिक ऐतिहासिक कालों से या कहें कि गुप्त काल से ही, भारत समाज के प्रमुख जाति-कृषक आधार वाले ढांचे से जुड़ते रहे। गुजरात मध्य भारत क्षेत्र के पश्चिमी किनारे पर स्थित है। यह प्रदेश तीन प्राकृतिक भागों में बंटा हुआ है। 

  • सौराष्ट्र 
  • अनर्त (उत्तरी गुजरात) 
  • लता (दक्षिण गुजरात)

अनर्त की विशेषता यहाँ अर्ध शुष्क वायु प्रवाहित मिट्टी है तो लता में पश्चिम तट पर उपजाऊ क्षेत्र शामिल है। गुजरात का मध्यवर्ती प्रायद्वीप काठियावाड़ कहलाता है। इस प्रदेश का एऔर प्राकृतिक भाग कच्छ के रण का निचला इलाका है। मानसून के दिनों में कच्छ का रण दलदली क्षेत्र में बदल जाता है। इस प्राकृतिक उप-विभाजन के बावजूद गुजरात की अपनी सांस्कृतिक पहचान और एकता रही है क्योंकि यह प्रदेश विंध्य पर्वत श्रृंखलाओं और पश्चिमी घाट से पूर्व में और उत्तर में मरुस्थल से सीमाबद्ध हैं। हालांकि यह एक अलग-थलग क्षेत्र प्रतीत होता है किन्तु वास्तव में यह हड़प्पा कालीन समय से ही निरंतर प्राचीन बस्तियों का क्षेत्र रहा है। सौराष्ट्र में इसकी सिंधु नदी के साथ भौगोलिक निकटता के कारण हड़प्पा की सभ्यता का विस्तार हुआ। यह क्षेत्र प्रायः सिंधु तथा सुदूर पश्चिमी क्षेत्र और भारत के बीसंक्रान्ति का क्षेत्र रहा है। यहाँ का मैदान नर्मदा, ताप्ती, साबरमती और माही नदियों द्वारा मध्य भारतीय पर्वत श्रृंलाओं से लाई गई कछारी भूमि से समृद्ध है। अपनी संरक्षित स्थिति र 

लम्बी तट रेखा के कारण गुजरात चार हजार वर्षों से भी अधिक सय तक टीय (समुद्र टीय) और विदेशी व्यापार का केंद्र रहा है।

मध्य भारत पर्वत श्रृंखलाओं के पूर्वी छोर पर गंगा के डेल्टा के दक्षिण पश्चिम में उडीशा के तटवर्ती मैदान हैं। हालांकि इसी तट पर बंगाल की खाड़ी में गिरने वाली कुछ अन्य नदियाँ भी हैं। ये तटवर्ती मैदान पर्वत शृंखलाओं का ही एक विस्तार है और जैसा कि छत्तीसगढ़ के मैदान के सम्बन्ध में पहले कहा जा चुका है, इसके कुछ प्राकृतिक लक्षण भी वैसे ही हैं। इस तरह उडीशा में दो भू-आकृतिक भाग हैं जो विकास की असमान प्रक्रियाओं को दर्शाते हैं। समृद्ध कृषि आधार वाला उपजाऊ तटवर्ती मैदान मानव गतिविधि का स्थल और सामाजिक सांस्कृतिक विकास का केंद्र रहा है। उडीशा ने अपनी भाषाई और सांस्कृतिक पहचान देर से पहली शताब्दी में बनायी थी।

4.5 प्रायद्वीपीभारत

प्रायद्वीपीय भारत की सीमाएँ इसको घेरने वाले तटवर्ती मैदानों और दक्कन के पठार से निर्धारित होती हैं। तटवर्ती मैदान पूर्व में और सुदूर दक्षिण में चौड़े हैं, जबकि पश्चिम में ये संकरे हैं। और पालघाट के बीच का मैदान सर्वाधिकार संकरा है। दक्कन का पठार तीन प्रमुख भागों में बंटा हुआ है। ये भाग महाराष्ट्र, आंध्र और कर्नाटक राज्यों में पड़ते हैं। महाराष्ट्र में अन्य क्षेत्रों के अलावा दक्कन के पठार का उत्तरी भाग शामिल हैं। सुदूर दक्षिण के लिए सांस्कृतिक प्रभावों का प्रसार दक्कन द्वारा होता रहा है। और ऐसा इसलिए संभव हुआ होगा क्योंकि पश्चिमी भाग को छोड़कर वहाँ और घने जंगल नहीं हैं। महाराष्ट्र और आन्ध्र के बीच सीमा प्राकृतिक रूप से निर्धारित हुई प्रतीत होती है क्योंकि यह सीमा रेखा उपजाऊ काली मिट्टी के वितरण के आधार पर बनी हुई है। यानी इस सीमा के इस ओर महाराष्ट्र में उपजाऊ काली मिट्टी है तो सीमा के उस पार तेलंगाना में लाल मिट्टी है जो नमी सोखने में सक्षम नहीं है। इसलिए तेलंगाना तालाबों तथा अन्य प्रकार के कृत्रिम सिंचाई के साधनों का क्षेत्र रहा है। प्रारंभिक बस्तियों के विकास पर पर्यावरण सम्बन्धी भिन्नताओं का प्रभाव इस क्षेत्र में जितने रूप में सामने आता है उतना अन्य क्षेत्रों में नहीं। दक्षिण पश्चिम आन्ध्र के प्रारंभिक नव-पाषाण युगीन लोगों के अनुकूल व्यवहार नीति के रूप में पशु चारण को अपनाया तो उत्तरी दक्कन ताम्र-पाषाण युगीन मानव समुदायों ने कृषि को अपना उद्यम बनाया। कर्नाटक में दक्षिणी-पश्चिमी दक्कन शामिल हैं। कुछ छोटे-मोटे क्षेत्रों को छोड़कर दक्कन लावा का फैलाव यहाँ तक नहीं है, इसके अलावा पश्चिमी घाट और पश्चिमी तटवर्ती मैदान का एक भाग इस राज्य में शामिल है। राज्य के दक्षिण भाग में अपेक्षाकृत अधिक जल संसाधन हैं और यह क्षेत्र मानव बस्तियों के लिए उत्तर की तुलना में अधिक उपयुक्त है। महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच विभाजन रेखा किन्हीं विशेष प्राकृतिक दशाओं को नहीं दर्शाती। इस क्षेत्र में पर्यावरण द्वारा पैदा की गई बाधाओं की पर्याप्त पुष्टि इस क्षेत्र के नपाषाण युगीन लोगों के अपेक्षाकृत अपर्याप्त सांस्कृतिक अवशेषों से होती है। 

चार दक्षिण भारतीय राज्यों में आन्ध्र विशालतम है। कृष्णा और गोदावरी नदियों के बीच का तटवर्ती क्षेत्र जो प्राचीन समय में बैंगी नाम से जाना जाता था धान का प्रमुख उत्पादन केंद्र रहा है। कृष्णा और तुंगभद्रा के बीच रायचूर दोआब की तरह इस क्षेत्र के लिए भी प्राचीन ऐतिहासिक कालों में निरंतर संघर्ष होते रहे। 3.4.6 सुदूर दक्षिण दक्कन का पठार सुदूर दक्षिण में नीलगिरी और कार्डामम पहाड़ियों जैसे अलग-अलग खंडों में विभाजित हो जाता है। ये पहाड़ियाँ मोटे तौर पर पूर्वी और पश्चिमी तटवर्ती मैदानों को विभाजित करती हैं। दक्षिण में विस्तृत पूर्वी तटवर्ती मैदान और इससे जुड़े भीतरी प्रदेश तमिलनाडु में आते हैं। तमिलनाडु के तटवर्ती जिलों में भारी मात्रा में चावल पैदा होता है। कावेरी का मैदान और इसका डेल्टा इस क्षेत्र का अधिकेंद्र है। इस क्षेत्र की नदियाँ मौसमी है इसलिए यहाँ के किसान पल्लव, चोल कालों से ही सिंचाई के लिए तालाबों पर निर्भर रहते आए हैं। असिंचित क्षेत्रों में ज्वार, दलहन और तिलहन की फसलें होती हैं। यह जानना रोचक है कि इस पारिस्थितिक विविधताओं का उल्लेख, जिनके कारण विविध वैकल्पिक जीवन शैलियाँ अस्तित्व में आईं, इस भूमि के प्राचीनतम साहित्य यानी संगम साहित्य में प्राप्त होता है। भौगोलिक, भाषायी और सांस्कृतिक रूप से इस प्रदेश की अपनी निजी पहचान बनी है। पश्चिमी तटवर्ती मैदान भी सुदूर दक्षिण में मालाबार यानी आज के केरल राज्य तक फैला हुआ है। केरल में धान तथा अन्य फसलों के अलावा काली मिर्च तथा अन्य मसालों का उत्पादन भी होता है। पश्चिम के साथ केरल में इन मसालों का व्यापार उत्तर मौर्य काल से ही होता आया है। तमिलनाडु की ओर से केरल में प्रवेश पालघाट घाटी के द्वारा और पश्चिमी घाट के दक्षिणी छोर से संभव है। भूमि से अपेक्षाकृत अलग-थलग केरल राज्य समुद्र की ओर से पूरी तरह खुला हुआ है। यह एक रोचसत्य है कि भारत में ईसाई प्रभाव और बाद में मुस्लिम प्रभाव समुद्र के माध्यम से ही आया। यह ध्यान देने योग्य है कि केरल औमिलनाडु, दोनों ही प्रदेश गंगा के मैदान की तरह घने आबादी के क्षेत्र हैं। 

5 क्षेत्रीय परिवर्तन के कारण।

क्षेत्रों तथा क्षेत्रीय संस्कृतियों के बीच विभिन्नताओं के चिह्न संभवतः खाद्य उत्पादन के रूप में जीवन यापन के नए साधन की शुरुआत के साथ ढूंढ़े जा सकते हैं। उपमहाद्वीप की मुख्य नदियों के क्षेत्रों में कृषि आधारित अर्थव्यवस्था की शुरुआत मात्र एक घटना नहीं बल्कि एक प्रक्रिया थी जो कई सहस्त्राब्दियों में फैली हुई थी। कच्छी मैदान (जो कि अब पाकिस्तान में है) के अंतर्गत मेहरगढ़ में कृषिगत गतिविधियाँ अपेक्षाकृत जल्दी लगभग 6000 बी.सी.ई. से पहले आरंभ हो गयीं थी तथा सिंधु घाटी में चौथी-तीसरी सहस्त्राब्दि बी.सी.ई. में गंगा की घाटी में कोलडिहवा (उत्तर प्रदेश) में 500 बी.सी.ई. में, चिरंद (बिहार) में तीसरी सहस्त्राब्दि बी.सी. ई के उत्तरार्ध तथा अंतरजीखेड़ा (दोआब) में दूसरी सहस्त्राब्दि बी.सी.ई. के पूर्वार्ध में कृषि की शुरुआत हुई। तथापि गंगा घाटी में पूर्ण रूप से नियोजित कृषि खेतीहर गाँव तथा अन्य सम्बद्ध लक्षण जैसे नगर का उदय, व्यापार तथा राज्य प्रणाली आदि प्रथम सहस्त्राब्दि बी.सी.ई. के मध्य में ही दिखाई देते हैं। मध्य एवं प्रायद्वीपीय भारत में ऐसे कई स्थान थे जहाँ बदलाव की यह प्रक्रिया प्रथम सहस्त्राब्दि बी.सी.ई. की अंतिम शताब्दि में ही आरंभ हो सकी। इसी प्रकार गंगा, गोदावरी, कृष्णा तथा कावेरी के क्षेत्रों में कृषक समुदाय तेजी से फैलता रहा और सभ्यता के चरणों की विभिन्न प्रक्रियाओं को तेजी से तय करता रहा। जबकि असम, बंगाल, गुजरात, उडीशा तथा मध्य भारत के काफी क्षेत्र जो कि बाकी क्षेत्रों से अपेक्षाकृत अथवा पूर्णतया कटे हुए थे, काफी लम्बे समय तक इन विकासों से अछूते रहे तथा आदिम अर्थव्यवस्था के चरण से आगे नहीं बढ़ पाए थे। अंततः जब कुछ अपेक्षाकृत कटे हुए क्षेत्रों में बदलाव की प्रक्रिया का ऐतिहासिक दौर शुरू हुआ तो अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा इन विकासों के बीच न केवल समय का लंबा अंतराल था बल्कि क्षेत्रों के गठन के स्वरूप में भी स्पष्ट अन्तर था। पूर्व विकसित क्षेत्रों के मुख्य केंद्रों का सांस्कृतिक प्रभाव इन कटे हुए क्षेत्रों के विकास की प्रक्रिया पर आरंभ से ही पड़ा। अतः आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि कुछ क्षेत्र अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक तेज़ी से विकसित हुए तथा अभी भी कुछ क्षेत्र हैं जो अन्य की अपेक्षा पिछड़े हैं।

5.1 ऐतिहासिक क्षेत्रों के उदय की असमान प्रक्रियाएँ

अनेक क्षेत्रों में सांस्कृतिक विकास की असमान प्रक्रिया तथा ऐतिहासिक शक्तियों का असमान विन्यास भूगोल से अत्यधिक प्रभावित रहा। क्षेत्रों के असमान्य विकास को ऐतिहासिक स्थितियों द्वारा दर्शाया जा सकता है। उदाहरण के लिए तीसरी सहस्त्राब्दि बी.सी.ई. के उत्तरार्ध में गुजरात में मध्य पाषाण युगीन संस्कृति मौजूद थी जबकि इसी समय दक्कनी क्षेत्रों में नवपाषाण युगीन पशु पालक काफी संख्या में मौजूद थे। ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि अन्य क्षेत्रों के इन संस्कृतियों के युग में ही हड़प्पा जैसी विकसित सभ्यता विद्यमान थी। फलतः विकास के विभिन्न चरणों में क्षेत्रों एवं संस्कृतियों के एक दूसरे से प्रभावित होने के प्रमाण मिलते हैं। यह प्रक्रिया भारतीय इतिहास के हर दौर में दिखाई देती है। दूसरे शब्दों में जहाँ एक ओर सिंधु एवं सरस्वती के क्षेत्रों में घुमक्कड़ लोग तीसरी सहस्त्राब्दि बी.सी.ई. में बसने लगे थे वहीं दूसरी ओर दक्कन, आंध्र, तमिलनाडु, उडीशा एवं गुजरात में बड़े पैमाने पर खेतिहार समुदाय बुनियादी रूप में लौह-युग में गठित हुए जो कि प्रथम सहस्त्राब्दि बी. सी.ई. का उत्तरार्ध अनुमानित किया जा सकता है। लोहे के प्रादुर्भाव के साथ ही स्थायी कृषिगत गतिविधि पर आधारित भौतिक संस्कृति का प्रसार आरंभ हुआ। तीसरी सहस्त्राब्दि बी.सी.ई. के आरंभ में गांगेय उत्तरी भारत तथा मध्य भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों की भौतिक संस्कृति में काफी कुछ समानता दिखाई देती है। यद्यपि अशोक के शिला लेखों (इकाई 13 व 14) के भौगोलिक वितरण (जो कि उत्तर से दक्षिण तक मिलते हैं) के कारण पूरे उपमहाद्वीप में कुछ द तक सांस्कृतिक समानता स्वीकार की जाती है। विंध्याचल के दक्षिण के क्षेत्रों में जटिल सामाजिक संरचना वाले आरंभिक ऐतिहासिक साक्षर युग के उदय की प्रक्रिया मौर्य युग में तथा उसके उपरांत तेज हुई। वास्तव में 200 बी.सी.ई. से 300 सी.ई. दक्षिण भारत तथा दक्कन के अधिकतर क्षेत्रों की संस्कृति के विकास का आरंभिक चरण था। इन क्षेत्रों की ऐतिहासिक बस्तियों की खुदाई से प्राप्त पुरातात्विक आंकड़ों से इस तर्क को बल मिलता है। यहाँ यह बताना आवश्यक है कि बीच के काफी क्षेत्र अथवा मध्य भारत की जंगली पहाड़ियाँ कभी भी पूरी तरह नहीं बसी और आदिम युगीन अर्थव्यवस्था के विभिन्न चरणों में आदिवासियों को शेष मानव समाज से अलग रहने का अवसर देती रहीं। इस उपमहाद्वीप में सभ्यता तथा पारंपरिक सामाजिक संगठन के रूप में अधिक जटिल संस्कृति विभिन्न क्षेत्रों में भिन्न कालों में पहुंची तथा अपेक्षाकृत अधिक विकसित भौतिक संस्कृति का क्षेत्रीय प्रसार काफी असमान रहा।

5.2 मृत्तिका कला के प्रमा

अपने अनश्वर गुण के कारण मृदमाण्ड किसी संस्कृति की पहचान का विश्वसनीय चिह्न होते हैं तथा पुरातत्वात्मक श्रेणीबद्धता का महत्त्वपूर्ण साधन होते हैं। विभिन्न संस्कृतियाँ अपने विशिष्ट मृदमाण्ड के आधार पर पहचानी जाती है। गेरू चित्रित 1000 बी.सी.ई. से हले के हैं, चित्रित पूरे 800-400 बी.सी.ई. के बीच के हैं, काले-एवं-लाल उपरोक्त दोनों के बीच के काल के हैं, तथा उत्तरी काले पालिश वाले मृदमाण्ड 500-100 बी.सी.ई. के हैं। मृद्भाण्ड की प्रथम तीन श्रेणियाँ मुख्यत: भारत-गांगेय विभाजन तथा दोआब सहित ऊपरी गंगा घाटी में मिलती हैं। काली पॉलिश वाले मृद्भाण्ड उत्तरी मैदान से आरंभ होकर मौर्य काल के दौरान मध्य भारत तथा दक्कन तक फैल गए। विभिन्न प्रकार के मृद्भाण्डों के वितरण से हमें संस्कृतियों की सीमाओं तथा उनके विस्तार के चरण के विषय में जानकारी प्राप्त होती है। भारत-गांगेय विभाजन तथा ऊपरी गंगा क्षेत्र में एक नई संस्कृति का उदय सर्वप्रथम दूसरी सहस्त्राब्दि बी.सी.ई. के उत्तरार्ध में हुआ जो कि धीरे-धीरे पूर्व की ओर फैली जो मौर्य काल में संभवतः मुख्य गांगेय क्षेत्र से भी आगे बढ़ गई।  

5.3 साहित्यिक प्रमाण 

प्राचीन भारतीय साहित्य से हमें संस्कृति स्वरूप के भौगोलिक प्रसार के प्रमाण भी मिलते हैं। ऋग-वैदिक काल का भौगोलिक केद्र बिंदु सप्तसिंधु (सिंधु तथा इसकी सहायक नदियों की भूमि) तथा भारत-गांगेय विभाजन था। उत्तर वैदिक काल में दोआब ने यह स्थान ले लिया गया। बुद्ध के युग में मध्य गांगेय घाटी (कौशल एवं मगध) को यह गौरव प्राप्त रहा। यहाँ यह कह देना उपयुक्त होगा कि भौतिक संस्कृति के विकास के साथ ही भौगोलिक विस्तार के चरणों का विकास होता रहा। राज्य सीमा के अर्थों में राष्ट्र’ शब्द का प्रयोग उत्तर वैदिक काल में आरंभ हुआ और इसी काल में कुरु और पाँचाल जैसे क्षेत्रों में छोटे-छोटे राजवंशों एवं राज्यों का उदय हुआ। बुद्ध के युग में (छठवीं शती बी.सी.ई.) सोलह महाजनपदों (बड़े क्षेत्रीय राज्य) का उदय हुआ। यह रुचिकर तथ्य यह है कि उत्तर पश्चिम में गांधार, मालवा में अवंती तथा दक्कन में अस्माक को छोड़कर अधिकतर महाजनपद ऊपरी एवं मध्य गांगेय घाटी में स्थित थे। कलिंग (प्राचीन तटवर्ती उडीशा) आंध्र, (प्राचीन बंगाल), राजस्थान एवं गुजरात जैसे क्षेत्रों को इस युग पर प्रकाश डालने वाले साहित्य में स्थान नहीं मिला जिसका अर्थ यह है कि इन राज्यों का तब तक ऐतिहासिक रंगमंच पर प्रादुर्भाव नहीं हुआ था।

विंध्याचल के दक्षिण के राज्यों, जैसे कलिंग का उल्लेख सर्वप्रथम पाणिनि ने पाँचवीं शती बी. सी.ई. में किया। सुदूर दक्षिण में तमिल भू-भाग का ऐतिहासिक काल में प्रवेश तक नहीं हुआ था। अतः विभिन्न क्षेत्रों का उदय और गठन एक दीर्घकालीन प्रक्रिया थी। अतः आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि विभिन्न क्षेत्रों की कनीकी एवं सामाजिक-आर्थिक विकास का यह अन्तर बाद में पनपने वाली सांस्कृतिक विभिन्नता के मूल में था। 

6 भारतीय इतिहास में क्षेत्रों की महत्ता 

सभी क्षेत्रों में गाँव ही बुनियादी सामाजिक संगठन के इकाई रहे हैं और अपने निवासियों तथा शहरी जनता के जीवन यापन तथा राज्य की शक्ति का आधार रहे हैं। इनमें से कुछ क्षेत्रों में जनसंख्या का घनत्व, ग्रामीण बस्तियाँ एवं नागरिक केंद्र अपेक्षाकृत अधिक था तथा शक्तिशाली विस्तारवादी राज्यों का इन क्षेत्रों में उदय हुआ। इन क्षेत्रों में नव पाषाण युग-ताम्र पाषाण युग से लगातार आबादियाँ तथा बस्तियाँ होने का प्रमाण मिलता है। यह विशेषता अन्य क्षेत्रों में दिखाई नहीं देती। क्षेत्रों के बीच के अन्तर की व्याख्या निम्न तथ्यों के आधार पर की जा सकती है : 

  • भूगोल
  • भौतिक संस्कृति के प्रसार का तरीका एवं काल तथा
  • ऐतिहासिक शक्तियों का विन्यास जैसे जनसंख्या, तकनीकी, सामाजिक संगठन, संचार आदि। 

इन तमाम कारणों का संयोग क्षेत्रों की अलग पहचान बनाने में सहायक हुआ। 

क्षेत्रों के पृथक् एवं मजबूत व्यक्तित्व तथा क्षेत्रीय शक्तियों की असमानता के कारण भारतीय उपमहाद्वीप राजनैतिक एकता प्राप्त न कर सका। कुछ ने अपनी आंतरिक शक्ति के कारण अखिल भारतीय, अथवा कई क्षेत्रों से सबसे बड़ी शक्ति बनने के उद्देश्य से राज्य विस्तार का प्रयास किया किंतु इन प्रयासों को पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं हुई। मौर्य, तुगलक, मुगल तथा ब्रिटिश साम्राज्यों को राजनैतिक एकीकरण में आंशिक सफलता मिली फिर भी इनमें से कोई भी सभी भौगोलिक इकाइयों और संस्कृतियों में राजनैतिक एकता नहीं ला सका, यद्यपि ब्रिटिश बहुत हद तक इसमें सफल रहे थे। मध्य भारत, या मोटे तौर पर मध्यवर्ती क्षेत्र तथा भारतीय प्रायद्वीप का दूरवर्ती सदैव ही मजबूत विस्तारवादी अखिल भारतीय शक्ति के दायरे से बाहर रहा। विंध्याचल उत्तरी भारत तथा दक्षिणी प्रायद्वीप के इतिहासों को पृथक करने में बहुत कुछ सफल रहा। इसी प्रकार अरावली पहाड़ियाँ कैम्बे खाड़ी के मुख से शुरू होकर दिल्ली तक एक सीमान्ती रेखा तैयार करती है। वास्तव में यह बहुत प्रभावी सीमा रही है।

तथापि सिंधु का निचली घाटी और गुजरात काफी लंबे समय तक ऐतिहासिक और सांस्कृतिकेंद्र बने रहे। इस प्रकार जहाँ एक ओर बड़े पैमाने पर केंद्रीयकृत राज्य लम्बे समय तक बने न रह सके वहीं दूसरी ओर मगध, कौशल, अवन्ती, आंध्र, कलिंग, महाराष्ट्र, चेर, पाण्डय, चोल आदि जैसे प्राचीन राज्य किसी न किसी वंश के अंर्गत बने रहे। उनके इस दीर्घकालीन स्थायित्व का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस प्राकृतिक क्षेत्र में राजनैतिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र बने रहे।

6.1 चक्रवर्ती संकल्पना 

चक्रवर्ती (विश्व सम्राट) की संकल्पना जो कि प्राचीन भारतीय राजनैतिक विचारों का आदर्श थी इस विषय पर प्रकाश डालती है। आदर्श चक्रवर्ती के लिए विश्व विजेता होना तथा सम्पूर्ण विश्व पर प्रभुत्व स्थापित करना आवश्यक था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र के अनुसार हिमालय से समुद्र तट का क्षेत्र चक्रवर्ती सम्राट का क्षेत्र था। रुचिकर तथ्य यह है कि उक्त क्षेत्र उतना ही है जितना भारतीय उपमहाद्वीप है। बाद की कृतियों में इस आदर्श को बार-बार दोहराया गया है। जो राजा विश्व-सम्राट का स्तर प्राप्त करना चाहता था उसे अश्वमेध यज्ञ करना होता था। प्राचीन भारतीय राजनैतिक विचारों में चक्रवर्ती की संकल्पना महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। इस प्रकार राजा की परिकल्पना सदैव विश्व प्रभुत्व से संबद्ध थी। 

लेकिन न तो कौटिल्य और न ही उसके उत्तराधिकारी इस बात की व्याख्या करते हैं कि सम्पूर्ण भारतीय साम्राज्य का प्रशासन किस रूप में होना चाहिए। संभावना इस बात की है कि चक्रवर्ती आदर्श का अर्थ विरोधियों को वशीकृत करना, उनकी सीमाओं में अपने अधिकारों का विस्तार करना और इस प्रकार साम्राज्य को विस्तृत बनाना था। इसका अर्थ यह नहीं है कि वशीकृत राज्य हमेशा के लिए एक ही प्रशासन प्रणाली का अंग बन जाते थे अथवा उन पर कठोर नियंत्रण रखा जाता था। दूसरे शब्दों में, चक्रवर्ती का अर्थ श्रेष्ठ राजनैतिक शक्ति प्रदर्शन था और प्रशासन प्रबन्ध और संगठन जैसे पक्षों से इसका कोई मतलब नहीं था। 

उक्त आदर्श की इस प्रकार की सीमाओं के बावजूद महत्त्वपूर्ण बात यह है कि प्राकृतिक क्षेत्रों की मजबूती और शक्तिशाली क्षेत्रवाद ने इस संकल्पना को साकार नहीं होने दिया। भारतीय उपमहाद्वीप को राजनैतिक रूप में एकीकृत करने के प्रयास यद्यपि अधिक सफल नहीं हुलेकिन यह इच्छा लगातार बनी रही। इस तथ्य के बारे में हमें आरंभिक ऐतिहासिक युग के शिलालेखों से संकेत मिलता है कि छोटे-मोटे शासक भी अश्वमेध यज्ञ किया करते थे जिससे कि वे अपनी शक्ति और संप्रभुता तथा राज्य के प्रति अपने लम्बे चौड़े दावों का प्रमाण प्रस्तुत कर सकें। वास्तव में यह एक स्पष्ट उदाहरण है जो कि वास्तविकता और आदर्श के अन्तर पर प्रकाश डालता है और हमारे पूरे इतिहास में पृथक प्राकृतिक क्षेत्रों के बड़े पैमाने पर विद्यमान होने की ओर संकेत करता है। 

7 क्षेत्रों की श्रेणीबद्धता 

“देश” शब्द की भांति “क्षेत्र” शब्द भी काफी विस्तृत अर्थ रखता है। आज के संदर्भ में इसका अर्थ स्पष्ट करना आवश्यक है। भूगोलशास्त्रियों तथा समाजशास्त्रियों ने अपने अनुसंधान की आवश्यकताओं के अनुरूप क्षेत्रों को भिन्न रूपों में रेखांकित किया है। फलतः क्षेत्रों के वर्गीकरण में “भाषायी क्षेत्र”, “जातीय क्षेत्र”, “भौतिक क्षेत्र”, “प्राकृतिक क्षेत्र”, “सांस्कृतिक क्षेत्र” आदि का उल्लेख मिलता है। यद्यपि ये क्षेत्रीय सीमाएँ लगभग समान प्रतीत होती हैं परंतु आवश्यक रूप से हमेशा ऐसा नहीं होता। भौतिक एवं प्राकृतिक क्षेत्रों की सीमाएँ मिलते । प्रतीत होती हैं। प्राकृतिक क्षेत्र अपनी विशिष्ट भाषायी, जातीय, पारिवारिक बंधुत्व संगठन तथा ऐतिहासिक परंपराओं के साथ स्वतंत्र संस्कृति क्षेत्र थे। तथापि आवश्यक नहीं है कि दो पड़ोसी क्षेत्र समरूप हों। जैसा कि हमने ऊपर पढ़ा है, भौगोलिक रूप से निकटवर्ती क्षेत्रों में भी सम्पूर्ण इतिहास के दौरान विपरीत सांस्कृतिक रुझान मौजूद थे। देश के ऐतिहासिक विकास के प्रतिरूप तथा ऐतिहासिक चरण की ओर संक्रमण में क्षेत्रीय असमानता क्षेत्रों के बीच श्रेणीबद्धता के अस्तित्व की ओर संकेत करती है। इस श्रेणीबद्धता की समझ के आधार पर क्षेत्रों के अंतरीय विशिष्टता तथा उनकी विभिन्न कालों में गठन को समझा जा सकता है। 3.7.1 बुनियादी भौगोलिक प्रभाव “भारतीय ऐतिहासिक भूगोल की बुनियादी संरचना-रेखा” अथवा भारतीय इतिहास को मुख्य भौगोलिक विशिष्टताओं जैसे नर्मदा-छोटा नागपुर रेखा अथवा कैम्बे की खाड़ी से मथुरा तक जाने वाली रेखा, अरावली द्वारा संरचित रेखा आदि ने उपमहाद्वीप में सांस्कृतिक प्रसार के प्रतिरूप को काफी प्रभावित किया, इनको निम्नलिखित रूप में चार बुनियादी मार्गों में विभाजित किया गया है : 

  • मध्य एवं पश्चिमी एशिया से प्रभाव ग्रहण करने वाले सिंधु के मैदान,
  • गांगेय मैदान जो कि दिल्ली-मथुरा रेखा से आरंभ होते हैं तथा उत्तर-पश्चिम सीमाओं से आने वाले तमाम राजनैतिक एवं सांस्कृतिक प्रभावों को समाहित कर चुके हैं,
  • केन्द्रीय भारतीय मध्य क्षेत्र जिनके गुजरात तथा उडीशा दो छोर हैं, तथा 
  • प्रायद्वीपीय भारत जो नर्मदा का दक्षिणी भाग है। 

अरावली रेखा के उत्तर एवं पश्चिम में सामान्यतः सांस्कृतिक स्थिति भिन्न प्रतीत होती है। आरंभिक ऐतिहासिक दौर में केवल राजस्थान एवं गुजरात के कुछ क्षेत्रीय गांगेय घाटी के सांस्कृतिक विकाकी मुख्य धारा से प्रभावित नज़र आते हैं।

पंजाब के संदर्भ में अन्तर अपेक्षाकृत अधिक स्पष्ट है। ऋग वैदिक काल के बाद पंजाब में विकास की दर धीमी थी। गुप्त काल तक स क्षेत्र में गैर-राजतंत्रीय जनपदों का नियमित अस्तित्व स्वतंत्र विकास का द्योतक है। इससे क्षेत्र में अविकसित सम्पत्ति संबंध तथा असंतोषजनक कृषि विकास की ओर भी संकेत मिलता है। पंजाब के मैदानों में भूमि अनुदान शिलालेखों की अनुपस्थिति, जो कि गुप्त काल तथा उत्तर गुप्त काल भारत में सामान्य बात थी, इस विश्वास को और भी बल प्रदान करती है। पंजाब के मैदानों में ब्राह्मणवाद ने कभी जड़ें नहीं पकड़ी थीं और न ही वर्ण व्यवस्था को पूर्ण रूप से स्वीकार किया गया था। ब्राह्मणों ने यदा कदा ही महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई और क्षत्रिय वर्ण शीघ्र ही वर्ण व्यवस्था से लुप्त हो गया। खत्री जो कि स्वयं को क्षत्रिय बताते हैं अधिकतर वैश्यों के व्यवसाय से जुड़े हुए हैं।

इस प्रकापंजाब गंगा घाटी के दृष्टिकोण से देर से हुए ऐतिहासिक परिवर्तन तथा क्षेत्रीय भिन्नता दोनों ही का अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करता है। इसी प्रकार नर्मदा-छोटा नागपुर रेखा बुनियादी विभाजन रेखा है क्योंकि गुजरात, महाराष्ट्र एवं उडीशा को छोड़कर इस रेखा के दक्षिण के सभी सांस्कृतिक क्षेत्र आरंभिक काल मे तमिल मैदानों से प्रभावित नज़र आते हैं। इन क्षेत्रों में भिन्न समुदाय-संगठन तथा जाति श्रेणियाँ मौजूद थीं। महाराष्ट्र, जिसकी सीमा मालवा से मिलती है और चूंकि मालवा और दक्कन लावा क्षेत्र एक दूसरे से जुड़े हुए हैं तथा मालवा गंगा घाटी तथा दक्कन के बीच महत्त्वपूर्ण सेतु है, अतः यहाँ विकास प्रक्रिया भिन्न थी। यहाँ यह उल्लेख अनुचित न होगा कि दक्षिकी ओर जनसंख्या का आवागमन तथा सीमा विस्तार इसी रास्ते से हुआ।

7.2 केन्द्रीय क्षेत्र 

भारतीय इतिहास में काफी पहले ही कुछ क्षेत्र शक्ति के स्थायी केंद्र बन गए थे। इन क्षेत्रों में निरंतर शक्तिशाली राज्य बने रहे। इसके विपरीत कुछ क्षेत्र इतने शक्तिशाली नहीं थे। भूगोलशास्त्री एवं इतिहासकार इन्हें तीन वर्गों में विभाजित करते हैं : i) स्थायी केन्द्रीय क्षेत्र ii) अपेक्षाकृत अलग-थलग क्षेत्र तथा iii) अलग-थलग क्षेत्र। स्थायी केन्द्रीय क्षेत्र गंगा, गोदावरी, महानदी, कृष्णा तथा कावेरी जैसी मुख्य नदी घाटियों के क्षेत्र हैं और इन क्षेत्रों में मानवीय बस्तियाँ अधिक संख्या में पायी जाती रही हैं। संसाधनों की उपलब्धता तथा व्यापार एवं संचार के अभिसरण ने इन क्षेत्रों के महत्त्व को और भी बढ़ा दिया था। तर्कसंगत ही है कि ये क्षेत्र महत्त्वपूर्ण शक्ति केन्द्रों में उभरें। किन्तु यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि भूगोल और संसाधन केवल संभावनाएँ अथवा सीमाएँ प्रस्तुत करते हैं। किसी का महत्त्वपूर्ण केन्द्र होना इस बात पर निर्भर करता है कि ऐतिहासिक कारण क्षेत्र पर किस प्रकार अभिसारित होते हैं। वारंगल में काकतीय एवं गुजरात के चालुक्य राज्य ऐसे ऐतिहासिक उदाहरण मौजूद हैं जोकि केन्द्रीय क्षेत्रों की परिधि से बाहर उदित हुए लेकिन ऐसे उदाहरण छिट-पुट ही हैं। मध्य भारत के अपेक्षकृत अलग-थलग क्षेत्र, जैसे भीलों का देश, बस्तर एवं राजमहल की पहाड़ियाँ, बस्तियों की संरचना, कृषिगत इतिहास, सामाजिक संगठन तथा राज्य प्रणाली की दृष्टि से केन्द्रीय क्षेत्रों से भिन्न थे। चूंकि क्षेत्रों का विकास ऐतिहासिक रूप में हुआ अतः तीनों प्रकार के क्षेत्रों में अन्तर सदैव एक ही जैसा नहीं था। एक बिन्दु पर एक श्रेणी का दूसरी श्रेणी में परिवर्तित होना संभव था। 

7.3 समय एवं स्थान के संदर्भ में अधिवासीय (बस्तियों की) संरचना

क्षेत्रों में बस्तियों की संरचना स्थिर नहीं रही। क्षेत्रों में गाँव, खेड़े, नगर एवं शहर शामिल होते थे। मध्य गंगा में मैदानों एवं दक्कन जैसे कुछ क्षेत्रों में नगरों की संख्या अधिक थी। जैसे हम गुप्त काल की ओर बढ़ते जाते हैं शहरी केन्द्रों की संख्या कम होती जाती है। कृषि के विस्तार तथा नयी ग्रामीण बस्तियों के प्रसार के निरंतर प्रमाण मिलते हैं। कुछ स्थानों पर आदिवासियों के खेड़े खेतिहर गाँव बन गए। आर्थिक गतिविधियों एवं सामाजिक वर्गीकरण के स्तर पर ब्राह्मण एवं गैर-ब्राह्मण बस्तियों में अन्तर था। इस अन्तर का धीरे-धीरे उन क्षेत्रों में भी प्रसार हो गया जो आरंभिक चरणों में विकास की मुख्य धारा से पूर्णतया जुड़े हुए नहीं थे। इन क्षेत्रों में आदिवासी संस्कृति से अधिक जटिल सामाजिक संरचना की दिशा में परिवर्तन हुए। उदाहरण के लिए, इन क्षेत्रों में संगठित धर्म, राज्य एवं वर्ग समाज का आधार तैयार हुआ । इन परिवर्तनों का अर्थ इन क्षेत्रों में नई बस्तियों का विस्तार तथा जनसंख्या में वृद्धि था। भारतीय इतिहास में सदैव जनसंख्या में अधिक घनत्व वाले क्षेत्र अपनी भूमिका निभाते रहे हैं। गंगा घाटी, तमिल मैदान एवं पूर्वी तट सभी ऐसे क्षेत्र थे जहाँ जनसंख्या का घनत्व अधिक था। संसाधन युक्त तथा अन्य सुविधाओं वाले क्षेत्र स्वाभाविक रूप से अधिक घनी जनसंख्या वाले क्षेत्र थे तथा निरंतर मानवीय संसाधनों का प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होना राज्य की सैन्य शक्ति को बल प्रदान करता था।

8 प्राचीन भारत में कुछ क्षेत्रों का गठन 

गंगा-यमुना दोआब, मध्य गंगा घाटी, मालवा, उत्तरी दक्कन, आंध्र, कलिंग (तटवर्ती उडीशा) एवं तमिल मैदान ऐसे मुख्य स्थायी केन्द्रीय क्षेत्र हैं जो शक्ति केन्द्र के रूप में काफी पहले उभर चुके थे। लेकिन कुछ ऐसे छोटे क्षेत्र भी हैं (जिन्हें उप-क्षेत्र कहा जा सकता है) जिन्होंने अपनी पहचान बनाए रखी। कोंकण, कनरा और छत्तीसगढ़ इसी श्रेणी में आते हैं। कुछ क्षेत्र जैसे कृष्णा और तुगभद्रा के बीच वेंगी, ऐसे क्षेत्र थे जिनके कृषि संसाधनों की प्रचुरता के कारण इन पर प्रभुता स्थापित करने के लिए निरंतर युद्ध हुए। इन क्षेत्रों पर प्रभुता स्थापित होने से आसपास के क्षेत्र शक्तिशाली बन सकते थे। मुख्य केन्द्रीय क्षेत्र नदी की मिट्टी वाली उपजाऊ भूमि की विस्तृत उपलब्धता के कारण मुख्य कृषि क्षेत्र भी रहे हैं। अब कुछ उदाहरणों के आधार पर क्षेत्रों के गठन के प्रतिरूपों एवं कारणों पर दृष्टिपात करेंगे।

8.1 गांगेय घाटी अधिक उच्च कृषि उत्पादकता तथा जनसंख्या के अधिक घनत्व के कारण गंगा के मैदान भारतीय उपमहाद्वीप में प्रभुत्वशाली रहे हैं। इसके समरूप किसी भी अन्य क्षेत्र का शक्ति आधार नहीं रहा है। किन्तु यह पूरा मैदान, पहले उल्लेख किया गया है, एक समरूपी भौगोलिक क्षेत्र नहीं है। हम पढ़ चुके हैं कि मध्य गंगा के मैदान कई कारणों से ऊपरी एवं निचले गंगा के मैदानों की अपेक्षा अधिक सफल क्षेत्र रहे और मौर्य काल तक आते-आते इस क्षेत्र ने पूरे उपमहाद्वीप पर अपना प्रभुत्व जमा लिया। ऋग-वैदिक काल के दौरान भारत गांगेय विभाजन इसका केंद्र था। उत्तर वैदिक काल में 1000 बी.सी.ई. के आसपास भौगोलिक केन्द्र गंगा-जमुना दोआब बन गया। इसके साथ ही वैदिक कालीबस्तियाँ पूर्व की ओर फैलने लगीं। लेकिन इसके अधिक महत्त्वपूर्ण विकास का दौर बैलों वाले हल के प्रयोग द्वारा स्थायी खेतिहर जीवन के आरंभ से होता है जिसके परिणामस्वरूप राज्य सीमाएँ एवं राष्ट्र एवं जनपदों का उदय हुआ। कुरू और पाँचाल इसके अच्छे उदाहरण हैं। छठी शताब्दी बी.सी.ई. से जनपदों के उदय की प्रक्रिया तेज हो गयी थी। इसी समय सर्वप्रथम-महाजनपदों का उदय होता है जिसमें छोटे जनपद समाहित हो जाते हैं। समकालीन साहित्य में महानपदों की संख्या सोलह बतायी गयी है।

रहने योग्य स्थान बनाने के लिए घने जंगलों को आग लगाकर थवा धातु के औज़ारों से साफ किया गया। धान की उपज वाली मध्य गंगा घाटी में लोहे के हल द्वारा गहरी जुताई के कारण अन्न का उत्पादन बढ़ गया। बढ़ती हुई जनसंख्या ने अधिक उपज की आवश्यकता को जन्म दिया। विशेषकर इस अधिक जनसंख्या वाले समाज का एक वर्ग जिसमें शासक, अधिकारी, पुरोहित, संन्यासी आदि शामिल थे किसी प्रकार की प्रत्यक्ष उत्पादन प्रक्रिया में भाग नहीं लेते थे। स्थानीय उपभोगी आवश्यकता से अधिक इस कृषि उत्पादन से नगरों के उदय एवं विकास को बढ़ावा मिला। इस काल के मिट्टी के बर्तन उत्तरी काली पालिश वाले (Northern Black Polish Ware) बर्तन हैं जो 500 बी.सी.ई. के लगभग के हैं। इसी समय सर्वप्रथम सिक्कों का चलन आरंभ होता प्रतीत होता है। बढ़ते हुए व्यापार एवं वाणिज्य के कारण सिक्कों की आवश्यकता महसूस की गयी। उत्तरी काली पालिश वाले बर्तनों का कौशल एवं मगध से उत्तर-पश्चिम में तक्षशिला, पश्चिमी मालवा में उज्जैन तथा तटवर्ती आंध्र में अमरावती जैसे सुदूर नगरों तक फैल जाना संगठित वाणिज्य एवं संचार का द्योतक है जिसने इन सुदूर नगरों के बीच संबंध जोड़ दिया। इस विकास के साथ ही भारी सामाजिक परिवर्तन हुए। बस्तियों में स्थायी जीवन के जड़ पकड़ने के कारण वन विचरण तथा आदिवासी जीवन पद्धति धीरे-धीरे कम होने लगी। उत्तर वैदिक काल की जनता मूल निवासियों के काफी नजदीकी सम्पर्क में आयी। उत्तर वैदिक काल साहित्य में इस संपर्क तथा पसी मेल-जोल के प्रमाण मिलते हैं। इन विकासों की पृष्ठभूमि में सर्वप्रथम कुछ हद तक श्रम-विभाजन और 

तदोपरांत व्यवसायों के विस्तार एवं उनमें विशिष्ट दक्षता प्राप्त करने की नयी परिस्थिति ने चार वर्णों की जाति व्यवस्था के लिए उपयुक्त माहौल तैयार कर दिया। 

जनपदों एवं महाजनपदों के अभ्युदय (विस्तृत जानकारी के लिए इकाई 10 देखें) के साथ ही काफी बड़े पैमाने पर सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक परिवर्तन प्रकट हुए। प्रत्येक जनपद में आमतौर पर ग्राम निगम (बड़ी बस्तियाँ जहाँ व्यापार विनिमय होता था) एवं नगहुआ करते थे। जंगल (वन) भी जनपदों का एक हिस्सा होते थे। जनपद मूलतः सामाजिक सांस्कृतिक क्षेत्र होते थे। इन्होंने राज्य के गठन का आधार तैयार किया, जिसे 6वीं सदी बी. सी.ई. में मूर्तरूप प्राप्त हुआ। महाजनपदों के उदय के साथ महानगरों और तदानुरूप घनी एवं निर्धन सामाजिक वर्ग का उदय हुआ। यपूरी प्रक्रिया मध्य गंगाघाटी में अपना चर्मोत्कर्ष पर मौर्य काल में पहुंची। इस प्रकार समाज में सत्ता का जन्म हुआ। सत्ताधारी वर्ग शक्तिशाली धार्मिक व्यवस्थाओं जैसे ब्राह्मणवाद, बुद्धमत, जैनमत आदि का प्रयोग करके नयी सामाजिक व्यवस्था तथा स्वयं को स्थायित्व प्रदान करने का भरपूर प्रयास कर रहा था। इन विकासों की पृष्ठभूमि में उत्तरी गांगेय भारत पूरी तरह इतिहास का पात्र बन जाता है।

8.2 तमिल देश 

तमिल कविताओं के संग्रह से, जिन्हें उनके समग्र रूप में संगम साहित्य के नाम से जाना जाता है, प्राचीन तमिल देश (तमिलाहम) में पूर्व आदिवासी वन-विचरण चरण से इन कविताओं से हमें एक ही समय में भिन्न पर्यावरणीय क्षेत्रों के अस्तित्व तथा भिन्न किन्तु अंतःसंबंधित जीवन शैली जैसे भोज्य पदार्थ एकत्रण, प्रारंभिक कृषि, मछली पकड़ना, पशुपालन से लेकर बड़े पैमाने पर खेती के हअस्तित्व की ओर संकेत मिलता है। कावेरी, पेरियार एवं पैगाई की उपजाऊ नदी घाटियों (मारूतम् क्षेत्र) में कृषि उत्पादन भारी मात्रा में होता था तथा यही वे क्षेत्र थे जो कि तीन प्राचीन अग्रणी वंशों, चोल, चेर एवं पांड्य के प्रभाव क्षेत्र थे। यद्यपि बी. सी.ई. शताब्दियों में लड़ाकू सरदारों, पशु प्राप्ति के लिए आक्रमण, युद्ध एवं लूट आदि का प्रभुत्व था लेकिन धीरे-धीरे लोग किसानों के रूप में बस्तियों में वास करने लगे और एक श्रेणीबद्ध समाज का उदय हुआ जिससे कृषक, भाट, योद्धा एवं कबिलाई सरदार मुख्य श्रेणियाँ थीं। पद के रिवाज ने योद्धा वर्ग को अपने मुखिया के अधीन प्रभुत्वमान बना दिया। धावों से बचाव एवं छुटकारा पाने की दृष्टि से किसान वर्ग एक ऐसी व्यवस्था में समाहित होने के लिए तैयार था जिसमें अविकसित राज्य व्यवस्था अस्तित्व में आ चुकी थी। राज्य के गठन की प्रक्रिया । तेज़ होने के निम्नलिखित कारण थे : 

  • आरंभिक सी.ई. शताब्दियों में रोम के साथ व्यापार, 
  • नगरों का उदय, तथा 
  • ब्राह्मणों के साथ उत्तरी सभ्यता (आर्य) की संस्कृति का आगमन।

सी.ई. युग की आरंभिक शताब्दियों में रोम के साथ व्यापार का महत्त्व बढ़ रहा था। साथ ही तमिलाम् में विभिन्न क्षेत्रों के बीच आंतरिक तथा तमिलाहम् एवं दक्कन के बीच व्यापार को काफी महत्त्व प्राप्त हो चुका था। इस आरंभिक काल में केरल तमिलाकम् का अभिन्न हिस्सा था। पहाड़ियों एवं सीमांती कृषि वाले क्षेत्रों के छोटे-छोटे असंख्य कबीले तीन राज्यों की परिधि में लाए गए। सामाजिक रूप से यह प्रक्रिया जाति व्यवस्था के गठन में परिलक्षित होती है। इस व्यवस्था के अंतर्गत किसान शूद्र के स्तर पर पहुंचा दिए ग। इस प्रकार आरंभिक मिलनाडु में राज्य के उदय का आधार तैयार किया जा चुका था।

8.3 दक्कन : आंध्र एवं महाराष्ट्र

आंध्र एवं उत्तरी दक्कन में लोहे के इस्तेमाल करने वाले महा-पाषाण युगीन समुदायों ने जोकि नवपाषाण युगीन तथा मध्यपाषाण युगीन संस्कृतियों का अनुसरण कर रहे थे स्थायी कृषि के लिए आधार तैयार किया और इन क्षेत्रों के परिवर्तन का पथ प्रशस्त किया । पाँचवीं से तीसरी सदी बी.सी.ई. के बीच आंध्र में समुद्र तटवर्ती भूमि पर अधिक उपज वाली धान की फसलें उगाना जारी रहा। महा पाषाणकालीन शवाघानों की परम्परा से निम्नलिखित प्रमाण मिलते हैं: 

  • शिल्पकला में अल्पविकसित विशेषज्ञता,
  • अविकसित विनिमय व्यवस्था जिसके अंतर्गत खनिज संसाधन उत्तर दक्कन भेजे जाते थे, तथा
  • स्तर विभाजन

यहाँ काले-एवं-लाल बर्तनों के स्थल प्रचुर मात्रा में मिले जिनका अर्थ है कि यहाँ संभवतः जनसंख्या में वृद्धि हुई होगी। तीसरी सदी बी.सी.ई. से महापाषाणकाल में परिवर्तन विस्तृत रूप से समता आधारित समाज में परिवर्तन की शुरुआत थी, फलतः वर्गीकृत समाज की नींव पड़ी। दूसरी सदी बी.सी.ई. के आरंभ से धातु के सिक्के का चलन, रोम से व्यापार तथा शहरीकरण के प्रमाण मिलते हैं। शिलालेखों तथा पुरातत्वशास्त्र से प्राप्त जानकारी के आधार पर आंध्र और महाराष्ट्र में काफी संख्या में नगरों के अस्तित्व के प्रमाण मिलते हैं। इस समय तक बौद्ध धर्म दक्कन में फैल चुका था और बौद्ध केन्द्र एवं मठ स्थापित हो चुके थे। साथ ही मौर्य साम्राज्य के ऐतिहासिक विस्तार के रूप में एक अन्य स्थिति उत्पन्न हुई जिसने इन विकासों की प्रक्रिया को और तेज कर दिया।

मौर्य प्रसार के साथ महापाषाण युगीन संस्कृति ने आरंभिक ऐतिहासिक बस्तियों का पथ प्रशस्त किया। दक्कन में कई शहरी केन्द्र एवं मठ जिनमें से कई केन्द्रीय स्थल बन गए इसी काल में अस्तित्व में आए। यही अंतःसंबंध दक्कन में स्थानीय बस्तियों के उदय में सहायक रहे। यह स्थानीय बस्तियाँ उत्तरी भारतीय नपदों के समरूप समझी जा सकती हैं। सतवाहनों के युग तक स्थानीय बस्तियों ने दक्कन में पूर्व ऐतिहासिक राज्य गठन का आधार तैयार किया। दूसरी सदी बी.सी.ई. के बाद से धीरे-धीरे खेतिहर बस्तियों के विस्तार एवं नए समुदायों के समाहित होने की प्रक्रिया दिखायी देती है। सामाजिक मेल-जोल का पथ सर्वप्रथम बुद्धमत एवं मठों ने तदोपरांत ब्राह्मणों एवं ब्राह्मणवाद ने प्रशस्त किया। निवासी समुदायों के बीच त्रिकोणी संबंध प्रतीत होता है। यह तीन पक्ष निवासी समुदाय, राज्य, मठ अथवा/एवं ब्राह्मण थे। यह ऐतिहासिक प्रक्रिया तटवर्ती आंध्र में इक्शवाकु वंश, कर्नाटक में कदम्ब तथा महाराष्ट्र में वाकाटक के अधीन और तेज हुई। प्रथम सहस्त्राब्दि सी.ई. के मध्य तक उक्त दो क्षेत्र अपनी अलग पहचान बना चुके थे।

8.4 कलिंग एवं प्राचीन उडीशा

दक्कन की भांति ही उडीशा में भी चौथी एवं तीसरी सदी बी.सी.ई. के दौरान महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। 300 बी.सी.ई. तथा 300 शताब्दी सी.ई. के बीच उडीशा का इतिहास आदिवासी समाज के आंतरिक परिवर्तन का इतिहास है। यह परिवर्तन आंशिक रूप से स्वतंत्र था तथा कुछ अंश तक गंगा के मैदानों की सुसंस्कृत सभ्यता से प्रभावित था जिसका आरंभ नंद एवं मौर्य काल के समय में इंगित किया जा सकता है। इसके उपरांत चौथी शताब्दी सी.ई. से नवीं शताब्दी के बीच इस क्षेत्र में विभिन्न स्थानों पर कई उप-क्षेत्रीय राज्यों का उदय हुआ। दसवीं शताब्दी तक यह विकास प्रक्रिया स्पष्ट रूप ले चुकी थी। तथापि यह प्रक्रिया प्रत्येक स्थान पर समरूपी नहीं थी।

डेल्टा तट के तटवर्ती क्षेत्रों में क्षेत्र के अंदर की जंगली भूमि और ढलानों की अपेक्षा, जो कि निकटवर्ती छत्तीसगढ़ एवं बस्तर उपक्षेत्रों से काफी मिलते-जुलते हैं, ऐतिहासिक चरण की दिशा में परिवर्तन जल्दी हुए। केंद्रीय एवं पश्चिमी उडीशा में धीमा और असमान परिवर्तन देखने को मिलता है। बड़ी संख्या में यहाँ आदिवासियों का बसना तथा भू-आकृति के कारण यहाँ गंगा प्रदेश की सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन प्रक्रिया की पुनरावृत्ति नहीं हो सकी, उडीशा में वर्ण व्यवस्था के अंतर्गजातिगत समाज देर से उभरा और जब उभरा भी तो काफी मूल अंतरों के साथ उभरा। सामाजिक संरचना की दृष्टि से उडीशा क्षेत्रीय भिन्नता का अच्छा उदाहरण है। 

8.5 उत्तर-पश्चिम

उत्तर-पश्चिम में सिंध और बलूचिस्तान के विषय में अभी बहुत कम चर्चा हुई है। इसका कारण इन क्षेत्रों की सीमांती स्थिति है। यह क्षेत्र आरंभिक ऐतिहासिक दौर में अधिकतर विशाल भारतीय रेगिस्तान में हो रहे सांस्कृतिक विकासों की मुख्यधारा से कटे रहे। इस तथ्य पर चर्चा की आवश्यकता नहीं कि यह क्षेत्र सांस्कृतिक रूप से विकासरहित था। जिस काल की हम चर्चा कर रहे हैं उस काल में इन क्षेत्रों में जो भी महत्त्वपूर्ण घटनाएँ हुई हैं वह अधिकतर मध्य एशिया, अफगानिस्तान अथवा ईरान के संदर्भ से हुई हैं, केवल कुषान काल के बाद से ही इन क्षेत्रों में एक अंतर्खेत्रीय राजनीतिक व्यवस्था स्थापित हुई जिसमें उत्तरी भारत का भी एक बड़ा भाग शामिल था। उत्तर-पश्चिम में गांधार क्षेत्र इसका अपवाद था। 

छठवीं शताब्दी बी.सी.ई. में ही गांधार 16 महा-जनपदों की सूची में था। मगध के राजा बिम्बसार के गांधार का राजा के साथ राजनैतिक संबंध था। गांधार की राजधानी तक्षशिला शिक्षा एवं व्यापार का केंद्र थी। गांधार का विस्तृत आर्थिक आधार था। मथुरा, मध्य भारत तथा रोम के साथ गांधार के व्यापार के प्रमाण हैं। अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण गांधार विभिन्न लोगों एवं संस्कृतियों के मिलाप का केन्द्रीय स्थान था। छठी शताब्दी बी.सी.ई. के अंतिम 25 वर्षों में यह क्षेत्र राजनीतिक रूप से ईरानी (आकेमिनिड) साम्राज्य का हिस्सा था। 500 शताब्दी बी.सी.ई. से 500 शताब्दी सी.ई. क लगभग 1000 वर्षों तक तक्षशिला में निरंतर शहरी जीवन के प्रमाण मिलते हैं। किंतु यह शहरी जीवन अपने चर्मोत्कर्ष पर दूसरी शताब्दी बी.सी.ई. से लेकर दूसरी शताब्दी सी.ई. तक रहा। इसी काल में सुविख्यात गांधार कला शैली विकसित हुई। भाव की दृष्टि से सामान्य यह कला यूनानी बौद्ध शैली के रूप में व्याख्यायित की जाती है क्योंकि यह गांधार शैली – यूनानी कला तथा बुद्धमत के सामंजस्य का परिणाम मानी जाती है। लेकिन अब निरंतर यह स्वीकार किया जा रहा है कि इस शैली पर बैक्ट्रिया का प्रभाव भी था। अतः गांधार शैली के विकास पर बैक्ट्रिया विचार पद्धति के प्रभाव को भी नहीं नकारा जा सकता। यहाँ जो कहने का प्रयास किया जा रहा है वह निम्नलिखित है :

1) प्रथमतः उत्तर पश्चिम में सिंध एवं बलूचिस्तान की तुलना में गांधार एक भिन्न विकास प्रक्रिया दर्शाता है, तथा

2) आरंभिक सी.ई. शताब्दियों में इस क्षेत्र की विशिष्ट पहचान अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण भिन्न बाह्य प्रभावों के आधार पर बनीं।

9 सारांश 

भारतीय उपमहाद्वीप में प्राकृतिक विभाजन मोटे तौर पर भाषाई क्षेत्रों के अनुरूप है। इन भाषाई क्षेत्रों ने समयानुकूल विकसित होकर अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान कायम की। विभिन्न प्राकृतिक भागों में लोगों को विभिन्न रुचियाँ, भोजन संबंधी आदतें और वस्त्र शैलियाँ हैं। ये आदतें और रुचियाँ विभिन्न प्राकृतिक क्षेत्रों की सीमाओं के अंदर विकसित हुए संसाधनों के उपयोग के तरीके, पर्यावरणीय व्यवस्था और जीवन के ढंग से पैदा हुई। बृहद क्षेत्रों के अंदर और दो बृहद क्षेत्रों के बीच जो असमान विकास हुआ, उसे इन क्षेत्रों में उपलब्ध या अनुपलब्ध संसाधनों के संदर्भ में, और मानवीय तथा तकनीकी अंतःक्षेप के आधार पर समझा जा सकता है। देश की प्रमुख नदियाँ/घाटियाँ, जिनमें प्रति वर्ष वर्षा का औसत पचास से सौ सेंटीमीटर के बीच रहा है और जो बड़े पैमाने पर कृषि समुदायों को पोषण प्रदान करने में सक्षम रही है, वे युगों से पूरी तरह आबाद रही है। कम या अधिक वर्षा वाले क्षेत्र अनुवर्रता और घनी वन्य वनस्पति की समस्याओं से ग्रस्त रहे हैं। और ऐसे क्षेत्र कृषि के लिए अधिक उपयुक्त नहीं रहे हैं। उपमहाद्वीप में इष्टतम वर्षा वाले क्षेत्र और कृषि के लिए साफ किये गये क्षेत्रों में आश्चर्यजनक, सह-सम्बन्ध पाया गया है। ऐतिहासिक प्रक्रियाओं के विकास सभी जगह न तो संतुलित हुआ और न एक जैसा। 

उत्तर में हिमालय और दक्षिण, दक्षिण-पश्चिम और दक्षिण-पूर्व में समुद्री सीमाओं से घिरा भारतीय उपमहाद्वीप एक बंद और अलग क्षेत्र होने का आभास कराता है। मगर इन सीमाओं के पार से सांस्कृतिक प्रभावों का आदान-प्रदान होता रहा। और इस महाद्वीप के पश्चिम, पश्चिम-पश्चिम एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के साथ समुद्री मार्ग से संबंध बने रहे। आंतरिक रूप से मध्य भारत की ऊबड़-खाबड़ और दुर्गम पहाड़ी प्रदेश, देश के विभिन्न प्रदेशों के बीच विचारों और प्रभावों के आदान-प्रदान के मार्ग में कभी भी वास्तविक बाधा नहीं बन सका। निष्कर्ष रूप से कहा जा सकता है कि हालांकि भूगोल और पर्यावरण ऐतिहासिक विकास को पूरी तरह नियत नहीं करते, फिर भी उसे पर्याप्त मात्रा में प्रभावित करता है।

हमारे इतिहास में क्षेत्र एवं क्षेत्रीयता की समस्या के सर्वेक्षण तथा क्षेत्रों के गठन की प्रक्रिया को रेखांकित करने वाले उपरोक्त उदाहरणों से स्पष्ट हो जाता है कि क्षेत्रों का सामाजिक सांस्कृतिक अंतर ऐतिहासिक रूप से काफी पुराना अंतर है। स्वाभाविक भौतिक्षेत्रों का ऐतिहासिक/सांस्कृतिक क्षेत्रों के रूप में उदय भारतीय इतिहास के आरंभिक दौर में देखा भी जा सकता है। बाद के दौर में इन क्षेत्रों ने अपनी विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक पहचान तैयार की और पृथक सामाजिक राजनैतिक इकाई के रूप में उभरे। कुछ क्षेत्र, ऐतिहासिक शक्तियों के उनमें आरंभ में ही अभिसारित हो जाने के कारण अपेक्षाकृत जल्दी और तेजी से उभरे। अन्य क्षेत्रों के अंतर्गत विकास इन बुनियादी केंद्रों के साथ सांस्कृतिक संपर्क तथा इस संस्कृति को समाहित करने के साथ हुआ। कुछ हद तक इससे भिन्न क्षेत्रों की विशिष्टताओं और उनमें भिन्नताओं को समझा जा सकता है। 

क्षेत्रीय विभिन्नताएँ गुप्त एवं उत्तर गुप्त काल में भाषा शिल्पकला, वस्तुकला एवं जाति व्यवस्था के माध्यम से अधिक स्पष्ट रूप में रेखांकित होती हैं। लगभग सभी क्षेत्रीय भाषाएँ इसी काल में विकसित होती हैं। साथ ही प्रत्येक क्षेत्र में अपनी अलग जाति व्यवस्था भी विकसित हुई। यह सांस्कृतिक अंतर केवल भिन्न क्षेत्रों के बीच ही नहीं थे बल्कि एक ही क्षेत्र में भी भिन्नताएँ देखी जा सकती हैं। यद्यपि क्षेत्र अपने आप में साधारणतया समरूपी इकाई थे लेकिन क्षेत्रों के अंतर्गत उपक्षेत्रों के अस्तित्व की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती। हमने पहले भी देखा है कि गांगेय उत्तरी भारत किसी भी रूप में एक समरूपी क्षेत्र नहीं था। प्राचीन तमिलाहम् (तमिलनाडु) के अंतर्गत पर्यावरणीय विभिन्नतायें भी ध्यान में रखी जानी चाहिए। आंध्र, उडीशा, पंजाब और गुजरात के संदर्भ में भी यह तथ्य उतना ही सही जान पड़ता है। उपक्षेत्रों के अपने प्राचीन नाम भी थे। तथापि बदलते हुए राजनैतिक प्रतिरूपों और उपक्षेत्रों के एक दूसरे में समाहित हो जाने के कारण यह उपक्षेत्र बाद के समय में नये नाम ग्रहण करने लगे। निश्चित सीमाओं में एक इकाई के रूप में क्षेत्र ऐतिहासिक प्रक्रियाओं के आधार पर उभरते हैं और भारतीय इतिहास की समझ के लिए क्षेत्रों की विशेषताओं और उनके गठन की प्रक्रियाओं को समझना आवश्यक है।