पल्लव, पांड्य और कलचुरी राज्य

इस पेज की पाठ्यक्रम

1 प्रस्तावना 2 पल्ल3 पांड्य 4 पल्लव-पांड्य संघर्ष 5 अंतर्काल और पतन 6 कल्चुरी 7 शासन प्रबन्ध 8 र्थव्यवस्था 9 समा10 धर्म 11 साहित्य 12 कला और वास्तुकला

इस पेज को पढ़ने के बाद आप इस बारे में जान पाएंगे

  • पल्लव, पांड्य और कलचुरी का राजनीतिक इतिहास और उसमें आया उतारचढ़ाव
  • इन तीन राजवंशों का शासन प्रबन्ध और सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक स्थितियाँ; और
  • साहित्य और वस्तुकला के क्षेत्रों में उनकी साहित्यिक गतिविधियाँ। 

1. प्रस्तावना 

इस इकाई में हम तीन महत्वपूर्ण राजवंशों जैसे पल्लव, पांड्य और कलचुरी के बारे में विस्तृतरूप में अध्ययन करेंगे। प्राचीन तमिल क्षेत्र को  तमिलाकम् या तमिलाहम नाम से सूचित किया जाता था जो वर्तमान में तमिलनाडु, केरल, पाण्डुचेरी, लक्ष्यद्वीप और आंध्रप्रदेश और कर्नाटक के दक्षिण हिस्सों के नाम से पहचाना जाता है। क्षेत्र के प्रमुख राज्य चोल, चेर और पांड्य थे जो संगम युग के दौरान लगभग 300 बी.सी.ई. से  300 सी.ई. तक फैले हुए थे। इस इकाई में हम संगम युग के दौरान पांड्य वंश के बारे में जानेंगे और सुगम युग के बाद उनकी राजनीतिक शक्तियों में आये असंतोष की अवधि के साथ ही साथ उनकी शक्तियों के पुनः प्रवर्तन के बारे में पढ़ेंगे। अन्य राजवंश पल्लव और कलचुरी है। जिनके बारे में हम अध्ययन करेंगे। पल्लव दो नदियों पेन्नार और पौन्नैयार के बीच टोंडईमंडलम क्षेत्र में या वर्तमान तमिलनाडु के उत्तरी भाग में स्थित थे। कलचुरी की विभिन्न शाखायें है लेकिन हमारा मुख्य ध्यान मध्य भारत के कुछ हिस्सों में चेदी के कलचुरी पर और कर्नाटक के आधुनिराज्य में कलयानी पर है। 

South India in 600 AD
South India in 600 AD

इस मानचित्र में हम टोंडईमंडलम में पल्लवों के राज्यों और तमिलाहम में पांड्यों के साथ ही साथ वातापी के चालुक्यों के राज्य और उनके सहयोगी पश्चिमी गंगा राजवंश को देख सकते हैं। कालभ्रों का पल्लवों, पांड्य और चालुक्यों द्वारा विस्थापन होने के बाद पल्लव और चालुक्य छठी शताब्दी बी. सी.ई. में पुनः संगठित हुए, जिसे हम स्पष्टरूप से देख सकते हैं। थॉमस लैसमन का फ्री डोमेन सामग्री से निर्मित।

2. पल्लव 

पिछली इकाई में हमने देखा कि सातवाहनों के अंत के बाद अनेक राज्य उत्पन्न हुये। पल्लव उनमें से एक थे। वे सातवाहनों के सामंत थे जो अधिपति के पतन के बाद सत्ता में आये। हालांकि, उनकी उत्पत्ति पर बहुत बहस हुई है। कुछ इतिहासकार उनकी उत्पत्ति को पहलवा या पार्थियन से संबंधित मानते हैं, जो प्राचीन ईरान में प्रमुख राजनीतिक शक्ति हुआ करते थे, जिन्होंने 247 बी.सी.ई. से 224 सी.ई. तराज्य किया। जबकि कुछ का ये मानना है उनकी उत्पत्ति अपने देश में हुई है न कि विदेश में। उनके अनुसार, वे स्वदेशी जनजाति/कबीला हो सकते हैं या एक जाति। ये कहा जाता है कि नका सम्बन्ध वाकाटक कुल से था। दूसरा सिद्धान्त वैवाहिक गठंबधन के भूमिका की ओर प्रकाश डालता है जो उनकी उत्पत्ति को समझाता है और प्रतिपादित करता है। वैवाहिक गठंबधन के जरिए पश्चिमी क्षत्र के एक पहलवा मंत्री ने कांची की गद्दी प्राप्त की उसने शिवासकन्दा नाग सातकर्णी की बेटी से विवाह किया। कुछ लोग मानते हैं कि वे चोल राजकुमार और मणियल्लवम की नाग राजकुमारी के उत्तराधिकारी थे। 

उनके राजनीतिक इतिहास को समझने के उद्देश्य से उनके शान को विभाजित किया जा सकता है और दो मुख्य भागों में अध्ययन किया जा सकता है: 

  • पूर्व पल्लव 
  • शाही या उत्तरोत्तर पल्लव 

पल्लव वंश से जुडे हुए कई पहलू अब तक स्पष्ट नहीं है और छठी शताब्दी सी.ई. से शुरू हुए, शाही पल्लव के इतिहाके बारे में हमारे पास कुछ जानकारी है। वातापी या बादामी चालुक्यों और शाही पल्लवों के बीच निरंतर चलने वाले युद्ध शी पल्लव के इतिहास का एक बड़ा हिस्सा है। आरंभिल्लव शासकों के बारे में सटीक वंशावली तैयार कर पाना कठिन है। कुछ विद्वान मानते हैं कि वीराकुरचा आरंभिक पल्लव के पहले महत्वपूर्ण शासक थे। पल्लव, पांड्य और कलचुरी ऐसा विश्वास है कि उन्होंने नाग राजकुमारी जो सातवाहन परिवार से सम्बन्धित थी, से राज्य विवाह किया। जब साववाहन वंश का तन हुआ वह स्वतन्त्र हो गया। उसका पौत्र कुमार विष्णु ने कॉचीपुरम पर कब्जा कर लिया और 200 सी.ई. में एक राज्य की स्थापना की जिसकी राजधानी कांचीपुरम थी आरंभिक पल्लव के आखिरी शासक के शासनकाल के दौरान कालभ्रों ने आक्रमण किया और उसे हरा दिया। इस तरह आरंभिक पल्लव के राज्य का अन्त हो गया। 

पल्लवों ने टोंडईमंडलम में खोये हुए राजनीतिक महत्व को पुनः प्राप्त करने में सफलता प्राप्त की जब सिंहाविष्णु (575-590 सी.ई.) ने कालभ्रों को हराया और इस तरह छठी ताब्दी सी.ई. में शाही पल्लवों का शासन शुरू हुआ। उसने चोल और पांड्य के विरूद्ध भी युद्ध लड़े। उसने बिरूडा (शाही उपाधि) की निम्नलिखित उपाधियां लीं

  • अवानिसिम्हा (धरती का शेर) और 
  • सिम्हाविष्णुपोट्टर्यन

महाबलिपुरम में आदिवराहा राह मंडप में एक उर्ध्ववृत्तचित्र में वह अपनी दो रानियों के साचित्रित है।

महेन्द्रवर्मन प्रथम (590-630 सी.ई.) अपने पिता की मृत्यु के बाद शासक बना । उसके शासन काल के दौरान ल्लव एक बहुत बड़ी राजनीतिक शक्ति के रूप में उभर कर आए। उसके पास कई उपलब्धियाँ थी। वह अपने साहित्यिक कार्यों और मन्दिर निर्माण कार्यों के लिए जाना जाता था और वह वीणावादन में भी निपुण था।

  • उसने कई कलात्मक कार्यों जैसे नाटक, चित्रकला, संगीत को बढ़ावा दिया व निम्नलिखित उपाधियाँ ग्रहण कीः
  • मतविलास (सुखों का आदी),
  • चित्राकरपुली (चित्रकारों के बीच बा),
  • ललितांकुर (आकर्षक संतान),
  • गुणभर (गुणी),
  • चट्टाकरी (मंदिर बनाने वाला),और
  • विचित्रचरित (जिज्ञासुन वाला)।

इसके राज्यकाल के दौरान पल्लवचालुक्य युद्ध शुरू हुये। पुलकेशिन द्वितीय वतापी के चल्लुयों का शक्तिशाली राजा जिसने पुष्याभुति राजवंश के हान शासक, हर्षवर्ध, के विरूद्ध एक महत्वपूर्ण युद्ध में विजय प्राप्त की। उसने महेन्द्रर्मन को कांची के निकट परास्त किया। उसके बाद पुलकेशिन द्वितीय पल्लवों की राजधानी की ओर बढ़ा | महेन्द्रवर्मन ने अपनी राजधानी बचाने के उद्देश्य से चालुक्य शासक के साथ शान्ति समझौता किया और उसे अपनी राज्य का उत्तरी क्षेत्र दे दिया। 

नरसिंहवर्मन प्रथम (630-668 सी.ई.) ने अपने पिता महेन्द्रवर्मन प्रथम की जगह ले ली। उन्हें सबसे महान पल्लव राजा समझा जाता है। उन्होंने ममल्ला (महान योद्धा) की पाधि ली। उन्होंने चालुक्य शासक पुलकेसिन द्वितीय को हराया और मार दिया तथा चालुक्य राजधानी वातापी को नष्ट कर दिया। इस उल्लेखनीय जीत को मनाने के लिए उन्होंने वातापिकोंड (वातापी का विजेता) की उपधि ली। चोल, चेरा और पांड्य भी इसके हाथों हार स्वीकार करने को मजबूर हुए। उन्होंने सिलोन पर दो बार आक्रमण किया ताकि 300 सी.. से 1206 वह मानयम्मा की सहायता कर सके जो एक निर्वासित सीलोनीज राजकुमार था। वह सिलोन की गद्दी को बचाने के लिए सहायता मांगने आया था। पल्लव शासक ने अपनी सेना राजकुमार के साथ सिलोन भेजी। यद्यपि मानयम्मा सिलोन की गद्दी पाने में सफल हुए पर ये सफलता लम्बे समय तक टिकी नहीं रही। उन्होंने दूसरी बार पल्लव शासक से सहायता की गुहार लगायी। दूसरा नौसेनिक अभियान ज़्यादा सफल हुआ और सीलोनीज राजकुमार अपनी शाही शक्ति को सुरक्षित और स्थिर कर पाये। नरसिंहवर्मन प्रथम शासनकाल के दौरान जब प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग 642 सी.ई. में कांचीपुरम की यात्रा करने आया। 

महेन्द्रवर्मद्वितीय (668670 सी.ई.) अगले शासक थे। उनका शासनकाल संक्षिप्त था। पल्लव और चालुक्यों के बीच दुश्मनी ने पल्लव राजवंश में राजनीतिक उथल-पुथल पैदा कर दी। चालुक्य राजाविक्रमादित्य प्रथम ने श्चिमी गंगा सम्राट की मदद से महेन्द्रवर्मन द्वितीय को हराया और मार दिया। इसी समय पल्लव राजधानी कांचीपुरम पर कब्ज़ा कर लिया गया और यह थोड़े समय के लिए बादामी के चालुक्यों के अधीन हो या। 

पर्मेष्वरवर्मन प्रथम (670-690 सी.ई.) ने चालुक्यों को हराने के कई प्रयास किये जिसमें अन्ततः उन्हें सफलता प्राप्त हुई। चालुक्यों पर अपनी विजय को मनाने के लिए अपने आप को ये उपाधियां दीं

  • ग्रदण्ड (प्रबल शासन), और 
  • “रणसिका नगर का विनाशक” | 

रणरसिका उपाधि उसे चालुक्य सम्राट विक्रमादित्य प्रथम के द्वारा दी गयी थी नरसिंहवर्मन द्वितीय के राज्यकाल (695722 सी.ई.) शान्तिपूर्ण था क्योंकि दो राजवंशों के बीच लगातार होने वाले युद्धों का अन्त हो चुका था। उसने राजदूतों को चीन भेजा। 

परमेश्रवर्मन द्वितीय (728731 सी.ई.) को वतापी के शासक विक्रमादित्य द्वितीय के साथ एक अपमानजनक शान्ति संधि पर हस्ताक्षर करने पड़े जब विक्रमादित्य द्वितीय ने कांचीपुरम पर हमला किया। उसे गंगा राजाओं के द्वारा मौत के घाट उतार दिया गया गंगा राजा चालुक्यों के राजनीतिक मित्र थे। परमेश्रवर्मन द्वितीय की मृत्यु के पश्चात् नन्दीवर्मन द्वितीय (731-795 सी.ई.) गद्दी पर बैठा। वह पल्लवों की समानान्तर शाखा से सम्बन्धित था। यह कदव सिम्हविश के भाई भीमवर्मन के वंशज थे और इस तरह कदव परिवार से संबंधित ब ल्लवों का राज्य शुरू हुआ | अपने पूर्वजों की तरह इसे भी विक्रमादित्य से युद्ध करना पड़ा जिसने पुनः पल्लव राजधानी पर आक्रमण किया। यद्यपि चालुक्य शासक ने इस मय तक कांचीपुरम पर कब्जा कर लिया था फिर भी राजधानी को नष्ट नहीं किया और अपने क्षेत्र में वापस जाने का फैसला किया। यह राजनीतिक संघर्षों में देखी गई उदारता का एकमात्र दुर्लभ मामला है। इसे पांड्य शासक ने हराया लेकिन इसने पश्चिमी गंगों को हराने में सफलता प्राप्त की। उसके बाद शासक रहे :

क) दन्तिवर्म

ख) नन्दीर्मन तृतीय

ग) नृपतुंग, और

घ) अपराजित। अपराजित आखिरी शाही पल्लव थे जिन्हें चोल राजाओं ने सामन्त बना लिया। 

3. पांड्य 

सटीक तरीके से पांड्य की उत्पत्ति के बारे में बताना कठिन है। इससे जुड़े कई सारे विचार हैं। हमें पांड्य सम्राटों के नामों का उल्लेख निम्न महत्वपूर्ण साहित्यिक ग्रन्थों में मिलता है

  • संगम साहित्य
  • रामायण और महाभारत महाकाव्यों में
  • श्री लंकाई ऐतिहासिक ग्रंथ महावंश में
  • कौटिल्य की अर्थशास्त्र में, और
  • मेगस्थनीज़ की इण्डिका, जो मौर्य साम्राज्य के राजा चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार मे यूनानी राजदूत था।

कुछ इतिहासकार बताते है कि यह शब्द ‘पांडय’ से लिया गया है। ऐसा भी कहा जाता है कि अगर हम मिल में ‘पांड्य’ शब्द के अर्थ को देखें तो इसका अर्थ पुराना नगर होता है इसकी उत्पत्ति की व्याख्या करने के लिए एक और अनुमान लगाया गया कि इसकी उत्पत्ति पन्डी’ शब्द से हुई है जिसका तमिल में अर्थ ‘वृश होता है और तमिलाहम में वृश शक्ति और बहादुरी का प्रतीक माना जाता है। इस प्रकार यह तर्क दिया जाता है कि पांड्य शासक अपने आप की शक्तिशाली संप्रभु के रूप में प्रस्तुत करने के लिए इसका प्रयोग किया करते थे। पहले राजा जिसने ‘पांड्य’ की उपाधि ली, कुलशेखरन था उसके उत्तराधिकारियों ने भी इसी उपाधि को अपनाया और इस तरह से दावा किया जाता है कि पांड्य उपनाम राजवंश का पर्याय बन गया

पल्लवों की तरह ही, पांड्यों के शासनकाल को निम्न भागों में वगीकृत किया जा सकता है :

1) आरंभिक पांड्य

2) प्रथम पांड्य साम्राज्य; और

3) द्वितीय पांड्य साम्राज्य। 

संगम युग के दौरान आरंभिक पांड्य या संगम युग के पांड्य चेराओं और चोलाओं के समकालीन थे। ये पड़ोसी शक्तियाँ अपने स्वयं की राजनीतिक प्रभुता को स्थापित करने के लिए संघर्षों में लगी हुई थी। और जैसा कि हमने तमिल देश में संगम युग के बाद कालों की उत्पत्ति के बारे में पढ़ा है और साथ ही ये भी पढ़ा है कि उन्होंने पल्लव के शासन का अन्त किया, सी तरह कालभ्रों आरंभिक पांड्यों के पतन का कारण बने । लेकिन पल्लव के तरह, पांड्य भी क्षेत्र में राजनीतिक पकड़ बनाने में सफल हुए। कावेरी नदी पल्लव और पांड्य के बीच सीमारेखा बन गयी। 

पांड्य वंश का सबसे पहला ज्ञात शासक पाल्यगसलाई मुदुकुदुमी पेरूवालुडी था। नेदुन्चिल्यान प्रथम या अय्यप्पुदाई कादंथा नेदुन्चिल्यान इस राज्य के चौथे राजा थे। उसके राजसी उपाधि अय्यप्पुदाई कादंथा का मतलब आर्यों पर विजय थी। उसका नाम सिलापादिकारम नामक महत्वपूर्ण तमिसाहित्य में ल्लेखित है। यह चेरा राजकुमार इलंगो अडिगाल द्वारा लिखा गया है। इस कृति के अनुसार निष्पक्ष नेदुन्चिल्यान न्याय देने में सफल हुए । जब उन्होंने एक निर्दोष आदमी, जिसका नाम कोवलन था जिस पर महारानी की पायल चुराने का गलत आरोप लगाया गया था, को मौत की सजा सुना दी। नेदुन्चिल्यान द्वितीय 

रंभिक पांड्य का महानम शासक था। उने टोंडईमंडलम के युद्ध में चोला और चेरा की संयुक्त ताकतों के हराया। इस कारण वह तमिल क्षेत्र प्राप्त करने में सफल हुआ औअपने पांड्य का राज्य को बढ़ा पाया । संगम युग के बाद उसकी शक्ति में कमी आई और कालभ्रा इस क्षेत्र में एक प्रमुख राजनीतिक शक्ति के रूप में उभरा।

  • काडुंगोन ने छठी शाताब्दी में कालों को हराकर प्रथम पांड्य साम्राज्य की स्थापना की। उसके बाद प्रथम पांड्य साम्राज्य के शासकों ने निम्न उपाधिया लीं:
  • मारावर्मन, और
  • सदायावर्मन (भगवान शिव के उपासक) या सार्दैयां (भय विनाशकों में एक)।

अरिकेसरी मारावर्मन इस साम्राज्य का एक महत्वपूर्ण शासक था। पांड्य अभिलेखों से हम यह जानकारी मिलती है कि उसने चेरा को कई बार हराया और शासन कर रहे चेरा शासक को बन्दी भी बनाया। उसके बेटे-कोचाडिया रणधिरन – के शासनकाल के दौरान चालुक्य पाड्य विद्रोह शुरू हुआ जिसमें बादामी के चालुक्यों को दक्षिणी गंगों की सहायता प्राप्त हुई। उसकी मृत्यु चोलाओं से युद्ध करते हुए हुई। उसका बेटा मारावर्मन राजसिम्हा प्रथम अगला शासक बना और उसने पल्लव शासक नंदीवर्मन द्वितीय के साथ कई युद्ध लड़े और पल्लव क्षेत्र का कुछ हिस्सा अपने कब्जे में कर लिया। उसने चालुक्य और गंगा राजाओं को भी हराया । चालुक्य शासक कीर्तीवर्मन द्वितीय ने अपनी बेटी का विवाह पांड्य राजा के पुत्र से करवाया। इस साम्राज्य का आखिरी शासक मारावर्मन राजसिम्हा तृतीय था। उसे चोला राजा परंटका प्रथम के द्वारा हराया गया। विजयी शासक ने पांड्यों की राजधानी पर कब्जा कर लिया और मदुरईकोंडा की उपाधि ली। धीरे-धीरे जब चोला 10वीं शताब्दी मे फिर से उभरें, पाड्य की शक्तियों पर ग्रहण लग गया। आदित्य कारीकाला जो परंटका चोल द्वितीय का पुत्र था, ने पाड्य शासक वीर पाड्य को हराया

बाद में 13वीं शताब्दी में पांड्य फ़िर से शक्तिशाली हुए । मारावर्मन सुन्दरा पांड्य ने दूसरे पांड्य साम्राज्य की नींव रखी जब उसने चोल शासक कुलोधुंगा तृतीय को औपचारिक रूप से पांड्य प्रभुत्व को स्वीकार रने के लिए विवश किया। जटावर्मन सुन्दरा पांड्य सबसे प्रसिद्ध राजा हुए | इसी समय के दौरान साम्राज्य का क्षेत्रीय विकास बहुत अधिक सीमा तक सम्भव हो सका । उन्होंने काफ़ी सफलतापूर्वतेलगु देश, कलिंग पर कब्जा किया (वर्तमान समय में उडीशा) और सीलोन तक अपने क्षेत्र का विस्तार किया। कुलोधुंगा चोल तृतीय के बाद आये चोल राजा पांडयों की बढ़ती हुई शक्ति को लगाम लगाने में सफल न हो सके। चोलों को होयसाल द्वारा पांड्यों की शक्तियों को कम करने के लिए लगातार सहायता मिलती रही परन्तु चोल अपने क्षेत्रों, प्रतिष्ठा और शक्ति को लगातार खोते हे। क्षिणी भारत में पांड्यान प्रमुख राजनीतिक शक्ति के रूप में उभर कर आये | अखिकार मारावर्मन पांड्य प्रथम ने राजेन्द्र चोल तृतीय और शासन कर रहे होयसाल सम्राट की संयुक्त सेनाओं को मात दीइस प्रकार चोल साम्राज्य का अंत हो गया। हालांकि चोलों के पतन के बाद भी पांड्य लम्बे समय तक जीवित नहीं कर सके। वीर पांड्य और सुंदरा पांड्य, जो मारावर्मन कुलशेखर पांड्य प्रथम के बेटे थे, के बीच उत्तराधिकार के युद्ध का परिणाम यह हुआ कि उनका राजनीतिक पतन हो गया। 

4. पल्लव-पांड्य संघर्ष

संघर्ष और गठबंधन शासकों की राजनीतिक महत्वकांक्षा के परिणाम थे। इनके जरिए शासक अपनी रकारों के उच्च क्रियालाप के लिए ज़्यादा से ज्यादा संसाधन प्राप्त किया करते थे। वातापी के चालुक्य और कांची के पल्लव लगातार एक दूसरे से युद्ध करते थे। 

पल्लव शासक महेन्द्र वर्मन प्रथम ने पल्लव वंश के क्षेत्र को उत्तर से कृष्णा नदी तक पल्ल, पांड्य और कलचुरी विस्तार किया। विष्णुकुंडीन पल्लवों के उत्तर में बसे हुए पड़ोसी राज्य बन गए । पुलकेशिन 

राज्य द्वितीय ने विष्णुकुंडीन को हराया और विष्णुकुंडीन के राज्य क्षेत्र को चालुक्य वंश का हिस्सा बना लिया। चालुक्य राजा ने अपने भाई कुब्जा विष्णुवर्धन को जीते हुए क्षेत्र का वायसराय नियुक्त किया। बाद में विष्णुवर्धन ने पूर्वी चालुक्य वंश या वेंगी के चालुक्य राज्य की स्थापना की। विष्णुकुंडीन के पतन के साथ चालुक्य उत्तर की ओर पल्लवों का पड़ोसी क्षेत्र बन गया। इस तरह महेन्द्रवर्मन प्रथम और पुलकेसिन द्वितीय की विस्तार करने वाली नीतियों ने दोनों को युद्ध क्षेत्र में एक दूसरे के सामने लाकर खड़ा कर दिया। इसने दो वंशों के बीनिरंतर संघर्षों को जन्म दिया। तीसरा महत्वपूर्ण वंश जो वेंगी घाटी में मदुरै के पांड्या हुआ करते थे, ने इस संघर्ष में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। ये तीनों राजनीतिक शक्तियाँ समकालीन हुआ करती थी और लगभग एक ही सय पर प्रसिद्धि प्राप्त कर सकी । पांड्य और चालुक्य पल्लवों के पड़ोसी राज्य थे। प्रत्येक अपनी क्षेत्र सीमाओं को एक दूसरे की कीमत पर बढ़ाना चाहते थे। पांड्य उपजाऊ कावेरी डेल्टा पर कब्जा करने के लिए उत्सुक थे। उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षा को पूर्ण करने के लिए वातापी के चालुक्यों, जो लगातार पल्लवों के साथ युद्ध में संलग्न थे, को अपना राजनीतिक मित्र बनाना उचित समझा। अरीकेसरी पारांकुसा मारावर्मन प्रथम जो पांड्य शासक थे, पांड्य शासक ने चालुक्य राजा विक्रमादित्य प्रथम के साथ संधि की। और ल्लव क्षेत्र का कुछ हिस्सा अधिग्रहण करने का प्रयास किया। पांडया भी दूसरे पड़ोसी वंश चेरा के साथ युद्ध में थे ताकि अपनी क्षेत्रीय सीमाओं को विस्तार कर सके। युद्धों को लड़ना और जीतना शासकों के लिए हमेशा ही गर्व की बात हुआ करती थी। उन्होंने इसे विभिन्न तरीकों से दर्शाया। जंयतवर्मन (645670 ई.) मारावर्मन अवानीसुलेमानी के पुत्र ने, वानावकी उपाधि ग्रहण की जो हमें बताती है कि वह चेरा के विरूद्व कुछ हद कर सफलता प्राप्त कर पाए थे। पांड्य ने सिंहल शासक सेना प्रकी अवधि के दौरान सीलोन पर आक्रमण करने की कोशिश की, इस क्षेत्र को नष्ट किया और एक विशाल लूट को अंजाम दिया। सिंहल का उत्तराधिकारी शासक सेना द्वितीय ने पांड्य से बदला लेने के उद्देश्य से पांड्य राज्य पर आक्रमण किया और लूटकर एक बहुत बड़ा हिस्सा साथ ले गया। 

पांड्य ने पल्लवों के आपसी झगड़ों में हस्तक्षेप कर अवसरों की तलाश की। पांड्य राजा मारावर्मन राजसिम्हा प्रथम (735-765 सी.ई.) में चालुक्य म्राट विक्रमादित्य द्वितीय से सन्धि की और पल्लव राज्य की गद्दी के लिए चित्रमाया को समर्थन दिया। पांड्य शासक ने पल्लव राजा नन्दीवर्मन द्वितीय को कई बार हराया। इस उपलब्धि को उल्लेख करने के लिए उसने पल्लव भंजना (पल्लवों को तोड़ने वाले) की उपाधि ली। अन्त में चित्रमाया को नन्दीवर्मन द्वितीय के सेना नायक द्वारा मार दिया गया। पल्लवों के राजनीतिक मामलों में पांड्य के हस्ताक्षेप और पल्लवों पर निरंतर आक्रमण को देख नंदीवर्मन द्वितीय भयभीत हुआ और उसने मदुरई के पांड्य के बढ़ते हुए प्रभाव को कम करने की चेष्टा की। 

कीर्तिवर्मन द्वितीय के शासन काल में, दन्तीदुर्ग, जो चालुक्य का सामंत था और उच्च राजनीतिक महत्वाकाक्षायें रखता था, एक स्वतंत्र क्षेत्र को तलाशने का प्रयास कर रहा था। उसने, इस प्रक्रिया में, पल्लव शासक नन्दीवर्मन द्वितीय पआक्रमण किया। नन्दीवर्मन द्वितीय ने दन्तीदुर्ग के साथ भयंकर लड़ाई लड़ी और इसीलिए वार्ता के बाद, दन्तीदुर्ग ने अपनी पुत्री रेवा का विवाह नंदीवर्मन द्वितीय से करवाया। इसी बीच, दन्तीदुर्ग ने कीर्तिवर्मन द्वितीय को हराया और मान्याखेत के राष्ट्रकूट सामाज्य की नींव डाली । तभी चालुक्यों ने, जिनकी संधि पश्चिमों गंगा वंश के साथ थी पल्लवों के विरूद्व कई लड़ाइयाँ लड़ी। पल्लव के राजनीतिक प्रभाव को रोकने के उद्देश्य से पांड्यों ने चालुक्यों को अपना राजनीतिक सहयोगी बनाया। इसी तरह नन्दीवर्मन द्वितीय वैवाहिक संधि के बाद पांड़यों की शक्ति को कम करना चाहते थे इसीलिए वातापी के चालुक्य को दंडीदुर्ग के द्वारा विस्थापित कर दिया गया। पल्लव शासक पांड्यों के विरूद्व शासकों को सहयोग देकर उनके आत्मविश्वाको बढाने की कोशिश कर रहे थे। कोंगु नामक राज्य दक्षिण गंगा वंश के निकट स्थापिथा। संघ के राज्यों में एक था। कोंगु के शासक को पांड्य द्वारा शिकस्त दी गयी और उसके राज्य की पाड्य क्षेत्र में मिला दिया गया। पाड्य पल्लव क्षेत्र में भीतर तक घुस गये । पल्लव पांड्यों की बढ़त को दबाने में असफल रहे। फ़िर भी, ई पराजयों और विजयों के वावजूद, कोई भी पक्ष लम्बे समय तक क्षेत्रीय विस्तार व लाभ का दावा न कर सका। निरन्तर आक्रमण और आपसी हमले और हानियाँ व लाभ होते रहे। 

5. अंतर्काल और पतन

कालभ्रों ने पांड्यों को कुचल दिया। इस तरह पांड्य शासन में अनिरंतरता का काल प्रारम्भ हुआ। इसीलिए इस समय को कालभ्र अंतर्काल के नाम से जाना जाता है जो तीसरी से 6-7वीं शताब्दी हा। कालभ्र के उद्गम के बारें में कोई जानकारी नहीं है। ऐसा माना जाता है कि छठी शताब्दी के अन्त और 7वीं शताब्दी के शुरुत में काडुंगन के अन्तर्गत पांड्य फिर से अस्तित्व में आये। उसने पांड्य शक्तियों को फिर से संगठित किया। पल्लवों को भी कालभ्र का सामना कना पड़ा और बाद में सिंह विष्णु के अन्तर्गत वे फिर से संगठिहुए। ह शाही पल्लवंश के संस्थापक बने । कालभ्र के अंतर्काल के समाप्त होने के बाद, ये राज्य दुबारा फलीभूत हुए। 

एक समृद्ध शक्ति के रूप में पल्लवों के सम्मान को एक गहरा धक्का लगा जब चालुक्य शासक विक्रमादित्य द्वितीय ने पल्लव वंश पर आक्रमण किया और कांचीपुरम पर कब्ज़ा किया। बाद में कुम्भकोनम के निकट पांड्य शासक श्रीमारा श्रीबल्लम (5-862 सी.ई.) ने नंदिवर्मन तृतीय का दमन कर दिया। पल्लव राजा की मृत्यु के बाद उनके तीन बेटों के बीच उत्तराधिकार को लेकर युद्ध हुआ। इस शक्ति संघर्ष में शाही भाईयों में एक नुपटुंगा की मौत हो गयी। चोल राजा आदित्य चोल ने पांडय शासक कमवर्मन के साथ मिलकर दूसरे ल्लव भाई राजिता को हरा दिया जबकि तीसरे ने 10वीं शताब्दी के आगमन के समय ही शाही चोल के अधिपत्य को स्वीकार किया। इस तरह, आखिरकार यह गृह युद्ध शाही पल्लव के शासन के विघटन का कारण बना। इसके अतिरिक्त पल्लव चालुक्यों जिन्हें पश्चिमी गंगों का समर्थन प्राप्त था के विरूद्व लगातार युद्ध में लीन रहे। पांड्य, राष्ट्रमिठ र चोल ने भी जब भी उन्हें मौका मिला, राज्य पआक्रमण किया। 

इसी तरह, पांड्य राज्यवंश में भी उत्तराधिकार को लेकर किये गये युद्ध ने गृह युद्व की स्थिति उत्पन्न की, जो उनके पतन के कारणों में से एक था। 1311 में मलिक कफूर अलाउद्दीन खिलजी का सैन्य अधिकारीने मदुरै पर आक्रमण किया। इस समय दो भाईयों वीरा पांड्य और सुन्दरा पांड्य के बीच राजगद्दी के लिए युद्ध चल रहा था। ऐसा कहा जाता है कि कफूर के सभी दक्कन र दक्षिण भारत का सैन्य अभियानों में भौतिक रूसे मदुरै पर आक्रमण सबसे सन्तोषजनक था। यह सिद्ध करता है कि पाड्य एक धनी राज्य था लेकिन आक्रमण ने उनकी स्थिति को कमजोर कर दिया था। इस तरह पांड्या के सांमत अपनी शक्तियों को स्वतन्त्र रूप से लागू कर सके। पांड्य तक अपनी उत्तरी क्षेत्र को काकातियों को हार गए। बाद में दिल्ली सल्तनत ने दो और आक्रमण किये । अन्तिम उल्लघ खान (मोहम्मद बितुगलक) द्वारा किया गया, और इस सपांड्य क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया गया और सल्तनत में मिला दिया गया। लेकिन मोहम्मद बिन तुगलक के शासन काल के दौरान (13251351 ई.) सल्तनत ने मदुरै पर अपना अधिकाखो दिया और मदुरै सल्लतत की स्थापना हुई। 

6. कल्चुरी

अब हम कालचुरी वंश के राजनीतिक इतिहास के बारे में जानेंगे। इनको हैहयास के नाम से भी जाना जाता है। कलचुरी के इतिहास की उत्पति बहुत स्पष्ट नहीं है। वे क्षेत्रिय जनजाति से सम्बन्ध खते थे। इनका उल्लेख महाकाव्य और पुराणों में मिलता है। माहिश्मती के प्रारंभिक कलचुरियों या कलचुरियों का उदय वर्तमान गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र में हुआ था। इस राजवंश के कुमहत्वपूर्ण शासक थे: 

  • कृष्णरा,
  • शंकरगण, और
  • बुद्धराजा

उन्होंने 550620 सी.ई. तक शासन किया। शुरुआती कलचुरियों को उनके पड़ोसी राज्यों वातापी के चालुक्यों और वल्लभी के मैत्रकों के कारण कठिनाई का सामना करना पड़ा। इन दोनों राज्यों को उन पर राजनीतिक दबाव था और आखिरकार, उनकी शक्ति कम हो गई। बुद्धराज को अपने काल में दो बार चालुक्यों के खिलाफ लड़ना पड़ा। पहली लड़ाई में वह मंलेश से हार गया था और दूसरे में वह पुलकेशिन द्वितीय से हार गया था। इन पराजयों ने हालांकि कलचुरियों को कमजोर कर दिया गया था फिर भी वे जीवित रहे। पूर्वी औपश्चिमी चालुक्यों के साथ उनके वैवाहिक संबंध थे। 

9वीं शताब्दी तक हम कलचुरी की अनेक संपार्श्विक शाखाओं से अवगत हुए। इनमें से प्रमुख थे:

  • चेदि के कलचुरी (जिसे त्रिपुरी के कलचुरियों के रूप में भी जाना जाता है), और 
  • दक्कन के कलचुरी। लचुरियों की कुछ अन्य शाखाएँ भी थीं, जैसे
  • तनपुर के कलचुरी, 
  • दक्षिण कोशल के कलचुरी
  • रतनपुर के कलचुरी, THE PEOPLE
  • गोरखपुर के कलचुरी, UNIVERSITY 
  • रायपुर के कलचुरी आदि।

रतनपुर के कलचुरी राजवंश की स्थापना कोकला प्रथम के एक पुत्र, चेदि का कलचुरी शासक द्वारा की गई थी। प्रारंभ में यह चेदि के कलचुरियों के अधीन था। 12वीं शताब्दी में जज्जलदेव प्रथम के अंतर्गत यह स्वतन्त्र हो गया। उन्होंने शाही उपलधियां धारण की: 

  • धर्ममहाराजधिरा, और 
  • परमेश्वर 

रतनपुर के कलचुरी ने दक्षिण कोशल पर विजय प्राप्त की। बाद में, रतनपुर कलचुरी से एक र शाखा उत्पन्न हुई और इसे रायपुर के कलचुरी के रूप में जाना गया। 

चेदी के कलचुरी और दहलमंडला शासकों ने अपनी राजधानी त्रिपुरी से शासन किया जो अब मध्य प्रदेश में जबलपुर के पास एक गाँव है। इस शाखा के प्रथम महत्वपूर्ण राजा कोकला प्रथम थे, जिनका शासनकाल लगभग 845 सी.ई. में शुरू हुआ। उन्होंने प्रतिहार सम्राट भोज प्रथम को हराया। उन्होंने राष्ट्रकूट राजा कृष्ण द्वितीय को भी पराजित किया था, जिनकी हार के बाद राष्ट्रकूटों ने कलचुरियों के साथ वैवाहिसंबंध रखना शुरू कर दिया था । इस प्रकार, हम देखते हैं कि कोकल्ला प्रथम अपने सैन्य कौशल और सफलताओं के माध्यम से कलचुरियों की प्रतिष्ठा बढ़ाने में सक्षम रहा। उसके बाद उसका बड़ा बेटा शंकरगणा गद्दी पर बैठा। उनकी मृत्यु के बाद, बल्हारशाह सत्ता में आया, उसके बाद युवराज प्रथम | उसकी अवधि के दौरान हुई सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक घटना राष्ट्रकूट राजा कृष्ण तृतीय और उसके बीच की लड़ाई थी, जिसमें वह पराजित हुआ। उसके राज्य पर कृष्ण तृतीय का कब्ज़ा हो गया। लेकिन कृष्ण तृतीय लंबे सय तक कलचुरियों से हड़पे हुए क्षेत्र को नहीं रख सके। युवराज प्रथम, अपने हारे हुए राज्य को पुनः प्राप्त रने में सफल रहा। उसके बाद लक्ष्मणराज, युवराज द्वितीय और कोकल्ला द्वितीय कलचुरी सिंहासन पर बैठे। 

सके बाद गंगेयदेका महत्वपूर्ण शासन प्रारम्भ हुआ। इसे कलचुरी का महानतम राजा माना जाता है। उसके शासनकाल के दौरान कलचुरी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति बन चुका था। उसने विक्रमादित्य की उपाधि ली। उसने विस्तारवादी नीतिओं को अपनाते हुए अपने राज्य के विस्ताकरने की कोशिश की। उसने दक्षिण कोशल के राजा महाशिवगुप्त यायाति का दमन किया और त्रिकालिंगाधिपति (त्रिकालिंगा के भगवान) की उपाधि ली। उन्होंने पाल सम्राट महीपाल प्रथम को भी हराया और बनास पर कब्जा कर लिया। उन्होंने चालुक्य राजा जयसिम्हा के खिलाफ पारमारों और चोलों के शासकों के साथ एक गठबंधन बनाया लेकिन जयसिम्हा ने उन्हें हरा दिया। बाद में, पारमार शासक और साथ ही बुंदेलखंड के चंदेल राजा ने भी उसे हराया। गंगेयदेव के बाद कई कलचुरी नरेश एक के बाद एक सफल हुए। विजयसिम्हा चेदि कलचुरियों का अंतिम शासक था। 

12वीं शताब्दी के दौरान एक राजनीतिक इकाई के रूप में कल्याणी कलचुरी अस्तित्व में आया । उनका शासन लगभग 1156 से 1181 सी.ई. तक था। उन्होंने वर्तमान कर्नाटक औमहाराष्ट्र के कुछ हिस्सों पर शासन किया। हालाँकि उन्होंने बहुत संक्षिप्त अवधि अर्थात् 25 वर्षों तक के लिए शासकिया था। उनका शासन बिना किसी महत्व के नहीं था। बिज्जला द्वितीय इस राजवंश का संस्थापक था और कलचुरियों की इस शाखा का सबसे महत्वपूर्ण शासक भी थाइससे पले, उन्हें चालुक्य वंश के राज्यपाल के रूप में नियुक्त किया गया था। लेकिन, उन्होंने तेला तृतीय के शासनकाल के दौरान अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की। उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र सोमेश्वर और संगम कल्याणी के राजगद्दी पर बैठे, लेकिन वे इतने मज़बूत नहीं थे कि वे कलचुरियों की शक्ति कायम रख सकें और चालुक्य अपने खोए हुए क्षेत्र को पुनः प्राप्त कर सकें। 

7. शासन प्रबन्ध

नीचे दिये गए भाग में हम उपरोक्त में उल्लेखित किये गये वंशों के दौरान प्रशासनअर्थव्यवस्था, समाज, धर्म, साहित्य, कला और वास्तुकला से परिचित होने जा रहे हैं। 

पल्लवों के प्रशासन को समझने के लिए हम उनके केंद्रीय प्रशासन और स्थानीय प्रशासनिक इकाइयों को देखेंगे। पल्लवों के पास वंशानुगत राजतंत्र था। राजा अपने राज्य में सर्वोच्च अधिकारी थे, न्यायपालिका विभाग के सर्वोच्च प्रमुख, सेना के सर्वोच्च नेता आदि | उन्होंने धर्म-महाराजा की उपाधि को इसलिए अपनाया कि वे धर्मशास्त्रों के सिद्धांतों के अनुसार अपने राज्य का संचालन करते थे। पल्लव प्रशासनिक प्रणाली अच्छी तरह से संरचित थी। अमात्य नामक नियुक्त मंत्री राजा को अपनी सेवाएं और सहायता प्रदान करते थे। सरकारी विभागों का नेतृत्व शाही सदस्यों जैसे कि राज्य के शाही कुमार करते थे। शाही परिवार के सदस्यों के अलावा प्रतिष्ठित सेना-अधिकारियों को भी शाही विभागों की देखरेख का काम दिया जाता था। राजवंश के पास एक सुव्यवस्थित सेना थी| पल्लव साम्राज्य के प्रशासनिक विभाग गुप्त साम्राज्य के समान थे। राज्य के क्षेत्र को पल्लव शिलालेखों में राष्ट्र, देश या मंडला कहा जाता है। क्षेत्र के लिए ये शब्द गुप्त शिलालेखों में भी पाए जाते हैं। पूरे राज्य या राष्ट्र को कई प्रशासनिक इकाइयों में विभाजित किया गया थाः 

  • कोट्टम, और
  • नाडु।

प्रत्येक कोट्टम राजा द्वारा नियुक्त अधिकारियों की देखरेख में था। ग्राम बसे छोटी प्रशासनिक इकाई थी। गांवों के प्रशासन की देखभाल के लिए कई स्थानीय विधानसभाएं थीं जो प्रकृति में स्वायत्त थीं। सभा और उर उनमें से सबसे महत्वपूर्ण थे। सभा आम तौर पर ब्रह्मादेय गाँवों (ब्राह्मणों को दिए गए गाँव) में पाए जाते थे। इसलिए, वे ऐसी सभाएँ थीं जिनके सदस्य ब्राह्मण जाति के थे। उर में विभिन्न जातियों के लोग शामिल थे। ये स्वशासित विधानसभाएँ निम्नलिखत कार्यों में शामिल थीं

  • मंदिरों का प्रबंध
  • सिंचाई टैंकों की मरम्मत कराना। 
  • दानशील कार्यों को करना आदि।

ग्राम सभाएँ पल्लव वंश के विभिन्न हिस्सों में कार्य कर रही थी और ग्रामों के प्रभावी कामकाज के लिए बहुत महत्वपूर्ण थी लेकिन केन्द्रीय सरकार से जुड़े हुए उनके कार्यों विभिन्न पहलुओं के बारे में कोई जानकारी नहीं है। केन्द्रीय सरकार और ग्राम कृषि योग्य और बेकार भूमि जल निकायों जैसो नदियाँ और झीले कुएँ और सिचाई टैंक या कृत्रिम जलाशय, राज्य में पाई जाने वाली चट्टानों और पेड़ों का भी एक सम्पूर्ण लेखा जोखा रखते थे। क्योकि ये भूमि के लिए महत्वपूर्ण संसाधन थे। राज्य के राजस्व का प्रमुख स्त्रोत भूमि कर था। फिर भी निम्न से कोई कर नहीं लिया जाता था: 

  • देवदान (मंदिरों को दी गई भूमि)
  • अग्रहार (ब्राह्मणों द्वारा बसाई गई भूमि), र 
  • ब्रह्मदे(ब्राह्मण या पुरोहित वर्ग के समूह को दी गई भूमि)।

अन्य प्रकार के कर भी थे जैसे

  • राइ
  • कानम
  • पूची, और
  • पातमा

बुनकरों पर लगाये गये कर को थन ईराइ और शिल्पकारों पर लगाया गया कर कुसकानम कहा जाता था। ताड़ी-उत्पादक, तेली (तेल निकालने वाले), सुनार, पशुपालाकरने वाले, धोबी, पड़ा निर्माता आदि को कर चुकाना पड़ता था। ग्रामों से दो तरह के कर लिये जाते थे। 

1) भूमि का राजस्व जो किसान भुगतान करने के लिए बाध्य थे। यह भूमि की उपज के एक-छठे से एक-दसवें तक होता है। यह गांव द्वारा एकत्रित किया जाता था और राज्य समाहर्ता (collector) को दिया गया था। 

2) दूसरा प्रकार का कर स्थानीय था।

ये कर ग्रामों से जमा किये जाते थे और रखरखाव के लिए प्रयोग किये जाते थे। विभिन्न साधनों से लिये गये करों को राजा और उसके परिचारक वर्ग पर, उसकी सेना और नौसेना आदि के रखरखाव के लिये व्यय किया जाता था। पल्लव ने एविशाल सेना को बनाये रखा था। पैदल सैनिक, घुड़सवार, हाथी और रथ सेना की चार शाखायें थीं। चुकि अच्छी नस्ल के घोड़े स्थानीय जगहों पर उपलब्ध नहीं होते थे, इस कारण पल्लवों को उत्तरी भारत या दक्षिणी एशिया से आयात कराने पड़ते थे। इसी कारण इन्हें राजस्व का बहुत बड़ा हिस्सा सेना के घुड़सवारों पर व्यय करना पड़ता था। उनके पास नौ सेना भी थी।

जैसा कि हमने पहले चर्चा की है, जब पल्लव राजा नृसिंहवर्मन के दबार में सीलोनियों का निर्वासित राजकुमार आया था, उसने दो नौसेना अभियान सीलोन भेजी थी।

पांड्य शासक वेदांर (अभिशिक्त शासक) थे। पल्लव पांड्य की तरह उनका शासन भी आनुवंशिक था बावजूद इसके, उत्तराधिकार के युद्ध होते रहते थे। उच्चतम न्यायालय सभा या मनरम थे। पाण्ड्यों के राज्य मंडलम (प्रांतों) में विभाजित किया गया था और मंडलम को नाडु या वलनाडु (उप-प्रांतों) में विभाजित किया गया था। एक नाडु में कई गाँव शामिल थे। गाँव प्रशासन की देखभाल के लिए निम्नलिखित पाँच वरियम्स (समितियाँ) नियुक्त की गई: 

  • नीरनिलई वरियम,
  • अरनिलया वरियम,
  • ननया वरियम,
  • वरीथंडल वरियम, और
  • नीधी वेरियम।

वरियम ग्राम संगठन की एक विशिष्ट विशेषता बन गया। खेती में लगे लोगों को भूमिपुत्र के रूप में जाना जाता था। 

8. अर्थव्यवस्था

गुप्त काल के बाद से उत्तर भारत के साथ-साथ दक्षिण भारत में भूमि-अनुदान की प्रथा गातार होती ग। यह कृषि भूमि के विस्तार में उपयोगी थी क्योंकि कई अक्षत भूमि को दान दी जाती थी। पल्लव साम्राज्य बहुत समृद्ध था। पल्लव अभिलेखों से पता चलता है कि पल्लव शासकों ने कई भूमि-अनुदान किये। उन्होंने मंदिरों के रखरखाव के लिए भूमि दान की जो महत्वपूर्ण आर्थिक केंद्रों के रूप में उभरे। उन्हें समृद्ध दान प्राप्त हुये। उन्हें मगामई नामक ग्रामीणों के समूह से खाद्यान्न का अनिवार्य दान प्राप्त होता था। मंदिरों में कोयल परिवारम (अनुष्ठाविशेषज्ञ) थे। वार्षिक त्यौहारों पर ये लोएक बड़े पैमाने पर लोगों को आकर्षित करते थे व अनुदान प्राप्त करते थे। 

ह्वेनत्सांग, जिन्होंने कांचीपुरम की यात्रा की थी, ने अपनी रचना में पल्लव की राजधानी का उल्लेख किया है, जिसके अनुसार पल्लव क्षेत्र बहुत उपजाऊ था और इसलिए, कृषि क्षेत्र का विकास हुआ। कृषि उत्पादन अधिक था। वन भूमि का उपयोग खेती के लिए भी किया जाता था। इसलिए, जंगलों ने न केवल लड़ी और हाथियों को प्रदान किया, ल्कि कृषि भूमि के विस्तार में भी मदद की। पल्लवों ने राज्य के विभिन्न हिस्सों में कृषि को बढ़ावा देने के लिए सिंचाई की सुविधा प्रदान की थी। कई सिंचाई टैंक बनाए गए थे और कुछ आज तक बच गए हैं। कई बड़े सिंचाई टैंक बताते हैं कि उन्हें बड़ी संख्या में विशेषज्ञों की आवश्यकता होगी। गांव के कई लोगों के पास टैंकों के निर्माण और उचित रखरखाव की देखभाल के लिए एक अलग टैंक पर्यवेक्षण समिति थी। 

पल्लव काफी हद तक चालुक्यों और पांड्यों के साथ संघर्ष में लगे हुए थे। लेकिन शांतिपूर्ण समय के दौरान वे अपने राज्य में व्यापार और वाणिज्य में सुधार की ओर अधिक ध्यान दे सकते थे। नरसिंहवर्मन द्वितीय राजसिम्हा (700728 सी.ई.) ने तुलनात्मक रूप से शांतिपूर्ण शासन का आनंद लिया था क्योंकि के समय में चालुक्य शासक के साथ लड़ाई नहीं लड़ी ई थी। समुद्री व्यापार को बढ़ावा मिला। महाबलीपुरम एक व्यस्त पल्लव बंदरगाह था और यहाँ जहाजों, पर सामान लादना व उतारना होता था। जब पल्लव सम्राट नरसिंहवर्म प्रथने सीलोन के लिए दूसरी बार अपना नौसेना अभियान भेजा तो बंदरगाह से उनकी सेना को भेजा गया। उनके पास नागपट्टिनम में जहाज बनाने का स्थान भी था। 

पांड्यों के पास आंतरिक और बाहरी दोनों तरह से समृद्व व्यापार था। वही अनेक विभिन्न प्रकार के व्यापारी (वणीयार ) थे जैसे: 

  • नमक
  • सोना
  • धार-फार
  • कपड़ा आदि।

वे कई व्यापारिक सहकारी समितियों में संगठित थे। बाहरी व्यापार में लगे लोगों को पराव या रतवत कहा जाता था। नगरत्तर एक अन्य प्रकार के सक्रिय व्यापारी थे। पांड्यों ने मसाले (विशेष रूप से काली मिर्च), लकड़ी, सोना और चंदन का निर्यात किया। लेकिन निर्यात की प्राथमिक वस्तु मोती थेपांड्य साम्राज्य अपनी मोती पालन के लिए भी जाना जाता था। मार्को पोलो – एक इतालवी अन्वेषक ने इस राज्य के मोतियों की अत्यंत उत्तम गुणवत्ता के बारे में बताया हैं। उनके प्रमुख बंदरगाह शहर थे। 

  • कोरकाई 
  • कायल 
  • पेरियापट्टिनम आदि।

पांड्यों का अंतर-महाद्वीपीय व्यापार था। विदेशी व्यापारियों और यात्रियों ने पांड्य साम्राज्य को मबर के रूप में संबोधित किया जो कि नौका या मार्ग के लिए एक अरबी शब्द है। यह क्षेत्र के महत्व को रेखांकित करता है और इस बात का प्रमाण है कि यह अक्सर फारस की खाड़ी और अरब क्षेत्र के व्यापारियों और यात्रियों द्वारा दौरा किया जाता था। पोलो ने अपने वृतान्त में बताया है कि पांड्य राजाओं ने व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा देने में रुचि ली और देशी और विदेशी व्यापारियों को व्यापारिक तिविधियों में संलग्न होने के लिए अनुकूल स्थिति प्रदान की। पांड्यों द्वारा आयात की जाने वाली प्रमुख वस्तुओं में से एक घोड़े थे। प्रारंभिक पांड्यों का रोम, यूनानी, चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ भी एक समृद्ध व्यापार संबंध था। रोमन साम्राज्य और पांड्य साम्राज्य के बीच राजदूतों का आदानप्रदान था। लगभग 361 सी.ई. में एक पांड्य शासक ने रोमन सम्राट जूलियन के दरबार में एक दूत भेजा था। हमें ग्रीक वृतान्तों में पांड्य राजाओं के नाम भी मिलते हैं।

कलचुरी ने एक समृद्व अर्थव्यवस्था बनाई। त्रिपुरी के कलचुरी ने एक क्षेत्र पर कब्जा किया जो खनिज संसाधनों में काफी धनी था। अपने क्षेत्र में राजा सर्वोच्च प्रभु थे। उनके शिलालेख बताते हैं कि वह पूर्ण ग्रामों को दाकरते और ऐसे दान केवल उन्हीं के द्वारा किये जाते। राज्य का खानों और मूल्यवांसंसाधनों के ऐसे अन्य भंडार पर एकाधिकार था। राजा द्वारा ब्राह्मणों को दी गई भूमि ने पुरोहित वर्ग को सामाजिक और आर्थिक रूसे शक्तिशाली बना दिया। कृषि के उत्थान के लिए सिंचाई सुविधायें प्रदान की जाती थी। चुंकि वन भूमि में चेदी के कलचुरी का क्षेत्र काफ़ी समृद्व था इसलिए उन्हें वन उत्पादों का पूरी तरह से उपयोग रने और अपने उद्योग विकसिकरने में सक्षम बनाया। कच्चे माल के लिए जंगलों तक आसान पहुंच के कारण लकड़ी के काम और धर्मशोधन उद्योगों को विशेष रूप से बढ़ावा दिया गया था। इस अवधि के दौरान प्रचलित अन्य उद्योग थे 

  • खनन,
  • तेल खनन,
  • कपड़ा,
  • धातु,
  • शराब निर्माण, और
  • पत्थर के काम के उद्योग।

कस्बों में आंतरिक व्यापार से संबंधित कई गतिविधियाँ आयोजित की गईं। मंडापिका में बाजार में बिकने वाले सभी उत्पादों पर कर लगता था। इन उत्पादों को तब विथि (दुकानों) में बेचा जाता था। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि त्रिपुरी के रूप में चेदि के कालचुरियों की राजधानी वह स्थान था जहाँ से होकर कई व्यापार मार्ग गुजरते थे, इसलिए उनकी अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिला होगा

9. समाज

शासक और पुरोहिवर्ग का अन्योन्याश्रित संबंध था। ब्राह्मणों ने सत्तारूढ़ वंश को राजनीतिक वैधता प्रदाकी और राजाओं ने उन्हें कर मुक्त भूमि प्रदान की। भूमिअनुदान की प्रथा, जैसा कि हले उल्लेख किया गया है, ने ब्राह्मणों के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक आधारों को और मज़बूत किया। उन्होंने उच्च सामाजिक स्थिति प्राप्त की। तमिल समाज में पल्लवों के दौरान एक महान परिवर्तन आया। उनके तहत दक्षिण भारत का “आर्गीकरण” पूरा हुआ। उन्होंने जिन स्मारकों का निर्माण किया, वे मुख्यतः हिंदू देवी देवताओं को समर्पित धार्मिक संरचनाएँ थीं। मंदिरों ने धार्मिक विचारों का प्रसार किया, लेकिन उन्होंने धर्मनिरपेक्ष कार्यों को भी किया। पुस्तकालयों के साथ कई मंदिर थे और इस प्रकार, वे धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष शिक्षा के केंद्र बन गए। मंदिरों से जुड़े शिक्षण संस्थान थे: 

  • घटिका, और 
  • मठ।

धनी मंदिरों में कुशल संगीतकार, गायक और नर्तक थे। नर्तकियों को रोजगार देने की प्रथा देवदासी प्रणाली में विकसित हुई। इस अधि के दौरान नर्तकियों को उनके कौशल के लिए सम्मानित किया जाता था। यहां तक कि शाही महिलाओं ने भी यह कौशल हासिल किया। नरसिंहवर्मन द्वितीय की एक रानी, रंगापट, एक कुशल नर्तकी थी। इसलिए मंदिरों ने न केवल धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष शिक्षा का प्रचार किया बल्कि एक नियोक्ता के रूप में भी काम किया। 

पल्लवों के अन्तर्गत पनपने वाले भक्ति आंदोलन ने उनकी सामाजिक संरचना पर एक बड़ा प्रभाव डाला। हम पाते हैं कि इस क्षेत्र में भक्ति पंथ के बढ़ते प्रभाव के कारण बौद्ध धर्म और जैन धर्म का प्रभाव कम हुआ। आंदोलन के संत कवियों और कवित्रियों का संबंध दोनों उच्च और निम्न जातियों से थाः। जैसे:: 

  • अरासर (राजा),
  • ब्राह्मण,
  • वेणीगर (व्यापारी),
  • वेल्लाला (किसान),
  • कुयवर (कुम्हार),
  • वेदार (शिकारी) आदि।

जाति प्रथा पल्लव समाज का एक महत्वपूर्ण पहलू था। प्रत्येजाति को व्यावसायिक वर्गों में संगठिकिया गया था जो वंशानुगत थे। किसी एक व्यक्ति के जाति और व्यवसाय अंतर-संबंधित थे। 

वर्ग भेदों ने पांड्य समाज में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रारंभिक पांड्य समाज में लोकई वर्गों में विभाजित थे। राजा सामाजिक पदानुक्रम के शीर्ष पर थाः

i) अरिवर्स (ज्ञानी संन्यासी)

ii) उलावर (किसान वर्ग)

iii) पोरुप्पन (योद्धा वर्ग)

iv) अय्यर (चरवाहे)

v) वेदुवार (शिकारी)

vi) कारीगर (सुना, लोहार आदि)

vii) वैलेयर (मछुआरे) और अंत में

vii) पुलेयर (मेहत) जो समाज के सबसे निचले पायदान पर थे।

विभिन्न प्रकार के सामाजिक र्गों ने सामाजिक असमानता पैदा की। समाज का स्वरूपितृसत्तात्मक था। महिलाओं को पुरुषों के बराबर नहीं माना जाता था। उनके पास संपत्ति का कोई अधिकाहीं था। विधवाओं की स्थिति अच्छी नहीं थी। सती प्रथा स्पष्ट थी और इसे टिप्पायडल कहा जाता था। पुपांडियान नाक एक पांड्य शासक की मृत्यु पर उसकी रानी ने इस रिवाज का पालन किया। पांड्य साम्राज्य के दौराराजा बहुविवाह करते थे। पोलो ने उल्लेख किया है कि राजा के पास कई भरोसेमंद मंत्री थे जो उनकी मृत्यु पर अपने राजा के अंतिम संस्कार की चिता पर जल जाते थे। हालाँकि, महिलाओं को शिक्षा दी जाती पी और उन्हें अपने पति को चुनने का विशेषाधिकार था। संगम युग में जो महिलाएं इयाल (साहित्य), ईसाई (संगीत) और नाटकम (नाटक) में निपुण थीं, उन्हें मृदुकुरवई माना जाता था। तमिल महाकाव्य सिलपदिकाराम (100300 सी.ई.) कन्नगी (कोवलन की पत्नी) को मुदुक्कुरवई के रूप में वर्णित करता है। 

पल्लव के भांति पांड्य साम्राज्य के मंदिर भी धार्मिक प्रतिष्ठानों से कुछ अधिक थे। उनके सामाजिक और आर्थिक पहलु भी थे। उन्हें राजाओं, राजकुमारों और अमीर व्यापारियों से भव्य उपहार मिलते थे। इस तरह के समृद्ध बंदोबस्तों ने उन्हें कई सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र बना दिया जैसे: 

  • नृत्य
  • संगीत
  • गायन
  • गहना बनाना आदि ।

कई मंदिरों में पुस्तकालय थे जो शिक्षा की सुविधा प्रदान करते थे। उनमें वेदों और पुराणों का अध्ययन और पाठ किया जाता था।

कलचुरी शासकों ने मठों और मंदिरों से जुड़ी ऐसी शिक्षण संस्थाओं को भी भूमि-अनुदान दिया। वे वर्णाश्रम धर्म के आदर्श में विश्वास करते थे, जो प्राचीन भारतीय समाज की महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक था, जिसके अनुसार समाज को चार वर्णों (वर्गों) में विभाजित किया गया था। कल्याणी के कलचुरियों के अन्तर्गत बसवन्ना द्वारा वीरशैव आंदोलन ने समानता के सिद्धांत को बढ़ावा देना शुरू कर दिया। उन्होंने विभिन्न जातियों और वर्गों से संबंधित पुरुष और महिला दोनों अनुयायियों के बीच सहज चर्चा को प्रोत्साहित करने के लिए अनुभव मंतपा जैसे सार्वजनिक संस्थान की स्थापना की।

10. धर्म 

पल्लवों ने अपने राज्य में ब्राह्मणवादी धर्म के विकास में योगदान दिया। उनके शिलालेख से हमें पता चलता है कि उन्होंने अश्वमेध जैसे वैदिक यज्ञ कि। 

महेन्द्रवर्मन प्रथम ने अपने काल के प्रारंभिक चरण में जैन धर्म का पालन किया लेकिन एनयनमार संत अप्पार (जिसे तिरुनावुक्करसु के नाम से भी जाना जाता है) द्वारा ब्राह्मणवादी आस्था में परिवर्तित हो गए। वह शिव के उपासक बन गये। उनकी रचना मत्तविलास प्रहसन अपने राज्य में विभिन्न धर्मों के अनुयायियों की मौजूदा स्थिति पर कुछ दिलचस्प प्रकाश डालता है। 

ह्वेनत्सांग ने कांचीपुरम की अपनी यात्रा के दौरान उल्लेखित किया है कि बौद्ध धर्म एक कठिन परिस्थिति में था । महायान बौद्ध धर्म के अध्ययन में लगभग 100 संघाराम (बौद्ध मठ) और 10,000 बौद्ध पुजारी लगे हुए थे। हिंदू और जैन मंदिरों की संख्या लगभग 80 थी। एक बौद्ध विद्वान धर्मपाल, जो बाद में नालंदा विश्वविद्यालय के प्रमुख बने, कांचीपुरम से थे। हालांकि, इस समय के दौरान बौद्ध और जैन धर्म शाही संरक्षण नहीं पा सके। वैष्णववाद और शैव धर्म के अनुयायियों के रूप में पल्लव शासकों ने बड़े पैमाने पर ब्राह्मणवादी मान्यता को संरक्षण दिया और यह पल्लव कला, वास्तुकला शाही खिताब, और कराधान प्रणाली आदि में देखा जा सकता है। पल्लवों द्वारा पत्थर को काटकर बनाई गई धार्मिक संचनाओं के साथ ही दक्षिण भारत में मंदिर-निर्माण की परंपरा शुरू हुई थी। शासकों द्वारा मंदिरों का निर्माण इन निम्नलिखित कारणों के लिए किया जाता थाः 

  • किसी विशेष देवता की भक्ति,
  • लड़ाई में जीत का पुण्यस्मरण, या
  • अपनी शक्ति पर जोर देना।

नरसिंहवर्मन द्वितीय ने शंकरभट्ट की उपाधि ली जिसका अर्थ है शिव का उपासक | उन्होंने  इनका निर्माण शुरू किया : 

  • कांची में कैलाशनाथ मंदि
  • पेनामलाई में शिव मंदिर, और 
  • ममल्लापुरम में शोर मंदिर।

मंदिरों ने प्रत्येक गांव में कई महत्वपूर्ण कार्य किए और इस प्रकार, धार्मिक संरचना राजनीतिक शक्ति के केंद्र के रूप में उभरी । वे धीरे-धीरे मंदिर के नगर बन गए। उन्हें कर मुक्त भूमि अनुदान में दी जाती थी। परमेश्वरवर्मन प्रथम ने कुर्म गांव में स्थित परमेश्वरमंगलम गाँव को शिव मंदिर के रखरखाव के लिए अनुदान दिया । शाही संरक्षण के अलावा पल्लव काल के दौरान भक्ति आंदोलन का उदय भी ब्राह्मण धर्म की लोकप्रियता का कारण बना। इसने लोगों के धार्मिक दृष्टिकोण को बदल दिया। भक्ति दर्शन उनके धार्मिक जीवन को संचालित करने लगा। भक्ति के आगमन और भक्ति संतों की शिक्षाओं के साथ विष्णु और शिव की पूजा अधिक लोकप्रिय होने लगी थी। 

पल्लवों की तरह पांड्य शासकों ने भी वैदिक यज्ञ किए। वे वैदिक देवताओं के उपासक थे। ब्राह्मणों ने तमिल समाज में एक उच्च स्थाधारण किया। संगम युग के दौरान तमिलाहम को पाँच मुख्य तिनैं (भौतिक विभाजनों) में विभाजित किया गया था। लोगों के व्यवसाय और देवताओं का संबंध उन क्षेत्रों से था जिनसे वे जुड़े हुए थे: 

  • कुरुंजि(पहाड़ियों) में रहने वाले लोगों के मुख्य देवता मुरुगन (या स्कंद) थे जो शिव और पार्वती के पुत्र थे।
  • मायन (विष्णु) मुल्लै (जंगलों) में रहने वालों के मुख्य देवता थे।
  • लोग मरुदम (मैदानी) में इंद्र की पूजा किया करते थे, जबकि नेयडल (तटीय क्षेत्रों) मेंलोग ने वरुण की पूजा करते थे।
  • पालैं (सूखी जमीन) के लोकोरवई (मुरुगन की माँ) के उपासक थे।

संगम के पांड्य साम्राज्य में शैववाद और वैष्णववाद पनपा और ये धर्म जैन र्म र बौद्ध धर्म के सह-अस्तित्व में थे। कालभ्रों के दौरान, जो संभवत: जैन धर्म या बौद्ध र्म के अनुयायी थे, दोनों ने इस क्षेत्र में अधिक प्रसिद्धि प्राप्त की | भक्ति परंपरा के उदय के साशैव और विष्णुवाद का फिर से उदय हुआ। जब वेनत्सांग ने पांड्य साम्राज्य का दौरा किया, तो उन्होंने पाया कि बौद्ध धर्म एक पतकी स्थिति में था। 

चेदि के कलचुरी ने ब्राह्मणवादी धर्म विशेषकर शैव धर्म को शाही संरक्षण दिया। उन्होंने विष्णु और शिव की पूजा की और धार्मिक प्रतिष्ठानों के रखरखाव के लिए कई भूमिअनुदान दिये | कलचुरी शासक युवराज प्रम शिव का उपासक था और शैव संतों को शाही संरक्षण देता था। दुर्वासा, एक प्रसिद्ध शैव ने गोलकीमठ नामक एक मठ की स्थापना की। उन्होंने इस मठ के रखरखाव के लिए भूमि दी। उनके पुत्र और उत्तराधिकारी लक्ष्मणराज भी शिव भक्त थे। शक्ति उपासना भी प्रचलित थी। योगिनी पंथ की प्रथा लोकप्रिय थी। यहां कुल 64 योगिनियाँ हैं। उनके मंदिर यहां पाए जाते हैं: 

  • खजुराहो,
  • भेराघाट
  • शहडोल आदि।

जैन और बौद्ध धर्म का भी प्रचलन था | कल्याणी के कलचुरियों के समय में वीरशैव या लिंगायत आंदोलन (शैव धर्म के भीतर एक उप-परंपरा) के कारण धर्म को सरल बनाया गया। यह बसवन्नालचुरी राजा बिज्जला के दरबार में एक मंत्री द्वारा स्थापित किया गया था। इसमें कई महिला संतों के साथ-साथ कवियों ने भी शिरकत की। चेन्नाबसवा (बसवा के भतीजे), अक्का महादेवी, अल्लामा प्रभु, रेणुकाचार्य, दारुचाचार्य, निलाम्बिके आदि कुछ लोकप्रिसंत थे जो इस आंदोलन से जुड़े थे। 

11. साहित्य

पल्लव काल के दौरान साहित्य धार्मिक व गैर धार्मिक था परंतु ज़्यादातर धार्मिक था। इस समय के दौरान संस्कृत और तमिल साहित्य दोनों का विकास हुआ। पल्लव शासकों के दरबार में संस्कृत को शाही संरक्षण दिया गया। तमिल साहित्य को भक्ति आंदोलन के विकास के साथ एक प्रेरणा मिली। कई नयनार या नयनमार (शिव के भक्त)अलवार कवि संतों (विष्णु के भक्त) ने साहित्यिक कृतियों को रचा है जिसे हम अब देखेंगे। 

पल्लव शासकों ने बड़े पैमाने पर संस्कृत विद्वता और संस्कृति को संरक्षण दिया। संस्कृत उनकी दरबारी भाषा थी। हालाँकि, उनके प्रारंभिक अभिलेखात्मक अभिलेख प्राकृत में हैं, जो 14वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में संस्कृत द्वारा प्रतिस्थापन किया गया था। महेंद्रवर्मन प्रम को उनके साहित्यिक योगदान के लिए याद किया जाता है। वह इन कृतियों के लेक थे: 

  • मत्तविलास प्रहासनमः संस्कृत में लिखा गया एक व्यंग्यात्मक नाटक, और 
  • भगवदजजुका 

न्होंने अन्य कृतियों की भी रचना की है। दुर्भाग्य से वे लुप्त हो गये। दंडिन ने पल्लव राजा नरसिंहवर्मन द्वितीय के दरबार को सुशोभित किया। उन्होंने संस्कृत में दशकुमारचरित और वंतिसुंदरीकथा लिखी। पल्लवों के दरबार में न केवल प्रमुकवि और लेखक थे, बल्कि इसने अन्य शाही दरबारों के कवियों को भी आकर्षित किया । भैरवी, एक संस्कृत कवियत्री जिन्होंने किर्तनजुनियम को लिखी, सिम्हाविष्णु के समय में पल्लव दरबार का दौरा किया। कांचीपुरम संस्कृत सीखने का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। कदंब वंश के संस्थापक मयूर शरमन ने कांचीपुरम में वेदों का अध्ययन किया। 

हम जानते हैं कि पल्लवों के दौरान एक सांप्रदायिक आंदोलन यानी भक्ति आंदोलन की धूम थी। अलवर और नयनामार संतों ने अपनी भक्ति के प्रति श्रद्धा और उमंग व्यक्त करने के लिए कई भक्ति गीतों और भजनों की रचना की। इन भक्ति रचनाओं ने भक्ति साहित्य के साथ-साथ तमिल साहित्य को समृद्ध बनाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई क्योंकि ये तमिल में भक्ति के दर्शन को व्यक्त करते हुए लिखे गए थे। वैष्णव संत कवि द्वारा रचित सबसे महत्वपूर्ण कृति नलायिरा दिव्य प्रबन्धम है जिसमें 4,000 तमिल छंद हैं और 12 अलवद्वारा लिखे गए थे। इसे द्रविड़ वेद या 5वें वेद के रूप में भी जाना जाता है। दूसरी ओर तिरुमुरई को प्रमुख शैव विहित पाठ माना जाता है। इसमें 12 किताबें हैं। प्रथम सात को तेवारम कहा जाता है, जो तीन महत्वपूर्ण नयनमार संतों द्वारा लिखा गया है जैसे सुंदरर, समबंदर और अप्पार | मानिकवसागर ने 8वीं पुस्तक पूर्ण की। वह पांड्य शासक वरगुण र्मन द्वितीय (862-885 सी.ई.) के अन्तर्गत काम करने वाले मंत्रियों में से एक थे। 9वीं पुस्तक में मामूली नयनमार कवियों की रचनाएँ शामिल हैं। पहली नौ पुस्तकों को थोथिरम कहा जाता है जिसका अर्थ है कि शिव की स्तुति करने के लिए मुख्य रूसे भजन लिखे गए थे। 10वीं पुस्तक में तिरुमूलर की रचना है और इसमें दिशानिर्देश (चर्थीम) हैं। 11वीं पुस्त, तिरुमुरई के खंड 9 के समा, कराईकल अम्मैयार जैसे मामूली शैव संतों की कृतियां हैं, जिसमें एक महिला नयनार संत और नंबी अंदार नंबी थे। तिरुमुरई के अंतिखंड को पेरियापुरानम (महान महाकाव्य) कहा जाता है जो चोल के दौरान सेक्किलार द्वारा लिखा गया था। पेरुंडेवनार द्वारा भरतवेन्बा एक तमिल रचना है जो बाद के पल्लव काल के दौरान लिखी गई थी।

रतनपुर के कलचुरियों के दौरान कुछ महत्वपूर्ण साहित्यकार (जो पहले चेदि के कलचुरियों के सामंत थे) निम्नलिखित हैं

  • रूद्रशिव 
  • राजगुरू 
  • बाबू रेवा राम, 
  • शिव दत्त शास्त्री, और 
  • गोपाल प्रसाद मिश्र

बाबू रेवा राम की विख्यात रचनाएँ हैं: 

  • रतनपरीक्षा
  • ब्रह्मोस्त्रोता
  • विक्रमविलास
  • गंगलाहरी
  • रामायण दिपिका,
  • सार रामायण
  • नर्मदाश्तक
  • तवारीख है हय वंशी, और
  • गीता माधव

गोपाल प्रसाद मिश्र ने खूब तमाशा की रचना की जो मुगल बादशाह औरंगजेब के प्रशासन का एक महत्वपूर्ण लेख है। उसने लिखाः 

  • भक्त चिंतामणि
  • सुदामाचारित्र, और
  • रामप्रताप

इतिहासमुच्चय और रतनपुर अख्यान् शिव दत्त शास्त्री द्वारा लिखे गए थे। चेदि के कलचुरियों के युवराज प्रथम के शासनकाल के दौरान प्रसिद्ध कवि राजशेखर ने उनके दरबार में विधा सलाभंजिका नामक नाटक का मंचन किया। कलयाणी के कलचुरि ‘के अन्तर्गत कन्नड़ साहित्य खूब फला-फूला। इस दौरान कन्नड़ कविता में एक नया चलन शुरू हुआ, जिसे वचन साहित्य कहा गया। यह एक प्रकार का लयबद्ध लेखन है। वचन लेखकों को वचनाकार के रूप में जाना जाता था। इस अवधि के कुछ महत्वपूर्ण कार्य हैं: 

  • धरिणी पंडिता द्वारा बिज्जलारायचारित, 
  • विरुपाक्ष पंडिता द्वारा चेन्नाबासवपुराण, और 
  • चंद्रसागर वरणी द्वारा बिजलारायणपुराण। 

12. कला और वास्तुकला

आइए हम इन राजवंशों के अन्तर्गत कला और वास्तुला को देखें। किसी विशेष राज्य की वास्तुकला निम्न कारणों से प्रभावित होती है जैसे: 

  • संबंधित क्षेत्रों में संसाधनों की उपलब्धता,
  • राजनीतिक परिस्थितियाँ,
  • राजनीतिक संघर्ष,
  • राजाओं की पसन्द
  • कारीगरों के कौशल, और
  • विश्वास प्रणाली। 

पल्लवों और पांड्यों ने ग्रेनाइड का प्रयोग किया था जो उनके मंदिरों के निर्माण के लिए एक प्रकार की कठोर चट्टान है। नरम ट्टानों को काटना और कठोर चट्टानों को आकार देना आसान नहीं है। इसके लिए बहुत कुशल कारीगरों की आवश्यकता होती है। ऐसा माना जाता है कि संभवतः, पल्लवों और पांड्यों द्वारा बनाए गए गुफा मंदिरों को एक ही रह के कारीगरों द्वारा बनाया गया था। 

दक्षिण भारत में चट्टान तराशने वाले वास्तुकारों ने द्रविड़ शैली की वास्तुकला की नींव रखी। पल्लवों को इस शैली की शुरुआत का श्रेय दिया जाता है। वास्तुकला की पल्लव शैली का विकास शासकों के साथ हुआ । महेन्द्रवर्मन प्रथम, नरसिंहवर्मन प्रथम, राजसिंहवर्मन और अपराजिता | उनमें से प्रत्येक ने विशिष्ट कला शैली के विकास में योगदान दिया औइस प्रका, प्रत्येक शैली का नाम उनके संबंधित संरक्षकों के नाम पर रखा गया है। पल्लव वास्तुकला उत्तरोत्तर रॉक-कट (पत्थर को काटकर) मंदिरों से अखंड रथों तक विकसित हुई और आखिरकार, इसने संरचनात्मक मंदिरों को जन्म दिया। पल्लव वास्तुकला के विकास को चार विभिन्न चरणों या शैलियों में विभाजित किया जा सकता है: 

क) महेंद्र शैलीः महेंद्रवर्मप्रथम को एक शाही उपाधि चट्टकरी से भी जाना जाता है जो मंदिर निर्माण के लिए उनकी पसंद को दर्शाता है। उन्होंने कारीगरों को रॉक-कट गुफा मंदिरों का निर्माण करने के लिए नियुक्त किया था और इस प्रकार, उनके संरक्षण में पल्लव वास्तुकला का प्रारंभिक रण विकसित किया गया था। इस शैली की कुछ मुख्य विशेषताएं हैं:

i) घस्तं,

ii) गोलाकार लिंगम,

iii) दो सशस्त्र द्वारपाल (द्वारक्षक) जो धर्मस्थलों के द्वार के दोनों तरफ कुछ विशेष स्थिति में खड़े हैं।

इस शैली में गुफा मंदिर में आयताकार मंडप के पीछे गर्भगृह स्थित हैं। मंडप में छोटे और भारी खंभे हैं जो समान रूप से स्थापित हुए हैं। ये स्तंभ शीर्ष और आधार पर आकार में चौकोर हैं। खंभों के मध्य भाग अष्टकोणीय रूप में हैं। वे बिना किसी अलंकरण के हैं, लेकिन इस शैली के बाद के चरण के दौरान स्तंभों के शीर्ष औआधार को कमल –आकार के साथ सुसज्जित पाया जाता है। शुरुआती रॉक-कट गुफा मंदिर ब्रह्मा, विष्णु और शिव (त्रिमूर्ति) को समर्पित थे, जो बामें एक अकेले हिंदू देवता विष्णु या शिव को समर्पित हैं। हालांकि, मंदिर में किसी देवता की छवि नहीं हैं। ये पूरी तरह से खाली हैं। लेकिन, हम मंदिरों के शिलालेखों के माध्यम से जानते पल्लव, पांड्य और कलचुरी हैं कि गर्भगृह में एक देवता की छवि थी। शायद, चित्र लकड़ी की तरह नाशवान सामग्री से बने थे और यही कारण है कि वे बच नहीं सके। इस अवधि के दौरान प्रतिमाओं को गर्भगृह में रखने के लिए पत्थर का उपयोग नहीं किया गया था। इस शैली में बने गुफा-मंदिरों के कुछ उदाहरण हैं

    • अर्कोनम के पास महेंद्रवाडी में महेन्द्रविष्णुगृह (विष्णु मन्दि)
    • लक्ष्मीतायातना गुफा मंदिर, और 
    • डालवनूर, मंडागापटू और तिरुचिरापल्ली में बने गुफा मंदिर।

ख) मम्मला शैली: नरसिम्हावर्मन प्रथम या मम्मला, हाइव्स मंदिर-निर्माण गतिविधियों के लिए प्रसिद्ध है। अपने शासनकाल के शुरुआती चरण में कुछ मंदिरों का निर्माण किया गया है जैसे कि पुदुकोटा और त्रिचीनोपोली में दर्शाया गया है। उन्होंने महेंद्र शैली को जारी रखा। मामल्ला शैली की एक बहुत महत्वपूर्ण विशेषता मंदिरों के स्तंभ हैं। महेंद्र शैली में वे मोटे, भारी और शकुधारी शीर्ष के आकार के होते हैं। अब वे लंबे, पतले, अधिक सजावटी होते हैं और सुरुचिपूर्ण दिखाई देते हैं। उनके आधार पर हलेओग्रिफ (शेर के सिर वाले प्राणी) या व्याल रूपांकनों को पाते हैं। ये सिम्ह व्याल खंभे को सहारा देने वाली स्थिति में बैठे हुए दिखाए गए हैं। इसलिए, इस शैली ने पल्लव वास्तुला की एक बहुत ही महत्वपूर्ण विशेषता को पेश किया, यानी स्तंभ, जिन्हें सिम्ह व्याल से सजाया गया है। 

इस शैली के दौरान पल्लव वास्तुकला के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण विकास हुआ। इसने रॉक-कट शैली से अखंड संरचना में स्थिर संक्रमण देखा । वह महाबलीपुरम/मम्मलापुरम (कांचीपुरम जिला, तमिलनाडु) में सात पैगोडा या अखंड रथों के निर्माण के लिए प्रसिद्ध हैं। इन थों को एक अखंड चट्टान से बनाया गया है। ये संख्या में 10 हैं जिनमें से पांच रथ जिन्हें आमतौर पर पंच पांडव रथ के रूप में जाना जाता है, का अधिमहत्व है। ये पंच रथ हैं

    • द्रौपदी रथ
    • धर्मराज रथ,
    • भीम रथ,
    • अर्जुन रथ, और
    • नकुल-सहदेव रथ।

उन्हें एक ही मंदिर परिसर में रखा गया है। द्रौपदी रथ को छोड़कर वे बौद्ध विहार और चैत्य शैली में निर्मित हैं। द्रौपदी रथ, एक चौकोर योजना में, बहुही सरल तरीके से बनाया गया है। यह एक छज्जे वाली छत के साथ एक गाँव की झोपड़ी जैसा दिखता है। भीम रथ बसे बड़ा एक खस्ताहाल छत है जैसा कि हम बौद्ध चैत्य में देखते हैं। अपनी तीन मंजिला विमान (शिखर) के साथ धर्मराज रथ महाबलीपुरम के सभी अखंड रथों में सबसे ऊंचा और सबसे बड़ा विमान है। इन पांच रथों के अलावा हमारे पास वाल्यांकुट्टाई रथ, गणेश रथ, उत्तरी पिडारी रथ और दक्षिणी पिडारी रथ और क और महिशासुरमर्दिनी गुफा के सामने स्थित है। 

पंचपाडव रथ, मम्मलापुरम, तमिलनाडु
पंचपाडव रथ, मम्मलापुरम, तमिलनाडु
स्तंभों पर सिम्ह व्याल के सथ भीमरथ। श्रेयः जोहेबखन94
स्तंभों पर सिम्ह व्याल के सथ भीमरथ। श्रेयः जोहेबखन94

ग) राजसिम्हा शैली : नरसिंहवर्मन द्वितीय या राजसिम्हा ने संरचनात्मक मंदिरों का निर्माण किया, जो एक के ऊपर एक रखे गए चट्टान के खण्डों का उपयोग करके बनाए गए थे। यह पल्लव काल के मंदिर निर्माण के पहले के तकनीकों से बहुत अलग हैं। मम्मलापुरम में उन्होंने, ईश्वरा मंदिर, मुकुंद मंदिर शोर मंदिर का निर्माण किया और कांचीपरम में उन्होंने कैलाशनाथ मंदिर (जिसे राजसिंमेहश्वर मंदिर भी कहा जाता है), वैकुंठपेरूमल मंदिर और ऐरावतेश्वर मंदिर का निर्माण किया । कैलाशनाथ मंदिर अपनी विमान और सपाट छत वाले मंडप के लिए प्रसिद्ध है।

घ) अपराजिता स्टाइल : इसके तहत निर्मित मंदिर शैली बहुत अलंकृत थी। राजाओं और उनकी रानियों के सुंदर चित्र भी दिखाए गए हैं जिन्हें इस शैली की महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक के रूप में जाना जा सकता है। इस शैली के कुछ उदाहरण हम दलवानुर में पा सकते हैं।

ल्लव शासकों द्वारा अधिकार में लिए गए इन स्मारकों की एक और विशेषता उनकी दीवारों पर पाए जाने वाले कलात्मक मूर्तिकला पैनल हैं। महिशासुरमर्दिनी मंडपम में जो पत्थर को काटकर बनाया गया है, दीवार पर एक विशामूर्तिकला पैनल है। इसमें एक भयंकर शेर पर सवार अष्ठभुजा देवी दुर्गा और राक्षस भैंस के सिर वाले राजा महिशासुर के बीच युद्ध का दृष्य दिखाया या है। महिशासुर को हारते हुए दिखाया गया है। उसी र कट गुफा मंदिर में अनंताषायण या विष्णु शेषाशायी की कम उभरी हुई नक्काशी है जिसमें उन्हें अपने योनिद्रा में दिव्य नाग आदिशेष पलेटे हुए दिखाया गया है। 

महाबलीपुरम में महिशासुरमर्दिनी की दीवार पर मूर्तीकला पट्टिका। श्रेयः जेनिथ।
महाबलीपुरम में महिशासुरमर्दिनी की दीवार पर मूर्तीकला पट्टिका। श्रेयः जेनिथ।
विष्णु की शेषशाई पट्टिका। श्रेयः रिचर्ड मोर्टल।
विष्णु की शेषशाई पट्टिका। श्रेयः रिचर्ड मोर्टल।
गंगाधर या अर्जुन की तपस्या। ए.एस.आई. स्मारक संख्याः एन-टी.एन-सी.57 श्रेयः डॉ. गुंजन गूहा ।
गंगाधर या अर्जुन की तपस्या। ए.एस.आई. स्मारक संख्याः एन-टी.एन-सी.57 श्रेयः डॉ. गुंजन गूहा ।

पल्लव काल से संबंधित एक अन्य प्रसिद्ध मूर्तिकला गंगाधर या “गंगा का अवतरण” है, जिसे मम्मलापुरम में “अर्जुन की तपस्या” भी कहा जाता है। यह गंगा नदी के पृथ्वी पर अवतरण की कहानी को दर्शाता है। ऋषि भगीरथ या अर्जुन की तपस्या जो उसे पृथ्वी पर लाई, व शिव को अपने बालों के जटों के माध्यम से कल-कल करती हुई नदी के रोश को नियंत्रित करते हुए दिखाया गया है। यह दृश्य कांचीपुरम में कैलाशनाथ मंदिर में भी दिखाया गया है। 

मूर्तिकला पट्टिकाओं के अन्य उदाहरण हैं वराह मंडप में वराह, त्रिविक्रम, गज-लक्ष्मी औदुर्गा पैनल और धर्मराज रथ में सोमस्कंद पैनल | पल्लव शासकों की चित्रित मूर्तियां भी हैं। 

इस प्रकार, हम देखते हैं कि पल्लव वास्तुकला मुख्य रूप से धार्मिक है। पल्लव शासकों ने मुख्य रूसे मंदिरों के निर्माण का समर्थन किया और ये धार्मिक संरचनाएं विष्णु और शिव जैसे देवताओं को समर्पित हैं। वास्तुकला की पल्लव शैली की विरासत को शाही चोलों ने कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तनों के साथ आगे बढ़ाया, जैसे कि पल्लव मंदिरों के छोटे शिखर अब बहुत ऊँचे हो गए थे। पल्लव वास्तुकला ने दक्षिण-पूर्व एशियाई मंदिर वास्तुकला को भी प्रभावित किया।

पांड्यों की वास्तुकला संरचनाओं की विशेषताएं, कई मायनों में, पल्लवों की वास्तुकला के मान दिखाई देती हैं। जैसा कि हमने पहले देखा है, के संबंधित क्षेत्रों में नरम पत्थर उपलब्ध नहीं था और इसलिए, उनके कारीगरों की नक्काशी के लिए कठोर पत्थर यानी ग्रेनाइट का इस्तेमाल किया गया था। यह संभव हो सकता है कि इन दो राजवंशों के अन्तर्गत काम करने वाले कारीगर एक ही समूह के थे, समान विशेषज्ञता और नक्काशी की तकनीक साझा करते थे। पांड्यों की वास्तुकला इसके निष्पादन में तुलनात्मक रूप से सरल थी और पल्लवों की तुलना में इसकी संरचना में छोटी थी। उदाहरण के लिए, पांड्यों के मंदिरों के खंभे बहुत अलंकृत नहीं हैं और इनमें सिंम्ह व्याल जैसी किसी विस्तृत रूपांकनों का अभाव है। जबकि नरसिंहवर्मन प्रथम के शासनकाल में पल्लवास्तुकला का विकारॉक-कट गुफा से लेकर अखंड संरचनाओं क हुआ है और स्थापत्य शैली अधिक उन्नत हो गई है। पांड्यों द्वारा निर्मित स्थापत्य संरचना चट्टान-कट वास्तुकला के प्रारंभिक चरण में प्रतीत होती है। इसलिए, कुछ विद्वानों का मानना है कि दक्षिण भारत में रॉक-कट गुफाओं की परंपरा पांड्यों द्वारा शुरू की गई थी, न कि पल्लवों द्वारा | कावेरी नदी के दक्षिण में हमें पांड्यों की गुफामंदिरों के कुछ दिलचस्प उदाहरण मिलते हैं। ये हैं: 

  • मलैयादिपट्टी में विष्णु गुफा-मंदिर,
  • शिव गुफा मंदिर, मलैयाकोयिल में,
  • तिरुमायम में सत्यागिरीश्वर गुफामंदिर
  • अरिवारकोइल गुफामंदिर में सीतान्नवसल जो एक जैन गुफा मंदिर है, और 
  • पिल्लैयारपट्टी में कर्पाकविनायकर गुफा-मंदिर।

मलैयाकोयिल में शिव गुफा-मंदिर और तिरुम्यम में सत्यागिरीश्वर गुफा मंदिर के शिलालेख में कुछ संगीत वाद्ययंत्रों के नाम हैं। करपकविनायक गुफा-मंदिर में हिंदू देता विनायक या णेश की शुरुआती मूर्ति है। इस मंदिर का शिलालेख ब्राह्मी और तमिल दोनों भाषाओं में अंकित है। 

पंड्यों के पुनरुत्थान के बाद हम उनकी स्थापत्य शैली में महत्वपूर्ण बदलाव पाते हैं, जिसने, द्रविडियन वास्तुकला शैली के विकास में योगदान दिया। उदाहरण के लिए, इस चरण के दौरान उनके द्वारा बनाए गए मंदिरों में विशाल अलंकरण वाले द्वार हैं जिन्हें गोपुरम कहा जाता है। उनके मंदिरों में इन गोपुरमों की ऊँचाई विमानों (गर्भगृह के ऊपर की शिखरों) की तुलना में काफी अधिक है। शाही चोलों के दौरान विमान गोपुरमों की तुलना में लंबा बनाया गया था। हालाँकि, पंड्यों ने अपने द्वारा निर्मित मंदिरों के गोपुरम पर धिक ध्यादिया। उन्होंने अपने गोपुरम को भी आयताकार पिरामिड आकार में सजाना शुरू कर दिया। ये गोपुरम अब अत्यधिक अलंकृत हैं। मदुरई में मीनाक्षी अम्मन मंदिर और तिरुनेलवेली में नैलायप्पार मंदिर, पांड्य साम्राज्य के मंदिरों के कुछ महत्वपूर्ण उदाहरण हैं। 

कलचुरियों ने कला और वास्तुकला के क्षेत्र में भी अपना योगदान दिया। उन्हें कई गुफाओं की खुदाई करने का श्रेय दिया जाता है, उदाहरण के लिए औरंगाबाद में बौद्ध गुफाओं की संख्या 6 और 7 और महाराष्ट्र में एलिफेंटा, एलोरा और जोगेश्वरी की कुछ गुफाएँ हैं। महिश्मती के कलचुरियों या शुरुआती कचुरियों ने कोंकण तट को नियंत्रित किया है और इसलिए, एलीफेंटा द्वीप के कुछ स्मारकों को उनका दिया योगदान माना जा सकता है। एलोरा गुफा सं0 29 अपने स्थापत्य शैली में ऐलिफेंटा गुफाओं से समानताएं प्रदर्शित करता है, माहिश्मती के कलचुरियों का संरक्षण प्राप्त था। ने पहले पढ़ा था कि शैववाद और वैष्णववाद के साथ चेदि के कलचुरी के दौरान देवी पूजा भी प्रचलित थी। चौसठ योगिनियों को समर्पित मंदिर खजुराहो, भेड़ाघाट, शहडोल आदि में बनाए गए थे। उन्होंने चंद्रेहे, अमरकंटक, सोहागपुर आदि में भी मंदिर बनाए ।

मीनाक्षी अम्मन मंदिर मदुरै का गोपुरम।
मीनाक्षी अम्मन मंदिर मदुरै का गोपुरम।

शब्दावली 

BCE : कॉमन ईरा से पहले। CE कॉमन ईरा (ईसा पूर्व या ईसा और ईस्वी सन् या एन्नो डोमिनी में तारीखों को विभाजित करने की पारंपरिक पद्धति को बी.सी.ई. और सी.ई. के उपयोग की आधुनिक प्रणाली द्वारा बदल दिया गया है।)

रॉककट संरचना : एक संरचना ब एक प्राकृतिक ठोस चट्टान या बोल्डर को एक वांछित आकार देने के लिए काट दिया जाता है।

द्रविड़ स्थापत्य शैली : वास्तुकला की शैली जो दक्षिण भारत में उत्पन्न हुई और विकसित हुई। गोपुरम, जलाशय और अन्य विशेषताएं वास्तुकला की इस शैली को अद्वितीय और नागर वास्तुकला के स्कूल से अलग बनाती हैं।