कदम्ब, बादामी के चालुक्य, चोल और होयसाल

1. प्रस्तावना 2. कदं3. बादामी के चालुक्य 4. चोल 5. होयसाल 

इस इकाई को पढ़ने के बाद आप जानेंगे

  • 6वीं से 12वीं शताब्दी सी.. के प्रायद्ववीपीय भारत में प्रमुराज्य और उनके क्षेत्रीय विस्तार और राजनीतिक प्रक्रियाएँ; कदंबों, चालुक्यों, चोलों और होयसालों की राजतंत्रीय राज्य-व्यवस्थाओं की प्रकृति; और
  • कंदब, चालुक्य, चोल और होयसाल की प्रशासनिक और संस्थागत संरचनाएं। 

1. प्रस्तावना

यह इकाई 9वीं-13वीं शताब्दी सी.. के दौरान दक्कन और सुदूर दक्षिण में राजनीतिक विकास को रेखांकित करती है। दक्कन और सुदूर दक्षिण में चालुक्यों और राष्ट्रकूटों के कमज़ोर पड़ने के बाद, नये राजनीतिक विन्यास सामने आए। बाद में कंदब जो चालुक्य और राष्ट्रकूट के सांमत थे, ने उनकी क्षीण शक्ति का लाभ उठाते हुए गोपाकपट्टन (गोवा) और बनवासी (हंगल) में अपने स्वतन्त्र राज्य स्थापित किए | चोल (ध्यकालीन चोल) क शक्तिशाली शक्ति के रूप में फिर से उभरे, और लगभग चार शताब्दियों तक इस क्षेत्र पर हावी रहे। इसी समय इस क्षेत्र में पल्लवों और पांडयों का रहस्ययी पतन हुआ, जिससे बादामी के चालुक्यों के उदय का मार्ग प्रशस्त हुआ। होयसालों ने भी स्थिति का लाभ उठाया और प्रमुशक्ति के रूप में उभरे, और हाँ तक कि पूरे चेरा प्रदेशों में फैल गये और केरल स्वामी बन गए। 

2. कदंब 

कदंब शुरू में उत्तरी-पश्चिमी कर्नाटक में तलगुंडा (आधुनिक शिमोगा जिला) के आसपास 345 सी.ई. आसपास शक्तिशाली बनकर उभरे। उनकी राजनीतिक गतिविधियों का केन्द्र बनवासी क्षेत्र था, इसलिए उन्हें आम तौर पर बनवासी के कदम्ब के रूप में भी जाना जाता है। वे 6वीं शताब्दी सी.. के आसपास चालुक्य राज्य-व्यवस्था में आत्मसात हो गये औचालुक्यों और राष्ट्रकूटों के सामंत बन गये। वे एक बार फिर 10वीं शताब्दी सी.. के उत्तरार्ध में प्रमुखता से उभरे। यहाँ हमारा प्रयोजन प्रारंभिक कदंबों से नहीं है, बल्कि हमारी चर्चा का ध्यान मध्ययुगीन कदंबों पर होगा जो 10वीं-13वीं शताब्दी सी.ई. के दौरान इस क्षेत्र में प्रमुख शक्ति थे। 11वीं शताब्दी सी.ई. में बनवासी कदंब की वंशावली का दावा करने वाले दो प्रमुख समूह उभरे :

1) हंगल के कदंब (धारवाड़ जिले में) और

2) गोवा के कदंब (धारवाड़, करवाड़ और बेलगाम जिले)।

दोनों ने बनवासिपुरर्धिसवर उपाधि का दावा किया और राजधानी बनवासी पर अपना अधिकार जताया। गोवा के कदंब चंद्रपुरा और गोपकापट्टन से शासन चलाते थे; जबकि हंगल के कदंबों ने बनवासी पर अपना आधार बरकरार रखा। 

हंगल के कदंबों ने 9वीं शताब्दी के शुरुआती दिनों से 13वीं शताब्दी तक अपनी राजधानी बनवासी से शासन किया। 11वीं शताब्दी के मध्य से प्रारंभिक 13वीं शताब्दी के बीच गोपकापट्टन (आधुनिक गोवा) के कदंब प्रमुख शक्ति थे। उन्होंने गोवा के उत्तर-पश्चिमी भा, बेलगाम (पटासीग 1200), धारवाड़ और उत्तरी न्नड़ के कुछ हिस्सों (कोंकण 900, वर्तमान रत्नागिरी) आधुनिक कर्नाटक के जिलों पर शासन किया। गोवा के कदंबों के संस्थापक शेश्ठ-प्रथम थे। हालाँकि, गोवा के कदंबों का समूचित इतिहास ग्वालदेव-प्रथम, शेश्ठ प्रथम के पुत्र से शुरू होता है। उन्हें लमका (दक्षिण गोवा) को स्थायी रूप से अपने अधिकार क्षेत्र में लाने का श्रेदिया जाता है। अंततः वे बादामी के चालुक्यों से हार गये। 

राजा और उनके अधिकारी

हालाँकि राजा पूर्ण शक्तिशाली था, मध्ययुगीन कर्नाटक की एक महत्वपूर्ण विशेषता वहाँ की विकेन्द्रीकृत राज्यव्यवस्था थी, जहाँ राजा ने स्थानीय प्रमुखों/सामंतों को शक्तियाँ सौपीं जिन्होंने लगभग समानान्तर सरकारें चलाईं, जिसमें उन्होंने स्वयं की प्रशासनिक व्यवस्था और अधिकारियों को बनाए रखा। वहाँ युवराज (युवराज, उत्तराधिकारी) को नियुक्ति करनेकी परंपरा थी। जयकेशी1 ने ये उपाधियाँ ग्रहण की : 

    • कोंकणाधीश
    • कोंकण चक्रवर्ती (कोंकण के स्वामी) और श्चिमी- मुद्रधीश्वर (पश्चिमी महासागर के स्वामी)

गुवाल-II का अपना मंत्री-परिषद था। 1054 सी.ई. के एक शिलालेख में वीरवर्मदेव को महामंडलेश्वर के रूप में वर्णित किया गया है। शण्ठीदेव ने तुला पुरुष और अश्वमेध यज्ञ किए और सोमनाथ मंदिर में दर्शन किए। 

हम राजदरबार के आधिकारियों के विशिष्ट कार्यों का वर्णन भी पाते हैं जैसे कि

    • मनवरगड़े (कुटुम्ब के अधिकारी), 
    • तन्त्रपाल (पार्शद)
    • प्रधान (प्रमुख), और 
    • तबुंला परूपेत्येगार (सुपारी की धाली का रक्षक)

इसी तरह, महामात्तर, राजजुका और लेखक की उपस्थिति भी थी। 

क्षेत्रों को विसाय (जिलों) में विभाजित किया गया था जिनका प्रशासन मानेय चलाते थे। सबसे छोटी इकाई गाँव (ग्राम) थी, जो ग्राम मुखिया, उरोदेय या गावूड द्वारा शासित थी। उन्होंने अपनी स्वयं की सेना बनाए रखी और न्यायिक कार्य किये। हाजन सभाओं के महत्वपूर्ण सदस्य थे। 

अर्थव्यवस्था और व्यापार

कृषि और व्यापार दोनों अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी थे। त्रियोग, सर्वनामस्थ्य और तालवश्त्री भूमि-अनुदानों के उद्धरण व्यक्तियों और धार्मिक समूहों द्वारा भूमि के स्वामित्व की मौजूदगी का सुझाव देते हैं। कदंब शासकों ने जैनों और शैवों को उदार अनुदान प्रदान किये । जुआन झांग बनवासी में कई बौद्ध विहारों और मठों की उपस्थिति की पुष्टि करता है। 

क्दंबों की समृद्धि उनकी समुद्री गतिविधियों पर आधारित थी। गोवा के कदंबों की राजधानीचंदापुर एक महत्वपूर्ण समुद्रीय केन्द्र था। उनके महत्वपूर्ण बंदरगाह गणदेवी (आधुनिक सूरत जिले में) के पूर्वी अफ्रीकी तट के साथ संपर्क थे। जयकेशी प्रथम ने पश्चिमी समुद्रधीश्वर (पश्चिमी महासागर का स्वामी) की उपाधि ग्रहण करते हुए कदंबों की र्थव्यवस्था में महासागरीय व्यापार का महत्व जताया । क्षेत्र में अरब व्यापारियों की मज़बूत उपस्थिति भी पायी गई। गुहलादेव को सोमनाथ की तीर्थ यात्रा के दौरान मधुमद (मोहम्मद/अली (?) द्वारा बचाया गया था जो एक अरब व्यापारी था। अली के बेटे साधना ने भूमि अनुदान भी प्राप्त किया, प्रशासनिक पद पर रहे और एक मस्जि(मिजिगिती का निर्माण किया। 

3. बादामी के चालुक्य

जब पल्लव राजा सिंहविष्णु 550-80 सी.ई. के दौरान अपने भूभाग का विस्तार कर रहा था, लगभग उसी काल में बादामी के चालुक्यों ने भी उत्तरी कर्नाटक पर शासन स्थापित कर दिया था जिनकी राजधानी बादामी (बीजापुर जिले में) थी। संस्थापक पुलकेसिन I (543 66 सी.ई.) ने बादामी के निकट पर्वत पर एक शक्तिशाली दुर्ग बना दिया और अपनी विस्तारवादी गतिविधियों को प्रारंभ किया था। दक्षिण की ओर बनवासी के कदंबों और पश्चिम के कोंकण के मौर्यों के क्षेत्रों का जल्द जीत लिया गया और I (566-97 सी.ई.) कीर्जिवर्मन द्वारा अपने फैलते क्षेत्र में मिला लिया गया लेकिन पुलकेशिन द्वितीय के शासनकाल (609-642 सी.ई) में चालुक्य क्षेत्र का सबसे ज़्यादा विस्तार हुआ। दक्षिण कर्नाटक के गंगा शासकों और पश्चिमी तट (दक्षिण कनारा जिला) के अलूपों को अपने अधीन कर लिया गया । अतः कन्नड़ भाशी संपूर्ण क्षेत्र को एक शासन के अंतर्गत ले या गया। उत्तर में सेना नर्मदा के पार मालवा और क्षिणी गुजरात तक पहुंच गई जहां ता, मावा और गुर्जर राजाओं ने अधीनता स्वीकार कर ली। चालुक्य शासकों को बड़ी सफलता त्तर के उनके सबसे बड़े प्रतिद्वंदी कन्नौज के हर्ष के विरूद्ध संघर्ष में मिली जो दक्कन को जीतने की योजना बना रहा था। नर्मदा के तट पर चालुक्यों ने उसे निर्णायक रूप से परास्त कर दिया। 

पूर्वी दक्कन और कृष्णा तथा गोदावरी के डेल्टा से बने तटवर्ती आंध्र पर चढ़ाई करके पुलकेसिन द्वितीय ने पूरे क्कन नियंत्रण करने की कोशिश की। इसके कारण उसका कराव पल्लवों से हुआ जो डेल्टा पर कब्जा करने की कोशिमें एक सदी से अधिक समय से लगे हुए थे। पल्लसमकालीन महेंद्रवर्मन (580630 सी..) भी एक महत्वाकांक्षी राजा था। दोनों के टकरावों में पल्लवों की हार हुई और पल्लवों के क्षेत्र में चालुक्य सेना  लगभग उनकी राजधानी कांचीपुरम तक घुस गई। इसके शीघ्र बाद पुलकेसिन द्वितीय ने अपने भाई विष्णुवर्धन को आंध्र प्रदेश का शासक नियुक्त कर दिया और इससे एक नया राजवंश, वेंगी के पूर्वी चालुक्य, उभरा जो गोदावरी कृष्णा डेल्टा में केंद्रित था तथा लम्बे समय तक वहां बना रहा। 

पल्लव राजा महेंद्र प्रथम का पुत्र और उत्तराधिकारी नरसिंह (630-68 सी.ई.) चालुक्य राजा के समान ही योग्य सिद्ध हुआ और अनेक युद्धों के बाउसकी सेनाएं चालुक्य क्षेत्र में प्रवेश कर गई और बादामी तक घुस गई। वहां उसने एक शिला पर अपनी विजय को अंकित कराया। बाद के दशकों में चालुक्यों और पल्लवों के बीच अनेक संघर्ष हुए लेकिन किसी को निर्णायक जीत हासिल नहीं हुई। तत्पश्चात लगभग तीन दकों तक युद्ध गतिविधियां रूकी रहीं। इस काल में चालुक्य शासक विजयदित्य (696-733 सी.ई.) और उसका समकालीन पल्लव राजा राजसिंह (691729 ईसवी) था। 750 ईसवी के आस-पास बादामी में चालुक्यों का स्थान राष्ट्रकूटों ने ले लिया, जब राष्ट्रकूटों के सामंत दांती दुर्ग ने चालुक्य राजा कीर्तिवर्मन को परास्त करके उन्हें अंतिम आघात पहुँचाया। 

चालुक्यों की राज्य-व्यवस्था

चालुक्यों और राष्ट्रकूटों के दक्कन राज्यों की राजनैतिक द्धतियां ब्राह्मणवादी सामाजिक राजनैतिक व्यवस्था और ब्रह्मदेय तथा मंदिरों जैसे संस्थाओं पर आधारिथी, लेकिन ये लचीले ढंग से जुड़े हुए सामंती प्रकृति वाले राज्य थे। इन राज्यों की कमजोरी सामंती व्यवस्था की प्रकृति में निहित थी जिसमें एक या दूसरे पदानुक्रम से युक्त मुखियातंत्र के द्वारा सत्ता संतुलन को सैन्य सामर्थ्य के आधार पर आसानी से बदला जा सकता था। इसलिए एक केंद्रीकृत कर प्रणाली और पदानुक्रमानुसार संगठित अधिकारी वर्ग होने के बावजूद किसी केंद्रीकृत प्रशासन के विकास की संभावना नहीं के बराबर थी। राजधानी में राजा के अधीन सैनिकों की और राजवंशीय परिवार के सस्यों के अधीन आस-पास क्षेत्रों में तैनात छोटी सैन्य टुकड़ियां अस्तित्व में थीं, र कोई स्थाई सेना नहीं थी। इन छोटी सैनिक टुकड़ियों में से कुछ को उन पारगमन क्षेत्रों या मध्यवर्ती क्षेत्रों के सामरिक स्थलों पर तैनात किया जाता था जो मुख्य राजवंश के प्रति निष्ठावान सामंतों अथवा छोटी राजनैतिक शक्तियों के नियंत्रण में होते थे; ये क्षेत्र आंध्र तथा तमिल क्षेत्र की बड़ी राजनैतिक ताकतों के क्षेत्रों की बड़ी सीमा से लगे हुए थे। 

राजत्व

चालुक्य राजाओं की उपाधियाँ थीं – सत्याश्र, श्रीपथ्वीवल्लभ महाराज, परमेश्वर और महाराजधिराज। यह केन्द्रीकृराज्य नहीं था। मंत्रिपरिषद् के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती है लेकिन ऐसा लगता है कि शाही परिवार के सस्य आधिकारिक स्तर पर कार्य करते थे। बाद में पूर्वी चालुक्य राज्य और अन्य राज्य इस नीति के तहत विकसित हुए। वे मूल बादामी के चालुक्यों की शाखाओं के रूप में उभरे। अभिलेखों से हमें उनकी प्रशासनिक व्यवस्था की जानकारी मिलती है। राजश्रवितम शाही आदेश थे। विज़नप्ति (आवेदन करने वाले) और राजा के आदेश लिखने वाले, जो पत्थर व ताम्रपत्रों पर अनुदान संबंधी आदेश अंकित करते थे, महत्वपूर्ण प्रशासनिक कार्मिक थे। वे महासंधिविग्रहिका (शांति और युद्ध के अधिकारी) के पद पर कार्यरत थे। अभिलेखों में जिन इकाइयों का उल्लेख है वे हैं : नाडु, विषय तथा राष्ट्र। चालुक्य राजाओं के ताम्र अनुदानपत्रों में विषयपति, सामं, ग्रामभोगिका तथा हारात्राओं का उल्लेख है। इस तरह प्रशासनिक व्यवस्था केन्द्रीकृत नहीं थी हालांकि विषयपति शाही प्रतिनिधि या कार्मिक थे। ग्राम प्रशासनिक व्यवस्था की सबसे छोटी इकाई थी। ग्राम स्तर के शाही प्रतिनिधि को गामुंडा कहते थे। वह राजा एवं ग्रामीणों के बीच कड़ी के रूप में कार्य करता था। करण ग्रामीण लेखाकार थे। गाँवों के बड़े लोगों को महाजन कहा जाता था। लक्षमेश्वर अभिलेखों में हमें शाही व्यवस्था व स्थानीय प्रशासन के बीच संबंधों की जानकारी मिलती है। एक आचार व्यवस्थे (अधिकार एवं कर्त्तव्यों का अधिकारपत्र) महानों, नगर (व्यावसायिक समूहों) देशाधिपति (अधिकारी जो कर एकत्र करते थे) और अठारह प्रकृतियों (प्रका) को दिया जाता था। यह शाही कार्मिकों, महाजन, देसाधिपति (अधिकारी जो कर एकत्र करते थे), तेल बेचने वालों की श्रेणी दि का उल्लेख करता है। अभिलेखों में अनेक करों का भी उल्लेख है जैसे नमक, स्वर्ण एवं नज़राना जो राजा के अधिकारियों को बड़े त्योहारों के दौरान दिए जाते थे। पुलकेसिन द्वितीय के हैदराबाद अनुदानपत्र से पता चलता है कि गाँवों के सानिधि (खज़ाना), पनिधि, क्लिप्त और पारिकर (दे) भी दिए जाते थे। शाही परिवार के सदस्य और व्यापार संगठन भी मंदिरों की वस्तुओं (ज्वार, पान के पत्ते) के रूप में दान (उपहार) देते थे।

प्रशासन सत्ता के अनिश्चित स्वरूप के कारण अतिशयोक्तिपूर्ण उपाधियों का प्रयोग किया गया बकि महासंधिविग्रह, महादंडनायक जैसी प्रभावशाली उपाधियां धारण करने वाले धिकारियों की नियुक्तियां राजवंशीय परिवार से संबंधित कुलवंशों और सामंतों एवं छोटे प्रमुखों में से की जाती थीं। स्थानीय स्तर पर विश्या, राष्ट्र और देश जैसी इकाइयां या क्षेत्र प्रशासन में भूमिका निभाते थे जिनके प्रमुखों को क्रमशः विश्यपति, देशाधिकारी आदि कहा जाता था, जबकि गांव या ग्राम के भूमि नियंत्रण, उत्पादन, पुनर्वितरण के साथ स्थानीय प्रशासन के लिए उत्तरदायी गांव के उच्च स्तर के लोग, महाजन थे। ये विभाजन केंद्रीसत्ता द्वारा नहीं बनाए गए थे ल्कि इन क्षेत्रों का विकास अपने आप हुआ था और इनको उसी रूप में शासक शक्तियों द्वारा स्वीकार कर लिया गया। सत्ता का केंद्र राजवंशों के बदलने के कारण परिवर्तित हो जाता था जिन्होंने कुछ मुख्य भू-सीमांकित और अन्य क्षेत्रों पर संपूर्ण नियंत्रण प्राप्त कर लिया था। अतः इस राजनैतिक पद्धति की ब्राह्मणवादी व्यवस्था और संस्थाओं से युक्त राजतंत्र के साथ एक अधिक शक्तिशाली राजवंशीय शासन के अंतर्गत ढीले-ढाले तौर पर जुड़ा हुआ मुखियातंत्र माना जा सकता है। शासक शक्तियों में सबसे शक्तिशाली के पक्ष में झुकाने की क्षमता संरचनाओं की प्रकृति में निहित थी’ |

4. चोल

तंजौर के चोल (कावेरी घाटी) (नौवीं-तेरहवीं शताब्दी ई.)। चोलों की सत्ता का केन्द्र कावेरी घाटी में था। प्रायद्वीपीय राजनैतिक पद्धति में वे सबसे शक्तिशाली थे औमिल बृहक्षेत्र में उन्होंने लंबे समय तक शासन किया। 

भौगोलिक विस्तार

नौवीं सदी में चोल एक शासन करने वाली राजनैतिक शक्ति के रूप में उभरे, जब विजयालय ने तंजावूर को पल्लवों के सामंत प्रमुख मुट्टारया से छीनकर अपने अधीन कर लिया। इसके बाद चोलों ने पल्लवों के क्षेत्र को कब्जे में कर लिया तथा पांड्यों की शक्ति को क्षीण कर दिया। चोल राज्य मज़बूत रूप से ‘कावेरी घाटी जैसे समृद्ध व उपजासंसाधनों वाले क्षेत्र में स्थापित हुआ। राजाराज प्रथम व उसके बाद के काल में कई सामंत प्रमुखों को अधीनस्थ कर लिया गया व पहले के नाडू को पुनर्गठित कर वालानाडू बनाया गया और इनको व्यवस्थित करने का दायित्व अधीनस्थ प्रमुखों को दिया गया। भू-स्वामियों को राज-व्यवस्था का हिस्सा बनाया गया और उन्हें प्रतिष्ठित उपाधियों के सासाथ प्रशासनिक व सैन्य कार्य दिए गए, जिसमें भू-राजस्व इकट्ठा करना और आकलन भी था। 

चोल राजत्व

चोल खुद को सूर्यवंशी मानते थे। मिथकीय परंपराएँ विभिन्न अभिलेखों जैसे प्रशस्तियों में उल्लिखित हैं, जिमें वंशावलियाँ भी हैं तिरुवलेंगड ताम्रपत्र, बड़ा लेडेन पत्र एवं अंबिल पत्र व वीर राजेन्द्र का कन्याकुमारी अभिलेख । इनमें ऐतिहासिक व्यक्तियों के विषय में जानकारी मिलती है। ऐसा प्रतीत होता है कि इनका उद्देश्य चोलों के शासन को वैधता देना था चोलों की प्रशस्तियाँ इतिहास पुराण परंपरा पर आधारित थी। संस्कृतिय एवं ब्राह्मणवादी परंपराओं की प्रधानता के प्रमाण मिलते हैं। चोल अपने को संगम काल की परंपरा से भी जोड़ते हैं। चोलों की वंशावली में राजा के पद को प्रतिष्ठित व महत्वपूर्ण वंश से जोड़ा गया है। राजराजा के शासनकाल के आठवें साल से लेकर आगे तक के समय में तमिल मेयकीर्ति में वंशावली रूपी प्रमाण नहीं पाए जाते हैं। ये मेयकीर्ति राजा की सैन्य उपलब्धियों को दर्शाती है तथा ये पत्थर पर अंकित की गई तथा ये तमिल भू-स्वामियों को संबोधित करती हैं। चोल खुद को क्षत्रिय वंशज बताते थे इस बात का प्रमाण है कि राजराजा ने क्षत्रिय-शिरोमणि की उपाधि धारण की थी। राजा के नाम के साथ वर्मन प्रत्यय (संस्कृत से) जोड़ना भी इस बात की पुष्टि करता है कि वे खुद को क्षत्रिय बताते थे जैसे आदित्य वर्मन (871-906 ईसवी) और परांतक वर्मन (707-775 ईसवी)। चोल शासन के दौरान बाकायदा राज्याभिषेक समारोह में नाम धारण किए जाते थे। जैसे प्रकेसरीवर्मन और राजकेसरीवर्मन एवं अरुमोलीवर्मन (संस्कृत प्रत्यय के साथ तमिल नाम)। चोलों के अधिकारपत्रों में प्रशस्ति तथा वंशावली संस्कृत में है तथा अनुदान से संबंधित विस्तृत विवरण तमिल में उपलब्ध है। चोल राजाओं द्वारा हिरण्यगर्भ एवं तुलाभरा अनुष्ठान आयोजित किए जाते थे। अभिषेक अनुष्ठान भी क्षत्रिय स्तर को पाने का माध्यम था। वीर चोल द्वारा दिए गए अनुदान से पता चलता है कि राजा को ब्राह्मणों, जैसे नैतिकता पर उपदेश देने वाले धर्मोपदेशता द्वारा यह बताया जाता था कि ब्राह्मणों को भूमि देने से राजाओं के पूर्वजों को स्वर्ग मिलता है। अनुदान देने का उद्देश्य संसाधनों जैसे भूमि, स्वर्ण तथा मवेशियों को पुनर्वितरित करना था। ब्राह्मणों को अग्रणीय सेवा व राजनैतिक क्षेत्र में वैधता प्रदान करने के लिए दान दिए जाते । भू-अनुदान के जरिये राजा गैर-बस्तियों वाले क्षेत्रों को कृषि क्षेत्रों में परिवर्तित करने का प्रयास करता था। यह अनुदान केवल धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए ही नहीं होता था। राजारा को उल्कलाइ पेरुमेल (वह महान् जिसने पृथ्वी को त्रिविक्रम की तरह नापा) के रूप में एवं शिव की तरह माना गया जिसका भार्गव राम की भूमि पर नियंत्रण था।

स्थानीय प्रशासन : उर एवं नाडु

चोल ताम्रपत्र में भू-अनुदान को क्रियान्वित करने वाले निम्नलिखित लोगों का विवरण है:

    1. नेट्टर
    2. ब्रह्मदेयाक्किलवर
    3. अ) देवदान
      • ब) पल्लिक्कांडा
      • स) कानिमुरुट्टु
      • द) वेट्टापेरु – उरकलिलर
    4. नगारेट्टर

नेट्टर, नाडु (इलाका) के प्रतिनिधि थे। ब्रह्मदेयाक्किलवर ब्रह्मदेय (भूमि जो ब्राह्मणों को दी जाती) अनुदान पाने वाले ब्राह्मण थे, नगारेटर व्यापारी समुदाय थे जो नगरम या व्यापारियों की बस्तियों से जुड़े थे। देवदा, पेल्लीकांडा, कविमुरुतु एवं वेट्टापेरु की पहचान कर मुक्त गाँवों के रूप में दी गई है। वाई. सुब्रयालु ने बताया है कि नेटर वेल्लनवगई उरर (कृषक ग्राम) के समकक्ष थे क्योंकि अनेक उर नाडु बनाते थे। सुब्रयालु उर या ग्राम को नाडु का एक छोटा हिस्सा मानते हैं। प्रशासनिक ढाँचे के रूप में नाडु महत्वपूर्ण थे लेकिन ये उर (वेल्लानवगई ग्राम) से बने थे तथा उसका प्रतिनिधित्व करते थे। इसलिए भू-सीमांकित क्षेत्र के अर्थ में नाडु वेल्लानवगई ग्रामों (उर) से मिलकर बने थे। नेटर नाडु (इलाके) के महत्वपूर्ण सदस्य (भूमि के धारक) थे। वेल्लानवगई गाँवों के बारे में बहुत कम अभिलेख उपलब्ध है। ऐसा प्रतीत होता है कि उस सामान्य जनता के उस भाग का प्रतिनिधित्व करता था जो साक्षर नहीं थे। परंतु उर से संबंधित अभिलेखात्मक साक्ष्य जो मंदिरों में मिलते हैं साक्षर लोगों से संबंधित है। एन. कारशीमा ने राजराजा प्रथम के दो तंजावुर अभिलेखों व वीरराजेन्द्र के गंगईक्कोंडा कोलापुरम अभिलेख का विश्लेषण किया है। उनके मुताबिक वेल्लानवगई गाँव में कृषि भूमि, पशुचारी के लिए उपयोग की जाने वाली भूमि, सिंचाई के लिए भूमि, श्मशान क्षेत्र एवं रिहाइशी क्षेत्र आदि पाए जाते थे। रिहाइशी इलाकों में निम्न आते थे :

1) भू-धारक/ कृषकों (उर- नेट्टम/उर-इरुक्कई के आवास स्थल |

2) शिल्पकार (काम्मानाक्केरी) के स्थाल और

3) कृषि मजदूरों (पराईक्केरी) के स्थल । काराशीमा का मत है कि वेल्लानवगई ग्रामों में विभेदीकरण नहीं था। सुब्बरयालु इस मत का खंडन करते हैं। गाँवों में पदानुक्रम व्यवस्था के अस्तित्व में होने की बात कहते हैं जिसके अंतर्गत कृषक (कानिइयुडयिया), काश्तकार कृषक (उलुकुडी, शिल्पकार तथा कृषक मज़दूर आते थे। कृषकों को सामान्यतः वेल्लाल कहा जाता था।

उर के निम्न कार्य थे : ग्राम भूमि की देखरेख, बिक्री जैसे खरीद तथा उपहार देने संबंधी गतिविधियाँ। उर का सदस्य बनने के लिए भूमि पर अधिकार होना बेहद जरूरी था। अभिलेखीय साक्ष्यों से हमें पता चलता है कि उर के सदस्य भी कई उपाधियाँ धारण करते थे जैसे उदईन, किलन (किलावन), वेलन, पेरारइयन। ये सभी उपाधियाँ भूमि का अधिका(कब्ज़ा) की द्योतक थीं। इस तरह अभिलेखीय सबूतों के मुताबिक यह पता चलता है कि उर ऐसे गैर ब्राह्मणों का समूह/सभा थी जिनका भूमि पर अधिकार था। 

एन. काराशीमा ने कहा है कि उर गाँवों में भूमि पर अधिकार सामूहिक था। कुछ अन्य दाहरण देकर काराशीमा ने यह बताया है कि उर के कुछ सदस्य भूमि का व्यक्तिगत रूप से बेचते भी थे। सुब्बरयालु बताते हैं कि इस काल में व्यक्तिगत भूमि अधिकारों के उभरने के संकेत थे। नाडु का नाम ग्राम के नाम पर रखा जाता था जो उसका अंश था। अभिलेखीय साक्ष्य इस ओर भी इशारा करते हैं कि अनेक नाडु में ब्रह्मदेय (ब्राह्मणों की दी जाने वाली जमीन) मुख्य गाँव थे। यद्यपि अनेक नाडु में ब्रह्मदेनहीं भी होते थे। सुब्बरयालु यह भी बताते हैं कि नाडु की संख्या में बढ़ोतरी नौवीं सदी से हुई। नाडु शुरू में उपजाऊ भूमि में स्थापित हुए जहाँ ज़्यादा गाँव थे जबकि बाह्य क्षेत्र (कम उपजाऊ क्षेत्र) में गाँवों की संख्या तुलनात्मक रूप से कम थी। नीलकंठ शास्त्री कहते हैं कि नाडु कई गाँवों का सम्मिश्रण होता था जो प्रशासनिव्यवस्था के सबसे छोटे हिस्से होते थे। महालिंगम ने कहा है कि नाडु एक प्रशासनिक इकाई थी जो कि गाँवों में उप-विभाजित थी। शोध करने वालों में इस संबंध में कोई सर्वमान्य मत नहीं है कि नाडु केवल वेल्लनवगई गाँवों से ही बना था या फिर उसमें ब्राह्मदेय, देवदान आदि भी समाहित थे। वाई. सुब्बरयालु कहते हैं कि नाडु एवं उर उस स्थानीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते थे जिसमें वेल्लनवगई गाँव शामिल थे एवम् इनके प्रतिनिधि नाडु की सभा में भाग लेते थे। नाडु कितने बड़े क्षेत्र में फैले थे इसके विषय में सुनिश्चित तौर पर बताना ठिन है। आकार की दृष्टि से नाडु कई तरह के होते थे और वे किसी प्राकृतिक विभाजन (जैसे नदी) के आधार पर गठित नहीं थे। नाडु कृत्रिम रूप से बनाई गई इकाई या विभाजित इकाई नहीं थी। कभी-कभी नाडु में नदी के पार का क्षेत्र भी आता था। पारंपरिक इतिहासलेखन में नट्टर को भू-सीमांकित इकाई नाडु की सभा माना गया है जिसके महत्वपूर्ण सदस्य प्रत्येक ग्राम से थे। अन्य सभाओं जैसे, ल्लिकांडम को प्रशासनिक व्यवस्था में नाड़ के अधीन बताया गया है। हाल में ही इतिहासकारों ने बताया है कि नाडु चोल राज्य द्वारा स्थापित कोई प्रशासनिक इकाई नहीं थी बल्कि यह किसानों की बस्तियों का एक स्वाभाविक समूह था जिसे चोल राज्य व्यवस्था में पहले की परंपरा के आधार पर शामिल किया गया। यह इस बात से सिद्ध होता है कि नाडु मान आकार के नहीं थे और वे केन्द्रीकृत थे। राजराजा प्रथम के समय उभरे वलानाडु प्रशासनिक खंडों के रूप में कृत्रिम तरीके से स्थापित किए गए। नाडु शुरुआत में उपजाऊ क्षेत्रों में उभरे और बाद में तुलनात्मक रूप से कम उपजाऊ क्षेत्र में भी फैल गए। इस प्रकार कृषि आधारित अर्थव्यवस्था का विस्तार हुआ। उपजाऊ क्षेत्रों में उभरे नाडु की संख्या अन्य क्षेत्रों के नाडु से अधिक थी। 

कुछ अन्य अभिलेख भी हैं जो हमें नाडु के बारे में जानकारी देते हैं | 1310 सी.. के किरनुर भिलेख के मुताबिक “नंजिल, पेरुनसेवुर, विराईक्कुडी गाँवों के उरुम को नाडु अथवा वडा चिरुवयइल नाडु (के. वेलुठट, पृ. 184) के लिए योग्य माना गया” | इससे यह साफ होता है कि साक्ष्यों के मुताबिक वेल्लाल ही नेटर थे वं नट्टर (नाडु) से संबंधित कार्य वेल्लाकरते थे तथा उन्होंने वेलन उपाधि भी धाण की थी। नेका मुख्य कार्य कृषि था क्योंकि नाडु कृषक बस्तियों का समूह थे। 

ताम्र पत्र मूलतः भू-अनुदान से संबंधित थे तथा ये नेट्टर को संबोधित करते थे तथा अनुदान के कार्यान्वयन का दायित्व राजा द्वारा नेटर को दिया जाता था (अनुदान में दी गई भूमि की सीमा तय करना जो नए अनुदान प्राप्तकर्ताओं को विशेषाधिकारों के तहत दी गई थी)। नेटर शासकों के अधीन थे तथा उनकी इच्छा के अनुसार कार्य करते थे। नेटर सिंचाई कार्यों की देखरेख करते थे। वे मंदिरों को भूमि अनुदान देते थे। वे मंदिरों को दिए गए दान की देखरेख करते थे। व्यक्तिगत तौर पर दिए गए अनुदानों का हिसाब रखना तथा इनको कर-मुक्त बनाने के बदले में नगद जमा करवा लेते थे। नाडु मंदिरों को कर-मुक्त (नेट्टीरेती) भूमि देता था। मंदिरों को कर-मुक्त भूमि दिए जाने के कारण राज्य को कर देना अब नाडु की ज़िम्मेदारी थी। नाडु कर लगाकर राज्य को देकर उसके प्रति अपना दायित्व निभाते थे। ये कर थे: नदातकी, नटट्ट विनियोगन तथा नडु व्यावस्थाई। मंदिर भूमि बेची जाती या पट्टे पर दी जाती थी और नेट्टर इसमें महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते थे। ऐसा लगता है कि नाडु कर संग्रहण और इसके निर्धारण का कार्य करते थे। कभी राजस्व संग्रहका कार्य राज्य की ओर से नेट्टर करते थे। हालाँकि कई बार राजा के कार्मि(कोमारवर) भी इस काम के लिए ज़िम्मेदार होते थे। मुडलिगल और दंडनायकम नाडु के लिए नियुक्त किए गए कार्मिक थे और शाही अधिकारियों की तरह प्रशासनिक ज़िम्मेदारियों को निभाते थे। चोलों ने राज्य व्यवस्था में क्षेत्र के भू-स्वामियों को शामिल किया। ये स्थानीय भू-स्वामी थे और ये राजा के निर्देशानुसार कार्य करते थे तथा उसके अधीन थे। 

राजस्व प्रशासन के अंतर्गत नाडु सबसे छोटी इकाई होती थी। नटुपुरखु, नटुवाड़ी (भू-राजस्व) एवं नटुक्कानक्कू सभी का नाडु के राजस्व से संबंध था। नटुक्कानक्कू नाडु के राजस्व प्रशासके लिए ज़िम्मेदार कार्मिक थेगाँव का राजस्व संग्रहण तथा निर्धारउस नाडु के संदर्भ में किया जाता था जहाँ वह गाँव स्थित था। जब उर करों में छूट देता था तो यह नाडु के खातों में प्रतिबिंबित होता था। किसी खास उद्देश्य के तहत मंदिर संसाधनों का हस्तारण वरीगीलारकनकू (शाही राजस्व दस्तावेज) तथा नटुकनकू (नाडु का राजस्व दस्तावे) में प्रतिबिंबित होता था। इससे यह पता चलता है कि नाडु चोल प्रशासनिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण घटक था। हालाँकि इसका स्थानीय संदर्भ में स्वायत्त चरित्र था। नाडु ई सेवर, नाडु कुर्क सेवर, नाडु कनकनीनयाग्राम एवं नाडु कनकटकी आदि कार्मिक नाडु में शाही शक्ति के प्रतिनिधि थे। नाडु कुरु का उल्लेख कुलोट्टुनगा प्रथम (1116 ई.) के अभिलेखों में मिलता है जो नये देवदान से संबंधित प्रबंधन की ज़िम्मेदारी निभाते थे। इन कार्मिकों को स्थानीय मंदिरों के खातों की देखरेख की भूमिका दी गई थी। नाडुवाई ब्रह्मदेय (सभा) की सभा में भाग लेते थे। एक अभिलेख में नाडु कनकी-नयागाम के सेनापति के अधीन होने का उल्लेख है। नाडु के अधिकारियों के पस्थानन्तरणीय थे। कुछ अधिकारियों को एक से ज़्यादा नाडु की ज़िम्मेदारी सौंपी गई थी। इस प्रकार से ये शाही प्रशासनिक व्यवस्था के घटके रूप में कार्य करते थे। 

ब्रह्मदेय एवं नगरम

ब्रह्मदेय ब्राह्मणों की बस्तियाँ थीं जो कृषि क्षेत्र में भू-धारक थे और उन्हें भूमि (कर-मुक्त) दी गई थी और वे एक खास समूह में संगठित हुए। नरम में वे व्यापारी रहते थे जो व्यापार तथा आदान-प्रदान की गतिविधियों में संलग्न थे और उनके इलाके वाणिज्यिक केन्द्रों में परिवर्तित हो गए क्योंकि शिल्पकारों के उत्पादन में बढ़ोतरी हुई। नौवीं सदी के मध्य में जब थांजवूमें चोल एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभरे तब अनेक ब्रह्मदेय कावेरी के उपजाऊ तथा घनी जनसंख्या वाले क्षेत्र में पहले से स्थापित थे। राजेन्द्र प्रथम के कर्नाटई अधिकारपत्रों में 1080 ब्राह्मणों के बारे में बताया गया है जो त्रिभुवनमहादेवी चतुर्वेदीमंगलम में बसे हुए थे। कृषि क्षेत्र में बसे ब्राह्मणों के समूह के भा या महासभा कहा जाता था। ज़्यादातर ब्रह्मदेय या ब्राह्मण बस्तियाँ मंदिरों के आस-पास स्थापित हुई। मंदिर एवं इतिहास तथा पुराण पर आधारिविचारधारा और वर्णाश्रमधर्म एवं क्ति के माध्यम से समाज तथा राजवंशीय राजनैतिक पद्धति को वैधता मिली। इसलिए राजा ब्राह्मणों को जमीन देते थे और अपनी शक्ति को वैधता देने के लिए ब्रह्मदेय स्थापित करते थे। 

अभिलेखों से हमें यह जानकारी मिलती है कि चोल काल में नाडु के तहत बहुत सारे ब्रह्मदेय तैनियुर (अलग ग्राम) थे। उनकी अलग प्रशासनिक व्यवस्था (राजस्व एवं न्याय) थी। बहुत से कृषि गाँवों को तैनियुर के साथ मिला दिया जाता था। कभी-कभी तैनियुर को मंदिर के अधीन रखा जाता था। यहाँ मुलपारउसई नामक निकाय प्रशासनिक व्यवस्था के लिए ज़िम्मेदार था। 

अभिलेख सभा की कार्यकारी समिति का सदस्य बनने के लिए ज़रूरी शर्तों की जानकारी देते हैं जैसे भू-अधिकार, ज्ञान, अच्छा व्यवहार आदि। कर्नाटई अधिकारपत्र (1080 ब्राह्मणो ब्रह्मदेके बारे में बताते हैं, लेकिन सभी व अन्य समितियों का किस तरह गठन हुआ इस बारे में जानकारी हीं देते। उन्हें शाही शक्ति ने स्थापित नहीं किया था। उनका उद्भव धर्मशास्त्र के नियमों के मुताबिक हुआ था। सभा एवं उनकी समितियाँ मंदिर भूमि, पशु एवं अन्य संसाधनों की देखरेख करती थीं। वे जमीन काश्तकारों को देते थे तथा उनसे लगान लेते थे। वे राजस्व का लेखा-जोखा रखते, उसे एकत्र करते थे और खर्चों का विवरण रखते थे। वे मंदिर के पुजारी से लेकर सफाईकर्मियों के कार्यों पर निगरानी खते थे और मंदिर के दैनिक कार्यों की देखरेख करते थे। सभी एक समूह की तरह कार्य करती थीं और जो निर्णय लिए जाते थे वे किसी व्यक्ति विशेष के हित के लिए नहीं वरन् सभी के कल्याण को ध्यान में रखकर लिए जाते थे। चोल शासन काल के उतरार्ध में ब्रह्मदेबस्तियाँ, जहाँ मंदिर महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे, महत्त्वपूर्ण नहीं रहीं। ग्यारहवीं सदी के मध्य में ब्रह्मदेय की संख्या में कमी ई तथा मंदिरों के निर्माण में वृद्धि हुई और पुराने मंदिरों को पुनर्निमित किया गया। कभी-कभी महासभा संसाधनों के अभाव में मंदिर से ली गई रकम को चुकाने में असमर्थ होती थी ब आसपास के ग्राम से एकत्रित रकम पर निर्भर रहती थी। नगरम स्तियाँ वो क्षेत्र थे, जहाँ व्यापारी व अन्य (शिल्पकारों सहित) रहते थे। 1036 सी.. के एक अभिलेख में गैर-ब्राह्मण निवासी, जो उच्च स्तर के थे (कुडीग) एवं वे जो निम्न स्तर (किल नई के थे, में अंतर बताया गया है। कुडीग के अंतर्गत दो व्यापारी समूह शंकरप्पिडियर (निचला समूह) एवं व्यापारिन (उच्च समूह) और तीन समूह वेल्लार (कृषक), सेलियर (कपड़ा व्यापारी) एवं पटिनवर (मछुवारे) आते थे। छोटे स्तर के कार्मिक (किल कलनई थे : टक्कर (बढ़ई), कोलियर (बुनकर), टट्टर (स्वर्णकार), तथा कोलर (लुहा) आदि। (बी. स्टेन, पेजेन्ट स्टेट एंड सोसाईटी न मिडीवल साउथ इंडिया)। 

गरेट्टर व्यापारियों का प्रतिनिधित्व करने वाला निकाय था। नगरम बस्ती एक अलग क्षेत्र थी। नगरेटर की समिति नगरवैरियम कहलाती थी। नगरम में भी भूमि व्यवस्था सामूहिथी जिसे नगरक्कनी कहते थे। भूमि को खरीदा जाता था तथा पट्टे पर भी दिया जाता था। नगरम कर लेते थे तथा स्थानीय समूहों को सेवाएं प्रदान करते थे। वे आय एवं व्यय का हिसाब रखते थे तथा शाही कर सोने या अनाज के रूप में देते थे। वे स्थानीय मंदिरों पर कर भी लगाते थे: जैसे कदामयी (भूमि पर कर), गरविनियोगम (नगरम के लिए कर) आदि। कभी-कभी नगरम नाडु से स्वतंत्र होते थे (तनियूर)। 

राजा, अधिकारी तथा मुखिया

चोल राज्य में अनेक अधिकारी प्रशासनिक व्यवस्था के लिए जिम्मेदार थे। यद्यपि मंत्रिपरिषद् के बारे में स्पष्ट साक्ष्य नहीं है, लेकिन लगता है उड्डम कोट्टम मंत्रीपरिषद् के रूप में कार्य करती थी। प्रशासनिक पदानुक्रम में ऊपर या नीचे की ओर गतिशीलता देखी जा सकती है। पारंपरिक इतिहासलेन के अनुसार पेरुंडनन एवं शिरुतरम क्रमशः उच्च एवं निम्न अधिकारियों की श्रेणी थी। सेनापति (सेना की टुकड़ी का अध्यक्ष) की बीच की स्थिति भी जिसे सिरुडनटुप, पेरुडनन कहा जाता है। न्यायट्टर (न्यायाधी) दोनों श्रेणियों के होते थे। हाल ही में इतिहासकारों ने इस ओर ध्यान दिलाया है कि यह विभाजन साक्ष्यों के द्वारा प्रमाणित नहीं है।

अधिकारियों को भू-अधिकार के रूप में पारिश्रमिक दिया जाता था। भूमि पर कर नगद तथा वस्तुओं के रूप में लिए जाते थे। अधिकारियों को भू-धारक (उयन, किलान) कहा जाता था। वे भूमि किसी अन्य को भी दे सकते थे या बेच सकते थे। सामुदायिक स्वामित्व प्रचलन में था तथा गाँववालों के पारंपरिक अधिकारों को मान्यता मिली हुई थी। प्रशासन की सबसे छोटी इकाई गाँव थी। इनको मिलाकर नाडु बनते थे। कुछ नाडुओं को मिलाकर वैलेनाडु  बनता था। तेनीयार एक अलग गाँव और बस्ती स्थल था। वैलेनाडु के ऊर मंडलम होते थे जो प्रांत के समान होते थे। कारुमिलगल एवं पैनिमक्कल शब्द अधिकारी एवं नौकर की ओर इंगित करते हैं। अंबिल अधिकारपत्र में ब्राह्मण मान्य सचिव के बारे में बताया गया है जिसे राजा द्वारा भूमि दी गई थी। राजा का आदेश मौखिक रूप (त्रियुवयकेलवी) में होता था खासतौर पर मंदिरों के लिए दान के संबंध में । दिशा-निर्देश पत्र (श्रीमुम) के द्वारा दिजाते जिन्हें राजा द्वारा नियुक्त अनाट्टी (कार्यकारी अधिकारी) जारी करता था। स्थानी निकायों को जानकारी दी जाती थी और प्रक्रिया पूरी हो जाने पर दस्तावेज स्थानीय प्रमु, जिन्हें नाटुक्कन, नाडुकिलावन, उरुदैयान कहते थे, के समक्ष रखा जाता था। अनुदान देने तथा उनके दस्तावेज़ बनाने की प्रक्रिया में संलग्न कुछ आधिकारियों को उत्तरामंत्रिन कहा गया है। पुरवुवारी-निनईक्कलभू-राजस्व विभाग था। वारिपोट्टगम भू-अधिकारों से संबंधित दस्तावेज़ तथा वारि-पोट्टगक कनक्कु भी राजस्व विभाग का दस्तावेज़ था। वारिपोट्टग वारियिलेवे अधिकारी थे जो राजस्व विभाग तथा भू-अधिकारों से संबंधित दस्तावेज़ रखते थे। कनकनिस या पर्यवेक्षक लेखा अधिकारी थे। दस्तावेज़ों में दी गई प्रविष्टि को वैरियीलेडु कहा जाता था। मुगावेट्टी (शाही पत्र लिखते थे) और पट्टोलई भू-राजस्व के कनिष्ठ कार्मिक थे। नाडु के अधिकारी’ (अधिकारी स्तर के) नाडुकुरु (राजस्व निर्धारण एवं बंदोबस्त अधिकारी) व नाडु वई (राजस्व अधिकारी) थे। मंदिओलई वे अधिकारी थे जो निरूगुम (शाही देश से संबंधित पत्र) लिखते थे। नाडुविरुक्कई शब्द विज़नप्ति (वक्केलवी के लिए इस्तेमाल किया जाता या आवेदन करने वाले लिए प्रयोग में लाया जाता था और अनट्टी (कार्यकारी अधिकारी) राजा तथा उससे मिलने के इच्छुक लोगों के बीको कड़ी के रूप में काम करता था। राजा मौखिक आदेश (तिरुवयक्केलवी) उन मुद्दों पर जारी करता था जो अधिकारियों द्वारा उसके पास लाए जाते थे। ये निवेदन आदेश में तबदील हो जाते थे जो स्थानीय प्रशासन और केन्द्रीय प्रशासन को कार्यान्वयन के लिए भेजे जाते थे। ओलई नयागम वे अधिकारी थे जो मंदिर ओलई द्वारा लिखे पत्रों को प्रमाणित करते थे। राजा के मौखिक आदेश को लिखित (एलुटु) रूप दिया जाता था तथा इसकी मूल आदेश (ओप्पु) से मिलाया जाता था फिर दस्तावेज में लिखा (पुगुंडा) जाता था। विदाइल दिगारी आदेश को दस्तावेज में सूचीबद्ध करते थे। इस दस्तावेज़ को टिट्टु कहते थे और धर्मार्थ कार्य को अरावोलाई।। 

ग्रामीण सभाओं द्वारा न्याय प्रक्रिया का कार्यान्वयन उन समितियों के जरिये होता था जिनमें न्ययट्टर होते थेधर्मासना केन्द्रीन्यायालय था जो धर्मासना भट्ट (ब्राह्मण जो कानून विशेषज्ञ थे) के द्वारा संचालित था। ऐसा लगता है कि नागरिक एवं फौजदारी अपराधों के मामलों के लिए अलग से व्यवस्था नहीं थी। राजा या शासकरने वाले राजवंश को प्रभावित करने वाले अपराध की सज़ा राजा निर्धारित करता था। दंड के कुछ तरीकों का विवरण उपलब्ध है जैसे आर्थिक दंड, मृत्यु दंड आदि । 

राजा के अधिकारियों को अधिकारी कहा जाता था। वे उदईयान, किलन/किलावन, वेलन, मुवेन्डावेलन, ब्रह्मा, पल्लवरियन, विलुप्परियन जैसी उपाधियाँ तथा अन्य मुखिया नामपद्धति धारण करते थे। कई बार एक से अधिक नाम पद्धतियाँ धारण की जाती थीं। चोल शासक का नाम या उपनाम अधिकारियों द्वारा प्रत्यय के रूप में प्रयुक्त होता था। नाडुविरुक्कई अधिकांशतः ब्राह्म(जो भट्ट, ब्रह्माधिराजन की उपाधि धाररते थे) अधिकारी थे। ये अधिकारी शाही प्रशासन एवं नौकरशाही के बीच कड़ी का काम करते थे और उनका उल्लेख हमेशा अधिकारियों के संदर्भ में मिलता है। मंदिरों के प्रभारियों को श्रीकार्यम कहते थे। लेकिन वे आनुष्ठानिक कार्यों जैसे पूजा आदि की व्यवस्था नहीं करते थे। कुछ मामलों में हमें इस बात के साक्ष्य मिलते हैं कि अधिकारी श्रीकार्यम का पद संभालते थे। सामान्यतः

प्रशासनिक व्यवस्था में उनकी विशिष्ट स्थिति थी। उनके द्वारा धारण की जाने वाली उपाधियाँ थीं किलन/किलावन, वेलन, मुवेन्डवेलन, ब्रह्मा, भट्ट, को, पल्लविरयमन, विलुप्परियन, नाडु उपाधि, राजा की उपाधि। सैन्य मालों का प्रभारी सेनापति होता था। वे राजा की उपाधि या नाम धारण करते थे एवं अन्य उपाधियाँ जैसे उदयान, ब्रह्माआरियन आदि भी धारण करते थे। तिरुमंदियाकम भूमिअनुदान से संबंधित दस्तावेजों को तैयार करते थे। इन अधिकारियों की उपाधियाँ थीं मुवेन्डवेलन, ब्रह्मा आदि । 

नाडु के अधिकारी जो राजा के प्रतिनिधि थे उन्हें नाडु वगई कहते थे। ये राजस्व निर्धारण एवं आकलन थे। कोट्टम वगई तोड़ाइमंडलम क्षेत्र में तैनात थे और नाडु वगई के समान कार्य करते थे। नाडुकंकनियकम का एक से अधिक नाडु पर नियंत्रण था और उसका स्तर नाडु वगई से च्च था। नाडु वगई से संबंधित उपाधियाँ आरियन एवं उदईन थीं। मुवेन्डवलेन उपाधि नाडु कुरु धारण करते थे (नाडु के अधिकारी) जो अधिकारी के स्तर के थे। 

राजराजा प्रथम (1001 सी.ई.) ने विस्तृत भूराजस्व निर्धारण प्रणाली अपनाई तथा वैलेनाडु अस्तित्व में आए और यह तरीके दूसरे शासकों ने भी अपनाए। भू-राजस्व विभाग को पुरखुवरी टिनईक्कलम कहा जाता था। यह विभाग राजा की शासन-व्यवस्था के अंतर्गत एप्रशासनिक खंड था और इसके निम्नलिखित कार्मिक थे पुरवुवारी, वारी पोट्टागन, मुगवेट्टी, वारी पोट्टागा, कनक्कु, वैरियिल इडु एवं पटोलई आदि । राजेन्द्र द्वितीके शासनकाल में प्रशासनिक कार्मिक अतिशयोक्तिपूर्ण उपाधियाँ धारत करते थे जैसे पुरख वारी- टिनईक्कला, कन्नकर आदि । कुलोटुंगा प्रथम को शासन काल में अधिकारियों की संख्या में कमी आई: उदईयान, मुवेन्डवेलन आदि । राजा के कार्मिकों द्वारा धारण की गई उपाधियाँ थीं: उदईया, किलन एवं किलवन जो नियंत्रण या कब्ज़ा होने की तरफ संकेत करती हैं। 

वेलान तथा मुवेन्डवेलन इनके द्वारा धारण की गई अन्य उपाधियाँ थी। मुवेन्डवेलन चोल उपाधि थी और यह परांतक के शासनकाल से प्रचलन में थी। इन उपाधियों से पता चलता है कि जो इन्हें धारण करते थे वे भूमि से जुड़े थे। मुवेन्डेवलन उपाधि चोल राजा देते थे तथा के. वेलुथट बताते हैं कि “इस उच्च उपाधि को धारकरने वालों का संबंध महत्वपूर्ण पदों से था इससे यह पता चलता है कि महत्वपूर्ण वेल्लाल भू-स्वामी राजा की सेवा में कार्यरत थे जिससे वे राज्य व्यवस्था के अभिन्न अंग के रूप में उभरे”। प्रमुखों एवं उनके परिवार द्वारा अरियान उपाधि धारण की जाती थी। यह उपाधि अन्य महत्वपूर्ण लोग भी धारण करते थे। राजराजा प्रथम के शासनकाल में प्रमुखों के प्रभुत्व में कमी आई परंतु अरियान उपाधि धारण करने वालों की संख्या बढ़ गई। यह मुवेन्डवेलन से अधिक प्रतिष्ठा वाली उपाधि थी। ऐसा माना जाता है कि प्रमुख राजराजा तथा उसके उत्तराधिकारियों के शासन काल में भू-स्वामियों या खेतिहरों में परिवर्तित हो गए हालाँकि वे बाद में भी उपाधि धारण करते रहे थे। 

पशुपालन समूह (मनराडी मंदिरों में दिए जलाने के कार्य की देख-रेख करते थे। व्यापारी सेट्टी, मेयलट्टी एवं पलन उपाधियाँ धाररते थे। वे महत्वपूर्ण पदों पर थे जैसे सेनापति तथा लेखाकार | पेरुटक्कन एवं पेरुकोल्लन वे उपाधियाँ थीं जो शिल्पकार धारण करते थे परंतु उनमें से कुछ महत्वपूर्ण पदों पर थे जो शाही महल तथा मंदिर से संबंधित थे। 

हमें मंत्रिपरिषद् के बारे में स्पष्ट साक्ष्य नहीं मिलते लेकिन अधिकारियों जैसे पुरोहित (धर्मोपदेस्त), राजागुरु, तिरुमंदिलई, अधिकारी, वइलकेत्पर (वे अधिकारी जो राजा के निर्देशों को संकलित करते थे) आदि के विषय में जानकारी मिलती है। एम.जी.एसनारायणन बताते हैं कि उडनकुट्टम राजा के सम्मानित सहयोगियों के समान थे। इनका शायद प्रमुख होता था क्योंकि हमें उडनकुट्टम, के अधिकारी का उल्लेख मिलता है। साहित्य में (पेरियापुरा) दरबार के उल्लेख मिलते हैं। राजा के दरबार में निम्नलिखित लोग होते थे : ब्राह्मण सलाहकार, पुजारी, राजगुरु, अधिकारी, तिरुमंदिराओलाई नायगम, वायिलकेतपर, राजा के अंगरक्षकों का प्रमुख और सामंत (सामंती प्रमुख)। इस काल में लिजाने वाले विभिन्न कर थे: अंतराम इकोरू, कदामई (उत्पादन शुल्क), कुडीमई, मुट्टाम अलवेट्टी (श्रम कर) एवं टैटर पैट्टन (नगद भुगतान)। कर उगाही अधिकतर वस्तुओं जैसे धान के रूप में की जाती थी। 

चोलों ने अपने सैन्य अभियान राजराजा प्रथम के शासनकाल में श्रीलंका और राजेन्द्र प्रथके शासकाल में श्रीविजय भेजे। इससे चोल राज्य की सैन्य शक्ति के बारे में पता चलता है। ऐसा लगता है कि घुड़सवार (कुडिराईसीवगरे), अनयिटक्ल (जो हाथी पर सवार होकर ड़ते थे), नुर्धर (विल्लिल, नुक्कसैन्य बल के विभिन्न घटक थे। वलनई (दाहिना हाथ) वेलईक्करर वे सैनिक थे जो किसानों में से नियुक्त किए जाते थे। दस्तकार समूहों (इदानगई बाएँ हाथ) में से भी सैनिकों की भर्ती होती थी। मूलतः ये सब किराये के सैनिक होते थे। चोल मेयकीर्ति में कनतलुर सलई का उल्लेमिलता है जो चेर राज्य में सैन्य शिक्षा का संस्थान माना जाता है। इसमें ब्राह्मणों को शिक्षा एवं प्रशिक्षण दिया जाता था तथा मेयकीर्ति में इसको वह स्थान माना गया है जहाँ चेर नौसेना को चोल राजाओं ने ध्वस्त किया था। यह सिद्ध करता है कि चोल सैन्य व्यवस्था उत्कृष्ट एवं शक्तिशाली थी। 

राज्य व्यवस्था में प्रमुख काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। पांड्या राज्य में मुखियाओं की एक ही श्रेणी थीः अय्स। संगम साहित्य में अनेक मुखियाओं के बारे में जिक्र है जैस अ, वेल, मुव, कोडुम्बलुर और डिगमन। पल्लव काल के साक्ष्यों से मुखियाओं जैसे गंगा और अदिगमन के बारे में पता चलता है। अन्य प्रमुख जिन्होंने पल्लवों के धिपत्य को स्वीकार किया थाः बन, वेटूवा अदिअरियन, मुट्टारियार आदि। 

चोल शान काल के दौरान मुखिया थे : पलुवेट्टारियार वेल, मालव, गंगा, बान। ऐसा गता है कि मुखियाओं को भूमि दी जाती थी तथा क्षेत्र की रक्षा के बदले वे देय वसूलते थे। कुलोट्टुंगा के शासकाल के बानीलामईटिटू या कूटनीतिक समझौते का उल्लेमिलता है जो दो या अधिक मुखियाओं के बीच होता था। इन मुखियाओं के अपने सैनिक व सेवक होते थे। चोल राजाओं द्वारा उनकी सेवाएं ली जाती थीं। 

5. होयसाल 

द्वारसमुद्र के होयसाल, जैसा कि वे आमतौर पर इतिहास में जाने जाते हैं, कन्नडिग क्षेत्र में उभरे और उन्होंने बेलूर के साथ दक्षिण भारत में 11वीं-14वीं शताब्दी सी.ई. के दौरान प्रमुखता हासिल की। बेलूर को (पहले राजधानी बाद में हेलबिंडु) गतिविधियों के केन्द्र रूप में उभरा । उस समय इस क्षेत्र में कल्याणी के पश्चिमी चालुक्य और पांड्यों के साथ चोल, काकतीय (पूर्व में), कलचूरि, देवगिरि (उत्तरी कर्नाटक) के यादव प्रमुख शक्ति थे। चोलों और पांड्यों के कमज़ोर और क्षीण राजनैतिक अधिकार ने होयसाल के वर्चस्व की राह को आसान कर दिया। राजवंश के संस्थापक नृपकाम द्वितीय थे जो पश्चिमी गंगाओं के सामंत थे। विनयदित्य ने कई मलनाड़ (कर्नाटक) के मुखियों को (कोगंलव, चेंगलव, संधार के हुमच, शिभोगा) के साथ-साथ बयालनाडू (वायनाड़) के कदंबों को भी अपने अधीन कर लिया। बल्लाल प्रथम का शिलालेख यह भी पुष्टि करता है कि बयालनाडू उनके राज्य का हिस्सा था। हालांकि, राजवंश के वास्तविक संस्थापक विष्णुवर्धन थे। अरिसकेरे शिलालेख (1197 सी.ई.) ने उसने स्वयं को “चेरा के लिए एक खतरनाक महामारी” के रूप में महिमामंडित किया है। चन्नाराय-पतना अभिलेख (1190 सी.ई.) ने उन्हें “चेरा-केरल की हड्डियों को तोड़ने वाले” (धीरज, 2016 : 638-639) के रूप में सराहा। उन्होंने एनाले (पश्चिमी घाट में छोटा राज्य), एलुमले (कन्नूर के पास आधुनिक एझिमाला-मुशका शक्ति केन्द्र) और बयाल-नाडू (वायनाड़) पर अधिकार कर लिया । 1185 सी.ई. का बेलूर अभिलेख उसके राज्य की सीमाओं की पहचान कता है : “इसके दक्षिण में कोगू, पूर्व में कांची, उत्तर में कृष्ण और वेन नदियाँ, और पश्चिम में अरब सागर था” (धीरज, 2016 : 639) शिलालेखीय साक्ष्य इस बात की पुष्टि करते हैं कि चोल और पांड्या शक्ति पूरी तरह से वशीभूत और अधीनस्थ थे। महोदायापुरम के अंतिम पेरूमल राम कुलशेखर (सी. 10891122 सी.ई.) ने होयसाल दबाव के तहत महोदायापुरम से कुराकेनी कोलम में अपना आधार स्थानांतरित कर दिया था। होयसाल साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार विष्णुवर्धन के पुत्र और उत्तराधिकारी नरसिंह प्रथम के समय में विक्रमेश्वरम (रामेश्वरम्) तक हो गया था। इसके अलावा कोणू (कोयम्बटूर), पश्चिमी घाटों को छूने वाले बयाल-नाडू भी उसके प्रभुत्व का हिस्सा थे, जिससे पुष्टि होती है कि नरसिंह प्रथम के शासकाल के दौरान होयसाशक्ति पूरी तरह से केरल क्षेत्र को अपने अधीन कर लेती है। नरसिंह द्वितीय के शाकाल में चोलों और होयसालों के बीच सौहार्दपूर्ण गठबंधन था। नरसिंम्ह द्वितीय ने अपनी पुत्री का विवाह चोल राजा राजराजा द्वितीय (12161256 सी.ई.) से किया। इस गठबन्धन ने चोलों को पांड्यों के लगातार हमलों से बचाया। इस अवधि के दौरान पांड्यों को केरल के छोटे सरदारों का समर्थन प्राप्त हुआ, जो संभवततः इस क्षेत्र में होयसालों के हमले का कारण था, जैसा कि चन्नारायपतने के 1223 सी.. के अभिलेख से स्पष्ट है। होयसाल का अंतिम शक्तिशाली राजा सोमेश्वर था। अरसिरकेरे (1239 सी.ई.) और अन्य शिलालेख उन्हें “चोलकुल के एकमात्र क्षक” के रूप में द्धरत ते हैं, (धीरज, 2016: 643-644)। 1229 सी.. तक होयसाल की सीमाएँ पूर्व में कांची तक विस्तृत हुई और पश्चिमें बयाल-नाडू (वायनाड़) को स्पर्श किया। नरसिंम्ह द्वितीय ने अपने दामाद राजराजा चोतृतीय को पूरा चेरा प्रदेश दे दिया । अरकलगुड़ तालुक (हसन जिला) 1252 सी.. का शिलालेख सोमेश्वर की “कुलोधुंगा-चोल की तुलना में हरिण के सामने शेर और केरल के प्रमुख” के रूप में प्रशंसा करता है। (धीरज, 2016: 644)। नरसिम्ह तृतीय के शासनकाल के दौरान आंतरिक झगड़ों के कारण सोमेश्वर को नरसिंह तृतीय (जिन्होंने हेलीबिडु से शासन किया) और उनके सौतेले भाई रामनाथ (जिन्होंने कन्नूर से शासन किया था) के बीच अपने राज्य को बाटॅना पड़ा। हालाँकि, विघटन के अंतिम संकेत बल्लाय तृतीय के शासनकाल में सामने आए जब 13101311 सी.. में मलिक काफूर के नेतृत्व में अलाउद्दीन की सेनाओं ने प्रदेशों पर कब्जा कर लिया और बल्लाल तृतीय को अपना आधार तिरूवन्नामलामें स्थानांतरिकरना पड़ा। 

राजा और उसके अधिकारी

राजा राज्य के मामलों का नियंत्रण करता था। उनका कर्त्तव्य था “बुराई पर लगाम लगाना और अच्छे लोगों की रक्षा करना” (कोएलो, 1950 : 180) । वह सर्वोच्च अधिकारी और अपील अंतिअदालत था | न्याय से संबंधित सभी मामलों को राजा द्वारा व्यक्तिगत रूप से देखा जाता था। होयसाल साम्राज्य में मुख्य रानी के पास विशेष प्रशासनिक अधिकार होते थे। सैन्य अभियानों का नेतृत्व करते हुए भी उनके पास अलग-अलग मंत्री और प्रबन्धक थे। हालाँकि वहाँ अन्य ‘बेताज रानियाँ’ भी होती थी जिन्होंने शायद ही कभी इस तरह की सत्ता का आनंद लिया हो। युवराज स्पष्ट रूप से राज्य का उत्तराधिकारी था, दूसरा आदेशकर्ता और जिसे अक्सर राज्यपाल के रूप में नियुक्त किया जाता था। हालाँकि उस क्षमता में वह दाननायकों/दण्डनायकों से श्रेष्ठ नहीं था। मंडलेश्वर प्रजा के राजकुमार थे, एक बिन्दू पर वो स्वतन्त्र थे या फिर पहले चालुक्य या राष्ट्रकूट के सामंत थे। उनकी स्थिति लगभग “ताजपोश रानियों” के बराबर थी। उनके नीचे मंडलीक (आमतौर पर छोटे शासक) थे, फ़िर सांमत (सीमावर्ती मुखिया, नौकरशाही में, जो वशानुगत भूमि पर शासन करते थे)। अधिकारी वर्ग में, दाननायक/ दंडनायक थे जो अधिकारिक पदानुक्रम में सर्वोच्च स्थान रखते थे; सेना के सेनापतियों के रूप में और विभिन्न उच्च नियुक्तियाँ भी उनको प्राप्त होती थी। महा-प्रधान राजा के परामर्शदाता थे जिनकी सलाह राजा समय-समय पर लेते थे। विशेष नुग्रह प्राप्त सलाहकारों को उच्च उपाधियों से सम्मानित किया जाता था जैसे सर्वाधिकारी, परमविश्वासी, बहतर-नियोगाधिपति (72 के स्वामी)। 

नायक पैदल सैनिको और घोड़ों (कोएल्सो, 1950 : 187-188) के कप्तान थे। राजाओं द्वारा दाननायकों पर नज़र रखने के लिए विकारियों और राजध्यक्षायों (निरीक्षकों) को नियुक्त किया गया था। विदेशी मामले के मन्त्री को संधि-विग्रही के नाम से जाना जाता था। उनका कर्त्तव्य गठबंधन करना, युद्ध करना, अन्य क्षेत्रों के राजाओं के बीच समझौता वार्ता करना था। 

यद्यपि राजा व्यक्तिगत रूप से सैन्य अभियानों का नेतृत्व करते थे, लेकिन सेनाध्यक्ष को अक्सर अग्रणी अभियानों की कमान दी जाती थी। उन्हें सेनापति (सेना नायक) या समस्त सेनाधिपति (सेनाध्यक्ष) कहा जाता था। ये सेनापति आमतौर पर ब्राह्मण होते थे। सफल लड़ाइयों के बाद सेना नायकों को सम्मान के चिन्ह दिए गए। सुपारी-पत्ती देना सम्मान की एक ऐसी निशानी थी। राजस्व मुक्त अनुदान सेनापतियों की विधवाओं और युद्ध के मैदान में मरने वालों के आश्रितों और बच्चों को दिया गया था। 

हम शिलालेखों में सभाओं (ब्राह्मणों की सभा) के बारें में कुछ नहीं सुनते हैं। बस्तियों की बसे बड़ी संख्या गैर ब्राह्मण गांवों (उरों और कालूपल्ली की थीं। कई गाँवों ने अद हेहेग्गेड़े (शासकीय अधिकारी) और नाङ प्रभु (उप-शासकीय अधिकारी) की अध्यक्षता में एक नाड़/नाडू (जिला) का गन किया। पट्टन बाजार शहर थे, जहाँ सभी दिशाओं से व्यापारी आते थे। हम इन पट्टनों में नानादेशी की उपस्थिति के बारे में उल्लेख पाते हैं। हम पट्टनों के पट्टन-स्वामी के विषय में भी सुनते हैं। कुछ पट्टन राजधानी शहर राजधानी पट्टन (काएलहो, 1950 : 187190)। 

अपराधियों को कड़ी सजा दी जाती थी। लोग अक्सर अपनी राजमार्गों की सुरक्षा के लिए सशस्त्र सैनिक साथ ले जाते थे। हालांकि, अगर अभियानों के दौरान सैन्य दलों की आवाजाही के द्वारा फसलों को नुकसान हुआ तो हर्जाने के लिए उचित मुआवजा दिया जाता था। 

भू-राजस्व 

भूराजस्व राज्य की आका मुख्य स्रोत था। भूमि कर आम तौर पर वस्तु रूप में एकत्र किया जाता था। स्थायी (भूमि) राजस्व/राजस्व बंदोबस्त को सिद्धाया के रूप में जाना जाता था जो कुल उज के 1/6 वें से 1/7 वें भाग तथा, (कोएलहो, 1950: 196)। भूमि को म्बा में मापा गया जो जगह-2 भिन्न था। हालाँकि भू-राजस्व के अलावा आम लोगों पर करों के बोझ की सूची अंतहीन प्रतीत होती है: 

    • प्रत्येक बस्ती में व्यक्तिगत आधार पर सुन्का लगाया गया। 
    • युवराज के लिए कुमार या कुमार गाणिके लिया जाता था। 
    • निबन्ध राजा द्वारा दिये गये अधिशुल्क और निवृत्ति वेतन के भुगतान के लिए था। 
    • नाड़ (जिला) कोशागार कर्मचारियों के रख-रखाव के लिए श्री-करण लगाया गया था।

राजाओं के सैनिकों और बौझा ढोने वाले पशुओं की देखरेख के लिकई कर लगाए गए युद्ध कर (वीर-सेस); अभियानों के दौरान राजा के घोड़ों के लिए अलग से चारा शुल्क (खाना-निबन्ध) और घोड़े का योगदान (कुडुरेया सेसे लिया गया। इसी तरह राजसी 

हाथियों के पालन-पोषण के लिए अनेया सेसे लगाया गया था। किसानों को राजा की सेना के लिए धान उपलब्ध कराना था, इसके लिए भट्टा लगाया गया था। शिविर के लिकटक सेसे योगदान था। लोगों को अभियानों के दौरान राजा को गायों और बैल की आपूर्ति (नल्लावूनल्लेटु) भुगतान करना पड़ता था। इसके अतिरिक्त एक बार दिये जाने वाले कर थे जैसे राज्यभिषेक के समय कर (पट्टा- बद्धा), और पुत्र जन्म के लिए पुत्रोत्साह जुर्माना भी राज्य की आय के नियमित स्रोतों में से एक था। अन्याय कानून तोड़ने के लिए। इनके अलावा बहुत सारे कर और जुर्माने नाडु भाओं और नाड़ हेग्गड़े और जमींदारों द्वारा राजसी प्रतिबन्धों के साथ लगाया गया था। यह सूची अंतहीन है: विवाह कर (मडुव), करघा कर (तेरी ईराई, तेल निकालने का कर (गन- देरे), रंगरेज कर (बेनिज), उपपत्नी कर (टोटू दे), और इसी तरह। 

अग्रहार गाँव ब्राह्मणों को उनके पालन-पोषण के लिए दिये गये थे। हमें होयसाल शिलालेखों में अग्रहारा गांवों के लगभग 104 उद्धरण मिलते है। हालाँकि हमें गैर-अग्रहारा भूमि-जोतों को ग्रहारों में परिवर्तित करने के लिए प्रतिरोध के उदाहरण मिलते हैं। जब गौड़ों में से एक (अमीर मींदार) की भूमि को अग्रहार में बदल दिया गया, जिसका उन्होंने विरोध किया और इसके परिणाम स्वरूप गौड़ों और ब्राह्मणों के बीच लड़ाई हुई, जिसमें ब्राह्मणों ने अपने दावों का सफलतापूर्वक बचाव किया। मंदिरों की मरम्मत और रखरखाव के लिए भूमियाँ दी गई। राजा के धार्मिक झुकाव का विचार किये बिना भूमि सभी धर्मों और सम्प्रदायों (शैव, वैष्णव, जैनों) को उदारतापूर्वक दी गई थी। 

व्यापार, व्यापारी और राज्य

व्यापार और वाणिज्य भी होयसाल राज्य की आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत था। व्यापारिक माल पर कर आमतौर पर नकदी में एकत्र किया जाता था। राज्य बड़े पैमाने पर हथियारों, हाथियों, घोड़ों और कीमती और विलासिता की वस्तुओं की आपूर्ति के लिए व्यापारियों पर निर्भर थे, जिने दोनों के बीच बड़ी अर्न्तनिर्भरता विकसित की। कुछ धनी व्यापारियों को राजश्रेष्ठिगल (राजसी-व्यापारी) जैसे उच्च प्रतिष्ठा वाली उपाधि दी गई और उन्हें कस्बों के स्तंभ के रूप में माना गया (पूरा मूल स्तंभो। कर्नाटक के व्यापारियों (जैसे अय्यवोल न्नुरुवर) का अंग, वं, कांलिग, कश्मीर, सिघंल और चक्र-गोट्टा से संपर्क था। व्यापारियों को नाडुओं में विभिन्न प्रशासनिक पदों पर भी नियुक्त किया गया था और यहाँ तक कि वे सैन्य अभियानों में भाग लेते दिखाई दिए। 1145 सी.ई. बल्लारू शिलालेख में सीगे की लड़ाई में दाननायक नगर सेट्टी की मृत्यु का उल्लेख है। गुजरात (लता), केरल (मलेयाला), तमिलनाडु (तिगुला) और आंध्र (तेलुगु) के कई व्यापारी होयसाल क्षेत्र में बस गए और उन्होंने प्रशासक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाईकुड़ालारू शिलालेख (1177-78 सी. ई.) में अय्यावोल के एक चूड़ी व्यापारी मरीसेट्टी का उल्लेख है जो होयसाल देश में बस गए थे। उन्हें महाप्रभु (महान अधिकारी) के रूप में संबोधित किया गया था, और उनके प्रपौत्र पेरूमादिदेव बल्लाय द्वितीय के तहत महा-प्रधान (महानमन्त्री) और तंत्रपाल (विदेश मंत्री) बनें। शिलालेखों के प्रमाण बताते हैं कि ये व्यापारी पट्टनस्वामी/पट्टनसेट्टी तक की स्थिति तक हुँचे थे। उन्हें सिक्कों की ढलाई में भी नियुक्त किया गया था। 1188 सी.ई. नावाशिलालेख महावाह धवहरी को काम्मता (टकसाल) छत्ट्टीसेट्टी के रूप में दर्ज करता है। ये व्यापारी मन्दिरों को उदार संरक्षप्रदाकरते थे और मंदिरों के निर्माण और मरम्मत में शामिल होते थे। 1177 सी.ई. श्रण बेलगोलशिलालेख में कहा गया है कि राजसी व्यापारियों पोयसालसेट्टी और नेमिसेट्टि की माताओं ने एक जैन मंदिर का निर्माण किया। इसी तरह दयमपुर के शिलालेख में कहा गया है कि 1188 सी.ई. में बाम्मेश्वर मंदिर का निर्माण बाम्मीसेट्टी के पुत्र वेंकागावुड़ ने किया था। व्यापारी भी सक्रिय रूप से जमीन के सुधार, कुओं की खुदाई, तालाब निर्माण और अन्य सिंचाई परियोजनाओं में शामिल थे। 

1027 सी.ई. का मरासानाहल्ली शिलालेख सिरिवुर में अरापम्भा तालाब की खुदाई और पलामेसेट्टी के पुत्र शाक्य द्वारा एक जलद्वार के निर्माण का उल्लेख करता है। ऐसा प्रतीत होता है कि 11वीं शताब्दी की तुलना में, होयसाल राज्य में मंदिरों के निर्माण में 12वीं-13वीं शताब्दी में व्यापारियों की भागीदारी बढ़ी। इससे व्यापारियों की बढ़ती भागीदारी और प्रशासनिक शक्ति का आभास होता है (नायक, 2003)।