हड़प्पा सभ्यता : भौतिक विशेषताएँ, समाज और धर्म

इस पेज का पाठ्यक्रम

1. प्रस्तावना 2. गाँव से कस्बों और नगरों की ओर 3. हड़प्पा-सभ्यता : स्रोत 4.भौगोलिक विस्तार

5. महत्त्वपूर्ण केंद्र 5.1 हड़प्पा 5.2 मोहन जोदड़ो 5.3 काली बंगन 5.4 लोथल 6.5 सुत्कागनदोर

6 भौतिक विशेषताएँ 6.1 नगर-योजना 6.2 मिट्टी के र्त6.3 औज़ार और उपकरण 6.4 कला और शिल्प 6.5 सिन्धुलिपि 6.6 जीवन-यापन का स्वरूप 

7. व्यापार तंत्रों की स्थापना 8. अंतर्खेत्रिय सम्पर्क 8.1 शहर 8.2 गाँव 

9 कच्चे माल के स्रोत 10. विनिमय व्यवस्था 

11. फारस की खाड़ी और मैसोपोटामिया के साथ व्यापार 11.1 पुरातात्विक प्रमाण 11.2. लिखित प्रमा

12. परिवहन के साधन 

13. समाज 13.1 वेश-भूषा 13.2 खान-पान 13.3 भाषा एवं लिपि  13.4 युद्ध 13.5 मुख्य शिल्प व्यवसाय

14 हड़प्पा के शासक 15 धर्म और धार्मिक रीतियाँ 15.1 पूजा-स्थल 15.2 आराध्य 15.3 मृतकों का अंतिम संस्कार

1. प्रस्तावना 

इस इकाई से हम चरागाही और खेतिहर जातियों तथा छोटे-छोटे कस्बों की नींव पर पनपी हड़प्पा-सभ्यता के भौगोलिक विस्तार और इसकी भौतिक विशेषताओं की चर्चा रेंगे। प्रारंभिक हड़प्पा और हड़प्पा-सभ्यता के बीच जनसंख्या और भौतिक परम्पराओं की निरंतरता बनी हुई थी। इसमें हड़प्पा-सभ्यता के भौगोलिक विस्तार के अलावा कुछ महत्त्वपूर्ण केंद्रों के संबंध में भी विशेष चर्चा की गई है। इस इकाई में आपको हड़प्पा सभ्यता की नगर योजना, महत्त्वपूर्ण इमारतों, कला एवं शिल्प, घरों की बनावट, मिट्टी के बर्तन, औज़ार तथा उपकरण और जीवन-निर्वाह के तरीकों, लिपि आदि की जानकारी देने का प्रयास किया गया है। अन्त में, हड़प्पा की बस्तियों की भौगोलिक विशेषताओं में पाई गई एकरूपताओं पर भी प्रकाश डाला गया है। 

हड़प्पाकालीन संस्कृति की विशेषता वहाँ असंख्य छोटे-बड़े नगरों उपस्थिति थी। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे शहरों के अलावा अल्लाहदीनों (कराची के पास) जैसी बहुत सी छोटी बस्तियों से भी ऐसे प्रमाण मिले हैं जो शहरी अर्थव्यवसथा के सूचक हैंशहरी अर्थव्यवस्था की विशेषता यह है कि इनमें अंतसंबंधों का तंत्र किसी क्षेत्रीय सीमा में बंधा नहीं होता। इस इकाई में आप पढ़ेंगे कि हड़प्पा से सैकड़ों मील दूस्थित दूसरे शहरों और नगरों के लोगों से हड़प्पावासी किप्रकार सक्रिय आदान-प्रदान में लगे हते थे। इस इकाई में इस बात की व्याख्या की गई है कि शहरों में व्यापारतंत्र क्यों स्थापित किया गया? साथ ही अंतक्षेत्रीय व्यापार के तरीकों का भी जिक्र इसमें किया गया हैइसमें कच्चे माल के स्रोतों और समकालीन पश्चिमी एशिया के साथ संपर्क का भी उल्लेख है। विभिन्न ऐतिहासिक स्रोतों से हड़प्पा सभ्यता के विषय में पता चलता है और इस इकाई में इसके बारे में भी बताया गया है। 

अंत में हम हड़प्पा के समाज व धर्म की चर्चा करेंगे। हमारी यह जानने की जिज्ञासा हो सकती है कि हड़प्पा वासी देखने में कैसे लगते थे? क्या वे वैसे ही वस्त्र पहनते थे जैसे कि हम पहनते हैं? वे क्या पढ़ते-लिखते थे? नगरवासी किस प्रकार के व्यवसाय अपनाते थे? वे कौन सी भाषा बोलते थे? क्या खाते थे? क्या वे चाय के साथ आलू चिप्स खाते थे? क्या वे खेलना पसंद करते थे और युद्ध करते थे? उनके शासक कौन होते थे? उनके मंदिर एवं देवी-देवता कैसे होते थे? क्या वे हम जैसे थे? यह सारे प्रश्न वस्तुतः काफी सरल प्रतीत होते हैं लेकिन विद्वानों के लिए इनके उत्तर देना अत्यंत कठिन होता है। इसका कारण उस युग की जानकारी प्राप्त करने के लिए उपलब्ध स्रोतों का स्वरूप है। इसका मुख्य स्रोत विभिन्न स्थानों पर हुई खुदासे प्राप्त केवल पुरातात्विजानकारी है। इस सभ्यता के संदर्भ में हमारे वर्तमान ज्ञान को देखते हुए विचारों और भावनाओं से जुड़े विभिन्न प्रश्नों का उत्तर कठिनाइयाँ खड़ी करता है। कभी-कभी ऐसे प्रश्न जो प्रत्यक्षतः अत्यंत सरल नजर आते हैं उत्तर देते समय अत्यंत कठिन प्रतीत होते हैं। उदाहरण के लिए ऐसे प्रश्न का उत्तर कि क्या हड़प्पा के लोग अकीक पत्थर की मालायें बनाने में सुख का अनुभव करते थे, काफी मुश्किल हो सकता है। हम केवल हज़ारों वर्षों से पड़ी मूक, बेजान वस्तुओं के आधार पर विचारों से संबंधित कुछ प्रश्नों का उत्तर दे सकते हैं जिसका प्रयास इस इकाई में किया जायेगा। 

2. गाँवों के कस्बों और नगरों की ओर

पिछली इकाई में आप पढ़ चुके हैं कि किस तरह चरागाही घुमन्तु और खेतिहार समुदाय सिन्धु के मैदान में आकर बसे। किस तरह छोटे-छोटे नगर और कस्बे आबाद हुए जिन्होंने दूर-दूर के देश-प्रदेशों से सम्पर्क कायम किया। आगे चलकर इन्हीं खेतिहर समुदायों और छोटे-छोटे नगरों की नींव पर “हड़प्पा-सभ्यता” पनपी। “हड़प्पा-सभ्यता” में बड़े-बड़े नगरों की मौजूदगी उसका एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। इसका अर्थ यह भी है कि उस समय कुशल कारीगर थे, दूर दूर तक व्यापार होता था, समाज में धनी और निर्धन दोनों तरह के लोग रहते थे और राजा हुए करते थे। वे विशेषताएँ तो आमतौर पर सभी सभ्यताओं में पाई जाती है, किन्तु हड़प्पा सभ्यता की अपनी कुछ अलग विशेषताएँ भी थीं। हड़प्पा सभ्यता के अवशेष जिस भौगोलिक क्षेत्र में पाए गए हैं, उस क्षेत्र में रहने वाले समुदाय एक ही लिखित लिपि का प्रयोग कर रहे थे। हड़प्पा का कोई भी समुदाय, भले ही उस समय वह राजस्थान में था या पंजाब में या सिंध में, नाप-तोल के लिए एक ही तरह के बाट और तराजू का इस्तेमाल करता था। वे तांबा और कांसे से निर्मित जिन औज़ारों का प्रयोग करते थे, वे बनाव, शक्ल और आकार में क जैसे होते थेउनके द्वारा प्रयोग में लाई गई ईंटों का अनुपात 4:2:1 थाउनके कुछ नगरों में बनी इमारतों, किलों आदि की बनावट में भी एकरूपताएँ थी। उस पूरे भौगेलिक क्षेत्र में, जहाँ हड़प्पा-सभ्यता के नगर मौजूद थे, मोहरों, शंख से बनी चूड़ियों, लाल पत्थर के बने मनकों सेलखड़ी से बने गोल चपटे मनकों की बनावट एकसी होती थीहड़प्पासभ्यता की बस्तियों को अधिकतर गुलाबी रंग के मिट्टी के बर्तनों से पहचाना जाता हैइन मिट्टी के बर्तनों का ऊपरी भाग लाल रंग का होता थामिट्टी के इन बर्तनों पर काले रंग से पेड़ों, पशु-पक्षियों के एक ही प्रकार के चित्र बने होते थे और ज्यामिती की आकृतियों को चित्रित किया जाता था। हड़प्पासभ्यता की बस्तियों की भौतिक विशेषताओं में पाई जाने वाली ये करूपताएँ ही हड़प्पासभ्यता की मुख्य विशेषताएँ थीं। 

3. हड़प्पा-सभ्यता : स्रोत

हड़प्पा-सभ्यता के बारे में जानकारी हड़प्पा और मोहनजोदड़ो नामक बस्तियों की खुदाई की रिपोर्टों से प्राप्त होती है। हड़प्पा में खुदाई 1921 में आरंभ हुई। तब से कई हड़प्पा की बस्तियों का पता लगाया जा चुका है और वहाँ खुदाई की गई है। सर जॉन मार्शल और सर मॉर्टिमर व्हीलर जैसे ख्याति प्राप्त पुरातत्वविदों ने हड़प्पा की बस्तियों की खुदाई की है। इन विद्वानों ने वहाँ मिले भौतिक अवशेषों का गहराई से अध्ययन किया है तथा अतीत की कहानी को पुनः स्थापित किया है। चूंकि उन अवशेषों पर लिखे शब्दों को पढ़ा नहीं जा सकता, इसलिए हड़प्पा के लोगों द्वारा प्रयोग किए गए शिल्प-अवशेषों के अध्ययन के आधार पर ही निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। अब तक 1000 से ज्यादा ऐसी बस्तियों की खोज की जा चुकी है जिनमें हड़प्पा-सभ्यता के अवशेष मौजूद हैं। फिर भी, इनमें से अधिकांश बस्तियों की खुदाई नहीं की गई है। एक अनुमान के अनुसार, अब तक जितनी हड़प्पा की बस्तियों का पता लगाया गया है, उनमें से केवल तीन प्रतिशत की ही खुदाई की गई है। जिन स्थानों पर खुदाई का कार्य किया गया है, वहाँ भी अब तक कुल क्षेत्र के पाँचवें हिस्से के बराबर क्षेत्र में ही खुदाई की गई है। हाकड़ा घाटी में गंवेरीवाला और पंजाब में फुर्कस्लान नामक कुछ स्थान इतने बड़े हैं, जितना कि मोहनजोदड़ो, लेकिन खुदाई करने वालों ने उन्हें अभी तक छुआ भी नहीं है। इसका कारण यह है कि खुदाई के कार्य में बहुत धन खर्च होता है और बहुत धिजन शक्ति की जरूरत पड़ती है। फिलहाल, भारत या पाकिस्तान की सरकारों के पास इन खुदाई के कार्यों के लिए पर्याप्त धन नहीं है। फिर भी, एक बात साफ है और वह यह कि जब ड़प्पा सभ्यता के बारे में सामान्य अनुमान लगाया जाता है तो बहुत ही सावधानी बरतनी चाहिए। कोई भी नई खोज या खुदाई की रिपोर्ट हड़प्पा-सभ्यता के लोगों के बारे में हमारे विचारों को बहुत हद तक बदल सकती है। उदाहरण के तौर पर, मॉर्टिमर व्हीलर जैसे विद्वान का, जिन्होंने लगभग बीस वर्ष पहले लिखा था, यह विश्वास था कि सिन्धु घाटी में हड़प्पा सभ्यता पूरी तरह विकसित थी और उससे पहले की अवधि में जो लोग इन क्षेत्रों में रहते थे, उनके और हड़प्पा-सभ्यता के बीच कोई साम्य नहीं था। फिर भी, उपलब्ध सामग्री और नई-उत्खनन रिपोर्टों का गहराई से विश्लेषण करने पर पुरातत्वविदों को यह मानना पड़ा है कि हड़प्पा सभ्यता का विकास सिन्धु घाटी और उसके आस-पास ही हुआ था और उसे विकसित होने में काफी समय लगा था। पहले वाली इकाई में आप “प्रारंभिक हड़प्पा” काल में हुई उन्नति के बारे में पढ़ चुके हैं। यह पाया गया है कि “प्रारम्भिक हड़प्पा” और हड़प्पा कालों के बीच आबादी और तकनीकी कौशल की निरंतरता थी। खेतिहर बस्तियों में विकास की प्रक्रिया जाहिर थी और बुनियादी शिल्प तथा विशिष्ट सिन्धु शैली संभवतः पहले की क्षेत्रीय परम्पराओं से प्रभावित थी। चूंकि हड़प्पा-सभ्यता का अध्ययन कई मायनों में अभी तक अधूरा है, इसलिए यह प्राचीन इतिहास के छात्रों के लिए बहुत ही चुनौतीपूर्ण विषय बना हुआ है। 

4. भौगोलिक विस्तार

विद्वानों का आम तौर पर यह विश्वास है कि हड़प्पा, घग्घर और मोहनजोदड़ो की अक्षरेखा हड़प्पा-सभ्यता का केंद्र-बिन्दु रहा होगा। अधिकांश हड़प्पा सभ्यता की बस्तियाँ इसी क्षेत्र में हैं। इस क्षेत्र में कुछ खास किस्म की एकरूपताएँ पाई जाती हैं। इस पूरे क्षेत्र की भूमि एकदम समतल और सपाट है, जो यह इंगित करती है कि यहाँ जीवन-यापन के तौर-तरीके एक जैसे थे। हिमालय से पिघली बर्फ और मानसून की वर्षा से यहाँ आने वाली बाढ़ के स्वरूप का पता लगता है। इससे खेती और चरागाही के लिए एक जैसी ही संभावनाएँ पैदा हुई होंगी। सिन्धु व्यवस्था के पश्चिम में कच्छी मैदान ईरानी सीमा-भूमि के अंतवर्ती क्षेत्र में स्थित है। यह एक समतल कछारी हिमानी धौत है जो बोलन दर्रे और मंचार झील के निचले भाग में स्थित है। 

यह बंजर और शुष्क प्रदेश है, हरियाली कहीं-कहीं बाह्य इलाके में नजर आती है। नौशारो, जुदैरजोदड़ो और अली-मुराद जैसे स्थान इसी क्षेत्र में स्थित हैं। मकरन तट पर सुत्का-कोह और सुत्कागन-दोर बस्तियाँ बलूचिस्तान के पहाड़ी क्षेत्र के सबसे अधिक शुष्क भाग हैं। वे हड़प्पा-सभ्यता की पश्चिमी-सभ्यता सीमाएँ हैं। पूर्ववर्ती अफगानिस्तान में शार्तुघई में जो हड़प्पा की बस्तयाँ पाई गई हैं, वे हड़प्पा-सभ्यता की अलगथलग बस्तियाँ रही होंगी।

हड़प्पा सभ्यता की पूर्वी सीमाओं पर बड़गाँव, मनपुर और आलमगीरपुर जैसी बस्तियाँ थीं। यह इलाका अब उत्तरप्रदेश में है। गंगा-यमुना दोआब में स्थित इन स्थानों में जीवन-निर्वाह की व्यवस्था, उनकी भौगोलिक स्थिति के अनुकूल थी। इस क्षेत्र में वर्षा अधिक होती थी और यहाँ घने जंगल थे। यह इलाका चरागाही और खानाबदोशी के क्षेत्र से बाहर है और गेहूं उत्पादक क्षेत्र के अंतर्गआता है। अतः इसमें बसने की समस्याएँ दूसरी तरह की थीं। सम्भवतः इसीलिए कुछ विद्वानों का मानना है कि इस क्षेत्र की अपनी स्वतंत्र संस्कृति थी, जिसे हड़प्पा सभ्यता से प्रोत्साहन मिलता था। जम्मू में मांडा और पंजाब में रोपड़ वे स्थान हैं, जो भारमें हड़प्पा-सभ्यता के उत्तरी छोर कहलाते हैं। महाराष्ट्र में दैमाबाद और गुजरात में भगत्रव की बस्तियाँ हड़प्पा की दक्षिणी सीमाएँ रहीं होंगी।

गुजरात में भी बसावट का स्वरूप एक जैसा नहीं था। वहाँ कच्छ और काठियावाड़ छोटे-छोटे कटे हुए पठार थे और असमतल भूमि थी। दूसरी ओर, इस क्षेत्र में काम्बे की खाड़ी और कच्छ के रण से जुड़ा एक बहुत विशाल समुद्रतट था। गुजरात में हड़प्पा के लोचावल और ज्वार बाजरे का भोजन के रूप में इस्तेमाल करते थे। 

ऐसा प्रतीत होता है कि हड़प्पासभ्यता बहुत बड़े क्षेत्र में फैली हुई थी। इसका क्षेत्र मेसोपोटामिया और मिश्र की समसामयिक सभ्यताओं से अधिविस्तृत थामेसोपोटामिया में बस्तियाँ नदीय मैदानों के पार घने समूहों में फैली हुई थीं। फिर भी, घग्घरहाकड़ा क्षेत्र में बसी बस्तियों को छोड़कर हड़प्पा सभ्यता की अन्य बस्तियाँ बहुत कम घनी थीं और बिखरी हुई थींराजस्थान और गुजरात में हड़प्पासभ्यता की बस्तियों के बीच सैकड़ों किलोमीटर तक फैला रेगिस्ताऔर दलदल भरा इलाका था। शार्तुघई का सबसे निकट का हड़प्पा पड़ौसी 300 कि.मी. दूर थाइन खाली स्थानों में आदिम जातियाँ रहती रही होंगी जो उस समय भी शिकार-संग्रहण या चरागाही-खानाबदोशी द्वारा अपना पोषण कर रही थीं। इसी तरह, इस क्षेत्र में किए गए अध्ययनों से हमें हड़प्पा-सभ्यता के किसी नगर में रहने वाली जनसंख्या के आकार का पता चलता है। विद्वानों का मत है कि हड़प्पा सभ्यता के सबसे बड़े नगर मोहनजोदड़ो की जनसंख्या लगभग 35,000 थी। आधुनिक भारत के सबसे छोटे शहरों की भी आबादी बड़े से बड़े हड़प्पा-सभ्यता के शहरों की आबादी से अधिक होगी। यह याद रखने योग्य बात है कि हड़प्पा काल में परिवहन का सबसे तेज रफ्तार का माध्यम बैलगाड़ी हुआ करती थी, लोहे से लोग अनजान थे और हल के इस्तेमाल को क्रांतिकारी खोज समझा जाता था। ऐसी पुरातन तकनीक का सहारा लेकर जो सभ्यता दूर-दूर तक बिखरे क्षेत्रों को सामाजिक-आर्थिक संबंध के जटिल जाल में पिरोने में सफल रही, उसके लिए उन दिनों यह एक चमत्कारिक उपलब्धि थी। 

5. महत्त्वपूर्ण केंद्र

अब सवाल यह उठता है कि हड़प्पा के लोगों ने अफगानिस्तान में शार्तुघई या गुजरात में सुरकोटड़ा जैसे दूरवर्ती स्थानों को अपने कब्जे में लाने की कोशिश क्यों की? इस सवाल का जवाब हमें मिल सकता है यदि हम कुछ महत्त्वपूर्ण केंद्रों की भौगोलिक स्थिति और विशेषताओं से संबंधित विवरण की जांच करें। 

5.1 हड़प्पा

हड़प्पा पहली बस्ती थी, जहाँ खुदाई की गई। सन् 1920 से आरंभ करके आगे के वर्षों में दयाराम साहनी, एम.एस. वत्स और मॉर्टिमर व्हीलर जैसे पुरातत्वविदों ने हड़प्पा में खुदाई का कार्य किया। यह बस्ती पश्चिमी पंजाब में रावी के तट पर स्थित है। इसके आकार और इधर पाई गई वस्तुओं की विविधता की दृष्टि से यह बस्ती हड़प्पा सभ्यता का प्रमुख नगर मानी जाती है। इस नगर के अवशेष लगभग 3 मील के घेरे में फैले हुए हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि हड़प्पा के इधर-उधर या आस-पास बस्तियों का कोई नामो-निशान नहीं है। हड़प्पा में जनसंख्या का एक बड़ा भाग खाद्य उत्पादन से भिन्न क्रिया कलापों में लगा हुआ था। ये क्रियाकलाप प्रशासन, व्यापार, कारीगरी या धर्म से संबंधित रहे होंगे। चूंकि ये लोग अपने लिए अन्न का उत्पादन नहीं कर रहे थे, इसलिए किसी दूसरे को उनके लिए यह कार्य करना पड़ता था। उत्पादकता कम थी और परिवहन के साधन अविकसित थे। अतः खाद्य उत्पादन न करने वाले इन लोगों के भरण पोषण के लिए खाद्य उत्पादक क्षेत्रों में खाद्यान्न प्राप्त करने और ढोने के लिए बहुत लोगों को जुटाना पड़ता होगा। किन्तु ये क्षेत्र नगर से बहुत दूर नहीं रहे होंगे क्योंकि अनाज ढोने का काम बैलगाड़ियों और नावों द्वारा किया जाता था। कुछ विद्वानों का यह कहना है कि आस-पड़ोस के गाँवों के लोग नदियों में बाढ़ मैदानों में जगह बदलबदल कर खेती करते रहे होंगे। हड़प्पा की भौगोलिक स्थिति का सबसे अलग-अलग होने का कारण यही बताया जा सकता है कि यह कुछ ऐसे महत्त्वपूर्ण व्यापार मार्गों के मध्य स्थित था, जो आज तक प्रयोग में है। इन मार्गों ने हड़प्पा को मध्य एशिया, अफगानिस्तान और जम्मू से जोड़ाहड़प्पा की स्थिति इसलिए उत्कृष्ट मानी जाती थी क्योंकि यहाँ दूरदूर से आकर्षक वस्तुएँ लाजाती थीं। 

5.2 मोहनजोदड़ो

सिन्धु नदी के तट पर बसे सिंध प्रांत के लरकाना जिले में स्थित मोहनजोदड़ो को हड़प्पा सभ्यता की सबसे बड़ी बस्ती माना जाता है। इस सभ्यता की नगर-योजना, गृह-निर्माण, मुद्रा, मुहरों आदि के बारे में अधिकांश जानकारी मोहनजोदड़ो से प्राप्त होती है। इस जगह खुदाई का काम 1922 में, आर.डी. बेनर्जी और सर जॉन मार्शल की देख-रेख में शुरू किया गया। बाद में मैके और जार्ज डेल्स ने भी खुदाई की। थोड़ी-थोड़ी खुदाई का काम और नक्शा तैयार करने का काम अस्सी के दशक तक चलता रहा। 

खुदाई से पता चलता है कि लोग वहाँ बड़े लम्बे समय तक रहे और एक ही जगह पर मकानों का निर्माण तथा पुनर्निर्माण करते रहेइसी का यह परिणाम है कि इमारतों के अवशेषों और मलबे के ढेर की ऊँचाई लगभग पचहत्तर फीट है। मोहनजोदड़ो में बसावट के समय से बराबर बाढ़ आती रहीबाढ़ की वजह से जलोड़ मिट्टी इकट्ठी हो गई। सदियों से बराबर जमा होती गई गाद के कारण मोहनजोदड़ो के आस-पास की भूमि की सतह लगभग तीस फुट ऊँची हो गई। भूजल तालिका का स्तर भी सके अनुरूप बढ़ता चला गया है। अतः मोहनजोदड़ो में सबसे पुरानी इमारतें आजकल के मैदानी स्तर से लगभग 39 फुट नीचे पाई गई हैजलतालिका में चढ़ाव के कारण पुरातत्व विशेषज्ञ इन स्तरों की खुदाई नहीं कर पाए है|

5.3 कालीबंगन 

कालीबंगन की बस्ती राजस्थान में घग्घर नदी के सूखे तल के आस-पास स्थित है। जैसा किपहले बताया जा चुका है, इस क्षेत्र में हड़प्पा की बस्तियों की संख्या सबसे अधिक थी। कालीबंगन की खुदाई 1960 के दशक में बी.के. थापर के निर्देशन में की गई थी। इस स्थान से पूर्व हड़प्पा और हड़प्पा-सभ्यता की बस्तियों की मौजूदगी के प्रमाण मिले हैं। इससे पता चलता है कि हड़प्पा और कालीबंगन के लोगों के बीच धार्मिक विचारों में काफी अन्तर था। कुछ विद्वानों का मत है कि कालीबंगन हड़प्पा-सभ्यता के “पूर्वी अधिकार क्षेत्र” का हिस्सा रहा होगा। आज के हरियाणा, पूर्वी पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में हड़प्पा युग के बाड़ा, सीसवाल और आलमगीरपुर जैसी बस्तियाँ पाई गई हैं। यहाँ हड़प्पा काल के मिट्टी के बर्तनों के साथ-साथ कुछ ऐसे प्रमाण भी मिले हैं जिनसे पता चलता है कि मिट्टी के बर्तन बनाने में इन बस्तियों की अपनी अलग स्थानीय परंपराएँ भी मौजूद थीं। ऐसा प्रतीत होता है कि हड़प्पा-सांस्कृतिक क्षेत्र और पूर्वी प्रान्तों के बीच कालीबंगन की स्थिति एक मध्यस्थ की रही होगी।

5.4 लोथल 

गुजरात में रंगपुर, सुरकोटड़ा और लोथल जैसी बस्तियाँ पाई गई हैं। लोथल काम्बे की बाड़ी के तट से लगे सपाट क्षेत्र में स्थित है। ऐसा लगता है कि यह स्थान समकालीन पश्चिम एशियाई समाजों के साथ समुद्री व्यापार के लिए सीमा-चौकी के रूप में महत्त्वपूर्ण रहा होगा। इसके उत्खनक, एस.आर. राव ने वहाँ एक जहाजी पोतगाह (Dockyard) की खोज का दावा किया है।

5.5 सुत्कागन-दोर

सुत्कागन दोर पाकिस्तानईरान सीमा से लगे मकरान समुद्रतट के समीप स्थित है। आजकल यह बस्ती सूखे बंजर मैदानों के बीच स्थित है। इस शहर में एक किला था जिसके चारों ओर रक्षा के लिए पत्थर की दीवार थी। बंजर भूमि में इसके स्थित होने का कारण यही हो सकता है कि यहाँ एक बन्दरगाह था जिसकी व्यापार के लिए आवश्यकता थी।

6. भौतिक विशेषताएँ 

इस भाग में हड़प्पासभ्यता की भौतिक विशेषताओं पर चर्चा की जाएगी। इसमें हड़प्पा-सभ्यता की नगर-योजना, मिट्टी के बर्त, औज़ार और उपकरण, कला एवं दस्तकारी, लिपि और जीविका के स्वरूप पर विचार किया जाएगा।

6.1 नगर-योजना

मॉर्टिमर व्हीलर और स्टूआर्ट पिगोट जैसे पुरातत्वविदों का मत था कि हड़प्पासभ्यता के नगरों की संरचना और बनावट में असाधारण प्रकार की एकरूपता थीप्रत्येक नगर दो भागों में बंटा होता था। एक भाग में ऊँचा दुर्ग होता था जिसमें शासक और राजघराने के लोग रहते थे। नगर के दूसरे भाग में शासित और गरीब लोग रहते थे। योजना की इस अभिन्नता का अर्थ यह भी है कि यदि आप हड़प्पा की सड़कों पर घूमने निकलें, तो आप पाएंगे कि वहाँ के घर, मंदिर, अन्न भण्डार और गलियाँ बिल्कुल वैसी ही हैं जैसी मोहनजोदड़ो की या हड़प्पा-सभ्यता के अन्य किसी भी नगर की। संकल्पना की अभिन्नता का यह विचार उन विदेशी समुदायों से लिया गया था जिन्होंने अकस्मात हमला करके सिन्धु घाटी को जीत लिया और नए नगरों का निर्माण किया। इन नगरों की योजना ऐसी की गई थी जिसमें कि वहाँ के मूल निवासियों को शासकवर्ग से अलग रखा जा सके। इस तरह, शासकों ने ऐसे किलों का निर्माण किया जिनमें वे आम जनता से अलग-थलग, शान से रह सकें। आजकल विद्वान अब इन विचारों को अस्वीकार कर रहे हैं कि हड़प्पा सभ्यता के नगरों का निर्माण अकस्मात हुआ और उनकी योजना में समरूपता थी। हड़प्पा सभ्यता के शहर नदियों के बाढ़ वाले मैदानों, रेगिस्तान के किनारों पर या समुद्री तट पर स्थित थे। इसका मतलब है कि अलग-अलग क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को तरह-तरह की प्राकृतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। जब उन्होंने स्वयं को वातावरण के अनुकूल बढालना सीखा तो उन्हें अपनी नगर-योजना और जीवन शैली में भी विविधता लाने पर विवश होना पड़ा। बहुत सी बड़ी और महत्त्वपूर्ण इमारतें निचले नगर में स्थित थीं। अब कुछ महत्त्वपूर्ण बस्तियों की योजना पर फिर से विचार किया जाएगा। 

हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और कालीबंगन बस्तियों की नगर-योजना में कुछ समानताएँ हैं। ये शहर दो भागों में विभाजित थे। इन शहरों के पश्चिम में किला बना होता था और बस्ती के पूर्वी सिरे पर नीचे एक नगर बसा होता था। यह दुर्ग या किला ऊँचे चबूतरे पर, कच्ची ईंटों से बनाया जाता था। ऐसा प्रतीत होता है कि दुर्ग में बड़े-बड़े भवन होते थे जो संभवतः प्रशासनिक या धार्मिक केंद्रों के रूप में काम करते थे। निचले शहर में रिहायशी क्षेत्र होते थे। मोहनजोदड़ो और हड़प्पा में किलों के चारों ओर ईंटों की दीवार होती थी। कालीबंगन में, दुर्ग और निचले शहर दोनों के चारों ओर दीवार थी, निचले शहर में सड़कें उत्तर से क्षिण की ओर जाती थीं और समकोण बनाती थीं। स्पष्टतः सड़कों और घरों की ओर पंक्तिबद्धता से पता चलता है कि नगर-योजना के बारे में वे लोग कितने सचेत थे। फिर भी, उन दिनों नगर आयोजकों के पास साधन बहुत सीमित थे। यह पूर्वधारणा मोहनजोदड़ो और कालीबंगन से मिले प्रमाणों पर आधारित है, यहाँ गलियाँ और सड़कें अलग-अलग ब्लॉकों में अलग-अलग तरह की हैं और मोहनजोदड़ो के एक भाग (मोनीर क्षेत्र) में सड़कों तथा इमारतों की पंक्तिबद्धता शेष क्षेत्रों से बिल्कुल भिन्न है। मोहनजोदड़ो का निर्माण एक सी सपाट इकाइयों में नहीं किया गया था। वास्तव में, इसका निर्माण अलग-अलग समय में हुआ। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में भवनों और इमारतों के लिए पक्की ईंटों का इस्तेमाल किया गया। कालीबंगन में कच्ची ईंटें प्रयोग में लाई गईं। सिंध में कोट-दीजी और आमरी जैसी बस्तियों में नगर की किलेबंदी नहीं थी। गुजरात में स्थिलोथल का नक्शा भी बिल्कुल अलग सा है। यह बस्ती आयताकार थी जिसके चारों तरफ ईंट की दीवार का घेरा था। इसका कोई आंतरिक विभाजन नहीं था, अर्थात् इसे दुर्ग और निचले शहर में विभाजित नहीं किया गया था। शहर के पूर्वी सिरे में ईंटों से निर्मित कुण्ड सा पाया गया, जिसे इसकी खुदाई करने वालों ने बन्दरगाहों के रूप में पहचाना है। कच्छ में सुरकोटड़ा नामक बस्ती दो बराबर के हिस्सों में बंटी हुई थी और यहाँ के निर्माण में मूलतः कच्ची मिट्टी की ईंटों और मिट्टी के ढेलों का इस्तेमाल किया गया था। 

हड़प्पा-सभ्यता के निवासी पकी हुई और बिना पकी ईंटों का इस्तेमाल कर रहे थे। ईंटों का आकार एक जैसा होता था। इससे पता चलता है कि हर मकान मालिक अपने मकान के लिए ईंट स्वयं नहीं बनाता था, बल्कि ईंटें बनाने का काम बड़े पैमाने पर होता था। इसी तर, मोहनजोदड़ों जैसे शहरों में सफाई की व्यवस्था उच्चकोटि की थीघरों से बहने वाला बेकार पानी नालियों से होकर बड़े नालों से चला जाता था जो सड़कों के किनारे एक सीध में होते थेइस बात से फिर वह संकेत मिलता है कि उस जमाने में भी कोई ऐसी नागरिक प्रशासन व्यवस्था रही होगी जो शहर के सभी लोगों के हित में सफाई संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए निर्णय लेती थी।

कुछ विशाल इमारतें

हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और कालीबंगन में किले के क्षेत्रों में बड़ी विशाल इमारतें थीं जिनका प्रयोग विशेष कार्यों के लिए किया जाता होगा। यह तथ्य इस बात से स्पष्ट होता है कि ये इमारतें कच्ची ईंटों से बने ऊँचे-ऊँचे चबूतरों पर खड़ी की गई थीं। इनमें से एक इमारत, मोहनजोदड़ो का प्रसिद्ध “विशाल स्नान कुण्ड” है। ईंटों से बने इस कुण्ड की लम्बाई-चौड़ाई 12 x7 मी. और गहराई 3 मी. है। इस तक पहुँचने के लिए दोनों तरफ सीढ़ियाँ हैं। कुण्ड के तल को डामर से जलरोधी बनाया गया था। इसके लिए पानी पास ही एक कक्ष में बने बड़े कुएँ से आता था। पानी निकालने के लिए भी एक ढलवां नाली थी। कुण्ड के चारों तरफ मण्डप और कमरे बने हुए थे। विद्वानों का मत है कि इस स्थान का उपयोग राजाओं, या पुजारियों के धार्मिक स्थान के लिए किया जाता था। 

मोहनजोदड़ो के किले के टीले में पाई गई एक और महत्त्वपूर्ण इमारत है, अन्नभण्डार। इसमें ईंटों से निर्मित सत्ताईस खंड (Blocks) हैं जिनमें प्रकाश के लिए आड़े-तिरछे रोशनदान बने हुए हैंअन्न भण्डार के नीचे ईंटों से निर्मित खांचे थे जिनसे अनाज को भण्डारण के लिए ऊपर पहुँचाया जाता था। हालांकि कुछ विद्वानों ने इस इमारत को अन्न-भण्डारण का स्थान मानने के बारे में संदेह व्यक्त किया है किन्तु इतना निश्चित है कि इस इमारत का निर्माण किसी खास कार्य के लिए किया गया होगा।

विशाल स्नान-कुण्ड के तरफ एक लम्बी इमारत (230 x 78 फुट) है जिसके बारे में अनुमान है कि वह किसी बड़े उच्चाधिकारी का निवास स्थान रहा होगा। इसमें 33 वर्ग फुट का खुला प्रांगण है और उस पर तीन बरांडे खुलते हैं। महत्त्वपूर्ण भवनों में एक सभाकक्ष’ भी था। इस सभा-कक्ष में पाँच-पाँच ईंटों की ऊँचाई की चार चबूतरों की पंक्तियाँ थीं। यह ऊँचे चबूतरे ईंटों के बने हुए थे और उन पर लकड़ी के खंभे खड़े किए गए थे। इसके पश्चिम की तरफ कमरों की एक कतार में एक पुरुष की प्रतिमा बैठी हुई मुद्रा में पाई गई है। 

हड़प्पा की प्रसिद्ध इमारतों में से एक ‘विशाल अन्नभण्डार’ है। इसमें एक क्रम में ईंटों के चबूतरे (Platform) बने हुए थे जो अन्नभण्डारों के लिए नींव का काम देते थे। इन पर बने अन्न भण्डारों की दो कतारें थीं और प्रत्येक कतार में छ: अन्नभण्डार थे। अन्न भण्डार के क्षिण में ईंटों के गोल चबूतरों की कई कतारें थीं। फर्श की दरारों में पाया गया गेहूं और जौ का भूसा यह सिद्ध करता है कि इन गोल चबूतरों का इस्तेमाल अनाज गाहने (अनाज से भूसी अलग करने) के लिकिया जाता है।

कालीबंगन नगर मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की तुलना में छोटा था। यहाँ की गई खुदाई में सबसे महत्त्वपूर्ण खोज है अग्नि-कुण्डों का पाया जाना । यहाँ ईंटों के बने बहुत से चबूतरे पाए गए हैं। इनमें से एक चबूतरे पर एक पंक्ति में बने सात “अग्नि कुण्ड” और एक गड्ढे में पशुओं की हड्डियाँ तथा मृगभंग पाए गए हैं।

घरों की बनावट

औसत दर्जे के नागरिक निचले शहर में भवन-समूहों में रहा करते थे। यहाँ भी घरों के आकार-प्रकार में विविधताएँ हैं। एक कोठरी वाले मकान शायद दासों के रहने के लिए थे। हड़प्पा में अन्नभण्डार के नजदीक भी इसी तरह के मकान पाए गए हैं। दूसरे मकानों में आंगन और बारह तक कमरे होते थे और अधिक बड़े मकानों में कुएँ, शौचालय एवं गुसलखाने भी थे। इन मकानों का नक्शा लगभग एक जैसा था – एक चौरास प्रांगण और चारों तरफ कई कमरे। घरों में प्रवेश के लिए संकीर्ण गलियों से जाना पड़ता था। सड़क की तरफ कोई खिड़की नहीं होती थी। इसका मतलब यह हुआ कि मकान की ईंट की दीवारों का मुंह सड़क की ओर होता था। 

हड़प्पा-सभ्यता के मकानों और गरों के विवरण से पता चलता है कि ऐसे लोग भी थे जिनके पास बड़े-बड़े मकान थे। उनमें से कुछ तो विशिष्ट तरणताल में नहाते थे। अन्य लोग बैरकों (Barracks) में रहते थे। यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि बड़े-बड़े मकानों में रहने वाले लोग धनी वर्ग के थे जबकि बैरकों (Barracks) में रहने वाले लोग मजदूर और दास वर्ग के रहे होंगे।

निचले शहर के मकानों में काफी बड़ी संख्या में कर्मशालाएँ भी थीं। कुम्हारों के भट्टों, रंगसाजों के हौजों और धातु का काम करने वालों, सीपी-शंख के आभूषण बनाने वाले और मनके बनाने वालों की दुकानों की पहचान कर ली गई है।

6.2 मिट्टी के बर्तन

हड़प्पा सभ्यता की बस्तियों में पाए गए अवशेषों में मिट्टी के बर्तन विशेष स्थान रखते हैंइनमें बलूचिस्तान की मृत्तिकाशिल्प की परम्पराओं और सिन्धु व्यवस्था के पूर्व की संस्कृतियों का मेल हुआ जान पड़ता हैहड़प्पा की सभ्यता के मिट्टी के बर्तनों में से अधिकांश बिल्कुल सादे हैं, लेकिन काफी बर्तनों पर लाल पट्टी के साथसाथ काले रंग से की गई चित्रकारी भी पाई गई है

रंग से की गई चित्रकारी में विविध मोटाई की सपाट लाइनें, पत्तियों के नमूने, तराजू, चारखाने, जाली का काम, ताड़ और पीपल वृक्ष शामिल है। पक्षियों, मछलियों और पशुओं को भी दर्शाया गया है। इन बर्तनों की आकृतियों में खास हैं पैडेस्टल (Pedestal), बर्तन, थाली, पानपात्र, चारों ओर छिद्रित बेलनाकार बर्तन और विभिन्न तरह के कटोरेकटोरियाँ । मिट्टी के बर्तनों पर बनी आकृतियों और चित्रकारी में एकरूपता के कारण स्पष्ट करना या बताना कठिन हैइस एकरूपता का सामान्यतः स्पष्टीकरण यही है कि मिट्टी के ये बर्तन स्थानीय कुम्हारों द्वारा बनाए जा रहे थे। किन्तु गुजरात और राजस्थान जैसे खेत्रों में अन्य अनेक तरह के बर्तन भी नाए जा रहे थे। मिट्टी के कुछ बर्तनों पर मुद्रा के निशान पाए जाने से संकेत मिलता है कि कुछ खास किस्म के बर्तनों का व्यापार भी किया जाता था। फिर भी, अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि इतने विशाल क्षेत्र में मिट्टी के बर्तनों की परम्परा में एकरूपता कैसे संभव हुई।

6.3 औज़ार और पकरण

हड़प्पा सभ्यता के निवासियों द्वारा इस्तेमाल किए गए औज़ारों और उपकरणों के आकार प्रकार तथा उत्पादन की तकनीक में भी आश्चर्यजनक एकरूपता दिखाई पड़ती है। वे तांबा, कांसा और पत्थर के बने औज़ार का प्रयोग करते थे उनके मूल औज़ार तांबे तथा कांसे के थे। इनमें चपटी कुल्हाड़ी, छैनी, चाकू हरावल और वाणाग्र मुख्य रूप से पाए जाते हैं।

सभ्यता के आगे के चरणों में वे छुरे, चाकू और चपटे तथा तीखी नोक वाले औज़ारों का भी प्रयोग करने लगे थे। वे कांसे और तांबे की ढलाई की तकनीक जानते थे। पत्थर के औज़ारों का भी आम इस्तेमाल होता ही था। 

 सिंध में सुक्कुर जैसे उद्योग क्षेत्रों में इन औज़ारों का निर्माण बड़े पैमाने पर किया जाता था और फिर ये औज़ार विभिन्न शहरी केंद्रों को भेजे जाते थे। औज़ारों के आकार प्रकार में एकरूपता का यही कारण था। “प्रारम्भिक-हड़प्पा” काल में औजार बनाने की परम्पराओं में विविधता थी, लेकिन बाद में हुई प्रगति के युग में हड़प्पा सभ्यता के निवासियों ने लम्बे, पैनी धार वाले, सुव्यवस्थित औज़ारों का ही निर्माण किया जो उनकी उच्चस्तरीय क्षमता औविशिष्टता का संकेत देते हैं। पर, इन औज़ारों को सुन्दर बनाने और उनमें नवीनता लाने की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया।

6.4 कला और शिल्प

कलाकृतियों से यह जानकारी मिलती है कि समाज किस तरह अपने वातावरण, अपने परिवेश और परिस्थितियों से जुड़ता है या जुड़ने की कोशिश करता है। कलाकृतियाँ हमें यह भी बताती हैं कि समाज, प्रकृति, मानव और ईश्वर के प्रति क्या विचार रखता है। पूर्व आधुनिक समाजों के अध्ययन में कला और शिल्प को अलग करना कठिन काम है। अतः उनका एक साथ अध्ययन किया जाएगा।

मोहनजोदड़ो की खुदाई में पाई गई हड़प्पा-सभ्यता की संभवतः सबसे प्रसिद्ध कलाकृति है नृत्य की मुद्रा में नग्न स्त्री की एक कांस्यमूर्ति। सिर पीछे की ओर झुकाए, आंखें झुकी हुई, बाईं भुजा कूल्हे पर टिकाए और बाईं भुजा नीचे लटकी हुई दर्शाने वाली यह मूर्ति नृत्य की स्थिर मुद्रा में है। स्त्री प्रतिमा ने बहुत सारी चूड़ियाँ पहनी हुई है और उसको बालों को सुन्दर वेणी बनी हुई है। इस मूर्ति को हड़प्पा-कला का अद्वितीय नमूना माना जाता है। भैंसे और भेड़ की छोटी-छोटी कांस्य प्रतिमाओं में पशुओं की मुद्राओं को सुन्दर ढंग से पेश किया गया है। खिलौनों के रूप में कांसे की दो गाडियाँ की बहुत आकर्षक एवं प्रसिद्ध हैं। हालांकि इनमें से एक हड़प्पा में पाई गई थी और दूसरी 650 कि.मी. दूर चन्हूदारों में फिर भी इन दोनों की बनावट एक जैसी है। 

मोहनजोदड़ों में पाई गई दाढ़ी वाले सिर की प्रस्तर प्रतिमा भी बड़ी प्रसिद्ध कलाकृति है। चेहरे पर दाढ़ी है परन्तु मूंछ नहीं है। अर्ध-मुदित आंखें शायद विचारमग्न मुद्रा को दर्शाती है। बाएँ कंधे के दोनों ओर एक आवरण पड़ा है जिस पर तिपतिया पैटर्न की सुन्दर नक्काशी की हुई है। कुछ विद्वानों का मानना है कि यह पुजारी की अर्ध-प्रतिमा है।

हड़प्पा की खुदाई में पाई गई दो पुरुषों की अर्ध मूर्तियों के बारे में यह भी कहा जाता है कि वे बाद के युग की रही होंगी। प्रतिमा के मांसल भागों को इस खूबसूरती और वास्तविकता से तराशा गया है कि देख कर आश्चर्य होता है। फिर भी, ऐसा लगता है कि हड़प्पा-सभ्यता के लोग अपनी कला-कृतियों के लिए प्रस्तर या कांसे का इस्तेमाल बहुत अधिक नहीं करते थे। इस तरह की कलाकृतियाँ बहुत कम संख्या में पाई गई हैं। 

हड़प्पा-सभ्यता की बस्तियों से पक्की मिट्टी की लघु मूर्तियाँ बड़ी संख्या में पाई गई हैं। इनका प्रयोग खिलौनों या पूजा-उपासना के लिए किया जाता था। ये लघु मूर्तियाँ विभिन्न तरह के पक्षियों, बन्दरों, कुत्तों, भेड़ों, मवेशियों और कूबड़दार तथा कूबड़रहित सांडों की हैं। स्त्री और पुरुषों की छोटी-छोटी मूर्तियाँ भी बड़ी तादाद में मिली हैं। पक्की मिट्टी (terracotta) की बनी तरह-तरह की गाड़ियों-ठेलों के नमूने भी मूर्ति कला में असाधारण सजीवता को प्रदर्शित करते हैं। इन नमूनों को देखकर लगता है कि आधुनिक काल में इस्तेमाल की गई बैलगाड़ियों का स्वरूप हड़प्पा-युग की बैलगाड़ियों का ही परिवर्तित रूप है।

‘हड़प्पा-सभ्यता के लोग गोमेद, फीरोजा, लाल-पत्थर और सेलखंड़ी जैसे बहुमूल्य एवं अर्थ-कीमती पत्थरों से बने अति सुन्दर मनकों का प्रयोग करते थे। इन मनकों को बनाए जाने की प्रक्रिया चन्हूदारों में एक कारखाने के पाए जाने से स्पष्ट हो जाती है। इस प्रक्रिया में पत्थर को आरी से काट कर पहले तो आयताकार छड़ में बदल दिया जाता था, फिर उसके बेलनाकार टुकड़े करके पॉलिश से चमकाया जाता था। अन्त में, चर्ट बरमे या कांसे के नलिकाकार बरमे से उनमें छेद किया जाता था। सोने और चांदी के मनके भी पाए गए हैं। मनके बनाने के लिए सबसे अधिक सेलखड़ी का प्रयोग किया जाता था।

तिपतिया पैटर्न के बेलनाकार मनकों का संबंध विशेष रूप से हड़प्पा-सभ्यता से जोड़ा जाता है। लाल पत्थर के मनके भी बहुत संख्या में पाए गए हैं। मोहनजोदड़ो के गहनों का ढेर भी पाया गया है। जिसमें सोने के मनके, फीते और अन्य आभूषण शामिल हैं। चांदी की थालियाँ भी पाई गई हैं।

हड़प्पा की बस्तियों से 2000 से अधिक मुहरें पाई गई हैं। इन्हें ग्रामीण शिल्पकारिता के क्षेत्र में सिन्धु घाटी का उत्कृष्ट योगदान माना जाता है। ये आम तौर पर चौकोर होती थीं और सेलखड़ी की बनी होती थीं लेकिन कुछ गोल मुहरें भी पाई गई हैं। मुहरों पर चित्रलिपि में संकेत चिन्हों से सम्बद्ध अनेक तरह के जानवरों के आकार बने होते थे। कुछ मुहरों पर केवल लिपि उत्कीर्ण है जबकि कुछ अन्य पर मानव और अर्ध-मानव आकृतियाँ बनी हुई हैं। कुछ मुहरों पर ज्यामिति से संबंधित विभिन्न नमूने बने हुए हैं। दर्शाई गई पशु आकृतियों में भारतीय हाथी, गवल (बिश) ब्राह्मनी सांड. गैंडा और बाघ प्रमुख हैं। अनेक तरह के संयुक्त पशु भी दर्शाए गए हैं। इस तरह की एक आकृति में मनुष्य के चेहरे पर हाथी की सूंड और दांत बने हुए हैं, सिर पर सांड के सींग हैं, अग्रभाग मेष का है और पीछे का भाग बाघ का। अनेक मुहरों में यह आकृति पाई गई है। इस तरह की मुहरों को धार्मिक प्रयोजन के लिए प्रयोग किया जाता होगा। मुहरों का प्रयोग बड़े शहरों के बीच माल के विनिमय के लिए भी किया जाता होगा। पशुओं से घिरे और योग की मुद्रा में बैठे सींगयुक्त देवता को दर्शाने वाली मुहर को भगवान् पशुपति से संबंधित माना गया है। हड़पपा-सभ्यता की कलाकृतियाँ हमें दो कारणों से निराश करती हैं :

i) पाई गई कलाकृतियों की संख्या बहुत सीमित है और

ii) उनमें अभिव्यक्ति की उतनी विविधता नहीं है जितनी मिश्र और मेसोपोटामिया की समकालीन सभ्यताओं की कलाकृतियों में पाई गई है।

हड़प्पा-सभ्यता की प्रस्तर मूर्तिकला मिश्र के लोगों की मूर्तिकला की तुलना में सीमित और अविकसित थी। पक्की मिट्टी की कलाकृतियाँ भी स्तर में उतनी अच्छी नहीं थीं जितनी कि वे जो मेसोपोटामिया में बनाई जाती थीं। संभव है कि हड़प्पा सभ्यता के लोगों ने अपनी कला की अभिव्यक्ति के लिए कपड़ों पर आकृतियाँ बनाई हों और रंगचित्रों का प्रयोग किया हो जो कम टिकाऊ होने के कारण समय के साथ नष्ट हो गए हों।

6.5 सिन्धु-लिपि

हड़प्पा सभ्यता के लोगों द्वारा प्रयोग की गई मुहरों (Seals) पर लिखावट होती थी। यह लिपि अभी तक पढ़ी न जा सकने के कारण रहस्य बनी हुई है। प्राचीन मिश्र की लिपियों जैसे अन्य विस्मृत लिपियों को दुबारा पढ़ना इसलिए संभव हो सका क्योंकि विस्मृत लिपि में लिखित कुछ लेख बाद में एक परिचित लिपि में पाए गए हैं। इस परिचित लिपि के कुछ अक्षर विस्मृत लिपि 

के अक्षरों से मिलते-जुलते थे। हड़प्पा में कोई द्विभाषिक लेख अभी तक नहीं मिले हैं। अतः यह नहीं कहा जा सकता कि हड़प्पा-निवासी कौन सी भाषा बोलते थे और उन्होंने क्या लिखा। दुर्भाग्यवश, अब तक पाए गए लेख बहुत संक्षिप्त हैं और मुहरों पर खुदे हुए हैं। इस कारण उन्हें पढ़ पाना और भी कठिन हो जाता है। हड़प्पा निवासी चित्राक्षरों का प्रयोग करते थे और दाईं से बाईं ओर लिखते थे। किन्तु, विद्वान अभी भी इस लिपि के रहस्य को खोलने की कोशिश में लगे हुए हैं। इस कार्य में सफलता मिलने पर हड़प्पा की सभ्यता के बारे में और भी जानकारी प्राप्त होगी। 

6.6 जीवन-यापन का स्वरूप 

हड़प्पा सभ्यता की शहरी आबादी कृषि उत्पादन पर निर्भर करती थी। विभिन्न स्थानों पर की गई खुदाई के दौरान हड़प्पासभ्यता के लोगों की आहार संबंधी आदतों के बारे में वृहत जानकारी प्राप्त हुई है। ऐसा लगता है कि भेड़ और बकरी के अलावा, कूबड़दार मवेशियों को भी पाला जाता थाबहुत सी बस्तियों में सूअर, भैंस, हाथी और ऊँट की हड्डियाँ भी पाई गई हैं। अभी तक यह निश्चित नहीं है कि ये जानवर पाले जाते थे या उनका शिकार किया जाता था। फिर भी, कुछ मुहरों पर एक सुसज्जित हाथी के चित्र में यह संकेमिलता है कि इस जानवर को पालतू बना लिया गया थामुर्गों की हड्डियाँ भी पाई गई हैं। संभवतः उन्हें पालतू बना लिया गया थाजंगली जानवरों की हड्डियाँ भी बड़ी तादाद में पाई गई हैंउनमें हिरण, गैंडे, कछुए आदि की हड्डियाँ शामिल हैं। हड़प्पा काल में लोग घोड़ों के विषय में शायद नहीं जानते थे। 

हड़प्पा सभ्यता की बस्तियों में गेहूँ की दो किस्में अधिक पाई गई हैंजौं काफी बार पायी गई है। अन्य फसलों में खजूर और फलदार पौधों की किस्में शामिल हैं, जैसे कि मटर। उनके अलावा इस काल में सरसों और तिल की फसल भी होती थी। लोथल और रंगपुर में चिकनी मिट्टी में और मिट्टी के बर्तनों में चावल की भूसी दबी हुई पाई गई है। यह नहीं कहा जा सकता कि चावल की ये किस्में जंगली थीं या नियमित रूप से उगाई जाने वाली किस्में। भारत अपने परम्परागत सूती वस्त्रों के लिए प्रसिद्ध रहा है। मोहनजोदड़ों में सूती कपड़े का एक टुकड़ा पाया गया है जिससे पता चलता है कि हड़प्पा-सभ्यता के लोग कपास की खेती करने और कपड़े बनाने पहनने की कला में निपुण हो चुके थे।

कालीबंगन में खांचेदार खेत के प्रमाण मिले हैं जिनसे यह स्पष्ट है कि हड़प्पा-सभ्यता के लोग लकड़ी के हल का प्रयोग करते थे। इस क्षेत्र में अभी भी एक दिशा में काफी दूर-दूर और एक दिशा में बहुत पास-पास आड़े-तिरछे खांचे बनाने की पद्धति प्रचलित है। आधुनिक कृषक अपने खेत में इसी ढंग से खांचे बनाकर एक तरफ कुलथी या तिल की खेती करता है और दूसरी तरफ सरसों की। हड़प्पा की सभ्यता के किसान भी शायद यही करते थे। 

इस तरह, यह पाया गया है कि हड़प्पा-युग के जीवन-निर्वाह की व्यवस्था अनेक प्रकार की फसलों, पालतू पशुओं और जंगली जानवरों पर निर्भर करती थी। इस विविधता के कारण ही जीवन-निर्वाह व्यवस्था मजबूत बनी हुई थी। वे प्रति वर्ष एक साथ दो फसलें उगा रहे थे। इससे अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत हो गई थी कि नगरों में रहने वाली और अपने लिए अन्न का उत्पादन खुद न करने वाली बड़ी जनसंख्या का भरण-पोषण किया जा सकता था। 

7. व्यापार तंत्रों की स्थापना 

यह माना जाता है कि पूर्व शहरी समाज में विभिन्न क्षेत्रों के बीच सक्रिय लेन-देन नहीं था। अब सवाल यह है कि नगरवासियों ने दूरस्थ देशों से सम्पर्क क्यों स्थापित किया और हमें इस विषय में कैसे पता चलता है? शहरी केंद्रों में जनसंख्या का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा खाद्यान्न उत्पादन में न लगकर दूसरे अन्य प्रकार के कार्यकलापों में लगा होता है। ये लोग प्रशासनिक, व्यापार और विनिर्माणी कार्य करते हैं। साथ ही यदि वे स्वयं खाद्यान्न उत्पादन नहीं करते हैं तो वह काम दूसरे को उनके लिए करना पड़ता है। यही कारण है कि नगर, खाद्यान्न आपूर्ति के लिए आस-पास के ग्रामीण क्षेत्र पर निर्भर हैं।

यह तथ्य महत्त्वपूर्ण है कि शहर और गाँव के बीच सम्बन्ध असमान हैं। शहरों का प्रशासनिक या धार्मिक केंद्रों के रूप में विकास होने पर पूरे देश में संसाधन वहाँ एकत्र हो जाते हैं। यह सम्पत्ति करों, उपहारों, भेटों या खरीदे हुए सामान के रूप में भीतरी प्रदेश से शहर में आते हैं। हड़प्पा समाज में इस सम्पत्ति का नियंत्रण शहरी समाज के सबसे अधिक प्रभावशाली लोगों के हाथ में था। साथ ही शहर के धनी और प्रभावशाली लोग आरामदायक जीवन बिताते थे। उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा उनके द्वारा बनाए गए भवनों और उनके द्वारा उपयोग में लाई जाने वाली भोग विलास की वस्तुओं के अधिग्रहण से प्रतिबिम्बित होती है जो स्थानीय रूप से अनुपलब्ध थीं। यह इस बात की ओर संकेत करता है कि शहरों का दूरस्थ देशों से सम्पर्क स्थापित करने का मुख्य कारण इस अमीर और प्रभावशाली लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करना था। हड़प्पावासियों के दूरस्थ देशों से सम्पर्क स्थापित करने के कारणों में से एक कारण यह भी हो सकता है। 

हड़प्पा, बहावलपुर और मोहनजोदड़ो वाला भू-भाग सभ्यता का मूल क्षेत्र है। लगभग दस लाख अस्सी हज़ार वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में पाई गई बस्तियों में हड़प्पा सभ्यता के प्रभाव के प्रमाण पाए गए हैं। 

यहाँ पर एक प्रासंगिक प्रश्न उठाया जा सकता है कि अफगानिस्तान के शार्तुघई और गुजरात के भगत्रव जैसे दूर तक फैले हुए क्षेत्र में हड़प्पा सभ्यता के लोगों ने बस्तियाँ क्यों बसाईं? इसका युक्तिसंगत उत्तर विभिन्न क्षेत्रों की आपसी आर्थिक अंतर्निर्भरता और व्यापारतंत्र है। मूल संसाधनों का अलगअलग स्थानों पर उपलब्ध होना सिन्धु घाटी के विभिन्न क्षेत्रों को जोड़ने का महत्त्वपूर्ण कारण था। इन संसाधनों में कृषि संबंधी संसाधन, खनिसंसाधन, लकड़ी आदि शामिल थे और ये व्यापार मार्गों की स्थापना करके ही प्राप्त किए जा सकते थे। उपजाऊ सिन्ध-हाकड़ा मैदान के धनी लोग अधिक से अधिक विलास की स्तुएँ प्राप्त करना चाहते थे। इस खोज में उन्होंने अफगानिस्तान और मध्य एशिया के साथ पहले से विद्यमान सम्बन्धों को और मजबूत बनायाउन्होंने गुजरात और गंगा की घाटी जैसी जगहों में भी बस्तियाँ बसाईं।

8. अंतर्खेत्रीय सम्पर्क 

अब हम हड़प्पा नगरों के आपसी और उस समय के दूसरे शहरों और समाजों के साथ सम्पर्क के स्वरूप का मूल्यांकन करने की चेष्टा करेंगेहमारे पास इस सम्पर्क के प्रमाण हड़प्पाकालीन नगरों की खुदाई द्वारा पाई गई वस्तुओं पर आधारित हैं। इनमें से कुछ प्रमाणों की पुष्टि समकालीन मेसोपोटामिया की सभ्यता के लिखित स्रोतों में पाए गए प्रसंगों द्वारा की गई है। 

8.1 शहर

अब हम हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में पाए गए अन्नभण्डारों से संबंधित प्रमाणों की चर्चा करेंगे। ये बड़ी इमारतें अनाज रखने के लिए बनाई गई थीं। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है, शहरी केंद्र खाद्यान्न आपूर्ति के लिए गाँवों पर ही निर्भर हैं। अन्न भण्डारों की उपस्थिति इस बात की ओर संकेकरती है कि शासक खाद्यान्न के एक सुनिश्चित भाग को अपने पास रखना चाहते थे। यह अनुमान है कि आस-पास के गाँवों से अनाज लाकर यहाँ रखा जाता था। फिर यह शहरी निवासियों को पुनर्वितरित किया जाता था। अनाज ऐसा संसाधन है जिसकी रोज बड़ी मात्रा में खपत होती थी। काफी मात्रा में अनाज एकत्रित करके बैलगाड़ियों और नावों द्वारा भेजा जाता था। दूरस्थ स्थानों के लिए अधिक मात्रा में खाद्य सामग्री ढोना मुश्किल काम है। यही कारण है कि नगर सर्वाधिक उपजाऊ क्षेत्रों में ही पाए गए हैं और सम्भवतया वहाँ अनाज आस-पास के गाँवों से लाया जाता था। 

उदाहरणस्वरूप, मोहनजोदड़ो जो कि सिन्ध के लरकाना जिले में स्थित था आज भी सिन्ध का सबसे उपजाऊ क्षेत्र है। परन्तु महत्त्वपूर्ण व्यापार मार्गों या औद्योगिक क्षेत्रों में से कुछ अन्य 

बस्तियाँ स्थापित हुई। बस्तियों की अवस्थिति किसी क्षेत्र की कृषि से संबंधित उपजाऊ क्षमता पर उतना निर्भर नहीं करती जितना कि व्यापार और विनिमय की सम्भावनाओं पर निर्भर करती 

है। 

यही कारण है कि बड़े शहरों की अवस्थिति के कारणों का विश्लेषण करते समय विद्वान इन बातों को ध्यान में रखते हैं: 

  • खाद्य उत्पादन के लिए उस स्थान की समर्थता, और 
  • उसकी व्यापार मार्गों और खनिज स्रोतों से निकटता।

यदि हम उपर्युक्त बातों को ध्यान में रखें तो हम पाएँगे कि हड़प्पा की अवस्थिति बहुत ही त्तम है। इके उत्तर पश्चिम के समूचे भौगोलिक क्षेत्र में किसी दूरी हड़प्पाकालीन बस्ती के प्रमाण नहीं मिले हैं। यहाँ तक कि 19वीं शताब्दी में भी इस क्षेत्र में मुख्यतया खानाबदोश चरवाहे ही रहते थे। कुछ विद्वानों का मत है कि हड़प्पा ऐसी जगह पर स्थित था जो दक्षिण की ओर स्थित कृषि बस्तियों और उत्तर पश्चिम की ओर स्थित खानाबदोश चरवाही बस्तियों को एक-दूसरे से विभाजित करती थी। इस प्रकार हड़प्पा के लोग दोनों समुदायों के संसाधनों का उपयोग कर सकते थे। ऐसा भी कहा जाता है कि यद्यपि खाद्य उत्पादन के सम्बन्ध में हड़प्पा का कोई भी महत्त्वपूर्ण योगदान नहीं था, ह एक बड़े शहर के रूमें इसलिए विकसित हो सका क्योंकि एक व्यापारिक बस्ती के रूप में इसकी अवस्थिति बड़ी महत्त्वपूर्ण थीयदि हम हड़प्पा को बीच में रखकर लगभग 300 किलोमीटर के क्षेत्र में उसके चारों 3 एक वृत बनाएँ तो हम पाएँगे कि हड़प्पा की अवस्थिति बहुत ही उत्तम है

  1. हड़प्पा निवासियों की हिन्दुकुश और पश्चिमोत्तर सीमांत तक पहुँच थी। इसका अर्थ यह है कि लगभग दस दिन की यात्रा करके हड़प्पा निवासी उस क्षेत्र में पहुँच सकते हैं जहाँ फिरोजा तथा वैद्यमणि जैसे बहुमूल्य पत्थर पाए जाते थेवे बहुमूल्य पत्थर हिन्दुकुश तथा पश्चिमोत्तसीमांत के मार्गों में लाए जाते थे
  2. वे नमक क्षेत्र से खनिज नमक भी प्राप्त कर सकते थे।
  3. उन्हें राजस्थान से टिन और तांबा सुलभ रूप से प्राप्त था।
  4. सम्भवतया वे कश्मीर में सोने और एमिथिस्ट के स्रोतों का भी उपयोग करते थे।
  5. इस 300 किलोमीटर की परिधि में उस स्थान तक भी उनकी पहुँच थी जहाँ पंजाब की पाँचों नदियाँ एक धारा में मिल जाती थीं। इसका अर्थ यह हुआ कि हड़प्पा निवासियों का पंजाब की पाँचों नदियों के नदी परिवहन पर भी नियंत्रण था। उस समय जब पक्की सड़कें नहीं थीं, नदियों द्वारा परिवहन कहीं अधिक सुलभ था।
  6. उनकी अवस्थिति उनकी कश्मीर के पर्वतीय क्षेत्रों से लकड़ी प्राप्त करने में सहायता प्रदान करती थी। हड़प्पा ऐसी जगह पर स्थित है जहाँ आधुनिक समय में भी पश्चिम और पूर्व के अनेक व्यापार मार्ग आपस में मिलते हैं।

वस्थिति के संदर्भ में मोहनजोदड़ो और लोथल की बस्तियों का भी अपना महत्त्व था। कुछ विद्वानों का मानना है कि मोहनजोदड़ो में बड़ी इमारतों का धार्मिक स्वरूप इस ओर संकेत करता है कि यह एक धार्मिक केंद्र था। यह धार्मिक केंद्र हो या न हो, यहाँ के अमीर लोग सोना, चांदी और दूसरी बहुमूल्य वस्तुओं का प्रयोग करते थे जो स्थानीय रूप से प्राप्य नहीं थी। हड़प्पा की तुलना में मोहनजोदड़ो समुद्र के अधिनिकट था। इसके कारण मोहनजोदड़ो वासियों के लिए फारस की खाड़ी और मेसोपोटामिया पहुंचना आसान था। फारस की खाड़ी और मेसोपोटामिया वे क्षेत्र थे जो सम्भवतया चांदी के मुख्य आपूर्तिकर्ता (Suppliers) थे। इसी प्रकार लोथल निवासी दक्षिणी राजस्थान और दक्कन से संसाधन प्राप्त करते थे। सम्भवतः वे हड़प्पावासियों को कर्नाटक से सोना प्राप्त करने में मदद करते थे। कर्नाटक में सोने की खानों के पास समकालीन नवपाषाण युगीन बस्तियाँ पाई गई हैं।

8.2. गाँव 

गाँव आवश्यक अनाज और कच्चा माल नगरों को भेजते थे पर हड़प्पा सभ्यता के नगर बदले में उन्हें क्या देते थे? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए हमें कुछ इने-गिने सुराग मिले हैं। एक तो यह कि नगरों के शासक अनाज को कर के रूप में वसूल करने के लिए बल प्रयोग करते थे। यह कर प्रशासनिक सेवाओं के बदले लोगों द्वारा दिया जाता था। इस ग्रामीण-शहरी सम्बन्ध का एक महत्त्वपूर्ण अवयव उन समस्त वस्तुओं को प्राप्त करना था जो स्थानीय रूप से उपलब्ध नहीं थीं और उन्हें ग्रामीण भीतरी प्रदेश (Hinterland) में उपलब्ध कराना था।

हड़प्पा काल की दिलचस्प वस्तुएँ पत्थर के औज़ार थे। हड़प्पा-सभ्यता के लगभग सभी नगरों और गाँवों के लोग समानान्तर आकार के पत्थर के ब्लेड का प्रयोग करते थे। ये पत्थर के ब्लेड बहुत ही उच्च स्तर के पत्थर से बनाएजाते थे जो हर स्थान पर नहीं पाए जाते थे। ऐसा माना जाता है कि इस प्रकार का पत्थर सिंध में सुक्कुर (Sukkur) नामक स्थान ले लाया जाता था। यह परिकल्पना इस तथ्य से सिद्ध होती है कि हड़प्पासभ्यता की शहरी अवस्था के दौरान गुजरात में स्थित रंगपुर के लोग दूर प्रदेशों से लाए गए पत्थर के औज़ारों का प्रयोग करते थे। जब हड़प्पा सभ्यता हास की ओर अग्रसर हुई तब इन क्षत्रों के लोगों ने स्थानीय पत्थर से बने औज़ारों का प्रयोग करना शुरू कर दिया। हड़प्पा के लोग तांबे और कांसे जैसी धातुओं का भी प्रयोग करते थे। तांबा कुछ ही स्थानों पर उपलब्ध था। हड़प्पा सभ्यता की लगभग सभी बस्तियों में तांबे और कांसे के औज़ार पाए गए हैं। हड़प्पा सभ्यता की लगभग सभी बस्तियों में पाए गए इन औजारों की बनावट और प्रयोग में एकरूपता थी। इससे यह पता चलता है कि वहाँ उत्पादन और वितरण अवश्य ही केंद्रीकृत संस्थाओं द्वारा किया जाता होगाइन संस्थाओं में नगरों में रहने वाले प्रशासक या व्यापारी शामिल थे। 

जिन वस्तुओं का ऊपर उल्लेख किया गया है वे आर्थिक रूप से महत्त्वपूर्ण थी। इसके अलावा हड़प्पा सभ्यता की छोटी अथवा बड़ी बस्तियों से सोने चाँदी और अनेक कीमती और अर्ध कीमती पत्थरों से बनी वस्तुएँ भी पाई गई हैं। ये धातु और पत्थर व्यापारियों या शहर के शासकों द्वारा लाए जाते थे। शहरीकरण की शुरुआत के साथ हड़प्पा-सभ्यता में व्यापार में अभूतपूर्व वृद्धि हुई । मोहनजोदड़ो से मनकों के प्रमाण मिले हैं। ये वस्तुएँ छोटे गाँवों और नगरों के अमीर और प्रभावशाली लोगों द्वारा उपयोग में लाई जाती थीं।

ऊपर की गई चर्चा से यह बात उभर कर सामने आती है कि :

  • गाँवों की अवस्थिति मुख्यतया भूमि की उपजाऊ क्षमता और सिंचाई की सुविधा की सुलभता पर निर्भर करती थी।
  • नगरों की अवस्थिति ऊपर दिए गए घटक के अन्य अतिरिक्त घटकों जैसे खानों या व्यापार मार्गों से इन नगरों की निकटता पर निर्भर करती थीं।
  • कभी-कभी नगरों की अवस्थिति व्यापार के घटक पर अन्य घटकों से अधिक निर्भर करती थी तथा कई नगर उन अनुपयोगी (Inhospitable) जगहों पर बसाए गए जहाँ कृषि उत्पादन बहुत कम था। उदाहरणस्वरूप मकरान समुद्र तट सुत्कागन दोर एक ऐसी बस्ती थी। वह कृषि उत्पादन की दृष्टि से अनुपयोगी क्षेत्र में स्थित है और इसकी मुख्य भूमिका हड़प्पा और मेसोपोटामिया के बीच व्यापार चौकी के रूप में थी।

अब हम हड़प्पा-सभ्यता के अन्य शहरों में घटित होने वाली गतिविधियों की चर्चा करेंगे।

  • बलूचिस्तान, समुद्रतट के पास बालाकोट और सिंध में चहुंदड़ों सीपी-शिल्प और चूड़ियों के लिए प्रसिद्ध थे,
  • लोथल और चहूंदड़ो में लाल (Carnelian) पत्थर और गोमेद के मनके बनाए जाते थे।
  • चन्हूंदड़ों में वैदूर्यमणि के कुछ अधबने मनके इस बात की ओर संकेत करते हैं कि हड़प्पा निवासी दूर दराज स्थानों से बहुमूल्य पत्थर आयात करते थे और उन पर काम करके उन्हें बेचते थे।
  • मोहनजोदड़ो में पत्थर की सिंचाई करने वाले, कुम्हार, तांबे और कांसे के शिल्पकार ईंटें बनाने वाले, सील काटने वाले, मनके बनाने वाले आदि हस्त कौशल में निपुण लोगों की उपस्थिति के प्रमाण पाए गए हैं।

9. कच्चे माल के स्रोत

हड़प्पा सभ्यता की विभिन्न बस्तियों की खुदाई द्वारा बहुत संख्या में चूड़ियाँ, मनके, मिट्टी के बर्तन और विभिन्न प्रकार के तांबे, कांसे और पत्थर की वस्तुयें पाई गई हैंहड़प्पा सभ्यता की बस्तियों में पाई अनेक प्रकार की वस्तुएँ इस बात की ओर संकेत करती हैं कि वे अनेक प्रकार की धातुओं और बहुमूल्य पत्थरों का प्रयोग करते थे जो प्रत्येक क्षेत्र में समान रूप से उपलब्ध नहीं थे। रोचक बात यह है कि हड़प्पा सभ्यता की छोटी-छोटी बस्तियों में भी बहुमूल्य पत्थरों और धातुओं के औज़ार पाए गए हैं। ये अमीर लोगों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए एक विस्तृविनिमय तंत्र की ओर संकेत करते हैंअब प्रश्न यह उठता है कि हड़प्पा सभ्यता के लोगों द्वारा प्रयोग में लाए जाने वाले खनिज पदार्थ और धातुओं के क्या स्रोत थे? 

  • वे राजस्थान की खेतड़ी खानों से तांबा प्राप्त करते थे।
  • मध्यवर्ती राजस्थान में जोधपुरा, बागोर और गणेश्वर बस्तियाँ जो हड़प्पा-सभ्यता की बस्तियों के समकालीन मानी जाती हैं। सम्भवतया हड़प्पा सभ्यता के लिए कच्चे तांबे का स्रोत रही होंगी।
  • गणेश्वर में 400 से अधिक तांबे के तीर शीर्ष, 50 मछली पकड़ने के कांटे और 58 तांबे की कुल्हाड़ियाँ पाई गई हैं।

इन बस्तियों में लोग खानाबदोशी चरवाहों तथा शिकार संग्रहकर्ताओं दोनों ही की तरह से जीवनयापन करते थे। इन पर हडप्पा सभ्यता का प्रभाव शायद हीं पडा था। इससे व्यापार संबंधों की समस्या की टिलता और भी बढ़ जाती है। पुरातत्ववेत्ताओं का विश्वास है कि हड़प्पावासी उस क्षेत्र से तांबे के औज़ारों का आयात करते थे जहाँ के लोग चरवाहे और शिकारी के रूप में जीवन यापन करते थे। तथापि हम यह हीं कह सकते हैं कि ये दोनों समुदाय एक जो विकसित शहरी सभ्यता और दूसरा जो चरवाह समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है, आपस में किस प्रकार आदान-प्रदान करते थे। सम्भवतया ये सम्बन्ध अप्रत्यक्ष थे।

शायद हड़प्पा-सभ्यता के लोग तांबा बलूचिस्तान और उत्तरी पश्चिमी सीमांत से प्राप्त करते थे। सोना सम्भवतया कर्नाटक के कोलार क्षेत्र और कश्मीर से प्राप्त किया जाता था। हड़प्पावासियों की समकालीन कुछ नवपाषाण युगीन बस्तियाँ भी इस क्षेत्र में पाई गई हैं। राजस्थान के जयपुर और सिरोही, पंजाब के हाजरा, कांगड़ा और झंग और काबुल और सिन्धु नदियों के किनारे सोने के मुलम्मों के प्रमाण मिले हैं।

हड़प्पा सभ्यता की बहुत सी बस्तियों से चांदी के बर्तन पाए गए हैं। यद्यपि इस क्षेत्र में चांदी के कोई विदित स्रोत नहीं हैं। चांदी शायद अफगानिस्तान और ईरान से आयात किया जाती होगी। सम्भवतया सिंध के व्यापारियों के मेसोपोटामिया से व्यापार संबंध थे तथा वे अपने माल के बदले में मेसोपोटामिया से चांदी प्राप्त करते थे। सीसा शायद कश्मीर या राजस्थान से प्राप्त किया जाता होगा। पंजाब और बलूचिस्तान में भी थोड़े बहुत सीसे के स्रोत थे।

वैदूर्यमणि जो कि एक कीमती पत्थर था उत्तरी पूर्वी अफगानिस्तान में बदक्शां (Badakshan) में पाया जाता था। इस क्षेत्र में शोर्तुघऔर अलतिन देपे (Altyn Depe) जैसी हड़प्पाकालीन बस्तियों का पाया जाना उस बात की पुष्टि करता है कि हड़प्पावासियों ने इस स्रोत का लाभ उठाया होगा। फिरोजा और जेड मध्य एशिया से प्राप्त किए जाते थे। गोभेव, श्वेतवर्ण स्फटिक और लाज पत्थर सौराष्ट्र या पश्चिमी भारत से प्राप्त किये जाते थे। समुद्री सीपियाँ जो हड़प्पावासियों में बहुत लोकप्रिय थीं गुजरात के समुद्र तट और पश्चिमी भारत से प्राप्त की जाती थीं। जम्मू में मंडा (Manda) उस स्थान पर स्थित है जहाँ पर चेनाव नदी में नौपरिवहन संभव है। सम्भवतया अच्छी किस्म की लकड़ी अधिक ऊँचाई वाले क्षेत्रों से प्राप्त होती थी औमध्य सिंधू घाटी में नदियों द्वारा पहुँचाई जाती थी। शोर्तुघई (Shortughai) में हड़प्पाकालीन अवशेषों में काफी मात्रा में वैधूर्यमणि पाए गए हैं। यह इस बात की ओर संकेत करता है कि हड़प्पा-सभ्यता के लोगों ने दूरस्थ क्षेत्रों में पाए जाने वाले खनिज पदार्थों का उपयोग करने के लिए उपनिवेशीकरण की नीति अपनाई थी। इससे यह पता चलता है कि व्यापार और बाहर से नई प्रकार की वस्तुएँ प्राप्त करने में हड़प्पा सभ्यता के लोगों की दिलचस्पी थी।

ऐसा प्रतीत होता है कि व्यापार विनिमय व्यापारियों का आपसी मामला होकर एक प्रशासनिक कार्यकलाप था क्योंकि लगभग 500 किलोमीटर के क्षेत्र में उपनिवेश स्थापित करना किसी व्यापारी के लिए सम्भनहीं था। ड़प्पा काल के प्रशासक दूरस्थ प्रदेशों के संसाधनों को नियंत्रित करना चाहते थे। 

10. विनिमय व्यवस्था

हड़प्पा सभ्यता के लोगों में भारतीय उपमहाद्वीप के भीतर और बाहर अंतक्षेत्रीय व्यापार का एक बृहद तंत्र स्थापित किया था। लेकिन हमें यह मालूम नहीं है कि हड़प्पा सभ्यता और अन्य क्षेत्रों के बीच किस प्रकार की विनिमय व्यवस्था प्रचलित थी। इससे बड़े क्षेत्र के बीच आदान प्रदान की प्रक्रिया में विभिन्न समुदायों का शामिल होना अवश्यम्भावी है। उस समय देश के एक बड़े भू-भाग में शिकारी संग्रहकर्ता रहते थे। कुछ क्षेत्रों में खानाबदोश चरवाहे थेकुछ समुदायों ने कृषि उत्पादन शुरू कर दिया था। इनकी तुलना में हड़प्पा सभ्यता धिक विकसित थी। हड़प्पा सभ्यता के लोग शिकारी संग्रहकर्ताओं या किसी और समुदाय के क्षेत्रों से खनिज पदार्थ प्राप्त करने के लिए क्या तरीके अपनाते थे? हड़प्पा सभ्यता के लोगों ने ऐसे कुछ क्षेत्रों में अपनी बस्तियाँ बसाई थीं। सम्भवतया हड़प्पा सभ्यता के लोगों से भिन्न समुदाय हड़प्पा सभ्यता के लोगों से कीमती वस्तुएँ प्राप्त करते थे। परन्तु विनिमय एक नियमित कार्यकलाप नहीं था। बल्कि यह इन समुदायों के मौसमी प्रवास या किसी एक जगह पर एकत्रित होने पर निर्भर था। हड़प्पा सभ्यता के व्यापारी उन स्थानों पर जाते थे जहाँ ये समुदाय मौसमी डेरे डालते थे। मौसमी प्रवास की प्रक्रिया के दौरान खानाबदोश चरवाहे भी दूर-दराज के क्षेत्रों से सामान प्राप्त करते थे। हड़प्पा सभ्यता के लोगों की विनिमय प्रणाली के बारे में हमें बहुत कम जानकारी है।

हड़प्पाकालीन नगरों के बीच विनिमय पद्धति

हड़प्पा सभ्यता के लोगों ने आपसी व्यापार और विनिमय को नियंत्रित करने के प्रयास किए। दूर फैली हुई हड़प्पा कालीन बस्तियों में भी नाव और तौल की व्यवस्थाओं में समरूपता थी। तौल निम्न मूल्याँकों में द्विचर प्रणाली के अनुसार है : 1, 2, 4, 8 से 64 फिर 150 तक और फिर 16 से गुणा वाले दशमलव 320, 640, 1600 और 3200 आदि तक। ये चकमकी पत्थर, चूना पत्थर, सेलखड़ी आदि से बनते हैं और साधारणतया घनाकार होते हैं। लम्बाई 37.6 सेंटीमीटर की एक फुट की इकाई पर आधारित थी और एक हाथ की इकाई लगभग 51.8 से 53.6 सेंटीमीटर तक होती थी। नाप और तौल की समरूप व्यवस्था केंद्रीय प्रशासन द्वारा हड़प्पा-सभ्यता के लोगों में आपसी तथा अन्य लोगों के साथ विनिमय को व्यवस्थित करने के प्रयास की ओर इशारा करती है। हड़प्पा सभ्यता की बस्तियों में काफी संख्या में मुहरें और मुद्रांकण पाए गए हैं। ये मुहरें और मुद्रांकण दूरस्थ स्थानों को भेजे जाने वाले उत्पादों के उच्च स्तर और स्वामित्व की ओर संकेत करते हैं। इनका प्रयोग व्यापारिक गतिवधियों में होता था। इस बात की पुष्टि इस तथ्य से होती है कि बहुसे मुद्रांकणों में पीछे की ओर रस्सी और चटाई के निशान हैं। इनमें पाए जाने वाले चिन्हों से यह पता चलता है कि ये मुद्रांकण तिजारती माल में ठप्पे की तरह प्रयोग में लाए जाते होंगे। लोथल में गोदामों में वायुसंचालन के रास्तों में राख में अनेक मुद्रांकण पाए गए हैं। ये सम्भवतया आयातित माल के गट्ठरों को खोलने के बाद फैंक दिए जाते होंगे। इन मुहरों पर विभिन्न जानवरों की आकृतियाँ भी चित्रित हैं और इन पर जो लिपि उत्कीर्ण है वह अभी तक पढ़ी नहीं जा सकी हैं। ऐसा लगता है कि दूरस्थ स्थानों के साथ व्यापार विनिमय में इनका प्रयोग होता था।

11. फारस की खाड़ी और मेसोपोटामिया के साथ व्यापार

अब तक हमने हड़प्पा-सभ्यता के लोगों के अंतर्खेत्रीय विनिमय कार्यकलापों की चर्चा की है। इन कार्यकलापों में हड़प्पा सभ्यता के लोग प्रमुख भागीदार थे। अब हम हड़प्पा-सभ्यता के लोगों की समकालीन पश्चिम एशिया की सभ्यताओं के साथ व्यापार और विनिमय के कार्यकलापों की चर्चा करेंगे। मेसोपोटामिया हड़प्पा-सभ्यता के मुख्य क्षेत्र से हज़ारों मील दूर स्थित था फिर भी इन दोनों सभ्यताओं के बीच व्यापार सम्बन्ध थे।

11.1 पुरातात्विक प्रमाण

विनिमय के विषय में हमारी जानकारी का आधार मोसोपोटामिया में पाई गई विशिष्ट हड़प्पाकालीन मुहरें हैं। मेसोपोटामिया के सूसा (Susa), उर (Ur) आदि शहरों में हड़प्पा सभ्यता की, या हड़प्पाकालीन मुहरों से मिलतीजुलती लगभग दो दर्जन मुहरें पाई गई हैं। हाल ही में फारस की खाड़ी में फैलका (Failka) और बेहरैन (Behrain) जैसे प्राचीन स्थानों में भी हड़प्पाकालीन मुहरें पाई गई हैं। मेसोपोटामिया के निप्पुर (Nippur) शहर में एक मुहर पाई गई है जिस पर हड़प्पाकालीन लिपि उत्कीर्ण है और एक सींग वाला पशु बना हुआ है। दो चीकोर सिंधु मुहरें जिन पर एक सींग वाला पशु और सिन्धु लिपि उत्कीर्ण है, मेसोपोटामिया के किश (Kish) शहर में पाई गई हैंएक अन्य शहर उम्मा (Umma) में भी सिंधु सभ्यता की एक मुहर पाई गई हैइसका अर्थ यह हुआ कि सिंधु घाटी और इन क्षेत्रों के बीच व्यापार विनिमय संबंध थे। 

तेल असमार (TelAsmar) में हड़प्पाकालीन मृद्भाण्ड शिल्प नक्काशी किये हुए लाल त्थर के मनके और गुर्दे के आकार की हड्डी के जड़ाऊ काम पाए गए हैं। इनसे मेसोपोटामिया और हड़प्पा-सभ्यता के लोगों के बीच व्यापार सम्बन्ध के बारे में पता चलता है। पक्की मिट्टी की छोटी मूर्तियाँ, जो साधारणतया सिंधु घाटी में पाई गई हैं, मेसोपोटामिया में निप्पुर में भी पाई गई हैं। इन छोटी मूर्तियों में प्रमुख हैं – एक मोटे पेट वाला नग्न पुरुष, जानवरों जैसे चेहरे, गोलमटोल पूंछे और हिलने डुलने वाले हाथों का जोड़ने के लिए कंधों में खाली जगह। निप्पुर में इसी प्रकार की तीन छोटी मूर्तियाँ पागई हैं जिनमें निप्पुर पर हड़प्पा-सभ्यता के प्रभाव का पता चलता है। सिंधु के चौसर के नमूने (1/2, 3/6, 4/5) मोसोपोटामिया के ऊपर (Ur), निप्पुर (Nippur) और तेल असमार शहरों में पाए गए हैं। इनके अलावा मेसोपोटामिया में विशिष्ट आकार के मनके पाए गए हैं और लगता है कि ये सिंधु घाटी से ही लाए गए थे। चन्हुंदड़ों में पाए गए इकहरे, दोहरे, तिहरे वृत्ताकार मनके, मेसोपोटामिया के किश (Kish) में पाए गए मनकों से बहुत मिलते-जुलते हैं। फारस की खाड़ी और मेसोपोटामिया में हड़प्पाकालीन तौल (बाट) भी पाए गए हैं।

हड़प्पा-सभ्यता की बस्तियों में मेसोपोटामिया की बहुत ही कम वस्तुएँ पाई गई हैं। मोहनजोदड़ो में मेसोपोटामिया की सभ्यता के बेलनाकार मुहरों के नमूने पाए गए हैं। सम्भवतः उनके हड़प्पा के ही किसी केंद्र में बनाया गया होगा। कुछ धातु की वस्तुएँ शायद मेसोपोटामिया से लाई गई थीं। लोवन में एक बटन के आकार की छोटी मुहर पाई गई है। बहरैन (Behrain) के बंदरगाह की खुदाई द्वारा इस प्रकार की अनेक मुहरें पाई गई हैं। लगता है कि ये मुहरें फारस की खाड़ी के बंदरगाहों से लाई गई थीं। लोथल में बन (bun) के आकार के तांबे के ढले हुए धातु पिंड भी पाए गए हैं। ये फारस की खाड़ी में द्वीपों और सूसा में पाई गई मुहरों से मिलते-जुलते हैं।

जिन वस्तुओं को हड़प्पा-सभ्यता और मोसोपोटामिया में पाया जाना हड़प्पा और मेसोपोटामिया वासियों के बीच प्रत्यक्ष व्यापार-विनिमय की ओर संकेत करता है, इनके कम मात्रा में पाए जाने के कारण विद्वानों को इन दो सभ्यताओं के बीच प्रत्यक्ष व्यापार की धारणा पर संदेह है। यह माना जाता है कि हड़प्पा-सभ्यता के लोग अपने माल को व्यापार के लिए फारस की खाड़ी की बस्तियों में ले जाते होंगे। कुछ सामान बेहरैन जैसे फारस की खाड़ी के बंदरगाहों के व्यापारियों द्वारा मेसोपोटामिया के नगरों में भेजा जाता होगा।

11.2 लिखित प्रमाण

मेसोपोटामिया में कुछ प्राचीन लेख पाए गए हैं जिनसे उसके हड़प्पाकालीन सभ्यता के साथ व्यापार सम्बन्धों का पता चलता है। मेसोपोटामिया में स्थित अक्काद (Akkad) के प्रसिद्ध सम्राट सारगॉन (Sargon) (2350 बी.सी.ई.) का यह दावा था कि दिलमुन (Dilmun), मगान (Magan), और मेलुहा (Meluha) के जहाज उसकी राजधानी में लंगर डालते थेविद्वान साधारणतया मेलुहा तथा हड़प्पासभ्यता के समुद्रतटीय नगरों या सिंधु नदी के क्षेत्र को क ही मानते हैं। कुछ विद्वानों का मानना है कि मगान तथा मकरासमुद्रतट एक ही हैंउर (Ur) शहर के व्यापारियों द्वारा प्रयोग में लाए जाने वाले कुछ अन्य दस्तावेज़ भी पाए गए हैं। ये इस बात की ओर संकेत करते हैं कि उर के व्यापारी मेलुहा से तांबा, गोमेद, हाथी दांत, सीपी, वैदूर्यमणि, मोती और आबनूस आयात करते थे। ऐसा लगता है कि ये वस्तुएँ हड़प्पाकालीन बस्तियों में काफी मात्रा में उपलब्ध थीं

हड़प्पा सभ्यता के लोगों द्वारा उपयोग में लाई जाने वाली कुछ वस्तुओं जैसे तांबे के विषय में हमें कोई जानकारी नहीं है। फिर भी हमें यह याद रखना चाहिए कि हड़प्पा सभ्यता के लोग मध्य एशिया क के एक बहुत बड़े भौगोलिक क्षेत्र के संसाधनों का उपयोग कर रहे थे। शायद उन्होंने आरम्भिक हड़प्पा काल में मध्य एशिया और अफगानिस्तान के व्यापार तंत्र पर अधिकार कर लिया था। मेसोपोटामिया के आरम्भिक साहित्य में मेलुहा के व्यापार समुदाय का जिक्र है जो मेसोपोटामिया में रहता था। मेसोपोटामिया के एक अन्य लिखित दस्तावेज़ में मेलुहा की भाषा के सरकारी दुभाषिए (Interpreter) का जिक्र है। इन सब उदाहरणों से संकेत मिलता है कि हड़प्पा-सभ्यता के लोगों और मेसोपोटामिया के लोगों के बीच सम्बन्ध अप्रत्यक्ष नहीं थे। इन समाजों के बीच भौगोलिक दूरी को देखते हुए इनके बीच नियमित आदान-प्रदान की आशा नहीं की जा सकती। फिर भी इन दोनों सभ्यताओं के बीच बहुत नजदीकी संबंध थे। इसकी पुष्टि इस तथ्य से होती है कि मेसोपोटामिया का राजा यह दावा करता था कि मेलुहा के जहाज उसके बंदरगाहों में लंगर डालते हैं।

हड़प्पा में मेसोपोटामिया की वस्तुओं का न पाया जाना इस तथ्य से स्पष्ट किया जा सकता है कि परम्परागत रूप में मेसोपोटामिया के लोग कपड़े, ऊन, खुशबूदार तेल और चमड़े के उत्पाद बाहर भेजते थे। ये सभी वस्तुएँ जल्दी नष्ट हो जाती हैं इस कारण इनके अवशेष नहीं मिले हैं। शायद चांदी भी निर्यात किया जाता था। हड़प्पा सभ्यता की बस्तियों में चांदी के स्रोत नहीं थे। लेकिन वहाँ के लोग इका काफी मात्रा में प्रयोग करते थे। सम्भवतया यह मेसोपोटामिया से आयात किया जाता होगा। 

12. परिवहन के साधन 

सम्पर्क और विनिमय के स्वरूप की चर्चा के अंतर्गत परिवहन के साधनों का प्रश्न भी सामने आता है। हड़प्पा और मोहनजोदड़ो में पाई गई मुहरों में जहाजों और नावों को चित्रित किया गया है। लोथल में पक्की मिट्टी से बने जहाज का एक नमूना पाया गया है जिसमें मस्तूल के लिए एक लकड़ी चिन्हित खोल तथा मस्तूल लगाने के लिए छेद है। लोथल में ही 219 x 37 मीटर लम्बाई का एक हौज मिला है जिसकी 4.5 मीटर ऊंची ईंटों की दीवारें हैं। इसके उत्खनक ने इसको एक जहाजी पोतगाह के रूप में पहचाना है। इस स्थान के अलावा अरब सागर के समुद्रतट पर भी अनेक बंदरगाह थे। रंगपुर, सोमनाथ, बालाकोट जैसे हड़प्पा सभ्यता के लोगों द्वारा बाहर जाने के रास्ते के रूप में प्रयोग में लाए जाते थे। मकरान समुद्रतट जैसे अनुपयोगी क्षेत्रों में भी सुत्कागन दोर और सुत्काकोह जैसी हड़प्पाकालीन बस्तियाँ पाई गई हैं। ऐसे अनुपयोगी क्षेत्रों में उनके स्थित होने का मुख्य कारण था कि वे पश्चिमी भारत और सिंधु के समुद्रतट पर टकराने वाली लहरों तथा तूफानी हवाओं से सुरक्षित थे। बारिश के महीनों में वे हड़प्पा सभ्यता के लोगों द्वारा बाहर जाने के रास्ते के रूप में उपयोग में लाए जाते थेसुत्कागन-दोर आधुनिक पाकिस्तान और ईरान की सीमा पर स्थित है। यह सम्भव है कि ईरान की तरफ भी कुछ हड़प्पाकालीन बस्तियाँ थी। उनका अभी तक पता नहीं लगा है। इस तरह समुद्र-तट के विस्तार से हड़प्पावासियों को फारस की खाड़ी तक अपने जहाजों के लंगर डालने की सुविधा प्राप्त हो सकेगी

बैलगाड़ी अंतर्देशीय परिवहन का साधन थी। हड़प्पाकालीन बस्तियों से मिट्टी के बने बैलगाड़ी के अनेनमूने पाए गए हैं। हड़प्पा में एक कांसे की गाड़ी का नमूना पाया गया है जिसमें एक चालक बैठा है तथा छोटी गाड़ियों के नमूने भी पाए गए हैं जो बहुत कुछ पंजाब के आधुनिक इक्कों से मिलतेजुलते हैं। जंगलों वाले क्षेत्र में लम्बे सफर के लिए भारवाही बैलों के काफिले परिवहन का मुख्य साधन रहे होंगेऐतिहासिक काल में खानाबदोश चरवाहे सामान को स्थान से दूसरे स्थान भेजते थे। सम्भवतया हड़प्पा-सभ्यता के लोग भी ऐसा ही करते होंगे। उस समय नौ परिवहन अधिक प्रचलित सुलभ तथा सस्ता था। 

13. समाज 

हड़प्पा से प्राप्त पुरातात्विक उपलब्धियों के आधार पर इस काल के समाज की कल्पना की जा सकती है। हम इस समाज के लोगों की वेश-भूषा और खान-पान, व्यापार, शिल्प कलायें तथा विभिन्न सामाजिक समूहों के प्रति जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। आइए सबसे पहले हम हड़प्पा के लोगों की प्रकट रूप एवं वेश-भूषा के संबंध में चर्चा करें।

13.1 वेश-भूषा

हड़प्पावासी देखने में कैसे लगते थे? इस प्रश्न का उत्तर इस काल की की हुई मिट्टी से बनी हुई मूर्तियों तथा पाषाण शिल्प के अध्ययन से मिल सकता है। जानकारी प्राप्त करने का एक अन्य तरीका हड़प्पा बस्तियों की खुदाई से प्राप्त कंकालों का अध्ययन हो सकता है।

कंकालों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि हड़प्पा के लोग वर्तमान उत्तर भारत के निवासियों जैसे दिखते थे। उनके चेहरे, रंग रूप एवं लम्बाई में इन क्षेत्रों के वर्तमान निवासियों से काफी कुछ समानता दिखती है। आधुनिक नर-नारियों की भांति वे पैन्ट-शर्ट अथवा सलवार-कमीज नहीं पहनते थे। हम उनके पहनावे एवं फैशनों का अनुमान उस काल की शिल्प कला तथा पक्की मिट्टी की बनी मूर्तियों के अध्ययन से लगा सकते हैं। पुरुषों को बहुधा ऐसे पहनावे में दिखाया गया है जिससे उनके शरीर का निचला भाग लपेटा रहता था तथा वस्त्र का एक सिरा बायें कन्धे से लेकर दायें बाजू के नीचे पहुँच जाता था, जिस प्रकार आधुनिक साड़ी पहनी जाती है। दूसरी पोशाक एक घुटने तक घाघरा और कमीज थी जो पुरुषों और महिलाओं दोनों के द्वारा पहनी जाती थी। पुरुष अपने बाल विभिन्न तरीकों से बनाते थे, कभी कभी जूड़ा बनाकर माथे पर पट्टी बांधते थेआधुनिक भारतीयों की अपेक्षा वे कहीं अधिक गहनों का प्रयोग करते थेवे अंगूठियाँ पहनते थे, कंगन पहनते थे तथा गले और हाथों में काफी गहने पहनते थे। दाढ़ी रखना सामान्य था लेकिन वे अपनी मूंछे मुंडवा लेते थेमहिलायें कमर में गहने पहनती थीं। गले में वे कई प्रकार के हार पहनती थीं, चूड़ियों का भी प्रयोग होता था तथा बाल काढ़ने के असंख्य तरीके थे। पुरुष और महिलायें दोनों ही लंबे बाल रखते थे वे सूती कपड़े पहनते थे तथा एक मूर्ति में वस्त्र लाल रंगों में त्रिदल पद्धति में दिखाया गया है। इन तमाम फैशनों के बावजूद यदि हड़प्पा-सभ्यता का कोई पुरुष हमें आज सड़क पर टहलता हुआ दिख जाय तो वह हमें किसी भिक्षु के स्वरूप ही दिखाई देगा। 

13.2 खान-पान 

वे क्या खाते थे? इस संदर्भ में हमें बहुत कम जानकारी है। सिन्ध और पंजाब में ड़प्पा निवासी गेहूँ और जौं खाते थे। राजस्थान में रहने वाले लोगों को केवल जौं से ही संतुष्ट होना पड़ता था। गुजरात के रंगपुर, सुरकोत्ता आदि स्थानों के हड़प्पा निवासी चावल और बाजरा खाना पसन्द करते थे। आइए ये देखने का प्रयास किया जाय कि वे प्रोटीन और चर्बी युक्त भोजन कहाँ से प्राप्त करते थे? 

वे तेल और चर्बी, तिल, सरसों तथा संभवतः घी से प्राप्त करते थे। हमें इस बात की जानकारी नहीं है कि वे गन्ने की खेती करते थे या नहीं। अतः चीनी के विषय में हमारे पास जानकारी नहीं है। सम्भव है कि वे अपने खाने को मीठा बनाने के लिए शहद का उपयोग करते हों। हड़प्पा स्थलों से मिलने वाले उन्नाव और खजूर के बीजों से यहाँ के लोगों की फल के प्रति प्राथमिकता का पता चलता है। संभवतः वे केले, अनार, खरबूजा, नींबू, अंजीर तथा आम भी खाते थे। ऐसा प्रतीत होता है कि वे विभिन्न प्रकार के जंगली फलों का भी सेवन करते थे लेकिन उन फलों की पहचान करना अत्यंत कठिन है। वे मटर भी खाते थे। इसके अतिरिक्त हड़प्पा निवासी मांसाहारी भोजन भी शौक से खाते थे। हड़प्पा बस्तियों के अवशेषों में हिरन, भालू, भेड़ तथा बकरियों की हड्डियाँ मिलती रही हैं। वे मछली, दूध तथा दही का भी सेवन करते रहे होंगे। लेकिन न तो उन्हें चाय का ज्ञान था न ही आलू के चिप्स का। क्या आप स्वयं इसका कारण ढूंढ़ सकते हो? 

13.3 भाषा एवं लिपि

वे कौन सी भाषा बोलते थे और क्या लिखते पढ़ते थे? इसकी भी हमें स्पष्ट जानकारी नहीं है। हम केवल हड़प्पा निवासियों की लिपि को खोज सके हैं जैसा कि पहले कहा जा चुका है हम अभी तक इस लिपि को पढ़ने में असमर्थ रहे हैंकुछ विद्वानों का मत है कि वहाँ लिखी जाने वाली भाषा द्रविड़ भाषा समूहों (जैसे तमिल) की जननी थीअन्य विद्वान इसे किसी आर्य भाषा (जैसे संस्कृ) की जननी मानते हैं।

अभी तक किसी भी विद्वान ने सर्वमान्य तर्क प्रस्तुत नहीं किया है। हड़प्पा की लिपि के संदर्भ में एक बात स्पष्ट नजर आती है कि पूरी हड़प्पा-सभ्यता के काल में इस लिपि में कोई परिवर्तन हुआ ही नहीं जबकि अन्य सभी प्राचीन लिपियों में समय के साथ-साथ परिवर्तन स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। इससे ये सिद्ध होता है कि हड़प्पा की लिपि का उपयोग विस्तृत नहीं थासंभवतः एक वर्ग विशेष लिखित शब्दों पर आधिपत्य जमाये बैठा था। वे क्या सीखते थे और कैसे सीखते थे इसका हमारे पास उत्तर नहीं है। समकालीन मेसोपोटामिया की भांति हड़प्पा में भी स्कूल थे अथवा नहीं इसकी जानकारी हमारे पास नहीं है। 

13.4 युद्ध

क्या वे खेल खेलते थे और युद्ध करते थे? हम जानते हैं कि वे चौसर खेलते थे लेकिन इसके आगे हमें जानकारी नहीं है। उनके युद्ध करने के काफी प्रमाण हमारे समक्ष हैं। संभवतः ऐसा इसलिए है कि विभिन्न हड़प्पा स्थलों की खुदाई में लगे पुरातत्व शास्त्री युद्ध के प्रमाण ढूंढ़ रहे थे न कि खेल कूके । इस संदर्भ में एक महत्त्वपूर्ण प्रमाण यह भी मिलता है कि हड़प्पा सभ्यता के उद्भव के समय कई “आरंभिक हड़प्पा’ स्थल (जैसे कोट दीजी तथा कालीबंगन) जला दिये गये थे। दुर्घटनापूर्ण अग्नि से बड़े नगरों का ध्वस्त हो जाना असंभव तो नहीं है। लेकिन इस बात की प्रबल संभावना है कि ये बस्तियाँ विजयी मानवीय समूहों द्वारा जलायी गयी होंगी। इसके अतिरिक्त मोहनजोदड़ो की गलियों में कंकालों के बिखरे पाये जाने के भी प्रमाण मिलते हैं। प्राचीनतम काल से लेकर अब तक के समाजों में नियमित रूप से अपने मृतकों का अंतिम संस्कार परम्परागत रूप से किया जाता रहा है। यह स्वाभाविक ही है कि हड़प्पा के लोग अपने मृतकों को सड़कों पर सड़ने के लिए नहीं छोड़ देते थे। अतः स्पष्ट है कि किसी असाधारण टकराव के कारण ही हडप्पा के लोग अपने मतकों का अंतिम संस्कार नहीं कर पाए। हड़प्पा के कई नगरों के चारों ओर किलेबंदी और दुर्ग बने होने से इस तथ्य की ओर संकेत मिलता है कि इन लोगों को बाह्य तत्वों से सुरक्षा की आवश्यकता प्रतीत होती थी। कुछ सुरक्षा दीवारों का उपयोग बाढ़ से बचने के लिए बांध के रूप में भी हुआ होगा। हड़प्पा नगरों के आस-पास की ग्रामीण जनता की तुलना में नगरवासियों की संपन्नता को देखते हुए इस बात का अनुमान लगाया जा सकता है कि अपनी बस्तियों की किलेबंदी करके अपने जानमाल की सुरक्षा करना चाहते थे। यहाँ से तांबे एवं कांसे के काफी हथियार भी प्राप्त हुए हैं। 

13.5 मुख्य शिल्प व्यवसाय

हड़प्पा निवासी अपने जीवन यापन के लिए क्या करते थे? इस प्रश्न का उत्तर अपेक्षाकृत से आसान है। इसका कारण यह है कि पूर्व आधुनिक समाजों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि उन समाजों के अधिकतर लोग कृषि से जुड़े हुए थे लेकिन हड़प्पा के काफी सारे लोग विभिन्न प्रकार की अन्य गतिविधियों में भी लगे हुए थे। मालाएँ बनाना हड़प्पा के निवासियों का मन पसंद व्यवसाय था। मोहनजोदड़ो चंहुदड़ो तथा लोथल बस्तियों की काफी बड़ी संख्या में हड़प्पावासी इस कार्य से जुड़े हुए थे। चूंकि मालाएँ बनाने में अकीम (Carnllion), लाजवर्द (Lapistazuli), सुलेमानी पत्थर (Agate) तथा नीलम (Jasper) जैसे बहुमूल्य रत्नों का प्रयोग होता था अतः संभव है कि प्रत्येक रत्न के माला बनाने के लिए भिन्न दक्ष कारीगर होते हों। कुछ अन्य हड़प्पावासी पत्थर के औज़ार में दक्ष थे। इनके तिरिक्त हड़प्पा नगरों में कुम्हारों, कांसे एवं तांबे के कार्य करने वालों, पत्थर के काकरने वालों, घर बनाने वालों, ईंट बनाने वालों तथा मुहरें काटने वाले होने की पूरी संभावना हैजब हम हड़प्पासभ्यता की चर्चा करते हैं तो हम बुनियाद पर इस युग की मुहरों, ईंटों, बर्तनों तथा इसी प्रकार की अन्य वस्तुओं का सहारा लेते हैंवस्तुओं के पाए जाने का अर्थ है कि इनके बनाने वाले इस युग में मौजूद थे।

14. हड़प्पा के शासक 

हड़प्पा समाज के शीर्ष पर तीन प्रकार के लोगों की अदृश्य श्रेणियाँ थीं – शासक, व्यापारी तथा पुरोहित। सामाजिक संगठन की समस्याओं की समझ के आधार पर इन श्रेणियों की कल्पना की जा सकती है। सभ्यता के उदय का संबंध सीधे-सीधे केंद्रीकृत निर्णय प्रणाली के अभ्युदय से है, जिसे राज्य कहा जाता है। हड़प्पा-सभ्यता के अन्तर्गत स्थानीय शासन चलाने के लिए निर्णय लेने के अधिकार रखने वालों के अस्तित्व की प्रबल संभावना है। इसके कई कारण हैं।

  1. व्यापक स्तर पर नीतियों की व्यवस्था तथा सड़कें बनाने एवं व्यवस्थित रखने के लिए शहरों में स्थानीय प्रशासन की आवश्यकता रही होगी।
  2. अनाज गोदामों के होने से भी इस तथ्य की ओर संकेत मिलता है। आस-पास से अनाज इकट्ठा करके नागरिकों के बीच बाँटने के लिए प्रशासन अवश्य रहा होगा।
  3. जैसा कि पहले कहा जा चुका है, हथियारों, औज़ारों और ईंटों की बनावट में असाधारण समरूपता है। ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ हथियार तथा औज़ार किसी एक स्थान पर बड़े पैमाने पर बनाए जाते और विभिन्न नगरों एवं बस्तियों में वितरित किए जाते थे। हज़ारों मील के क्षेत्र में इन वस्तुओं के उत्पादन एवं विक्रेता के प्रबंध से वह वर्ग असाधारण रूप से शक्तिशाली बन गया होगा जो कि निर्णय लेता होगा कि कितना उत्पादन हो और कहाँ उसका वितरण हो। यदि यह लोग किसी नगर को वस्तुएँ देना बंद कर दें तो वहाँ औज़ारों और हथियारों का अकाल ही पड़ जाय ।
  4. बड़े नगरों के निवासियों द्वारा उत्पादनों के प्रकार एवं मात्रा के उपभोग की दर से संकेत मिलता है कि वहाँ कोई शासक वर्ग रहता होगा। काफी वस्तुएँ सुदूर प्रदेशों से लाई गयी दुर्लभ वस्तुएँ होती थीं। बहुमूल्य पत्थरों एवं धातुओं से संपन्न होने से मालिकों की शेष जनता की तुलना में प्रतिष्ठा बढ़ जाती थी।
  5. इसी प्रकार नगरों के वृहत होने से केवल इस ओर ही संकेत नहीं मिलता कि वहाँ काफी बड़ी संख्या रहती थी बल्कि इस तथ्य का भी पता चलता है कि वहाँ मंदिरों तथा महलों जैसे भवन भी मौजूद थे। इन भवनों में रहने वाले लोग राजनैतिक आर्थिक अथवा धार्मिक क्षेत्र में अधिकार सम्पन्न रहे होंगे। यही कारण है कि वे मोहरें जिन पर व्यापारियों, पुरोहितों अथवा प्रशासकों के अधिकार चिन्ह अंकित हैं, सबसे अधिक संख्या में मोहनजोदड़ो से मिलती हैं। जहाँ कि सबसे अधिक संख्या में मन्दिरों और महलों के रूप में अवशेष पाये गये हैं।

हमारे कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि मोहनजोदड़ो हड़प्पा सभ्यता की राजधानी थी। यह भी संभव है कि हड़प्पा-सभ्यता में दो अथवा पाँच स्वतंत्र राजनैतिक इकाइयाँ रही हों। हमारे कहने का तात्पर्य केवल यह है कि मोहनजोदड़ो नगर राजनैतिक आर्थिक शक्ति का केंद्र बन गया था। हमें यह ज्ञात नहीं है कि हड़प्पा के शासक कौन थे, संभव है वे राजा रहे हों अथवा पुरोहित अथवा व्यापारी। हम जानते हैं कि पूर्व आधुनिक समाजों में आर्थिक, धार्मिक एवं प्रशासनिक इकाइयों में स्पष्ट रूप से भेद नहीं किया जाता था जिसका अर्थ यह है कि एक ही व्यक्ति प्रधान पुरोहित भी हो सकता था, राजा भी हो सकता था और धनी व्यापारी भी, लेकिन उपलब्ध प्रमाणों से संकेत मिलता है कि यहाँ शासक वर्ग अवश्य मौजूद था तथापि इस शासक वर्ग के स्पष्ट रूप से हम अवगत नहीं हैं। 

15. धर्म एवं धार्मिक रीतियाँ 

हड़प्पा के लोग किसकी पूजा करते थे? यह प्रश्न विद्वानों के बीच काफी चर्चा का विषय रहा है। हड़प्पा के अतीत के अवशेष इस संदर्भ में कोई सूत्र नहीं देते हैं। अतः उसकी धार्मिक मान्यताओं को समझने के लिए हमें केवल अपनी बुद्धि और तर्क पर निर्भर होना पड़ेगा। मुख्य समस्या यह है कि लिखित स्रोतों के अभाव में उनकी लौकिक और अलौकिक गतिविधियों के बीच अन्तर करना कठिन है, इसलिए हड़प्पा से प्राप्त होने वाली प्रत्येक जानकारी पअलौकिक गतिविधि होने का शक पैदा होता है। इस पृष्ठभूमि में उचित होगा कि हड़प्पा के लोगों की धार्मिक मान्यताओं को आधुनिक मान्यताओं के परिप्रेक्ष में रखकर उन्हें समझा जाय। 

15.1 पूजा-स्थल

मोहनजोदड़ो के किलेबंद नगर तथा निचले नगर की कई बड़ी इमारतें मन्दिरों के रूप में देखी गयी हैं। इस दृष्टिकोण से इस तथ्य को और भी बल मिलता है कि अधिकतर पत्थर की मूर्तियाँ इन्हीं इमारतों में मिली हैं।

मोहनजोदड़ो के निचले नगर में एक वृहत् इमारत मिली हैंइस इमारत में संस्मारकीय द्वार तथा एक मंकी ओर ले जाने वाली दोहरी सीढ़ियों का रास्ता है। मंच पर 16% इंऊँची एक पाषाण शिल्प कृति प्राप्त हुई हैइस कृति में अपने घुटनों पर हाथ रखे हुए एक पुरुष बैठा है। पुरुष के चेहरे पर दाढ़ी है तथा माथे पर पट्टी बंधी हुई है जिसके दोनों सिरे पीठ की ओर लटके हुए हैं। इसी इमारत में एक और पत्थर की मूर्ति प्राप्त हुई है यही कारण है कि विद्वानों ने इस इमारत को मन्दिमाना है। 

मोहनजोदड़ो में किले के खंडहरों पर कई ऐसी इमारतों के अवशेष प्राप्त हुए हैं जिन्हें देखकर प्रतीत होता है कि वे हड़प्पा के पवित्र स्थल रहे होंगे, इनमें विशाल स्नानगृह सबसे अधिक प्रसिद्ध है। भारत के बाद के ऐतिहासिक युगों में इस प्रकार के विस्तृत स्नानगृहों का निर्माण पवित्र संस्कार स्थलों में होता था। अतः संभव है कि विशाल स्नानगृह कोई साधारण तरण ताल रहा हो अपितु इसका पवित्र संस्कार स्थल के रूप में महत्त्व हो।

विशाल स्नानगृह के निकट ही एक अन्य विशाल इमारत (230 X 78 फुट) पाई गयी है। जिसे किसी मुख्य पुरोहित का निवास स्थल अथवा पुरोहितों का मठ माना जाता है। इसी प्रकार किलेबंद क्षेत्र में एक सभागार पाया गया है। इसके पश्चिम की ओर एक साथ कई कमरे बने हुए मिले हैं जिनमें से एक में एक बैठे हुए पुरुष की मूर्ति भी मिली है। इसे भी एक धार्मिक इमारत के रूप में देखा गया है। इन पवित्र धार्मिक इमारतों से मोहनजोदड़ो की धार्मिक रीतियों की ओर संकेत मिलता है। हम यह मान सकते हैं कि कुछ धार्मिक गतिविधियाँ इस विशाल मंदिर जैसी इमारत में की जाती रही होंगी। 

15.2 आराध्य 

आराध्य अथवा पूज्य वस्तुओं के विषय में प्रमाण हड़प्पा की मुहरों एवं पकी मिट्टी की मूर्तियों से प्राप्त होते हैं, मुहरों से मिलने वाले प्रमाणों में सबसे प्रसिद्ध देवता की पहचान आदि – शिव के रूप में की गई है। कई मुहरों में एक देवता जिसके सिर पर भैंस के सींग का मुकुट है, योगी की मुद्रा में बैठा हुआ है। देवता बकरी, हाथी, शेर तथा मृग से घिरा हुआ है। मार्शल ने इस देवता को पशुपति माना है। कई स्थानों पर देवता के सींग के बीच से एक पौधा उगता दिखाया गया है। एक अन्य मुहर पर एक देवता जिसके सिर पर सींग और लम्बे बाल हैं, नंगे बदन पीपल की शाखाओं के बीच खड़ा है। एक उपासक उसके समक्ष झुका हुआ है। उपासक के पीछे आदमी के सिर वाली बकरी है तथा अन्य सात मानवीय आकृतियाँ हैं, इन मानवीय आकृतियों के लम्बी चोटियाँ हैं एवं सिर पर लम्बे वस्त्र बंधे हैं। एक मुहर में योगी के साथ एक सर्प की आकृति हैं। सींग वाली सभी आकृतियों के साथ दर्शाये गये लक्षण को उत्तर भारतीय इतिहास के शिव से संबंधित माना गया है। कुछ हड़प्पा बस्तियों से शिव लिंग भी प्राप्त हुए हैं। इन प्रमाणों के आधार पर विद्वानों ने शिव को हड़प्पा का सबसे महत्त्वपूर्ण देवता माना है। संभवतः सारे मंदिरों में शिव की पूजा होती थी। 

मातृ देवी 

हड़प्पा बस्तियों में भारी संख्या में पक्की मिट्टी की मूर्तियाँ मिली हैं। इनमें महिलाओं की भी मूर्तियाँ हैं जो कि बड़ी सी मेखला, वस्त्र तथा गले में हार पहने हुए दिखाई गयी हैं। वे सिरों पर पंखानुमी मुकुट धारण किए हैं। कभी-कभी उनके साथ शिशु भी दिखाये गये हैं। अभिजनन पंथ को आमतौर से गर्भ धारण के विभिन्न रूपों द्वारा चित्रित किया गया है। इन प्रमाणों से हड़प्पा सभ्यता में अभिजनन पंथ के प्रति विश्वास तथा देवियों की आराधना की ओर संकेत मिलते हैं।

वृक्ष आत्माएँ

संभवतः हड़प्पा के लोग वृक्ष आत्माओं की पूजा करते थे। कई स्थानों पर वृक्षों की शाखाओं के बीच से झांकती हुई आकृतियाँ दिखायी गयी हैंविद्वानों का मत है कि यह आकृतियाँ वृक्ष आत्माओं को बिंबित करती है। कई चित्रों में आराधक पेड़ के सामने खड़े दिखाये गये हैं। कई अन्य स्थानों पर शेर अथवा किसी अन्य जानवर को वृक्ष के सामने बिंबित किया गया है। एक स्थान पर वृक्ष के सामने सात मानवीय आकृतियाँ खड़ी दिखाई गयी हैं और वृक्ष के अन्दर एक आकृति जिसके सिर पर सींग हैं, दिखाई गयी है। जैसी कि पीछे चर्चा की गई है सींग वाली आकृति संभवतः शिव की हैभारत में पीपल के पेड़ की पूजा युगों से होती रही है और कहीं-कहीं पीपल के पेड़ और शिव की पूजा साथ-साथ होती दिखाई गयी है। सात आकृतियाँ बहुधा सात महान् ऋषियों अथवा भारतीय मिथक की सात जननी मानी गयी है। 

कुछ पौराणिक नायक

कुछ अन्य माननीय आकृतियाँ जिनका धार्मिक महत्त्व हो सकता है मुहरों और गण्डों पर पायी गयी हैं। मुहरों के सिर पर सींग तथा लम्बी दुम वाली आकृतियाँ बड़ी मात्रा में पायी गयी हैं। यदा कदा इन आकृतियों के खुर तथा पिछली टाँगे जानवरों जैसी दिखायी गयी हैं। कुछ अन्य मुहरें मेसोपोटामिया के मिथकों से मिलती-जुलती हैं। उदाहरण के लिए दो शेरों से लड़ता हुआ एक पुरुष हमारा ध्यान तुरन्त उस प्रसिद्ध योद्धा गिलगामेष की ओर ले जाता है जिसके विषय में दो शेरों को मारने की कथा प्रचलित है। 

जानवरों की पूजा 

ऐसा प्रतीत होता है कि हड़प्पा के लोग कई प्रकार के जानवरों की पूजा करते थे, इस संदर्भ में भी हमारी जानकारी का स्रोत मुहरें एवं पक्की मिट्टी की मूर्तियाँ हैं। चन्हुदाड़ो में एक मुहर मिली है जिसमें लिंग बाहर किए हुए सांड एक झुकी हुई मानव आकृति के साथ संभोग कर रहा है। यह निश्चित रूप से अभिजनन के प्रति विश्वास का सूचक है। मुहरों पर बहुधा एक ब्राह्मणी बैल चित्रित मिलता है जिसके गले के नीचे भारी झालरदार खाल लटकती दिखाई देती है। संभवतः वर्तमान सभ्यता के बैलों एवं गायों के प्रति आदर भाव के बीज हड़प्पा-सभ्यता में रहे हों। 

मिथकीय जानवर

मुहरों पर विभिन्न समष्टि आकृति वाले जानवर चित्रित किए गए हैं। मुहरों पर ऐसे जानवर रूपी जीव मिलते हैं जिनका अगला हिस्सा मनुष्य जैसा है तथा पिछला शेर जैसा दिखाया गया है। इसी प्रकार भेड़ों, बैलों तथा हाथियों की मिली-जुली आकृतियों वाले समष्टि काफी संख्या में प्राप्त हुई हैं। वे निश्चित रूप से पूज्य आकृतियाँ रही होंगी। हड़प्पा के बाद के भारतीय परंपरा के मिथकों से समष्टि आकृति वाले जीवों जैसे “नर सिंह” का विशेष स्थान रहा है। हड़प्पा की मुहरों पर एक अन्य महत्त्वपूर्ण जानवर एक शृङ्क (Unicorn) चित्रित मिलता है। यह एक घोड़े जैसा जानवर है जिसके सिर के बीच एक सींग निकली हुई है। इस जानवर के सामने एक विचित्र वस्तु दिखाई देती है। जो कि किसी अन्य जानवर से मिलती-जुलती नहीं है। इस चित्र में एक पिंजरे जैसी वस्तु एक दंड से लटकी रही है। दंड के बीच में एक कटोरे जैसी वस्तु है। हमें इस वस्तु का प्रयोजन ज्ञात नहीं है। इसकी पहचान पवित्र हौदे अथवा धूपदान के रूप में की गयी है। एक अन्य मुहर में एक शृङ्क एक मिथकीय पशु था क्योंकि इस प्रकार का कोई पशु कहीं नहीं पाया जाता। संभवतः इसकी उपासना की जाती रही होगी।

ऐसा प्रतीत होता है कि कालीबंगन एवं लोथल के हड़प्पावासी भिन्न धार्मिक रीतियों के अनुयायी थे। कालीबंगन में किले में उभरी ईंटों के चबूतरे मिले हैं जिनके ऊपर “अग्नि वेदियाँ” हैं जिनमें पशुओं की हड्डियाँ एवं राख हैं। इस स्थान पर भी कुआं और स्नानगृह हैं। यह स्थान पूजा क्रिया का केंद्र रहा होगा जहाँ पशुओं की बलि, धार्मिक पवित्रीकरण तथा अग्नि की पूजा की जाती रही होगीनिचले नगर के कई मकानों में भी अग्नि वेदी” वाले कमरे हैं। कई अन्य अग्नि वेदियाँहोने की भी जानकारी मिली है, लोथल में भी अग्निवेदियाँ” पायी गयी हैं यह प्रमाण अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है क्योंकि

अ) इनमें यह संकेत मिलता है कि विभिन्न क्षेत्रों के हड़प्पावासी विभिन्न धार्मिक रीतियों के अनुयायी थे, था 

) वैदिक युग के धर्म के अग्नि पूजा का केंद्रीय महत्त्व था। 

वैदिक युग के आर्यजन भिन्न प्रकार के लोग थे। कालीबंगन से मिले प्रमाणों से ज्ञात होता है कि आर्यों ने हड़प्पा क्षेत्र में आकर बसने के बाद हड़प्पा के लोगों की ही धार्मिक रीतियों को अपनाया

15.3 मृतकों का अंतिम संस्कार

मानव जाति अपने सगे सम्बन्धियों के मृत शरीरों के अंतिम संस्कार को महत्त्वपूर्ण धार्मिक गतिविधि के रूप में मानती रही है। इसका कारण मृतकों के प्रति दृष्टिकोण तथा इस जीवन तथा मृत्योपरांत जीवन के संबंध में मानव जाति के विश्वास से परस्पर जुड़ाव है। हड़प्पा सभ्यता से मृतकों का कोई ऐसा स्मारक नहीं प्राप्त हो सका है जो मिश्र के पिरामिड अथवा मेसोपोटामियाँ के उप नगर के राजकीय कब्रिस्तान के वैभव की बराबरी कर सकें। तथापि हमें हड़प्पा के लोगों में प्रचलित अंतिम संस्कार पद्धति के विषय में कुछ प्रमाण मिले हैं। 

हड़प्पा में कई कबें मिली हैं। शव साधारणतया उत्तर-दक्षिण दिशा में रखकर दफनाए जाते थे। उन्हें सीधा लिटाया जाता था। कब्र में बड़ी संख्या में मिट्टी के बर्तन रख दिए जाते थे। कुछ स्थानों पर शवों को गहनों जैसे सीप की चूड़ियों, हार तथा कान की बालियों के साथ दफनाया जाता था। कुछ कब्रों में तांबे के दर्पण, सीप और सुरमें की सलाइयाँ भी रखी जाती थीं। कई कबें ईंटों की बनी हुई मिली हैं। हड़प्पा में एक कब्र में ताबूत भी प्राप्त हुआ है। कालीबंगन में अंतिम संस्कार की भिन्न रीतियाँ देखने को मिली हैं। यहाँ पर छोटे-छोटे वृत्ताकार गड्ढे देखे गए हैं। जिनमें बड़ी राखदानियाँ तथा मिट्टी के बर्तन मिले हैं। लेकिन यहाँ कंकालों के अवशेष नहीं मिले हैं। कुछ ऐसे भी गड्ढे मिले हैं जिनमें हड्डियाँ एकत्रित मिली हैं। लोथल में साथ-साथ दफनाए गए महिला एवं पुरुष के मुर्दो के कंकालों के जोड़े मिले हैं।

इन रीतियों से यह स्पष्ट हो जाता है कि हड़प्पा के लोगों में मुर्दो के अंतिम संस्कार की रीतियाँ भारत में बाद में आने वाले समय की रीतियों से भिन्न थीं। भारत के ऐतिहासिक चरणों में अंतिम संस्कार की मुख्य पद्धति दाह संस्कार प्रतीत होती है। साथ ही मुर्दो का सावधानीपूर्वक रखकर अंतिम संस्कार करना तथा आभूषण एवं शृंगार की वस्तुएँ उनके साथ रखना इस तथ्य का द्योतक है कि वे लोग मरणोपरांत जीवन में विश्वास खते थे। इस विश्वास के स्वरूप के विषय में हमें जानकारी नहीं है। 

खुदाई से प्राप्त विभिन्न वस्तुओं के अध्ययन से ऐसा प्रतीत होता है कि हड़प्पा सभ्यता के अंतर्गत विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की धार्मिक रीतियाँ प्रचलित थीं। कालीबंगन तथा लोथल में अग्नि पूजा प्रचलित थी किन्तु हड़प्पा तथा मोहनजोदड़ो में ऐसा प्रचलन नहीं था। मोहनजोदड़ो में प्रचलित पवित्र स्नान की रीति संभवतः हड़प्पा में नहीं थी। अंतिम संस्कार में विस्तृत विभिन्नता देखने को मिलती है। एक साथ कई मुर्दे दफनाने से लेकर जोड़े दफनाये तथा मुर्दे के साथ कुछ वस्तुएँ रखने तक की रीतियाँ पायी गयी हैं। कालीबंगन से प्राप्त जानकारी के आधार पर ऐसे तथ्य भी प्राप्त हुए हैं जो यह बताते हैं कि एक ही स्थान पर भी अंतिम संस्कार की भिन्न रीतियाँ प्रचलित थींधार्मिक विश्वास एवं रीतियों की इस विभिन्नता से मुख्य नगरों के जटिल स्वरूप की ओर संकेत मिलता है। कबीलाई समाजों के विपरीत से जहाँ कबीले का प्रत्येक सदस्य समान धार्मिक रीति का पालन करता है, मुख्य नगरों में यह विशेषता दिखाई देती है कि वहाँ के निवासी विभिन्न धार्मिक रीतियों का पालन करते थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि मुख्य नगरों का गठन विभिन्न सामाजिक समूहों के राजनैतिक एवं आर्थिक एकीकरण से हुआ होगाइसके अतिरिक्त मुख्य नगरों में भिन्न धार्मिक रीतियों के अनुयायी विभिन्न क्षेत्रों के व्यापारी निवास करते होंगेवे लोग अपनी राजनैतिक तथा आर्थिक विशिष्टता तो बनाये न रख पाये होंगे, लेकिन अपनी सामाजिक तथा धार्मिक रीतियों का पालन करते रहे होंगे