हड़प्पा सभ्यता का कालानुक्रम, भौगोलिक विस्तार और पतन

इस पेज की पाठ्यक्रम

1 प्रस्तावना 2 एक प्राचीन शहर की खोज 3 हड़प्पा की सभ्यता का युग 4 इसे हड़प्पा की सभ्यता क्यों कहा जाता है? 5 पूर्ववर्ती इतिहास 6 भौगोलिक विशेषताएँ 7 कृषि की शुरुआत और बसे हुए गाँव

8. आरंभिक हड़प्पा काल  8.1 दक्षिणी अफगानिस्तान 8.2 क्वेटा घाटी 8.3 मध्य और दक्षिण बलूचिस्तान 8.4 सिंधु क्षेत्र 8.5 पंजाब और बहावलपुर 8.6 कालीबंगन

9 हड़प्पा की भ्यता का अभ्युदय 10 हड़प्पा का हास : पुरातात्विक साक्ष्य

11 आकस्मिक हास के सिद्धांत 11.1 बाढ़ और भूकम्प 11.2 सिंधु नदी का मार्ग बदलना 11.3 शुष्कता में वृद्धि और घग्घर का सूख जाना 11.4 बर्बर आक्रमण

12 पारिस्थितिक असन्तुलन

13 परंपरा बाद में भी जीवित रही 13.1 सिंध 13.2 भारत-ईरानी सीमांत प्रदेश 13.3 पंजाब, हरियाणा और राजस्थान 13.4 कच्छ और सौराष्ट्र

14 हड़प्पा परंपरा का प्रसार 15 हड़प्पा सभ्यता के अवशेष

 1. प्रस्तावना 

पहले की इकाई में आपने पढ़ा कि किस प्रकार मानव समाज शिकारी संग्रहकर्ता से कृषि समाज की ओर अग्रसर हुआ। कृषि की शुरुआत के कारण ही मानव समाज में व्यापक परिवर्तन हुएकृषि की शुरुआत का एक महत्वपूर्ण परिणाम था नगरों और सभ्यताओं का अभ्युदय इस इकाई में आप एक ऐसी ही सभ्यता के उद्भव से परिचित होंगे, जिसे हड़प्पा की भ्यता कहते हैं। 

हम इस बात को भी जानेंगे कि हड़प्पा सभ्यता का उद्भव विकास के क्या पहलू हैंतथापि इसकी परिपक्वता के विभिन्न पहलुओं जैसे लेखन, नगर नियोजन आदि का प्राचीन भारत के बाद के चरणों में लुप्त हो जाना एक रहस्य ही है। हम इस इकाई में इस रहस्य को सुलझाने की दिशा में प्रस्तुत विभिन्न तर्कों की परीक्षा भी करेंगे। 

5.2 एक प्राचीन शहर की खोज 

1826 में चार्ल्स मोसन नामक एक अंग्रेज पश्चिमी पंजाब (जो अब पाकिस्तान में है) में हड़प्पा नामक गाँव में आया। उसने वहाँ बहुत पुरानी बस्ती के बुर्जी और अद्भुत ऊँची-ऊँची दीवारों को देखा। उसने यह समझा कि यह शहर सिकन्दर महान् के समय का है। सन् 1872 में प्रसिद्ध पुरातत्ववेत्ता सर अलक्जेंडर कनिंघम इस स्थान पर आया उसे आस-पास के क्षेत्रों के लोगों ने बताया कि हड़प्पा के ये ऊँचे-ऊँचे टीले हज़ार वर्ष पुराने शहर के अवशेष हैं। अपने राजा की दुष्टता के कारण यह शहर नष्ट हो गया था। कनिंघम ने इस स्थान से कुछ पुरातात्विक वस्तुएँ इकट्ठी की, लेकिन वह इन वस्तुओं का काल निर्धारण न कर सका। उसने सामान्य तौर पर यह माना कि संभवत: ये वस्तुएँ भारत के बाहर की हैं। इसलिए उसने गाँव के लोगों के इस मत से सहमति व्यक्त की कि यह शहर लगभग एक हजार वर्ष पुराना है। फिर भी 1924 में एक अन्य पुरातत्वविद जॉन मार्शल ने हड़प्पा के विषय में रिपोर्ट दी और एक लम्बे समय में विस्मृत सभ्यता के बारे में बताया। यह सभ्यता उतनी ही प्राचीन थी जितनी मिश्र और मेसोपोटामिया की सभ्यताएँ। है न विचित्र बात? 

आस-पास के क्षेत्रों के लोग इस शहर के अवशेषों के प्रति उदासीन थे। फिर एक पुरातत्ववेत्ता अंग्रेज आया और उसने हमें बताया कि यह लगभग पाँच हजार वर्ष पुराना है। इस संबंध में सामान्य लोगों और विद्वानों के मत इतने भिन्न क्यों थे? किसी बस्ती के काल निर्धारण के लिए इन्होंने क्या तरीके अपनाए? 

3 हड़प्पा की सभ्यता का युग 

पुरातत्ववेत्ता यह पता लगाने के लिए कि ये बस्तियाँ कितनी पुरानी हैं, अलग-अलग तरीके अपनाते हैं। अब यह मार्शल के उस मत की जाँच करेंगे, जिसमें उन्होंने बताया है कि हड़प्पा की सभ्यता पाँच हजार वर्ष पुरानी है। कनिंघम इस सभ्यता को एक हजार वर्ष पुरानी मानते हैं। मार्शल ने पता लगाया कि हड़प्पा में मिलीं मुहरें, ठप्पे, लिखित लिपि और कलाकृतियाँ उनसे बिल्कुल भिन्न थीं जिनसे विद्वान पहले से परिचित थे और जो बहुत बाद के समय की थी। इसी प्रकार सिंध में मोहनजोदड़ो नामक स्थान से इसी प्रकार के तथ्य सामने आए हैं। मोहनजोदड़ो में प्राचीन बस्तियाँ कुषाण युग से संबंधित बौद्ध बिहार के नीचे दबी हुई पाई गईं। यह पाया गया है कि यदि प्राचीन काल में कोई मकान किसी कारणवश नष्ट हो जाता था तो लोग आमतौर पर उस मकान की ईंट और गारे को चबूतरा तैयार करने के लिए प्रयोग करते थे और उस पर दूसरा मकान बनाते थे। इसलिए यदि कोई पुरातत्ववेत्ता किसी क्षेत्र की खुदाई करता है और किसी मकान के नीचे उसे दूसरे मकान के अवशेष मिलते हैं तो वह पता लगाया जा सकता है कि नीचे वाला मकान ऊपर वाले मकान से पुराना है। इसलिए वह जितनी गहरी खुदाई करता है, कालक्रम की दृष्टि से वह उतना ही पीछे पहुँच जाता हैइस प्रकार मार्शल यह पता लगा सका कि बौद्ध बिहार के नीचे जो मकाथे वे अवश्य ही कुषाणकाल से पहले के रहे होंगेइसके बाद इस बात का भी प्रमाण मिल गया कि इन बस्तियों में रहने वाले लोग लोहे का प्रयोग करना नहीं जानते थे। इसका अर्थ यह हुआ कि ये शहर उस युग के थे जब लोगों को लोहे के बारे में जानकारी नहीं थीलोहे का प्रयोग दूसरी सहस्राब्दी के उत्तरार्ध में शुरू हुआ। जब मार्शल ने अपनी खोजों द्वारा प्राप्त जानकारी को प्रकाशित किया तो कुछ अन्य लेखकों को मेसोपोटामिया में ऐसी वस्तुएँ मिलीं जो हड़प्पा और मोहनजोदड़ो की वस्तुओं से मिलती-जुलती थीं। मेसोपोटामिया के शहर तीसरी सहस्राब्दी के उत्तरार्ध के आरंभ में अस्तित्व में आए। इस प्रकार मेसोपोटामिया के प्राचीन शहरों में हड़प्पा की भ्यता की कोई वस्तु मिल जाती थी तो उससे यह पता चलता था कि हड़प्पा के निवासी और मेसोपोटामिया के निवासी समकालीन थे। इन साक्ष्यों से विद्वान यह पता लगा सके कि स्थानीय लोगों और कनिंघम के निष्कर्ष गलत थे। मार्शल द्वारा प्रतिपादित हड़प्पा के कालक्रम को रेडियो कार्बन डेटिंग जैसे काल-निर्धारण के नए तरीकों, से और भी समर्थन मिला है। इसलिए विद्वानों ने हड़प्पा पूर्व (Pre Harappa) और हड़प्पा की संस्कृतियों के लिए निम्नलिखित कालक्रम माना है : 

हड़प्पा पूर्व और हड़प्पा संस्कृति का कालानुक्रम :

5500 बी.सी.ई. से 3500 बी.सी.. तक नवपाषाण युग

बलूचिस्तान और सिंधु के मैदानी भागों में मेहरगढ़ और किले गुलमुहम्मद जैसी बस्तियाँ उभरीं । यहाँ लोग पशु चराने के साथ-साथ थोड़ा बहुत खेती का काभी करते थे। इस प्रकार स्थायी गाँवों का उद्भव हुआ। इस युग के लोग गेहूं, जौ, खजूर, तथा कपास की खेती की जानकारी रखते थे और भेड़ बकरियों और मवेशियों को पालते थे। साक्ष्य के रूप में मिट्टी के मकान, मिट्टी के बर्तन और दस्तकारी की वस्तुएँ मिली हैं।

3500 बी.सी.ई. से 2600 बी.सी.ई. तक आरम्भिक हड़प्पा काल

इस काल में पहाड़ों और मैदानों में बहुत सी बस्तियाँ स्थापित हुई। इसी समय गाँव सबसे अधिक संख्या में आबाद हुए। तांबा, चाक और हल का प्रयोग पाया गया। कई प्रकार के मिट्टी के अद्भुत बर्तन बनाए जाते थे जिससे कई क्षेत्रीय परम्पराओं के आरम्भ का पता चलता है। अन्न भण्डार, ऊँची-ऊंची दीवारें और सुदूर व्यापार के प्रमाण मिले हैं। सारी सिंधु घाटी में मिट्टी के बर्तनों की एकरूपता के प्रमाण मिलते हैं। इसके साथ-साथ पीपल, कुबड़े बैलों, शेषनागों, सींगदार देवता आदि के रूपांकनों के प्रयोग के प्रमाण मिले हैं।

2600 बी.सी.ई. से 1800 बी.सी.ई. तक पूर्ण विकसित हड़प्पा युग

ड़े शहरों का अभ्युदय, समान आकार की ईंटें, तौलने के बाट, मुहरें, मनके और मिट्टी के बर्तन, नियोजित ढंग से बसे हुए शहर और दूर-दूर स्थानों के साथ व्यापार |

1800 बी.सी.ई. से आगे उत्तर-हड़प्पा युग 

हड़प्पा की सभ्यता के बहुत से शहर खाली हो गए, अंतर-क्षेत्रीय विनिमय में हास हुआ, लेखन कार्य और शहरी जीवन का त्याग कर दिया गया। हड़प्पा की सभ्यता के शिल्प और मिट्टी के बर्तनों की परम्परा जारी रही। पंजाब सतलुज-यमुना की ग्रामीण संस्कृतियों का विभाजन और गुजरात में हड़प्पा की शिल्प और मिट्टी के बर्तनों की परंपराओं को अपनाया जाना। 

4. इसे हड़प्पा की सभ्यता क्यों कहा जाता है? 

हड़प्पा की खोज के बाद से अब तक लगभग एक हज़ार बस्तियों की खोज की जा चुकी है जिनकी विशेषताएँ हड़प्पा से मिलती हैं। विद्वानों ने इसे “सिंधु घाटी की सभ्यता’ का नाम दिया क्योंकि शुरू में बहुत सी बस्तियाँ सिंधु घाटी और उसकी सहायक नदियों के मैदानों में पाई गई थीं। पुरातत्ववेत्ता इसे “हड़प्पा की सभ्यता” ही कहना पसंद करते हैं। ऐसा इसलिए है कि पुरातत्व-विज्ञान में यह परंपरा है कि जब किसी प्राचीन संस्कृति का र्णन किया जाता है तो उस स्थान के आधुनिक नाम पर उस संस्कृति का नाम रखा जाता है, जहाँ से उसके अस्तित्व का पता चला है। हमें यह मालूम नहीं है कि वे लोग अपने को क्या कहते थे क्योंकि हम उनकी लिखाई नहीं पढ़ पाये हैं। इसलिए हम आधुनिक स्थान ड़प्पा को आधार मानकर उन्हें हड़प्पावासी कहते हैं। क्योंकि इसी स्थान पर इस विस्मृत सभ्यता का प्रमाण सबसे पहले मिला था। 

5. पूर्ववर्ती इतिहास 

जब हम “हड़प्पा की सभ्यता’ शब्द का प्रयोग करते हैं तो हमारा तात्पर्य असंख्य शहरों, कस्बों और गाँवों से होता है जो तीसरी सहस्राब्दी बी.सी.ई. में पूर्णतः विकसित हो चुके थे। एक विशाल भौगोलिक क्षेत्र के अंतर्गत इन शहरों और गाँवों में आपसी संबंध थे। इन भौगोलिक स्थानों के अंतर्गत मोटे तौर पर आज का राजस्थान, पंजाब, गुजरात, पाकिस्तान और कुछ आस-पास के क्षेत्र आते हैं। यदि हम हड़प्पा की सभ्यता के उद्भव से उन क्षेत्रों में रहने वाले लोगों द्वारा छोड़े गए अवशेषों का अध्ययन करते हैं तो हमें शहरों के उद्भव की जानकारी मिल सकती है। विद्वानों का विचार है कि मानवजाति के अतीत में एक ऐसा समय था जब शहरों का अस्तित्व नहीं था और लोग छोटे-छोटे गाँवों में रहते थे। अब प्रश्न यह उठता है कि हड़प्पावासियों के पूर्वज कस्बों और शहरों के उद्भव से पहले क्या किया करते थे। ऐसे प्रमाण मिले हैं जिनसे पता चलता है कि हड़प्पावासियों के पूर्वज गाँवों और छोटे छोटे कस्बों में रहा करते थे। उनमें से घूम-फिरकर पशु चराने का काम करते थे और कुछ व्यापार के कार्य में लगे हुए थे। हड़प्पा की सभ्यता से कृषक और अर्ध यायावर समुदायों के एक लम्बे समय से चले आ रहे विकास के चरमोत्कर्ष का पता चलता है। अब हम हड़प्पा की सभ्यता के पूर्ववर्ती इतिहास की समीक्षा करेंगे। सबसे पहले हम हड़प्पा की सभ्यता के क्षेत्र की भौगोलिक विशेषताओं को समझने का प्रयास करेंगे।

6 भौगोलिक विशेषताएँ

आज के पाकिस्तान और उत्तर पश्चिम भारत के क्षेत्र “हड़प्पा की सभ्यता’ के प्रमुख क्षेत्र थे। इन क्षेत्रों में मौसम सूखा रहता है और वर्षा बहुत कम होती है। फिर भी इन क्षेत्रों में कुछ महत्वपूर्ण अंतर है। पंजाब और सिंधु के क्षेत्र में सिंधु नदी के कछारी मैदानों की प्रधानता है। इसी प्रकार बलूचिस्तान के क्षेत्र की एक विशेषता है उसकी दुर्गम चट्टानी पहाड़ियाँ । उत्तर पूर्वी बलूचिस्तान में घाटियों की तलटी से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यहाँ खेती होती होगी। इस क्षेत्र में पशुचारी था खानाबदोश जातियाँ भी रहती आई हैं। ये पशुचारी खानाबदोश जातियाँ अपने पशुओं के लिए चारे की खोज में ऊँचे स्थानों से निचले स्थानों पर आती जाती रहती थींवह सीमांत क्षेत्र जो सिंधु के मैदान में जा मिलता है, पूर्वी ईरान के पठार का ही विस्तारण है। इन पहाड़ी क्षेत्रों में खैबर, गोमाल, बोलन जैसे कई दर्रे बन गए हैंखानाबदोशों, व्यापारियों, योद्धाओं और विभिन्न लोगों के लिए ये आने-जाने के मार्ग बन गए थे। एक तरफ बलूचिस्तान के ऊपरी भागों के लोगों और सिंधु नदी के मैदानों में बसे लोगों और दूसरी तरफ ईरान में रहने वाले लोगों के बीच अन्तरसम्बन्ध इस भौगोलिक विशेषता से जुड़ा प्रतीहोता है। हड़प्पा की सभ्यता की जलवायु और पहाड़, नदियाँ आदि तथा ईरान और ईराकी सीमांत प्रदेश की जलवायु और प्राकृतिक दृश्य में समानता होने के कारण विद्वानों ने यह अनुमान लगाया कि इन क्षेत्रों में कृषक समुदायों का अभ्युदय मोटे तौर पर एक ही काल में हुआ होगा। ईरान और ईराक में खेतीबाड़ी का आरम्भ लगभग 8000 बी.सी.. में हुआ है। अब यह जानने की कोशिश करेंगे कि सिंधु के आसपास के क्षेत्रों में कृषि की शुरुआत के विषय में क्या प्रमाण मिले हैं?

7. कृषि की शुरुआत और बसे हुए गाँव

कृषक समुदायों के उद्भव का सबसे प्राचीन प्रमाण मेहरगढ़ नामक स्थान से मिलता है जो पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में बोलन दर्रे के निकट स्थित है। (जैसा कि हमने पहले की इकाई में पढ़ा है) यह स्थान अस्थायी शिविर के रूप में स्थापित हुआ तथा पाँचवीं सहस्त्राब्दी बी.सी.ई. में आबाद गाँव बन गया। इस स्थान पर लोग गेहूं, जौं, कपास और खजूर पैदा करते थे और भेड़-बकरियों और मवेशी पालते थे। मेहरगढ़ उस स्थान पर स्थित है जहाँ सिंधु नदी के कछारी मैदान और भारत-ईरान सीमांत प्रदेश के ऊँचे-नीचे पहाड़ी पठार मिलते हैं। मेहरगढ़ के लोग कच्चे मकानों में रहते थे। कुछ मकानों में पाँच-छह कमरे होते थे। तीसरी सहस्त्राब्दी बी.सी.ई. के मध्य में बहुत से छोटे और बड़े गाँव सिंधु नदी के आस-पास बलूचिस्तान और अफगानिस्तान के क्षेत्र में बस गए थे। इनमें से कुछ मशहूर हैं : बलूचिस्तान में कीली गुल मोहम्मद और अफगानिस्तान में मुंडीगक । सिंधु नदी के बाढ़ वाले मैदानों में ड़प्पा के पास जलीलपुर जैसे गाँव बस गए थे। इन किसानों ने सिंधु नदी के अत्यधिक उपजाऊ मैदानों का उपयोग करना सीख लिया था, इसलिए गाँवों के आकार और उनकी संख्या एकाएक बढ़ गई। इन किसानों ने सिंधु नदी के मैदानों का धीरे-धीरे उपयोग करना और सिंधु नदी के बाढ़ पर नियंत्रण करना सीख लिया था। इस प्रकार प्रति एकड़ भूमि पर खेती रने से प्रचुर मात्रा में उपज होती थी। इस कारण सिंधु, राजस्थान, बलूचिस्तान और अन्य क्षेत्रों में भी बस्तियों का काफी विस्तार हुआ। उन्होंने अपने लिए उपयोगी पत्थरों की खदानों और अन्य खदानों का उपयोग करना सीख लिया था। इस काल में अस्थायी बस्तियों में पशुचारी खानाबदोश समुदायों के मौजूद होने के संकेत मिलते हैं। कृषकों के इन खानाबदोश समूहों से संपर्क ने कृषकों को अन्य क्षेत्रों के संसाधनों का उपयोग करने में सहायता दी क्योंकि पशुचारी खानाबदोशों के बारे में यह माना जाता है कि जिन क्षेत्रों से वे गुजरते हैं वे वहाँ व्यापारिक गतिविधियों में लग जाते हैं। इन सभी कारणों में छोटे-छोटे कस्बों का विकास हुआ। सिंधु नदी के आस-पास के क्षेत्रों की सभ्यता में पाई गई कुछ समानताओं के कारण इस नए विकास के काल को “आरम्भिक हड़प्पा काल” कहते हैं।

8. आरम्भिक हड़प्पा काल 

अब हम हड़प्पा सभ्यता के अभ्युदय के कुछ समय पहले की कुछ बस्तियों की समीक्षा करेंगे। बहुत से विद्वानों ने इसे आरम्भिक “हड़प्पा काल” कहा है क्योंकि उनका विश्वास है कि यह हड़प्पा की सभ्यता का निर्माण-युग था जिसमें सांस्कृतिक एकता की कुछ प्रवृत्तियों के प्रमाण भी मिले हैं। 

8.1 दक्षिणी अफगानिस्तान 

दक्षिणी अफगानिस्तान में एक मुंडीगक नामक स्थान है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह स्थान व्यापारिक मार्ग पर स्थित रहा होगा। सिंधु सभ्यता के आरम्भिक काल में इस स्थान के निवासी शिल्पकृतियों का प्रयोग करते थे जिनसे एक ओर ईरान के कुछ नगरों और दूसरी ओर बलूचिस्तान के कुछ नगरों के साथ संघर्ष का पता चलता है। खानाबदोश लोगों के कुछ समूहों द्वारा पड़ाव डालने की धीमी शुरुआत से यह स्थान एक घनी आबादी वाला नगर हो गया। इस बात के प्रमाण हैं कि यहाँ ऊँची दीवार होती थी जिसमें धूप में सुखाई गई ईंटों के वर्गाकार बुर्ज थे। एक विशाल भवन जिसमें खंभों की कतारें थीं महल के रूप में पहचाना या है। दूसरा विशाल भवन मंदिर जैसा प्रतीत होता है। इसी स्थान पर मिट्टी के बर्तनों की अनेक किस्में भी मिली हैं। वे लोग प्राकृतिक सजावट के रूप में चिड़ियों, लम्बे सींग वाले जंगली बकरे, बैल और पीपल के पेड़ों को चित्रित करते थे। पक्की मिट्टी की बनी हुई स्त्रियों की छोटी-छोटी मूर्तियाँ भी मिली हैं जो बलूचिस्तान की बस्तियों में पाई गई मूर्तियों से मिलती जुलती हैं। ये कांसे के मुठदार कुल्हाड़ियों और बसूलों का प्रयोग करते थे। सेलखड़ी और लाजवर्द जैसे अल्प अमूल्य पत्थरों से ईरान और मध्य एशिया के साथ अनेक संबंधों का पता चलता है क्योंकि ये पत्थर स्थानीय रूप से उपलब्ध नहीं थे।

8.2 क्वेटा घाटी

मुंडीगक के क्षिण पूर्व की ओर क्वेटा घाटी है। दंब सादात नामक स्थान में बड़े-बड़े ईंटों के घर पाए गए हैं जिनका संबंध तीसरी सहस्त्राब्दी बी.सी.ई. के आरम्भ से है। कई प्रकार के चित्रकारी किए हुए मिट्टी के बर्तन भी पाए गए हैं जो मुंडीगक में पाए गए मिट्टी के बर्तनों जैसे ही हैं। ये लोग पक्की मिट्टी की मोहरों और तांबे की वस्तुओं का भी प्रयोग करते थे। इन खोजों से उस समय के समुदायों की सम्पन्नता का संकेत मिलता है जिन्होंने अपनी खाद्य समस्या सुलझा ली थी और दूर के क्षेत्रों से व्यापारिक संबंध स्थापित कर लिए थे। इसी प्रकार आस-पास के क्षेत्रों में भी विशिष्ट कला और मिट्टी के बर्तनों की परंपरा के बारे में जानकारी मिली है। राना धुंडई नामक स्थान में लोग बारीकी से बने हुए तथा चित्रकारी किए हुए मिट्टी के बर्तन प्रयोग करते थे। इन पर काले कुबड़े बैलों के चित्र बने होते थे। इन मिट्टी के बर्तनों तथा क्वेटा घाटी में पाए गए मिट्टी के बर्तनों में सुस्पष्ट समानताएँ पाई गईं। एक अन्य स्थान पेरिआनों धुंडई जिनकी खुदाई की गई है, में भी एक विशिष्ट प्रकार की स्त्रियों की छोटी-मोटी मूर्तियाँ पाई गई है

8.3 मध्य और दक्षिणी बलूचिस्तान

मध्य और दक्षिणी बलूचिस्तान में अंजीरा, तोगाऊ, निंदोवाड़ी और बालाकोट जैसी बस्तियाँ हमें आरम्भिक हड़प्पा सभ्यता के समाजों की जानकारी देती है। घाटी की व्यवस्था के अनुसार गाँव और उपनगर विकसित हुएबालाकोट में विशाल इमारतों के अवशेष पाए गए हैंइस क्षेत्र की कई बस्तियों से फारस की खाड़ी से समपर्क का पता चलता हैबालाकोट में जो लोग सबसे पहले बसे उसी प्रकार की मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग करते थे जिस प्रकार के मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग बलूचिस्तान के समकालीन गाँवों के लोग करते थे किंतु कुछ समय पश्चात् उन्होंने सिंधु नदी के कछारी मैदानों में प्रयुक्त किए जाने वाले मिट्टी के बर्तनों के समान ही मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग करना आरम्भ कर दिया था। हमारे लिए महत्वपूर्ण बात यह है कि सम्पूर्ण बलूचिस्तान प्रांत के लोग एक ही प्रकार के मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग करते थे। इस प्रकार उन पर एक ओर फारस की खाड़ी के नगरों का तथा दूसरी ओर सिंधु घाटी के नगरों के प्रभावों का पता लता है। वे अपने मिट्टी के बर्तनों पर कुबड़े बैल और पीपल के चिन्हों का प्रयोग करते थे जो विकसित हड़प्पा काल में भी जारी रहा। 

8.4 सिंधु क्षेत्र

चौथी सहस्त्राब्दी बी.सी.ई. के मध्य तक सिंधु के कछारी मैदान परिवर्तन का केंद्र बिंदु बन गए। सिंधु नदी और घग्गर-हाकरा नदियों के किनारों पर बहुत सी छोटी और बड़ी बस्तियाँ बस गईं। यह क्षेत्र हड़प्पा की सभ्यता का मुख्य क्षेत्र बन गया। इस चर्चा में हम यह बताने का प्रयास करेंगे कि किस प्रकार इन घटनाओं से हड़प्पा की सभ्यता की अनेक विशेषताओं का पता चला। 

i) आमरी

सिंधु घाटी के निचले मैदानों में स्थित सिंधु प्रांत का विकास रोचक है। आमरी में मिले मकानों के अवशेषों से पता चलता है कि लोग पत्थर और मिट्टी की ईंटों के मकानों में रहते थे। उन्होंने अनाज को रखने के लिए अनाज के कोठार (अन्नागार) भी बनाए थे। वे मिट्टी के बर्तनों पर भारतीय कुबड़े बैलों जैसे जानवरों के चित्र बनाते थे। यह चित्र (चिन्ह) पूर्ण विकसित हड़प्पा काल में बहुत लोकप्रिय था। वे चाक पर बने मिट्टी के बर्तनों का भी प्रयोग करते थे। थरों और कोहत्रास बुथीं जैसे स्थानों से भी सी ही वस्तुएँ पाई गई। यहाँ पर हड़प्पा की सभ्यता के शुरू होने से पहले ही उन्होंने अपनी बस्तियों की किलेबंदी कर ली थी। 

ii) कोट दीजी 

मोहनजोदड़ो के सामने सिंधु नदी के बाएँ किनारे पर कोट दीजी नामक स्थान है। आरंभिक हड़प्पा काल में यहाँ के निवासियों ने अपनी बस्ती के चारों ओर अति विशाल सुरक्षात्मक दीवार बना ली थी। उनकी सबसे बढ़िया खोज मिट्टी के बर्तन हैं। वे चाक पर बने मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग करते थे जिन पर गहरे भूरे रंग की साधारण धारियों की सजावट होती थी। इस प्रकार के मिट्टी के बर्तन राजस्थान में कालिबंगन और बलूचिस्तान में मेहरगढ़ जैसे दूर-दराज के स्थानों में बसे पूर्व हड़प्पा काल के निवासियों के बताजाते हैं। कोट दीजी मिट्टी के बर्तनों की किस्में सिंधु नदी के आस-पास के सम्पूर्ण भू-भाग में पाई गई हैं जहाँ पर हड़प्पा के पूर्व-शहरी और शहरी अवस्था से संबंधित बस्तियों के बारे में जानकारी मिली हैमिट्टी के बर्तनों का समान रूप से सजावट की इस प्रवृत्ति से यह संकेत मिलता है कि सिंधु नदी के मैदानी भागों में रहने वाले लोगों के बीच घनिष्ठ संबंध थे। इससे हडप्पा की सभ्यता में संस्कृतियों के समाभिरूपता की प्रक्रिया का भी पूर्वाभास मिलता है। मिट्टी के बर्तनों के अनेक डिजाइन शहरी अवस्था तक शेष रहे। उसी समय के अन्य मिट्टी के बर्तन मुंडीगक में बने हुए मिट्टी के बर्तनों के समान थे। इससे आरंभिक हड़प्पा के स्थानों में विस्तृत आपसी संबंधों का पता चलता है। पुरातत्ववेत्ताओं ने मोहनजोदड़ो में इस मैदान की आधुनिक स्तर के 39 फुट नीचे तक खुदाई करके अधिवास से जमा वस्तुओं का पता लगाया है। इस प्रकार चान्हूदड़ो नामक स्थान पर आरंभिक हड़प्पा के मकानों का पता चला है। मोहनजोदड़ो में शुरू के स्तर तक खुदाई नहीं हो पाई है परंतु अनेक पुरातत्ववेत्ताओं का यह विश्वास है कि उनके रहन-सहन के ढंग से आरंभिक हड़प्पा की संस्कृति की जानकारी मिलती है जो संभवतः कोट दीजी की संस्कृति से मेल खाती है।

iii) मेहरगढ़

इससे पहले भी हम मेहरगढ़ स्थल के बारे में बता चुके हैं। हड़प्पा के शहरीकरण के पूर्ववर्ती काल में मेहरगढ़ के लोगों ने एक संपन्न उपनगर बसाया था। वे पत्थरों की कई प्रकार की मालाएँ बनाते थे। वे एक कीमती पत्थर लाजवर्द मणि का प्रयोग करते थे जो केवल मध्य एशिया के बदख्शां क्षेत्र में पाया जाता है। बहुत सी मोहरों और ठप्पों का भी पता चला है। आपसी लेन-देन में प्राधिकार के चिन्ह रूप में इन मोहरों का प्रयोग होता था। मेहरगढ़ के मोहरों का प्रयोग संभवतः व्यापारियों द्वारा दूर-दराज के क्षेत्रों को भेजे जाने वाले माल की गुणवत्ता की गारंटी देने के लिए किया जाता था। मिट्टी के बर्तनों के डिजाइन, मिट्टी की बनी मूर्तियों, तांबे और पत्थर की वस्तुओं से पता चलता है कि इन लोगों का ईरान के निकटवर्ती नगरों के साथ घनिष्ठ संबंध था। मेहरगढ़ के लोगों द्वारा प्रयोग किए गए अधिकतर मिट्टी के बर्तन दम्ब सदात और क्वेटा घाटी की बस्तियों में सदा प्रयुक्त किए जाने वाले बर्तनों से मिलते थे। इसके अतिरिक्त मिट्टी की बनी स्त्रियों की बहुत सी मूर्तियाँ भी मिली हैं। वे झोब घाटी में पाई गई मूर्तियों से बहुत कुछ मिलती जुलती हैं। इन समानताओं से उस क्षेत्र में रहने वाले समुदायों के बीच निकट आपसी संबंधों का पता चलता है।

iv) रहमान ढेरी 

यदि हम सिंधु नदी के उत्तर की ओर चलें तो हमें कुछ और बस्तियाँ मिलेंगी जिनसे हमें यपता चलता है कि आरंभिक हड़प्पा काल में लोग किस प्रकार रहते थे। रहमान ढेरी नामक स्थान पर आरंभिक सिंधु उपगर की खुदाई की गई है। यह उपनगर आयताकार था और इसमें घर, सड़कें, गलियाँ नियोजित ढंग से बने हुए थे। इस उपनगर की सुरक्षा के लिए एक विशाल दीवार थी। यहाँ भी फीरोजी और लाजवर्द के मनके मिले हैं। इससे नके मध्य एशिया के साथ संबंधों का पता लता है। बर्तनों के टुकड़ों पर पाए गए असंख्य भित्ति चित्र हड़प्पालिपि के पूर्वसूचक हो सकते हैं। इस क्षेत्र में मिट्टी के बर्तनों की स्वतंत्र परंपरा धीरे धीरे बदल गई और कोट दीजी के मिट्टी के बर्तनों के समान मिट्टी के बर्तनों ने स्थान ले लिया। पत्थर, तांबे और कांसे से बनी मोहरें और औज़ार भी मिले हैं।

v) तरकाई किला

बन्नू क्षेत्र के उत्तरपश्चिम सीमा प्रांत में तरकाई किले की किलेबंदी का प्रमाण भी मिला है। पुरात्वविदों ने खाद्यान्नों के बहुत सारे नमूने खोज निकाले हैं जिनमें गेहूं और जौं, मूंग-मसूर की दालें और देसी मटर के किस्म शामिल हैं। फसल काटने के औज़ारों का भी पता चला है। उसी क्षेत्र में लीवान नामक स्थान पर पत्थर के औजार बनाने के एक बहुत बड़े कारखाने का पता चला है। हड़प्पा के निवासी और उनके पूर्वज लोहे और तांबे के बारे में बिल्कुल भी जानकारी नहीं खते थे। अतः अधिकतर लोग पत्थर से बने औज़ारों का प्रयोग करते थे। इसलिए कुछ स्थानों पर जहाँ अच्छी श्रेणी का पत्थर उपलब्ध था, ड़ी संख्या में औज़ार बनाए जाते थे और उसके बाद उन औज़ारों को दूर-दूर के नगरों और गाँवों में भेजा जाता था। लीवान में लोग पत्थर के कुल्हाड़े, हथौड़े, चक्कियाँ आदि बनाते थे। इस काम के लिए वे निकटवर्ती क्षेत्रों से भी उपयुक्त चट्टानी पत्थर मंगाते थे। लाजवर्द की उपस्थिति और मिट्टी की बनी मूर्तियों के पाए जाने से मध्य एशिया के साथ संबंधों का पता चलता है। सरायखोला नामक स्थान पर जो पश्चिमी पंजाब के उत्तरी किनारे पर स्थित है एक अन्य आरंभिक हड़प्पा बस्ती का पता चला है। यहाँ पर भी लोग कोट दीजी जैसे मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग करते थे। 

8.5 पंजाब और बहावलपुर

पश्चिमी पंजाब में हड़प्पा प्रसिद्ध है। एक खुदाई के दौरान शहरीकरण की अवस्था से पहले की बस्तियों की खोज की गई है। दुर्भाग्यवश अभी तक उनकी खुदाई नहीं हुई है। यहाँ पाए गए मिट्टी के बर्तन कोट दीजी के बर्तनों के समान हैं। विद्वानों का विचार है कि ये बस्तियाँ हड़प्पा में ‘आरंभिक हड़प्पा काल’ में रही होंगी। बहावलपुर क्षेत्र में हाकरा नदी की सूखी तलहटी में आरम्भिक हड़प्पा काल के लगभग 40 स्थानों का पता लगाया गया है। कोटी दीजी में पाए गए मिट्टी के बर्तनों से यहाँ पर भी आरंभिक हड़प्पा सभ्यता का पता लता है। इन स्थानों का बस्ती के स्वरूप के तुलनात्मक विश्लेषण से यह ज्ञात होता है कि आरंभिक हड़प्पा काल में कई प्रकार के मकान बन गए थे। जबकि कई स्थानों में तो साधारण गाँव ही थे और उनमें से कुछ स्थानों में विशिष्ट औद्योगिक कार्य हो रहे थे। इलिए हम देखते हैं कि अधिकतर स्थानों का औसत आकार लगभग पाँच से छह एकड़ था। गमनवाला 27.3 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला है। इसका अर्थ यह हुआ कि गमनवाला कालीबंगन के हड़प्पा काल के उपनगर से बड़ा था। इन उपनगरों में कृषि कार्यों के अतिरिक्त अवश्य ही प्रशासनिक और औद्योगिक कार्य होते होंगे।

8.6 कालीबंगन 

उत्तरी राजस्थान के कालीबंगन स्थान पर आरंभिक हड़प्पा काल के प्रमाण मिले हैं। यहाँ पर लोग कच्ची ईंटों के मकानों में रहते थे। इन कच्ची ईंटों का मानक आकार होता था। वे बस्ती के चारों तरफ चार दीवारी भी बनाते थे। उन लोगों द्वारा प्रयुक्त मिट्टी के बर्तनों का आकार और डिजाइन दूसरे क्षेत्रों में प्रयुक्त मिट्टी के बर्तनों के आकार और डिजाइन से अलग था। फिर भी मिट्टी के कुछ बर्तन कोट दीजी के पाए गए मिट्टी के बर्तनों से मिलते थे। बलि स्तंभ’ जैसे मिट्टी के बर्तनों के कुछ नमूनों का प्रयोग शहरी चरण के दौरान जारी रहा। इसके अतिरिक्त एक महत्वपूर्ण खोज थी जुते हुए खेत का तल । से सिद्ध होता है कि उस समय भी किसान हल के बारे में पहले से ही जानते थे। पुराने हालात में किसान केवल बीज छितराकर बो सकते थे या खेतों की खुदाई के लिए फावड़े, कुदाली का प्रयोग करते थेहल से कोभी व्यक्ति बहुत कम मेहनत से अधिक गहरी खुदाई कर सकता है। इसलिए इसे खेती का उन्नत औज़ार समझा जाता है जिसमें खाद्य उत्पादन को बढ़ाने की शक्ति है। 

घग्गर नदी, जो भारत में है सूखी तलहटी में आरंभिक हड़प्पा की अनेक बस्तियाँ पाई गई हैं। ये बस्तियाँ उन जलमार्गों के पास पाई गई हैं जो अब विलुप्त हो गए हैं। सोथी बाड़ा और सीसवाल जैसी बस्तियों में जो मिट्टी के बर्तनों की शैलियाँ प्रचलित थीं वह कालीबंगन के मिट्टी के बर्तनों की शैलियों से मिलती जुलती थी। ऐसा प्रतीत होता है कि राजस्थान में खेतड़ी की तांबे की खानों का उपयोग आरंभिक हड़प्पा काल में ही शुरू हो गया होगा। हमने आरंभिक काल में सिंधु क्षेत्रों और उसके आस-पास रहने वाले विभिन्न कृषक समुदायों की सांस्कृतिक परंपराओं में पाई गई समानताओं का उल्लेख किया है। बलूचिस्तान, सिंधु, पंजाब और राजस्थान में आरंभ में छोटी-छोटी कृषक बस्तियाँ थीं, इसके पश्चात् इन क्षेत्रों में अनेक प्रकार की क्षेत्रीय परंपराओं का अभ्युदय हुआ है। किंतु एक ही प्रकार के मिट्टी के बर्तन, सींग वाले देवता के चित्रण और मिट्टी की मातृदेवियों की मूर्तियों से पता चलता है कि एकीकरण की परंपरा शुरू हो चुकी थी। बलूचिस्तान के लोगों ने फारस की खाड़ी और मध्य एशिया के नगरों के साथ पहले ही व्यापारिक संबंध बना लिए थे। इस प्रकार आरंभिक हड़प्पा काल से हड़प्पा की सभ्यता की उपलब्धियों की जानकारी मिलती है।

हमने लगभग तीन हजार वर्षों में हुई घटनाओं को पढ़ा है। इस काल के दौरान किसानों ने सिंधु नदी के कछारी जलोढ़ मैदानों में बस्तियाँ बसाई। ये समुदाय तांबे, कांसे और पत्थर के औज़ारों का प्रयोग करते थे। श्रम से अधिक उत्पादकता प्राप्त करने के लिए वे हल और पहिवाली गाड़ी का प्रयोग करते थे। ईरान में भेड़बकरियाँ पालने का प्रचलन था तो इसके विपरीत सिंधु घाटी के लोग गाय, भैंस आदि पशु पालते थे। इससे उन्हें यातायात और खेती के लिए पशु शक्ति का प्रयोग करने के लिए बेहतर अवसर मिल गए थे। इसी दौरान मिट्टी के बर्तनों को बनाने की परंपरा में धीरे-धीरे एकरूपता आईकोट दीजी में जो विशेष प्रकार के मिट्टी के बर्तन सबसे पहले पाए गए थे आरंभिक हड़प्पा काल में वे बलूचिस्तान, पंजाब और राजस्थान के समस्त क्षेत्रों में भी पाए गए। मिट्टी की मातृदेवियों की मूर्तियाँ और सींगदार देवता के रूपाँकन कोट दीजी और कालीबंगन में भी पाए गए। कुछ समुदायों ने अपने घरों के चारों ओर ऊँचीऊँची दीवारें बना ली थीं। इन दीवारों के निर्माण के पीछे क्या प्रयोजन रहा होगा, यह हमें मालूम नहीं है। हो सकता है कि ये दीवारें दूसरे समुदायों से सुरक्षित रहने के लिए बनाई गई हों अथवा बाढ़ से बचने के लिए बनाई गई होंये सभी घटनाएँ फारस की खाड़ी और मेसोपोटामिया की समकालीन बस्तियों के साथ अधिक व्यापक संबंधों के संदर्भ में घटित हो रही थी। 

9. हड़प्पा की सभ्यता का अभ्युदय

प्रौद्योगिकीय और वैचारिक एकीकरण की इन प्रक्रियाओं की पृष्ठभूमि में हड़प्पा की सभ्यता का अभ्युदय हुआ। इस सभ्यता की उत्पत्ति से संबंधित प्रक्रियाएँ अस्पष्ट हैं क्योंकि उनकी लिपि का अध्ययन नहीं किया गया है और अनेक बस्तियों की खुदाई की जाने की जरूरत है। ऊपर कुछ सामान्य प्रक्रियाओं की रूपरेखा प्रस्तुत की गई है। उन्नत और सिंधु घाटी के उर्वर मैदानों में खेती करने तथा उन्नत प्रौद्योगिकी के प्रयोग से खाद्यान्न उत्पादन में बढ़ोत्तरी हुई होगी। इससे अधिकांश खाद्यान्न की संभावनाएँ पैदा हुई। इसके कारण जनसंख्या में भी वृद्धि हुई। इसके साथ-साथ समाज के धनी वर्ग बहुमूल्य वस्तुओं को प्राप्त करने के लिए दूर दराज के समुदायों के साथ व्यापारिक संबंध स्थापित करते थे। अधिकांश खाद्यान्नों से गैर कृषि कार्य करने के अवसर मिले। गाँव का पुरोहित सम्पूर्ण क्षेत्र में फैले हुए पुरोहित-कुल का अंग बन सकता था। इसी प्रकार की प्रक्रियाएँ धातु-कर्मियों, कुम्हारों और शिल्पियों के संबंध में सामने आईं। गाँवों में अनाज रखने के चबूतरे बड़े-बड़े कोठारों में बदल गए। 

कई कृषक समूहों और पशुचारों यायावर समुदायों का एक दूसरे के साथ निकट संपर्क होने से उनके बीच तनाव तथा परस्पर विरोध उत्पन्न हो सकता था। कृषक एक समुदाय के रूप में स्थापित होने के पश्चात् अन्य कम खुशहाल समूहों को अपनी ओर आकृष्ट कर सकते थे। पशुचारी यायावर जातियों के बारे में यह प्रसिद्ध है कि वे व्यापार और लूटपाट के कार्य में लगी थीं। अपनी आर्थिक दशा के अनुसार वे इन गतिविधियों में म्मिलित होते थे। कृषक । समुदाय में अधिक उपजाऊ भूमि को हथियाने के लिए संघर्ष होता था। संभवतः यही कारण है कि कुछ समुदायों ने अपने चारों ओर सुरक्षा के लिए दीवार बना ली थी। हम जानते हैं कि हड़प्पा की सभ्यता के अभ्युदय के समय कोट दीजी और कालीबंगन जैसी कई बस्तियाँ आग से नष्ट हो गयी थी हमें इसका कारण मालूम नहीं है। यह अकस्मात घटना हो सकती है फिर भी यह तथ्य अधिक विश्वसनीय प्रतीत होता है कि सिंधु क्षेत्र में विभिन्न प्रतियोगी समुदायों में लोगों के एक वर्ग ने दूसरों पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया था। इससे “विकसित हड़प्पा काल” के आरंभ का संकेत मिला। हड़प्पा सभ्यता एक विस्तृत भौगोलिक क्षेत्र में फैली हुई थी। इस कारण विसित हड़प्पा काल के आरंभ होने की कोई एक तिथि नहीं हो सकती थी। यह संभव है कि विकास के केंद्र के रूप में इस शहर का कई सौ वर्षों की समयावधि में अभ्युदय हुआ होगा। परंतु यह शहर अस्तित्व में आया और यही कारण है कि इस शहर के अगले सात-आठ सौ वर्षों के लिए पूरे उत्तर-पश्चिम क्षेत्र का प्रभुत्व रहा।  

10. हड़प्पा का पतन: पुरातात्विक साक्ष्य

हड़प्पा, मोहनजोदड़ो और कालीबंगन जैसे नगरों का नगर नियोजन और निर्माण में क्रमिक हास हुआ। पुरानी जीर्ण ईंटों से बने और घटिया निर्माण वाले घरों ने नगरों की सड़कों और और गलियों पर भी कब्जा कर लिया। पतली विभाजक दीवारों से घरों के आंगनों का उपविभाजन कर दिया गया। शहर बड़ी तेजी से तंग बस्तियों में बदल रहे थे। मोहनजोदड़ो के वास्तुकला के विस्तृत अध्ययन से पता चलता है कि विशाल स्नानागार के अनेक प्रवेश मार्ग अवरुद्ध हो गए थे। कुछ समय बाद ‘विशाल स्नानागार’ और ‘अन्न भण्डार’ का उपयोग पूर्णतः समाप्त हो गया। इसी समय मोहनजोदड़ो में अपेक्षाकृत बाद के निवास स्थानों में मूर्तियों और लघुमूर्तियों मनकाओं, चूड़ियों और पछचीकारी की संख्या में स्पष्ट कमी दिखाई देती है। अन्त में मोहनजोदडो नगर मूलतः पच्चीस हेक्टेयर से सुकड़ कर मात्र तीन हेक्टेयर की छोटी सी स्ती रह गया। 

हड़प्पा के परित्याग से पहले लगता है एक और जन समूह आया था जिनकी जानकारी हमें उनकी मुर्दो को दफनाने की पद्धतियों से चलता है। वे मिट्टी के जिन बर्तनों का इस्तेमाल करते थे वे बर्तन हडप्पा निवासियों के बर्तनों से भिन्न थी। उनकी संसकृति को “सिमेटरी एच” (कब्रिस्तान-एच) संस्कृति कहा जाता है। कालीबंगन और चंहुदाड़ो जैसे स्थानों में भी हास की प्रक्रिया स्पष्ट दृष्टिगोचर हो ही थी। हम देखते हैं कि शक्ति और विचारधारा से सम्बद्ध और भव्यता प्रदर्शन के सामान अधिक से अधिक दुर्लभ हो रहे थे। बाद में हड़प्पा और मोहनजोदड़ो जैसे नगरों का पूर्ण परित्याग हो गया। 

उत्तर हड़प्पा काल की बस्तियाँ । स्रोत : ई.एच.आई.-02, खंड-2, इकाई-91 बहावलपुर क्षेत्र में हड़प्पा कालीन और परवर्ती हड़प्पा कालीन स्थानों के शहरी नमूने के अध्ययन से भी हास की प्रवृत्ति लक्षित होती है। हारूड़ा नदी के तटों के साथ परिपक्व काल में जहाँ 174 बस्तियाँ थी, वहाँ उत्तरवर्ती हड़प्पा काल में बस्तियों की यह संख्या घटकर 50 रह गई। इस बात की संभावना है कि अपने जीवन के बाद के दो-तीन सौ वर्षों में हड़प्पा सभ्यता के मूल प्रदेश में बस्तियों का हास हो रहा था। जन-समूह या तो नष्ट हो गए थे या अन्य क्षेत्रों में चले गए थे। जहाँ हड़प्पा, बहावलपुर और मोहनजोदड़ो के त्रिभुज में बस्तियों की संख्याओं में हास हुआ वहीं गुजरात, पूर्वी पंजाब, हरियाणा और ऊपरी दोआब के दूरस्थ क्षेत्रों में बस्तियों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई। इससे इन क्षेत्रों में लोगों की संख्या में अपूर्व वृद्धि का संकेत मिलता है। इन क्षेत्रों की जनसंख्या में आकस्मिक वृद्धि का कारण हड़प्पा के मूल क्षेत्रों से लोगों का आना हो सकता है। 

हड़प्पा-सभ्यता के दूरस्थ क्षेत्रों में जैसे गुजरात, राजस्थान और पंजाब के प्रदेश में लोग रहते रहे। लेकिन उनके जीवन में परिवर्तन आ गया था। हड़पपा-सभ्यता से संबद्ध कुछ महत्वपूर्ण लक्षण जैसे लेखन, तोलने के समान बाट, हड़प्पा कालीन मिट्टी के बर्तन और वास्तुकला शैली-लुप्त हो गए थे। सिंधु नदी के नगरों का परित्याग स्थूल रूप से लगभग 1800 बी.सी.ई. में हुई। इस तारीख का समर्थन इस तथ्य से होता है कि मेसोपोटामिया साहित्य में 1900 बी.सी.ई के अंत तक मेलुहा का उल्लेख समाप्त हो गया था। तथापि आज भी हड़पपा कालीन नगरों को अंत का कालानुक्रम स्थाई नहीं है। हम आज क यह नहीं जान सके कि मुख्य बस्तियों का परित्याग एक ही समय हुआ अथवा भिन्न-भिन्न अवधियों में हुआ। तथापि यह अवश्य निश्चित है कि मुख्य नगरों के परित्याग और अन्य बस्तियों को विनगरीकरण से हड़प्पा-सभ्यता के हास का संकेमिलता है। 

11. आकस्मिक हास के सिद्धांत 

विद्वानों ने इस प्रश्न के विभिन्न उत्तर दिए हैं कि यह सभ्यता नष्ट क्यों हुई? कुछ विद्वानों ने जिनका विश्वास है कि सभ्यता का नाटकीय अंत हो गया उन्होंने आकस्मिक विपत्ति के ऐसे साक्ष्य खोजे हैं जिससे शहरी समुदायों का सत्यानाश हो गया। हड़प्पा सभ्यता के ह्रास के लिए कुछ अपेक्षाकृत अधिक संभावना युक्त सिद्धांत निम्न हैं :

क) यह भयंकर बाढ़ से नष्ट हो गई। 

) हास नदियों का रास्ता बदलने से और घग्घर-हाकड़ नदी तंत्र के धीरे-धीरे सूख जाने के कारण हुआ

ग) बर्बर आक्रमणकारियों ने शहरों को र्बाद कर दिया।

घ) केंद्रों की बदली हुई माँगों से क्षेत्र की पारिस्थितिकी भंग हो गई और उसे संभाला नहीं जा सका।

आइए, इस समष्टीकरणों पर उनके गुणदोषों के आधार पर चर्चा करें

11.1 बाढ़ और भूकम्प

हड़प्पा सभ्यता के ह्रास के लिए विद्वानों ने जो कारण बताए हैं, उनमें उन्होंने मोहनजोदड़ो में बाढ़ आने के साक्ष्य भी शामिल किए हैं। प्रमुख खुदाई करने वालों के नोटबुक से पता चलता है कि मोहनजोदड़ो में रिहाइश की विभिन्न अवधियों से अत्यधिक बाढ़ के साक्ष्य मिले हैं। यह निष्कर्ष इस तथ्य से निकाला जा सकता है कि मोहनजोदड़ो में मकानों और सड़कों पर इसके लम्बे इतिहास में अनेक बार कीचड़युक्त मिट्टी भरी पड़ी थी और टूटे हुए भवनों की सामग्री और मलबा भरा पड़ा था। लगता है कीचड़युक्त यह मिट्टी उस बाढ़ के पानी के साथ आई जिस पानी में सड़कें और मकान डूब गए थे। बाढ़ का पानी उतर जाने के बाद मोहनजोदड़ो के निवासियों ने पहले के मकानों के मलबे के ऊपर फिर से मकान और सड़कें बना लीं। इस प्रकार की भयंकर बाढ़ और मलबे के ऊपर पुनःनिर्माण का सिसिला कम से कम तीन बार चला।

रिहाइशी क्षेत्र में खुदाई से पता चला है कि 70 फुट ऊँचाई तक रिहायशी तलों का सिलसिला था। यह सात मंजिला इमारत की ऊँचाई के बराबर है। विभिन्न आवासी स्तरों के बीच कीचड़ की स्तरें पाई गई थीं। आज के भूतल से 80 फुट ऊँचाई तक कई स्थानों पर कीचड़ के ढेर मिले हैं। इस प्रकार, कई विद्वानों का विश्वास है कि ये मोहनजोदड़ो में विनाशकारी बाढ़ आने के साक्ष्य हैं। इन बाढ़ों के कारण अपने पूरे इतिहास काल में शहर बार-बार अस्थायी रूप से वीरान हुआ और फिर बसा। 

यह बाढ़ महा भयंकर थी। यह इस बात से प्रमाणित होता है कि नदी की कीचड़ के ढेर आज के भूतल से 80 फुट ऊँचाई तक मिले हैं जिसका अर्थ है कि बाढ़ का पानी इस क्षेत्र में इस ऊँचाई तक पहुँचा । मोहनजोदड़ो के हड़प्पा निवासी इन बार-बार आने वाली बाढ़ों से मुकाबला करने में हिम्मत हार गए। एक अवस्था ऐसी आई जब कंगाल हड़प्पा निवासी इसे और सहन न कर सके और इन बस्तियों को छोड़कर चले गए।

रेईक्स (Raikes) की प्राक्कल्पना

महा भयंकर बाढ़ के सिद्धांत का विख्यात जलविज्ञानी आर.एल. रेईक्स ने भी समर्थन किया है। उसका मत है कि ऐसी बाढ़ जो बस्ती के भूतल से 30 फुट ऊँचे भवनों को छू सकती थी, सिंधु नदी में सामान्य बाढ़ आने का परिणाम नहीं हो सकती। उसका विश्वास है कि हड़प्पा सभ्यता का हास भयंकर बाढ़ के कारण हुआ जिससे सिंधु नदी के तट पर स्थित नगर बहुत समय तक डूबे रहे। उसने बताया है कि भू-आकृति विज्ञान की दृष्टि से क्षेत्र अशान्त भूकम्प क्षेत्र है। भूकम्पों से हो सकता है, निम्न सिंधु नदी के बाढ़ मैदानों का स्तर ऊँचा हो गया हो। सिंधु नदी के लगभग समकोण पर एक धुरी के साथ-साथ मैदान के इस त्थान से नदी का समुद्र की ओर मार्ग अवरुद्ध हो गया। इससे सिंधु नदी में पानी इकट्ठा होने लगा। उस क्षेत्र में एझील सी बन गई। जहाँ कभी सिंधु नदी के शहर आबाद थे। और इस प्रकार, नदी के बढ़ते हुए पानी के स्तर में मोहनजोदड़ो जैसे शहर डूब गए।

यह ताया जा चुका है कि करांची के पास बालाकोट और मकरान तट पर सुतकागनदौड़ और सतका-कोह जैसे स्थान हड़पपा निवासियों के समुद्री तट थे। तथापि आजकल ये समुद्र तट से दूर स्थित है। ऐसा संभवतः उग्र भूकम्प के कारण समुद्र पर भूमि के त्थान के परिणामस्वरूप हुआकुछ विद्वानों का मत है कि ऐसे उत्थान 2वीं सहस्त्राब्दी बी.सी.ई में किसी समय हुए। इन उग्र भूकम्पों से जिन्होंने नदियों को अवरुद्ध कर दिया और शहरों को जला दिया, हड़प्पासभ्यता नष्ट हो गई। इससे नदी पर आधारित वाणिज्यिक गतिविधियों औतटीय संचार भंग हो गया। 

आलोचना हड़प्पा सभ्यता के महा भयंकर विनाश का हान सिद्धांत विद्वानों को मान्य नहीं हैएच. टी. लैमब्रिका कहना है कि यह विचार कि एक नदी भूकम्पीय उत्थानों से इस प्रकार अवरुद्ध हो जाएगी, निम्नलिखित दो कारणों से सही नहीं है :

1) यदि किसी भूकम्प से अनुप्रवाह पर एक कृत्रिम बाँध बन भी गया, तो भी सिंधु नदी के अत्यधिक मात्रा में जल से वह आसानी से टूट गया होगा। सिंधु में हाल ही में 1819 को भूकम्प से जो टीला बन गया था, वह सिंधु की एक छोटी नदी नारा से उत्पन्न पहली बाढ़ में ही बह गया था।

2) जमा हो गई गाद (कीचड़) परिकल्पित झील में पानी के उठते हुए तल के समान्तर हो गई होती। यह नदी के पिछले मार्ग के तल के साथ जमा होगी। इस प्रकार मोहनजोदड़ो की गाद बाढ़ के कारण इकट्ठी नहीं हुई थी।

इस सिद्धांत की दूसरी आलोचना यह है कि इस सिद्धांत में सिंधु नदी तंत्र के बाहर की बस्तियों के हास का स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है।

11.2 सिंधु नदी का मार्ग बदलना

लैमब्रिक ने इस हास के लिए अपना स्वयं का स्पष्टीकरण दिया है। उसका मत है कि सिंधु नदी के मार्ग में परिवर्तन मोहनजोदड़ो नगर के विनाश का कारण हो सकता है। सिंधु नदी एक अस्थिर नदी तंत्र है जो अपना तल बदलता रहता है, स्पष्टतः सिंधु नदी मोहनजोदड़ो से लगभग 30 मील दूर चली गई। शहर और आसपास के खाद्यान्न उत्पादक गाँवों के लोग इस क्षेत्र से चले गए क्योंकि वे पानी के लिए तरस गए थे। मोहनजोदड़ो के इतिहास में ऐसा अनेक बार हुआ। शहर में देखी गगाद वास्तव में हवा के कारण इकट्ठी हुई है क्योंकि हवा से । बड़ी मात्रा में रेत और गाद उड़कर यहाँ आई। इस गाद और विधारित कीचड़, कच्ची ईंटों और पक्की ईंटों की संरचनाओं से वह गाद बन गई जिसे गल्ती से बाढ़ से उत्पन्न गाद मान लिया गया।

इस सिद्धांत से भी हड़प्पा-सभ्यता के पूर्णतः हास के कारण स्पष्ट नहीं होते। अधिक से अधिक यह सिद्धांत मोहनजोदड़ो का वीरान हो जाना स्पष्ट कर सकता है और यदि मोहनजोदड़ो के निवासी नदी के मार्ग में इस प्रकार के बदलाव से परिचित थे तो वे स्वयं ही किसी नई स्ती में जाकर क्यों नहीं बस सकते थे और मोहनजोदड़ो जैसा दूसरा शहर क्यों नहीं बसा सकते थे? स्पष्टतः ऐसा लगता है कि इसके कुछ और ही कारण थे?

11.3 शुष्कता में वृद्धि और घग्घर का सूख जाना

डी.पी. अग्रवाल और सूद ने हड़प्पा-सभ्यता के हास के लिए एक नया सिद्धान्त बताया है। उनका मत है कि हड़प्पा-सभ्यता का ह्रास उस क्षेत्र में बढ़ती हुई शुष्कता के कारण और घग्घर नदी-हाकडा-के सूख जाने के कारण हुआ। संयुक्त राज्य अमरीका, आस्ट्रेलिया और राजस्थान में किए गए अध्ययनों के आधार पर निष्कर्ष निकालते हुए उन्होंने बताया है कि द्वितीय सहस्त्राब्दी बी.सी.ई. के मध्य तक शुष्कता की स्थितियों में बहुत वृद्धि हो गई थी। हड़प्पा जैसे अर्ध शुष्क क्षेत्रों में भी नमी और जल उपलब्धता में थोड़ी सी कमी के भी भयंकर परिणाम हो ते थे। इससे कृषि उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता और इसके परिणामस्वरूप नगर की र्थव्यवसथा पर बहुत दबाव पड़ता

उन्होंने पश्चिम राजस्थान में अस्थिर नदी तंत्रों की समस्या पर चर्चा की हैजैसा पहले बताया जा चुका है घग्घर-हाकड़ा क्षेत्र हड़प्पा सभ्यता का एक मूल क्षेत्र थाघग्घर एक शक्तिशाली नदी थी जो समुद्र में गिरने से पहले पंजाब, राजस्थान और कच्छ के रन में से होकर बहती थी। सतलुज और यमुना नदियाँ इस नदी की सहायक नदियाँ हुआ करती थींकुछ विवर्तनिक विक्षोभों के कारण सतलुज सिंध नदी में समा गई तथा यमुना नदी गंगा नदी में मिलने के लिए पूर्व की ओर रास्ता बदल गई। नदी क्षेत्र में इस प्रकार के परिवर्तन से जिससे घग्घर जल विहीन हो गई, इस क्षेत्र में अवस्थित नगरों के लिए भयंकर उलझनें हुई होंगीस्पष्टतः शुष्कता में वृद्धि तथा जल निकासी स्वरूप में हुए परिवर्तन से आए पारिस्थितिक विक्षोभों से हड़प्पा सभ्यता का ह्रास हुआ। 

यह सिद्धांत रोचक तो है, पर इसमें कुछ समस्याएँ भी हैं। शुष्कता की परिस्थितियों के संबंध में सिद्धांतों का पूर्णतः अध्ययन नहीं किया गया है और इस संबंध में और सूचनाएँ अपेक्षिहैं। इसी प्रकार घग्घर नदी सूख जाने का काल अभी तक उचित रूप से निर्धारित नहीं किया जा सका है।

11.4 बर्बर आक्रमण

व्हीलर का मत है कि हड़प्पा-सभ्यता आक्रमणकारी आर्यों ने नष्ट की थी। जैसा पहले बताया जा चुका है, मोहनजोदड़ो में आवास के अन्तिम चरणों में जनसंहार के साक्ष्य मिलते हैं। सड़कों पर मानव कंकाल पड़े मिले हैं। ऋग्वेद में इनके स्थानों पर दासों और दस्युओं के किलों का उल्लेख मिलता है। वैदिक देवता इन्द्र को पुरन्दर कहा जाता है, जिसका अर्थ है “किलों को नष्ट रने वाला” | ऋग्वेद कालीन आर्यों के आवास के भौगोलिक क्षेत्र में पंजाब तथा घग्घर-हाकड़ा क्षेत्र शामिल थे। चूंकि इस ऐतिहासिक चरण में किसी अन्य संस्कृति समूहों के किले होने के कोई कारण अवशेष नहीं मिलते। व्हीलर का मत है कि ऋग्वेद में जिसका उल्लेख है वे हड़प्पा के नगर ही हैं। वस्तुतः ऋग्वेद में एक स्थान का उल्लेख है जिसे हरियूपिया कहा गया है। यह स्थान रावी दी के तट पर अवस्थित था। आर्यों ने यहाँ एक युद्ध लड़ा था। इस स्थान के नाम से हड़प्पा नाम लगता है। इन साक्ष्यों से व्हीलर ने प्राचीनतम काल निष्कर्ष निकाला कि हड़प्पा के शहरों को नष्ट करने वाले आर्य आक्रमणकारी ही थे। 

यह सिद्धांत आकर्षक तो है, पर अनेक सिद्धांतों को मान्य नहीं है। उनका कहना है कि हड़प्पा-सभ्यता के हास का अनुमानित समय 1800 बी.सी.ई. माना जाता है। पर इसके विपरीत आर्य यहाँ लगभग 1500 बी.सी.ई. से पहले आए नहीं माने जाते। जानकारी की आज की स्थिति के अनुसार दोनों में से किसी भी समय को बदलना कठिन है और इसलिए संभावना यही है कि हड़प्पा निवासियों और आर्यों का कभी एक दूसरे से मिलन नहीं हुआ। साथ ही, न तो मोहनजोदड़ो में और न ही हड़प्पा में किसी सैन्य आक्रमण के साक्ष्य मिले हैं। सड़कों पर मनुष्यों के शव पड़े मिलने का साक्ष्य महत्वपूर्ण है। बहरहाल बड़े शहरों का तो पहले से ही अपकर्ष हो रहा था। इसके लिए आक्रमण प्राक्कल्पना उचित स्पष्टीकरण नहीं हो सकता। 

12 पारिस्थितिक असंतुलन : क्रमिक हास की परिकल्पना 

फेयरसर्विस जैसे विद्वानों ने हड़प्पा-सभ्यता का हास पारिस्थितिकी की समस्याओं के रूप में स्पष्ट करने का प्रयास किया है। उसने हड़प्पा नगरों की आबादी की गणना की है और नगर निवासियों की खाद्य जरूरतों का हिसाब लगाया है। उसने गणना की है कि इन क्षेत्रों में ग्राम निवासी अपनी उपज की लगभग 80 प्रतिशत खपत स्वयं करते हैं और लगभग 20 प्रतिशत बाजार में बिकने के लिए बचती है। यदि कृषि का यही प्रतिमान पहले भी विद्यमान रहा होता तो मोहनजोदड़ो जैसे नगर को, जिसकी आबादी लगभग 35 हज़ार थी, खाद्यान्न उगाने के लिए बहुत बड़ी संख्या में ग्राम निवासियों की आवश्यकता थीं। फेयरसर्विस की गणना के अनुसार इन अर्ध शुष्क क्षेत्रों में नाजुक पारिस्थितिक संतुलन इसलिए बिगड़ रहा था क्योंकि इन क्षेत्रों में मनुष्यों और मवेशियों की आबादी अपर्याप्त जंगलों, खाद्यान्न और ईंधन के प्रांतों को तेजी से समाप्त कर रही थी। हड़प्पा के नगर निवासियों, किसानों और पशुचारकों की सम्मिलित आवश्यकताएँ इन क्षेत्रों में सीमित उत्पादन क्षमताओं से अधिक थी। इसलिए मनुष्यों और पशुओं की बढ़ती हुई आबादी के कारण जिसे अपर्याप्त स्रोतों का सामना करना पड़ रहा था, प्रकृति की छटा मद्धम पड़ने लगी। 

जंगल और घास के मैदान धीरे-धीरे लुप्त होते जाने के कारण अब अधिक बाढ़ आ रही थी और अधिक सूखा पड़ रहा था। जीविका के इस आधार के नष्ट हो जाने के कारण इस सभ्यता की समस्त अर्थव्यवस्था पर बहुत दबाव पड़ा। लगता है कि धीरे-धीरे लोग उन क्षेत्रों में बसने के लिए जाने लगे जहाँ जीविका की बेहतर संभावनाएँ थी। यही कारण है कि हड़प्पा समुदाय सिंधु से दूर गुजरात औपूर्वी क्षेत्रों की ओर चले गए

अब तक जिन सिद्धांतों पर चर्चा हुई है, उन सभी में से फेयरसर्विस का सिद्धांत सर्वाधिक युक्ति-युक्त लगता है। संभवतः नगर नियोजन और जीवन स्तर में क्रमिक ह्रास हड़प्पा निवासियों का जीविका आधार समाप्त हो जाने के कारण था। हास की प्रक्रिया आस पास के समुदायों के आक्रमणों और छापों से पूरी हुई। तथापि पर्यावरण संकट के सिद्धांत में भी कुछ समस्याएँ हैं। 

  • भारतीय उपमहाद्वीप की भूमि की उर्वरता बाद के सहस्त्राब्दों तक बनी रही, इससे इस क्षेत्र में भूमि की क्षमता समाप्त होने की प्राक्कल्पना उचित सिद्ध नहीं होती।
  • साथ ही हड़प्पा निवासियों की जरूरतों की गणना अल्प सूचनाओं पर आधारित है और हड़प्पा निवासियों की जीविका संबंधी अपेक्षाओं की गणना करने के लिए काफी अधिक और सूचना अपेक्षित है।

इस प्रकार हड़प्पा निवासियों की आवश्यकताओं के बारे में अल्प अपर्याप्त सूचना पर आधारित गणना तब तक मात्र प्राक्कल्पना ही रहेगी जब तक आप इसके पक्ष में और अधिक साक्ष्य नहीं जुटाए जा सकेंगे।

हड़प्पा-सभ्यता के आविर्भाव में नगरों कस्बों और गाँवों, शासकों, किसानों और खानाबदोशों के बीच संबंधों का नाजुक संतुलन था। उनके पड़ौस के क्षेत्रों में उन समुदायों से भी दुर्लभ लेकिन महत्वपूर्ण संबंध थे। इसी प्रकार, उनका समकालीन सभ्यताओं और संस्कृतियों से भी संपर्क बना हुआ था। इसके अतिरिक्त, हमें प्रकृति से संबंध के लिए पारिस्थितिक घटक पर भी विचार करना होगा। संबंध की इन शृंखलाओं की कोई भी कड़ी टूटने से नगरों के हास का पथ प्रशस्त हो सकता था

13. परम्परा बाद में भी जीवित रही। 

सिंधु-सभ्यता का अध्ययन करने वाले विद्वान अब इसके हास के कारण नहीं खोजते। इसका कारण है कि जिन विद्वानों ने हड़प्पा-सभ्यता का अध्ययन 1960 के दशक तक किया था, उनका मत था कि सभ्यता का अंत अचानक हुआ। इन विद्वानों ने अपना कार्य नगरों, नगर नियोजन और बड़ी संरचनाओं के अध्ययनों पर ही केंद्रित किया। ऐसी समस्याएँ, जैसे हड़प्पा नगरों के समकालीन गाँवों से संबंध और हड़प्पा सभ्यता के विभिन्न तत्वों की निरन्तरता से अनदेखी कर दी गई। इस प्रकार हड़प्पा-सभ्यता के ह्रास के कारणों के संबंध में वाद-विवाद अधिक से अधिक अमूर्त बनता गया। 1960 के दशक के अन्तिम चरण में जाकर ही मलिक और पोशैल जैसे विद्वानों ने अपना ध्यान हड़प्पा परम्परा की निरन्तरता के विभिन्न पहलुओं पर केंद्रित किया। इन अध्ययनों के परिणाम हड़प्पा-सभ्यता के हास के कारणों की अपेक्षा कहीं अधिक उत्तेजक निकला है। यह सत्य है कि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो को उनके निवासी खाली कर गए थे और नगर चरण समाप्त हो गया था। तथापि यदि हम हड़पपा सभ्यता के सम्पूर्ण भौगोलिक प्रसार के परिप्रेक्ष्य में देखें तो काफी वस्तुएँ उसी पुरानी शैली में चलती दिखाई देंगी।

पुरातात्विक दृष्टि से कुछ परिवर्तन ध्यान देने योग्य हैं। कुछ बस्तियाँ तो खाली कर दी गई पर अधिकतर और बस्तियों में रिहाइश जारी रही। तथापि, एकरूप लेखन, मुहर बाँट औमिट्टी के बर्तनों की परम्परा समाप्त हो गई। दूर-दराज की बस्तियों के बीच घनिष्ठ अंतःक्रिया सूचक वस्तुएँ नष्ट हो गईं। अन्य शब्दों में नगर केंद्रित अर्थव्यवस्थाओं से संबंधित कार्यकलाप समाप्त हो गए। इस प्रकार जो परिवर्तन आए वे केवल नगर चरण की समाप्ति के ही सूचक थे। छोटे-छोटे गाँव और कस्बे तब भी बने रहे और इन स्थानों की पुरातात्विक खोजों में हड़प्पासभ्यता के अनेक तत्व मिले हैं।

सिंध में अधिकतर स्थानों में मृदभांड परम्परा में कोई अंतर दिखाई नहीं पड़तावस्तुतः गुजरात, राजस्थान और हरियाणा क्षेत्र के बाद के कालों में प्रवासी कृषि समुदायों का बहुत बड़ी संख्या में आविर्भाव हुआ। इस प्रकार क्षेत्रीय परिप्रेक्ष्य में नगर चरण के बाद का काल समृद्ध गाँवों का काल था। जिसमें नगर चरण के मुकाबले कहीं अधिक गाँव थे। यही कारण है कि विद्वान आज सांस्कृतिक परिवर्तन, क्षेत्रीय प्रवासन और बसने और जीविका के तंत्र में रूपान्तरण जैसे विषयों पर चर्चा करते हैंतथापि कोई भी प्रारंभिक मध्यकालीन भारत में प्राचीन भारतीय सभ्यता नष्ट होने के बारे में बात नहीं करता जबकि गंगा घाटी के अधिकतर नगरों का ह्रास हुआ था। आइए देखें नगर चरण की समाप्ति के बाद भी किस प्रकार के पुरातात्विक अवशेष विद्यमान थे

13.1 सिंध

सिंध में, आमरी और चान्हुदाड़ों, झूकर जैसे हड़प्पा कस्बों में लोग ऐसे ही रहते रहे जैसे पहले रहते थे। वे अब भी ईंटों के मकानों में रहते थे पर उन्होंने सुनियोजित विन्यास त्याग दिया था। वे मामूली भिन्न मृद्भांड उपयोग में ला रहे थे जिसे झूकर मृद्भांड कहा जाता था। यह पांडुभांड थे जिनमें लाल पट्टी थी और काले रंग में चित्रकारी थी। हाल ही के अध्ययनों से पता चला है कि यह ‘विकसित हड़प्पा’ मृद्भांड से विरासत किए गए थे और इसलिए इसे कोई नई चीज नहीं माना जाना चाहिए। झूकर में कुछ विशिष्ट धातु की वस्तुएँ मिली हैं जो ईरान के साथ व्यापार संबंधों की सूचक हो सकती हैं और इससे अधिक इस बात की भी संभावना प्रदर्शित करती है कि ईरानी अथवा मध्य एशिया प्रभावों वाले प्रवासियों का बड़ी संख्या में आगमन हुआ। दंड विवर, कुल्हाड़ियाँ, और तांबे की पिनें, जिनके सिरे कुडलाकार अथवा अलंकृत थे, जैसी यहाँ मिली हैं वैसी ईरानी बस्तियों में भी मिली हैं। पत्थर अथवा प्रकाशित वस्तु की गोलाकार मुहरें और कांस्य प्रसाधन जार सिंधु के पश्चिम की संस्कृतियों से संपर्क के सूचक हैं।

13.2 भारत-ईरानी सीमांत प्रदेश

सिंधु नदी के पश्चिम के क्षेत्र बलूचिस्तान और भारत-ईरानी सीमांत प्रदेश में भी उन लोगों के रहने के प्रमाण मिले हैं जो ठप्पेदार ताम्र मुहरे और ताम्र दंड विवर कुल्हाड़ियाँ इस्तेमाल करते थे। शाही टम्प मुंडीगाक, नौ शहरों और पीरक जैसे स्थलों पर लोगों के ईरान से आवागमन और सम्पर्कों के प्रमाण मिले हैं। दुर्भाग्यवश हम बस्तियों का काल निर्धारण अभी तक स्पष्ट रूप में नहीं किया जा सका है।

13.3 पंजाब, हरियाणा और राजस्थान

पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के क्षेत्रों में ऐसी अनेक बस्तियों की सूचना मिली है जहाँ नगरों के हास के बाद भी लोग उसी पुराने तरीके से रहते आ रहे थे। तथापि, मृद्भांड परम्परा पर हड़प्पा-सभ्यता के प्रभाव धीरे-धीरे क्षीण हो रहे थे और स्थानीय मृद्भांड परम्पराओं ने हड़प्पा मृद्भाण्ड परम्परा का पूरी तरह स्थान ले लिया। इस प्रकार, इन क्षेत्रों में प्रादेशिक परम्पराओं के अक्षुण्ण बने रहने से नगर रूप का ह्रास प्रतिबिम्बित होता है। मीताथल, रोपड़ और सीसवाल के स्थल सुप्रसिद्ध हैं। बाड़ा और सीसवाल में ईंटों के मकान मिले थे। इनमें से कई स्थलों में गैरिक मृद्भांड मिले हैं। प्राचीन भारत में अनेक प्रारंभिक ऐतिहासिक स्थलों में ऐसे मृभांड मिले हैं इसलिए पंजाब, हरियाणा और राजस्थान की ये ग्राम्य संस्कृतियाँ परवर्ती हड़प्पा परम्परा से संबद्ध हैं और प्रारंभिक भारतीय परम्परा का पूर्व ज्ञान कराती हैं। इन पर परवर्ती हड़प्पा प्रभाव अल्प मात्रा में दिखाई देते हैं। यह केंद्र भारतीय सभ्यता के बाद के चरण का केंद्र बिन्दु बना। 

13.4 कच्छ और सौराष्ट्र

कच्छ और सौराष्ट्र में नगर चरण का अंत रंगपुर और सोमनाथ जैसे स्थानों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। नगर चरण में भी उनकी हड़प्पा मृभांड परम्परा के सह अस्तित्व में स्थानीय मृद्भाण्ड परम्परा थी। यह परम्परा बाद के चरणों में भी बनी रही। रंगपुर जैसे कुछ स्थल बाद के काल में अधिक समृद्ध हो गए प्रतीत होते हैं। वे जिन मृद्भांडों का उपयोग करते थे उन्हें “चमकीले लाल भांड” कहा जाता है तथापि लोगों ने दूरस्थ क्षेत्रों से आयातित औज़ार तथा सिंधु कालीन बाट और लिपी का उपयोग बंद कर दिया। अब वे स्थानीय रूप से उपलब्ध पत्थरों से बने पत्थरों के औज़ार काम में ला रहे थे। 

“विकसिहड़प्पा” चरण में गुजरात में 13 बस्तियाँ थीं। परवर्ती हड़प्पा चरण में जिसका काल लगभग 2100 बी.सी.ई. है, बस्तियों की संख्या 200 या इससे और अधिक तक पहुंच गई। बस्तियों की संख्या में यह वृद्धि जो जनसंख्या की वृद्धि की द्योतक है, केवल जैविक कारणों से ही नहीं हुई थी। पूर्व आधुनिक समाजों में जनसंख्या कुछ ही पीढ़ियों में इतनी अधिक नहीं बढ़ सकती थी कि 13 बस्तियाँ बढ़कर 200 या और अधिक हो जाएँ। इस प्रकार इस बाकी निश्चित संभावना है कि इन नई बस्तियों में रहने वाले लोग अन्य क्षेत्रों से आए होंगे। परवर्ती हड़पपा बस्तियाँ महाराष्ट्र में भी बताई गई हैं जहाँ उनकी संस्कृति उभरने वाले कृषि समुदायों की संस्कृतियों में विलीन हो गई। 

14. हड़प्पा परम्परा का प्रसार 

नगरों की समाप्ति का यह अर्थ नहीं था कि हड़प्पा समुदाय आसपास के कृषि समूहों में विलीन हो गए। तथापि व्यवस्था और अर्थव्यवसथा में केंद्रीय निर्णायन कार्य समाप्त हो गया था। जो हड़प्पा समुदाय नगर चरण के बाद भी बने रहे, उन्होंने अवश्य ही अपनी पुरानी परम्पराओं को बनाए रखा होगा। इस बात की संभावना है कि हड़प्पा निवासी किसानों ने अपनी पूजा का रूप बनाए रखा होगा। हड़प्पा नगर केंद्रों के पुरोहित अत्यन्त संगठित शिक्षित परम्परा के अंग थे। साक्षरता समाप्त हो गई थी, ब भी संभावना है, उन्होंने अपनी धार्मिक प्रथाएँ बनाए रखी होंगी। बाद के प्रारंभिक ऐतिहासिक काल के प्रभावी समुदाय ने अपने आप को “आर्य’ कहा। संभवतः हड़प्पा निवासियों के पुरोहित समूह आर्यों के शासक समूहों के साथ घुल-मिल गए। इस प्रकार हड़प्पा कालीन धार्मिक परम्पराओं का ऐतिहासिक भारत में प्रसार हुआ। लोक समुदायों ने दस्तकारी की अपनी परम्पराएँ भी बनाए रखी, जो मृभांड और औज़ार निर्माण परम्पराओं से स्पष्ट होता है। इस बार फिर जब शिक्षित नगरीय संस्कृति प्रारंभिक भारत में उदय हुई। उसने लोक संस्कृतियों के मूल तत्व समाविष्ट कर दिए। इससे हड़प्पा परम्परा के प्रसार का अधिक कारगर माध्यम मिला।

15. हड़प्पा-सभ्यता के अवशेष

लोथल जल निकास प्रणाली

पशुपति (शिव) और मातृ देवी की उपासना और लिंग पूजा हम तक संभवतः हड़प्पा परम्पराओं से पहुँची है। इसी प्रकार पवित्र स्थानों, नदियों या वृक्षों या पवित्र पशुओं की उपासना स्पष्टतः भारत के बाद की ऐतिहासिक सभ्यता में भी जारी रही। कालीबंगन और लोथल में अग्नि पूजा बलि का साक्ष्य भी महत्वपूर्ण है। यह बौद्धिक धर्म के सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य बन गये। क्या आर्यों ने यह प्रथाएँ हड़प्पा के पुरोहित वर्ग से सीखी थीं? इस प्राक्कल्पना के लिए और अधिक साक्ष्य की आवश्यकता है, पर ऐसा होने की संभावना तो है ही।

मकानों के नक्शे, जल-आपूर्ति व्यवस्था और स्नान पर ध्यान जैसे घरेलू जीवन के अनेक पहलू इन बस्तियों में बाद के कालों में भी जारी रहे। भारत की पारम्परिक तोल और मुद्रा की प्रणाली जो इकाई के रूप में सोलह के अनुपात पर आधारित थी, हड़पपा सभ्यता काल में भी विद्यमान थी। ये उन्हीं से ली गई प्रतीत होती है। आधुनिक भारत में कुम्हार का चाक बनाने की प्रविधि हड़प्पावासियों द्वारा अपनाई गई प्रविधियों के समान ही है। आधुनिक भारत में इस्तेमाल की जाने वाली बैल गाड़ियों और नावें हड़प्पा के नगरों में भी विद्यमान थीं। अतः हम कह सकते हैं कि हड़प्पा-सभ्यता के अनेक तत्व परवर्ती ऐतिहासिक परम्परा में भी जीवित रहे।