तमिल भाषा और साहित्य का विकास 

इस पेज की पाठ्यक्रम

1 प्रस्तावना 2 प्रारम्भिक साक्ष्य 3 प्रेम और वीरता के काव्य 

3.1 वर्गीकरण 3.2 काव्य संगठन 3.3 समय निर्धारण की समस्या 3.4 काव्यशास्त्र 3.5 साहित्यिक विकास 

4 अन्य रचनायें 5 सारांश 6 शब्दावली 7 बोध प्रश्नों के उत्तर 8 संदर्भ ग्रंथ

1. प्रस्तावना 

आपने पिछले इकाई में पढ़ा कि किस प्रकार से तमिलाहम् में नई बस्तियों का विकास हुआ और कैसे कृषि का फैलाव एवं व्यापार की उन्नति हुई । व्यापार के कारण लोग बाहर से आकर बसते हैं और प्रदेश के अन्दर ही स्थानीय एवं बाह्य लोगों के बीच पारस्परिक संबंधों की प्रक्रिया के लिये अवसरों का प्रारंभ होता है। संस्कृतियों के पारस्परिक संबंधों की प्रक्रिया किसी क्षेत्र में भाषा एवं साहित्य के विकास में सहायता करती है। इस इकाई में आप तमिल भाषा एवं साहित्य के विकास की जानकारी प्राप्त करेंगे।

2. प्रारम्भिक साक्ष्य

लगभग 3वीं सदी बी.सी.ई. के आस-पास तमिल पूर्णतः साहित्यिक भाषा के रूमें विकसित हो चुकी थी, अर्थात् ऐसी भाषा के रूप में जिसकी अपनी स्वयं लिखने की एक प्रणाली थीतमिल साहित्यिक रंपरा अर्थात् तमिल भाषा में लेखन की रंपरा के संदर्भ में सबसे प्रारंभिक प्रमाण मदुरई की पहाड़ियों में बनी जैन एवं बौद्ध गुफाओं से प्राप्त तमिल ब्राह्मी के शिलालेख हैंये शिलालेख उन लोगों और संस्थाओं की पट्टिकाओं के रूप में हैं जिन्होंने इन गुफाओं को दान दिया। उनमें मुख्य अरिजापट्टी (मौथलम, मदुरई) कारूंगलाकूति (मैलूर, मदुरई), कौंगरपुलियाम्कूलम (मदुरई), अजकरमलई (मदुरई) हैं। इन लेखों में तमिल के ऐसे बहुत से शब्दों का प्रयोग हुआ है जिनको स्थानीय स्तर पर संस्कृत, प्राकृत या पालि भाषाओं से ग्रहण किया गया हैनिगम्ततोर (निगम का सदस्य) और वणिक(वह पुरुष जो वणिकम् / वणिगम् अर्थात् व्यापार में संलग्न है) शब्दों को उदाहरण के रूप में बताया जा सकता है कि इनको तमिल भाषा में संस्कृत से ग्रहण किया गया है। इसको भी भली-भाँति जान लेना चाहिए कि इन लेखों में जिस तमिल भाषा का प्रयोग किया गया है वह तमिल साहित्य की भाषा से काफी अलग प्रकार की है। यह अन्तर इसलिए आया क्योंकि उत्तर की ओर से देशान्तर करने वाले जैन एवं बौद्ध धर्मों के अनुयाइयों ने काफी बड़ी संख्या में संस्कृत और प्राकृत या पालि की उक्तियों का प्रयोग किया। इन उक्तियों को तमिल भाषा की भाष्य प्रणाली के अनुरूप ही ग्रहण किया गया। इन लेखों में जिस ढंग से व्यक्तियों, व्यावसायिकों एवं स्थानों के नामों का प्रयोग हुआ है उस से तमिल का साहित्यिक भाषा के रूप में सूत्राधार मिलता है। इन लेखों का लेखन काल सामान्यतः लगभग 200 बी.सी.ई. से 300 सी.ई. के मध्य का है। तमिल भाषा के वीर काव्यों की लोकप्रियता संगम साहित्य के नाम से है और यह साहित्य ही तमिल साहित्य की प्राचीनतम परम्परा का प्रमाण प्रस्तुत करता है। 

3. प्रेम और वीरता के काव्य

तमिल के वीर काव्यों को संगम साहित्य इसलिये कहा गया है क्योंकि इनको संम के द्वारा एकत्रित और वर्गीकृत किया गया। संम विद्धानों की एक संस्था थी। इन कविताओं की रचना स्वयं संगम के द्वारा नहीं की गई थी। वास्तव में ये कवितायें संम से अधिक पुरानी हैं। संगम का इतिहास किवदंतियों से भरा पड़ा है। परम्परा के अनुसार प्रारंभ में तीन संगम अस्तित्व में थे परन्तु अन्ततः उनमें से एक ही संम के द्वारा किये गये कार्य जीवित रह सके। पहले ऐसा विश्वास किया जाता था कि ये संगम दरबारी कवियों की संस्थायें थीं। परन्तु अब यह स्वीकृत तथ्य है कि वे साहित्यिक विद्धानों के द्वारा गठित की गई थीं। संगम और वीर काव्यों की रचना के मध्य समय-अंतराल है उसके कारण संम साहित्य मिथ्या नाम जैसा हो गया हैं। कुल मिलाकर तमिल वीर काव्य लोक कथाओं की उत्पत्ति था। ये भाट कवियों की परम्परा के महत्व को अभिव्यक्त करती है। ये भाट कवि अपने आश्रयदाता सरदारों की प्रशंसा में गाते हुए घूमते रहते थे। फिर भी, सभी काव्यात्मक रचनायें घूमक्कड़ भाट कवियों की रचना नहीं थीं। उनमें से कुछ की रचना विद्धान कवियों ने की थी जिन्होंने भाट कवियों की परंपरा का अनुकरण किया। कापिलर, पारानर, अव्वायऔर गौतमनार इस काल के जाने-पहचाने कवि थे। ये विद्धान भाट कवि थे और इनको साधारण भाट कवियों से अलग पुलावर के नाम से जाना जाता है। साधारण भाट कवियों को पनार कहा गया है। यह साहित्य किसी विशेष सामाजिक समूह या गुट से संबंधित नहीं है बल्कि साधारण जीवनयापन का एक भाग ही है। ये कवितायें कई शताब्दियों में फली फूलीं जिससे ऐसा लगता है कि तमिल भाषा एवं साहित्य का क्रमिक विकास हुआ। वे न केवल अपनी वास्तविक पहचान को कायम रखने में सफल हुई बल्कि वे वर्गीकृत काव्यसंग्रह या चुनिन्दा संग्रह का अभिन्न अंग बन गई। 

3.1 र्गीकरण

अब हम वर्गीकृत काव्य संग्रहों से कुछ विशेष काव्यात्मक शीर्षकों एवं परिपाटियों से प्राप्त की गई कविताओं को देखेंगे। एटूतोगै अर्थात् कविताओं के आठ संग्रह और पत्तुप्पाटू अर्थात् दस काव्य संग्रह-ऐसे काव्य संग्रहों की दो श्रेणियां हैं जिनमें वीर गाथा काव्यों का वर्णन है। एटूतोगै के अन्तर्गत नट्रिनाइ, कुरून्तौकाइ, ऐन्कुरूनुरू, पातिरूप्पडू आदि काव्य संग्रहों के समूह हैं। उदाहरणार्थ, मूल्लैप्पाटू, मदूकिक्कंज, कुरून्जीप्पहू आदि काव्य संग्रह पट्ट्पट्ट के अन्तर्गत हैं। काव्य संग्रहों को अकम में विभाजित किया गया है। इसके अन्तर्गत व्यक्तिनिष्ठ प्यार या प्रेम जैस विषयों का वर्णन है और पुरम के अन्तर्गत वस्तुनिष्ठ जैसे लूट और सर्वनाश विषयों का वर्णन हुआ है। काव्य संग्रहों की इन श्रेणियों में अकम और पुरम जैसे शीर्षकों पर कवितायें हैं। अकनानूरू काव्य ग्रंथ में अकम शीर्षक पर लिखी गई चार सौ कवितायें है और पुरानानुरू काव्य संग्रह में पुरम शीर्षक पर आधारित कवितायें हैं और ये दोनों एटूतौगे श्रेणी में ही आते हैं। इसी भांति दोनों अकम और पुरम काव्य संग्रह पत्तू पत्तू श्रेणी में आते हैं। वीर काव्य ग्रंथों के अलावा संम साहित्य के वर्गीकृत ग्रंथों के अन्तर्गत तमिल व्याकरण का ग्रंथ तोल्काप्पियम और 18 धर्मोपदेशों के वर्णन से परिपूर्ण ग्रंथ तिनेन्कीश्कणक्कू भी आता है। तिरूक्कुरल द्वारा रचित सुप्रसिद्ध तिरूक्कूरल इन 18 धर्मोपदेशों में से एक हैं। तोल्काप्पियम और पतिनेन्कीश्कणक्कू दोनों की रचना एटूतौगे और पत्तू पत्तू काव्यों के संकलन के बाद हुई। वीर काव्य संग्रहों के संकलन की तकनीकी एवं शैली बाद में की जाने वाली रचनाओं से विशिष्ट प्रकार का अन्तर रखती हैं। 

3.2 काव्य संगठन 

वीर काव्यों का संकलन मौखिक भासाहित्य के सिद्धान्तों के आधार पर किया गया। मौखिक संकलन की विशेषतायों सारे विश्व में लगभग एक जैसी हैं। भरपूर मुहावरों तथा अभिव्यक्तियों का प्रयोग मुख्य विशेषता है। इनमें उन्हीं मुहावरों एवं अभिव्यक्तियों का प्रयोग किया जाता है जो उन सामान्य जनों के मध्य प्रचलित थे। कवि लोग इनकी स्वाभाविक अभिव्यक्ति को जानते थे और वे यह भी जानते थे कि इनका कहां एवं कैसे अपनी कविता में उपयोग किया जाये। कविताओं के संकलन में मूल भावों एवं स्वाभाविक अभिव्यक्तियों का प्रयोग इस प्रकार किया गया है कि उनको मौखिक रूप से प्रसारित किया जा सके और उनमें सामान्य रूप से भाट कवियों के साथ-साथ समाज की भागीदारी भी स्पष्ट हो सके। कविताओं में घटित होने वाले विभिन्न संदर्भो की अभिव्यक्तियों को व्यक्त करने के लिये काव्यात्मक बनाने की आवश्यकता होती थी। उदाहरण के लिये, यदि किसी सरदार की प्रशंसा करनी होती थी तो उसकी प्रशंसा के लिये “मालाधारी विजेताओं का योद्धा’, “गौरवशाली रथों का स्वामी”, “तेज दौड़ने वाले अश्वों का सरदार”, “आंखों को रसिक लगने वाला योद्धा” जैसे काव्यात्मक शब्दों का प्रयोग बिना किसी रूकावट के किया जाता था फिर चाहे कोई भी कवि या सरदार रहा हो। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि भाट कवि कृत्रिम अभिव्यक्तियों एवं उनके संदर्भो के प्रयोग में दक्ष थे। इसका अभिप्राय यह नहीं है कि हम उनकी काव्यात्मक प्रतिभा को कम करके देखना चाहते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि कवियों की व्यक्तिगत शैली एवं अभिव्यक्ति का कोई विशेष महत्व नहीं है। मौखिक कविता में छंद रचनाओं की तकनीकी साधारण शैली एवं अभिव्यक्तियों पर निर्भर करती थी। यह संकलन की एक ऐसी तकनीकी थी जिसमें ऐसे मुहावरों का प्रयोग होता था जिन पर न केवल कवियों की बल्कि समाज की भी सामान्य तौर पर पकड़ होती थी। इसलिये बार-बार ऐसी पंक्तियों एवं शीर्षकों का वर्णन आया है जिनका उदार परिवर्तन के साथ अनेक कवियों ने विभिन्न काव्यों में प्रयोग किया। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को किवदंतियां सुनाने की प्रक्रिया द्वारा वीर कवितायें पुरानी यादगारों से भरी हुई थीं। जिसके कारण इन कविताओं की रचना समय का निर्धारण करने में कठिनाई होती है। 

3.3 समय निर्धारण की समस्या

संगम साहित्य के ग्रंथों में वर्णित श्रेणीबद्ध समस्याओं से इनके रचना समय को निश्चित रूप से नहीं बताया जा सकता। ग्रंथों की कवितायें वास्तव में भिन्न-भिन्न कालों का प्रतिनिधित्व करती हैं। इन काव्यों के वास्तविक संकलन एवं मौखिक प्रसारण में 2वीं सदी बी.सी.ई. से 3वीं सदी सी.ई. के बीच की कई शताब्दियों का समय है। इनका काव्य संग्रहों के रूप में संकलन 6वीं सदी सी.ई. से 9वीं सदी सी.. के मध्य में हुआ। इनकी समीक्षाओं का काल भी 1314वीं दी सी.ई. से पूर्व का नहीं है। तोकापियजो परम्परागत व्याकरण निबन्ध है अपने वर्तमान रूप में 3वीं सदी सी.ई. से पूर्व का नहीं है यद्यपि इसके कुछ आधारभूत भाग कुछ थोड़े से पहले के हो सकते हैंकिजखानाक्कू के सभी ग्रंथ 3वीं सदी सी.. के बाद वाले समय के हैं। संगम साहित्य का समय निर्धारण करने में सबसे बड़ी समस्या यह है कि उसके प्रारंभिक व बाद के स्वरूप को निश्चित करना कठिन है क्योंकि ये सब एक दूसरे में घुल-मिल गये हैं।

3.4 काव्यशास्त्र 

संगम साहित्य के आधार पर कुछ स्वस्थ विकसित काव्यात्मक परम्पराओं का विकास हुआ। यद्यपि काव्यात्मक परम्पराओं का विकास कुछ बाद की शताब्दियों में हुआ परन्तु संकलन के नियम एवं आचार विधियां तमिल भाट काव्य की पुरानी परंपराओं का ही भाग थींपारम्परिक तमिल काव्य की दो मूलभूत विशेषताओं को अकम एवं पुरम नामक काव्य शैलियों में विभाजित किया गया है। इस इकाई के पहले भाग में ही हम अकम एवं पुरम काव्यों के विषय में बता चुके हैं। पांच तिनइ के संबंध में अकम को प्रेम के पांच उपभागों में विभाजित किया गया है प्रत्येक तिनइ एक विशेष प्रकार की प्रेम मुद्रा से संबंधित हैं। उदाहरणार्थ, पालै प्रेमियों के बिछुड़ने की भावना से संबंधित है। पुरम काव्य की कविताओं में अपने स्वरूप तिनइ (स्थितियों तथा दृश्यों) एवं संदर्भो का वर्णन है। इसमें नौ दृश्यों और 63 संदर्भो का वर्णन है जिनको कवि संकलन के लिये ग्रहण कर सके। अकम एवं पुरम काव्य संग्रहों की कविताओं में प्रत्येक की निश्चित परम्पराओं का अनुसरण किया गया। प्रत्येक अकम कविता में तिनइ के ऐसे भाव का अनुसरण किया गया था जिसके स्वयं अपने देवता, जीव, प्राणी, जीवनयापन के तरीके, संगीत यंत्र एवं गीत होते थे। इसी भांति प्रत्येक पुरम काव्य में ऐसे प्रतिबंधों का अनुसरण किया गया है जो तिनइ अर्थात् दृश्यों और व्यवहार की विविधता से जुड़े थे।

3.5 साहित्यिक विकास 

मिल साहित्य परम्परा भारत के शास्त्रीय संस्कृत साहित्यिक परम्परा से स्वतंत्र है। यह संस्कृत भाषा के समानांतर ही भाषायी परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है। लेकिन इसके बावजूद भी तमिल भाषा एवं साहित्य के विकास की प्रक्रिया का प्रवाह कभी भी अलगाव की अवस्था में नहीं हुआ। तमिल साहित्य की प्रारंभिक रचनाओं पर भी संस्कृत का प्रभाव है। वीर काव्यों एवं संगम साहित्य की अन्य रचनाओं में आर्य संस्कृति के विषय का वर्णन है। यहां पर आर्य संस्कृति से हमारा तात्पर्य वैदिक काल के विचारों तथा संस्थाओं से है। वैदिक अनुष्ठानों की परम्परा को भी इन कविताओं के द्वारा प्रमाणित किया गया है। गौतमानर, पाशनर और कपिला जैसे कुछ भाट कवि ब्राह्मण थे। कवि गौतमानर को इसलिये उद्धृत किया गया है कि उसने अपने आश्रयदाता चेसरदाचेलकेजू कुत्तून का भाग्य परिवर्तन करने के लिए बहुत से यज्ञ या वैदिक बलि सम्पन्न किए। तमिल वीर काव्य में महाकाव्यात्मक एवं पौराणिक विचारों को भी पाया गया है। जहां एक ओर संरक्षक सरदारों की प्रशंसा में कवितायें लिखी गई वहां दूसरी ओर महाभारत के युद्ध में उनकी भूमिका का भी वर्णन किया गया है। बहुत से पौराणिक देवी-देवताओं की तुलना तमिल देवी-देवताओं के साथ की गई है। तमिल कविताओं में मैयों (काला देवता) को कृष्ण के समान ही माना गया है। तमिल साहित्य की कठोर परम्परा के बावजूद भी इन प्रभावों को कम करके कभी भी नहीं देखा गया। तमिल साहित्य एवं भाषा का मूल पक्ष उद्भव के लिये संस्कृत का ऋणी नहीं है। परन्तु इसके पूर्ण भाषायी एवं साहित्यिक रूप में बढ़ने एवं विकसित होने में आर्य संस्कृति के प्रभाव ने अनुगृहित किया। वीर कवितायें और प्रेम एवं संगम परंपरा की कुछ रचनायें प्रारंभिक तमिल क्षेत्र की व्यापक साहित्यिक संस्कृति की ही पुष्टि करती हैं। 3वीं सदी सी.ई. तमिलों ने जो भाषायी परिपक्वता प्राप्त की वह उसकी ओर भी इशारा करती है। 

4. अन्य रचनायें

तोल्काप्पियके मूल भाग में किजम्वाक्कू कुछ भाग यहां दूसरी रचनाओं को बनाते हैंइनको दूसरी रचनायें कहा गया है क्योंकि ये वीर काव्य की भाट परंपराओं से संबंधित नहीं हैं। परन्तु भाट काव्य की परंपरा की साहित्यिक पृष्ठभूमि से ये बहुत अलग भी नहीं हैं। तोल्काप्पियम के भाग प्रोरूलदिकरम में पुराने तमिल अकम और पुरम की परंपराओं का जो वर्णन हुआ है वह वीर काव्यों की रचना काल के काफी नजदीक हैइसी प्रकार से तिनइ ग्रंथों एवं रचनाओं जैसे कि कालवाजि अपेक्षाकृत कुछ पहले के हैं। यद्यपि कुछ विद्धानों का मानना है कि सिप्पदिकारम एवं मणिमेकलैं दोनों महाकाव्य वीर काव्यों के समकालीन हैं लेकिन इन दोनों को काफी बाद की रचना माना गया है