उत्तर-गुप्त काल में अर्थव्यवस्था और समाज

1. प्रस्तावना 2. र्थव्यवस्था 2.1. व्यापार का हास 2.2. सिक्कों की कमी 2.3. नगरों का हास 3. कृषि संरचना 4. कृषि संबंध 4.1. किसानों के दायित्व 4.2. सामंतीय भू-व्यवस्था 4.3. परिबद्ध अर्थव्यवस्था का विकास 5. सामाजिक संरचना 5.1. ज़मींदार और किसान 5.2. जातियों की संवृद्धि 5.3. कायस्थों का विकास 5.4. अछूत 5.5. दस्तकारी और जातियां 6. वैश्यों का ह्रास और शूद्रों के सामाजिक स्तर में बढ़ोतरी 7. महिलाओं की स्थिति

इस इकाई में हमारा उद्देश्य है आपका परिचय उत्तर-गुप्त काल में होने वाले आर्थिक व सामाजिक परिवर्तनों से कराना। इस पेज को पढ़ने के बाद आपकोः 

  • भूमि अनुदानों की उत्पत्ति एवं आर्थिक परिणामों की जानकारी प्राप्त होगी
  • नगरों और अन्य नगरीय बस्तियों के क्रमिक पतन की प्रक्रिया एवं परिणामों के विषमें जानकारी होगी;
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था व कृषि उत्पादन की विशेषताओं के बारे में जानकारी होगी;
  • वर्ण पदानुक्रम में संशोधन के कारणों, नई जातियों का उदय; और समाज में महिलाओं की स्थिति के बारे में जानकारी होगी।

1. प्रस्तावना 

उत्तरगुप्त काल में भारतीय अर्थव्यवस्था में हुए कुछ निश्चित परिवर्तन हुये थे।

1) गुप्तकाल के बाद के नगर (जैसे कि तक्षशिला, कौशाम्बी, पाटलिपुत्र) प्रायः लुप्त हो गए। शहरी बस्तियों का यह हास कोई अपवाद नहीं था बल्कि ऐसा मालूम पड़ता है कि यह एक सामान्य विशेषता थी।

2) बहुसे कारणों से व्यापारिक गतिविधियों को भी धक्का लगा और उनकी गति भी मंद पड़ गई। इसकी पुष्टि शायद इस तथ्य से भी होती है कि इस समय में पहले की अपेक्षाकृत सिक्कों का निर्माण एवं जारी होना बहुसीमित स्तर पर हो गया। 

इस पर ध्यान केन्द्रित किया जाना चाहिए कि ये परिवर्तन गुप्त काल में ही प्रारंभ हो चुके थे। यह मुख्य रूप से एक कृषि अर्थव्यवस्था थी। भूमि-अनुदान, व्यापार का हास, वाणिज्य और नगरीय जीवन, धन की कमी, कृषि का प्रसार और समाज का बढ़ता कृषि चरित्र; उत्पादन और उपभोग की अपेक्षाकृत बंद स्थानीय इकाइयाँ स अर्थव्यवस्था की विशेषतायें थी। इस आधार पर एसे समाज का ढांचा विकसित हुआ जिसके अंतर्गत मुख्य रूप से काफ़ी बड़ी संख्या में शासक कुलीन ज़मींदा, बिचौलिए और बहु-संख्यक किसान थे। नये सामाजिक गुटों का विकास हुआ। नई जातियों की उत्पत्ति एवं संवृद्धि, जाति संबंधों का कठोर होना और कबीले के द्वारा ब्राह्मणिक संस्कृति को अपनाना नये परिवर्तन थे। एक जटिल समाज का उद्भव हुआ जिसमें सामाजिक विभेद का प्रतिनिधित्व किसानों, दस्तकारों, व्यापारियों, शासकों आदि वैसे विभिन्न समूहों द्वारा किया जाता था। 

2. अर्थव्यवस्था

इन परिवर्तनों की व्याख्या कौन कैसे करता है? कुछ इतिहासकारों का अनुमान है कि इस विकास की प्रक्रिया में भूमि-अनुदानों की प्रथा निर्णायक तत्व थी। भूमि-अनुदानों की संख्या में वृद्धि गुप्त तथा विशेषकर उत्तरगुप्तकाल में हुई तथा सम्पूर्ण देश में इसका प्रसार हो गया। भूमिअनुदानों को राजाओं, सरकारों, राज्य परिवार के सदस्यों और उनके सामंतों द्वारा, ब्राह्मणों और मंदिर जैसी धार्मिक संस्थानों एवं मठों को व्यापक स्तर पर किया जाता था। पांचवी शताब्दी सी.ई. से न केवल इन भूमि-अनुदान प्राप्तकताओं को भू-राजस्व (लगान) वसूल करने का अधिकार मिल गया अपितु इन क्षेत्रों में स्थित खानों से प्राप्त होने वाले खनिज पदार्थों को भी उनके अधीन कर दिया गया। दान की गई भूमि, गांव और गांवों को राजकीय अधिकारियों एवं सिपाहियों के हस्तक्षेप से मुक्त कर दिया गया । अंततः राजाओं और राजकुमारों ने इन अनुदान ग्रहीत ब्राह्मणों को यह अधिकार भी दिये कि वे उन सभी अपराधों के लिए दण्ड दे सकते थे जो परिवार, व्यक्तिगत सम्पति और व्यक्ति विशेष के विरूद्ध किए गए हों तथा यहां तक कि उनको आर्थिक दण्ड देने और इसको प्राप्त करने का भी विशेष अधिकार दिया गया। 

समकालीन धर्मशास्त्रों के साहित्य में यह अनुमोदन किया गया है कि राज्य के अधिकारियों को वेतन के बदले भूमि-अनुदान या भू-राजस्व को एकत्रित करने का अधिकार दिया जा सकता था। 

अन्य बातों के साथ-साथ, भूमि-अनुदानों की यह प्रक्रिया भूमि पर अधिकारों के प्रश्न, किसान का आर्थिक सामाजिक परिस्थितियों, नगरों में दस्तकारों तथा व्यापारियों के स्वतंत्र संगठके अधिकार और बंद अर्थव्यवस्था के उदय का एक अभिप्राय थी। 

किसानों, कारीगरों और व्यापारियों को उनकी बस्तियों के साथ जोड़ देने तथा उनकी गतिविधियों पर विभिन्न प्रतिबंधों को लगा देने से एक ऐसा वातावरण बना जिसमें बंद अर्थव्यवस्था का उदय एक स्वाभाविक परिणाम था। 

2.1. व्यापार का हास

व्यापारिक हृास का प्रारंभ गुप्त काल में हुआ और छठी सदी ई. के मध्य में अधिक गहरा हो गया। ईसा की प्रारंभिक शताब्दियों के बाद रोमन सिक्कों का बहाव भारत के अंदर आना बंद हो गया। व्यापार में, अरब वं ईरानियों का प्रतियोगी के रूप में पैदा हो जाना, भारतीसौदागरों के लिए अच्छा शगुनकारी सिद्ध नहीं हुआ। भारतीय- बाइज़न्टाईन (या यूनान का भाग) व्यापार में मुख्य वस्तुएं, रेशम एवं मसाले थे। छठी सदी सी.. के मध्य बाइजन्टाईन (यूनान का एक भाग) लोगों ने कीड़ों से पैदा होने वाली रेशम को कला की सीलिया। परिणास्वरूप, रेशम का व्यापार भयंकर रूप से प्रभावित हुआ। मध्य एशिया और पश्चिएशिया के साथ जो कुछ भी सम्बन्ध थे हूण आक्रमणों के बाद वे पूर्णतः समाप्त हो गए। 

ऐसा कहा जाता है कि भारत में समुद्र तट के नगरों का कुछ व्यापार दक्षिण-पूर्वी एशिया के देशों एवं चीन के साथ चलता रहा। परन्तु इस आपसी व्यापार का कोई विशेष प्रभाव नहीं ज़र आता। व्यापार में हास केवल विदेशी व्यापार तक ही सीमित न था। समुद्र तटीय नगरों तथा दूर-दराज़ के नगरों के बीच सम्पर्क कमज़ोर पड़ जाने के कारण आंतरिक व्यापार का भी पतन हुआ और इसका प्रभाव ग्रामों एवं नगरों के बीच होने वाले व्यापार पर भी पड़ा। 

परन्तु इस सबका तात्पर्य यह नहीं है कि आवश्यक वस्तुओं जैसे कि नमक, लोहे और शिल्प वस्तुओं आदि का व्यापार नहीं होता था। इसके साथ-साथ लम्बी दूरी का व्यापार सम्मानीय, मंहगी विलासिता के सामानों जैसे कि बहुमूल्य पत्थरों, हाथीदांत की चीज़ों और घोड़ों के लिए लगातार चलता रहा। इसलिये कुछ शताब्दियों के लिए विशाल तथा संगठित व्यापार का स्थान घुमक्कड़ छोटे सौदागरों, असंगठित और धीमी गति के व्यापार ने ले लिया।

2.2. सिक्कों की कमी 

उत्तर-गुप्त काल में वाणिज्य के पतन की अभिव्यक्ति सिक्कों की कमी के रूप में भी होती है। कुषाण एवं गुप्त काल में सोने के सिक्कों की जो बहुतायत थी उका छठी सदी सी. . के बाद जारी होना बंद हो गया। चांदी और तांबे के सिक्कों की अनुपस्थिति भी हमारा ध्यान इस ओर आकर्षित करती है। यह उल्लेखनीय है कि गुप्त काल के सोने के सिक्कों में सोने की मात्रा का अनुपात लगातार घट रहा था और बाद के गुप्त सोने के सिक्कों में सोने की मात्रा कुषाण सोने के सिक्कों की तुलना में आधी रह गई। हर्षवर्धके द्वारा जारी किए गए सिक्के भी बहुत कम हैं तथा राष्ट्रकूट एवं पाल जो आठवीं सदी सी.ई. में क्रमशः दक्कन एवं बंगाल में सत्ता में ए थे, ने अपने कोई सिक्के जारी नहीं किए । उत्तरी भारत के अधिकर भागों-बंगाल, उड़ीसा, मध्य भारत तथा दक्कन-में धातु वाली मुद्रा का पूर्ण अभाव था। जो इन क्षेत्रों के लिए सत्य था वह पूर्णतः दक्षिण भारत के लिए भी था। 

इस संदर्भ में कुछ इतिहासकार यह तर्क देते हैं कि परवर्ती सदियों में जारी किए गए सिक्कों ने बाद के समय की मुद्रा ने आपूर्ति की मांग को पूरा किया, इसलिए नए सिक्कों को जारी करना अनावश्यक था। परन्तु यहां पर हम जिस काल का विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं उस समय में कृषि का व्यापक स्तर पर प्रसार हुआ और केवल इसकी पूर्ति के लिकाफ़ी मात्रा में धातु मुद्रा धन की आवश्यकता होगी। दूसरा, सिक्के सार्वभौमिक सत्ता की भी अभिव्यक्ति थे। जब तक गंभीर मजबूरियां न हों तब तक कोई भी शासक सिक्कों को अपने नाम से जारी करने के विशेष अधिकार से स्वयं को वंचित नहीं करेगा | व्यापार के ह्रास तथा उच्च अधिकारियों को नकद धन का भुगतान करने के स्थान पर भूमि-अनुदान की परम्परा ने सिक्कों की आवश्यकता को खत्म र दिया। इन सबके साथसाथ इस बात के भी प्रमाहैं कि नित्य-प्रतिदिन के लेन-देन के लिए अब मुद्रा का स्थान वस्तु विनिमय (barter system) एवं कौड़ियों ने ले लिया था। 

2.3. नगरों का हास 

व्यापार का हा, सिक्कों की कमी, सिक्के के सांचों तथा वाणिज्य मोहरों की अनुस्थिति आर्थिक हास एवं निर्मित उत्पादों की मांग में कमी की ओर इशारा करते हैं। उत्तर भारमें जो नगर परवर्ती-कुषाण एवं कुषाण काल से तथा दक्कन में जो सातवाहन शासन काल से जुड़े हुए थे उनका हास तीसरी सदी सी.ई. के मध्य या चौथी सदी सी.ई. से प्रारंभ हुआ। जो उत्तरी भारत, मालवा क्कन के लिए सत्य था वही दक्षिणी भारके लिए भी समान सत्य था । नगरों जैसे कि संघो, हस्तिनापुर, अंतरजिखेड़ा, मथुरा, सौंख, श्रावस्ती, कौशाम्बी, खैरादिह, चिरंद, तमलुक आदि के उत्खनन से स्पष्ट है कि गंगा के ऊपरी तथा मध्य मैदानों के नगरों का ह्रास होना प्रारंभ हो गया था। राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और महाराष्ट्र के प्रारंभिक सम्पन्न केन्द्रों जैसे कि नॉह, उज्जैन, नागर, पौणी, तेर, भौकरदन, नालिक, पैंठन आदि नगरों में भी इसी प्रकार का झुकाव देखने को मिलता है। तमिलनाडु में अरिकामेदू, आन्ध्र प्रदेश तथा कर्नाटक के सातवाहन काल के नगरीय केन्द्र भी इस विशेषता के अपवाद नहीं थे। नगरीय हास का दूसरा चरण छठी सदी सी.ई. के बाद शुरू हुआ और इसके पश्चात् ये केन्द्र नगर रह ही हीं सके। 

समकालीन साहित्य एवं अभिलेखों से भी भली-भांति नगरों एवं शहरों का पतन प्रकट होता है। छठी सदी सी.ई. तक के अभिलेखों एवं मोहरों में नगरीय जीवन में कारीगरों, दस्तकारों तथा व्यापारियों के महत्व का उल्लेख किया गया है। उत्तरी भारत में बौद्ध नगरों के पतन का उल्लेख चीनी यात्री हवेन-त्सांग ने अपने यात्रा विवरणों में किया है तथा वह हर्षर्धन के शासनकाल में भारत आया था। वात्सायन ने कामसूत्र में जिस नगरीय जीवन का सजीव एवं रोमांचक चित्रण किया है, उत्तर-गुप्त काल के साहित्य जैसे कि दामोदरगुप्त की रचना कुत्तानिमतम (सातवीं सदी सी.ई.) में इतना सजीव वर्णन नहीं है तथा वह मुख्यतः ग्रामीण जीका ही उल्लेख करती है। 

परन्तु सभी बस्तियां ग्रामीण नहीं थीं। उत्तर-गुप्त काल में गैर-कृषि बस्तियों की अभिव्यक्ति प्रशासनिक स्थलों, सैन्य दुर्गों तथा धार्मिक या तीर्थस्थल केन्द्रों के रूप में हुई। छठी सदी से आठवीं सदी सी.ई. तक के अभिलेखों में सेना के शिविरों का स्कन्धवरा के नाम से उल्लेख किया गया है। इसके प्रमाण उपलब्ध हैं कि कुछ नगर इसलिए बचे रह सके क्योंकि उनका परिवर्तन तीर्थस्थल केन्द्रों के रूप में हो गया। इन सभी गैर-कृषि बस्तियों को पूरा, पट्टन नगर तथा राजधानी के नाम से जाना जाता था और ये उत्पादन के केन्द्र न होकर खपत के केन्द्र थे। 

3. कृषि संरचना

राजाओं, राजकुमारों तथा सरकारों के द्वारा कृषि को प्रदान किए गए संरक्षण, सिंचाई सुविधाओं में सुधार, कृषि विज्ञान का बढ़ता ज्ञान आदि ऐसे कुछ कारक तत्व थे जिनके कारण ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सुदृढ़ हुई। यह संभव है कि शहरों के पतके फलस्वरूप हुत से निपुण कारीगर ग्रामीण क्षेत्रों की ओर पलायन कर गए हों। कबिलाई सीमांत क्षेत्रों में भूमि-अनुदानों के कारण नवीन भूमि कृषि कार्यों के लिए उपलब्ध हो गई। 

दक्कन तथा मध्य भारत में, पांचवीं सदी से सातवीं सदी तक लगभग पचास शासक शक्तियां अस्तित्व में रहीं। वे महाराष्ट्र, पूर्वी मध्य प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश, उडीशा तथा बंगाल में फैली हुई थीं। इस क्षेत्र के बहुत से नए-नए शासक वंशों ने अपने स्वयं के भूमि-अनुदानों को जारी किया। इन राज्यों में से प्रत्येक भूमि और कृषि से प्राप्त होने वाले राजस्व को निर्भर किया। वास्तव में, उत्तगुप्त काल में कृषि ने राज्य के आधार पर निर्मित किया। इस प्रकार प्रारम्भ में जिन क्षेत्रों में राज्य की स्थापना नहीं हुई थी उन क्षेत्रों में राज्य की स्थापना वहाँ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था एवं कृषि प्रसार के लिये अग्रदूत साबित हुई। 

उपरोक्त वर्णित विकासों ने प्रारंभिक मध्यकालीन भारत की ग्रामीण बस्तियों में स्थान ग्रहण किया। गांवों के लिए सामान्यतः ग्राम शब्द का प्रयोग किया गया। परन्तु सभी ग्रामीण बस्तियाँ एक समान नहीं थीं। हमें ऐसे दूसरे शब्दों के विषय में भी जानकारी है जो भिन्न प्रकार की ग्रामीण बस्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। पालि को सामान्यतः आदिवासी गांव के लिए प्रयोग किया जाता था। पटका से गांव के एक भाग का बोध होता है। यह एक छोटे गांव या पुरवा को इंगित करता है परन्तु वास्तव में यह एक बड़ें गांव का ही एक भाथा। चरवाहों की बस्तियों को घोश कहा जाता था। परन्त यह याद रखा जाना चाहिए कि ये शब्द जो विभिन्न प्रकाकी बस्तियों का प्रतिनिधित्व करते थे सदैव परिवर्तित होते रहते थे। कृषि एवं ब्राह्मणिक संस्कृति के प्रसार के कारण आदिवासियों की बस्तियों के चरित्र में भी परिवर्तन हो गया था। 

उत्तरगुप्त काल की बहुत सी तांबें की प्रज्ञाओं में, जिनको भूमि-अनुदान करते हुजारी किया गया, भूमि की विभिन्न किस्मों का उल्लेख किया गया है जिनके अंतर्गत खेती योग्य, बिना जुताई वाली, ऊंची, नीची, पानी ग्रहण करने वाली, दलदली, हरि और जंगल वाली भूमि शामिल थी। जिन ग्रामों को ब्राह्मणों को अनुदान में दिया गया उनको “ब्रह्मदेय‘ औअग्रहर’ के नाम से जाना जाता था। जिन गांवों को ब्राह्मणों ने दान स्वरूप्राप्त किया था उगांवों में ब्राह्मणों के साथसाथ गैरब्राह्मण लोग भी रहते थे। परन्तु इस प्रकार के गांवों में सम्पत्ति के अधिकार केवल ब्राह्मणों को प्राप्त थे। दक्षिण भारत में भी इस प्रकार के गांवों को मंलम् के नाम से जाना जाता था। 

4. कृषि संबंध

अब हम कृषि संबंधों की उन मुख्य-मुख्य विशेषताओं का विश्लेषण करेंगे, जिनका विकास प्रारंभिक मध्य काल में हुआ। 

4.1. किसानों का दायित्व 

दान प्राप्तकर्ता सभी प्रकार के करों को एकत्रित करने के हकदार थे। वे स्थायी तथा अस्थायी करों को एकत्रित कर सकते थे और उनकी अदायगियों को भी निश्चित एवं अनिश्चित कर सकते थे। इन अतिरिक्त अपवादीय लाभों के साथ-साथ दान प्राप्तकर्ता अन्य स्थायी करों जैसे कि भाग, भोग, कर, उपारिकर, हिरण्य, उदरं, हलिकाकर इत्यादि को वसूल करते थे। पल्लव शासकों के साक्ष्यों में करों की संख्या अठारह से बीस ताई गई है। दसवीं सदी सी.ई. के अंत तक विभिन्न प्रकार के करों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि हुई। 

4.2. सामंतीय भू-व्यवस्था 

स्मृति ग्रंथों के लेखकों याज्ञवलक्य और बृहस्पति ने भूमि के एक ही टुकड़े पर चार क्रम में भूमि अधिकारों का उल्लेख किया है। उनके अनुसार अधिकारों का उपभोग करने वालों के विभिन्न क्रम इस प्रकार थेः महापति (राजा), क्षेत्रस्वामी (खेत का मालिक), कृषक (खेती करने वाला) और अर्ध-कृषक। भूमि-अनुदानों ने भूमि पर वर्गीय अधिकारों तथा उप-भूस्वामी बनने का मार्ग प्रशस्त किया और इस परम्परा के कारण ज़मींदारों की उत्पत्ति हुई जो किसानों के द्वारा पैदा किए गए अतिरिक्त उत्पादन के आधार पर अपना जीवन व्यतीत करते थे। दक्षिण भारत में पल्लव शासकों के शासन काल के दौरान मंदिरों को भूमि तथा गांवों का अनुदान किया गया। पल्लवों के समय से ही मंदिर के सेवकों को वेतन के लिए भूमि को दिया जाने लगा। इसके परिणाम स्पष्ट हैं। अब धार्मिक मठों की भूमि से लाभ प्राप्त करने वाले हो गए और वे अपने आश्रितों जैसे कि छोटे अधिकारी, कारीगरों, संगीतज्ञों, सेवकों आदि को जमीन के खंडों को देते। इस प्रकार की ज़मीनों को लगान पर दे देते थे। इसी प्रकार से, मंदिरों की भूमि को खेती करने के लिए किसान को किराये या लगान पर दे दिया जाता।

4.3. परिबद्ध अर्थव्यवस्था का विकास

प्रारंभिक मध्यकालीन भारतीय अर्थव्यवस्था ने बहुत-सी ऐसी ग्रामीण बस्तियों के उदय तथा विकास का अनुभव किया जिनका विनिमय कार्य प्रणाली और दूर-दराज़ के व्यापार से संपर्क नहीं था। स्थानीय जरूरतों को स्थानीय स्तर पर ही पूरा किया जाने लगा। युद्धों के लिए सेनाओं और धार्मिक केन्द्रों के लिए तीर्थयात्रियों का आवागमन तथा ब्राह्मणों के द्वारा भूमिअनुदानों को पाना एवं उल्लास मनाना ही संभवतः स्थलीय गतिशीलता के तरीके थे। इन सबके कारण स्थानीय पहचान बनाए रखने की भावना को और बल मिला। ग्रामों की स्थानीयता और आत्म-निर्भरता की बढ़ती भावना को ग्राम धर्म, ग्रामकर और स्थानकर जैसे शब्दों में व्यक्त किया गया और इन सभी शब्दों का प्रयोग समकालीन पौराणिक साहित्य में गांव या स्थानीयता का उल्लेख करने के लिए हुआ।

5. सामाजिक संरचना

भूमि-अनुदानों, उदित हुए बिचौलिए ज़मींदारों और राजनीतिक शक्ति तथा आर्थिक ताकत के गठजोड़ ने वर्ण के आधार पर विभाजित समाज को भी संशोधित किया। नए सामाजिक गुट चार वर्णों वाली व्यवस्था में समा न सके । असमान भूमि के बंटवारे ने से वर्गों को पैदा किया कि वे वर्ण पर आधारित सामाजिक स्तरों को लांघ गए। विदेशी जातीय गुटों तथा भारतीय कबिलाई सरदारों के शाकुलीन वर्ग के क्षत्रिय वर्ण में और ब्राह्मण संस्कृति को ग्रहण करने वाले कबिलाई लोगों के शूद्र वर्ण में शामिल हो जाने से न केवल उनके सामाजिक स्तरों में वृद्धि हुई बल्कि वर्ण पर आधारित विभाजित समाज भी रूपांतरित हुआ। इससे भी अधिक, इस काल में द्विज (दो बार जन्मा) और शूद्रों के बीच का प्रारंभिक अंतर भी संशोधित होने लगा। 

किसी भी सामाजिक स्थिति साधारणतः इस बात पर आधारित नहीं रह गई थी कि वह किस वर्ण से संबंधित था । उसके सामाजिक रुतबे का सम्बन्ध इस बात से हो गया था कि विभिन्न श्रेणियों के भूमि स्वामियों में उसके भू-स्वामित्व की क्या स्थिति थी। इन प्रवृत्तियों का प्रारंभ इस समय में हुआ और 9-10वीं सदियों में इनकी गति और तीव्र हो गई। 9-10वीं सदियों से, कायस्थों, व्यापारियों और धनी प्रभुत्वशाली किसानों ने राणका, नायक जैसी उपाधियों को धारण करना शुरू कर दिया । वे उच्च समाज और शासक कुलीन वर्ग का एक भाग बन गए। 

नई जातियों का उदएवं प्रसार था। नई जातियों की बढ़ती संख्या ने ब्राह्मणों, क्षत्रियों, कायस्थों एवं शूद्रों को प्रभावित किया। संकर जातियों और शूद्र जातियों की संख्या में काफी वृद्धि हुई। दस्तकार संगठनों का जातियों में रूपांतरण, व्यापार और नगरीय केन्द्रों के पतन के फलस्वरूप तथा दस्तकारी की पैतृक विशेषता ने कई जातियों के निर्माण की प्रक्रिया में मद्द की। 

5.1. जमींदार और किसान

यह पहले ही बताया जा चुका है कि इस समय की कृषि व्यवस्था में किसानों से भिन्नता बनाए रखने के लिए ज़मींदारों के भी कई वर्ग थे। भोगी, भोक्ता, भोगपति, महाभोगपति, बृहद्भोगी आदि शब्दों का प्रयोग भूमि से लाभ प्राप्तकर्ताओं के लिए किया गया। ज़मींदारों को उच्च वर्ग में राणका, राजा, सामन्त, महासामन्त, मण्डलेश्वर आदि को भी सम्मिलित किया गया । राजा ने भी भारी भरकम उपाधियों के द्वारा अपनी प्रभुता और भूमि के स्वामित्व को प्रमाणित करने का प्रयास किया। 

किसान वर्ग भी स्वयं में कोई एकरूप समुदाय न था। उनको कृषक, कृषि वाला, किसान, क्षेत्राजीवी, हलिका, अर्धाश्री, अधिका, कुटुम्बी भूमि कृषक दि अन्य नामों से पहचाना जाता था। इन सब नामों से सामान्यतः ऐसा प्रतीत होता है कि उनका भूमि पर नियंत्रण से कोई सम्बन्ध न था। उनका वर्गीकरण विभिन्न प्रकार से किया गया । उनको भूमि जोतने वाला, निर्भर किसान, बटाईदार, खेत मजदूर आदि नाम दिए गए और इनमें से किसी का भी भूमि पर स्वतंत्र स्वामित्व न था। 

5.2. जातियों की संवृद्धि 

क ही वर्ण के अंतर्गत बहुतसी जातियों का संयोग हो गया परन्तु पहले के कुछ ऐसे भी उदाहरण है कि एक ही समान समुदाय कई वर्णों और जातियों में टूट गए। इस उपलक्ष्य में सबसे अच्छा उदारहण आभीर कबीले का है, जो आभीर ब्राह्मणों, आभीर क्षत्रियों तथा आभीर शूद्रों में बंट गया। 

ब्राह्मण 

ब्राह्मणों के बीच जिन जातियों का उद्भव हुआ उनकी संख्या भी काफ़ी थी। जिन ब्राह्मणों ने अपनी धार्मिक सेवाओं का “व्यापारीकरण’ किया, जो स्थानीय निवासियों के सम्पर्क में आए तथा उनमें जो पूर्णतः शारीरिक परिश्रम की अवहेलना न कर सके, उन ब्राह्मणों को क्षत्रिय अग्रहार ब्राह्मण पतित समझने लगे तथा ये ब्राह्मण स्वयं शारीरिक परिश्रम न करते थे। भूमि-अनुदानों का भोग करने के लिए ब्राह्मणों का बहुसे क्षेत्रों में विस्थापन हुआ जिसके कारण वर्ण के अंतर्गत जातियों और उप-जातियों के निर्माण की प्रक्रिया और तेज़ हो गई। जो ब्राह्मण राजनीतिक शक्ति के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़े थे तथा राज्य में उच्च पदों पर आसीन होते थे उनका वर्ग अलग था। इस प्रकार के ब्राह्मणों के द्वारा विशेष पदों र आसीन होने के कारणवश उन्होंने ब्राह्मण र्ण के अंदर ही एक विशेष वर्ग बना लिया। यही प्रक्रिया कायस्थों के लिए भी सत्य थी। 

क्षत्रिय 

क्षत्रियों के बीच जाति संवृद्धि का कारण स्थानीय कबीलों के बीच से शासक घरानों का उदय तथा विदेशी जातीय गुटों का राजनीतिक शक्ति के साथ समाज की मुख्यधारा में मिल जाना था। विदेशी जातीय गुटों में से बैक्ट्रिया के पुजारियों, शकों, पार्थियनों, हूणों आदि को वर्ण व्यवस्था में समाहित करते हुए उसको दूसरी श्रेणी का क्षत्रिय बना दिया गया। क्षत्रिय जातियों की संख्या में गुणात्मक वृद्धि पांचवीं-छठी सदियों से उस समय से होनी प्रारम्भ हुई जबकि बहुत से कबीलों के सरदारों का उन ब्राह्मणों की स्वीकृति के द्वारा “हिन्दुत्वरूपांतरण हुआ जिनको उन्होंने संरक्षण दिया और वैदिक बलि यज्ञों का आयोजन किया। शासक वंशों की एक समान उत्पत्तियों तथा उनकी सामाजिक स्वीकृति की इच्छा क्षत्रिय समुदाय में जाति संवृद्धि का स्पष्ट प्रमाण है। 

शूद्र

सजातीय वैवाहिक गुटों का बहुत से समुदायों वं क्षेत्रों से आने पर शूद्र वर्ण का आधार व्यापाक रूसे फैल गया। गुप्त और उत्तरगुप्त कामें असमान आर्थिक शक्ति के संसाधनों के साथ-साथ छोटी-कृक जातियों, धनी किसान, बटाईदार तथा कारीगरी जातियां भी शूद्र वर्ण में शामिल हो गई। कबीलों का क्रमिक रूप से किसानों में रूपांतरण होने के परिणामस्वरूप उनकी जातियां बन गई और इन किसान गुटों को ब्राह्मणिक समामें शूद्रों के रूप में शामिल कर लिया गया। इसके परिणामस्वरूप शूद्रों की संख्या तथा उनकी जातियों में काफी वृद्धि हुई। 

5.3 कायस्थों का विकास 

मुनीम या कायस्थ समुदाय उस समय की सामाजिक-आर्थिक शक्तियों की उपज थे। भूमि अनुदानों के फलस्वरूप भूमि राजस्व तथा भूमि का हस्तारब्राह्मणों, धार्मिसंगठनों तथा अधिकारियों को हो गया था। इस तथा अन्य जटिल प्रशासनिक कार्यों के फलस्वरूप लेखन का काम करने वं प्रमाणों को रखने वाले लोगों की आवश्यकता हुई जिनका कार्य था भूमि अनुदानों का लेखन करना और राजस्व के बहुत से अन्य मामलों के साथ-साथ भूमि हस्तांतरण के विवरणों को खना । गुप्त काल में भूमि बंटवारा शुरू हो गया। भूमि के एक एक भूखण्ड के प्रमाण को ठीक प्रकार रखना, इस प्रकार के झगड़ों को निपटाने के लिए आवश्यक था। इस कठिन कार्य को एक लिखने वाले र्ण के द्वारा किया जाता जिसकों हुत नामों जैसे कि कायस्थ, करण, णिका, पुरत्तपल, चित्रगुप्त, अक्षपतिलिका दि से जाना जाता था। लेखन का कार्य करने वाले का कायस्थ मात्र एक गट था। परन्त शनै:- शनै: मुनीम और समुदाय के रूप में प्रमाणों को रखने वालों को कायस्थ कहा जाने लगा। प्रारंभ में उच्च वर्गों के पढ़े-लिखे लोगों को कायस्थ का काम करने के लिए लगाया जाता। समय के साथ-साथ मुनीमों को कार्य करने के लिए उनकी भर्ती बहुत से वर्णों से की जाने लगी और उनके व्यवसाय के कारण उनके सामाजिक आदान-प्रदान का दायरा सिकुड़ने लगा एवं उनके बीच भी एक जातीविवाह तथा परिवार से बाहर विवाह करने की परम्परा का अनुसरण किया जाने लगा। इस प्रकार कायस्थ जाति के निर्माण की प्रक्रिया पूरी हो गई। 

5.4. अछूत

“अपवित्र” या अछूत जातियों ने सी.ई. की प्रारंभिक सदियों में निश्चित स्वरूप प्राप्त कर लिया था। परन्तु उस समय में उनकी संख्या बहुत कम थी। तीसरी सदी सी.ई. के आसपास से अछूत परम्परा ने जोर पकड़ना शुरू कर दिया तथा इनकी संख्या में वृद्धि होने लगी। गुप्त काल में धर्मशास्त्र का लेखक कात्यायन ऐसा प्रथम लेखक था जिसने अछूत अर्थ के लिए अस्पर्श शब्द का प्रयोग किया। प्रथम सहस्राब्दी सी.ई. के आसपास से शिकारियों, छुआरों, जानवरों का वध करने वाले (कसाइयों), जल्लादों और महत्तरों को अछूत श्रेणी में शामिल कर दिया गया। कालिदास, वराहमिहिर, फाहिया, बाण तथा अन्य लेखकों ने अपनी रचनाओं में उन पर लगाए गए सामाजिक प्रतिबंधों का रोचक चित्रण किया है। चाण्डालों का भी एक भाग अछूतों में अंतर्गत आता था, यद्यपि सामाजिक पदानुक्रम में उसका स्तर सबसे निम्न था। 

इस काल तथा बाद के समय में अछूतों की संख्या में कितनी वास्तविक वृद्धि हुई इसको बता पाना कठिन है। ब्राह्मणिक तथा बौद्ध ग्रंथों का मत है कि अछूत जातियां मूलतः पिछड़े हुए आदिवासियों से संबंधित थीं। यह तर्क दिया जाता है कि उनके पिछड़ेपन तथा ब्राह्मणिक संस्कृति को अपनाने की प्रक्रिया और ब्राह्मणवाद के उनके विरोध के कारउनको समाज में शामिल नहीं किया गया तथा उनको अछूतों की स्थिति की ओर धकेल दिया गया। यद्यपि यह भी हो सकता है कि उनको भूमि के अधिकार से वंचित करके गांवों के बार की ओर बसा दिया। 

5.5. दस्तकारी और जातियां

इस काल के दौरान कारीगरों तथा दस्तकारों के बहुत से गुटों ने अपने प्रारंभिक स्तरों को खो दिया और उमें से कई को अछूतों की श्रेणी में माना जाने लगा। संभवत: यह उनगरीय केन्द्रों के पतन के फलस्वरूप हुआ जहां पर दस्तकारों की काफी बड़ी संख्या में मांग थी। दस्तकारी के संगठन जातियों में रूपांतरित हो गए और इस रूपांतरण को दस्तकारी उत्पादन के संगठन तथा प्रकृति में हुए परिवर्तन में प्रभावकारी ढंग से समझा जा सकता है। बहुत सी जातियां जैसे कि स्वर्णकार (सुनार), मालाकार (माला बनाने वाला), चित्रकार, मपिता (नाई) आदि की उत्पत्ति विभिन्न दस्तकारियों (जिनका अनुसरण विभिन्न गुटों द्वारा किया जाता था) से हुई। कारीगरों के भी कुछ वर्ग अछूत बन गए । दसवीं सदी के अंत तक जुलाहे, रंगकार, दर्जी, नाई, जूतों का निर्माण रने वाले, लुहा, धोबी और अन्यों की स्थिति भी अछूतों जैसी हो गई। 

6. वैश्यों का हास और शद्रों के सामाजिक स्तर में बढोत्तरी

धर्मशास्त्रों और इसी तरह के अन्य साहित्य में उल्लेख है कि चारों वर्गों के ढांचे के अंतर्गत सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन होना शुरू हुआ। शूद्रों के एक भाग का कृषि के साथ सम्बन्ध कायम होने के बाद उनके सामाजिक तथा आर्थिक स्तर में बढ़ोतरी हुई। वैश्यों के विशेषकर उस भाग का, जो अपने वर्ण में सबसे नीचे के स्तर पर थे, पतन शूद्रों के स्तर तक हुआ। इस प्रकार दो नीचे के वर्गों की सापेक्ष स्थिति में परिवर्तन हुआ। शूद्र अब केवल दास और सेवक मात्र नहीं रह गए थे। उनका उदय काश्तकारों, बटाईदारों तथा किसानों के रूमें हुआ। नगरों के पतन के कारण शूद्र कारीगरों को खेती के काम को मजबूरन स्वीकार करना पड़ा। 

उत्तर-मौर्य काल में भारत के विदेश व्यापार की पराकाष्ठा के दौरान वैश्यों की पहचान व्यवसायों तथा नगरों के साथ की जाती थी। उत्तर-गुप्त काल में कृषि व्यवस्था की प्राथमिकता के कारण वैश्य व्यापारियों तथा सौदागरों को र्थिक नुकसान एवं सामाजिक पतनशीलता का सामना करना पड़ा। उनमें से बहुतों ने अपना जीवन यापन करने के लिए कृषि कार्यों को अपना लिया। 

7. महिलाओं की स्थिति

इस काल के दौरान समाज में महिलाओं की स्थिति में क्रमशः पतन हुआ। आचार-संहिता पुस्तकों में महिलाओं की कम आयु में या यौवन अवस्था से पूर्व विवाह करने की प्राथमिकता का उल्लेख हुआ है। महिलाओं के लिए औपचारिक शिक्षा को मना कर दिया गया। महिला और सम्पत्ति की एक ही श्रेणी में कर दिया गया जिससे उनकी सामाजिक स्थिति पर प्रतिकूल प्रभाव हुआ । सामान्यतः उनको सम्पत्ति अधिकार से वंचित कर दिया गया। परन्तु विधवाओं के मामले में सम्पत्ति अधिकारों में कुछ सुधार हुआ। स्त्री धन (जिसका साहित्यिक अर्थ है महिलाओं का धन) के प्रावधानों से स्पष्ट है कि इसका अधिक महत्व इसलिए नहीं था क्योंकि महिलाओं को अपनी व्यक्तिगत सम्पत्ति जैसे ज़ेवर, आभूषण एवं उपहारों से अधिक को रखने का अधिकार हीं था। बृत-संहिता जैसे समकालीन साहित्यिक ग्रंथों में महिलाओं एवं शूद्रों के लिए संयुक्त रूप से संदर्भो का प्रयोग महिलाओं की समाज में दुर्दशा को स्पष्ट करता है। उनको बहुत से यज्ञों एवं उत्सवों में भाग लेने से वंचित कर दिया गया। इसी काल में सती प्रथा को भी सामाजिक स्वीकृति प्राप्त हो गई। विवाह के पश्चात् महिलाओं के गोत्र में परिवर्तन का प्रारंभ भी पांचवीं सदी सी.. से हो गया। यह एक महत्वपूर्ण परिवर्तन था क्योंकि इसकी अंतिम परिणति उनके पैतृक घर में उनके अधिकारों की समाप्ति के रूप में हुई और यह पैतृक व्यवस्था या पुरुप्रधान समाज की विजय का प्रतीक था।