दक्कन और तमिलाहम् में आरंभिक राज्य निर्माण

इस पेज के पाठ्यक्रम

1 प्रस्तावना 2 स्रोत 3 राज्य की उत्पत्ति 4 पूर्ववृत्त 5 भौगोलिक पृष्ठभूमि 6 सातवाहन वंश के इतिहास की रूपरेखा

7 बस्तियों का प्रारूप 7.1 पश्चिमी तट 7.2 समुद्र तट से दूर की बस्तियाँ 8 प्रशासन समाज

10 दक्षिण भारत (तमिलाहम्) : क्षेत्र विशेष 11 पाँच परिस्थितिकी प्रदेश और जीवनयापन का तरीका 12 राजनीतिक समाज का उद्भव 

12.1 विभिन्न प्रकार के मुखियातंत्र 12.2 लूटमार और लूके माल का बंटवारा 12.3 मूवेंदर और राजनीतिक नियंत्रण के विभिन्न स्तर 

1. प्रस्तावना

 प्रथम सदी बी.सी.ई. के आस पास दक्कन में जिस ताकतवर वंश का उदय हुआ वह सातवाहन वंश था। यहाँ पर हम सातवाहनों के अंतर्गत दक्कन की राजनैतिक सामाजिक व्यवस्था पर ध्यान केंद्रिकरेंगे।

सातवाहनों के अधीन दक्कन में आरंभिक राज्य उत्पत्ति की जानकारी लेने के बाद आप जानेंगे कि इस काल के दौरान तमिल क्षेत्र में उसी प्रकार की स्थिति नहीं थी। इस क्षेत्र में केवल मुख्यिातंत्र विद्यमान था, राज्य शक्ति जैसी चीज का नामोनिशान नहीं थाराज्य के लिए एक क्षेत्र विशेष में केंद्रीकृत राजनीतिक शक्ति का होना अनिवार्य माना जाता हैक्षेत्र के विभिन्न स्रोतों पर नियंत्रण स्थापित होने पर ही किसी राजनीतिक शक्ति का अधिकार कायम होता था। इसके अतिरिक्त राज्य के लिए एक नियमित कराधान व्यवस्था और व्यवस्थित सेना का होना आवश्यक था। इस कराधाऔर सेना को व्यवस्थित करने के लिए राज्य के पानौकरशाही या विभिन्न स्तरों के अधिकारियों का एक दल होना चाहिए। दूसरी तरफ व्यापक व्यवस्था नहीं होती है। मुखियातंत्र वंशानुगत अधिकार पर आधारित एक ऐसा समाज होता है, जिसमें एक मुखिया का शासन होता है। उसके अधिकार क्षेत्र में वे लोग होते हैं जो उसके साथ संबद्ध कबीले के नियमों और सगोत्रता के सूत्र में बंधे होते हैं। मुखिया अपने लोगों के सगोत्रीय संबंधों का संस्थागत रूप होता है। इस प्रकार की व्यवस्था में लोगों से राजस्व के तौर पर नियमित रूप से कर नहीं वसूल किया जाता है, बल्कि स्वेच्छा से लोग समय-समय पर नज़राना दिया करते हैं। इस इकाई में आप विभिन्न प्रकार के मुखियाई अधिकारों और तमिलाहम् में उनके राजनीतिक विकास के स्तर की जानकारी प्राप्त करेंगे। 

2. स्रोत

सातवाहन शासकों को दूसरे नाम आन्ध्राओं से भी जाना जाता है। इन राजाओं के नामों की सूची पुराणों में भी पायी जाती है। इन सूचियों को ऐतिहासिक स्रोतों के रूप में दूसरे साक्ष्यों के साथ आलोचनात्मक तुलना किये बिना उपयोग करने में बहुत सी कठिनाइयाँ होती हैं। उदाहरण के तौर पर, विभिन्न पुराणों में राजाओं के नाम एवं उनके शासनकाल में काफी अन्तराल है। इससे भी अधिक बड़ी समस्या यह है कि इन राजाओं के विषय में सूचना केवल कल्पित एवं किंवदंतियों में निहित हैं। इसलिए वास्तविकता एवं किंवदंतियों के बीच अन्तर करने के लिए इन स्रोतों का ध्यानपूर्वक अवलोकन करना चाहिए। यदि अन्य स्रोतों जैसे कि सिक्कों व शिलालेखों के साथ पुराणों का अध्ययन किया जाये तो वे काफी उपयोगी हैं। सातवाहनों ने काफी बड़ी संख्या में सीसे, चांदी व तांबे के मिश्रित सिक्कों को ढलवाया। उनके चांदी के सिक्कों पर राजा का चित्र एवं नाम खुदा हुआ है। बौद्ध गुफाओं से पत्थर पर खुदे लेख एवं लिपिबद्ध किये दान के विवरण प्राप्त हुए हैं जिनको सातवाहन राजाओं एवं रानियों के साथ-साथ बड़ी संख्या में साधारण लोगों ने बनवाया। इन विभिन्न स्रोतों से प्राप्त सूचना का तुलनात्मक अध्ययन करने के बाद सामान्यतः विद्वान यह स्वीकार करते हैं कि सातवाहनों ने प्रथम बी.सी.ई. के आसपास अपना शासन करना प्रारंभ किया। उनका सबसे प्रारम्भ का साक्ष्य महाराष्ट्र राज्य के नासिक के पास एक गुफा में पत्थर पर उत्कीर्ण लेख के रूप में पाया गया है। 

3. राज्य की उत्पत्ति के विषय में

अब हम एक प्रश्न उठाते हैं राज्य क्या है और राज्य की उत्पत्ति ने समाज में कैसे परिवर्तन किये? राज्य की उत्पत्ति के कारणों के विषमें कई मत दिये जाते हैं। राज्य की उत्पत्ति के कारण एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में भिन्न हैंकुछ विशेष मामलों में व्यापार के विकास एवं नगरों के फैलाव के कारण राज्य की उत्पत्ति हुईअन्य दूसरे मतों के अनुसार आबादी के दबाव एवं विजय के कारण उस समय की प्रचलित राजनैतिक व्यवस्था में परिवर्तन हुआ। सामान्यतः विद्वान लोग इस तथ्य से सहमत हैं कि बढ़ती जनसंख्या पर नियंत्रण करने के लिए राज्य एक सक्षम औज़ार है। एक राज्य भली भांति परिभाषित एक क्षेत्र पर नियंत्रण रखता है और कर तथा राजस्व को एकत्रित करने के लिए एक प्रशासनिक तंत्र को बनाकर रखता है। वह एक स्थायी सेना को भी रखता है जो कानून एवं व्यवस्था को बनाये रखने में मदद करती है। लेकिन इन सबके साथ-साथ माज में असमानता एवं वर्ग विभेदन भी बढ़ता है। यहाँ शासक और शासित के मध्य स्पष्ट भेद है। शासन कर्ता अपने लाभ एवं उपयोग के लिए समाज के संसाधनों पर नियंत्रण रखते हैं। दूसरी ओर शासित वर्ग शाही परिवार के सदस्यों, राज्य के कुलीनों, बहुत से अधिकारियों एवं सेवा के रख-रखाव के लिए आवश्यक धन एवं राजस्व उपलब्ध कराते थे। इस प्रकार कबीलाई समाज एवं राज्य समाज में मूल भूत अन्तर राजनीति के नियंत्रण की प्रकृति में निहित है। राज्य व्यवस्था के अंतर्गत विशेषज्ञात्मक प्रशासनिक व्यवस्था शासक एवं शासित को अलग करती है। कबीलाई समाज में सामान्यतः एक कबीले के द्वारा राजनैतिक शक्ति का उपयोग किया जाता है जिसके पास अपने निर्णयों को लागू करने के कोई अधिकार नहीं होते। कबीले की स्थिति सदस्यों की वफादारी पर निर्भर करती है और अधिकतर निर्णयों को एक साथ लिया जाता है। 

4. पूर्ववृत्त

दूसरी सहस्त्राब्दी बी.सी.ई. में पश्चिम दक्कन में ताम्रपाषाण बस्तियों का प्रसार हुआ। बाद में प्रथम सहस्त्राब्दी बी.सी.ई. के द्वितीय भाग में लोहे का प्रयोग करने वाली जातियों ने पूर्वी दक्कन पर अपना अधिकार कर लिया। ये मुख्य रूप से ग्रामीण बस्तियाँ थीं और जिनमें बहुत बड़ी तादाद में कबीलाई लोग वास करते थे। प्रारंभिक संस्कृत साहित्य विशेषकर महाकाव्यों एवं पुराणों में आन्ध्रा, सबर, पुलिन्द आदि जैसी कबीलाई जातियों का वर्णन है जो दक्कन में रहती थीं। इनमें से कई जातियों के दक्कन नामों को अशोक शिलालेखों में भी उद्धृत किया गया है। परन्तु इनमें से अधिक सन्दर्भ सामान्य प्रकृति के हैं और इनके आधार पर उस निश्चित क्षेत्र को परिभाषित कना कठिहै जहाँ दक्कन में वे रहते थे। 

दक्कन में परिवर्तन की प्रक्रिया का प्रारंभ शायद मौर्यों के प्रसार के साथ हुआ। मौर्य मुख्यतः दक्कन प्रायद्वीप के खनिज संसाधनों को शोषित करने में रुचि रखते थे। आधुनिक कर्नाटक और आंध्र प्रदेश की खानों से प्राप्त किये गये सोने, हीरे एवं रत्नों को भूमि एवं समुद्र के किनारे वाले मार्गों के द्वारा उत्तर भारत में मगध को भेजा जाता था। इन मार्गों पर कई बाजार केंद्र विकसित हुए जैसे कि आंध्र प्रदेश के वर्तमान गुंटूर जिले में कृष्णा नदी के किनारे धरनिकोटा 

और महाराष्ट्र के तारा जिले में करद् । इर्द-गिर्द के अनेक स्थानों पर महारठी के नाम से जाने वाले अनेक सरदार महत्त्वपूर्ण हो गयेलेकिन ये स्थानीय महारठी सरदार सातवाहनों के अन्तर्गत ही थे तथा सातवाहनों एवं महारठियों के बीच वैवाहिक संबंध थे और इस प्रकार सातवाहनों के रूप में दक्कन में प्रथम राज्य की उत्पत्ति हुई। 

5. भौगोलिक पृष्ठभूमि 

दक्कन प्रायद्वीप पठारीय क्षेत्र और पूर्व एवं पश्चिमी किनारों के पर्वतीय श्रृंखलाओं के द्वारा तटीय मैदानों में विभाजित हैपश्चिम के कोंकण तटीय क्षेत्र की अपेक्षा आंध्र का तटीय क्षेत्र काफी चौड़ा है। इस पठारी क्षेत्र का सामान्यतः ढलान पश्चिम क्षेत्र से पूर्व की ओर है तथा उसके कारणवश महानदी, गोदावरी और कृष्णा जैसी नदियों का बहाव पूर्व दिशा की ओर है जिससे कि वे बंगाल की खाड़ी में मिल जाती हैं। नदियों के डेल्टा एवं घाटियों में बस्तियों के लिए काफी उत्पादक भूमि उपलब्ध होती है। दक्कन की एक भौगोलिक विशेषता शायद इस तथ्य में निहित है कि पठार के पर्वतीय क्षेत्रों को केवल दरों के द्वारा ही पार किया जा सकता है। 

6. सातवाहन वंश के इतिहास की रूपरेखा 

पुराणों के अनुसार सिमुक सातवाहन ने सातवाहन शक्ति की स्थापना की। उसके भाई कन्हा या कृष्ण के विषय में हमें जानकारी नासिक के लेख से प्राप्त होती है। वंश के अनेक शासकों का विवरण रानी नागनिका के नानाघाट शिलालेख से भी प्राप्त होता है जो राजा सतकर्णी की विधवा थी तथा उसने वैदिक बलि यज्ञों का आयोजन किया था। नानघाट एक काफी बड़ा दर्रा था जो जुन्नर के साथ समुद्र तट से जुड़ा था और इस दर्रे के ऊपर एक गुफा है जिसमें सातवाहन शासकों के चिन्ह खुदे हुए थे। दुर्भाग्यवश ये मूर्तियाँ अब पूर्णतः नष्ट हो चुकी हैं और जो अवशेष बचे हैं नके मस्तक के ऊपर के चिन्ह उनका मात्र नाम देते हैं।

सतकर्णी के बाद गौतमीपुत्र सतकर्णी के शासनकाल तक जिन शासकों ने शासन किया उनके विषय में हमें काफी कम जानकारी है। नासिक में एक गुफा के प्रवेश द्वार पर गौतमीपुत्र सतकर्णी की माता का एक लेख खुदा हुआ है जिससे उसके राज्य के फैलाव एवं उसके शासन काकी घटनाओं का विवरण प्राप्त होता है। गौतमीपुत्र सतकर्णी की मुख्य उपलब्धि यह है कि उसने पश्चिम दक्कन एवं गुजरात के क्षत्रियों को पराजित किया था। उसकी माता के इस लेख में इस तथ्य की प्रशंसा की गई है कि उसने पुनः सातवाहन गौरव को स्थापित किया था और इस तथ्य की पुष्टि मुद्रा साक्ष्यों से भी होती है। अपनी जीत के बाद गौतमीपुत्र सतकर्णी ने अपने खुद के लेख और प्रतीकों के साथ क्षत्रप नाहपण के चांदी के सिक्कों का प्रतिकार किया। पेरिल्पस फ दी ऐरिरियन सी के अनुसार सातवाहनों एवं क्षत्रपों के मध्य चलने वाले संघर्ष के कारण मुम्बई के पास स्थित बन्दरगाह में ठहरे हुए ग्रीक जहाजों को सुरक्षा के साथ भड़ौच स्थित बन्दरगाह पर भेजा गया। शायद अति आवश्यक विदेशी व्यापार को लेकर इन दोनों के बीच संघर्ष था। ऐसा प्रतीत होता है कि गौतमीपुत्र सतकर्णी शासनकाल में ही सातवाहनों का शासन आंध्र प्रदेश तक फैल गया था। 

गौतमीपुत्र सतकर्णी के बाद उसका पुत्र पुलुमावि शासक हुआ और इस समय तक सातवाहनों में अपनी शक्ति का फैलाव पूर्वी दक्कन तक कर लिया था। हमें प्रथम चार सातवाहनों के लेख पश्चिमी दक्कन से बाहर अमरावती में प्राप्त होते हैं। यजनश्री सतकर्णी अंतिम महत्त्वपूर्ण सातवाहन शासक था और उसके बाद उनके साम्राज्य का विभाजन उसके उत्तराधिकारियों के बीच हो गया जिनकी एक शाखा ने आंध्र क्षेत्र में शासन किया। बाद के सातवाहन शासकों ने द्विभाषा में लिखे हुए सिक्कों को जारी किया जिसमें राजा का नाम प्राकृत भाषा में लिखा हुआ है और मुद्रा लेख किसी एक दक्षिणी भाषा में। इस भाषा को लेकर विद्वानों में मतभेद हैं। कुछ का मानना है कि यह तमिल में हैं तो कुछ के अनुसार यह तेलगू में हैं।

क्षत्रपों के साथ-साथ प्रारम्भिक सातवाहन शासक को उडीशा का कलिंग की खारवेल शक्ति के साथ संघर्ष करना पड़ा। खारवेल ने प्रथम शताब्दी बी.सी.ई में कलिंग में अपनी शक्ति की स्थापना की थी। उसने सातवाहन शासक सतकर्णी की परवाह किये बगैर पश्चिम की ओर अपनी सेना को भेजा। ऐसा कहा जाता है कि सातवाहन शासक को क्षत्रपों और खारवेल नरेश के हाथों पराजय भोगनी पड़ी। इसको केवल गौतमीपुत्र सतकर्णी ने पुनः स्थापित किया।

सातवाहन इतिहास की यह भी एक समस्या है कि हमें सातवाहन शासकों के एवं उन छोटे सरदारों के बीच के सम्बन्धों की जानकारी बहुत कम है जो दक्कन प्रायद्वीप के अनेक क्षेत्रों में उनके शासन काल के दौरान फले फूले । उदाहरण के लिए एक क्षेत्र में सातवाहनों का महारठी एवं महाभोजों के बीच वैवाहिक संबंधों का संदर्भ मिलता है – वास्तव में नानाघाट के अभिलेख में एक महारठी सरदार एक राजकुमार पर अग्रता प्राप्त कर लेता है और नायनिका रानी स्वयं एक महारठी सरदार की पुत्री थी। महारठियों ने भी स्वयं स्वतंत्र रूप से दान किये उनके अधिकतर अभिलेख कार्ले के आस-पास प्राप्त हुए हैं जबकि महाभोजियों के अधिकतर साक्ष्य पश्चिमी तट के क्षेत्र में मिलते हैं। 

7. बस्तियों का प्रारूप 

उनके प्रारंभिक अभिलेखों के प्राप्ति स्थान के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सातवाहनों ने अपने शासन का प्रारंभ पश्चिमी दक्कन से किया। गौतमीपुत्र सतकर्णी की माता का दूसरी सदी बी.सी.ई. का नासिक अभिलेख सातवाहनों के साम्राज्य की सूचना देता है। इस शिलालेख में यह भी संदर्भ है कि पश्चिमी एवं पूर्वी दोनों तट गौतमीपुत्र सतकर्णी के साम्राज्य के भाग थे जिसका तात्पर्य यह हुआ कि इस समय में सातवाहन शान सम्पूर्ण दक्कन प्रायद्वीप पर था और यह अहार या जिलों में विभाजित था। इस शिलालेख में हमें पाँच अहार या जिलों के नाम इस प्रकार मिलते हैं – नासिक के आस-पास केंद्रित गोवर्धन अहार, पश्चिमी तट पर सोपारका-अहार, पुणे एवं सतारा जिलों के पर्वतीय क्षेत्रों को मिलाकर ममला-अहार, सातवाहनिहारा कर्नाटक के जिले बैल्लारी में, और कपूरशरा शायद गुजरात में था। 

7.1 पश्चिमी तट 

पश्चिमी तट पर भड़ौच, कल्याण, सोपारा और चौल एवं कोंकण तट पर दक्षिण में अनेक बन्दरगाहों की श्रृंखला थी। इन बंदरगाहों पर विक्रय वस्तुओं को देश के आंतरिक केंद्रों से पश्चिमी तट के दरों के बीच से लाया जाता था। प्रथम सदी सी.ई. का एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ, पेरिप्लस ऑफ दि ऐरिथरियन सी जिसकी रचना ग्रीक के एक गुमनाम नाविक ने की थी, इस समय की यात्रा एवं व्यापार की प्रकृति को समझने में बड़ी मदद करता है। कैम्बे की खाड़ी में भड़ौच की ओर जाने वाले ऐसे रास्तों का चित्रण यह ग्रंथ करता है जो काफी संकरी जगहों से होकर गुजरते थे। इसी कारणवश जिले के शाही मछवारे इन जहाजों को स्वयं चलाकर बंदरगाह के अन्दर ले जाते थे। हमने पहले ही इस तथ्य का वर्णन किया है कि क्षत्रपों एवं सातवाहनों के बीच सामुद्रिक व्यापार पर नियंत्रण करने और भड़ौच तथा कल्याण के बंदरगाहों के मध्य की प्रतियोगिता को लेकर युद्ध हुआ था।

7.2 समुद्र तट से दूर की बस्तियाँ

पश्चिमी तटों से दूर मुख्य भूभाग की ओर कार्ले की 30 किमी. की परिधि के अंतर्गत जुन्नर व नासिक के आस-पास और आगे दक्षिण में कृष्ण के ऊपरी डेल्टा में कोल्हापुर के इर्द-गिर्द ये बस्तियाँ केंद्रित थीं। यह माना जाता है कि ये सभी क्षेत्र कृषि के लिए काफी संपन्न एवं उपजाऊ थे जिससे कि ये पश्चिमी तट पर स्थित बंदरगाहों के लिए संसाधन का आधार उपलब्ध कराते थे। इन बंदरगाहों के माध्यम से भू-मध्य सागर क्षेत्र एवं भारत के बीच प्रथम शताब्दी सी.ई. में व्यापार किया जाता था और इनका सम्पर्क भू-मार्ग के द्वारा दक्कन प्रायद्वीप के पूर्वी तट एवं आंध्र प्रदेश के व्यापारिक केंद्रों के साथ भी था। यह भड़ौच के पैंठन व टेर एवं पूर्व को आगे की ओर आंध्र के केंद्रों तक जाता था। पैंठन का प्राचीन क्षेत्र गोदावरी के इर्द-गिद्र 4 किमी. क्षेत्र में फैला हुआ था और जब कभी भी इस स्थल की खुदाई की गई तो वहाँ से बहुत सी प्राचीन वस्तुएँ जैसे कि सिक्के, सांचे ओर पकी हुई मिट्टी के पुरावशेष एवं बर्तन प्राप्त हुए हैं। परंतु सातवाहनों के निर्माण संबंधी अवशेषों के विषय में बहुत कम ज्ञान है। 

टेर दक्कन के कपास उत्पादक क्षेत्र में स्थित है। इस स्थल का उत्खनन करने पर यहाँ से लकड़ी के परकोटे और रंगने वाले बर्तन प्राप्त हुए हैं जिससे ऐसा मालूम पड़ता है कि यहाँ पर कपड़ों की रंगाई का भी कार्य होता था। टेर को इसलिए भी भली भांति जाना जाता है कि वहाँ पर पायी जाने वाली हाथी दांत की बनी सुन्दर तस्वीर पोम्पेई से पायी जाने वाली प्रतिरूप के बहुत समान है। इस स्थल का सबसे महत्त्वपूर्ण अवशेष ईंटों से निर्मित चैत्य है और जो बाद में ब्राह्मणों के मंदिर के रूप में परिवर्तित हो गया। 

दक्कन का दूसरा मार्ग वह था जो उज्जैन से नर्मदा पर स्थित महेश्वर से जुड़ा था तथा अजन्ता एवं पितलखोरा की गुफाओं पर से गुजरता हुआ भोकरदान और पैंठन को जोड़ता था। भोकरदान मोती बनाने का काफी बड़ा केंद्र था तथा उसको सीप एवं हाथी दांत के काम के लिए भी जाना जाता थाभोकरदान के निवासियों या भोगवर्धनियों ने मध्य भारत में सांची एवं बारहुत की गुफाओं में अंकित लेखों के अनुसार बौद्धों को दान दिया

दक्षिण में आगे की ओर कृष्णा नदी की ऊपरी घाटी में करद नाम का एक और अन्य नगर था जिसका वर्णन बौद्ध अभिलेखों में हुआ हैइसी क्षेत्र में कोल्हापुर भी स्थित था। इस नगर के पश्चिमी भाग से तांबे की बनी वस्तुओं का ढेर प्राप्त हुआ है। इनमें से कुछ जैसे पोसाईडन की मूर्ति का आयात किया गया जबकि गाड़ियाँ एवं तांबे की नावें स्थानीय स्तर पर निर्मित की गई थींपास के जिले बेलगाँव में वादगाँवमाधवपुर के प्राचीन स्थल हैं जो बेलगाँव का एक उपनगर था तथा जिसकी खुदाई किये जाने पर बहुड़ी संख्या में सिक्के एवं दूसरी प्राचीन वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं। यहाँ से जब दक्षिण में आगे की ओर बढ़ते हैं तो बनवासी का स्थल है जहाँ से सातवाहनों का एक शिलालेख मिला हैयह संभवतः क किलेबन्द बस्ती है क्योंकि यहाँ पर एक किले की दीवार एवं खाई के चिन्ह मिले हैं। प्रायद्वीप के पार दक्कन से गुजरते मार्ग पश्चिमी दक्कन में कृष्णा नदी की नीचे की घाटी में अमरावती जैसे इन स्थलों से जुड़े थे और आंध्र प्रदेश के करीमनगर तक जाते थे। करीमनगर क्षेत्र में भरपूर रूप से फैले हुए बहुत से प्रारंभिक ऐतिहासिक स्थल हैं जिनमें से हैदराबाद से उत्तर पश्चिम की ओर लगभग 70 किमी. दूर कोंडापुर के नाम से एक महत्त्वपूर्ण स्थल है। इस स्थल का उत्खनन करने पर पर्याप्त मात्रा में सिक्के, पकी मिट्टी की वस्तुएँ एवं बहुत से आकार की ईंटें मिली हैं जो गारा चूना में लगी हैं। पेद्दा-बंकुर आजकल एक छोटा सा गाँव है परन्तु सातवाहन शासनकाल में एक महत्त्वपूर्ण बस्ती थी जो 30 हैक्टेयर क्षेत्र में फैली थी। पेद्दा-बंकूर से लगभग 10 किमी. दूर शूलि कट्टा नाम का स्थल किलेबंद के रूप में था। यह एक कच्ची दीवार से घिरा था और इस स्थल का बहुत सा निर्माण ईंटों का है जिसकी अभी तक खुदाई नहीं की गई है। दूसरी बड़ी बस्ती कोटालिंगल थी जो सातवाहन शासन काल से पूर्व की है क्योंकि अभी हाल में प्राप्त वहाँ से सिक्के इसका प्रमाण हैं। सातवाहन कालीबस्तियों की कच्ची दीवार से किलेबन्दी की गई और विस्तृत रूप से वे ईंटों का निर्माण थीं। उत्खनन स्थलों से बड़ी मात्रा में लोहे का कचरा एवं कच्ची धातु प्राप्त हुए हैं। करीमनगर क्षेत्र से रास्ता प्रारम्भ होकर नीचे कृष्णा घाटी में शाखाओं में विभाजित हो जाता था जहाँ पर प्रारंभिक ऐतिहासिक बस्तियाँ केंद्रित हैं। इनमें से अमरावती और धरनिकोटा विशेष रूप से मुख्य हैं जो कृष्णा नदी 

के दोनों किनारों पर बसे हैं। धरनिकोटा नदी से नौ परिवहण प्रणाली के रास्ते से जुड़ा हुआ था। इस स्थल पर प्रारंभिक निर्माण कार्य लकड़ी के घाट का था और बाद में जिसका स्थान ईंटों के निर्माण ने ले लिया। परन्तु नाव चलाने वाले स्थान पर रेत भर जाने के कारण चौथी सदी सी.ई. में इस स्थल का परित्याग कर दिया गया। प्रायद्वीप के पार जाने वाले मार्गों में एक मार्ग विदर्भ होकर मध्य भारत को जाता था। उस काल के विदर्भ में पौनार, पौनि, मंढल, भटकूली और अढ़म बस्तियाँ थीं।

सातवाहन वंश के इतिहास की एक अन्य विशेषता यह भी है कि इस काल में दक्कन में किलेबन्द बस्तियों का विकास हुआ और उत्खनन से हमें जो प्रमाण उपलब्ध हुए हैं उनसे स्पष्ट है कि निर्माण की गुणवत्ता में काफी सुधार हुआ। किलेबन्दी एवं अन्य निर्माण कार्यों के लिए ईंट का काफी प्रयोग होने लगा। छतों के ऊपरी भागों को ठोस कूटी हुयी मिट्टी से बनाया जाने लगा। छत के निचले भाग को लकड़ी के खम्भों के सहारे एवं ऊपर से खपरों की मदद से बनाया जाता था। 

प्राचीन काल में जिन मार्गों का उपयोग किया गया वर्तमान रेलवे लाइन भी उन्हीं मार्गों पर बिछायी गई हैं। भोरघाट केवल एक मात्र ऐसा दर्रा है जो पश्चिमी तटों को पार करते हुए पुणे एवं मुम्बई को जोड़ता है तथा जिस पर प्रारंभिक बौद्ध गुफाएँ जैसे कि शैलरवाडी, बेडसा, भाजा, कार्ले, अम्विाले, कोंडाने पड़ते हैं। 

8. प्रशासन 

सातवाहन शासकों का प्रशासन मौर्य प्रशासन की अपेक्षा सरल थाशिलालेखों से ऐसे कई मंत्रियों का विवरण मिलता है जिन पर विभिन्न कार्यों को पूरा करने का उत्तरदायित्व था। अन्य कार्यों के साथ-साथ वे कोषाधिकारी एवं भूमि संबंधी दस्तावेजों को खने का भी कार्य करते थे। मंत्रियों की संख्या की वास्तविक जानकारी नहीं मिलती। इन मंत्रियों की नियुक्ति प्रत्यक्ष रूप से राजा के द्वारा की जाती थी और मंत्री का पद पैत्रक नहीं होता था अर्थात् पिता के स्थान पर पुत्र मंत्री नहीं बनता थाउनको राज्य द्वारा एकत्रित किये गये राजस्व से धन दिया जाता थाहमारे पास इसकी कोई निश्चित संख्या नहीं है कि कितना राजस्व एकत्रिकिया जाता था लेकिन हम यह जानते हैं कि कर को व्यापार एवं कृषि दोनों से एकत्रित किया जाता थासातवाहन शासकों ने प्रथम शताब्दी बी.सी.ई. में जिस प्रथा का प्रारंकिया वह यह थी कि किसी एक गाँव से प्राप्त किये गये राजस्व को ब्राह्मण या बौद्ध संघ को दान के रूप में दे दिया जाता था। इस प्रथा का गुप्त शासकों के द्वारा व्यापक रूप से प्रयोग किया गया। 

राजा के लिए भू-राजस्व के महत्त्व को इस नीति की स्पष्टता से अनुमानित किया जा सकता है कि भूमि के दान को प्रमाणित किया जाता था। इन दोनों को प्रथम बार किसी सभा या निगम सभा के बीच घोषित किया जाता था। तब इसको किसी तांबे की प्लेट या कपड़े पर किसी अधिकारी या मंत्री के द्वारा लिखा जाता था। फिर इसको दान प्राप्त कर्ता या जिसको भूमि का अनुदान किया जाता था, दिया जाता था। दस्तावेजों को सुरक्षित रखने वाला एक अधिकारी था जो इन विस्तृत लेखे-जोखे को संभाल कर रखता था। 

इस काल के शासक अधिक से अधिक भूमि कृषि योग्य बनाने के लिए उत्सुक रहते थे जिससे कि वे अतिरिक्त राजस्व प्राप्त कर सकें। ऐसा प्रतीत होता है कि जो जंगल को साफ करता था एवं उस खेत पर खेती कता था वह उस भूमि पर स्वामित्व का दावा प्रस्तुत कर सकता था। व्यापार से राजस्व प्राप्त करना राजस्व की आमदनी का एक दूसरा बड़ा स्रोत था। व्यापाके प्रसार के विषय में हम विस्तृत रूप से दूसरी इकाई में विवरण करेंगे। अधिकतम व्यापार पर नियंत्रण श्रेणियों का था जो बैंक का भी कार्य करती थी। व्यापार को प्रोत्साहित करने के लिए राज्य विशेष कदम उठाता था। दूरस्थ व्यापार मार्गों को सुरक्षित बनाया गया था और उनके किनारे आराम गृहों का निर्माण भी किया गया। 

9. समाज 

दक्कन में सातवाहन शासकों के अन्तर्गत सामाजिक व्यवस्था की बहुत सी विशेषतायें उनसे भिन्न थीं जिनका विवरण संस्कृत ग्रंथों जैसे कि मनुस्मृति में हुआ है। उदाहरणार्थ, सातवाहन शासकों के बहुत से शिलालेखों में पिता के नाम के स्थान पर माता के नाम का उल्लेख हुआ है, जैसे कि गौतमीपुत्र सतकर्णी (सतकर्णी गौतमी का पुत्र)। यह धर्मशास्त्रों की उस परम्परा के साथ मेल नहीं खाता जिसके अनुसार मान्यता प्राप्त विवाह के बाद पत्नी के पिता का गोत्र लुप्त हो जाता है और वह पति के गोत्र को धारण करती है।

इन शिलालेखों में एक दूसरी महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि सातवाहन स्वयं को ऐसे अनोखे ब्राह्मणों के रूप में प्रस्तुत करते हैं जिन्होंने क्षत्रियों के अभियान को कुचल दिया। परन्तु ब्राह्मणिक ग्रंथों के अनुसार केवल क्षत्रियों को ही शासन करने का अधिकार था। ये शिलालेख इसलिए भी उपयोगी हैं कि आबादी के विभिन्न वर्गों द्वारा दिये गये भू-दान के प्रमाण इनमें उल्लेखित हैं जिससे कि समाज के कुछ विशेष वर्गों की सम्पन्नता का अनुमान लगाया जा सकता है। दान करने वालों में व्यापारियों एवं सौदागरों का मुख्य रूप से संदर्भ आया है, परन्तु लुहारों, मालियों एवं मछुआरों के नामों का उल्लेख भी महत्त्वपूर्ण है। इनमें कोई संदेह नहीं कि इन कारीगरों एवं दस्तकारों को निश्चित रूप से दूरस्थ व्यापार से लाभ हुआ थाविशेष उल्लेखनीय यह है कि इन लोगों ने अपने नामों के साथ अपने व्यवसायों का उल्लेख किया है न कि अपनी जाति का। हमने पहले की इकाई में उद्धृत किया था कि बौद्ध ग्रंथों में समाज के विभाजन का विवरण ब्राह्मणिक ग्रंथों के विवरण से भिन्न हैयहाँ पर भिन्नता कार्य एवं दस्तकारिता पर आधारित थी और अधिकतर लोगों को उनके व्यवसाय के आधार पर जाना जाता था न कि जाति के आधार पर। 

दान कर्ताओं की एक और श्रेणी थी जिनको यवनों के नाम से या विदेशियों के रूप में जाना जाता है। यवन शब्द का प्रयोग अपने मूल शब्द में आयोनियन यूनानियों से किया जाता था किन्तु प्रथम सदी सी.ई. के आसपास इस शब्द का प्रयोग बिना किसी भेदभाव के विदेशियों के लिये किया जाने लगा। बहुत से यवनों ने प्राकृत नामों को धारण किया और बौद्ध भिक्षुओं को दान दिये। महिलायें स्वतंत्र रूप से अपने आप या अपने पतियों या बेटों के साथ उपहार देती थीं। सातवाहन रानियों में से नयनिका नाम की एक रानी ने वैदिक बलि अनुष्ठानों का आयोजन किया और ब्राह्मणों तथा बौद्ध भिक्षुओं को उपहार दान दिये।

इन सब प्रमाणों से स्पष्ट है कि दक्कन में समाज का संचालन जैसा कि इस काल के प्रमाणों से भी जाना जाता है, ब्राह्मणिक ग्रंथों में दिये गये नियमों के अनुसार नहीं होता था। इस प्रकार प्राचीन सामाजिक संरचना का पुनर्निर्धारण करते समय ग्रंथों के संदर्भो का हमें ध्यानपूर्वक विश्लेषण करना चाहिए तथा उनके तथ्यों की तुलना अन्य दूसरे स्रोतों जैसे कि शिलालेखों एवं पुरातात्विक तथ्यों के साथ करनी चाहिए।

जिन बौद्ध मठों का विवरण इस काल के स्रोतों में हुआ है इससे स्पष्ट है कि उनके व्यवहार एवं जीवन में बुद्ध के समय से काफी परिवर्तन हो चुका था। प्रारंभ में बौद्ध भिक्षुओं को कुछ ही व्यक्तिगत सामान रखने का अधिकार था। ये सामान कुछ ढीले-ढाले वस्त्रों एवं भिक्षा के पात्रों तक सीमित थे। परन्तु धीरे-धीरे बौद्ध संघ की सदस्यता का प्रभाव बढ़ता गया। हम देख चुके हैं कि सातवाहन राजाओं ने काफी बड़ी मात्रा में बौद्ध भिक्षुओं को धन एवं भूमि दान दिये। जिसके कारण संघ की सम्पत्ति में और वृद्धि हुई। इस काल के हमें कुछ ऐसे विवरण भी प्राप्त हुए हैं जिनके अनुसार बौद्ध भिक्षुओं एवं भिक्षुणियों ने स्वयं भी दान दिये। 

10. दक्षिण भारत (तमिलाहम्) : क्षेत्र विशेष 

वेंकटम पहाड़ियों और कन्याकुमारी के बीच के भूक्षेत्र को तमिलाम् यानी तमिल क्षेत्र कहते हैं। इसके अंतर्गत सम्पूर्ण आधुनिक तमिलनाडु और केरल आ जाते हैंइस क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की भौगोलिक पारिस्थितिकीय तथा जलवायु पाई जाती है। यहाँ वनों के आच्छादित पहाड़ियाँ, हरे मैदान, चरागाह, शुष्क प्रदेश, नम भूमि और लम्बे समुद्री तट भी हैं। तीन प्रमुख मुखियातंत्रों चेर, चोल और पांड्यों का भीतरी भू-भाग के साथ-साथ समुद्र तट पर भी नियंत्रण थाचेरों का भीतरी भू-भाग में करूर में भी पश्चिमी तट पर स्थित प्रसिद्ध प्राचीन बंदरगाह मुचरिस पर अधिकार था। भीतरी भू-क्षेत्र में उराईजूर पर और कोरोमंडल तट में पुहार पर चोलों का आधिपत्य था। इसी प्रकार पांड्यों का भू-क्षेत्रीय मुख्यालय मदुरई और तटीय मुख्यालय कोरकर थाये इस क्षेत्र के प्रमुख राजनीतिक केंद्र थे

11. पाँच पारिस्थितिकी प्रदेश और जीवनयापन का तरीका

प्राचीन तमिल काव्य में प्रदेश की प्राकृतिक विभिन्नता का सुंदर समन्वय हुआ है। यह आईनतिनै या पाँच विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों की अवधारणा के रूप में व्यक्त हुआ है। तमिलाहम् को पाँच तिनैं का समुच्चय बताया गया है, यह पाँच तिनैं हैं कुरिंजि (पहाड़ी वन क्षेत्र), पालै (शुष्क प्रदेश), मुल्लै (चारागाह क्षेत्र), मरूतम (नम भूमि) और नेयतल (समुद्र तट)।

कुछ प्रदेश ऐसे भी थे जहाँ एक से अधिक तिनैगल का अस्तित्व था। पर आमतौर पर अधिकांश तिनैंगल चारों तरफ बिखरे पड़े थे। भौगोलिक स्थितियों के कारण प्रत्येक तिनैं में मनुष्य के जीवनयापन का तरीका अलग-अलग था। सामाजिक समूह भी अलग-अलग थे। कुरिंजि प्रदेश में रहने वाले लोग शिकार और फल-फूल इकट्ठा कर अपनी जिंदगी बसर करते थे। पालै की सूखी भूमि के कारण, वहाँ के लोग कुछ उपजा नहीं सकते, अतः यहाँ के लोग जानवरों को चुराकर और लोगों को लूटकर अपना भरण-पोषण करते थे। मुल्ले के लोग पशुपालन और झूखेती करते थे। मरूतम में हल से खेती की जाती थी और नेयतल में मछली मारना और नमक बनाना जीवनयापन का मुख्य साधन था। इस प्रकार तमिलाहम् के पाँच तिनैगल में भौगोलिक प्रभावों के कारण जीवन यापन के भिन्न-भिन्न तरीके अपनाये जाते थे। एक ति के लोग दूसरे तिनैगल के लोगों से वस्तुओं का आदान-प्रदान करते थे। जैसे पहाड़ियों में रहने वाले लोग मैदानी इलाके में अपने वन्य उत्पादों जैसे शहद, मांस, फल आदि के साथ आते थे। तटीय प्रदेश में रहने वाले लोग उनके इन पदार्थों के बदले मछली और नमक की आपूर्ति करते थे। कृषि प्रदेश सभी को आकर्षित करते थे। छोटे आत्मनिर्भर तिनैगल का इस प्रकार के आदान-प्रदान और आपसी निर्भरता से अपेक्षाकृत बड़े पारिस्थितिकी में विकास हुआ। इनमें से कुछ प्रदेशों में उत्पादन की दृष्टि से स्थिति अनुकूल थी और कुछ प्रदेशों में प्रतिकूल। बेहतर उत्पादन वाले इलाके में अपेक्षाकृत विकसित सामाजिक श्रम विभाजन अस्तित्व में था। कम उत्पादन वाले इलाके में सामाजिक संरचना सरल थी और वह कुल से मिलकर बनी थी। कुल मिलाकर तमिलाहम् असमान रूप से विकसित तत्वों से मिलकर बने एक जटिल समाज का प्रतिनिधित्व करता था जिनकी सांस्कृतिक विरासत एक समान थी। इस समाज में ई प्रकार की राजनीतिक व्यवस्थाएँ थीं, जिनमें कुल पर आधारित सरल मुखियातंत्र से लेकर राजघरानों द्वारा शासित जटिल मुखियातंत्र का अस्तित्व था। पूर्णविकसित राज्य का निर्माण होना अभी बाकी था। 

12. राजनीतिक समाज का उद्भव 

विभिन्न कुलों के मुखियातंत्र से राजनीतिक समाज का उद्भव माना जा सकता है। कुलों का यह मुखियातंत्र बड़ा भी होता था और छोटा भी। कविताओं में कुल मुखियातंत्र के मुखियाओं को श्रेष्ठ (पेरु-मकन) या मुखिया पुत्र (को-मकन) कहा गया है, इससे कुल के सदस्यों और मुखिया के बीच संबंध का भी पता चलता है। वस्तुतः इससे नातेदारी के आधार का पता चलता है। इसमें से कुछ मुखियातंत्रों ने दूसरे कुलों पर विजय प्राप्त करके उन्हें अपने कुल में मिलाकर, क्त संबंधीय आधार पर अतिक्रमण भी किया होगाअपेक्षाकृत जटिल प्रकृति के बड़े मुखियातंत्रों का निर्माण आक्रमणों और दूसरों के इलाकों पर कब्जा जमा कर ही हुआ है। मुखियाओं की वैवाहिक संधियों के कारण भी बड़े मुखियातंत्रों का निर्माण हुआ, पर मुखियातंत्रों के विकास का मुख्य आधार उनकी सम्पत्ति थी। जिनके पास धिक खेतिहर इलाके थे, वे मुखियातंत्र अधिक शक्तिशाली थेसमकालीन तमिल क्षेत्र में इस प्रकार के मुखियातंत्रों में चे, चोल और पांड्य सर्वप्रमुख थे। ये मुखियातंत्र राज्य के उद्भव के पूर्व के चरण का प्रतिनिधित्व करते थे।

12.1 विभिन्न प्रकार के मुखियातंत्र 

तमिल क्षेत्र में तीन प्रकार के मुखियातंत्र थे। इन्हें किलार (छोटे मुखिया), वेलीर (बड़े मुख्यिा) और वैडर (सबसे बड़े मुखिया) कोटि में विभक्त किया जाता था। किलार छोटे गाँवों (उर) के मुखिया होते थे, जहाँ रक्त संबंध का आधिपत्य था। काव्यों में कई किलारों का उल्लेख किया गया है। उनके आगे उनके अपने गाँव का नाम जुड़ा होता था जैसे उरूट्र-किलार या उरंटूर किलार । इनमें से कुछ प्रदेशों को बड़े मुखियातंत्रों ने हड़प लिया था और उन्हें बड़े मुखियातंत्रों के अभियान में साथ देना पड़ता था। काव्य में इस बात का उल्लेख है कि किलारों को बड़े मुखियातंत्रों जैसे चेर, चोल और पांड्य के सैनिक अभियानों में विदुतोलिल (अनिवार्य सेवा) करनी पड़ती थी। इसके बदले में बड़े मुखियातंत्र किलारों को बतौर इनाम कुछ पराजित गाँवों का नियंत्रण सौंप देते थे। वेलीर मुख्यतः पहाड़ी क्षेत्र पर नियंत्रण रखते थे, पर इनमें से कुछ मैदानी इलाकों में भी जमे हुए थे। पहाड़ियों पर स्थित मुखियातंत्रों के मुखिया मुख्यतः शिकारी प्रमुख होते थे, जिसे वैडर कोमान या कुरवर-कोमान या नेडु वेटुवन के नाम से जाना जाता था। वेडर-कुरवर और वेटुवर पहाड़ी इलाके के प्रमुख कुल थे, जिसमें वेलीर का वर्चस्व था। इस काल के मुखियातंत्रों के प्रमुख केंद्र वैंकटमलै (वेंकम की पहाड़ियाँ), नांजिलमलै (त्रावणकोर की दक्षिणी पहाड़ी), परमपुरलाई (संभवतः पोल्लाच्ची के समीप आधुनिक परम्पिकुल्लभ आरक्षित व), पोट्टिलमलै (महुरै जिले की पहाड़ियाँ) आदि थे। बड़े मुखिया तंत्रों की श्रेणी में चेर, चोल और पांड्य प्रमुख राजघराने थे। इन्हें मूवेंदर के नाम से जाना जाता था। इन राजघरानों का बड़े हिस्सों पर नियंत्रण था। चेरों का नियंत्रण पश्चिमी घाट में स्थित कुरिंजों पर था। चोलों का कावेरी क्षेत्र पर और पांड्यों का दक्षिण-मध्य समुद्री इलाके पर नियंत्रण था। उनके अधीन कई छोटे-छोटे सरदार थे, जो नजराना (तियरई पेश किया करते थे। उस समय तक राज्य क्षेत्र का कोई निश्चित सीमा-निर्धारण नहीं हो सकता था। इस युग में राजनीतिक अधिकार का कार्यान्वयन जनता के माध्यम से होता था न कि मूलभूत स्रोतों पर अधिकार जमाकर | जैसे कि कुरवर या वेतर या वेंटुवर जैसे लोगों पर नियंत्रण स्थापित कर ही कोई मुखिया सरदार बन पाता था। इन लोगों का सामूहिक तौर पर पहाड़ी या मैदानी इलाकों पर अधिकार होता था। मुखिया या सरदार सगोत्रता पर आधारित समाज से ही अधिकार प्राप्त करता था। विभिन्न स्रोतों पर किसी व्यक्ति विशेष का अधिकार न होकर बल्कि पूरे समुदाय का अधिकार होता था, यह उनका वंशानुगत अधिकार होता था। यह वंशपरम्परा पर आधारित समुदाय था और वे स्वेच्छा से अपने मुखिया को नजराना देते थे। नियमित और निश्चित समय पर करों का भुगतान करना प्रचलन में नहीं था। फिर प्रमुख मुखिया की शक्ति अपने क्षेत्र की उत्पादकता और उपजाउपन पर आधारित होती थी। पशुपालक या शिकारी समुदाय के सरदार की शक्ति खेतिहर इलाके के सरदार से कम होती थी। शक्तिशाली सरदार कमज़ोर सरदार के इलाकों पर कब्जा जमा लेते थे और उनसे नजराना वसूल करते थेइस काल में लूटमार का धन इकट्ठा करना एक म प्रचलन था।

12.2 लूटमार और लूट के माल का बंटवारा

अपने लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़े और छोटे सरदार अक्सर लूटमार किया रते थे। ये सरदार अपने सगोत्रों के अलावा लूट के माल का हिस्सा सैनिकों, भाटों और चिकित्सकों को भी दिया करते थे। कोडै संस्था (उपहार प्रदान करने की संस्था) लूट के माल के पुनर्वितरण की प्रथा का एक अंतरिम हिस्सा थी। उपहार प्रदान करना किसी भी सरदार का महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व माना जाता था। पुरनानूरू (एटुत्तोगै) की परम्परा में संकलित एक काव्य की अधिकांश कविताओं में सरदार की उदारता की प्रशंसा की गयी हैं। इन कविताओं के अनुसार बहादुरी और उदारता को सरदारों का प्रमुख गुण माना जाता था। स्थानीय स्रोतों के अभाव में लूटमार आय का प्रमुख स्रोत बन जाता था। पुरनानूरू में संकलित एक काव्य में ऊर्तरकिजार नाम के सरदार का उल्लेख है, जिसके पाआय के स्रोत काफी कम थे। जब भी कोई व्यक्ति उससे उपहार मांगने जाता था, तो वह पने लोहार को बुलाकर नया बल्लम बनाने का आदेश देता था ताकि वह लूटमार करके धन एकत्र कर उसे उपहार के तौर पर अपने आश्रितों को दे सके। इस प्रकार लूटमार और प्राप्त माल का पुनर्वितरण उस समय की राजनीतिक व्यवस्था का एक अंग बन चुका था। सरदार एक दूसरे को लूटा करते थे। लूटमार के अभियान में छोटे सरदार बड़े सरदारों का साथ देते थे और लूट के माल के समय इनकी नजर ज्यादातर पशुधन और अनाज पर होती थी। इस काल के भाटों ने अपने गायन में हाथी, घोड़े, स्वर्ण कमल, रथ, हीरे-जवाहरात और मलमल के कपड़े आदि उपहारों की चर्चा की है। कभी-भी बड़े सरदार अपने आक्रमण के दौरान दूसरे सरदारों के भू-क्षेत्र पर भी अधिकार कर लेते थे। इन अधिकृत भू-क्षेत्रों को बड़े सरदार अपने सहायक छोटे सरदारों के बीच बाँट दिया करते थे। यह स्मरणीय है कि गाँव की भूमि नहीं बल्कि लोगों पर स्थापिनियंत्रण को दान किया जाता था। 

12.3 मूवेंदर और राजनीतिक नियंत्रण के विभिन्न स्तर

प्रधान शासक समुदाय के रूप में मूवेंदर की पुरातनता मौर्यकाल तक जाती है। अशोक की राजविज्ञप्तियों/फरमानों में उनका जिक्र मिलता है। भाट मूवेंकी स्तुति एक “राजा’ के रूप में करते हैं, और उनके अनुसार मूवेंदर का अधिकार पूरे तमिल क्षेत्र पर था। पर “राजा” के उल्लेख का यह मतलब नहीं है राज्य की स्थापना हो चुकी थी। एक राज्य के निर्माण के लिए स्थायी सेना, नियमित कर व्यवस्था, नौकरशाही और स्थानीय प्रशासनिक निकायों का होना अनिवार्य है। अभी तक इनकी उत्पत्ति नहीं हो सकी थी। इसके बावजूद मूवंदर अन्य सरदारों से बिल्कुल भिन्न था। लगातार छोटे सरदारों को अपने अधीन लाने का प्रयत्न करते रहे। तीनों शासक समुदाय – चेर, चोल और पांड्य का एक ही प्रमुख मकसद था, वेलीर (बड़े सरदारों) को अपने अधीन करना। वेलीर सरदार की परम्परा भी काफी प्राचीन थी। अशोक के फरमान में चेर, चोल और पांड्यों के साथ-साथ सत्यपुत्रों या अडैगैमान सरदारों का भी उल्लेख हुआ है। सत्यपुत्र वेलीर सरदारों की श्रेणी में आते थे। उनका ऊपरी कावेरी की पहाड़ियों पर स्थित लोगों पर नियंत्रण था। अन्य वेलीर सरदारों का अधिकार क्षेत्र मूवेंदकी सीमा से लगी हुई ऊँची भूमि और समुद्री तट तक फैला हुआ था। वेलीर सरदारों के नियंत्रण में पहाड़ी और मैदानी इलाके थे, इनमें प्रमुख हैं : धर्मपुरी, नीलगिरि, मदुरई, उत्तरी आर्कोट, त्रिचिनापल्ली, पुदुकोट्इ आदि आधुनिक जिले। तमिल क्षेत्र में लगभग पन्द्रह महत्त्वपूर्ण वेलीर मुखियातंत्र अस्तित्व में थे। इनमें से कुछ वेलीरों का नियंत्रण व्यापारिक स्थल, बंदरगाह पहाड़ियों के मुहाने और पहाड़ी बस्तियों जैसे महत्त्वपूर्ण केंद्रों में रहने वाले लोगों पर था। स्थान और स्रोतों से उनकी शक्ति का निर्धारण होता था। भारतीय-यूनानी व्यापार की शुरुआत होने के बाद महत्त्वपूर्ण स्थानों और व्यापारिक माल पर नियंत्रण से सरदारों का महत्त्व बढ़ गया। कविताओं में परंबुमैल के पारी के पराम्बुमलाई (पोल्लाची के समीप) पोडिइलमलाई के अरियार (मदुरई), नंजीमलाई आंदीरन (श्रावणकोर के दक्षि), कोडुम्बै के इरून्को-वेल (पदुक्कोट्टइ) आदि प्रमुख वेलीर सरदारों का जिक्र किया गया है। ऐसे सामरिक महत्त्व के क्षेत्रों के वेलीर सरदारों को बार-बार मूवेंदर जैसे बड़े सरदारों का आक्रमण झेलना पड़ता था। इस भागदौड़ में कभी-कभी कमज़ोर सरदारों का विनाश भी हो जाता था। भूवेंदर द्वारा परंबुनाडु के वेलीर सरदार की सारी रियासत का नाश इसी प्रकार का उदाहरण हैयुद्ध के अतिरिक्त विवाह के माध्यम से भी बड़े सरदार वेलीर रियासत तक पहुँचने की कोशिश करते थे। चेर, चोल और पांड्यों द्वारा वेलीरो की लडकी से शादी करने के कई उदाहरण मिलते हैं; सामरिक महत्त्व के क्षेत्र के सरदार पर बड़े सरदार सैन्य नियंत्रण रखते थे। उनका दमन करके बड़े सरदार उन्हें अपने अधीन कर लेते थे। मूवेंदर के नियंत्रण में ऐसे कई पराधीन सरदार थे, जो लूमार के अभियान में उनका साथ देते थे। यह स्पष्ट है कि समकालीन तमिल क्षेत्र में मूवेंदर सर्वशक्तिमान राजनीतिक सत्ता थी। इसके बाद वेलीर का स्थान आता था। जबकि किलार के ग्रामीण सरदार राजनीतिक शक्ति का प्राथमिस्तर थे। इन्हें देखकर एक राजनीतिक पदानुक्रम का आभास होता है पर राजनीतिक शक्ति के इन तीन स्तरों को सूत्रबद्ध करने के लिए राजनीतिक नियंत्रण की कोई कड़ी नहीं बन पाई थी। मूवेंदर द्वारा युद्ध और विवाह के माध्यम से छोटे सरदारों को अपने अधीन करने की प्रक्रिया जारी रही, पर अभी भी एक एकीकृत राजनीतिक व्यवस्था का अभाव था। सगोत्रीय आधार पर संगठित कुलों पर परम्परागत अधिकार ही इस काल के राजनीतिक नियंत्रण का आधार था। परम्परागत ज्येष्ठ लोगों की सभा प्रतिदिन के सभी कार्यकलापों को संपादित करती थी। सभी स्थल को मन्रम कहा जाता था। अर्थात् किसी पेड़ के नीचे बैठने के लिबनाया गया चबूतरा इसे पोदियिल भी कहते थे । सरदार की सहायता के लिए ज्येष्ठों की एक सभा होती थी, जिसे अवै (सभा) कहा जाता था, इसकी संरचना बनावट और कार्य का अभी तक पूर्ण ब्यौरा प्राप्त नहीं हुआ है। आरंभिक तमिल राजनीतिक व्यवस्था के दो और निकायों की प्रायः चर्चा की जाती है, इसे ऐप्पेरूम कुजु या पाँच बड़े समूह और एणपेरायम या आठ बड़े समूहों के नाम से जाना जाता है। संभवतः इन निकायों का विकास तृतीय शताब्दी सी. ई. के आसपास हुआ था, यह काफी बाद की गतिविधि है। इन निकायों की संरचना और कार्यों का भी कुछ निश्चित पता नहीं चला है।