ताम्र पाषाण युग तथा आरंभिक लौह युग

इस पेज की पाठ्यक्रम

1. प्रस्तावना 2. गुरुए रंगे मृद्भाण्ड (Ochre Coloured Pottery) संस्कृति 3. ताम्र भंडारों (Copper Hoards) की समस्या

4. काले-एवं-लाल मृद्भांड (Black-and-Red Ware) संस्कृति 4.1 मृभांड 4.2 अन्य वस्तुयें 4.3 काले-एवं-लाल मृद्भांड

5. चित्रित धूसर मृद्भांड (Painted Grey Ware) संस्कृति  5.1 मृद्भांड 5.2 भवनों के अवशेष 5.3 अन्य वस्तुयें 5.4 पशु फसल अवशेष 5.5 व्यापार प्रथाएँ एवं कड़ियाँ

6. उत्तरी काली पॉलिश वाले मृद्भांड (Northern Black Polished Ware) संस्कृति 6.1 भवनों के अवशेष 6.2 बर्तन 6.3 अन्य वस्तुएँ 6.4 गहने 6.5 क्की मिट्टी की मूर्तियाँ 6.6 जीवन-यापन अर्थव्यवस्था एवं व्यापार

7. पश्चिमी, पूर्वी एवं मध्य भारत की ताम्र पाषाण युगीन संस्कृतियाँ 7.1 बर्तन : पहचान के लक्षण 7.2 अर्थव्यवस्था 7.3 घर एवं बस्तियाँ 7.4 अन्य विशेषताएँ 7.5 धर्म एवं विश्वास 

7.6 सामाजिक संगठन

8 दक्षिण भारत में आरंभिक कृषक बस्तियाँ 8.1 सांस्कृतिक चरण 8.2 जीवन यापन अर्थव्यवस्था 8.3 भौतिसंस्कृति 8.4 दाह संस्कार के तरीके 9 दक्षिण भारत में सतह पर मिलने वाले नवपाषाण संस्कृति के अवशेष 

10 दक्षिण भारत में लौह युग के अवशेष 10.1 महापाषाण युगीन संस्कृतियाँ 10.2 महापाषाण युगीन संस्कृतियों की उत्पत्ति 10.3 भौतिक संस्कृति 10.4 जीवन-यापन अर्थव्यवस्था 

11 सारांश 

1 प्रस्तावना 

दूसरी सहसाब्दी बी.सी.ई. तक भारतीय उपमहाद्वीप के विभिन्न भागों में विभिन्न क्षेत्रीय संस्कृतियाँ अस्तित्व में आयीं। ये संस्कृतियाँ न तो शहरी थीं और न ही हड़प्पा संस्कृति की तरह थीं, बल्कि पत्थर एवं ताँबे के औज़ारों का इस्तेमाल इन संस्कृतियों की अपनी विशिष्टता थी। अतः यह संस्कृतियाँ ताम्र पाषाण संस्कृतियों के नाम से जानी जाती हैं। ताम्र पाषाण संस्कृतियाँ अपनी भौगोलिक स्थितियों के आधार पर पहचानी जाती हैं। इस प्रकार हम इन्हें निम्नलिखित रूप से वर्गीकृत करते हैं : 

  • राजस्थान में बानस संस्कृति (बानस घाटी में स्थित),
  • कायथा संस्कृति (चम्बल की सहायक नदी काली सिंध के तट पर स्थित कायथा नामक स्थान पर नामांकित) जो मध्य भारत (नर्मदा, तापती तथा माही घाटी में) में कई स्थलों पर पाई जाती है,
  • मालवा संस्कृति (मालवा तथा मध्य प्रदेश एवं महाराष्ट्र के अन्य भागों में बिखरी संस्कृति), 
  • जोर्वे संस्कृति (महाराष्ट्र)। इन संस्कृतियों से संबंधित स्थलों की खुदाई से हम इनके निम्न पक्षों के बारे में विस्तृत अनुमान लगा सके हैं : 
  • बस्तियों का फैलाव,
  • अर्थव्यवस्था का ढाँचा,
  • शव गृह और शवदाह के तरीके, 
  • धार्मिक विश्वास। 

खुदाई स्थलों में इस संस्कृति से संबंधित वस्तुओं के साथ-साथ उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, बिहार, पश्चिमी बंगाल, उडीशा एवं कर्नाटक के विभिन्न भागों में ताम्र/कांस्य की वस्तुओं के भंडार प्राप्त हुए हैं। चूंकि ये वस्तुएँ भंडारों (उपरोक्त राज्यों के 85 स्थानों पर लगभग एक हज़ार वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं) के रूप में प्राप्त हुई है, अतः इन क्षेत्रों के एक भिन्न ताम्र भंडार संस्कृति से सम्बद्ध होने का अनुमान लगाया गयासाईपई (इटावा जिला) उत्तर प्रदेश में ताम्र मत्स्यभाला तथा उसके साथ गेरुए चित्रित बर्तन (OCP) प्राप्त हुए हैं। यद्यपि कुछ अन्य ताम्र वस्तुओं के भंडार स्थलों में भी गेरुए चित्रित बर्तन मिले हैं किन्तु इस ताम्र भंडार का चित्रिबर्तनों के साथ सीधा सम्पर्क नहीं है। चूंकि गंगायमुना दोब में 100 से अधिक स्थानों पर ये विशिष्ट प्रकार के बर्तन प्राप्त हुए हैं अतः इन्हें गेरुए चित्रित र्तनों की संस्कृति से संबंधित माना जाता है। गेरुए चित्रित बर्तनों की संस्कृति के बाद काले-एवं-लाल मृद्भाण्डों की संस्कृतियाँ तथा चित्रित धूसर मृद्भाण्डों की संस्कृतियाँ जो कि विशिष्ट प्रकाके बर्तनों के आधार पर पहचानी जाती हैं, का युग आता हैउत्तर भामें हरियाणा तथा ऊपरी गंगा घाटी में चित्रिधूसर मृदभाण्ड के स्थलों की बड़ी संख्या मिलती है जिनमें 30 की अब तक खुदाई हो चुकी है।

इस बिन्दु पर काले-एवं-लाल मृद्भाण्ड, चित्रित धूसर मृदभाण्ड तथा उत्तरी काली पॉलिश किए मृद्भाण्ड जैसी शब्दावलियों की व्याख्या आवश्यक है। यह संस्कृतियाँ बर्तनों की विशिष्ट किस्मों के आधार पर निर्धारित की जाती है क्योंकि बर्तनों की विशिष्ट किस्म उक्त संस्कृति का विशिष्ट लक्षण होती है। यद्यपि उक्त संस्कृति के कई अन्य पक्ष भी हो सकते हैं। विशिष्ट मृद्भाण्डों अथवा बर्तनों का प्रयोग किसी विशिष्ट संस्कृति की पहचान अथवा उसे नाम देने के उद्देश्य से किया जाता है। उदाहरणार्थ, किसी विशेष क्षेत्र में यदि चित्रित धूसर मृद्भाण्ड पाए जाते हैं तो वहाँ की संस्कृति को चित्रित धूसर मृद्भाण्डों की संस्कृति कहा जाता है।

लोहे का प्रादुर्भाव सर्वप्रथम चित्रित धूसर मृद्भाण्ड संस्कृति में होता है और इसके बाद की संस्कृति जो कि उत्तरी काली पॉलिश किए मृद्भाण्डों की संस्कृति के नाम से जानी जाती थी तथा आगे के चरणों में इसका प्रयोग बहुत विस्तृत पाया जाता है। 600 बी.सी.ई. से शहरीकरण का आरंभ दिखाई पड़ता है।

हड़प्पा सभ्यता के पतन के बाद के सांस्कृतिक विकास को समझने के लिए हमें चर्चा उत्तभारत, विशेषकर गंगा-यमुना दोब से आरम्भ करनी चाहिए। 

2. गेरुए रंगे मृदभांड (Orchre Coloured Pottery) संस्कृति

1950 में उत्तर प्रदेश में बिसौली (बदायूं जिला) तथा राजपुर परसू (बिजनौर जिला), जो कि दोनों ही ताम्र भंडार क्षेत्र हैं, की परीक्षण दृष्टि से खुदाई में नए किस्म के बर्तन प्राप्त हुए । बर्तन मध्यम स्तर की दानेदार मिट्टी से बनाकर कम तपाए गए हैं। इन्हें नारंगी से लेकर लाल रंग क के गेरुए, जो कि प्रायः घिसने पर धूमिल हो जाता है, रंग से रंगा गया है। इस प्रकार के मृद्भाण्डों से सम्बद्ध क्षेत्र गेरुए रंगे बर्तनों की संस्कृति (O.C.P.) वाले क्षेत्र कहलाते हैं। मायापुर (सहारनपुर जिला) से लेकर साईपई (इटावा जिला) तक लगभग 100 स्थल इस विशिष्ट संस्कृति के हैं।

Thermoluminiscence (ताप संदीप्ति परीक्षा) काल पद्धति के आधार पर ओ.सी.पी. मृद्भाण्ड संस्कृति का काल लगभग 2000-1500 बी.सी.ई निर्धारित किया गया है। 

गेरुए रंगे बर्तनों के क्षेत्र सामान्यतः नदियों के तटों पर मिले हैं। ये क्षेत्र आकार में छोटे हैं तथा कई क्षेत्रों (जैसे बहादराबाद, बिसौली, राजपुर परसू, साईपई) में टीलों की ऊँचाई काफी कम है। इससे इन बस्तियों के जीवन काल अवधि अपेक्षाकृत कम होने की ओर संकेत मिलता है। बस्तियों के बीच की दूरी 5 से 8 किलोमीटर के बीच पाई गयी है। कुछ गेरुए चित्रित बर्तनों के क्षेत्रों (जैसे अम्बखेरी, बहेरिया, बहादराबाद, झिंझाना, लाल किला, अतरंजीखेड़ा, साईप) की खुदाई से यहाँ नियमित बस्तियाँ होने के लक्षण नहीं मिले हैं। हस्तिनापुर तथा अहिक्षेत्र में गेरुए रंगे बर्तनों की संस्कृति तथा इसके बाद आने वाली चित्रित धूसर बर्तनों की संस्कृति के बीच की प्रक्रिया अवरोधित प्रतीत होती है, जबकि अतरंजीखेड़ा में गेरुए रंगे बर्तनों के स्तर के बाद कालेएवं-लाल मिट्टी के बर्तनों के स्तर आते हैंगंगायमुना दोआब में लगभग 100 से ज्यादा स्थल इस संस्कृति के हैंओ.सी.पी. संस्कृति के बाद बी.आर.डब्ल्यू. तथा पी.जी.डब्ल्यू. संस्कृतियाँ पाई जाती हैं जिनकी मुख्य विशेषता मृद्भाण्ड हैं।

गेरुए रंगे बर्तनों की संस्कृति के भौतिक अवशेष मुख्य रूप से बर्तन हैंइनमें मर्तबान (भंडारण करने वाले जार सहि), गोल आधार वाले प्याले, सुराही, दस्तेवाले बर्तन, छोटे बर्तन, पात्र, टोटी वाले बर्तन आदि शामिल हैं।

अन्य वस्तुओं में, पक्की मिट्टी की चूड़ियाँ, पक्की मिट्टी व इन्द्रगोप के मनके तथा पक्की मिट्टी की जानवरों की मूर्तियाँ एवं गाड़ी के पहिए जिनके केंद्र में एक गुमटा है, पत्थर की चक्की एवं मूसल तथा हड्डियों के हरावल प्राप्त हुए। साईपई में गेरुए बर्तनों के क्षेत्र में एक ताम्र त्स्यभाला भी प्राप्त हुआ है।

घरों के ढाँचों से सम्बन्धित अधिक प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं। पुराना किला से प्राप्त प्रमाणों, जो कि अपर्याप्त हैं, के आधार पर अनुमान लगाया गया है कि फर्श थापी हुई मिट्टी के बनाये जाते थे। घर सरपट एवं उस पर मिट्टी की लिपाई के साथ बनाए जाते थे। ऐसा अनुमान पुराना किला में प्राप्त तपी मिट्टी के लेप एवं मिट्टी पर सरकड़े एवं बाँस के निशानों के आधार पर लगाया गया है। 

इस संस्कृति से संबंधित अंतरजीखेड़ा से प्राप्त पुरातात्विक-वानस्पतिक अवशेषों से पता चलता है कि इन क्षेत्रों में धान, जौ, दालें तथा केसरी की फसल उगाई जाती थी। बर्तनों के प्रकारों में समानता के आधार पर कुछ विद्वानों के विचार हैं कि गेरुए रंगे बर्तन उत्तर-हड़प्पा के तुच्छ मृद्भाण्डों का ही रूप हैं।

गेरुए रंगे बर्तनों से प्राप्त ताप संदीप्ति परीक्षा के आधार पर यह संस्कृति 2000 बी.सी.ई. से 1500 बी.सी.ई. के बीच की मानी गयी है। 

3. ताम्र भंडारों (Copper Hoards) की समस्या 

ताम्र भंडार संस्कृति के संबद्ध प्रथम ताम्र वस्तु (ताम्र मत्स्यभाला) 1822 में ही कानपुर जिले के बिठूर नामक स्थान पर प्राप्त हुआतब से लेकर अब तक 85 विभिन्न क्षेत्रों में लगभग एक हज़ार ताम्र वस्तुएँ भंडारों में मिली हैं

यह संभव है कि ऐसे ताम्र भंडार गुजरात और आंध्र प्रदेश में मिले हों परन्तु इनकी विधिवत सूचना उपलब्ध नहीं करायी गयी है। 

मध्य प्रदेश में गुंगेरिया को छोड़कर, जहाँ कि केवल एक भंडार से 424 ताम्र वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं, भंडारों में ताम्र वस्तुएँ पाए जाने की औसत 1 से 47 के बीच है। यह ताम्र भंडार हल चलाते समय, नहर खोदते अथवा सड़क बनाते समय प्रकाश में आए एवं सभी उपलब्धियाँ संयोगिक रही हैं। केवल साईपई में ही गेरुए चित्रित बर्तनों से सम्बन्धित क्षेत्र की खुदाई में एक ताम्र मत्स्यभाला प्राप्त हुई थी।

इन ताम्र भण्डारों में निम्न वस्तुएँ विशिष्ट हैं।

शृंगिका तलवार : शृंगिका तलवार (जिसकी लम्बाई 40 से.मी. से 50 से.मी. के बीच है) में एक फलक तथा एक दस्ता है। दस्ता किसी कीटाणु के शृंगिका की भांति विभक्त है। शृंगिका तलवार के फलक का मध्य वक्र काफी स्पष्ट है।

बेधनी तलवार : इन तलवारों में फलक के बजाय दस्ते पर कांटेदार बेधनी हैं।

मानवकल्प : मानवकल्प विशालकाय मानवरूपी वस्तु है जिनके हाथ मुड़े हुए हैं तथा बाहरी सिरा धारदार है। बाजू सर की अपेक्षा पतले हैं। लम्बाई 25 से.मी. से 45 से.मी. तथा चौड़ाई 30 से.मी. से 43 से.मी. के बीच है। इनका वजन 5 किलोग्राम तक है। (इनके अतिरिक्त अन्य प्रमुख वस्तुएँ नीचे दिये गये चित्र में दर्शायी गयी हैं।)

साईपई में गेरुए चित्रित बर्तनों के साथ ताम्र मत्स्यभाले के पाए जाने तथा अन्य गेरुए रंगे मृद्भाण्ड क्षेत्रों में ताम्र भंडार पाए जाने (तथापि यह प्रत्यक्ष पुरातात्विक संबंध पर आधारित नहीं हैं) के आधार पर इन्हें गेरुए रंगे मिट्टी के बर्तनों की संस्कृति से जोड़ा जा सकता है। इस प्रकार ताम्र भंडारों का काल 2000 बी.सी.ई. से 1500 बी.सी.ई. के बीच रखा जा सकता है। 

4. काले-एवं-लाल मृद्भाण्ड (BLACK-AND-RED WARE) संस्कृति

1960 के दशक के आरंभ में अतरंजीखेड़ा में खुदाई के दौरान एक विशिष्ट प्रकार के, गेरुए रंगे बर्तनों एवं चित्रित धूसर मृदभाण्डों के स्तरों के बीच के मृद्भाण्ड प्रकाश में आए। इस स्तर के विशिष्ट बर्तन काले-एवं-लाल मृद्भाण्ड कहे जाते हैं। जोधपुरा एवं नोह (राजस्थान) से 1970 के दशक में इसी प्रकार के स्तरीय क्रम प्रकाश में आए। किंतु अहिच्छत्र, हस्तिनापुर एवं आलमगीरपुर में काले-एवं-लाल मृद्भाण्ड चित्रित धूसर मृद्भाण्डों के साथ प्राप्त हुए हैं।

4.1 मृद्भाण्ड 

इन बर्तनों के विशिष्ट लक्षण यह हैं कि बर्तनों के अन्दर के भाग तथा बाहर के भाग में किनारा काले रंग तथा शेष बर्तन लाल रंग का है। ऐसा विश्वास है कि रंग का यह समायोजन बर्तनों को उल्टा करके तपा कर लाया गया है। बर्तन अधिकतर चाक पर बनाये गये हैं, यद्यपि कुछ हाथ से बनाए हुए बर्तन भी हैं। महीन मिट्टी के बने इन बर्तनों की बनावट काफी सुगठित हैं तथा किनारे पतले हैं। काले-एवं-लाल मृद्भाण्ड राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार तथा पश्चिमी बंगाल में भी पाए गए हैं, किंतु दोब के काले-एवं-लाल मृद्भाण्ड चित्रित नहीं हैं।

4.2 अन्य वस्तुएँ

अतरंजीखेड़ा में खुदाई के दौरान पत्थर के टुकड़े, परत तथा टुकड़े, स्फटिक, सिक्थस्फटिक, अकीक तथा इन्द्रगोप के मूलभाग, इन्द्रगोप, सीप तथा ताम्र का एक मनका, ताम्र का एक चक्र तथा हड्डी से बनी कंघी का एक टुकड़ा प्राप्त हुआ है। पत्थर अथवा धातु के कोई औज़ार नहीं मिले हैं। जोधपुरा में हड्डी की नुकीली कील मिली है। नोह में आकृति रहित लोहे का टुकड़ा, पक्की मिट्टी का एक मनका तथा एक हड्डी की कील मिली है।

4.3 काले-एवं-लाल मृद्भाण्ड

कुछ विद्वान यह मानते हैं कि अतरंजीखेड़ा तथा पश्चिमी राजस्थान में गिलुन्द तथा अहार में मिले काले-एवं-लाल मृद्भाण्डों के स्वरूप, बनावट एवं चमक के आधार पर समानता है। लेकिन इन स्थानों से प्राप्त बर्तनों के आकार और रूपरेखा में विभिन्नताएँ भी हैं जो निम्न हैं: 

    • दोआब के (तथा नोह के) काले-एवं-लाल बर्तनों की मुख्य विशेषता उनका सादा पृष्ठभाग है जो कि चित्र रहित है। जबकि गिलुंद एवं अहार में मिट्टी के बर्तन के काले पृष्ठभाग पर सफेद रंग के चित्र हैं।
    • इनमें किस्मों का भी अंतर है। अहार के चित्रिकाले-एवं-लाल मिट्टी के बर्तनों में स्पष्ट रूप से कोणिक अवतल किनारे हैं तथा बनावट खुरदुरी हैदोआब के काले-एवंलाल मिट्टी के बर्तनों में कोणिक किनारे नहीं हैं तथा बनावट चिकनी है
    • स्वरूप विहीन किनारे तथा अवतल भाग वाली तश्तरियाँ दोआब के काले-एवं-लाल मिट्टी के बर्तनों में प्रचुर संख्या में मिलती है जबकि अहार एवं गिलुंद में ऐसी तश्तरियाँ नहीं प्राप्त हुईं।
    • टोटी वाले प्याले तथा आधार (Stand) वाली तश्तरियाँ अहार एवं गिलुंद में प्राप्त हुई लेकिन दोआब क्षेत्रों में नहीं प्राप्त हुई।

यह तथ्य काफी महत्त्वपूर्ण है कि काले-एवं-लाल मृद्भाण्ड विभिन्न क्षेत्रों में थोड़ी बहुत भिन्नताओं के साथ काफी बड़े क्षेत्र में फैले पाए गए हैं। ये मृद्भाण्ड उत्तर में रोपड़ से लेकर दक्षिण में आदिचनालूर तथा पश्चिम में अमरा तथा लाखबवाल से लेकर पूर्व में पाँडु-राजार ढिब्बी तक प्राप्त हुए हैं। इनका समय परिप्रेक्ष्य भी काफी लम्बा है जो कि लगभग 2400 बी. सी.ई. से लेकर सी.ई. युग की आरंभिक शताब्दियों तक फैला हुआ है।

5. चित्रित धूसर मृदभाण्ड (PAINTED GREY WARE) संस्कृति

1946 में अहिच्छत्र में चित्रित धूसर मृद्भाण्डों की खोज के बाद से उत्तरी भारत के विभिन्न क्षेत्रों से ये बड़ी संख्या में प्रकाश में आए हैं। इनमें से 30 स्थानों की खुदाई हुई है जिनमें से मुख्य रोपड़ (पंजाब), भगवानपुरा (हरियाणा), नोह (राजस्थान), आलमगीरपुर, अहिच्छत्र, हस्तिनापुर, अतरंजीखेड़ा, जखेड़ा तथा मथुरा हैं। ये सभी उत्तर प्रदेश में हैं।

काले-एवं-लाल मृद्भाण्डों के क्षेत्र सिंधु-गांगेय विभाजन, सतलुज के थाले तथा गंगा के ऊपरी मैदानों में केंद्रित हैं। स्थलों के बीच की औसत दूरी 10 से 12 कि.मी. की है यद्यपि कुछ क्षेत्र 5 कि.मी. की दूरी पर भी हैं। इन क्षेत्रों की बस्तियाँ अधिकतर छोटे-छोटे गाँव हैं (जिनका क्षेत्रफल 1 से 4 हेक्टेयर के बीच है)। केवल हरियाणा में बुखारी (अम्बाला जिला) इसका अपवाद है जो कि 96, 193 वर्ग मीटर में फैला हुआ है। आइए, अब हम उन वस्तुओं पर दृष्टि डालें जिन्हें चित्रित धूसर मृद्भाण्ड संस्कृति से संबंधित समझा गया है। 

5.1 मृद्भाण्ड 

    • बर्तन चाक पर बनाए गए हैं। मिट्टी काफ़ी चिकनी है तथा बर्तनों का आधार काफ़ी पतला है।
    • इनका पृष्ठभाग चिकना है तथा रंग धूसर से लेकर राख के रंग के बीच है।
    • इनके बाहर तथा अन्दर के तल दोनों ही काले और काफी गहरे चॉकलेटी रंग में रंगे गए हैं। इन पर काले रंग की चित्रकारी है।
    • इनकी लगभग 42 किस्म के एक-रेखा चित्र (Design) हैं और इनमें सबसे सामान्य किस्म प्याले एवं तश्तरियाँ हैं।

5.2 भवनों के अवशेष 

अहिच्छत्र, हस्तिनापुर, अतरंजीखेड़ा तथा जखेड़ा की खुदाई के बाद घरों तथा अन्य ढांचों के सरपत एवं मिट्टी से पाथे होने की जानकारी मिलती है। तपाई मिट्टी, मिट्टी की ईंटों, तपाई ईंटों, मिट्टी के चबूतरे तथा मिट्टी के लेप के साथसाथ सरकण्डे एवं बाँस के निशान पाए जाने के आधार पर यह जानकारी मिलती हैभगवानपुरा (हरियाणा) क्षेत्र में खुदाई से घरों के ढांचों के भिन्न चरणों की ओर संकेत मिले हैं। प्रथम चरण में खंभों के गड्ढे घरों के गोलाकार एवं आयताकार होने की ओर संकेत करते हैं। दूसरे चरण में एक घर में 13 कमरे तथा दो कमरों के बीच बरामदा पाया गया है। इस घर में एक आंगन भी है। 

5.3 अन्य वस्तुएँ 

खुदाई के दौरान ताम्र, लौह, कांच तथा हड्डियों की कई प्रकार की वस्तुएँ मिली हैं। इनमें कुल्हाड़ियाँ, छेनियाँ, मछली के कांटे तथा बाण के फल मुख्य हैं। बरछे के फल केवल लोहे के हैं। खेती के उपकरणों में जखेड़ा में लोहे की बनी हंसिया और कुदाली प्राप्त हुई हैं। हस्तिनापुर के अतिरिक्त अन्य सभी क्षेत्रों में लोहे की वस्तुएँ मिली है। केवल अतरंजीखेड़ा से ही 135 वस्तुएँ मिली हैं जिनमें एक भट्टी, सतह पर लोहे का बुरादा तथा एक चिमटा मिला है। जोधपुरा में दो भट्टियाँ मिली हैं। 

अकीक, पकी मिट्टी, सूर्यकांत, इन्द्रगोप, सिक्थस्फटिक, लाजवर्द, कांच तथा हड्डी के मनकों के गहने पाये गये हैं। हस्तिनापुर में दो कांच की चूड़ियाँ तथा जखेड़ा में ताम्र की चूड़ियाँ मिली हैं। मिट्टी की वस्तुओं में मानवीय (पुरुष और स्त्री दोनों) तथा पशुओं (बैल और घोड़े) की मूर्तियाँ, चपटी गोलाकृतियाँ (disk), गेंद, कुम्हार की मोहरें आदि पाई गई हैं। 

5.4 पशु व फसल अवशेष

केवल हस्तिनापुर और अतरंजीखेड़ा में ही उगाई जाने वाली फसलों के प्रमाण मिले हैं। हस्तिनापुर में केवल चावल और अतरंजीखेड़ा में गेहूं और जौ के अवशेष मिले हैं। घोड़े, गाय, भैंसों, सुअर, बकरी और हिरन की हड्डियाँ हस्तिनापुर, अल्हापुर और अतरंजीखेड़ा से प्राप्त हुई हैं। इनमें जंगली और पालतू दोनों प्रकार के पशुओं की हड्डियाँ हैं।

5.5 व्यापार प्रथाएँ एवं कड़ियाँ

विभिन्न प्रकार के अर्धबहुमूल्य पत्थरों (जैसे अकीक, सूर्यकांत, इन्द्रगोप, सिक्थस्फटिक, लाजवर्द) के मनके दोब के विभिन्न चित्रित धूसर मृद्भाण्ड क्षेत्रों से प्राप्त हुए हैं। जहाँ तक इन पत्थरों के कच्चे खनिक के रूप में प्राप्त होने का प्रश्न है, इनमें से दोआब में एक भी त्थर उपलब्ध नहीं है। अकीक एवं सिक्थस्फटिक कश्मीर, गुजरात तथा मध्यप्रदेश में, तथा लाजवर्द अफगानिस्तान के बदखशां प्रांत में पाया जाता हैं। अतः चित्रित धूसर मृद्भाण्ड क्षेत्रों में निवासियों ने इन पत्थरों को इन क्षेत्रों से व्यापार के द्वारा अथवा विनिमय के रूप में प्राप्त किया होगा। 

उत्तर पश्चिमी भारत के बर्तनों तथा चित्रित धूसर मृद्भाण्डों (PGW) के आकार और रूप के आधार पर कुछ समानताएँ मिलती हैं। विशेषकर लोहे के साथ पाए गए सलेटी बर्तनों का धूसर मृद्भाण्ड संस्कृति से सम्बन्ध दिखलाई देता है। 

6. उत्तरी काली पॉलिश वाले मृद्भाण्ड (NORTHERN BLACK PALIDED WARE) संस्कृति

पूर्व संस्कृतियों की भाँति ही उत्तरी काली पॉलिश वाले मृद्भाण्ड संस्कृति की पहचान इसके विशिष्ट बर्तनों के आधार पर की जाती है। ये मृद्भाण्ड सर्वप्रथम 1930 में तक्षिला में मिले। इन मृद्भाण्डों की काली मक के कारण इनके खोजने वालों ने उस समय इन्हें ‘ग्रीक काले मृद्भाण्ड समझा। तब से लेकर अब तक उत्तर पश्चिम में तक्षिला तथा उदग्राम से लेकर पूर्वी बंगाल में तालमुक एवं दक्षिण में अमरावती (आंध्र प्रदेश) तक लगभग 1500 उत्तरी काली पॉलिश किए मृद्भाण्डों के क्षेत्रों की पहचान की जा सकी है जिसमें से 74 क्षेत्रों की खुदाई हो चुकी हैं।

उत्तरी काली पॉलिश किए मृद्भाण्डों के खुदाई किए गए मुख्य क्षेत्र

क्षेत्र का नाम  राज्य जिनमें क्षेत्र स्थित है।
रोपर  पंजाब
राजा कर्ण का किला 
हरियाणा
जोधपुरा/नोह  उत्तरी राजस्थान
अहिच्छत्र/हस्तिनापुर/ अतरंजीखेड़ा/कौशाम्बी/श्रावस्ती  उत्तर प्रदेश
 वैशाली/पाटलीपुत्र/सोनपुर बिहार
चन्द्रकेतुगढ़  पश्चिमी बंगाल 

खुदाई से पता चलता है कि:

  • कई क्षेत्रों में उत्तरी काली पॉलिश किए मृद्भाण्डों का उदय चित्रित धूसर मृद्भाण्ड स्तरों के उपरांत हुआ।
  • कई स्थानों पर उत्तरी काली पॉलिश किए मृद्भाण्ड काले-एवं-लाल मृद्भाण्डों के उपरांत  मिलते हैं तथा लाल मृद्भाण्ड उत्तरी काली पॉलिश किए मृद्भाण्डों के बाद मिलते हैं।

इस किस्म के बर्तनों तथा अन्य वस्तुओं का विभिन्न कालों से संबंधित होने के आधार पर ऐसा माना गया है कि उत्तरी काली पॉलिश किए बर्तनों की संस्कृति के दो भिन्न चरण रेखांकित किए जा सकते हैं।

चरण

यह चरण ‘प्रिडिफेंस’ (Predefense) चरण भी कहा जाता है। इस चरण की विशेषता उत्तरी काली पॉलिश किए मृद्भाण्डों की प्रचुरता तथा इनके साथ काले-एवं-लाल मृद्भाण्डों व चित्रित धूसर मृद्भाण्डों के अवशेषों का भी पाया जाना है। यद्यपि ये अवशेष कम मात्रा में ही मिले हैं। इस चरण में पंच मार्कड सिक्के (आहत सिक्के) तथा तपाई गई ईंटों के मकान नहीं थे जो उच्च स्तरीय विकास के सूचक हैं। इसका प्रतिनिधित्व अतरंजीखेड़ा, श्रावस्ती तथा प्रहलादपुर करते हैं। 

चरण II 

इस चरण में काले-एवं-लाल मृद्भाण्डों तथा चित्रित धूसर मृद्भाण्डों के बर्तनों के नमूने नहीं मिलते हैं। उत्तरी काली पॉलिश किए मृद्भाण्ड न तो अच्छी कोटि के हैं (इनकी बनावट मोटी है) और इनकी संख्या भी कम है। पंच मार्कड सिक्के तथा तपाई गई ईंटें इस चरण में पहली बार सामने आती हैं। एक अपरिष्कृत स्लेटी मृदभाण्ड इस चरण में प्रकाश में आया। इस चरण का प्रतिनिधित्व हस्तिनापुर, अतरंजीखेड़ा, श्रावस्ती II और प्रहलादपुर करते हैं।

उत्तरी काली पॉलिश किए मृद्भाण्डों तथा चित्रित धूसर मृद्भाण्डों के बीच समानता को देखते हुए कुछ विद्वानों ने मत प्रकट किया है कि चित्रित धूसर मृद्भाण्ड उत्तरी काली पॉलिश किए मृद्भाण्डों का परिष्कृत रूप हैं तथा दोनों के बीच भिन्नता केवल ऊपरी सतह के तौर पर है। 

चित्रित धूसर मृद्भाण्डों, काले-एवं-लाल मृद्भाण्डों तथा उत्तरी काली पॉलिश किये मृद्भाण्डों के रासायनिक विश्लेषण से इस तथ्य की पुष्टि भी की जा चुकी है।

चूँकि उत्तरी काली पॉलिश किए मृद्भाण्डों की पूर्वी उत्तर प्रदेश एवं बिहार में बहुतायत है अतः संभव है कि इनका उद्भव इसी क्षेत्र में हुआ हो। बाद के दिनों में ये गंगा के मैदानों के परे फैल गए होंगे जिसका कारण बौद्ध भिक्षुओं तथा व्यापारियों की गतिविधियाँ हैं।

6.1 भवनों के अवशेष

हस्तिनापुर, अतरंजीखेड़ा तथा कौशाम्बी में खुदाई से यह स्पष्ट हो गया है कि इस काल के दौरान मकान बनाने का कार्य बड़े पैमाने पर शुरू हो गया था और शहर का बनना आरंभ हो चुका था। कौशाम्बी में बस्तियों के स्वरूप के प्रमाण काफी स्पष्ट रूप से उपलब्ध हुए हैं। इसी स्थान पर ईंटों के फर्श वाले रास्ते और गलियाँ मिली हैं। एक सड़क जो पहली बार लगभग 600 बी.सी.ई में बनायी गई थी जिसकी कई बार मरम्मत की गई (इसकी चौड़ाई 5.5 मीटर से 2.5 मीटर के बीच रही) और लगभग 300 सी.ई. तक प्रयोग में रही। घरों के ढांचे तपाई ईंटों के होते थे। खंभों के गड्ढों एवं दरवाजे के बाजू के लिए बने कोष्ठों से इमारतों में लकड़ी के प्रयोग के प्रमाण भी प्रयाप्त मात्रा में मिलते हैं। घरों की छतें खपरैल लगा कर ढकी जाती थीं। कमरे वर्गाकार तथा आयताकार होते थे। 

इन सभी प्रमाणों से पता लता है कि इमारतों की बनावट काफ़ी योजनाबद्ध तरीके से होती थी। हस्तिनापुर की खुदाई के साथ, जहाँ नालियों की विस्तृत व्यवस्था पायी गई है, इस तथ्य की और भी पुष्टि हो जाती है।

कुछ बस्तियाँ मिट्टी और ईंट की दीवारों के द्वारा किलेबन्द की गयी थीं और इस किलेबन्दी के चारों ओर खाइयाँ बना दी गयी थीं। कौशाम्बी में किले की दीवार के साथ जगह-जगह पर चौकीदारों के कमरे, बुर्ज तथा दरवाज़े बने पाए गए हैं। 

इस बिंदु पर एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि क्या इन ढांचों से इस काल के सामाजिक अथवा राजनैतिक जीवन के बारे में कोई जानकारी मिलती है? हाँ, मिलते हैं। उदाहरण के लिए: 

    • किलेबन्दी से आक्रमणों के विरुद्ध सुरक्षा उपायों तथा राजनैतिक तनावों पर प्रकाश पड़ता है।
    • नालियों की व्यवस्था से न केवल लोगों में स्वास्थ्य के प्रति जागरुकता की जानकारी मिलती है बल्कि इस दिशा में इन लोगों द्वारा की गयी प्रगति की भी जानकारी मिलती है।
    • यह पता चलता है कि बड़ी इमारत बनाने और किलेबन्दी करने के लिए बड़ी संख्या में कामगरों की आवश्यकता रही होगी तथा इन लोगों से काम लेने के लिए अधिकारी और सत्तावर्ग भी रहे होंगे।

6.2 बर्तन

उत्तरी काली पॉलिश किए मृद्भाण्डों की मुख्य विशेषता इसकी चमकदार बाहरी सतह है। चाक पर बनाए गए इन बर्तनों के लिए मिट्टी अच्छी तरह गूंथ कर तैयार की गयी है। कुछ बर्तनों का तल 1.5 मिलीमीटर तक पतला हैचमकदार काले ऊपरी भाग के अतिरिक्त, उत्तरी काली पॉलिश किए मृद्भाण्ड सुनहरे, रुपहले, सफेद, गुलाबी, इस्पाती नीले, चाकलेटी तथा भूरे रंग में भी पाए गए हैं। कुछ क्षेत्रों (जैसे-रोपर, सोनपुर) से रिपिट लगे बर्तनों (टूटे हुए टुकड़ों को जोड़कर बनाए गए) से पता चलता है उत्तरी काली पॉलिश किए मृद्भाण्ड कितने मूल्यवान थे। इन मृद्भाण्डों तथा साथसाथ अन्य बर्तनों की उपलब्धता से संकेत मिलता है कि उत्तरी काले पॉलिश किए मृद्भाण्ड बहुत कीमती होते थे और सभी के पास नहीं होते थेयह इस थ्य की ओर इशारा करता है कि स काल में माज असमान वर्गों में विभाजित था

यद्यपि उत्तरी काली पॉलिश किए मृद्भाण्ड सामान्यतः चित्रित नहीं हैं लेकिन कुछ चित्रित मृद्भाण्डों के टुकड़े भी मिले हैं। मृद्भाण्ड पीले तथा हल्के सिंदूरी रंग से चित्रित किए जाते थेइनके सामान्य एकरेखा चित्रों (Designs) में सादी पट्टियाँ, लहरदार रेखाएँ, बिंदियाँ, संकेद्री गोले, प्रतिच्छेदी गोले, अर्धवृत्त, चाप तथा फंदों की आकृतियाँ पाई गयी हैं। सबसे सामान्य बर्तन की किस्म प्याले तथा विभिन्न प्रकार की तश्तरियाँ हैं। 

6.3 अन्य वस्तुएँ

उत्तरी पॉलिश किए मृदभाण्डों के क्षेत्रों से ताम्र, लोहे, सोने, चाँदी, पत्थर, कांच तथा हड्डी के बने विभिन्न प्रकार के औज़ार, हथियार, गहने तथा अन्य वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं। इन उपलब्धियों से इस काल की तकनीकी प्रगति का संकेत मिलता है। बौद्ध साहित्य, जो कि कई प्रकार की कलाओं और शिल्पों का उल्लेख करता है, से इस तथ्य की और भी पुष्टि हो जाती है। जातक कथाओं में लकड़ी, धातु, पत्थर, बहुमूल्य तथा अर्धबहुमूल्य पत्थर, हाथी दाँत, कपड़े आदि के कामगरों के लगग 18 श्रेणी समूहों का उल्लेख मिलता है।

कई क्षेत्रों से प्राप्त ताम्र वस्तुओं में छेनियाँ, चाकू, बेधक, पिनें, सूइयाँ, सुरमें की सलाइयाँ, काटने का औज़ार, जोड़ चूड़ी, चरखियाँ तथा चूड़ियाँ मुख्य हैं।

लोहे की वस्तुओं की न केवल इस संस्कृति में प्रधानता है बल्कि चित्रित धूसर मृद्भाण्ड युग की तुलना में इनमें काफी विविधता भी है। केवल कौशाम्बी से ही लगभग 800 बी.सी.ई. 

 से 550 बी.सी.. के बीच की 1,115 लोहे की वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं। इन वस्तुओं में मुख्य हैं :

अ) खेती के उपकरण जैसे : कुदालें और हंसिया तथा शिल्पकारों के औज़ार जैसे कुल्हाड़ियाँ, बसूला, छेनियाँ तथा पेच दंड।

ब) हथियार जैसे : तीर के फल, बरछे व भले के फल।

स) अन्य वस्तुएँ जैसे : चाकू, विभिन्न प्रकार के दस्ते, कांटे, कीलें, रिपिट, जोड़ पट्टी, अंगूठियाँ तथा छोटी घंटियाँ ।

चाँदी के आहत सिक्के उत्तरी काली पॉलिश किए मृद्भाण्ड संस्कृति के मध्य चरण से मिलना आरम्भ होते हैं। इसका अर्थ वस्तु विनिमय अर्थव्यवस्था से धातु मुद्रा आधारित अर्थव्यवस्था की ओर संभावी बदलाव है। 

6.4 गहने 

अर्ध बहुमूल्य पत्थर, कांच, चिकनी मिट्टी, ताम्र, शंख तथा हड्डियों की मनके, सबसे अधिक पाए गए हैं। इनकी आकृति सामान्यतः वृत्ताकार, गोलाकार, द्विकोणीय, बेलनाकार, ढोलाकार तथा चौकोर होती थी। कुछ मनके निक्षारित भी हैं। कौशाम्बी IB (लगभग 300 बीसी.सी.) से एकमात्र सोने का मनका प्राप्त हुआ है।

अन्य गहनों में पक्की मिट्टी, रंगी चमकाई मिट्टी (Faience), कांच, सीप, पत्थर एवं ताम्र की चूड़ियाँ थीं। ताम्र, लोहे, सींग तथा भूरी मिट्टी की अंगूठियाँ, चिकनी मिट्टी, अकीक तथा इन्द्रगोप के कुंडे (Locket) भी पाए गए हैं। इन सभी वस्तुओं से हमें निम्नलिखित जानकारी मिलती हैं : 

    • समाज में गहनों का इस्तेमाल, 
    • गहने बनाने वाले विशेषज्ञ शिल्पकारों का मौजूद होना, 
    • गहने बनाने की तकनीक की जानकारी के स्तर, तथा 
    • विभिन्न अर्धबहुमूल्य पत्थरों की उपलब्धता के लिए अन्य क्षेत्रों के साथ व्यापार अथवा विनिमय गतिविधियाँ।

6.5 पकी मिट्टी की मूर्तियाँ

मिट्टी की मूर्तियों में मनुष्यों तथा पशुओं की मूर्तियाँ तथा अन्य वस्तुएँ शामिल हैंमनुष्य की मूर्तियाँ अधिकतर सांचे में बनायी गई हैं। पुरुषों की मूर्तियाँ, कुछ को छोड़कर जिनके सिरों पर पहनावा है, सामान्यतः सादी हैं। महिलाओं की मूर्तियाँ सर के पहनावों, कान के गहनों, हार, कमर के लटकों से सुसज्जित हैं। पशुओं की मूर्तियाँ यद्यपि हाथ से गढ़ी गयी हैं लेकिन उनकी बनावट काफी अच्छी है। इनमें घोड़े, बैल, मेढ़े तथा हाथियों की मूर्तियाँ हैं। मिट्टी की अन्य वस्तुएँ खिलौनों की गाड़ियाँ, साधारण तथा पशुओं के सर वाले खिलौने, चक्र (disc), गेंद तथा कुम्हार की मुहरें हैं। इसी संस्कृति के अगले चरण में मुहरें, जिन पर ब्राह्मी लिपि में लिखावट मौजूद है, भी पायी गई है। इन तथ्यों से इन क्षेत्रों के निवासियों के संबंध में काफी जानकारी मिलती है। उदाहरण के लिए, खिलौने की गाड़ी से हमें पता चलता है कि यह लोग वाहन के साधन के रूप में गाड़ियों का प्रयोग करते थे।

6.6 जीवन-यापन अर्थव्यवस्था एवं व्यापार 

पुरातात्विक वानस्पतिक अवशेषों से संकेत मिलता है कि इन क्षेत्रों में धान, गेहूं, जौ, बाजरा, मटर तथा काला चना उगाया जाता था। कुछ क्षेत्रों से मिले पशुओं के अवशेषों से लोगों के गाय, बैलों, भेड़, बकरियों, सुअरों तथा मछलियों पर निर्भर होने की जानकारी मिलती है। विभिन्न क्षेत्रों में सामान्य रूप से पाई गई विविध प्रकार के मनकें व्यापारिक गतिविधियों की ओर संकेत करते हैं। इसी आधार पर अनुमान लगाया गया है कि तक्षिला, हस्तिनापुर, अहिच्छत्र, श्रावस्ती तथा कौशाम्बी के बीच, लगभग 600 बी.सी.ई. से 200 बी.सी.ई के दौरान व्यापारिक संबंध रहे होंगे। बौद्ध साहित्य में व्यापार संघ तथा ऊंटों, घोड़ों, खच्चरों, बैलों तथा भैंसों के कारवां के संबंध में उल्लेखों से इस विचार की पुष्टि होती है। छठवीं तथा चौथी शताब्दी बी.सी.ई. के बीच भारत, बेबीलोनिया, सीरिया तथा सुमेर (मध्य एशिया) के बीच व्यापार होता था। निर्यात की मुख्य वस्तुएँ कपड़े, मसाले तथा सम्भवतः लोहे और इस्पात के बने सामान थे। र्थशास्त्र (पुस्तक II) के अध्ययन से प्रतीत होता है कि राज्य न केवल व्यापार पर नियंत्रण रखता था बल्कि सोने, ताम्र, लोहे, सीसा, टिन, चाँदी, हीरे, जवाहरात तथा अन्य बहुमूल्य पत्थरों के उद्योग पर भी उसका प्रभुत्व था। 

7. पश्चिमी, पूर्वी एवं मध्य भारत की ताम्र पाषाण युगीन संस्कृतियाँ 

पश्चिमी, पूर्वी एवं मध्य भारत में दूसरी एवं प्रथम सहस्राब्दी बी.सी.. के दौरान कई स्थानीय ताम्र पाषाण आरंभिक खेतिहर संस्कृतियाँ मौजूद थी। ये संस्कृतियाँ मूलतः ग्रामीण बस्तियाँ हैं तथा उनमें कई तत्व समान हैं। इन संस्कृतियों के विशिष्ट लक्षण निम्नलिखित हैं

  • चित्रित बर्तन जो मुख्यतः लाल पर काले रंगे हुए हैं, तथा 
  • सिलिकामय पत्थर के ब्लेड तथा परतों का अत्यधिक विकसित उद्योग। 

ताम्र की जानकारी इस समय थी लेकिन चूंकि यह धातु प्रचुर मात्रा में नहीं थी अतः इसका इस्तेमाल सीमित पैमाने पर होता था। बस्तियों की संरचना गोल एवं आयताकार झोपड़ियों से होती थी। कई स्थानों पर गर्तावास के भी प्रमाण मिले हैं। अर्थव्यवस्था खेती तथा पशुपालन पर आधारित थी। इन संस्कृतियों के नाम उनके विशिष्ट क्षेत्रों के नाम पर रखे गए हैं।

ताम्र पाषाण युगीन संस्कृतियाँ 

संस्कृति का नाम  काल 
कायथा लगभग 2000-1800 बी.सी.ई.
अहार अथवा बानस   लगभग 2000-1400 बी.सी.ई
सवालदा  लगभग 2000-1800 बी.सी.ई.
मालवा  लगभग 1700-1200 बी.सी.ई(मध्य भारत में)

लगभग 1700-1400 बी.सी.ई. (महाराष्ट्र में)

प्रभास लगभग 1800-1500 बी.सी.ई.
रंगपुर लगभग 1400-700 बी.सी.ई.
चिरंद  लगभग 1500-750 बी.सी.ई.

महाराष्ट्र की तापी घाटी में उत्तर-हड़प्पा सभ्यता की लगभग 50 गैर नगरीय बस्तियाँ अब तक प्रकाश में आ चुकी हैं (लगभग 1800-1600 बी.सी.ई. के बीच)। दायमाबाद की खुदाई से पता चला है कि उत्तर कालीन हड़प्पा के लोग दक्षिण की ओर प्रवरा घाटी (महाराष्ट्र) की ओर बढ़ गए। 

कायथा संस्कृति का नाम कायथा (उज्जैन से 25 कि.मी. पूर्व की ओर), चम्बल नदी की एक उप नदी काली सिंध के तट पर स्थित क्षेत्र के नाम पर रखा गया है। अहार अथवा बानस संस्कृति का नाम बानस नदी के नाम पर रखा गया है तथा इसका विशिष्ट क्षेत्र अहार (राजस्थान में उदयपुर) है। दक्षिण पूर्व राजस्थान में बानस और बेराच घाटियों में इस संस्कृति की 50 से अधिक बस्तियाँ पायी गईं। सावलदा संस्कृति का नामकरण सावलदा (धूलिया जिला, महाराष्ट्र) बस्ती के नाम पर हुआ है। यद्यपि यह संस्कृति अधिकतर तापी घाटी तक सीमित है लेकिन दायमाबाद से मिले प्रमाणों से इस संस्कृति के प्रवरा घाटी तक पहुँचने के संकेत मिलते हैं। मालवा संस्कृति नर्मदा नदी के तट पर महेश्वर एवं नवदाटोली (निमार जिला, मध्य प्रदेश) की खुदाई के दौरान प्रकाश में आई। चूँकि इस संस्कृति की अधिकतर बस्तियाँ मालवा क्षेत्र के अंतर्गत प्रकाश में आई इसलिए इस संस्कृति का नाम मालवा संस्कृति रखा गया। लगभग 1600 बी.सी.ई. के दौरान मालवा के लोग महाराष्ट्र की तरफ बढ़ना शुरू हो गए और तापी, गोदावरी तथा भीमा घाटियों में इनकी कई बस्तियाँ प्रकाश में आई हैं। महाराष्ट्र में प्रकाश (धुलिया जिला), दायमाबाद (अहमदनगर जिला), इनामगाँव (पुणे जिला) सबसे बड़ी बस्तियाँ थीं। प्रभास और रंगपुर संस्कृतियाँ क्रमश: प्रभासपाटन और रंगपुर (गुजरात) क्षेत्र के नामों से जानी जाती हैंजोर्वे संस्कृति की विशिष्ट बस्ती महाराष्ट्र में स्थित जोर्वे (अहमदनगर जिला) हैप्रकाश, दायमाबाद तथा इनामगाँव में मावा संस्कृति के बाद जोर्वे संस्कृति विस्तृत रूप में फैलीपाषाण और ताबें का प्रयोग करने वाले कई समूहों की जानकारी पूर्वी भारत में भी मिली हैउत्तरी बिहार में चिरंद नामक स्थान पर एक प्राचीन ग्रामीण बस्ती के अवशेष मिले हैंयहाँ लोग मिट्टी से थापे हुए बाँस के घरों में रहते थेउनका प्रमख भोजन चावल और मछली था तथा ये लोग जंगली जानवरों का शिकार भी करते थेयह लोग भी काले-व-लाल रंग के मिट्टी के बरतनों का प्रयोग करते थे। इसी प्रकार की कुछ बस्तियाँ गोरखपुर के सहगोरा (उत्तर प्रदेश) और या के सोनपुर (बिहार) नामक स्थानों पर भी मिली हैं। यहाँ लोग गेहूँ और जौ की खेती करते थे। बंगाल के बुर्दवान जिले में पंडु राजर-ढीबी और भिरभुम जिले में माहिसदाल नामक स्थानों पर भी इसी तरह की बस्तियों के संकेत मिले हैं। ये सारी बस्तियाँ लगभग 1500 से 750 बी.सी.ई. की प्रतीत होती हैं। 

आइए, इस संस्कृति की विभिन्न विशेषताओं पर दृष्टि डालें।

7.1 बर्तन : पहचान के लक्षण

इन ताम्र पाषाण युगीन संस्कृतियों के बर्तनों पर हम संक्षिप्त चर्चा करेंगे। कायथा के मृद्भाण्ड की बनावट की तीन मुख्य विशेषताएँ हैं : 

    • गहरे भूरे रूपरेखा चित्रों (designs) में बनी मोटी तथा गहरी लाल धारी वाले मृद्भाण्ड, 
    • लाल रंग में चित्रित हल्के भूरे मृद्भाण्ड (ये मृद्भाण्ड पतले हैं तथा काफी सफाई से गढ़े गए हैं), और
    • बगैर धारी वाले खरोचे गए मृद्भाण्ड | गहरी तथा मोटी लाल धारी वाले अधिकतर बर्तनों का आधार गोल है। यह गोल आधार पूर्व हड़प्पा सोथी मृद्भाण्डों के समरूप है।

सोथी संस्कृति (राजस्थान) घग्घर घाटी (सरस्वती) के विभिन्न क्षेत्रों में फैली पायी गयी | है। यहाँ पाए गए बर्तन कालीबंगन के पूर्व हड़प्पा बर्तनों के समरूप हैं।

अहार के बर्तनों के सात प्रकार के मृद्भाण्ड पाए गए हैं लेकिन इनमें मुख्य सफेद सावलदा चित्रित कालेएवंलाल मृद्भाण्ड हैं। सावलदा संस्कृति की विशेषता यहाँ के लालपरकाले चित्रित बर्तन हैं जिनको प्राकृतिक चित्रों जैसे चिड़ियों, जानवरों तथा मछलियों के चित्र बनाकर सुसज्जित किया गया हैमालवा के मृद्भाण्ड कुछ हद खुरदरे हैं तथा इन पर मोटी हल्की भूरी धारी है जिस पर काले अथवा गहरे भूरे रंग से चित्र बनाए गए हैंप्रभास तथा रंगपुर दोनों के मृद्भाण्ड लाल-पर-काले चित्रित मृद्भाण्डों के समरूप हैं लेकिचूंकि इनको चमकाया भी गया है अतः इन्हें चमकदार लाल मृद्भाण्ड (lustrous ware) कहा जाता है।

जोर्वे मृद्भाण्ड लालपरकाले चित्रित हैं तथा इनकी बनावट समतल, चमकरहित है, एवं इन पर लाल रंग की पुताई की गयी है।

इन विशिष्ट किस्मों के अतिरिक्त इन संस्कृतियों में अन्य मृद्भाण्ड भी मौजूद थे जो कि अधिकतर लाल अथवा धूसर हैं। बर्तन चाक गढ़ित हैं लेकिन हाथ के बनाए हुए बर्तन भी पाए गए हैं। 

इन संस्कृतियों के सामान्य बर्तन प्याले, अन्दर की ओर धंसती गोल गर्दन वाले गोलाकार मर्तबान, तश्तरियाँ, लोटे आदि हैं। मालवा के बर्तनों के विशिष्ट लक्षण ठोस आधार वाले छोटे छोटे गिलासों में परिलक्षित होते हैं। जोर्वे संस्कृति के विशिष्ट बर्तन नौतली प्याले, चौड़े मुंह वाले टोटीदार मर्तबान तथा गोल कलश हैं।

7.2 अर्थव्यवस्था

ये ताम्र पाषाण संस्कृतियाँ जिन क्षेत्रों में फैली उनका अधिकतर भाग कपास उगाने के लिए उपयुक्त काली मिट्टी वाला क्षेत्र है। यहाँ का मौसम अर्धखुश्क है तथा वर्षा औसत 400 से 1000 मिलीमीटर के बीच है। इन ताम्र पाषाण युगीन संस्कृतियों की अर्थव्यवस्था खेती तथा पशुपालन पर आधारित थी। कुछ क्षेत्रों में जंगली जानवरों तथा मछली आदि जैसे अन्य भोजन स्रोतों पर निर्भरता के प्रमाण मिले हैं। 

i) फसलें 

कुछ क्षेत्रों से खुदाई में प्राप्त बीजों के कार्बनयुक्त अवशेषों से यहाँ के कृषक समुदायों द्वारा विभिन्न प्रकार की फसलें उगाने के प्रमाण मिलते हैं। मुख्य फसलें जौ, गेहूं, धान, बाजरा, ज्वार, मसूर, फलियाँ, मटर, काला चना तथा मूंग थीं। अन्य पेड़ जिनके फलों का उपयोग किया जाता था वे थे जामुन, बहेड़ा, जंगली खजूर, आंवला, बेर आदि । 

इस काल में जौ मुख्य अन्न था। इनामगाँव से प्राप्त प्रमाणों से क्रमिक रूप में फसल उगाने, गर्मी तथा सर्दी की फसलों की कटाई तथा कृत्रिसिंचाई की परंपरा का पता लता हैआरंभिक जोर्वे युग (लगभग 14001000 बी.सी..) में इनामगाँव में नहर द्वारा (200 मीटर लम्बी, 4 मीटर चौड़ी तथा 3.5 मीटर गहरी) बाढ़ के पानी की दिशा परिवर्तन के लिए एक विशाल बाँ(240 मीटर लम्बा तथा 2.40 मीटचौड़ा) बनाया गया था।

कपास उगाने के लिए उपयुक्त काली मिट्टी की जमीन की जुताई के संकेत इनामगाँव के समीप ही बालकी में मिले बैल के कंधे की हड्डी से बने अर्द (हल के फल का आरंभिक रूप) से मिलते हैं। 

ii) पशु

खुदाई से यहाँ पालतू तथा जंगली दोनों प्रकार के जानवरों के प्रमाण मिले हैं।

1) ताम्र पाषाण युग के दौरान पालतू पशुओं में गाय-भैंस, भेड़, बकरी, कुत्ता, सुअर तथा घोड़े मुख्य थे। गाय-भैसों तथा भेड़-बकरियों की हड्डियाँ यहाँ के अधिकांश क्षेत्र में अपेक्षाकृत अधिक मिली हैं। हड्डियों पर चोट पड़ने तथा कटने के निशानों से पता चलता है कि यह पशु भोजन की दृष्टि से काटे गए होंगे। इन हड्डियों से आयु निर्धारण के संकेत मिलते हैं कि इन पशुओं को कम आयु (तीन महीने से लेकर 3 वर्ष के बीच) में ही काटा गया होगा।

2) जंगली जानवरों में मृग, चार सींगों वाले हिरन, नीलगाय, बारहसिंगा, सांबर, चीतल, जंगली भैंस तथा गैंडे थे।

कुछ क्षेत्रों में जलमुर्गियों, समुद्री कछुआ तथा चूहों की भी हड्डियाँ मिली हैं। इनामगाँव में समुद्री मछलियों की भी हड्डियाँ मिली हैं। यह मछलियाँ कल्याण अथवा महद खाड़ी बंदरगाहों जो कि इनामगाँव के समीपतम 200 कि.मी. पश्चिम की ओर स्थित थे से प्राप्त की गयी होगी। 

7.3 घर एवं बस्तियाँ

आइए, अब हम इन संस्कृतियों की गृह-निर्माण परंपराओं को संक्षिप्त रूप में विश्लेषित करें। मिट्टी की दीवारों तथा छप्पर की छतों वाले आयताकार एवं गोलाकार घर इन संस्कृतियों में सामान्य थे, यद्यपि विभिन्न क्षेत्रों में घर के आकारों में भिन्नता थी।

    1. सावलदा संस्कृति में अधिकतर घर आयताकार तथा एक कमरे वाले थे लेकिन कुछ घरों में दो अथवा तीन कमरे भी थे। अहार के लोग पलमा पत्थरों के चबूतरे पर आधारित घर बनाते थे। इन्हीं चबूतरे पर मिट्टी अथवा मिट्टी की ईंटों की दीवारें बनाई जाती थीं। तथा उन्हें स्फटिकी रोड़ी से सजाया जाता था। फर्श तपाई मिट्टी अथवा मिट्टी में नदी के कंकड़ मिलाकर तैयार किया जाता था।
    2. बाहर के घरों का आकार 7 मीटर x 5 मीटर अथवा 3 मीटर x 3 मीटर होता था। यहाँ मिले सबसे बड़े घरों का आकार 10 मीटर से भी अधिक लम्बा है। बड़े घरों में विभाजन दीवारें, चूल्हे तथा रसोई में चक्कियाँ होती थीं।
    3. मालवा की बस्तियाँ, जैसी कि नावदातोली, प्रकाश, दयामावाद तथा इनामगाँव में मिली हैं, काफी बड़ी थीं। इनामगाँव से मिले प्रमाणों से संकेत मिलते हैं कि बस्तियाँ बनाने का काम योजनाबद्ध तरीके से होता था। इनामगाँव में मिले लगभग 20 घरों में से अधिकतर पूर्व पश्चिम दिशा में नियोजित किए गए हैं। यद्यपि यह घर एक दूसरे से काफी निकट बनाए गए हैं लेकिन इनके बीच लगभग 1-2 मीटर की दूरी अवश्य रखी गयी है जो संभवतः गली के रूप में इस्तेमाल की जाती रही होगी। इनामगाँव में मिले इन घरों का आकार काफी बड़ा (7 मीटर x 5 मीटर) और आयताकार है। इनमें विभाजन करती हुई दीवारें मौजूद हैं। घरों की दीवारें मिट्टी की बनी हैं तथा काफी नीची हैं एवं इनकी छतें ढलवा हैं। घरों के अन्दर आग जलाने के गोलाकार गड्ढे हैं जिनके किनारे दीवारों के रूप में ऊपर की ओर उठे हैं, जिससे आग पर नियंत्रण रखा जा सके। नावदातोली के घरों में रसोई के अन्दर एक मुंह अथवा दो मुंह वाले चूल्हे होते थे। अनाज का भंडारण गहरे बने अन्न भंडारण गड्ढों (एक मीटर व्यास तथा एक मीटर गहरे) में होता था। घरों के अन्दर मिट्टी के गोल चबूतरे (1.5 मीटर व्यास के) संभवतः अनाज के टोकरों को रखने के काम आते होंगे।
    4. जोर्वे संस्कृति (जिसके अब 200 से अधिक क्षेत्र प्रकाश में आ चुके हैं और इनमें से अधिकतर को एक से चार हैक्टेयर के बीच के गाँवों में श्रेणीबद्ध किया जा सकता है) की मुख्य विशेषता यहाँ के प्रत्येक क्षेत्र में एक बड़े केंद्रीय क्षेत्र का पाया जाना है। यह केंद्र प्रकाश, दायमाबाद तथा इनामगाँव है जो कि क्रमशः तापी, गोदावरी तथा भीमा की घाटियों में हैं। दयमाबाद जोर्वे बस्तियों में सबसे बड़ी बस्ती थी जो लगभग 30 हैक्टेयर में फैली थी जबकि प्रकाश एवं इनामगाँव पाँच-पाँच हैक्टेयर में फैले थे।
    5. इनामगाँव में जोर्वे (पूर्वकालीन एवं उत्तर दोनों) की बस्ती की महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि दस्तकारों, जैसे कुम्हार, सुनार, हाथीदांत व मनकों के शिल्पकार आदि के घर मुख्य निवास क्षेत्र की पश्चिमी सीमा की ओर होते थे जबकि समृद्ध किसान केंद्रीय भाग में रहते थे। दस्तकारों के घरों का आकार समृद्ध किसानों की अपेक्षा छोटा होता था। घर बनाने के स्थान पर आकार के आधार पर इस समाज में दस्तकारों के निचले सामाजिक स्तर की जानकारी मिलती है।

कुछ ताम्र पाषाण बस्तियों के चारों ओर किलाबंदी भी की जाती थीउदाहरण के लिए, मालवा संस्कृति की एरन तथा नागदा (मध्य प्रदेश) तथा इनामगाँव (जोर्वे युग) में पत्थर के रोड़ों की बुर्ज युक्त मिट्टी की दीवार तथा बस्ती के चारों ओर खुदे हुए गड्ढे मिले हैं।

इनामगाँव में घरों की बनावट में पूर्वकालीन जोर्वे युग (1400-1000 बी.सी.ई.) के घरों तथा उत्तरकालीन जोर्वे युग (1000-700 बी.सी.ई.) के घरों में भिन्नता दिखाई देती हैं। 

पूर्वकालीन जोर्वे घरों के ढांचे आयताकार होते थे, इनकी मिट्टी की दीवारें नीची (लगभग 30 सेंटीमीटर ऊँची) होती थीं तथा चारों ओर सरपत एवं मिट्टी से बने ढांचे होते थे। यह घर पंक्तियों में बनाए जाते थे तथा दिशा लगभग पूर्व से पश्चिमी की ओर होती थी, इन घरों के बीच में लगभग 1.5 मीटर चौड़ा खुला स्थान भी होता था जोकि संभवत: गली अथवा सड़क का काम देता था। इसके विपरीत उत्तरकालीन जोर्वे के घर यहाँ की निर्धनता का चित्रण करते हैं। बड़ी-बड़ी आयताकार झोपड़ियाँ इस युग में नहीं दिखाई देतीं। इनकी जगह मिट्टी की छोटी दीवारें वाली गोल झोपड़ियाँ बनाई जाती थीं। अन्न भण्डार गड्ढों की जगह चार पत्थरों पर रखे चौपाए भण्डारण जार का उपयोग होता था।

तमाम प्रमाणों से संकेत मिलते हैं कि पूर्व कालीन जोर्वे से उत्तरकालीन जोर्वे में इस प्रकार का परिवर्तन वर्षा की दर में कमी आने के परिणामस्वरूप खेती का पतन होने के कारण हुआ। पश्चिमी एवं मध्य भारत में खोजबीन से पता चलता है कि दूसरी सहस्राब्दी बी.सी.ई. के अंतिम चरण में इस क्षेत्र में मौसम में भारी परिवर्तन आने के कारण पूरा क्षेत्र खुश्क होने लगा जिसके परिणामस्वरूप लोगों को बाध्य होकर अर्ध खानाबदोश जीवन की ओर लौटना पड़ा। यह । निष्कर्ष विभिन्न स्तरों से प्राप्त पशुओं की हड्डियों की प्रतिशत मात्रा के आधार पर निकाला गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि जोर्वे युग में जलवायु में शुष्कता बढ़ने के कारण कृषि का ह्रास हुआ जिससे कृषि पर आधारित अर्थव्यवसथा भेड़-बकरी पशुपालन अर्थव्यवस्था में परिवर्तित हो गई।

7.4 अन्य विशेषताएँ

यह सभी विशेषताएँ पत्थर के ब्लेडों, पत्तरों के उद्योग, जो कि सिक्थस्फटिक, चकमकी, सूर्यकांत तथा अकीक जैसे सिलिकामय पत्थरों पर आधारित थे, द्वारा रेखांकित होती हैं। औज़ारों में समानांतर किनारे वाले फलक, कुण्ठिकिनारे वाले फलक, दंतुर फलक, चाकू, नवचन्द्राकार, तिकोने तथा समलंबाकार औज़ार पाए गए हैं। इन फलकों वाले औज़ारों में कुछ की धार पर चमक है, जिसका अर्थ यह हुआ कि यह औज़ार फसल की कटाई के काम में इस्तेमाल किए जाते थे। पॉलिश की गयी त्थर की कुल्हाड़ियाँ भी जो कि विशिष्ट रूप से कर्नाक, आंध्र के नव पाषाणताम्र पाषाण युगीन संस्कृतियों से सम्बद्ध हैं, कुछ क्षेत्रों में प्राप्त हुई हैं यद्यपि उनकी संख्या अधिक नहीं है।

ताम्र वस्तुओं में चपटी कुल्हाड़ियाँ अथवा काटने की उतल धार वाली कुठारें, तीर के फल, बरछों के फल, छेनियाँ, मछलियों के कांटे, मध्य पंशुका वाली तलवार, फलक, चूड़ियाँ, अंगूठियाँ तथा मालाएँ हैं। कायथा में मिली वस्तुओं में एक बर्तन में ताम्र की 28 चूड़ियाँ मिली हैंकुल्हाड़ियाँ जैसी कुछ वस्तुएँ गढ़ी जाती थीं बकि अन्य वस्तुएँ हथौड़ों से पीट कर निरुपित की जाती थीगहनों में सबसे अधिक इन्द्रगोप, सूर्यकांत, सिक्थस्फटिक, अकीक, सीप दि के मनके पाये गये हैंकायथा संस्कृति से सम्बद्ध एक बर्तन में सेलखड़ी के 40,000 छोटेछोटे मनकों की एक कण्ठी मिली है। इनामगाँव में सोने तथा हाथी दांत के मनके, सोने की एक कुंडलित आकार वाली कान की बाली तथा ताम्र की पहुँची प्राप्त हुई है

इनमें से अधिकतर क्षेत्रों में मिट्टी की बनी वस्तुएँ प्रचुर मात्रा में मिली हैं। यह वस्तुएँ मानवीय एवं पशुओं की मूर्तियों के रूप में हैंपारंपरिक शैली के मिट्टी के सांड (जो कि अधिकतर छोटे आकार के हैं) कायथा के ताम्र पाषाण स्तर से मिले हैं। इनमें कुछ में स्पष्ट ककुद हैं, कुछ की सींगें पीछे की ओर मुड़ी हुई हैं तथा कुछ की सींगें आगे की ओर समतलीय रूप में निकली हुई हैंइन ताम्र पाषाण क्षेत्रों के अधिकतर क्षेत्रों में मिट्टी के बने सांडों के पाए जाने से यह पता चलता है कि सांड पूजनीय पशु था। यद्यपि इनके खिलौनों के रूप में इस्तेमाल की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। 

दायमाबाद भंडार 

एक संयोगिक उपलब्धि के रूप में दायमाबाद में टीले के ऊपर (इसके नीचे जोर्वे युग का 1.2 मीटर संग्रह है) चार वस्तुएँ मिली हैं। यह सभी वस्तुएँ ठोस ढली हैं तथा इनका वजन 60 कि. ग्रा. से ऊपर है। 

1) हाथी : यह सबसे भारी है (ऊँचाई 25 सेंमी. तथा लम्बाई 27 से.मी.) तथा ताम्र के आधार पर, जिसके नीचे धुरियों को समाने के लिए चार कोष्ठ हैं, खड़ा है।

2) गेंडा : यह कुछ छोटा है तथा यह भी एक आधार पर खड़ा है। कोष्ठों में ताम्र की दो ठोस धुरियाँ तथा गढ़े हुए पहिए लगे हैं। गेंडा कुछ उसी प्रकार का है जैसा कि सिंधु की मुहरों पर बना है।

3) सवार सहित दो पहियों वाला रथ-रथ एक लम्बे ध्रुव के सहारे जुआ युक्त बैलों से, जो कि दो ताम्र की ढली दो पट्टियों पर खड़े हैं, जुड़ा हुआ है। लेकिन इसमें पहियों के लिए कोष्ठ नहीं हैं। रथ में एक दंड है, जिसे दो समानांतर दंड संभाले हुए हैं। इस दंड पर सवार खड़ा है। इस कृति जैसा अन्य कोई उदाहरण नहीं है।

4) भैंस : इस कृति में भी दो पहिए एवं धुरी मौजूद है। इस कृति जैसी ही भैंस की मिट्टी एवं ताम्र अथवा कांस्य दोनों की ही मूर्तियाँ मोहनजोदड़ो से भी प्राप्त हुई हैं। 

दायमाबाद के भंडार की ताम्र की तुलना खुदाई में मिलीं अन्य ताम्र वस्तुओं से की जा सकती है। इस धातु के स्पेक्ट्रोमेटरिक विश्लेषण से पता चलता है कि इसमें टिन अथवा कोई अन्य धातु की मिलावट नहीं की गयी थी। एक मत के अनुसार, दायमाबाद के भंडार का काल उत्तर कालीन उड़प्पा काल (1600-1300 बी.सी.ई.) है। एक अन्य मत के अनुसा, तकनीक के आधार पर इनका काल कल्लूर भंडारों वाला काल हो सकता है।

7.5 धर्म एवं विश्वास

खुदाई से प्राप्त जानकारियों से लोगों के धार्मिक विश्वासों एवं रीतियों पर भी प्रकाश पड़ता है। 

देवियाँ : ताम्र पाषाण समुदाय के लोगों के देवियों में विश्वास तथा उनकी पूजा के प्रमुख प्रमाण नारी प्रतिमाओं (जो तपाए तथा गैर तपाए दोनों रूपों में मौजूद थीं) के पाए जाने से प्राप्त होते हैं। इन प्रतिमाओं में कुछ के सर हैं और कुछ के नहीं हैं। बस्तियों के निचले तलों में नेवासा (दूसरी सहस्राब्दी बी.सी.ई. के मध्य में) में शीर्ष रहित बड़े आकार की एक नारी प्रतिमा मिली है जो कि बगैर किसी विशिष्ट शारीरिक लक्षणों की है। इनामगाँव में भी इसी प्रकार की मिट्टी की प्रतिमाएं मिली हैं जिनमें स्तनों के अतिरिक्त अन्य शारीरिक लक्षण नहीं हैं।

इनामगाँव में एक आरंभिक जोर्वे घर (1300 बी.सी.ई.) की खुदाई से देवी पूजा के प्रमाण मिले हैं। यहाँ पर एक कोने में फर्श के नीचे दबा अंडाकार मिट्टी का पात्र ढक्कन सहित मिला है। इस पात्र के अन्दर एक नारी प्रतिमा मिली है जिसके स्तन बड़े एवं लटके हुए हैं। साथ एक सांड की मूर्ति भी मिली है। इनामगाँव से मिले प्रमाण तथा सभी नारी प्रतिमाओं से उर्वरता की देवी की पूजा के संकेत मिलते हैं। यह प्रतिमाएँ (विशेषकर शीर्ष रहित प्रतिमाएँ), एक मतानुसार, शाखबरी देवी (पूर्व ऐतिहासकि युग) जो कि कृषि उर्वरता की देवी थी तथा सूखे से छुटकारा पाने के लिए पूजी जाती थी, की प्रतीत होती है।

ii) देवता : ताम्र पाषाण बस्तियों में पुरुष प्रतिमाएँ काफी कम हैं। ऐसा मत है कि इनामगाँव में उत्तर जोर्वे तलों (1000700 बी.सी.ई.) में मिली दो मिट्टी की पुरुष प्रतिमाएँ (जिनमें एक तपाई गयी है तथा दूसरी गैर तपाई है) देवताओं की प्रतिमाएँ होंगीइसी संदर्भ में मालवा काल (1600 बी.सी.ई.) का एक चित्रित जार धार्मिक महत्त्व का माना गया है। इस बर्तन में दो भाग हैं। ऊपरी भाग में एक चित्र बना है, जिसमें एक मानवीय आकृति टहनियों का वस्त्र पहने हुए एक शेर के सामने झुका हुआ है, और उसके चारों ओर कुछ निश्चित शैली में ढले हुए पशु जैसे सांड, हिरन तथा मोर आदि खड़े हैं। निचले भाग में छलांग लगाते चीते अथवा तेंदुए हैं और यह भी निश्चित शैली में ढले हुए हैं। अच्छी तरह चित्रित करके सजायी गई तश्तरी भी सम्भवतः कर्मकाण्डीय प्रयोगों के लिए होगी। इसी प्रकार दायमाबाद से प्राप्त ठोस ताम्र हाथी और भैंस की प्रतिमाएँ आदि भी संभवतः धार्मिमहत्त्व रखते होंगे

ii) मृतकों को दफनाने की : मृतकों को दफन करके विन्यास करना एक सामान्य रीति थी। वयस्क तथा बच्चे दोनों ही उत्तर-दक्षिण क्रम में दफनाए जाते थे। सर उत्तर की ओर होता था तथा पैर दक्षिण की ओर । वयस्क अधिकतर लिटा कर दफनाए जाते थे जबकि बच्चे कलशों में दफनाए जाते थे। यह कलश कभी एक और अधिकतर दो होते थे जिनका मुंह जोड़ कर उन्हें गड्ढे में लिटा दिया जाता। वयस्क और बच्चे दोनों ही गड्ढों में दफनाए जाते थे जो घर के फर्श में खोदे जाते थे और कभी भी घर के आंगन में नहीं खोदे जाते थे। इस संदर्भ में रुचिकर तथ्य यह है कि जोर्वे युग में वयस्क मृतकों के टखनों के नीचे का पैर काट दिया जाता था। मृतकों को घर के अहाते में दफनाने तथा टखने के नीचे का भाग काट देने की प्रथा संभवतः इस विश्वास की ओर संकेत करती है कि ऐसा करने से मृतक भूत नहीं बनेंगे जो कि दुष्ट हो सकते हैं।

विभिन्न स्थानों पर वयस्क शवाधान में शव के साथ कुछ वस्तुएँ भी रखी जाती थीं जो कि सामान्यतः दो और कभी-कभी दो से अधिक पात्र होते थे। उत्तर जोर्वे युग के एक शवाधान में पंद्रह पात्र रखे मिले हैं। मृतकों को उनके गहनों के साथ दफनाना भी सामान्य था। उत्तर जोर्वे युग के एक शवाधान में मनुष्य के अस्थिपंजर की गर्दन के निकट एक ताम्र का गहना प्राप्त हुआ है। इसी युग में दो कलशों में दफनाए गए एक बच्चे के साथ ताम्र एवं लाल इंद्रगोप के मनकों की क्रम में गुथी बारह मनकों की एक कण्ठी मिली है।

इनामगाँव से प्राप्त जानकारी से जोर्वे युग में कुछ असामान्य शवाधान के तरीकों का भी पता चला है। यहाँ पर एक चार पायों वाला कलश, जो कि गैर तपाई मिट्टी का बना है और इसका दक्षिणी भाग मानवीय शरीर की तरह है, प्राप्त हुआ है। इस कलश (इसकी ऊँचाई 80 से.मी. तथा चौड़ाई 50 से.मी. है) का मुख चौड़ा और स्वरूप विहीन है और इसमें एक 30 से 40 वर्ष की आयु के पुरुष का ढांचा मिला है। यह ढांचा बैठने की मुद्रा में रखा मिला है। इसके टखने नहीं काटे गये हैं। कब्र की वस्तुओं में एक टोटीदार पात्र, जिस पर एक नाव, जिसके लम्बे चप्पू हैं का चित्र बना है, रखा मिला है। इस नाव के चित्र से आज हिन्दुओं के उस विश्वास को स्मरण होता है जिसमें वे मानते हैं कि मृतक की आत्मा को जल सागर पार करना होता है और तभी वह स्वर्ग पहुँचती है। इस प्रकार के भव्य शवाधान का गौरव प्राप्त करने वाला व्यक्ति संभवतः 

    • समाज में उच्च स्तर का व्यक्ति रहा होगा, अथवा 
    • बस्ती का प्रधान शासक रहा होगा, अथवा 
    • किसी ऐसे सामाजिक समूह का सदस्य होगा जिनके शवाधान का तरीका भिन्न था।

7.6 सामाजिक संगठन 

ताम्र पाषाण संस्कृति के क्षेत्रों में पाये गये विभिन्न स्थलों के फैलाव के अध्ययन से ह लगता है कि स्थल दो प्रकार के थे, एक वह जो क्षेत्रीय केंद्रों का प्रतिनिधित्व करते थे तथा दूसरे गाँवों की बस्तियों कायह अन्तर अथवा स्तरीकरण ताम्र पाषाण काल में किसी प्रकार की प्रशासनिक व्यवस्था के मौजूद होने की ओर संकेत करता हैइससे यह भी संकेत मिलता है कि ताम्र पाषाण सामाजिक संगठन श्रेणीबद्ध था। इसके साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों में मिली सुरक्षा दीवारों, खाइयों, अनाज के गोदाम, बाँध तथा नहरों (जो कि इनामगाँव में काफी स्पष्ट हैं) आदि सार्वजनिक व्यवस्थाओं को समग्र रूप में देखने से किसी न किसी प्रकार की प्रशासनिक व्यवस्था के विद्यमान होने के विचार को और भी बल मिलता है।

उत्तर हड़प्पा में हुए विकास के विस्तृत संदर्भ में देखने पर ताम्र पाषाण संस्कृतियाँ हड़प्पा संस्कृति के प्रभाव को आंशिक रूप में दर्शाती हैं। तथापि इन संस्कृतियों में अपने विशिष्ट क्षेत्रीय प्रभाव मौजूद हैं और एक दूसरे के साथ व्यापारिक संपर्क तथा सांस्कृतिसंबंध के प्रमाण मौजूद हैं।

धातु का इस्तेमाल करने वाले यह खेतिहर समुदाय दूसरी सहस्राब्दी बी.सी.ई. के आस-पास फैले और प्रथम सहस्राब्दी बी.सी.ई के लगभग अदृश्य हो गए (केवल उत्तर कालीन जोर्वे 700 बी.सी.ई. तक विद्यमान रहा)। इस पतन का एक संभावी कारण (जो कि इन ताम्र पाषाण क्षेत्रों की मिट्टी के नमूनों के विश्लेषण के आधार पर व्यक्त किया गया है) बढ़ती हुई खुश्की तथा मौसम की विपरीत परिस्थितियाँ हैं। गोदावरी, तापी तथा अन्य घाटियों की कई बस्तियाँ निर्जन हो गयीं और पाँच अथवा छ: शताब्दियों के अंतराल के बाद पाँचवीं/चौथी शताब्दी बी.सी.ई में शहरीकरण के साथ फिर से बसीं।

8. दक्षिण भारत में आरंभिक कृषक बस्तियाँ

दक्षिण भारत में आरंभिक कृषक समुदायों की बस्तियाँ तीसरी सहस्राब्दी बी.सी.. में अचानक अस्तित्व में आती हैं। आखेटन संग्रहण अर्थव्यवस्था से खाद्योत्पादन अर्थव्यवस्था की ओर क्रमबद्ध विकास (जैसा कि पश्चिमी एशिया में हुआ) के कोई प्रमाण नहीं मिले। इन क्षेत्रों से मिलने वाले प्रमाण इस दिशा की ओर संकेत करते हैं कि गोदावरी, कृष्णा, तुंगभद्र, पेनेरु तथा कावेरी नदियों के निकट खेती तथा जानवरों के लिए उपयुक्त क्षेत्रों का एक प्रकार से उपनिवेशीकरण हो गया था। अधिकतर स्थानों पर यह बस्तियाँ अर्धअसर कम वर्षा वाले तथा चिकनी मिट्टी के बालू वाले क्षेत्रों में फैली हुई थीं। ये क्षेत्र खुश्क खेती तथा चरवाही (गाय, बैल तथा भेड़, बकरी) के लिए उपयुक्त थे। इन बस्तियों की विशिष्टताएँ निम्नलिखित हैं :

i) स्थिर ग्रामीण बस्तियाँ जिनके घर तथा अन्य भवन अर्धस्थायी और स्थायी दोनों ही प्रकार के थे। स्थायी इमारती में सरपत से बने ढांचों पर लिपायी की जाती थी।

ii) पत्थरों की कुल्हाड़ियाँ (भूरी चट्टानों जैसे सख्त पत्थरों से बनी) जो कि घिसाई तथा चमका कर बनायी जाती थी। इस तकनीक के कारण आरंभिक कृषक संस्कृतियों के पत्थर के औज़ार के उद्योग को चमकाई हुई पत्थर की कुल्हाड़ियों का उद्योग कहा जाता है। 

ii) चकमकी, सूर्यकांत, सिक्थस्फटिक तथा अकीक जैसे पत्थरों से बनाए गए लम्बे एवं पतले फलकइन औज़ारों में काटने की धार चमकाई गयी प्रतीत होती है जिससे पता चलता है कि वऔज़ार फसल काटने के लिए प्रयोग किए जाते थे। 

iv) रंभिक चरणों में हाथ से बनाए गए बर्तन तथा बाद के चरणों में चाक पर बनाए जाने वाले बर्तन। 

v) ज्वार बाजरे की खेती तथा गाय, बैल एवं भेड़-बकरियों के पालन पर आधारित र्थव्यवस्था। इस प्रकार यह अर्थव्यवस्था मूलतः कृषि पशुपालन पर आधारित है। 

vi) भोजन की आवश्यकताएँ जंगली जानवरों से पूरी की जाती थीं।

8.1 सांस्कृतिक चरण 

उपरोक्त प्रमाणों के आधार पर हम दक्षिण भारत में आरंभिक कृषक समुदाय के विकास के मोटे तौर पर तीन चरण इंगित कर सकते हैं। 

चरण l

इन खेतिहर समुदायों की प्राचीनतम बस्तियाँ प्रथम चरण का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह बस्तियाँ पहाड़ियों के शिखरों अथवा पहाड़ियों के निकट समतल स्थानों अथवा दो या दो से अधिक पहाड़ियों के बीच की घाटियों में बनी थीं। इस चरण की भौतिक संस्कृति चमकाई हुई पत्थर की कुल्हाड़ियों का उद्योग, फलक, फलकयुक्त औज़ार तथा हाथों से गढ़े बर्तनों पर आधारित थी। 

बर्तनों में धूसर अथवा सलेटी रंग के मिट्टी के बर्तनों की अधिकता है। चमकाए हुए चिकनी मिट्टी के लाल अथवा धारी वाले बर्तन कम संख्या में हैं। यह बर्तन अक्सर बैंगनी रंग से अलंकृत किये जाते थे। यह प्राचीनतम बस्तियाँ राख के टीलों से संबंधित थी जिनमें से कुछ में खुदाई की गई हैं। उनमें प्रमुख – उत्तनूर, कूपगल, कोडेकल, पल्लावाय, पिकलीहल, मस्की, और ब्रह्मगिरी। यह स्थल इन कृषक पशुपालक समुदाय की बस्तियों के प्रथम चरण के विशिष्ट उदाहरण हैं। रेडियोकार्बन तिथियों के आधार पर इस चरण का काल 2500-1800 बी. सी.ई रखा जा सकता है। 

चरण II 

इस चरण में भी प्रथम चरण की बस्तियों की यथास्थिति बनी रहती है। अभी भी बस्तियाँ पहाड़ियों के शिखर पर अथवा पहाड़ियों से जुड़े समतल स्थान पर बसती थीं। तथापि कुछ महत्त्वपूर्ण प्रगति अवश्य दिखायी देती है। बस्तियों में गोलाकार झोंपड़ियाँ लकड़ी के ढांचे पर सरपत लगाकर बनाई जाती थी और उस पर लिपाई होती थी तथा फर्श मिट्टी के गारे से तैयार किया जाता था। नगार्जुनकोंडा (तटीय आंध्र) में मिले कुछ बड़े गड्ढे जो कि गोलाकार, चौकोर, तथा अनियमित हैं अर्धभूतलीय आवासी के रूप में देखे जाते हैं। भूतलीय आवासी पद्धति पय्यमपल्ली एवं वीरापुरम में मिलती है। इस चरण में नए प्रकार के बर्तन बनाने की परंपरा आरंभ होती है जैसे टोटी वाले तथा छिद्रित बर्तन। इस प्रकार के बर्तनों के प्राप्त होने से इस क्षेत्र के उत्तरी क्षेत्रों के साथ संबंध की ओर संकेत मिलता है क्योंकि इसी प्रकार के बर्तन उत्तरी क्षेत्रों में भी प्राप्त हुए हैं। इस चरण के बाह्य तल के खुरदरे करने की तकनीक आरंभिक हड़प्पा युग की तकनीक को अपनाए जाने का प्रतीक हैइस चरण में चमकाई हुई पत्थर की कुल्हाड़ियों एवं फलकों के द्योग का प्रसार हुआताम्र एवं कांस्य की वस्तुएँ प्रथमतः इसी चरण में मिलती हैं जिनकी संख्या चरण की समाप्ति तक काफी बढ़ जाती है। कुछ स्थल जहाँ चद्वितीय की बस्तियाँ प्राप्त हुई हैं वे हैं, पिकलीहल, ब्रह्मागिरि, संगानाकल्लु, टेक्कलकोटा, हल्लूर तथा टी. नारसीपुर । रेडियो कार्बन तिथियों के अनुसार इस चरण का काल 18001500 बी.सी.ई. निश्चित किया जा सकता है। 

चरण III 

इस चरण की महत्त्वपूर्ण प्रगति ताम्र तथा कांस्य के औज़ारों में वृद्धि है। यह वृद्धि टेक्कलकोटा, हल्लूर, पिकलीहल, संगनाकल्लु, ब्रह्मागिरी तथा पय्यमपल्ली में देखने को मिलती हैं। पत्थर की कुल्हाड़ियों वं फलकों का उद्योग यथावत बना रहता है। बर्तनों में सख्त पार्श्व वाले सलेटी एवं धूसर बर्तनों का उपयोग काफी सामान्य प्रतीत होता है।

एक अन्य प्रकार के मृद्भाण्ड, जो कि चाक से बनाए गए हैं, बैंगनी रंग से रंगे गए तथा बगैर चमकाए गए रूप में मिलते हैं। यह बर्तन महाराष्ट्र के ताम्र पाषाण युगीन जोर्वे बर्तनों से मिलते-जुलते हैं। इस आधार पर इस चरण का काल 1400-1500 बी.सी.ई. रखा जा सकता है। 

यह तीनों चरण दक्षिण भारत में आरम्भिक खेतिहर पशुपालक बस्तियों के उदय एवं विस्तार को दिखाते हैं। चरण प्रथम से चरण तृतीय के बीच व्यवसायों में निरंतरता दिखाई देती है (जैसा कि कई स्थलों पर खुदाई के प्रमाण मिले हैं) और अर्थव्यवस्था में कोई विशेष परिवर्तन नजर नहीं आता। अंतर केवल इतना है कि चरण I में ताम्र एवं कांस्य के औज़ार नहीं मिलते। चूंकि चरण द्वितीय तथा चरण तृतीय के व्यवसायों में इन धातु औज़ारों का प्रथमतः प्रयोग किया गया अतः इन्हें नवपाषाण-ताम्र पाषाण युगीन कहा जाता है। 

बस्तियों के फैलाव से पता चलता है कि निचली पहाड़ियों के निकट मुख्य जल स्रोतों से हट कर किंतु नदियों से निकट के स्थलों को प्राथमिकता दी जाती थी तथा गर्म काली मिट्टी वाली भूमि लाल तथा काली मिट्टी वाली बलुई उपजाऊ भूमि, बलुई उपजाऊ भूरी भूमि तथा डेल्टा की बाढ़ की मिट्टी वाले क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जाती थी। जहाँ यह बस्तियाँ मौजूद थीं वहाँ आज एक वर्ष में औसत वर्षा दर 600-1200 मिली मीटर है। यह स्थान सामान्यतः दीवारनुमा पहाड़ियों पर प्राकृतिक रूप से उभरे जगहों पर पाए जाते हैं तथा निवास स्थल पहाड़ियों के शिखर पर अथवा पहाड़ियों के एकदम नीचे होता है।

8.2 जीवन यापन अर्थव्यवस्था

प्राकृतिक दृष्टि से स्थलों के चुनाव में ऐसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जाती थी जो ढलान वाले क्षेत्रों में हों जिससे कि सिंचाई की सुविधा स्वतः बनी रहे। तथापि ऐसे भी स्थल पाए गए हैं जहाँ नहर द्वारा सिंचाई करके पानी का उपयोग किया जा सकता था जैसे कृष्णा नदी के तट पर वीरपुरम, तुंगभद्र के तट पर हल्लूर, कावेरी तथा कपिला के संम पर टी. नरसीपुर तथा कृष्णा के निकट बाढ़ की मिट्टी वाले क्षेत्र। 

उपलब्ध पुरातत्व वानस्पतिक प्रमाणों से पता चलता है कि मुख्य फसलें बाजरा एवं दालें थीं। रामापुरम में हाल में ही बाजरे की विभिन्न किस्में जैसे ज्वार, चना, उड़द, मूंग, फलियाँ तथा जौ पायी गयी हैं। 

जानवरों के संदर्भ में नवपाषाण तथा ताम्रपाषाण युग के स्थलों से खुदाई में प्राप्त सभी अवशेष पालतू एवं जंगली दोनों ही प्रकार के जानवरों के अस्तित्व की ओर संकेत करते हैं। 

पालतू जानवरों में गाय, बैल, भैंस, बकरी, सुअर, कुत्ते तथा मुर्गी शामिल हैंबैल लगभग हर स्थान पर पाए गए हैं, जिससे इन समुदायों की अर्थव्यवस्था में इनके महत्त्व की ओर संकेत मिलता हैउदाहरण के लिए, वीरापुरम के जानवरों के अवशेष जिन पर गहन अध्ययन किया गया हैयहाँ गाय, बैलों की संख्या कुल पालतू जानवरों की संख्या का 48.68 प्रतिशत है जबकि भेड़/बकरी केवल 5.4 प्रतिशत पाए गए हैं। यदि कृष्णा के दाहिने तट पर, जोकि सिंचाई वाली खेती के लिए अत्यंत उपयुक्त स्थान है, यह स्थिति थी तो अपेक्षाकृत ऊपरी स्थानों पर बैलों का महत्त्व निश्चित रूप से और अधिक रहा होगा। चूंकि इन समुदायों की अर्थव्यवस्था खेती तथा पशुपालन (गाय, बैल अधिक तथा भेड़/बकरी कम) पर आधारित थी, इसलिए इस व्यवस्था को खेतिहर पशुपालक अर्थव्यवस्था कहा जा सकता है।

इन पालतू जीवों के साथ-साथ इन बस्तियों से जंगली जानवरों के भी अवशेष मिलते हैंयही जानवर साही, नीलगाय, चिंकारा, काले हिरन, सांबर और चीतल हैंइससे यह पता चलता है कि भोजन में मांस की आवश्यकताएँ जंगली जानवरों से भी पूरी होती थी। 

8.3 भौतिक संस्कृति 

इस युग की भौतिक संस्कृति बर्तनों, पत्थर के औज़ारों, ताम्र/कांस्य की वस्तुओं तथा अन्य स्तुओं पर आधारित थी।

i) बर्तन : चरण I (2500 से 1800 बी.सी.ई.) के बर्तन मुख्यतः हाथ से बनाए गए सलेटी अथवा मटमैले भूरे होते थे। सलेटी बर्तनों की विशेषता बर्तनों को पकाने के बाद उन पर लाल गेरू से रंगाई करना थी। रुचिकर तथ्य यह है कि इन बर्तनों में से कुछ ऐसे हैं जिनके पाए खोखले तथा वृत्ताकार हैं जो कि हड़प्पा पूर्व आमरी तथा कालीबंगन में मिले र्तनों की किस्मों से मिलते-जुलते हैं। चरण प्रथम से संबंधित मृद्भाण्ड की एक अन्य किस्म में चमकाए हुए काले एवं लाल बाह्य भाग वाले बर्तन जो बैंगनी रंग से रंगे जाते थे, मिलते हैं। 

चरण II (1800-1500 बी.सी.ई.) में चमकाए हुए काली एवं लालधारी वाले बर्तनों का चलन समाप्त हो जाता है और एक अन्य किस्म सामने आती है। यह किस्म छिद्रित तथा टोटी वाले बर्तनों की है। मृद्भाण्ड तैयार करने में बाहरी भाग को खुरदरा बनाने की तकनीक अपनाई जाती थी जो कि हड़प्पा पूर्व बलूचिस्तान के इलाकों में सामान्य थी। 

चरण II (1400-1050 बी.सी.ई.) में जो नए मृद्भाण्ड चलन में आए वे हैं : 

अ) सख्त ऊपरी भाग वाले सलेटी वं धूसर मृद्भाण्ड।

ब) चाक से बनाए गए बैंगनी रंग के बगैर चमकाए मृद्भाण्ड। 

यह दूसरी किस्म के बर्तन महाराष्ट्र के जोर्वे किस्म से मिलते-जुलते हैं जो कि दक्षिणी दक्कन तथा उत्तरी दक्कन के बीच सांस्कृतिक संबंधों की ओर संकेत करता है। बर्तनों की किस्मों में विभिन्न प्रकार के प्याले (उड़ेलने के लिए विशिष्ट मुख वाले प्याले, टोंटी वाले प्याले, दस्ता लगे हुए तथा खोखले पाए वाले प्याले) जार, स्टैण्ड युक्त डोंगे तथा छिद्रित एवं टोंटी वाले बर्तन मिलते हैं। 

ii) पत्थर के औजार तथा हड्डियों की शिल्पकृति : पत्थर के फलकों के उद्योग में लम्बे पतले, समानांतर दिशा वाले फलक, जिनमें से कुछ अतिरिक्त शिल्प कार्य के द्वारा अन्य रूले लेते थे, मिले हैं। अतिरिक्त शिल्प वाले इन रूपों में चांदनुमा फलक, 90 अंश के दो कोण बनाते फलक, त्रिकोणीय फलक तथा आरी वाले फलक शामिल हैंसामानांतर दिशा वाले कुछ फलकों में काटने की धार पाई गई हैजिसका कारण यह है कि इन फलकों का फसकी कटाई में इस्तेमाल किया जाता थाकई पत्थर के औज़ारों पर पॉलिश की गई प्रतीत होती है। पॉलिश की गयी अथवा पत्थर की कुल्हाड़ी के उद्योग की सबसे सामान्य किस्म त्रिकोणीय कुल्हाड़ी है जिसका एक सिरा अंडाकार तथा दूसरा नुकीला है। अन्य किस्में हैं बसुला, फाल, छेनी, रंदा तथा नुकीले औज़ार (जिन्हें कुदाल कहा गया है

इनके अतिरिक्त पत्थर के अन्य औज़ार हैं हथौड़े, फेंकने के पत्थर, पीसने वाले पत्थ, घिसाई के पत्थर तथा हस्तचलित चक्की। हस्तचलित चक्की खाद्य अनाज तैयार करने के काम आती थी। 

हड्डियों के शिल्पकृति के शिल्पयुक्त हड्डियाँ, सींगें तथा प्रायः शाखायुक्त सींगें एवं सीप मिली हैं। सबसे सामान्य पुरावशेष नुकीले छेनी के उपकरणों का है, एक स्थान पर (पल्लावॉ) बैलों के कंधे की हड्डी को घिसकर तैयार की गयी हड्डी की कुल्हाड़ी भी प्राप्त हुई है। 

iil) धातु की वस्तुएँ: जैसा कि पीछे देखा गया है, ताम्र एवं कांस्य औज़ार चरण द्वितीय में प्रकट होते हैं और चरण तृतीय तक उनकी संख्या में काफी बढ़ोत्तरी हो जाती है। इनमें सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण सीधी कुल्हाड़ियों तथा छेनियाँ हैं जो मालवा एवं महाराष्ट्र की पद्धति का अवशेष हैं। अन्य रुचिकर उपलब्धि कल्लूर में मिली शृंगिका तलवार है जिस पर ताम्र भंडारों के संदर्भ में चर्चा की गयी है।

विभिन्न स्थानों पर प्राप्त हुई ताम्र/कांस्य की अन्य वस्तुएँ चूड़ियाँ, लच्छेदार कान की बालियाँ तथा सुरमें की सलाईयाँ हैं, हल्लूर से एक मछली पकड़ने का कांटा भी मिला है। टेक्कलकोटा में एक लच्छेदार कान की सोने की बाली भी मिली है। 

iv) मनके एवं मिट्टी की प्रतिमाएँ : कुछ स्थानों पर अर्ध बहुमूल्य पत्थरों के मनके प्राप्त । हुए हैं। उदाहरण के लिए, नागार्जुनकोंडा में लुगदी एवं स्टीटाइट पत्थर की चपटी गोलाकार मनकों की मालाएँ, मिट्टी की प्रतिमाएँ, जो कि हड़प्पा के उभरी हुई पीठ वाले बैलों की हैं पिकलीहल जैसे कुछ स्थलों से प्राप्त हुई हैं।

इन्हें यदि कूपगल, मस्की, पिकलीहल आदि बस्तियों से प्राप्त बैलों के चित्रों के संदर्भ में देखा जाए तो इन संस्कृतियों में बैल के महत्त्व की ओर संकेत मिलता है। इन चित्रों में बैलों को समूह में प्रसन्न मुद्रा में दर्शाया गया है तथा उभरी पीठ वाले सांड एवं लम्बे सींगों वाले बैलों को चित्रित किया गया है। कुछ बैलों की पीठे अलंकृत की गयी दर्शायी गयी हैं।

8.4 दाह संस्कार के तरीके सामान्यतः

शव घर के अन्दर दफनाए जाते थे, वयस्क दाह संस्कार में और शिशु कलशों में दफनाए जाते थे। टेक्कलकोटा में खुदाई से (चरण III में) शवों को विभिन्न बर्तन के साथ दफनाने के प्रमाण मिले हैं जो कि महाराष्ट्र में जोर्वे दाह संस्कार के अनुरूप था। नागार्जुनकोंडा में नवपाषाण युगीन कब्रिस्तान की खोज की गयी है। कब्रों में शवों के साटोटी वाले बर्तनों सहित कुछ अन्य बर्तन तथा कुछ स्थानों पर पत्थर के फलक एवं कुल्हाड़ियाँ भी दफनाई जाती थीं। 

9. दक्षिण भारत में सतह पर मिलने वाली नवपाषाण 

संस्कृति के अवशेष बस्तियों के अतिरिक्त पॉलिश की गयी पत्थर की कुल्हाड़ियाँ जंगली इलाकों के निर्जन स्थानों पर जहाँ लोग कभी-कभी इकट्ठे होते होंगे मिली हैं। दक्षिण भारत में इस प्रकार के कई स्थान मिले हैं, बहुधा ऐसे स्थानों के निकट बस्तियाँ भी होती थी। यह वस्तुस्थिति किस तथ्य की ओर संकेत करती हैं? संभवतः ह स्थान गतिविधि केंद्रों के रूप में प्रयोग होते होंगे। कहने का तात्पर्य यह है कि औज़ारों (जैसी पेड़ काटने की कुल्हाड़ियों) के इस्तेमाल को देखते हुए यह चयनित स्थल पहाड़ी जंगली क्षेत्रों को साफ करके खुश्क खेती योग्य बनाने के लिए चुने गए होंगे।

तमिलनाडु के जंगली पहाड़ी क्षेत्र जैसे – स्लेवॉरी, जवड़ी तथा तीरूमलाई पहाड़ी क्षेत्रों में इस प्रकार की नवपाषाण युगीन पत्थर की कुल्हाड़ियाँ पाया जाना सामान्य हैं। पश्चिमी तटों के दक्षिणी विस्तार के जंगली ढलानों से लेकर निचले तमिल मैदानों तक नवपाषाण युगीन कुल्हाड़ियों का समानरूप से पाया जाना, झूम खेती (shifting cultivation) के तरीकों जो कि अभी कुछ समय पूर्व तक पश्चिमी तटों के दक्षिणी भाग में प्रचलित थे, के प्रचलन का द्योतक है।

दक्षिण भारतीय नवपाषाण युग में भी राख के टीले मिलते हैं जो कि भीमा-कृष्णा तुंगभद्र दोआब के अर्ध ऊसर भागों तक फैले हुए हैं। 60 से अधिक राख के टीले खोजे जा चुके हैं और इनमें से कुछ काफी बड़े हैं। पुरातत्वशास्त्रियों के अनुसार, राख के यह टीले नवपाषाण युगीन समुदायों द्वारा गाय के गोबर को जलाने के कारण बने । उनके कथनानुसार, ये वे स्थान थे जो गाय बैलों के बाड़ों के रूप में प्रयोग किए जाते थे जहाँ गोबर इकट्ठा किया जाता था। रेमंड अलचिन ने उत्तनूर (राख का एक टीला) की खुदाई से प्राप्त प्रमाणों के आधार पर यह परिणाम निकाला कि राख के टीले नवपाषाण युगीन लोगों के जानवरों के जंगली पड़ाव थे तथा गोबर का जलाया जाना संभवतः कर्मकांडी महत्त्व रखता था। 

जैसा कि पहले कहा गया है कि दक्षिण भारत में शिकारी संग्रहकर्ता अर्थव्यवस्था से ग्रामीण खेतिहर समुदाय की ओर विकास को प्रमाणित करने के लिए कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। जैसा कि हमने देखा कि इन क्षेत्रों में तीसरी सहस्राब्दी बी.सी.. के लगभग मध्य में अचानक ग्रामीण बस्तियाँ अस्तित्व में गयींयह खेतिहर बस्तियाँ कैसे अस्तित्व में आयी? कुछ पुरातत्वशास्त्रियों के अनुसार, धूसर मृद्भाण्ड उत्तरी-पूर्वी ईरान में तुरंग तेप तथा शाह तेप स्थलों हिसार पर प्राप्त हुए मृद्भाण्ड से मिलते-जुलते हैं और लाल-एवं-काले चित्रित बर्तन बलूचिस्तान तथा हड़प्पा पद्धति से पूर्व हड़प्पा बर्तनों के समरूप हैं। इन समानताओं तथा कुछ अन्य विशिष्टताओं के आधार पर इन पुरातत्व शास्त्रियों ने माना है कि क्षिण भातीय नवपाषाण युगीन संस्कृतियों का संभवतः कुछ भारत ईरान सीमांती क्षेत्रों के साथ संबंध रहाहोगा। 

10. दक्षिण भारत में लौह युग के अवशेष

दक्षिणी भारत में लोहे का प्रयोग लगभग 1100 बी.सी.ई. के आस-पास आरंभ हुआ। समय का यह अनुमान हल्लूर में प्राप्त वस्तुओं के रेडियो कार्बन विश्लेषण के आधार पर लगाया गया हैं तथापि कुछ अन्य स्थानों पर, जिनकी पीछे चर्चा की जा चुकी है, नवपाषाण तथा ताम्र पाषाण युगीन संस्कृतियाँ लौह युग तक अपना अस्तित्व बनाए रहती है। उत्तरी दक्कन (महाराष्ट्र) में भी कई ताम्र पाषाण युगीन बस्तियाँ लौह युग में भी बनी रही। दक्षिणी दक्कन के ब्रह्मागिरी, पिकलीहल, संगनाकल्लु, मस्की, हल्लूर, पय्यमपल्ली आदि में भी ऐसी ही स्थिति थी।

दक्षिण भारत में लौह युग का प्राचीनतम चरण पिकलीहल तथा हल्लूर की खुदाई और संभवतः ब्रह्मगिरी के शव दफनाने व गड्ढों के आधार पर निश्चित किया गया है। इन शवाधान के गड्ढों में पहली बार लोहे की वस्तुएँ काले-एवं-लाल मृद्भाण्ड तथा फीके रगे भूरे एवं लाल मृद्भाण्ड प्राप्त हुए। कुछ हद तफीके रंगे भूरे एवं लाल मृद्भाण्ड जोर्वे मृद्भाण्डों के समरूप हैं। इसी प्रकार के प्रमाण टेकवाड़ा (महाराष्ट्र) से भी प्राप्त हुए हैं। कुछ बस्तियों में पत्थर की कुल्हाड़ियाँ एवं फलक प्रयोग में बने रहे हैं।

इसके बाद के चरण की विशेषता घिसकर चमकाए बगैर चित्रित काले एवं लाल मृद्भाण्डों तथा लाल एवं काले मृद्भाण्डों की बहुतायतता है।

10.1 महापाषाण युगीन संस्कृतियाँ

दक्षिण भारत में लौह युग के विषय में अधिकांश जानकारी महापाषाण कालीन कब्रों की खुदाई से मिलती है। महापाषाण से तात्पर्य उस काल से है, जब मृतकों को आबादी क्षेत्र से दूर कब्रिस्तानों में पत्थरों के बीच दफनाया जाता था। दक्षिण भारत में इस प्रकार के दफनाने की परंपरा लौह युग के साथ आरम्भ हुई। महापाषाण कालीन दफन करने के इस तरह की जानकारी बड़ी संख्या में निम्न स्थानों जैसे महाराष्ट्र (नागपुर के पास), कर्नाटक (मस्की), आंध्र प्रदेश (नागार्जुनकोंडा), तमिलनाडु (आदिचनाल्लुर) तथा केरल में पायी गयी है।

महापाषाण कालीन शवों के दफनाने में कई तरीके देखने में आते हैंकभी-कभी मृतकों की हड्डियाँ बड़े कलशों में जमा करके ड्ढे में दफनाई जाती थींइस ड्ढे के ऊपर पत्थरों से घेरा बनाया जाता था या केवल एक पत्थर से ढक दिया जाता था कभी-कभी दोनों ही चीजें की जाती थीं, कलश और गड्ढों में कुछ वस्तुएँ भी रखी जाती थीं। कुछ जगह शवों को पकाई हुई मिट्टी की शवपेटिकाओं में भी रखा गया हैकुछ ऐसे भी उदाहरण देखने में आते हैं, जहाँ मृतक दफनाने के गड्ढे पत्थरों से बनाये गये हैं। ग्रेनाइट पत्थर की पट्टिकाओं से बने ताबूतनुमा कब्रों में भी शवों को दफनाने के उदाहरण मिलते हैं। केरल में पत्थर की चट्टानों में शव दफनाने के कुछ उदाहरण मिले हैंकुछ जगह पत्थर को सीधा गाढ़ कर आयताकार या वर्गाकार छेदों में भी शव दफनाये गये हैं। 

10.2 महापाषाण युगीन संस्कृतियों की उत्पत्ति

महापाषाण कालीन संस्कृति का प्रारम्भ दूसरी सहस्राब्दी बी.सी.ई. के अंत और प्रथम सहस्राब्दी बी.सी.ई. के प्रारम्भ में हुआ। बाद की कई शताब्दियों तक यह परम्परा जारी रही। कुछ विद्वानों का मत है कि महापाषाण युग के लोग एक ही सांस्कृतिक समूह के हीं थे तथा दक्षिण भातीय कब्रों पर कई क्षेत्रों के प्रभाव के कारण यह कबे कई संस्कृतियों का मिश्रण प्रतीत होती हैं। प्रथमतः महापाषाण युग के कुछ शवाधान मध्य एशिया, ईरान अथवा कॉकस्स क्षेत्र के जैसे हैं और इंडो-यूरोपीय भाषाएँ बोलने वाले इन क्षेत्रों के लोगों ने ऐसी परम्परा की शुरुआत की होगी। इके अतिरिक्त कुछ शवाधानों में दक्कन के स्थानीय नवपाषाण युगीन ताम्र पाषाण युगीन शवाधान के तरीके अपनाये गए प्रतीत होते हैं।

कुछ विद्वानों ने महापाषाण स्थलों को आर्यों अथवा द्रविड़ों के अवशेषों के रूप में माना है। परन्तु इस विचार को स्वीकार करना सम्भव नहीं है, यह तथ्य लगभग निश्चित है कि यह कब्र स्थल एक ऐसी स्थिति में अस्तित्व में आये जब उत्तर व दक्षिण भारत के विभिन्न समुदायों में मेल-जोल की प्रक्रिया काफी अधिक थी। जैसी कि पहले चर्चा की गई कि इन क्षेत्रों में खेतिहर पशुपालक समुदाय लोहे के प्रयोग से काफी पहले से मौजूद थे। इन समुदायों की मृतकों को दफनाने की बहुत सी रस्में लौह युग तक जारी रहीं, मिट्टी के पात्रों में शवों को दफनाने की परम्परा ताम्र पाषाण युगीन इनामगाँव में प्रचलित थी। महापाषाणीय दफनाने के बहुत से तरीके सम्भवतया स्थानीय सांस्कृतिक परम्पराओं से लिए गये थे। कब्रों से प्राप्त बहुत सी वस्तुएँ भारत के उत्तर-पश्चिम में स्थित क्षेत्रों के साथ संबंधों की ओर संकेत करती हैंकुछ विशेष प्रकार के बर्तन जैसे कि पायों वाले प्याले जो इन कब्रों में पाये गये हैं बहुत कुछ उन प्यालों की तरह है जो भारत के उत्तर-पश्चिम में और ईरान में इससे भी पुरानी कब्रों में मिले हैं। इसी तरह घोड़ों की हड्डियाँ और घोड़ों के प्रयोग से संबंधित अन्य वस्तुओं का यहाँ मिलना इस ओर संकेत करता है कि घुड़सवारी करने वाले लोग इस क्षेत्र में पहुँच गये थे। निश्चित ही घोड़े मध्य एशिया से लाये गये होंगे क्योंकि भारत में जंगली घोड़े नहीं पाये जाते थेघोड़ों को दफनाने के उदाहरण, नागपुर के निकट जूनापानी से प्राप्त होता है, मस्की और पिकलीहल से प्राप्त शिला चित्रों में बहुत से घुड़सवार धातु की कुल्हाड़ियाँ ले जाते दिखाए गए हैं। यह सब तथ्य इन क्षेत्रों को भारत के उत्तर-पश्चिम में रहने वाले समुदायों के साथ संबंधों पर प्रकाश डालते हैं। अतः लौह युग के मृतकों के अंतिम संस्कार के तरीके आंतरिक और विदेशी रस्मों का मिश्रण दर्शाते हैं।

10.3 भौतिक संस्कृति

पूर्व की भांति ही लौह की भौतिक संस्कृति लोहे तथा अन्य धातु की वस्तुओं के अतिरिक्त कुछ विशिष्ट किस्म के बर्तनों के आधार पर रेखांकित होती है। 

1) बर्तन : कब्रों की खुदाई से प्राप्त बर्तन काले-एवं-लाल मृद्भाण्ड हैं। विशिष्ट बर्तनों में  छिछली तश्तरी, प्याले, गहरे प्याले जो कि गोल आधार वाले तथा कोण के आकार वाले हैं जिनके ऊपर दस्ता अथवा धुंडी वाले ढक्कन थे, बर्तन रखने के गोलाकार स्टैण्ड तथा गोल आधार वाले पानी के मटके हैं।

2) लोहे तथा अन्य धातुओं की वस्तुएँ : महापाषाण युग के सभी स्थलों, विदर्भ (मध्य भारत) में नागपुर के समीप जूनापानी से लेकर दक्षिण में आदिचानालूर तक लगभग 1500 कि.मी. के क्षेत्र में लोहे की वस्तुएँ समान रूप से पायी गयी हैं। लोहे की विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ : चपटी लोहे की कुल्हाड़ियाँ जिसमें पकड़ने के लिए लोहे का दस्ता होता था, उभरे हुए चपटे किनारे के विभिन्न फावड़े, बेलचे, खुरची, कुदालें, हंसिए, फरसे, फान, सब्बल, बरछे, छुरे, छेनी, अथवा बसुले, तिपाइयाँ बर्तन के स्टैंड, तश्तरियाँ, लटकाने 

वाले लैम्प, कटारें, तलवारें (जिनमें से कुछ के दस्तों में कांस्य के आभूषण जड़े हैं) तीर के फल तथा बरछे के फल जिनके पात्र खोखले हैं, विशेष अवसरों के लिए सीप जड़ी। कुल्हाड़ियाँ, लोहे के त्रिशूल आदि हैं। इन औज़ारों के अतिरिक्त कुछ विशेष प्रकार की वस्तुएँ भी प्राप्त हुई हैं। जैसे घोड़े के सामान जिनमें लगाम का लोहे का वह हिस्सा जो घोड़े के मुंह में होता है तथा फंदे के आकार वाले किनारों वाली दो छड़ें (जो कि जूनापानी से प्राप्त हुई है), फंदे के आकार वाली नाक तथा मुंह पर लगाने वाली छड़ें (जो कि सनूर से प्राप्त हुई है) आदि । धातु की अन्य वस्तुओं में सबसे अधिक संख्या में ताम्र एवं कांस्य की घंटियाँ पाई गयी हैं जो कि घोड़े अथवा गाय, बैलों की घंटियों के रूप में इस्तेमाल की जाती रही होंगी, सोने अथवा अर्ध बहुमूल्य पत्थरों के मनके भी इन स्थानों से मिले हैं।

10.4 जीवन-यापन व्यवस्था 

खुदाई में लौह युग की बस्तियाँ काफी कम संख्या में प्राप्त हुई हैं। अतः दक्षिण भारतीय महापाषाण युग के निर्माताओं की अर्थव्यवस्था की स्पष्ट स्थिति का अनुमान लगाना कठिन है। कुछ स्थानों पर भेड़/बकरी तथा गाय, बैलों के अवशेष तथा बाजरा और दालें प्राप्त हुई हैं।

कब्रों की खुदाई से प्राप्त कब्रों में रखी जाने वाली लोहे की वस्तुओं की समरूपता इन वस्तुओं की विशेषता है। नागपुर के निकट जूनापानी से लेकर दक्षिण के आदिचानालूर क ही प्रकार की लोहे की वस्तुओं का पाया जाना लोहे का काम करने वाले कारीगरों के काफी हद तक संगठित होने की संभावना को सिद्ध करता है। एक विद्वान के अनुसार, तमिलनाडु एवं कर्नाटक में यह मध्यपाषाण युगीन लोग कच्चे लोहे की खानों का पता लगाने तथा विभिन्न लोहे की वस्तुएँ तैयार करने में दक्ष थे, वे अन्य वस्तुओं के साथ लोहे की चीजों का व्यापार भी करते थे तथा धीरे-धीरे सामुदायिक जीवन के रूप में गाँवों में बस गएलेकिन एक अन्य विद्वान का मत है कि यह समूह खानाबदोश पशुपालक समूह थे जो कि भेड़/बकरी पालने पर अधिनिर्भर थे। 

महापाषाणीय स्थलों के पास जो बस्तियाँ पाई गई हैं उनमें पुरातात्विक अवशेष बहुत कम संख्या में मिलते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि यहाँ के लोग किसी एक स्थान पर बहुत कम समय तक रहते थे। ऐसा भी संभव है कि लोहे की जानकारी होने के बाद यह लोग नये क्षेत्रों में बस गये। इस प्रकार यहाँ कुछ लोग तो घुमक्कड़ पशुपालकों का जीवन व्यतीत करते रहे जबकि कुछ लोग नये क्षेत्रों में बसकर स्थायी जीवन पद्धति पर चलने लगे। जहाँ भी नई बस्तियाँ पुरानी बस्तियों की परम्परा में बसी, लोग अपने पुराने तरीकों से ही रहते रहे। लोहे के औज़ारों के प्रयोग से यह लोग ग्रेनाइट पत्थर का उपयोग भी कब्रों के लिए कर सके । यही वह खेतिहर पशुपालक मुदाय है जिन्होंने सामान्य युग की प्रारभिक शताब्दियों के ऐतिहासिक चरण में प्रवेश किया। इनका प्रारंभिक विवरण हमें संगम साहित्य में मिलता था। कुछ कब्रों में रोमन सिक्के मिले हैं जिनसे ऐसा आभास होता है कि यह एक बड़े क्षेत्र में व्यापारिक गतिविधियों में भाग ले रहे थे। 

11. सारांश 

लगभग 2000 बी.सी.ई तक भारत के विभिन्न भागों में खेतिहर समुदाय स्थापित हो चुके थे। यह खेतिहर समुदाय ताम्बे और पत्थर से बने औज़ारों का प्रयोग करते थे। उत्तर भारत में यह समुदाय विभिन्न प्रकार के मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग करते थे। विशेषकर गेरुए रंग वाले मिट्टी के बर्तन (ओसीपी)। विभिन्न प्रकार के तांबे के औज़ार भी प्राप्त हुए हैं। मध्य भारत 

और महाराष्ट्र के काली मिट्टी वाले क्षेत्रों की खुदाई से कायथा, मालवा और जोर्वे संस्कृतियों की उपस्थिति का पता चलता है। लगभग 750 बी.सी.ई. तक बहुत से खेतिहर समुदायों ने लोहे का प्रयोग प्रारम्भ कर दिया। ताम्र पाषाण समुदायों में मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग में भी बहुत भिन्नता दिखाई देती है। लौह युग के चित्रित धूसर वाले मृद्भाण्ड तथा उत्तर काली पॉलिश किए मृद्भाण्ड बहुत विस्तृत क्षेत्र में प्रयोग किये जाते थे। उत्तरी काले पॉलिश किए मृद्भाण्ड लगभग पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में प्रयोग किये जाते थे इस काल में विभिन्न समुदायों के बीच आदान-प्रदान और एक दूसरे पर प्रभाव डालने की प्रक्रिया बढ़ी। इसी काल में शहरी सभ्यता का भी प्रारम्भ हुआ। विभिन्न संस्कृतियों के खुदाई स्थलों से प्राप्त वस्तुएँ बस्तियों की बनावट, व्यापारिक संबंध, औज़ारों की किस्मों, आभूषणों और धार्मिक विश्वासों के बारे में जानकारी प्रदान करते हैं। 

तीसरी सहसाब्दी बी.सी.ई. में दक्षिण भारत में खेतिहर समुदायों का उदय हुआ। इसी में बड़ी संख्या में घुमक्कड़ पशुपालक समुदायों का भी उदय हुआ। खेतिहर वर्ग अधिकांशतयाः चना, जौ और कई किस्मों का बाजरा उगाया करते थे, पशुपालक समुदाय भेड़, बकरी तथा गाय, बैल आदि पालते थे। लगभग दूसरी सहस्राब्दी बी.सी.ई. के प्रारम्भिक काल में इन समुदायों ने तांबे और कांस्य के औज़ारों का प्रयोग आरंभ किया। इन लोगों के कांस्य के बहुत से औज़ार उत्तर पश्चिमी भारत के औज़ारों से मिलते हैं। दूसरी सहस्राब्दी बी.सी.ई. के अंत तक इस क्षेत्र में लोहे का प्रयोग भी होने लगा। इसी कारण में महापाषाणीय दफनाने के तरीके भी शुरू हुए। इसने बस्तियों की योजना को भी प्रभावित किया क्योंकि इन समुदायों ने अपने मृतकों को बस्तियों के अलग हट कर दफन करना शुरू किया। परन्तु खेतिहर उन्हीं सलों को उगाते रहे और पशुपालक भी पुरानी जीवन पद्धति पर चलते रहे। लेखन की परम्परा शुरू होने पर धीरे-धीरे विकास के इस चरण का विलय दक्षिण भारत के इतिहास में हो गया।