सिकंदर (Alexander) का आक्रमण

इस पेज का पाठ्यक्रम

1 प्रस्तावना 2 स्रोत 3 मैसिडोनिया का अलेक्जेंडर (सिकंदर) 4 एरियन का इंडिके 5. अलेक्जेंडर के उत्तराधिकारी और सेल्यूकस निकेटर 6. अलेक्जेंडर के आक्रमण का प्रभाव 7. सारांश

8. शब्दावली 

1. प्रस्तावना 

पिछली एक इकाई में आपने लगभग छठी शताब्दी बी.सी.ई. में उत्तर भारत में उभरे जनपदों और महाजनपदों के बारे में जानकारी प्राप्त की। इस इकाई में हम भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिमोत्तर क्षेत्र की ओर ध्यान देंगें और जानेगें कि कैसे यह चौथी शताब्दी बी.सी.ई. में अलेक्जेंडर के आक्रमण से संबंधित घटनाओं के कारण जीवंत गतिविधियों का क्षेत्र बन गया। 

छठी शताब्दी बी.सी.ई. में भारत का पश्चिमोत्तर क्षेत्र विभिन्न रियासतों के बीच संघर्ष का स्थल था। कंबोज, गांधार और मद्रास आपस में एक-दूसरे के साथ लड़ते रहे। चूंकि शक्तिशाली राज्य का अभाव था इसलिए पश्चिमोत्तर क्षेत्र की रियासतों को एक राज्य में संगठित नहीं किया जा सका। इसी राजनीतिक अस्थिरता के कारण फारस के एकेहमिनियन राजा इस क्षेत्र की ओर आकर्षित हुए। 516 बी.सी.ई. में केहमिनियन (हखमनी) शासक डेरियस ने भारत के उत्तर पश्चिम क्षेत्र पर आक्रमण किया और पंजाब, सिंध और सिन्धु नदी के पश्चिम भूभाग को जीत लिया। इस समय ईरान के पास कुल 28 क्षत्रप थे जिनमें से भारत का पश्चिमोत्तर क्षेत्र बीसवाँ प्रांत था। भारतीय क्षत्रपों में सिन्धु नदी का पश्चिम भाग था जिसमें सिंध, उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रदेश और पंजाब का हिस्सा शामिल था। ईरान द्वारा एशिया क्षेत्र से प्राप्त राजस्व का एक तिहाई हिस्सा बहुमूल्य सोने के रूप में अकेले इसी क्षेत्र से आता था। लगभग पाँचवीं शताब्दी बी.सी.ई. में ग्रीक (यूनानियों) के खिलाफ लड़ने वाली फ़ारसी सेनाओं में भारतीय प्रांतों ने अपने सैनिकों की सेवाएं प्रदान की। 330 बी.सी.ई. में एलेक्जेंडर के आक्रमण तक भारतीय क्षेत्र का यह हिस्सा ईरानी साम्राज्य का अंग बना रहा।

ईरानियों के आक्रमणों के परिणामस्वरूप ईरान और उत्तर-पश्चिम भारत के बीच बहुत सारे सांस्कृतिक आदान-प्रदान हुए। ईरानी विद्वानों द्वारा एक नई लिपि की शुरुआत हुयी जिसे खरोष्ठी लिपि कहा जाता है। यह अरबी की तरह दाईं से बाईं ओर लिखी जाती थी। यह एकेहमिनियन (हखमनी) साम्राज्य की एरामाइक लिपि पर आधारित है। उत्तर पश्चिम सीमांत प्रदेश में प्राप्त फारसी सिक्कों के आधार पर इन दो क्षेत्रों के बीच व्यापार के संकेत भी मिलते हैं। 

2. स्रोत

विभिन्न स्रोतों द्वारा अलेक्जेंडर के युग के इतिहास की जानकारी मिलती है। प्रारम्भिक तौर पर ये स्रोत प्रभावशाली और उल्लेखनीय लगते हैंएरियन और कर्टियस रूफस द्वारा लिखा इस काल का लंबा इतिहास, प्लूटार्क द्वारा लिखी जीवनी, डायोडोरस सिरिकुलस की बिल्लियोथिका और स्ट्रैबो की जियोग्राफ़ी (Geography) के अंत के अनुभागों में पर्याप्त सामग्री उपलब्ध हैपरन्तु ये सभी अनुवर्ती काल में लिखे गए इसलिए पर्याप्त होने के बावजूद इन प्राथमिक स्रोतों पर सवाल उठाया जाता है। उदाहरणतया, प्रथम सदी बी.सी.ई. की तीसरी तिमाही में डियोडोरस की चनाओं को दिनांकित किया जाता है, एवं लगभग दूसरी शताब्दी में प्लूटार्क और एरियन की । इस प्रकार अलेक्जेंडर की मृत्यु और उसके शासनकाल से जुड़े प्रथम सारख्यानों के बीच दोतीन शताब्दियों का अंतर हैइनमें से कुछ विवरणों पर काल्पनिक होने का आरोप लगाया गया है कि यह बयानबाजी, तुच्छ विवरणों से ओतप्रोत एवं अतिरंजित हैं, और अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए अपर्याप्त हैं। फिर भी भारत के संदर्भ में विद्वानों को विश्वसनीय और उपयोगी जानकारी उपलब्ध करने में ये स्रोत महत्वपूर्ण हैं। एरियन का वर्णन अलेक्जेंडर के युग के सम्बन्ध में सबसे गंभीर व्याख्या है। एरियन एक आम सैनिक था जिसने अलेक्जेंडर की याद में विश्वसनीय स्रोतों का चयन करके उन्हें ईमानदारी से पेश करते हुए अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की। उसकी पुस्तक हिस्ट्री ऑफ अलेक्जेंडर टॉलेमी, एरिस्टोबुलस, नियरकस और एराटोस्थिनिस के विवरणों पर आधारित थी। टॉलेमी, एरिस्टोबुलस और नियरकस अलेक्जेंडर के अभियानों के प्रत्यक्षदर्शी और कभी कभी सक्रिय भागीदार भी थे। एराटोस्थिनिस, मेगस्थनीज़ और नियरकस के स्रोतों पर आधारित ‘इंडिके’ दक्षिणी महासागर में अलेक्जेंडर के बेड़े की यात्रा का वर्णन करता है। 

क्युन्ट्स कर्टियस रूफस (लगभग प्रथम शताब्दी बी.सी.ई.) – वह अलेक्जेंडर महान पर एकमात्र मौजूद लैटिन (Latin) मोनोग्राफ (विनिबंध) का लेखक है, जिसे आमतौर पर हिस्टोरिया अलेक्जेंड्री मैगनी कहा जाता है। यह एशिया में अलेक्जेंडर के कारनामों का सबसे प्राचीन वर्णन है। 

प्लूटार्क (जन्म 46 बी.सी.ई.) – प्लूटार्क एक यूनानी लेखक, मुख्यतः जीवनी लेखक था। इनकी रचनाओं ने 16वीं-19वीं शताब्दियों से यूरोप में इतिहास लेखन के विकाको काफी प्रभावित किया।

स्ट्रैबो (जन्म 64 बी.सी.ई.) – स्ट्रैबो एक यूनानी भूगोलशास्त्री और इतिहासकार था जिसका विख्यात जियोग्राफी एक ऐसा कार्य है जो ऑगस्टस (27 बी.सी.ई. – 114 बी. सी.ई.) के शासनकाल के दौरान रोमन और ग्रीक (यूनानियों) को ज्ञात सभी प्रकार के लोगों और देशों की जानकारी समेटे हुए है।

कैसेंड्रेया के एरिस्टोबुलस – यह अलेक्जेंडर के अभियानों में उसके साथ रहा। इसने एक वास्तुकार और सैन्य अभियन्ता के रूप में अलेक्जेंडर को सेवाएँ प्रदान की।

डायोडोरस सैल्यूकस (प्रथम शताब्दी बी.सी.ई.) – यूनानी इतिहासकार।

नियरकस (जन्म 312 बी.सी.ई.) – यह अलेक्जेंडर की मैसेडोनियन सेना में सैन्य अधिकारी था। अलेक्जेंडर के आदेश पर इन्होने पश्चिमी भारत में हाइडैस्पीस नदी से फ़ारस की खाड़ी तक और यूफ्रेट्स से बेबीलोन तक का सफर तय किया। 

एरैसटोसथिनिस (जन्म 276 बी.सी.ई.) साइरेन के एरैसटोसथिनिस एक यूनानी | वैज्ञानिक लेखक, खगोलशास्त्री और कवि थे। 

3. मेसिडोनिया का अलेक्जेंडर (सिकंदर) 

प्राचीन यूनानी संसार में ओलम्पस पर्वत के दक्षिण में रहने वालों और इसके उत्तर में रहने वाले मैसेडोनियन लोगों के बीच अंतर था। उत्तर में रहने वाले लोगों को ‘मकेडोन्स‘ कहा जाता था, यह मूल से एक यूनानी शब्द है। चौथी शताब्दी बी.सी.ई. के अंत तक यूनानी लोगों ने उन्हें बर्बर लोगों के रूप में देखा जो यह दर्शाता था कि वे लोग उन्हें यूनानियों के रूप में नहीं देखते थे। 

मैसेडोनिया 

मैसेडोनिया को कभी-कभी मैसेडोन भी कहा जाता है। यह प्राचीन काल में एक नृवंशतया रूप से मिश्रित क्षेत्र था, इसके दक्षिण में यूनानी राज्य और अन्य दिशाओं में आदिवासी राज्य थे। उत्तर और पश्चिम में बाल्कन के पहाड़ी क्षेत्र थे जबकि दक्षिणी क्षेत्र उपजाजलोढ़ मैदान था। ये दोनों क्षेत्र आपस में संघर्षरत थे। पहली बार इन दोनों क्षेत्रों को अलेक्जेंडर के पिता फिलिप ने एकजुट किया था। चौथी शताब्दी बी. सी.ई. में मैसेडोनियन और यूनानी नृवंश प्रतिद्वंद्विता में संलग्न थे। ये दोनों वर्ग एक दूसरे से भिन्न एवं पृथक थे। फिलिप द्वितीय ने 337 बी.सी.ई. में यूनानियों पर अपना नियंत्रण स्थापित किया। अलेक्जेंडर को अक्सर या गलती से यूनानी के रूप में जाना जाता है जो वह नहीं था। वह हमेशा यूनानियों से सावधान रहता था। मेसेडोनियन लोगों की उपेक्षा यूनानी अधिक परिष्कृत थे और इनकी सांस्कृतिक विरासत भी अलग थी। 

अलेक्जेंडर का जन्म जुलाई 356 बी.सी.ई. में हुआ। वह मैसेडोनिया के शासक फिलिप द्वितीय का बेटा था। 337 बी.सी.ई. तक फिलिप द्वितीय ने यूनानी राज्यों का संघ बनाकर यूनानी क्षेत्र पर अपना नियंत्रण स्थापित किया जिसे लीग ऑफ द कोरिन्थ कहा जाता था। इस मेसीडोनियन शासक के अंतर्गत यह संघ एकजुट हुआ और लीग के प्रति निष्ठावान भी। 

फारस के युद्ध के दौरान आर्थेनियन लोगों की पीड़ा और उनके मंदिरों के विनाश का बदला लेने के लिए फिलिप ने फ़ारस पर आक्रमण की घोषणा की ताकि एशिया माइनर के यूनानी क्षेत्रों को मुक्त करवा सके। 336 बी.सी.ई. में उसकी हत्या कर दी गई। उसकी मृत्यु के बाद यूनानी राज्यों ने मैसेडोनियन शान से विद्रोह कर दिया जिसे अलेक्जेंडर द्वारा कुचल दिया गया। 334 बी.सी.ई. में अलेक्जेंडर ने एक शक्तिशाली सेना के साथ फ़ारस पर आक्रमण किया और फ़ारस के राजा डेरियस को हराया।

ए. के. नारायण ने टार्न की कृति को आधार मानकर कहा है कि उस समय चूंकि भारत ईरानी साम्राज्य का हिस्सा था, इसलिए फारसी साम्राज्य के अपने विजय अभियान में अलेक्जेंडर की दिलचस्पी भारत के इस क्षेत्र में बढ़ गयी। हालाँकि एरियन ने अलेक्जेंडर को इससे कहीं अधिक महत्वाकांक्षी माना है तथा उसे भारत पर अधिकार प्राप्त करने का इच्छुक बताया है। यदि ऐसा नहीं होता तो वह सिंधु नदी पार नहीं करता, क्योंकि सिंधु नदी भारत और एरियाना के बीच की सीमा थी। उसमें भारत को जीतने का जोश था। एरियाना भारत के पश्चिम में स्थित क्षेत्र था जो फारसियों के कब्जे में था। डेरियस प्रथम के साम्राज्य की पूर्वी सीमा सिन्धु नदी थी।

भारत में अलेक्जेंडर के अभियान अत्यधिक उल्लेखनीय हैं जिनमें कई विजय शामिल हैं। 327 बी.सी.ई. में अलेक्जेंडर बेक्ट्रिया से हिंदुकुश पर्वत पार कर सिन्धु नदी के मैदान की ओर बढ़ा। उसकी सेना के एक हिस्से ने हिंदुकुश के संचार मार्ग पर अधिकार कर लिया और सेना के दूसरे हिस्से ने, जिसका नियंत्रण स्वयं उसके पास था, स्वात क्षेत्र में प्रवेश कर लियाइसके लिए उसे इन पहाड़ी इलाकों के लोगों के साथ भयंकर लड़ाई लड़नी पड़ीउसने स्वात को अपने अधीन कर लिया। 326 बी.सी.ई. में दोनों सेनाएँ सिंधु पर मिलीं और सिंधु को पाकर तक्षशिला तक पहुंच गई। भारतीय उत्तर-पश्चिम क्षेत्र की राजनीतिक स्थिति अलेक्जेंडर के लिए उपयुक्त थी क्योंकि यह भूभाग छोटे स्वतंत्र राजशाही और आदिवासी गणराज्यों में विभाजित था। झेलम और चेनाब के मध्य क्षेत्र पर शासन करने वाले पोरस सबसे प्रसिद्ध राजा थेपोरस और अलेक्जेंडर की भिडंत और उनके बीच का संवाद इतिहास में बहुत प्रसिद्ध है। सिकंदर ने सिंध को पार किया और तक्षशिला के राजकुमार आम्भी से मिला। आम्भी और पोरस दोनों मिलकर अलेक्जेंडर को हरा सकते थे लेकिन वे एक संयुक्त मोर्चा नहीं बना सकेआम्भी ने अलेक्जेंडर का विरोनहीं किया बल्कि भव्य उपहारों के साथ उसका स्वागत कियाअलेक्जेंडर ने आम्भी राज्य को कोई क्षति न पहुँचाते हुए वहाँ से शांतिपूर्व पलायन किया परन्तु फिलिप्स को वहाँ का क्षत्रप नियुक्त किया और अपना सैन्य दुर्ग निर्मित किया। वह झेलम (हाइडस्पिस) के लिए रवाना हुआ। वपोरस से मिलने का इच्छुक था जिसने आत्मसमर्पण करने से मना कर दिया था। मौसम की स्थिति अनुकूल नहीं थी, पूरा क्षेत्र बर्फ से ढका हुआ था। इन कठिन परिस्थियों में भी वह झेलम को पार करने में कामयाब रहा औनदी के दूसरे तट पर तैनात पोरस की सेना पर हमला कर दिया। पोस घायल होकर पीछे हट गया किन्तु वह पोरस के सैन्य कौशल और व्यक्तित्व से बहुत प्रभावित हुआ और उसने पोरस को उसका क्षेत्र वापिस करने का फैसला किया। तत्पश्चात् वे सहयोगी बन गये। अलेक्जेंडर की जीत महत्वपूर्ण थी, उसने अपनी जीत का उत्सव मनाने के लिए दो नगरों ‘नैसिया’ और ‘ब्यूसेफला’ की स्थापना की। उसने अपने प्रिय घोड़े ब्यूसेफला के नाम पर इस नगर का नाम रखा था जो युद्ध की थकान के कारण मर गया था। 

एलेक्जेंडर ने बेबीलोन में एक टकसाल से युद्ध के स्मरण में सिक्के भी जारी किये। 

अलेक्जेंडर अपने अभियान में आगे बढ़ता रहा और चेनाब तथा रावी नदी (ससिनेस और हाइड्रोटस) पार कली। उसने कराज्यों को हराया पंजाब के राजाओं के साथ भयानक लड़ाई लड़ीउन्होंने आत्मसर्मपण नहीं किया और वे बहादुरी से लड़े किन्तु अलेक्जेंडर ने उनका पहाड़ी किला जीत लिया और उसको तहसनहस कर दिया। एक पड़ोसी राजा ने सको ब्यास नदी के पूर्व में नंद वंश की शक्ति के बारे में बताया। पोरस ने भी इस जानकारी को पुख्ता किया। अलेक्जेंडर आगे बढना चाहता था लेकिन उसके सैनिकों ने आगे बढ़ने से इन्कार कर दिया।

इसलिए उसे झेलम की ओर लौटने के लिए मजबूर होना पड़ा। उसने झेलम और ब्यास के बीच का प्रदेश पोरस को सौंप दिया और अपनी वापसी यात्रा के लिए झेलम की ओर रवाना हुआझेलम और चेनाब के संगपर उसने अपना आखिरी महत्वपूर्ण अभियान मालव राजतंत्रों (मल्लोई) के खिलाफ लड़ा। मालव और शुद्रक गणराज्यों ने उसके खिलाफ कजुट होने की कोशिश की किन्तु सफल नहीं हो सके। उसने शुद्रकों को मालवों का साथ देने से रोक दिया। मालवों ने बहादुरी से लड़ाई लड़ी लेकिन हार गए। शुद्रक भी अलेक्जेंडर के आगे टिक नहीं सके।

ऐसा माना जाता है कि बेबीलोन में अलेक्जेंडर के आखिरी दिनों के दौरान पोरस के साथ मिलकर चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्य ने पंजाब को एकजुट करने का प्रयास किया। बाद में मौर्यों ने गंगा घाटी के नंद वंश पर आक्रमण करके अपना साम्राज्य स्थापित किया। 

324 बी.सी.ई. में भारत में अपने अभियानों के तीन साल बाद अलेक्जेंडर फारस में सूसा में वापस आ गया। अगले वर्ष बेबीलोन में उसकी मृत्यु हो गई। मृत्युशैया पर जब उससे पूछा गया कि उसके साम्राज्य को किसे सौंपा जाए तो उसने जवाब दिया “सबसे शक्तिशाली को”। बाद में उसके विशाल साम्राज्य के नियंत्रण के लिए उसके सेनापतियों और राज्यपालों के बीच संघर्ष की एक लंबी श्रृंखला शुरू हो गयी। उतराधिकार को लेकर दायदोची कहे जाने वाले उसके उत्तराधिकारियों के बीच हुए संघर्ष ने इस क्षेत्र पर यूनानी आधिपत्य की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया। 317 बी.सी.ई. भारत में यूनानी सीमा चौकियों को भी छोड़ दिया गया। 

एरियन – लुसियस फ्लेवियस एरियनस या एरियन, जैसा कि उन्हें आमतौर पर अंग्रेजी भाषा में कहा जाता है, का जन्म 85-90 सी.ई. के बीच निकोमीडिया (रोमन साम्राज्य में एक यूनानी शहर) में हुआ। यह याद रखना महत्वपूर्ण है कि अलेक्जेंडर से सम्बन्धित सभी आख्यान उसकी मृत्यु से तीन शताब्दियों बाद के हैं। ये सभी अब लुप्त हो चुके प्राथमिक स्रोतों पर आधारित हैं जो त्रुटिपूर्ण एव पक्षपाती हैं। 334-323 बी.सी.ई. के बीच की घटनाओं के लिए विद्वान एरियन के विवरणों पर निर्भर हैं। वह रोमन साम्राज्य में एक बड़ी सेना का अध्यक्ष/नायक थासाहित्यिक झुकाव के कारण उसने शिकार, घुड़सवारी, सेना की रणनीति पर कई लेख लिखे और अलेक्जेंडर की जीवनी भी लिखीउसने दावा किया है कि अलेक्जेंडर पर लेखन कार्य करने के लिए उसने विश्वसनीय प्राथमिक स्रोतों के रूमें अलेक्जेंडर के पूर्वी अभियान में शामिल टॉलेमी और ऐरिस्टोबुलस की कृतियों को आधार बनाया है। उसने अलेक्जेन्डर पर नाबेसिस (‘देश भ्रमण”) भी लिखा जिसमें सात पुस्तकें शामिहैंभारत पर लिखी उसकी पुस्तक इंडिके ऐनाबेसिस का ही एक छोटा भाग है।

स्रोतः जेम्स रॉम द्वारा संपादित अलेक्जेंडर द ग्रेटः सलैक्शन्स फ्रॉम एरियन, डियोडोरस, प्लूटार्क एंड क्युटस, हैकेट प्रकाशन कंपनी, इंडियानापोलिस/केम्ब्रिज। 

4. एरियन की इंडिके 

एरियन ने स्वयं को एक दार्शनिक, राजनेता, सैनिक और इतिहासकार के रूप में वर्णित किया है। यह अलेक्जेंडर के एशियाई अभियान के साथी के रूप में अधिक विख्यात हैं। इनकी लेखनी में सटीकता और स्पष्टता उल्लेखनीय है। भारत पर इनकी पुस्तक इंडिके आयोनी बोली (ग्रीक) में लिखी गयी है। इसमें तीन भाग सम्मिलित हैं: 

  • मेगस्थनीज़ और एराटोस्थिनिस द्वारा भारत के विवरणों पर आधारित पहला भाग भारत का एक सामान्य विवरण है;
  • दूसरा भाग नियरकस की सिन्धु यात्रा का लेखा-जोखा है; और 
  • तीसरा भाग यह प्रमाणित करता है की अत्यधिक गर्मी के कारण ही दुनिया के दक्षिणी हिस्से आबादी के योग्य नहीं थे।

इंडिके के पहले भाग का अनुवाद जे. डब्ल्यू. मैक किंडल द्वारा किया गया है और यह इतिहास, भूगोल, पुरात्व और ग्रीक मूल शब्दों के साथ संस्कृत के मूल नामों के भी संदर्भ प्रस्तुत करता है। मेगस्थनीज़ और नियरकस के विवरणों के आधार पर एरियन भारत के बारे में संक्षिप्त और रोचक विवरण प्रस्तुत करता है। वह भारत विशेष की सीमाओं की जानकारी से आरम्भ करता है जो उसके अनुसार सिन्धु के पूर्व में पड़ती थीं। वह उत्तर में हिंदुकुश, पश्चिम में सिंधु नदी और क्षिण में पट्टल का उल्लेख करके भारत की सीमाओं को चित्रित करता हैअलेक्जेंडर कनिंघम ने पट्टकी पहचान निरंकोल या हैदरबाद से की है जिसका पराना नाम पाटशिला था। उनके अनसार गंगा घाटी के पर्वी भाग प्रसियाका के विपरीत पश्चिमी भाग को ब्राह्मण पाताल शब्द से पुकारते थे। “पाताल” संस्कृत भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है पाताललोक । और यही संज्ञा पश्चिम की भूमि को भी दी गई है।

मैक किंडल के अनुसार स्ट्रैबो द्वारा दिए गए नापतोल के परिमाण एरियन की तुलना में अधिक टीक हैंहालाँकि कनिंघम की टिप्पणी है कि एरियन द्वारा बताए गए माप देश के वास्तविक आकार के निकट और बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये दर्शाते हैं कि भारतीयों को अपने इतिहास के शुरुआती चरण में ही अपनी मातृभूमि के आकासीमा का बहुत सटीज्ञान था।

सिंधु और गंगा की विभिन्न सहायक नदियों, भारत की जातियों एवं जनजातियों का उल्लेख करने के लिए उसने मेगास्थनीज़ के विवरण से जीवन सहायता ली है। एरियन बहुत विस्तार से नदियों, प्राचीन “बर्बर भारतीयों और खानाबदोश जीवन पर उनकी निर्भरता की चर्चा करता है। वह शक्तिमान अलेक्जेंडर के आगमन से पहले भारत आये डायोनिसस का उल्लेख करता है जिसने भारत को जीता और भारतीयों को कानूनों, कृषि और हल से परिचित कराया।

एरियन ने पाटलिपुत्र का भी वर्णन किया है जिसे वह ‘पालिम्बोथरा का सबसे बड़ा शहर’ कहता है। अलेक्जेंडर कनिंघम का कहना है कि एरियन द्वारा पालिबोथरा के लोगों को ‘प्रासी’ नाम देने पर स्ट्रैबो और प्लिनी सहमत थे। आधुनिक लेखकों ने इसकी तुलना संस्कृत शब्द प्राच्य या ‘पूर्वी’ से की है। कनिंघम का यह भी मानना है की ‘प्रासी’ शब्द ग्रीक भाषा के ‘पलासा से लिया गया है जो मगध, जिसकी राजधानी पालीबोथरा थी, को संबोधित करता है। 

एरियन बताता है की भारत में गुलामी की प्रथा नहीं थी। वह हाथियों द्वारा शिकार करने के तरीकों और सोने की खुदाई करने वाली चींटियों के बारे में भी लिखता है हालाँकि वह खुद इस बारे में विश्वस्त नहीं है क्योंकि मेगस्थनीज़ द्वारा सोने की खुदाई करने वाली चींटियों का वर्णन कहासुनी पर आधारित था। 

5. अलेक्जेंडर के उत्तराधिकारी और सेल्यूकस निकेटर । 

भारत और फारस से वापिस आने के बाद अलेक्जेंडर ने अपने साम्राज्य का संगठन व्यवस्थित ढंग से नही किया। अधिकांश विजित राज्यों को उनके शासकों को ही दे दिया गया जिन्होंने उसकी अधीनता को स्वीकार कर लिया था। उसके विजित भूखंड को यूनानी नियंत्रकों के अधीन तीन भागों में विभाजित कर दिया गया। अस्थिरता और अराजकता शीघ्र ही साम्राज्य में फैल गयी। विभिन्न क्षत्रपों के अधीन कई उत्तराधिकारी राज्य उभरे और मैसिडोनिया ने अपना महत्व खो दिया।

अलेक्जेंडर की मृत्यु के समय क्षत्रपों की संख्या 20 थी। 308 बी.सी.ई. तक आते-आते उन्होंने मैसेडोनियन साम्राज्य के साथ सभी संबंधों को समाप्त कर दिया और एंटीगोनस, सेल्यूकस और टॉलेमी के नेतृत्व में तीन अलग-अलग समूह बन गये। बेबीलोनिया के क्षत्रप के शिखर पर सेल्यूकस निकेटर था। एंटीगोनस द्वारा बेबीलोन से बाहर निकाले जाने के बाद उसने पुनः अपना राज्य प्राप्त किया और अपने प्रभुत्व को सिंधु तक पहुँचाने में सफल रहा। उसने पूर्व के सभी क्षत्रपों को अपने अधीन कर लिया। इस बीच चंद्रगुप्त मौर्य गंगा के मैदान पर अपनी शक्ति बढ़ा रहा था। वह अलेक्जेंडर के प्रस्थान के बाद पश्चिमोत्तर क्षेत्र में उभरी अनिश्चितता का लाभ उठाते हुए सिंधु तक पहुंच गया। वहाँ उसका सामना सेल्यूकस निकेटर से हुआ जिसका प्रभुत्व उस क्षेत्र में था। सिंध के मैदान में दोनों की सेनाओं का आमनासामना हुआ, यह क्षेत्र सेल्यूकस निकेटर का गढ़ था किन्तु लड़ाई में चन्द्रगुप्त की जीत हुयी। 303 बी.सी. . की संधि की शर्तों के अनुसार पूर्वी अफ़गानिस्तान, मकरान और बलूचिस्तान के सेल्यूसीड प्रदेश चंद्रगुप्त को मिल गए, बदले में सेल्यूकस ने 500 हाथी प्राप्त किए। सेल्यूकस ने अपनी बेटी का विवाह चंद्रगुप्त से करवाया। इस जीत के साथ पश्चिमोत्तर क्षेत्र के महत्वपूर्ण मार्ग मौर्य नियंत्रण में आ गए

अंततः चन्द्रगुप्त सेल्यूकस (यूनानियों) के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित हुएयूनानी विवरणों में चन्द्रगुप्त सैंड्राकोटोस’ के नाम से प्रसिद्ध था। सेल्यूकस के दूत मेगस्थनीज़ ने चंद्रगुप्त के दरबार में समय बिताया और इंडिका नामक ग्रन्थ लिखा। इंडिका मूल रूप से लुप्त हो गयी है किन्तु इसके कई अध्यायों को बाद के लेखकों जैसे डियोडोरस, स्ट्रैबो और एरियन ने अपनी कृतियों में प्रतिलिपित किया हैकई यूनानी राजदूतों जैसे मेगस्थनीज़, डायमाकोस, हेजिसेंड्रोस ने चन्द्रगुप्त के दरबार का दौरा किया और आपसी मैत्रीपूर्ण संबंध सावधानीपूर्वक आगे बढ़े। 

6. अलेक्जेंडर के आक्रमण का प्रभाव 

जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, भारत में अलेक्जेंडर के अभियान उतने महत्वपूर्ण नहीं थे जितने कि वह स्वयं विश्वास करता होगा। आर.के. मुखर्जी के अनुसार भारत में अलेक्जेंडर के अभियान किसी शानदार सैन्य उपलब्धि का उदाहरण नहीं थे क्योंकि उसका सामना किसी भी शक्तिशाली भारतीय सम्राट के साथ नहीं हुआ। उसके अभियानों का प्रभाव मुख्यतः अप्रत्यक्ष था। ए.के. नारायण के अनुसार अलेक्जेंडर के अनुशासित और संगठित अभियानों का छोटे राज्यों और रियासतों से कोई मुकाबला ही नहीं था यह तथ्य उत्तर-पश्चिम के लोगों ने समझा लिया था। चंद्रगुप्त ने एक विशाल साम्राज्य खड़ा करने के महत्व को समझा और नंद वंश को उखाड़ फेंकने के बाद संपूर्ण पंजाब और उत्तरी भारत को एकजुट किया। उसने न केवल दक्षिणी राज्यों को जीता, बल्कि चार क्षत्रपों – अरिया, अराकोशिया, गेड्रोशिया और पेरोपमिसेडिया – को भी एकीकृत किया जिन्हें सेल्यूकस ने अलेक्जेंडर की मृत्यु के बाद चंद्रगुप्त को सौंप दिया था।

इस तरह यूनानियों और भारतीयों के बीच मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध बने हुए थे। ग्रीक लेक एथेनेअस के अनुसार भारतीय शासक एमिटोकट्स ने सीरिया के एंटिओकस प्रथम को मीठी शराब, अंजीर और एक सोफिस्ट (तार्किक-बुद्धिजीवी) भेजने के लिए लिखा था। इस संदर्भ में सीरियाई राजा ने जवाब दिया कि वह खुशी से मीठी शराब और अंजीर भेजेगा, किन्तु ग्रीस में एक सोफ़िस्ट नहीं बिकता। स्टैबो सैंड्रोकोट्टोस के बेटे एलिट्रोकैड्स के दरबार में डीयामकस को भेजने का उल्लेख करता है। प्लिनी मिस्र के टॉलेमी द्वितीय द्वारा एक और दूत डायोनिसियस के भेजे जाने का उल्लेख करता है। इसके अलावा, अशोक ने पश्चिम एशिया और मिस्र के यवनों के साथ भी करीबी संबंध बनाए रखे। ग्रीस के कांधार प्रदेश में पाए गए उसके तेरहवें शिलालेख में सीरिया के एंटिओकस द्वितीय, मिस्र के टॉलेमी फिलाडेल्फस द्वितीय, मैसिडोनिया के एंटीगोनस गोमातास, साइरेन के मगास और कोरिथ के अलेक्जेंडर के राज्यों में अशोक के धम्मविजय का उल्लेख है। अशोक द्वारा एंटीओकस द्वितीय और उसके पड़ोसी राज्य के मवेशियों और मनुष्यों की चिकित्सा एवं उपचार के भी संकेत मिलते हैं। देवानामप्रिय पियदस्सी के रूप में अशोक का वर्णन न केवल यूनानी राजाओं के बीच उसकी वर्तमान स्थिति को दर्शाता है, बल्कि पश्चिम के यूनानी राजाओं के मध्य उनके देवता-सदृश्य पद को भी दर्शाता है। अशोक के शिलालेखों की शैली डेरियस के शिलालेखों से प्रभावित प्रतीत होती है। कौटिल्य और मेगस्थनीज़, दोनों विदेशियों के कल्याण की देखरेख करने वाले एक राजविभाग का उल्लेख करते हैं जो अधिकतर यवन और फ़ारसी थे। तक्षशिला, सारनाथ, बसढ़ और पटना में प्राप्त पकी मिट्टी की कलाकृतियों में स्पष्ट यूनानी प्रभाव दिखाई देता है। 

अलेक्जेंडर के आक्रमण ने बैक्ट्रिया और वर्तमान अफगानिस्तान और पाकिस्तान के हिस्सों में ग्रीक सत्ता की स्थापना के लिए मार्ग प्रशस्त कियापुरातात्विक सिक्कों से लगभग 40 यवन वंश के शासकों की जानकारी मिलती हैस्ट्रैबो कहता है की इन राजाओं ने अलेक्जेंडर से अधिक संख्या में जनजातियों को अपने वश में किया। इनमें मिनांडर और यूथीडेमस का पुत्र बैक्ट्रियन जनता के राजा के रूप में विख्यात डेमेट्रियस सर्वाधिक उल्लेखनीय शासक थेये इंडो-ग्रीक राजा भारतीय धर्म संस्कृति से मान रूप से प्रभावित थे। उनके कई सिक्कों पर भारतीय आकृतियाँ मिलती हैं। इंडो-ग्रीक राजा एंटियालकिडस ने तक्षशिला के निवासी तथा डायोन के पुत्र हीलियोडोरस को भारतीय राजा भागभद्र के दरबार में अपना राजदूत नियुक्त किया था। इसका विवरण मध्य प्रदेश में भिलसा के समीप स्थित बेसनगर में प्राप्त हीलियोडोरस के शिलालेख में मिलता है जिसमें उल्लेख किया गया है कि वह हिंदू धर्म के भागवत संप्रदाय का अनुयायी था। मिनांडर के कुछ सिक्कों पर पहिए की छवि अंकित हैं, विद्वानों का मानना है कि यह धार्मिकता का पर्याय समझे जाने वाले बौद्ध प्रतीक ‘धर्मचक्र से सम्बन्धित है।

अलेक्जेंडर के अभियानों के कारण भारत का पश्चिमोत्तर क्षेत्र यूनानी संसार के साथ सीधे संपर्क में आया। समुद्र और भूमि मार्ग खुल ग, जिनके माध्यम से यूनानी व्यापारी औशिल्पकार दूर-दराज के क्षेत्रों तक पहुँचे। इस क्षेत्र में यूनानी बस्तियों की स्थापना की गई, उदाहरण के लिए काबुल क्षेत्र में अलेक्जेंड्रिया, झेलम पर बाऊकेफला, सिंध में अलेक्जेंड्रिया। अलेक्जेंडर ने सिंधु के मुख से लेकर यूफ्रेट्स के बंदरगाहों और तटों की भौगोलिक खोज भी की। उसके इतिहासकारों ने उसके अभियानों की भौगोलिक योग्यता के संबंध में बहुमूल्य जानकारी दी है। भारतीय कालक्रम को एक ठोस आधार प्रदान करने के अतिरिक्त यूनानी वर्णन हमें भारतीय प्रथाओं जैसे सती, गरीब माता-पिता द्वारा बाजार में लड़कियों की बिक्री और बैलों की अच्छी नस्लों के बारे में बताते हैं। वास्तव में, अच्छी किस्म के 2,00,000 बैलों को अलेक्जेंडर द्वारा भारत से मैसेडोनिया भेजा गया था। भारतीयों द्वारा बनाये रथ, नाव और जहाज़ों के आधार पर यूनानियों ने पाया की भारतीयों ने काष्ठकला के क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त की थी। 

7. साराश

इस इकाई में हमने जाना कि भारतीय इतिहास के आरम्भ से ही भारत के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र ने आक्रमणकारियों का ध्यान आकर्षित किया। एकेमेनिड हमलों के बाद अलेक्जेंडर ने उत्तरपश्चिमी भारत की रियासतों और राज्यों पर विजय प्राप्त की। भारतीयों के वीरतापूर्ण संघर्ष और विरोध के बावजूद वह भारतीय शक्तियों को अपने अधीन करने में सफल रहा। उसने रात में ही हाइडस्पिस (झेलम) को पार किया और पोरस को हराया किन्तु उसकी वीरता से वह इतना प्रभावित हुआ कि उसने पोरस को अपना राज्य बनाए रखने की अनुमति दी। परन्तु वह चेनाब और रावी (एसेसीन्स, हाइड्रोटिस) से आगे नहीं जा पाया क्योंकि उसके सैनिकों ने आगे बढ़ने से इनकार कर दिया। हमने यह भी जाना कि एरियन के वर्णन अलेक्जेंडर केअभियानों के इतिहास का मुख्य स्रोत हैं। एरियन ने अपनी पुस्तक इंडिके में कुछ तथ्यात्मक और कुछ काल्पनिक विवरण दिए हैं जो अन्य यात्रियों के विवरणों पर आधारित हैं। अलेक्जेंडर के उत्तराधिकारियों में सबसे उल्लेखनीय सेल्यूकस निकेटर था जो चंद्रगुप्त मौर्य के साथ लड़ा किन्तु हार गया। उन्होंने मौर्य राजा के दरबार में यूनानी राजदूत मेगस्थनीज़ को भेजा जिसने अपनी इंडिका में चन्द्रगुप्त के शासनकाल का दिलचस्प वर्णन किया है।

शब्दावली

एकेमेनिड : एकेमेनियन राजवंश के सदस्य जिन्हें एकेमेनिड (फ़ारसी में हखमनिशिया) भी कहा जाता है (559330 बी.सी.ई.)। यह प्राचीन ईरानी राजवंश था जिसके राजाओं ने एकेमेनिड साम्राज्य की स्थापनाऔर उस पर शासन किया। 

दायादोची : अंग्रेजी ऑक्सफोर्ड शब्दकोश के अनुसार, दायादोची सिकंदर महान के छह सेनानायकों – एंटीगोनस,एंटीपेटर, कैसेंडर, लाइसीमेकस, टॉलेमी तथा सेल्यूकस को संदर्भित करता है जिनके बीच 323 बी.सी.ई. में उसकी मृत्यु के पश्चात् उसका साम्राज्य विभाजित हो गया। यह ग्रीक शब्द ‘दायादोखोई’ (diadokhoi) से लिया गया है जिसका अर्थ है, ‘उत्तराधिकारी’ |

क्षत्रप: प्राचीन फ़ारसी साम्राज्य के प्रांतों के नियंत्रक।

यवन: प्रारंभिक भारतीय साहित्य में इस शब्द का अर्थ ग्रीक (यूनानी) या किसी अन्य विदेशी से है।